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मैथिली_थिसॉरस_और_समाज_का_एक्स-रे.m4a
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- 0:00–0:07ज़र खल्पना कीजीए के एक दिक्षनरी कोली जाएं, और उस में नो शब्द कोजाएं, अंगरीजी वाल अशनो.
- 0:07–0:12और उसका मतलब बर्फ नहीं बलकी चेहरे पर लगाने वाली कोल्ड क्रीम निकले.
- 0:12–0:15और वाजा ये तो सच्मे चोकाने वाला है.
- 0:15–0:25या फिर मतलप कोई एसा शब्द मिले, जो महेज एक मज्दूर का नहीं, बलकी बिना पैसों के चलने वाली एक पूरी ग्रामीन अर्थ विवस्था का नाम हो.
- 0:25–0:31बिलकु और आम अखसर दिक्षनरी या शब्द कोष, शब्दो की बस इक उबाओसी सुची मान लेते है.
- 0:31–0:34इक असी मोटी किताब जिसे सर्फ तब उठाया जाता है,
- 0:34–0:37जब किसी शब्द की श्पलिंग चेक करने हो.
- 0:37–0:41सही बाते. लेकिन असल में, कोई भी शब्द कोश श्ब्दों का,
- 0:41–0:43मतलब नरजीव संग्रा नहीं होता.
- 0:43–0:44तो फिर क्या होता?
- 0:44–0:52ये किसी संट्क्रती, उसके इतिहास, उसके केतों और उसकी रसोयों का इक हाई देफनिशन अख्स्रे होता है
- 0:52–0:54अख्स्रे? ये कापी दिल्चास्प तून्ना है?
- 0:54–0:55तुन्नाय?
- 0:55–0:59आँ एक आँसा एकस्रे जो समाज की हड्डीों उसकी नसूं
- 0:59–1:03और उसके काम करने की तरीके को बलकोल पार्दर्षी बना देता है.
- 1:03–1:06चल ये फिर इसी एकस्रे को आज खूल कर देकते है.
- 1:06–1:36अगर बद्यादा बद्यादा बद्यादा बद्यादा बद्यादा बद्यादा बद्यादा बद्यादा बद्यादा बद्यादा बद्यादा बद्यादा बद्यादा बद्यादा बद्यादा बद्यादा बद्यादा बद्यादा बद्यादा बद्यादा बद्यादा बद्या�
- 1:36–1:40या अदर बाशाई ब्रमान्द की अवर रिशारा करती है।
- 1:40–1:42और इस में भी सबसे हैरानी की बात ये है,
- 1:42–1:48की अकेले सर्फ अग़ अखचर से शुरू हुँए वाले 10,406 शबद है।
- 1:48–1:50ये वाखगी हेरान करता है।
- 1:50–1:53तो होने वाले 10,406 शब्द हैं
- 1:53–1:56तो जब एक अख्षर से 10,000 से ज़ादा शब्द
- 1:56–1:58ये वाखगी हेरान करता है
- 1:58–2:00बलकुल, कोई भी सोचेगा कि अखर
- 2:00–2:02इतने सारे शब्द आते कहां से हैं
- 2:02–2:04मदलब एकी बाशा में इतनी बारी की
- 2:04–2:06तो तो तो बज़ागा बज़ागा विशिष्ट शब्द कैसे पढ़ा हो सकते हैं
- 2:06–2:12यही से उस रही देफिनिशन एकस्रे की पहली अस्ली तस्वीर सामने आती है
- 2:12–2:17कुकि देखे इतनी विशाल शबदावली किसी कम्रे में बैट कर रातो रात तो नहीं गडी जाती
- 2:17–2:20जब अपने आस्पास की हर चीस को एक नाम देटेटा है
- 2:20–2:26एक दम सही, एक बाशा अपने समाच के हर एक चोटे हिस्चे को अपने शब्दों में सहेज कर रकती है
- 2:26–2:30जेसे खेती के तरीके या खाना बनाने की विदियान जाएगा
- 2:30–2:36तो उसका हर काम, हर अजार, हर मोसम, बाशा मे अपनी जगा बनाता है.
- 2:36–2:38मडल वो अपने अस्पास की हर चीस को एक नाम दे देता है.
- 2:39–2:39एक दम सही.
- 2:40–2:45एक बाशा अपने समाच के हर एक चोटे हिस्छे को अपने शब्दो में सहेज कर रकती है.
- 2:45–2:47जेसे खेती के तरीके या काना बनाने की विदिया
- 2:47–2:50आप, चाहे वो क्रिषी का जटल तरीका हो,
- 2:50–2:53बोजन पकाने की कोई खास विदिय हो,
- 2:53–2:54पहने जाने वाले वस्त रहो,
- 2:54–2:57या फिर लोगों का आपसी लोक विवावार
- 2:57–3:02तो ये थिसवरस आसल में सदियों का जमा किया हुए एक सांसक्रितिक बांक है.
- 3:02–3:07बिलकु एक अझसा बांक, जहां हर शबद एक सिक्के की तरा है.
- 3:07–3:11और इसी सांसक्रितिक बांक से जब हम कुछ शबद निकालते है,
- 3:11–3:15तो ये समजाता है के किसी समाज का मुख्ध्य व्यव्साए
- 3:15–3:16उसकी दिक्षनरी कैसे लिकता है
- 3:16–3:18ये बहुत महें तुपून बात है
- 3:18–3:21मित्ला मुखे रूप से एक ख्रिषी प्रदान शेट्र रहा है
- 3:21–3:23इसले यहां के थिसवोरस में
- 3:23–3:25केतों की मिट्टी से लेकर
- 3:25–3:27अजारों तक कग इतना बारीक विव्रन है.
- 3:27–3:28जी.
- 3:28–3:29मैंन नोट्स में इक शब्द देखा.
- 3:30–3:31अंगवार या अंगवर्या.
- 3:32–3:32पहली नजर में,
- 3:32–3:35नजी बगा की ये शाथ किसी आम,
- 3:35–3:36खेट, मस्दूर या,
- 3:36–3:37हल्वाहे का नाम होगा.
- 3:37–3:39ये बहुत इज़ स्वबाविक सी बात है,
- 3:39–3:42कि हम इसका सीदा अनुवाद मस्दूर कर दें.
- 3:43–3:44तो क्या ये सर्फिक मस्दूर नहीं है?
- 3:44–3:45बिलकुल नहीं.
- 3:45–3:49इस थिसवारस के पन्ने कुछ और ही कहानी बताते हैं?
- 3:49–3:52अंग्वार स्विक व्यक्ती अ मस्दूर नहीं है,
- 3:52–3:58बलकी यहे ग्रामीन समाज की एक पूरी सामाजिक आर्टिग विवस्ता का नाम है.
- 3:58–4:00आच्छा एक पूरी विवस्ता?
- 4:00–4:07आँ यहे एक बहुत फीजटिल बाटर सिस्तम यह कहे वस्तू विनिमाई प्रनाली का हिस्सा है.
- 4:07–4:09आँ ये काम कैसे करता था?
- 4:09–4:39अग्वार वाई लाईग का आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आ� आप आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ�
- 4:39–4:41ये तो सच्छ में हरान करने वाला है
- 4:41–4:45ये तो इसका मतलब है कि उस ग्रामीन अर्थ्वेवस्ता में
- 4:45–4:49चाहा शाएद नकत पैसा हर किसी किषी किषाँजा असानी सुप्लप नहीं होता था
- 4:49–4:53माहश्रम और संसादनो का लें दें इस तरा के समजोतो पर तिका था
- 4:53–4:56एक दम, उस वमैं की अर्थ्वेवस्ता को समजने के लिए
- 4:56–4:59ये शब्द एक चाभी कितरा है
- 4:59–4:59सही कह?
- 4:59–5:03इस में, मालिक के पास बेल और हल जैसे सन्सादन तो है
- 5:03–5:07लेक शाएद उसके पास सारा काम रहा खुड करने का समझ
- 5:07–5:08या शारे रिक शमता नहीं है
- 5:08–5:12और मज्दूर के पास आपना श्रम है, इस सर्फ काम का लें दें न नहीं है,
- 5:12–5:15ये समाज में संतुलन बनाई रकने का एक तरीका था.
- 5:15–5:20सो प्रतीषत अंग्वार शब्द इस बात का जीता जागता प्रमाण है,
- 5:20–5:22यह तो सर्फ एक आर्थिक वेवस्ता की बात हुई
- 5:22–5:25नोट्स मे आगे खेती से जुडे अजारो के नामी दिये गे है
- 5:25–5:29और आम यहां बात सच्छ में बहुत दिल्चास तो जाती है
- 5:29–5:31अजारो वाले हिस्से में देखाराई है
- 5:31–5:33आप इक शबद है अंकुड
- 5:33–6:03तो ज़ाँ बाज तो ज़ाँ बाज तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो
- 6:03–6:33अग चाँ बाज़ बाज़ में, अग चाँ बाज़ बाज़ बाज़ बाज़ बाज़ बाज़ बाज़ बाज़ बाज़ बाज़ बाज़ बाज़ बाज़ बाज़ बाज़ बाज़ बाज़ बाज़ बाज़ बाज़ बाज़ बाज़ बाज़ बाज़ बाज़ बाज़ बाज
- 6:33–6:35अगा उड़ार की बड़ी की थरफ चलें?
- 6:35–6:36वहां क्या हुटा है?
- 6:36–6:42वहां कोईले को कुरेदने और आग को सेट करने के लिए एक विषेच तेगे लोहे के अजार की जरूरत होती हैं?
- 6:42–6:44उसे भी अंकुड कहा जाता है
- 6:44–6:46दोनो का नामे की है, पर काम बिल्कुल अगतो
- 6:46–6:48उसे भी अंकुड कहा जाता है.
- 6:48–6:50दोनो का नामे की ये पर काम बिल्कु लगत हो.
- 6:50–7:01तो तो तो तो तो जानवरों को दागने या पहचान का निशान लगाने के लिए,
- 7:01–7:06जो आगे से मुडा हूँा लोग उपकरन होता है, वो भी इसी श्वेनी में आता है.
- 7:06–7:10ये तो ये ये साज़े से बाशा सीदे केतों बटींवों और पीडों से निकल कर पन्नों पर आगगे हूँ.
- 7:11–7:16अंगरेजी का हुक तो बहुती सामान्ने और फीका शबद लकता है इसके सामने.
- 7:16–7:19अंगरेजी का हुक बस एक आकार को दरषाता है.
- 7:19–7:25लेकिन मैठली का अंकुर अपने आप में एक पुरा अक्ष्छन एक पुरा पेशा समेटे हुएं
- 7:25–7:26ये बात बलकुल सईए है
- 7:26–7:31जब को याउजार आपके रोज मरदा की जिन्दगी आपके काम धनदे किलि एतना ज़रूरी होता है
- 7:31–7:33कि उसके बना आपका दिन नहीं गुजर सकता,
- 7:33–7:37तो बाशा उसे गेहराई से परवाशित करने लकती है.
- 7:37–7:40अप अब अगर उजरों और केतों से तोडा आगे बड़ें,
- 7:40–7:41तो इन सब का अंतुम लक्षे क्या था?
- 7:41–7:43अंतिम लक्षे तो फसल ही है.
- 7:43–7:44बलकल फसल.
- 7:44–7:46और फसल अखिरकर कहां जाती है?
- 7:46–7:47रसोई में
- 7:47–7:51इस टिसटिसवारिस में भोजन और पाकला को लेकर जुबाली क्या है
- 7:51–7:53वे भी कम दिलचवस्प नहीं
- 7:53–7:56खाने पीने की शब्दावली तो हमेशा से भोछ सम्रुद रही है
- 7:56–7:58कुई किछ तुछ भी खेट में पैडा होता है
- 7:58–8:02अगर कार किसी बी संसक्रती का असली स्वाद और उसकी एकोनमी तैक अरते है
- 8:02–8:08बोजन किसी बी संसक्रती की सबसे मजबुत असबसे पुरानी पहचान होता है
- 8:08–8:10अगट इसके बारे में क्या जानकारी है?
- 8:10–8:17इसके बारे में लिखा है कि ये गेहूँ चने मसुर्या कहिसारी की फसल के भीच उगने वाली एक प्रकार की गास या चोटे दाने वाला अन्ने है.
- 8:17–8:19अच्छ एक तरा का खरपतवाद?
- 8:19–8:22अगत या अंकरा
- 8:22–8:25अंकत इसके बारे में क्या जानकारी है
- 8:25–8:29इसके बारे में लिखा है कि ये गेहू चने, मसुर या केसारी की फसल के भीच
- 8:29–8:32उगने वाली एक प्रकार की गास या चोटे डाने वाला अन आप
- 8:32–8:34अच्छ एक तरा का खरपत वात
- 8:34–8:38अब अगर आजकी आदूनिक अद्श्ट्यल फामिंकी बाद की जाए,
- 8:38–8:42तो हम इसे शाएद सर्फ वीड मान कर कीट नाशक डालकर खतम कर देंगे.
- 8:42–8:44भिलको लाज तो यही होता है.
- 8:44–8:47लेकिन थिसवोरस एक कडम आगे जाकर बताता है,
- 8:47–8:50इस गास के चोटे-चोटे-गोल दानो को पहगा नहीं जाता ता
- 8:50–8:52बलकी उनसे दाल बनाई जाती थी
- 8:52–8:53औरे वाआ
- 8:53–8:55ये जानकारी उस समें की
- 8:55–8:57खादे सुरक्षा और सन्सादनो के
- 8:57–8:58प्रती लोगो के
- 8:58–9:01नजरिये को मतलप पुरी तरह से खोल कर रग देती है
- 9:01–9:06मुजे तो ये पडकर आजके औन आदूनेक फैंसी कुकिंचोस की यादा गई जाहां
- 9:06–9:08जीरो वेस्ट कुकिंग की बात होती है
- 9:08–9:11आजकल ये बहुत बडाट ट्रेंट है
- 9:11–9:41अचके शेव बहुत गर्व से बताते हैं कि कैसे वे सबजीों के चिलकोंगा भी अपी अपी अपी अपी अपी अपी अपी अपी अपी अपी अपी अपी अपी अपी अपी अपी अपी अपी अपी अपी अपी अपी अपी अपी अपी अपी अपी अपी अपी अपी अपी अ
- 9:41–9:44गरामीड जीवन पर मद्राता रहता था
- 9:44–9:47और इसलिये उने हर चीज बचानी पड़ती थी
- 9:47–9:51बलकुल आज़े में मुख्यफसल के सात उगने वाले
- 9:51–9:54किसी भी खाध्द पदार्त को विर्थ नहीं जाने दिया जाता था
- 9:54–9:59बाशा ने उस जीरो वेस्ट दरशन को उस अस्तित्व बचाने की जद्डो जहत को अंकत जैसे शब्द के रूप में,
- 9:59–10:02समाज के पास सीमिज संसादनो का अदिक्तम उप्योग करने की
- 10:02–10:06एक बहुत गेहरी वेग्यानिक समज ती
- 10:06–10:07वेग्यानिक समज ती, सबी का
- 10:07–10:10वे प्रक्रिती से मिलने वाले, हर एक दाने को
- 10:10–10:12पोशन में बडलना जानते थे
- 10:12–10:14अज सब से खुबसुरत बात यह है,
- 10:14–10:20की भाशाने उस जीरो वेस्ट दरशन को उस अस्थित्वबचाने की जद्डो जहत को
- 10:20–10:25अंकत जैसे शब्द के रूप में, मतलब अपने भीटर हमेशा के ले सुरक्षित कर लिया.
- 10:25–10:28इसी तरा रसुए का एक अर शबद है को मुझे बहुत दिल्चस्त लगा.
- 10:28–10:29अंटका.
- 10:29–10:30अंट्का
- 10:30–10:31ये किस चीस के लिए?
- 10:31–10:34नोट्स बताते हैं कि ये एक बहुत बड़ा मिट्टी का बरतन है,
- 10:34–10:36जिस में खाना पकाया जाता है.
- 10:36–10:39लिकिन बात सिझ बरतन तक सीमित नहीं रहती.
- 10:39–10:40अच्छ अवर भी कुच है?
- 10:40–10:41रहां.
- 10:41–10:43पूरी में बबाग्वान जगननात को,
- 10:43–10:46विशेश चावल प्रसाथ के रूप में च़ाईा जाता है
- 10:46–10:49उस चावल का नाम भी अंट का ही दरज है
- 10:49–10:52कुकि वो इसी मिट्टी के बरतन में पकाया जाता है
- 10:52–10:56ये एक बहुत ही सुन्दर भाशाएई और संसक्रितिक सफर है
- 10:56–11:00यहां देखा जा सकता है के से एक बहुतिक वस्तू,
- 11:00–11:02मतलब एक मिट्टी का बर्टन,
- 11:02–11:05अपनी उप्योगिता के कारण इतना पवित्र हो जाता है,
- 11:05–11:08कि वो सीदे इश्वर के प्रसाथ का पर्याए बन जाता है.
- 11:08–11:10भिल्कुल बर्टन और प्रसाथ का नाम एक हो गया.
- 11:10–11:14दाशा बर्टन और अनुश्टान की भीज की दूरी को मिता देती है
- 11:15–11:18बर्टन का नाम ही उस पवित्र भूजन का नाम बन जाता है
- 11:18–11:21ये बहुत फी गेरी बात है
- 11:21–11:23और जब खाने और अनुश्टान की बात हो रही हो
- 11:24–11:26तो आचार यहनी आचार का जिकल तो आना है
- 11:26–11:29अचार के बनातो बारतिय ठाली अदूरी
- 11:29–11:38वही तो तिसवारस में आचार को आदूनिक मैठिली साहित्ते में भोजन विन्यास का एक भेहत ज़ोरी हिस्सम आना गया है
- 11:38–11:43मुझे लगता ता आचार सरफ एक साइट दिष है जिसे बस स्वात किले खालिया जाता है
- 11:43–11:47नहीं ने, बोजन विन्यास का मतलब सर्फ खाना काना नहीं है,
- 11:47–11:50बलकी यहे बोजन को परोसने की एक पूरी कला है,
- 11:50–11:52ये एक संसक्रतिक प्रतीक है.
- 11:52–11:54एक कला वो कैसे?
- 11:54–11:56दिक ही अचार बनाने की प्रक्रीया,
- 11:56–11:58उसे महीनो तक दूप में रकना,
- 11:58–12:00मसालो का सही अनुपात,
- 12:13–12:15भोजन विन्यास की बात होती है,
- 12:15–12:18तो उस में आचार की एक निष्छित सन्रचनात्मक
- 12:18–12:21और सम्मानजनक जगा होती है.
- 12:21–12:23ये सरफ एक अतरिक्ट विएनजन नहीं है,
- 12:23–12:26ये ठाली को पुरनता देने वाला हिस्था है.
- 12:26–12:29ये तो बहुती शान्दर नजर या आगा खाने को दिखने का
- 12:29–12:33खेर अप तक तो बात लेपों की मिट्टी और रसोई के दूए कि हुई
- 12:33–12:33जी
- 12:33–12:37लिकिन कुई भी संस्क्रिती, कुई भी समाज एक बंद दिभबे में नहीं रह सकता
- 12:37–12:39बहरी दुन्या का प्रब्हाँ परतदे है?
- 12:39–12:40जाहर सी बात है!
- 12:40–12:45जैसे-जैसे समें बडला, अंगरेजी शासन का प्रब्हाँ भारत के हर कोने पर पडा,
- 12:45–12:47और इस थेसारिस के दस्तावेज दिखाते है,
- 12:47–12:50कि ये प्रब्हाँ मैत्हली बाशा की शब्दावली में भी
- 12:50–12:52बाशाये कभी स्तिर नहीं रह सकती
- 12:52–12:55अगर वि स्तिर होगें तो मतलवे मरजाएंगी
- 12:55–12:56बिलकल
- 12:56–12:58वि बहती नदियो की तरा होती है
- 12:58–13:00जो अपने रास्ते में आने वाली नहीं चीजों
- 13:00–13:02नहीं पत्तरों और नहीं मिट्यों को
- 13:02–13:04अपने बहावो में शामिल कर लेती है
- 13:04–13:08अगनाई मिट्यों को अपने बहाँ में शामिल कर लेती हैं.
- 13:08–13:10इस तिसोरस में अंगरेजी मुलक
- 13:10–13:13या इंगलिष ड़ाइव्ट शब्दो की एक पूरी के पूरी श्रेनी दीगाई है.
- 13:13–13:14अच्चा.
- 13:14–13:15कोन कों से शब्दा उस में?
- 13:15–13:22ये देखना बहुत दिल्चष्प है कि कैसे आदूनिक वस्तरोने इस टेट पारमपर एक बाशा मे अपनी जगा बनाई.
- 13:22–13:27उदारन के लिए शब्द कोष में कोट, कोलर, यान खमीज की कोलर,
- 13:27–13:32ताईल, गले में बानने वाली ताई, और हेम, वस्त के किनारे की सिलाई,
- 13:32–13:34जेसे शब्द बलकुट स्पश्ट्रूप से दर्च है
- 13:34–13:38ये उस वह चमाजिक बदलाव का सीदा दस्टावीजी करन है
- 13:38–13:40जब अंग्रेज आए, तो नके साथ उनका पहनावा भी आया
- 13:41–13:42हा, कोट तो ताए तो उनही के साथ आद आए
- 13:42–13:48और इस्तानी दर्जीं और आम लोगों जब नहीं तरा की सिलाई यी और नहीं तरा की कब्रे अपना ने शुरू किए,
- 13:48–13:52तो जाहिर है उनके पास ये ने डिजाईनो के लिए पुराने शब्द नहीं ते.
- 13:52–13:55इसले उनो ने सीदे उन विदेशी शब्डो को ही अपना लिया
- 13:55–13:57बलकोल अपनी सहुलियत के साब से
- 13:57–14:02लेकिन इन विदेशी शब्डो में मेरे लिये जो सबसे बड़ा चोकाने वाला शब्द्चा
- 14:02–14:04वो ता सनो
- 14:04–14:06वगी जिसके बारे में हम ने शुरू में बात की थी
- 14:06–14:13तो आप यह जान ते हैं के अंगरीजी में स्नो का मतलप बर्फ होता हैं
- 14:13–14:16लेकिन तिस्वारूस में स्नो का मतलप बर्फ नहीं दिया गया है
- 14:16–14:18तो क्या थिया गया है?
- 14:18–14:22इसका अर्थ है चेहरे या ललाड़ पर लगाय जाने वाला आदूनिक कोसमेटिक
- 14:22–14:25जिसे हम कोलक्रीम केतें अग़ आब ये कैसे हूँँँँ
- 14:25–14:28के बरफ का मतलब चहरे की क्रीम बन गया?
- 14:28–14:33ये बाशाव के आपसी टक्राव और बाजार के प्रभाव का एक बहुती
- 14:33–14:37ख्लासे कुदारन है. बाजार का प्रभाव? वो कैसे काम करता है?
- 14:37–14:41जब अंग्रेज भारत आए, तो वो आपने साथ ठ़न्दे देशो में स्तमाल होने वाली
- 14:41–14:44कोल क्रीम लेक रहें तो उन दिनो और बाद मे भी,
- 14:44–14:49कई यह सी क्रीम बजार मे आई जिनके दिब मों पर ब्रान्ट के नाम के साथ
- 14:49–15:19तो था दो बगाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद न
- 15:19–15:21मूल आर्ट को पूरी तरा से चोर दिया
- 15:21–15:24और उस वस्तू के स्थान्या उप्योग को अपना लिया
- 15:24–15:27बाजार की ब्रेंटिंग भाशा का हिस्वा बन गय
- 15:27–15:30ये तो मारकिटिंग का एक मलगब सद्यो पुराना के चट़ी बन गय
- 15:30–15:31एक दम सेई के रहे है
- 15:31–15:33आँगुर्तान अगुर्तान अगुर्तान
- 15:33–15:34आँगुर्तान
- 15:34–15:35आँगुर्तान
- 15:35–15:36आँगुर्तान
- 15:36–15:37आँगुर्तान
- 15:37–15:38आँगुर्तान
- 15:38–15:39आँगुर्तान
- 15:39–15:40आँगुर्तान
- 15:40–15:41आँगुर्तान
- 15:41–15:42आँगुर्तान
- 15:42–15:43आँगुर्तान
- 15:43–15:44आँगुर्तान
- 15:44–15:45आँगुर्तान
- 15:45–15:52नोट्स में से मित्था साद्दिष्या, यानी फाल्स अनालोगी के दूनी उदारन के रुक में दरज की आगे है.
- 15:52–15:58ये मित्था साद्दिष्या क्या होता है, और अंगुष्धान से अंगुर्टान का सफर कैसे तैहुवा?
- 15:58–16:03ये एक बहत महत्वपों प्रश्न कड़ा करता है
- 16:03–16:08मित्या साद्रिष्य बाशा विग्यान का एक बहुत दिल्च्यस् पनीम है
- 16:08–16:11जिसे आम लोग अन्जाने में ही बना देते हैं
- 16:11–16:13अन्जाने में? कैसे?
- 16:13–16:16अंगुष्तान असल में एक फार्सी शब्द है
- 16:16–16:20जब ये शब्द आम ग्रामीनो या स्थानिये लोगों के भीज पहचा,
- 16:20–16:24तो उच्चारन में ये उने थोड़ा पराया या मतलब भारी लगा.
- 16:24–16:26आप बूलने में थोड़ा मुष्किल है.
- 16:26–16:30उनो ने देखा कि ये छीज आंगुली या आंगुर में पहनी जाती है.
- 16:30–16:32अंगुर मतलब उंगली
- 16:32–16:35इसलि उनके दिमाग ने एक लोगिकल चलाण लगाए
- 16:35–16:36अचा
- 16:36–16:38उनो अने अंगुष्टान को
- 16:38–16:40अपनी समच के हिसाप से मोडखर
- 16:40–16:42अंगुडटान कर दिया
- 16:42–16:44मतलब उनो अग विदेशी शबद को
- 16:44–16:47अपने जाने पहचाने शब्द के साचे में फिट कर दिया?
- 16:47–16:47भिलकुल
- 16:47–16:51इसी को मित्या साद्रिष्या या फाल्सनालेजी कहते है
- 16:51–16:58जब कोई विदेशी या नया शब्द किसी जाने पहचाने स्थानिये शब्द के जैसा लगने लकता है
- 16:58–17:02जेसे अंगुर तो लोग उसे उसी के अनरूब द्हाल लेते हैं
- 17:02–17:04बहले ही व्याक्रन के हिसाब से वो गलत हो
- 17:04–17:07रहा, बहले ही व्याक्रन या उत्पती के हिसाब से वो गलत हो
- 17:07–17:13उनका मकसत बस उष्षब्द को अपनी जुबान किली आसान और अर्थपोन बनाना था
- 17:13–17:16ये सच में अदब होतें, लेकिन यह आईक सवाल भी उड़ता है.
- 17:16–17:16क्या सवाल?
- 17:16–17:20अखसर के भाशा वादी यह सुद्दददावादी लोग शिकाएत करते हैं,
- 17:20–17:25के विदेशी शबनो के आने से या उने इस तर आपने इसाप से मोल लेने से,
- 17:25–17:27कोई भी मुल बहाशा कमजोर या ब्रष्ट जाती है
- 17:27–17:29आई ये बहिज तो बहुत पुरानी है
- 17:29–17:31तो क्या विदेशी शब्डो को यस तरा
- 17:31–17:32अंगुर्तान या स्नू बना देना
- 17:32–17:34किसी बहाशा की कमजोरी है
- 17:34–17:36या फिर ये उसके लचीले पन को दरषाता है
- 17:36–17:42अगर हमे तिहास को गेराई से देक हैं, तो जो बाशाए खुद को एक चार दिवारी में बन कर लेती हैं,
- 17:42–17:47जो शुद्द्टा के नाम पर नैई शब्डो को नहीं अपनाती, वे दिरे-दिरे मर जाती हैं.
- 17:47–17:48वतला उनका अंथ हो जाता है.
- 17:48–17:58बलकुल, बाशाय व्श्पन्ज कितरा हूती है, वे नई तक्नी की बडलावों, नई कप्डों और नई अजारों को बहुत थेजी सुकती है.
- 17:58–18:06लेकिन एक मस्वूथ बाशा उने ज्योंका त्यों नहीं रकती, बलकी उने अपने स्थानी ए लहेजे में डाल लेती है.
- 18:06–18:10जेसे मिरर या आईना किलिए मेत्फिली मिशव्द बन गया आईन
- 18:10–18:14बलकुल सही उदारन ये बहाशा की कमजूरी नहीं
- 18:14–18:17बलकि उसकी शान्दार पाचन शकती है
- 18:17–18:23एक जिन्दा बहाशा नईए शब्दों को खाखर पचाखर अपने ही रँग में रग देती है
- 18:23–18:26तु मदलब इस पूरी चर्चा का अखिर कर क्या आप्द निकलता है
- 18:26–18:29जब हम एक लाक प्टलिस हसार से जआदा शब्डो वाले
- 18:29–18:31इस विशाल मेठिली हन्रेजी तिसारस के
- 18:31–18:33पननो से होकर गुजरते है
- 18:33–18:37तो ये बात बिल्कुल साफ जाते है कि ये केवल एक दिक्षनरी नहीं हैं
- 18:37–18:40बिल्कुल नहीं, ये उसे कही बडखर है
- 18:40–18:44ये उन किसानो का पसीना है जो अंग्वार वेवस्त्तामे बिना पैसो के काम करते थे
- 18:44–18:48ये उन लोहारों और ताडी निकालने वालों की कला है, जो अगकुड बनाते ते.
- 18:49–18:55आँ और उन रसुइयों की गेहरी समजदारी भी, जो अकाल के दर से गासे भी दाल निकाल लेते ते.
- 18:55–19:00ये उन आम लोगों के जीवन का एक बड़ा और सुवच्छित मुज्यम है,
- 19:00–19:03जिनोने पीडियों से इस गयान को जीया है.
- 19:03–19:08ये सच्छ है, जोभी किसी विषे या संसक्रिती को गेराई से समझना चाहता है,
- 19:08–19:10उसके लिए ये सबसे बड़ा सबक है.
- 19:10–19:14जोबी किसी विष्य या संट्सक्रती को गेराई से समझना चाहता है
- 19:14–19:16उसके लिए ये सबसे बड़ा सबख है.
- 19:16–19:17जबगा.
- 19:17–19:20अगर किसी समाज का अस्ली इतिहास जानना हो,
- 19:20–19:22तो सिर्फ राजा महाराजावो की कहानियों
- 19:22–19:26या युद्दों की तारीकों तक सीमित तही रहना जाहीए,
- 19:26–19:29उस समाज की आम शब्दावली पर दियान देना जाहीए.
- 19:29–19:31योकी अस्ली तियास तो वही चबा है.
- 19:31–19:35बलकल, अस्ली तियास वही उन शब्दों की ज़ों में चबा होता है,
- 19:35–19:37जो केत और रसोई से निकलते है.
- 19:37–19:40आजके इस विस्त्रित दद्यन को, हम एक विचार के साथ कहत्म करेंगे.
- 19:40–19:45हम ने देखा की कैसे खेती, रसोई और बाहरी दूनिया के प्रभावोने
- 19:45–19:49इस विशाल ठिसवरस को आकार दिया. कैसे हुख से लेकर स्नो तक्का.
- 19:49–19:51मतलब सफरत है हूँँँ.
- 19:51–19:51जी.
- 19:51–19:56अब ज़र था ज़ा ज़ीए अगर आज से तीक सो साल बाद बहविश्षे का कोई भाशा विग्यानी
- 19:56–20:00हमारे आज के इस आदहूनेक दिजितल जीवन का ठिसवरस बनाएं
- 20:00–20:05तो वो नोटिखेशन दूम स्क्रालिंग या गोस्टिंग जैसे शब्दों को के शेणी में रखेगा
- 20:05–20:08ये तो बहुती दिल्च्छप सवाल है
- 20:08–20:11क्या हमारे आजकी ये दिजिटल सवद, हमारे आने वाले कल को
- 20:11–20:13हमारी संस्क्रिति की वो सच्च्चाई बताबाएंगे
- 20:13–20:15यो हम आज खुद भी सपच्ट्रूप से नहीं देख पारे हैं?
- 20:15–20:18ये एक आँसा सवाल है, जो रोज मरा के बोले जाने वाले,
- 20:18–20:21शब्डो को एक नैं जज़र्ये से दिखने पर मजबूर करता है.
- 20:21–20:23बलको ये सोचने पर मजबूर करता है.
- 20:23–20:28तो शावेद अगली बार जब हम कोई शबत बोले, तो ये याद रखना चाहीग,
- 20:28–20:32कि हम सर्व बात नहीं करे, बलकी हम भरिश्षे के लिए अपनी सबभ्यता का एक
- 20:32–20:35है देफिनिशन एकसरे तगयार करे है।
Plain text
ज़र खल्पना कीजीए के एक दिक्षनरी कोली जाएं, और उस में नो शब्द कोजाएं, अंगरीजी वाल अशनो. और उसका मतलब बर्फ नहीं बलकी चेहरे पर लगाने वाली कोल्ड क्रीम निकले. और वाजा ये तो सच्मे चोकाने वाला है. या फिर मतलप कोई एसा शब्द मिले, जो महेज एक मज्दूर का नहीं, बलकी बिना पैसों के चलने वाली एक पूरी ग्रामीन अर्थ विवस्था का नाम हो. बिलकु और आम अखसर दिक्षनरी या शब्द कोष, शब्दो की बस इक उबाओसी सुची मान लेते है. इक असी मोटी किताब जिसे सर्फ तब उठाया जाता है, जब किसी शब्द की श्पलिंग चेक करने हो. सही बाते. लेकिन असल में, कोई भी शब्द कोश श्ब्दों का, मतलब नरजीव संग्रा नहीं होता. तो फिर क्या होता? ये किसी संट्क्रती, उसके इतिहास, उसके केतों और उसकी रसोयों का इक हाई देफनिशन अख्स्रे होता है अख्स्रे? ये कापी दिल्चास्प तून्ना है? तुन्नाय? आँ एक आँसा एकस्रे जो समाज की हड्डीों उसकी नसूं और उसके काम करने की तरीके को बलकोल पार्दर्षी बना देता है. चल ये फिर इसी एकस्रे को आज खूल कर देकते है. अगर बद्यादा बद्यादा बद्यादा बद्यादा बद्यादा बद्यादा बद्यादा बद्यादा बद्यादा बद्यादा बद्यादा बद्यादा बद्यादा बद्यादा बद्यादा बद्यादा बद्यादा बद्यादा बद्यादा बद्यादा बद्यादा बद्या� या अदर बाशाई ब्रमान्द की अवर रिशारा करती है। और इस में भी सबसे हैरानी की बात ये है, की अकेले सर्फ अग़ अखचर से शुरू हुँए वाले 10,406 शबद है। ये वाखगी हेरान करता है। तो होने वाले 10,406 शब्द हैं तो जब एक अख्षर से 10,000 से ज़ादा शब्द ये वाखगी हेरान करता है बलकुल, कोई भी सोचेगा कि अखर इतने सारे शब्द आते कहां से हैं मदलब एकी बाशा में इतनी बारी की तो तो तो बज़ागा बज़ागा विशिष्ट शब्द कैसे पढ़ा हो सकते हैं यही से उस रही देफिनिशन एकस्रे की पहली अस्ली तस्वीर सामने आती है कुकि देखे इतनी विशाल शबदावली किसी कम्रे में बैट कर रातो रात तो नहीं गडी जाती जब अपने आस्पास की हर चीस को एक नाम देटेटा है एक दम सही, एक बाशा अपने समाच के हर एक चोटे हिस्चे को अपने शब्दों में सहेज कर रकती है जेसे खेती के तरीके या खाना बनाने की विदियान जाएगा तो उसका हर काम, हर अजार, हर मोसम, बाशा मे अपनी जगा बनाता है. मडल वो अपने अस्पास की हर चीस को एक नाम दे देता है. एक दम सही. एक बाशा अपने समाच के हर एक चोटे हिस्छे को अपने शब्दो में सहेज कर रकती है. जेसे खेती के तरीके या काना बनाने की विदिया आप, चाहे वो क्रिषी का जटल तरीका हो, बोजन पकाने की कोई खास विदिय हो, पहने जाने वाले वस्त रहो, या फिर लोगों का आपसी लोक विवावार तो ये थिसवरस आसल में सदियों का जमा किया हुए एक सांसक्रितिक बांक है. बिलकु एक अझसा बांक, जहां हर शबद एक सिक्के की तरा है. और इसी सांसक्रितिक बांक से जब हम कुछ शबद निकालते है, तो ये समजाता है के किसी समाज का मुख्ध्य व्यव्साए उसकी दिक्षनरी कैसे लिकता है ये बहुत महें तुपून बात है मित्ला मुखे रूप से एक ख्रिषी प्रदान शेट्र रहा है इसले यहां के थिसवोरस में केतों की मिट्टी से लेकर अजारों तक कग इतना बारीक विव्रन है. जी. मैंन नोट्स में इक शब्द देखा. अंगवार या अंगवर्या. पहली नजर में, नजी बगा की ये शाथ किसी आम, खेट, मस्दूर या, हल्वाहे का नाम होगा. ये बहुत इज़ स्वबाविक सी बात है, कि हम इसका सीदा अनुवाद मस्दूर कर दें. तो क्या ये सर्फिक मस्दूर नहीं है? बिलकुल नहीं. इस थिसवारस के पन्ने कुछ और ही कहानी बताते हैं? अंग्वार स्विक व्यक्ती अ मस्दूर नहीं है, बलकी यहे ग्रामीन समाज की एक पूरी सामाजिक आर्टिग विवस्ता का नाम है. आच्छा एक पूरी विवस्ता? आँ यहे एक बहुत फीजटिल बाटर सिस्तम यह कहे वस्तू विनिमाई प्रनाली का हिस्सा है. आँ ये काम कैसे करता था? अग्वार वाई लाईग का आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आ� आप आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� ये तो सच्छ में हरान करने वाला है ये तो इसका मतलब है कि उस ग्रामीन अर्थ्वेवस्ता में चाहा शाएद नकत पैसा हर किसी किषी किषाँजा असानी सुप्लप नहीं होता था माहश्रम और संसादनो का लें दें इस तरा के समजोतो पर तिका था एक दम, उस वमैं की अर्थ्वेवस्ता को समजने के लिए ये शब्द एक चाभी कितरा है सही कह? इस में, मालिक के पास बेल और हल जैसे सन्सादन तो है लेक शाएद उसके पास सारा काम रहा खुड करने का समझ या शारे रिक शमता नहीं है और मज्दूर के पास आपना श्रम है, इस सर्फ काम का लें दें न नहीं है, ये समाज में संतुलन बनाई रकने का एक तरीका था. सो प्रतीषत अंग्वार शब्द इस बात का जीता जागता प्रमाण है, यह तो सर्फ एक आर्थिक वेवस्ता की बात हुई नोट्स मे आगे खेती से जुडे अजारो के नामी दिये गे है और आम यहां बात सच्छ में बहुत दिल्चास तो जाती है अजारो वाले हिस्से में देखाराई है आप इक शबद है अंकुड तो ज़ाँ बाज तो ज़ाँ बाज तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो ज़ाँ तो अग चाँ बाज़ बाज़ में, अग चाँ बाज़ बाज़ बाज़ बाज़ बाज़ बाज़ बाज़ बाज़ बाज़ बाज़ बाज़ बाज़ बाज़ बाज़ बाज़ बाज़ बाज़ बाज़ बाज़ बाज़ बाज़ बाज़ बाज़ बाज़ बाज़ बाज़ बाज अगा उड़ार की बड़ी की थरफ चलें? वहां क्या हुटा है? वहां कोईले को कुरेदने और आग को सेट करने के लिए एक विषेच तेगे लोहे के अजार की जरूरत होती हैं? उसे भी अंकुड कहा जाता है दोनो का नामे की है, पर काम बिल्कुल अगतो उसे भी अंकुड कहा जाता है. दोनो का नामे की ये पर काम बिल्कु लगत हो. तो तो तो तो तो जानवरों को दागने या पहचान का निशान लगाने के लिए, जो आगे से मुडा हूँा लोग उपकरन होता है, वो भी इसी श्वेनी में आता है. ये तो ये ये साज़े से बाशा सीदे केतों बटींवों और पीडों से निकल कर पन्नों पर आगगे हूँ. अंगरेजी का हुक तो बहुती सामान्ने और फीका शबद लकता है इसके सामने. अंगरेजी का हुक बस एक आकार को दरषाता है. लेकिन मैठली का अंकुर अपने आप में एक पुरा अक्ष्छन एक पुरा पेशा समेटे हुएं ये बात बलकुल सईए है जब को याउजार आपके रोज मरदा की जिन्दगी आपके काम धनदे किलि एतना ज़रूरी होता है कि उसके बना आपका दिन नहीं गुजर सकता, तो बाशा उसे गेहराई से परवाशित करने लकती है. अप अब अगर उजरों और केतों से तोडा आगे बड़ें, तो इन सब का अंतुम लक्षे क्या था? अंतिम लक्षे तो फसल ही है. बलकल फसल. और फसल अखिरकर कहां जाती है? रसोई में इस टिसटिसवारिस में भोजन और पाकला को लेकर जुबाली क्या है वे भी कम दिलचवस्प नहीं खाने पीने की शब्दावली तो हमेशा से भोछ सम्रुद रही है कुई किछ तुछ भी खेट में पैडा होता है अगर कार किसी बी संसक्रती का असली स्वाद और उसकी एकोनमी तैक अरते है बोजन किसी बी संसक्रती की सबसे मजबुत असबसे पुरानी पहचान होता है अगट इसके बारे में क्या जानकारी है? इसके बारे में लिखा है कि ये गेहूँ चने मसुर्या कहिसारी की फसल के भीच उगने वाली एक प्रकार की गास या चोटे दाने वाला अन्ने है. अच्छ एक तरा का खरपतवाद? अगत या अंकरा अंकत इसके बारे में क्या जानकारी है इसके बारे में लिखा है कि ये गेहू चने, मसुर या केसारी की फसल के भीच उगने वाली एक प्रकार की गास या चोटे डाने वाला अन आप अच्छ एक तरा का खरपत वात अब अगर आजकी आदूनिक अद्श्ट्यल फामिंकी बाद की जाए, तो हम इसे शाएद सर्फ वीड मान कर कीट नाशक डालकर खतम कर देंगे. भिलको लाज तो यही होता है. लेकिन थिसवोरस एक कडम आगे जाकर बताता है, इस गास के चोटे-चोटे-गोल दानो को पहगा नहीं जाता ता बलकी उनसे दाल बनाई जाती थी औरे वाआ ये जानकारी उस समें की खादे सुरक्षा और सन्सादनो के प्रती लोगो के नजरिये को मतलप पुरी तरह से खोल कर रग देती है मुजे तो ये पडकर आजके औन आदूनेक फैंसी कुकिंचोस की यादा गई जाहां जीरो वेस्ट कुकिंग की बात होती है आजकल ये बहुत बडाट ट्रेंट है अचके शेव बहुत गर्व से बताते हैं कि कैसे वे सबजीों के चिलकोंगा भी अपी अपी अपी अपी अपी अपी अपी अपी अपी अपी अपी अपी अपी अपी अपी अपी अपी अपी अपी अपी अपी अपी अपी अपी अपी अपी अपी अपी अपी अपी अपी अ गरामीड जीवन पर मद्राता रहता था और इसलिये उने हर चीज बचानी पड़ती थी बलकुल आज़े में मुख्यफसल के सात उगने वाले किसी भी खाध्द पदार्त को विर्थ नहीं जाने दिया जाता था बाशा ने उस जीरो वेस्ट दरशन को उस अस्तित्व बचाने की जद्डो जहत को अंकत जैसे शब्द के रूप में, समाज के पास सीमिज संसादनो का अदिक्तम उप्योग करने की एक बहुत गेहरी वेग्यानिक समज ती वेग्यानिक समज ती, सबी का वे प्रक्रिती से मिलने वाले, हर एक दाने को पोशन में बडलना जानते थे अज सब से खुबसुरत बात यह है, की भाशाने उस जीरो वेस्ट दरशन को उस अस्थित्वबचाने की जद्डो जहत को अंकत जैसे शब्द के रूप में, मतलब अपने भीटर हमेशा के ले सुरक्षित कर लिया. इसी तरा रसुए का एक अर शबद है को मुझे बहुत दिल्चस्त लगा. अंटका. अंट्का ये किस चीस के लिए? नोट्स बताते हैं कि ये एक बहुत बड़ा मिट्टी का बरतन है, जिस में खाना पकाया जाता है. लिकिन बात सिझ बरतन तक सीमित नहीं रहती. अच्छ अवर भी कुच है? रहां. पूरी में बबाग्वान जगननात को, विशेश चावल प्रसाथ के रूप में च़ाईा जाता है उस चावल का नाम भी अंट का ही दरज है कुकि वो इसी मिट्टी के बरतन में पकाया जाता है ये एक बहुत ही सुन्दर भाशाएई और संसक्रितिक सफर है यहां देखा जा सकता है के से एक बहुतिक वस्तू, मतलब एक मिट्टी का बर्टन, अपनी उप्योगिता के कारण इतना पवित्र हो जाता है, कि वो सीदे इश्वर के प्रसाथ का पर्याए बन जाता है. भिल्कुल बर्टन और प्रसाथ का नाम एक हो गया. दाशा बर्टन और अनुश्टान की भीज की दूरी को मिता देती है बर्टन का नाम ही उस पवित्र भूजन का नाम बन जाता है ये बहुत फी गेरी बात है और जब खाने और अनुश्टान की बात हो रही हो तो आचार यहनी आचार का जिकल तो आना है अचार के बनातो बारतिय ठाली अदूरी वही तो तिसवारस में आचार को आदूनिक मैठिली साहित्ते में भोजन विन्यास का एक भेहत ज़ोरी हिस्सम आना गया है मुझे लगता ता आचार सरफ एक साइट दिष है जिसे बस स्वात किले खालिया जाता है नहीं ने, बोजन विन्यास का मतलब सर्फ खाना काना नहीं है, बलकी यहे बोजन को परोसने की एक पूरी कला है, ये एक संसक्रतिक प्रतीक है. एक कला वो कैसे? दिक ही अचार बनाने की प्रक्रीया, उसे महीनो तक दूप में रकना, मसालो का सही अनुपात, भोजन विन्यास की बात होती है, तो उस में आचार की एक निष्छित सन्रचनात्मक और सम्मानजनक जगा होती है. ये सरफ एक अतरिक्ट विएनजन नहीं है, ये ठाली को पुरनता देने वाला हिस्था है. ये तो बहुती शान्दर नजर या आगा खाने को दिखने का खेर अप तक तो बात लेपों की मिट्टी और रसोई के दूए कि हुई जी लिकिन कुई भी संस्क्रिती, कुई भी समाज एक बंद दिभबे में नहीं रह सकता बहरी दुन्या का प्रब्हाँ परतदे है? जाहर सी बात है! जैसे-जैसे समें बडला, अंगरेजी शासन का प्रब्हाँ भारत के हर कोने पर पडा, और इस थेसारिस के दस्तावेज दिखाते है, कि ये प्रब्हाँ मैत्हली बाशा की शब्दावली में भी बाशाये कभी स्तिर नहीं रह सकती अगर वि स्तिर होगें तो मतलवे मरजाएंगी बिलकल वि बहती नदियो की तरा होती है जो अपने रास्ते में आने वाली नहीं चीजों नहीं पत्तरों और नहीं मिट्यों को अपने बहावो में शामिल कर लेती है अगनाई मिट्यों को अपने बहाँ में शामिल कर लेती हैं. इस तिसोरस में अंगरेजी मुलक या इंगलिष ड़ाइव्ट शब्दो की एक पूरी के पूरी श्रेनी दीगाई है. अच्चा. कोन कों से शब्दा उस में? ये देखना बहुत दिल्चष्प है कि कैसे आदूनिक वस्तरोने इस टेट पारमपर एक बाशा मे अपनी जगा बनाई. उदारन के लिए शब्द कोष में कोट, कोलर, यान खमीज की कोलर, ताईल, गले में बानने वाली ताई, और हेम, वस्त के किनारे की सिलाई, जेसे शब्द बलकुट स्पश्ट्रूप से दर्च है ये उस वह चमाजिक बदलाव का सीदा दस्टावीजी करन है जब अंग्रेज आए, तो नके साथ उनका पहनावा भी आया हा, कोट तो ताए तो उनही के साथ आद आए और इस्तानी दर्जीं और आम लोगों जब नहीं तरा की सिलाई यी और नहीं तरा की कब्रे अपना ने शुरू किए, तो जाहिर है उनके पास ये ने डिजाईनो के लिए पुराने शब्द नहीं ते. इसले उनो ने सीदे उन विदेशी शब्डो को ही अपना लिया बलकोल अपनी सहुलियत के साब से लेकिन इन विदेशी शब्डो में मेरे लिये जो सबसे बड़ा चोकाने वाला शब्द्चा वो ता सनो वगी जिसके बारे में हम ने शुरू में बात की थी तो आप यह जान ते हैं के अंगरीजी में स्नो का मतलप बर्फ होता हैं लेकिन तिस्वारूस में स्नो का मतलप बर्फ नहीं दिया गया है तो क्या थिया गया है? इसका अर्थ है चेहरे या ललाड़ पर लगाय जाने वाला आदूनिक कोसमेटिक जिसे हम कोलक्रीम केतें अग़ आब ये कैसे हूँँँँ के बरफ का मतलब चहरे की क्रीम बन गया? ये बाशाव के आपसी टक्राव और बाजार के प्रभाव का एक बहुती ख्लासे कुदारन है. बाजार का प्रभाव? वो कैसे काम करता है? जब अंग्रेज भारत आए, तो वो आपने साथ ठ़न्दे देशो में स्तमाल होने वाली कोल क्रीम लेक रहें तो उन दिनो और बाद मे भी, कई यह सी क्रीम बजार मे आई जिनके दिब मों पर ब्रान्ट के नाम के साथ तो था दो बगाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद नाद न मूल आर्ट को पूरी तरा से चोर दिया और उस वस्तू के स्थान्या उप्योग को अपना लिया बाजार की ब्रेंटिंग भाशा का हिस्वा बन गय ये तो मारकिटिंग का एक मलगब सद्यो पुराना के चट़ी बन गय एक दम सेई के रहे है आँगुर्तान अगुर्तान अगुर्तान आँगुर्तान आँगुर्तान आँगुर्तान आँगुर्तान आँगुर्तान आँगुर्तान आँगुर्तान आँगुर्तान आँगुर्तान आँगुर्तान आँगुर्तान आँगुर्तान नोट्स में से मित्था साद्दिष्या, यानी फाल्स अनालोगी के दूनी उदारन के रुक में दरज की आगे है. ये मित्था साद्दिष्या क्या होता है, और अंगुष्धान से अंगुर्टान का सफर कैसे तैहुवा? ये एक बहत महत्वपों प्रश्न कड़ा करता है मित्या साद्रिष्य बाशा विग्यान का एक बहुत दिल्च्यस् पनीम है जिसे आम लोग अन्जाने में ही बना देते हैं अन्जाने में? कैसे? अंगुष्तान असल में एक फार्सी शब्द है जब ये शब्द आम ग्रामीनो या स्थानिये लोगों के भीज पहचा, तो उच्चारन में ये उने थोड़ा पराया या मतलब भारी लगा. आप बूलने में थोड़ा मुष्किल है. उनो ने देखा कि ये छीज आंगुली या आंगुर में पहनी जाती है. अंगुर मतलब उंगली इसलि उनके दिमाग ने एक लोगिकल चलाण लगाए अचा उनो अने अंगुष्टान को अपनी समच के हिसाप से मोडखर अंगुडटान कर दिया मतलब उनो अग विदेशी शबद को अपने जाने पहचाने शब्द के साचे में फिट कर दिया? भिलकुल इसी को मित्या साद्रिष्या या फाल्सनालेजी कहते है जब कोई विदेशी या नया शब्द किसी जाने पहचाने स्थानिये शब्द के जैसा लगने लकता है जेसे अंगुर तो लोग उसे उसी के अनरूब द्हाल लेते हैं बहले ही व्याक्रन के हिसाब से वो गलत हो रहा, बहले ही व्याक्रन या उत्पती के हिसाब से वो गलत हो उनका मकसत बस उष्षब्द को अपनी जुबान किली आसान और अर्थपोन बनाना था ये सच में अदब होतें, लेकिन यह आईक सवाल भी उड़ता है. क्या सवाल? अखसर के भाशा वादी यह सुद्दददावादी लोग शिकाएत करते हैं, के विदेशी शबनो के आने से या उने इस तर आपने इसाप से मोल लेने से, कोई भी मुल बहाशा कमजोर या ब्रष्ट जाती है आई ये बहिज तो बहुत पुरानी है तो क्या विदेशी शब्डो को यस तरा अंगुर्तान या स्नू बना देना किसी बहाशा की कमजोरी है या फिर ये उसके लचीले पन को दरषाता है अगर हमे तिहास को गेराई से देक हैं, तो जो बाशाए खुद को एक चार दिवारी में बन कर लेती हैं, जो शुद्द्टा के नाम पर नैई शब्डो को नहीं अपनाती, वे दिरे-दिरे मर जाती हैं. वतला उनका अंथ हो जाता है. बलकुल, बाशाय व्श्पन्ज कितरा हूती है, वे नई तक्नी की बडलावों, नई कप्डों और नई अजारों को बहुत थेजी सुकती है. लेकिन एक मस्वूथ बाशा उने ज्योंका त्यों नहीं रकती, बलकी उने अपने स्थानी ए लहेजे में डाल लेती है. जेसे मिरर या आईना किलिए मेत्फिली मिशव्द बन गया आईन बलकुल सही उदारन ये बहाशा की कमजूरी नहीं बलकि उसकी शान्दार पाचन शकती है एक जिन्दा बहाशा नईए शब्दों को खाखर पचाखर अपने ही रँग में रग देती है तु मदलब इस पूरी चर्चा का अखिर कर क्या आप्द निकलता है जब हम एक लाक प्टलिस हसार से जआदा शब्डो वाले इस विशाल मेठिली हन्रेजी तिसारस के पननो से होकर गुजरते है तो ये बात बिल्कुल साफ जाते है कि ये केवल एक दिक्षनरी नहीं हैं बिल्कुल नहीं, ये उसे कही बडखर है ये उन किसानो का पसीना है जो अंग्वार वेवस्त्तामे बिना पैसो के काम करते थे ये उन लोहारों और ताडी निकालने वालों की कला है, जो अगकुड बनाते ते. आँ और उन रसुइयों की गेहरी समजदारी भी, जो अकाल के दर से गासे भी दाल निकाल लेते ते. ये उन आम लोगों के जीवन का एक बड़ा और सुवच्छित मुज्यम है, जिनोने पीडियों से इस गयान को जीया है. ये सच्छ है, जोभी किसी विषे या संसक्रिती को गेराई से समझना चाहता है, उसके लिए ये सबसे बड़ा सबक है. जोबी किसी विष्य या संट्सक्रती को गेराई से समझना चाहता है उसके लिए ये सबसे बड़ा सबख है. जबगा. अगर किसी समाज का अस्ली इतिहास जानना हो, तो सिर्फ राजा महाराजावो की कहानियों या युद्दों की तारीकों तक सीमित तही रहना जाहीए, उस समाज की आम शब्दावली पर दियान देना जाहीए. योकी अस्ली तियास तो वही चबा है. बलकल, अस्ली तियास वही उन शब्दों की ज़ों में चबा होता है, जो केत और रसोई से निकलते है. आजके इस विस्त्रित दद्यन को, हम एक विचार के साथ कहत्म करेंगे. हम ने देखा की कैसे खेती, रसोई और बाहरी दूनिया के प्रभावोने इस विशाल ठिसवरस को आकार दिया. कैसे हुख से लेकर स्नो तक्का. मतलब सफरत है हूँँँ. जी. अब ज़र था ज़ा ज़ीए अगर आज से तीक सो साल बाद बहविश्षे का कोई भाशा विग्यानी हमारे आज के इस आदहूनेक दिजितल जीवन का ठिसवरस बनाएं तो वो नोटिखेशन दूम स्क्रालिंग या गोस्टिंग जैसे शब्दों को के शेणी में रखेगा ये तो बहुती दिल्च्छप सवाल है क्या हमारे आजकी ये दिजिटल सवद, हमारे आने वाले कल को हमारी संस्क्रिति की वो सच्च्चाई बताबाएंगे यो हम आज खुद भी सपच्ट्रूप से नहीं देख पारे हैं? ये एक आँसा सवाल है, जो रोज मरा के बोले जाने वाले, शब्डो को एक नैं जज़र्ये से दिखने पर मजबूर करता है. बलको ये सोचने पर मजबूर करता है. तो शावेद अगली बार जब हम कोई शबत बोले, तो ये याद रखना चाहीग, कि हम सर्व बात नहीं करे, बलकी हम भरिश्षे के लिए अपनी सबभ्यता का एक है देफिनिशन एकसरे तगयार करे है।