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मैथिली_का_वजूद_और_विदेह_शब्दकोष.m4a
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- 0:00–0:08ज़रा कलपना की जीए, एक बहुत ही विशाल नदी है, जो सदियों से एकी दिशा में बहरे है.
- 0:08–0:09आप थीक है.
- 0:09–0:11और वो अचानक से अपना रास्ता बडल लेती है.
- 0:11–0:19बाड़ी का एक बहानक रिला आता है, और रातो रात पुरे के पूरे गाँँँ, केथ, पुरीँ पुरानी बस्तिया सब कुईज बहेजाता है.
- 0:19–0:22तुछ तुछ बहुत खोफनाक मनजर है.
- 0:22–0:28अगर बजाग़ खुचा समझेटते हैं, मीलो दूर किसी नहीं अजज़गे पर जागे पर जाखे बस जातें.
- 0:29–0:30अब या एक सवाल उटता है.
- 0:30–0:31क्या सवाल?
- 0:31–0:35सवाल यह है कि जब अब अपनी जमीन से उज़ड़ता है,
- 0:35–0:39तो क्या उसके शब्द भी उस बाड के पानी में बहेजाते है?
- 0:39–0:47या थिर फिर वो शब्द उस नहीं जगे पर जाकर किसी और भाशा के साथ मिलकर एक नया अकार ले ले लेते हैं?
- 0:47–0:49दिखे ये एक बहुत भी गेरा सवाल है.
- 0:49–0:55कुई कि अखसर हम यही मान कर चलते है, कि बाशा तो बस किताबो से,
- 0:55–0:58या फिर व्याक्रन के उन सक्त नियमो से बनती है.
- 0:58–1:00और कुल, इसकूल में तो यही सक्वाया जाता है.
- 1:00–1:05आप, लेकिन सच तो यह के बाशा उस जमीन से बनती है,
- 1:05–1:10ज़ाई ज़ाई वो बोली जाती है, उन नदियो से बनती है जो उसके बूगोल को तैकरती है।
- 1:10–1:15और सबसे बड़ी बात उन लोगों के संगर्ष से बनती है,
- 1:15–1:20जो रव विस्थापन के बाद अपनी पहचान बचाने की जध्डो जहत करते है।
- 1:20–1:24क्या बाथ है? और आज हम जिस विष्चय की गेराई में जाने वाले है,
- 1:24–1:28वो इसी विस्ठापन, इसी संगर्ष, और इक भाशा के जिन्दा रहने की,
- 1:29–1:34बहुत इं, मडलब शान्दार कहानी है. जे भिल्कोल. आज हमारी चर्चा के के खिंदर में कोई आम किताब नहीं है.
- 1:34–1:41आज हम बात कर रहे हैं, साल 2012 में प्रकाशित, विदेहा, अंग्रेजी मेठली शब्द्खोष की,
- 1:41–1:47जिसे गजेंदर ताकृर, नागेंदर कुमारजा, और पंजिकर विद्याननजाने मिलकर तगयार किया है.
- 1:47–1:50और ये कोई चोटी मोटी उपलप्डी नहीं है?
- 1:50–1:55ये एक दम सेगी कहा. तो आजका हमारा मिशन स्व इन पन्नो में चबए शबडो का अर्थ कोजना नहीं है.
- 1:55–1:58हमें दर सल ये समजना है की कैसे एक टिक्षनरी.
- 1:58–2:02मथलब एक शबद कोच किसी भी भाशा, उसकी संसक्रती
- 2:02–2:05और उसके बोलने वालो के वजुद का एक जीता जागता दस्तावेज होता है.
- 2:06–2:08तीक हैं, तो आई ये ये से खोल कर देकते हैं.
- 2:08–2:12आप, और इस पूरी चर्चा को सही दिशा देने के लिए ना,
- 2:12–2:16इस शब्द्कोश की प्रस्टावना का जिक्र करना बहुत जरूरी हो जाता है
- 2:16–2:19आच्चा, जो प्रफेसर उदेन आराईन सिंगने लिकिया?
- 2:19–2:22बिलकोल, प्रफेसर सिंग का जो विष्लेशन है,
- 2:22–2:26वो दिक्षनरी को देखने का हमारा नजरया ही पुरी तरह से बडल देता है.
- 2:26–2:31वो बताते है, की एक शब्द को श्वास्टव में एक ताईम काप्सूल कितरा होता है.
- 2:32–2:35एक ताईम काप्सूल? मतलब जो समय को कैद कर ले?
- 2:35–2:36हाँ, बilkul वही.
- 2:36–2:43हमें से सर्व एक बाशा से दूसके बाशा में अनुवाद करने वाले किसी तूल कितरा नहीं देक सकते.
- 2:43–2:46उम ये अपने भीतर उस पूरे समाज की सोच को,
- 2:46–2:48उसके इतिहास के उतार च़ाफ को,
- 2:48–2:52और उसके क्रमिक विकास को हमीशा के लेग कैत कर लेग गद कर लेगता है.
- 2:52–3:22ये बाद मुझे सच में सोचने पे मजबोर कर रही है, के अखर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर �
- 3:22–3:23लो गे ही सुचते हैं?
- 3:23–3:24बलकुल!
- 3:24–3:25तो क्या ये सच नहीं है?
- 3:25–3:27नहीं, ये ब्रानती बहुत आम है,
- 3:27–3:29लेकिं सच नहीं है.
- 3:29–3:32अगर हम इतिहास के पन्नो को तोडा और पीचे पल्तें,
- 3:32–3:34तो शब्दुकोष बनाने की परम पराए,
- 3:34–3:36इस से हजारो साल पुरानी है.
- 3:36–3:38अजके सीर्या के आस्पास के हिस्ट्सा है
- 3:38–3:42वहां सुमेर्यन अखकादिन शब्दों की बाकाईदा एक दूी भाशी सुची तैआर की गगी गगी तीश्ट्सो इसापुर्व
- 3:42–3:44अगा इबला नाम की जगापर मिट्टी के ताबलेट्स यहनी तक्तिया मिलिया ना
- 3:44–3:49अद्याश्पास का हिस्ट्सा है, वहां सुमेरियन अखादियन शब्दों की बाकाईदा
- 3:49–3:51उग दूई भाशी सुची तैआर की लेए गाई ती
- 3:51–3:53तीस सो इसापूर
- 3:53–3:56अआ एबला नाम की जगापर मिट्टी के जो ताबलेट्स
- 3:56–4:00यहनी तक्तिया मिली आना वो अनसान दवारा शब्दों को सहेजने के
- 4:00–4:02सबसे पुराने गयाथ प्रयास माने जाते है
- 4:02–4:04अग, में ने नहीं भी नहीं, मुझे यहां थोडा सन्दे हो रहा है.
- 4:04–4:05पुच्छे.
- 4:05–4:08सीरिया के वो प्राचीन मिट्टी के ताबलेट्स,
- 4:08–4:12तो मुख्हे रूप से राजागो के हिसाप किताब रह्गने,
- 4:12–4:15व्यापार एक लें देन या राच्चाई फरमानो के लिए होते तेना
- 4:15–4:16आप, काफी हत तक
- 4:16–4:20और हम या 2012 की एक आदूनिक दिक्षनरी की बात कर रहे है,
- 4:20–4:22तो पूरी तरह से एक रेफ्रेंज बुक है.
- 4:23–4:26हम इन दोनो की तुलना एकी तराजू पर कैसे कर सकते हैं?
- 4:26–4:28ये तो सेव और संट्रे की तुल्ना करने जासा होगया
- 4:28–4:30मैं समथ सकती हों, ये सवाल बहुत लाजमी है
- 4:30–4:33देखने में ये दोनो चीज ये अग्ड़ाग लक सकती है
- 4:33–4:36लेकिन अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर पीचे की वजज़़ पर गवर करें
- 4:36–4:37मतला उनके मक्सध पर?
- 4:37–4:38बिलकुल
- 4:38–4:41उनके क्यूपर गवर करें तो दोनो का मुल मक्सध एक ही है
- 4:41–4:45अपने नजरीये और अपने ग्यान को विलुप थोने से बचाना
- 4:45–4:48प्राचीन काल से ही शब्दुकोशो का उदेश्छ
- 4:48–4:51केवल एक बाशा से दुस्री बाशा में अनुवाद करना नहीं रहा है
- 4:51–4:53अच्छ? तो और क्या उद्डेशि था?
- 4:53–4:56अगर हम अपने भाराद कही उदारन लें
- 4:56–5:00तो इसा पूर्व साथसो के आस्पास निगगंटुं की रच्ना हुई
- 5:00–5:01अब उसका मकसत क्या था?
- 5:01–5:05उसका मकसत ता वेदों के उन कतीं शब्दों को सहेजना
- 5:05–5:08और समजाना जिने लोग दिरे दिरे बूल रहेते है.
- 5:08–5:14यानी शब्दों को सहेजना असल में एक पूरी सभबहका की याद्दाश्ट को सहेजने जैसा है.
- 5:14–5:15बलकों सतीग बात कही आपने.
- 5:15–5:20ज़ेसे हम जमीन कोदकर दाईनोसर की हद्डिया निकालते हैं
- 5:20–5:22और लिक पुरा दाचा तब तब आजा तेरे ना
- 5:22–5:25वैसी एक शब्द्खोष भी एक भाशाई जीवाश्म की तरा है
- 5:25–5:27एक लिंविस्टिक फोसिल रिकोट
- 5:27–5:57तो आप आप दोग नहीं तो बज़ाड़ा है कि तो बज़ाड़ा बज़ाड़ा बज़ाड़ा बज़ाड़ा बज़ाड़ा बज़ाड़ा बज़ाड़ा बज़ाड़ा बज़ाड़ा बज़ाड़ाड़ा बज़ाड़ाड़ा बज़ाड़ाड़ा बज़ाड़ाड़ाड़
- 5:57–6:01अमर सिंग का रचा हुए अमर कोष सामने आया
- 6:01–6:04इस गरन्द की एहमियत का अंदाजा पिसी बाट से लगा सकते है
- 6:04–6:07के इस पर चालीस से अदिक तीकाए लिख ही गएं
- 6:07–6:10चालीस इस ज़ाद कोमेंट्रीस सरफ एक शब्द कोष पर
- 6:10–6:14आदुनेक दोर में पश्छमी शिक्षा का प्रब़ाव बड़ा तभी ये सल्सला थमा नहीं आना.
- 6:14–6:18मैंने पड़ा था की 1813 में एच एच विल्सन ने पश्छमी सिद्धानतों पर पहला संसक्रित अंगरेजी शब्छ प्च्छ बनाया था.
- 6:18–6:24यह तो सच्मी कमाल है. और आदूनिक दोर में जो पश्चमी शिक्षा का प्रभाव बड़ा, तब यह सल्सला ठमा नहीं है ना.
- 6:24–6:31मैंने पड़ा था की, 1813 में एच एच विलसन ने पश्चमी सिद्धानतों पर पहला संसक्रित अंग्रेजी शब्द्खोष बनाया था.
- 6:31–7:01बलकों सही बलकों सही बलकों सही बलकों सही बलकों सही बलकों सही बलकों सही बलकों सही बलकों सही बलकों सही बलकों सही बलकों सही बलकों सही बलकों सही बलकों सही बलकों सही बलकों सही बलकों सही बलकों सही बलकों सही बलकों सही बलकों सही बलकों सही बलकों सही बलकों स
- 7:01–7:05बद़ा बड़ा रही होती है, ये सिझफ एक चबने की बात नहीं है,
- 7:05–7:09ये ये इस बात का सीदा एलान है, कि मैठली बहाशा में
- 7:09–7:13दूनिया के किसी भी आदूनिक विचार, तकनीक
- 7:13–7:16या विग्यान को वेक्त करने की पूरी पूरी कषम्ता है.
- 7:16–7:19अग, और ये विख्सित नात रात विख्सित नहीं होती?
- 7:19–7:23इसके पिचे यक बहुत लंबा बहुले कोर समाजिक मन्तन रहा होगा?
- 7:23–7:25बिलकुल, सदियों का मन्तन
- 7:25–7:29तो इतिहाज से निकल कर अब हमें उस जमीन पर आना चीए
- 7:29–7:31जहां मैठली वास्तो में सांस लेती है
- 7:31–7:36मैं बद्ला का शेट्र अपने ज़ो बद्लाग बदलने की जो कलपना की ती ना
- 7:36–7:38आज जो सच में बहुत ड़ावनी ती
- 7:38–7:43वो दर सल कोई मन गरमत कहानी नहीं बल के मित्ला का एक बहुती कठोर सच आच आच
- 7:43–7:45यहा मामला सच में बहुत दिल्चस फोजाता है
- 7:45–7:50तो किसी भी बाशा का बूगोल उसे सबसे जयादा प्रभाविद करता है
- 7:50–7:53जोज अब्राहिम ग्रियरसन ने उनीसो आप में
- 7:53–7:57मित्लाक शेट्र का जो बाशाई सरवेख्षन किया तना
- 7:57–7:59वो आज कि स्तिती से बहुत अलग है
- 7:59–8:04अग, उगर बड़ा कारन वो बहुगलिक सीमाय है, जो हमेशा से चलाईमान रही है.
- 8:04–8:05बलकोल.
- 8:05–8:09ये बहुत हेरान करने वात है, मड़ब जब हम सीमाय बडलने की बात करते है,
- 8:09–8:12तो दिमाग में किसी युद्ध यह राजने तिक संदी का खयाल आता है.
- 8:12–8:16यहां बूगोल बदलने का सब से बड़ा कारन तो कोसी नदी है.
- 8:16–8:20जी हां, कोसी नदी जिसे अकसर भीहार का शोक भी कहाजाता है.
- 8:20–8:26आपको पता है, इसने पिछले 200 वर्षो में कम साथ बार अपना मारक बडला है.
- 8:26–8:27साथ बार? बाप्रे?
- 8:27–8:33अब इसे इस तरह से समचते हैं, जब कोई नदी अचानक पचास यस सो किलोमिटर दूर से बहने लकती है,
- 8:33–8:39तो पुराने गाँई दूब जाते है, लोग अपना सब को चोडक न नई अजान जगोगवपर जाकर बसते हैं.
- 8:39–8:43और इस प्रक्रिया में प्रशासनिक जिलों की सीमाए भी बार भार पुनरगधित होती हैं
- 8:43–8:44बिलकुल
- 8:44–8:46नहीं जगापर गये हूंगे
- 8:46–8:49तो जाहर है वो नहीं बहाशाँं के समपरक में आई हूंगे
- 8:49–8:52नहीं शब्द उनके दैनिक जीवन का हिस्सा बने हूंगे
- 8:52–8:57अर यही वो बिन्दो है ज़ा मैठिली का अस्ली लचीला पन नजर आता है.
- 8:57–9:00अगर हम इसे बड़े परीद्श्ष्य से जोडखर देखे,
- 9:00–9:05तो अकसर माना जाता है के जब कोई भाशा दूस्री ताकत्वर भाशाँं कि समपरक में आती है,
- 9:05–9:08तो उसका मूल स्वरुब नश्ट होने लकता है
- 9:08–9:10आँ लोग केतें कि बशाशा ब्रष्ट होगगे
- 9:10–9:14बलक्ल, लेकिन मैठिली कोई अलक खलक पडा दूएप नहीं है
- 9:14–9:17या एक आसे बहुबजाशी समाज में जीवित है
- 9:17–9:21जाहां इसके आसपास भोजपूरी और मगी जैसी सम्रिद बाशाये बोली जाती हैं
- 9:21–9:25साति हिंदी एक बहुत बड़े समपरक सुत्र का काम करती है
- 9:25–9:32और प्रस्तावना में तो ये भी बताया गया है के इस लाके में नेपाली, बंगाली और संथाली बोलने वाले भी अच्छी कासी संख्या में मोगजुत हैं
- 9:32–9:37इतना ही नहीं जो मेठिली बोलने वाले जारकंट के खषेट्रो में पहले में हैं
- 9:37–9:43उनका समपरक, उराम, मुन्दारी, और हो जैसी अस्ट्रिक भाशाँँ से हूँ आज्चा,
- 9:43–9:48अच्छा अस्ट्रिक भाशाँँ से जी अप सोची किसका बाशा की सन्रचना पे क्या सर पडा होगा?
- 9:48–9:52अस्ट्रिक भाशाँँ ने मेठ्टिली के वाख के विन्यास को,
- 9:52–9:56यानी वाक्यों को गड़ने के तरीके को सीदे तोर पर प्रभाविद किया
- 9:56–9:56आरे वा
- 9:56–10:02और दूसरी तरफ उर्दूर अन्ने बाशावने इसके शब्द भंडार को और भी सम्रिध्ध किया है
- 10:02–10:06आक्डे बताते हैं कि किवल प्चीस से तीस प्रतीषत लोग यह आसे हैं
- 10:06–10:36तो ये विदेश शब्द्कोश इसी बाशाई मिलावद को इस खुफसुरत बाशाई मिलावद को इस खुफसुरत बाशाई मिलावद को आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आ�
- 10:36–10:39खिचडी को एक तरहां से प्रमानिक्ता देता है
- 10:39–10:43और गजेंद्र ताकृर और उनकी तीम की यह बहुत बड़ी उपलबदी है
- 10:43–10:47कि उनोने इन अपनाए गय शब्डो को अच्छुत नहीं माना
- 10:47–10:50बलकी उने दिक्षनरी में पुरे सम्मान के साथ जगा दी
- 10:50–10:53लेकिन देक्ये, यहां एक बात मुझे कब रही है.
- 10:53–10:54क्या?
- 10:54–10:57अगर ये भाशा इतने बगलिख शेटर में पहली हूँई है,
- 10:57–11:01और इतने सारे अलगलक समुदायों की जिन्दगी का हिस्चा है,
- 11:01–11:05तो इसे बुलनेवालों की गिन्ती करना इतना विवादित कि रहा है.
- 11:05–11:35आप दो बज़ाद कर देखाद बाज़ा था था बज़ाद कर था था था ज़ाद कर था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था �
- 11:35–11:421891 क्यानवे में ग्री आर्षन ने अन्मान लगा आ गब कि लग बबग नबभे लाक यानी नाईईप्वाँ तुम्यों लोग मेतली बोलते हैं.
- 11:42–11:49फिर उन्निस्थ क्यानवे में जंगन ना आती अग्ब आपी से भी कमोग कर महेंज उन्चास लाक रेजाती हैं.
- 11:49–11:56और थे चवमत्कार देखिये, 2001 में ये फिर से उचाल मारती है, और एक करोर भीस लाक से जाडा हुजाती है।
- 11:56–11:57रही कैसे संबहव है?
- 11:57–12:03ये बहरी उतार चडाव हमें ये सुचने पर मजुवूर करता है के अदिकारिक अखडे हमेश्या जमीनी हकीकत नहीं बताते.
- 12:03–12:06कئी बार यह आँता है किसी बाशा को बोलने लोग
- 12:06–12:10खुड आपनी बाशा को आदिकारिक दस्टाबेजो में दर्ज नहीं करवाते
- 12:10–12:13यह सा क्यो? मैटलब आपनी मात्र बाशा को कोई क्यों चुपाएगा?
- 12:13–12:15इसके काई कारन हो सकते है
- 12:15–12:18कभी कभी उने लगता है कि अगर वो किसी बडी
- 12:18–12:23या कहें की मुख्धारा की बाशा को अपनी मात्र बाशा बताएंगे
- 12:23–12:26तो उने शिक्षा या रूजगार में जी आदा असानी होगी
- 12:26–12:28हम यहां कोई राजनितिक पक्ष नहीं ले रहे है
- 12:28–12:33लिकिन हम बस इतना कैसकते हैं कि पहचान और अदिकारिक आख्रों के भीच
- 12:33–12:36हमेशा एक गेहरी रस्सा कषी चलती रहती है.
- 12:36–12:40और शाएद इसी रस्सा कषी के भीच एक बहुत बडा मिठाग भी गड़ा गया.
- 12:40–12:45अकसरे कहा जाने लगा, की मैठली तो सरफ ए खास जाती मुख्य रुब से ब्राह्मनो की बाशा है.
- 12:45–12:48मैं इसे थोडा रग दंग से देकती हूँ.
- 12:48–12:51ये एक बहुती सीमित और गलत नजर्या था,
- 12:51–12:53जिसे इस शब्द्कोष की प्रस्तावना में,
- 12:53–13:23बवाशा बवाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बा
- 13:23–13:53तब आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आ� आ� आप आप आप आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ�
- 13:53–13:55तित्तु किलि लड़ना परता है.
- 13:55–13:56दबाव में निकरती है.
- 13:56–13:59बिलकुल समविदाने कदिकारों से
- 13:59–14:01इस बलंभे समयतक वंच्चना ले
- 14:01–14:05वास्तव में मिठिला में एक संसक्रतिक पुनरुद्धान को जन्म दिया.
- 14:05–14:06लोगों ने महसुस किया
- 14:06–14:09कि अगर सरकार उनकी भाशा को नहीं गिनेगी,
- 14:09–14:13तो ने खुद अपनी संसक्रती को दुन्या के सामने लाना होगा.
- 14:13–14:17और इसी दोर में बहत्रीं सहत्रे रचा गया होगा.
- 14:17–14:20आआ, और विष्व प्रस्छद भादुबनी पेंटिंग भी,
- 14:20–14:24इसी सांस्क्रितिक अस्मिता को जताने का एक सशक्त माद्यम बन कर अब्री
- 14:24–14:26और इसी लंभे संगर्ष कही परडाम ता
- 14:26–14:31कि अंतता मैत्हली को बारतिय संविदान की आप्वी अनुसुची में शामिल कर लिया गया
- 14:31–14:37ये के अईसी जीत ती जिस ने बता दिया की बाशा का स्तितव कागजोंपर नहीं
- 14:37–14:39बलकी लोगों के दिलो में होता है.
- 14:39–14:40बलकल सही बाथ है.
- 14:40–14:44और अब जब इसे समविद्धानिक मानिता मिल चुकी है,
- 14:44–14:46तो अगा सतवाल ये है की आगे क्या?
- 14:46–14:51इक बाशा को आप स्वर्ष्टिक पुरानी कविताँ या लोग गीतों तक तो सीमत ने रक सकतेना
- 14:51–14:57और यही पर ये विदे हे अंग्रेजी मेठेली शब्द्खोश फिर से बहुत प्रासंगे को जाता है
- 14:57–15:27तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो �
- 15:27–15:32तिरहुता लिपि को एक आदूनिक दिखष्टरी में दिखना सच में बहुत शान्दार अनुभव्व्रा मेरे लिए
- 15:32–15:35आम तोर पर जुक शेट्रिय बहाशागो के शब्द्कोष होते है ना
- 15:36–15:40उन में हमें आब्दोमन जिसका अथ अत्री या पेट दिया है
- 15:40–15:43या एसे ही आम शब्द आसानी से मिल जाते है
- 15:43–15:46लेकिन जो चीज मुझे सबसे जाडा मजदार लगी
- 15:46–15:48वो तिक्नीकी शब्दों का समावेश
- 15:48–15:52आँ, किसी बी भाशा का अस्ली इम्तिहान तो यही होता है
- 15:52–15:55कि क्या उ आजके विग्यान और आदूनिक तकनीक को समजा सकती है या नहीं?
- 15:55–15:59और मेठिली ने ये इम्तिहान बहुत अची तरह पास किया है.
- 15:59–16:04मतलब इस दिक्षनरी में आबकस के लिए, गिनेबला खलोना शब्द गड़ा गया है.
- 16:04–16:06ये बहुत फी रचनात्मक है.
- 16:06–16:13इतना ही नहीं, कमपुटर अर इंट्रनेट की दुनिया के बारी भरकम शब्डों को भी मेठली के साचे में बहुत खुबसुरती से डाला गया है.
- 16:13–16:22जैसे अपसलूट यौर्रेल किलिए इस में लिखा है निरपेखष सार्व केत या चेतर नाम्युक्त अंतरजाल संकेत.
- 16:22–16:26और अक्तिव सेल के लिए सक्व्रीए कक्ष का प्रेजोग की आगया है
- 16:26–16:29और आलगोरिखम जटल तकनी की शब्द को
- 16:29–16:31कलन विधी कह कर समजगा आगया है
- 16:31–16:35मतलब ये देखकर मुझे एक �alaghi romanch mein susua
- 16:35–16:36ये साभिट करता है
- 16:36–16:39कि ये बाशा किसी मुзिम में सजाकर रखने की चीज नहीं है?
- 16:39–16:40बलकल नहीं
- 16:40–16:44ये आजके इस तेस्तरार, दिजितल युग में पुरी तरा सास ले रहीं
- 16:44–16:46बलकी मैं तो कहुँगा दोड रही है
- 16:46–16:48और ये बहुत ज़ोरी भी है
- 16:48–16:54वोगा पीटी है, वो मबाल फोँन, एजीन और वेब दिक्षनरी के जर ये ही दुनिया को समचती है
- 16:54–16:57आँ, उनके लिए तो इंटनेटी सब कुछ है
- 16:57–17:00अगर कोई बाशा यें दिजिटल माद्यमो पर प्लप्द्ध नहीं है,
- 17:00–17:03तो वो पहड जल्दी लिए विलुप्त हो सकती है.
- 17:03–17:06विदे शब्द कोश दरसल ये सूनिष्च्ट करता है,
- 17:06–17:08के जो भी ज्यान चाहने वाले है,
- 17:08–17:12चाहे वो चात्र हों, लेअनर्स हों, या शोथ करता
- 17:12–17:15उने अपनी मात्र भाशा में जानकारी हासल करने किले
- 17:15–17:18बारी बरकं सुचनाों के शोर्गुल में ना भबतक ना पडे
- 17:18–17:21या गिसी दुसरी भाशा पे निरभर ना रहना रहना पडे
- 17:21–17:23अज भी जर्चा या सच मे बहुत या दबुद रही है
- 17:23–17:27विदे हे अंग्रेजी मेठली शब्दकोष के पन्ने पलडटटेवे हमने देखा
- 17:27–17:29कि ये सरफ दो बाशागो का मिलन न नहीं है?
- 17:29–17:30जी
- 17:30–17:33ये एक आसी बाशा के अदम में सहास की कहानी है
- 17:33–17:39जिसने नद्यों की विनाशकारी बाड को जिला, बबदलते हुए नक्षों के भीच अपनी जगा बनाई,
- 17:39–17:42जनगडना के उन उतार च़ाव वाले आक्रो को माद्द दी,
- 17:42–17:45और आज कमठूटर की सक्रीन पर पुरी शान से कडी है.
- 17:45–17:50ये उस भाशाई लचीलेपन की जीथ है, जो अस्ट्रिक से लेकर उर्दू और अंग्रेजी तक,
- 17:50–17:53हर भाशा के अच्छे शब्दों को अपनाता तो है,
- 17:53–17:58लेकिन अपनी आत्मा, यानि अपनी मूल पहचान को कवी नहीक होता.
- 17:58–18:02बिलकुल सही. लेकिन इस चर्चा को समेटने से पहले
- 18:02–18:05मैं चाहता हूं के हम एक अजे विचार पर चिन्तन करें
- 18:05–18:08जो आज की तकनीक से सीदे तोर पर जुडा है.
- 18:08–18:09वताएए.
- 18:09–18:12हम सब जानते है, की बाशा हमारे सोचने के तरीके को
- 18:12–18:42अब ज़़ाई को ज़ाई को ज़ाई को ज़ाई को ज़ाई को ज़ाई को ज़ाई को ज़ाई को ज़ाई को ज़ाई को ज़ाई को ज़ाई को ज़ाई को ज़ाई को ज़ाई को ज़ाई को ज़ाई को ज़ाई को ज़ाई को ज़ाई को ज़ाई को ज़ाई को ज़ाई को ज़ाई को �
- 18:42–18:48यह बद्दाँ के मुहावरों को और तिरहुता जैसी प्राचीन लिप्यों को अगर निद्टानेट और कोडिंग की दुन्या में
- 18:48–18:52दिजितल रूप देरे हैं तो इसके बवविश्ष्य में क्या परिनाम होंगे
- 18:52–18:53और वाज, क्या बात है?
- 18:53–18:56क्या आजा हो सकता है कि बवविश्वे के आलगोरिदम भी हमारी तर है
- 18:56–18:59अलग �alag-alag सांसक्रतिक नजर्यों से सोचना सीकेंगे?
- 18:59–19:01यही तो सोचने वाली बात है
- 19:01–19:03मतलब क्या तकनीक की बाशा
- 19:03–19:33अभी अवट्याई बाज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो ब
- 19:33–19:37अर गेरे सवाल के साथ, हम आजकी इस चर्चा को यही विराम देतें
- 19:37–19:41ग्यान के एक ने विशें और एक ने नजरीए के साथ आप लोगो से फिर मिलेंगे.
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ज़रा कलपना की जीए, एक बहुत ही विशाल नदी है, जो सदियों से एकी दिशा में बहरे है. आप थीक है. और वो अचानक से अपना रास्ता बडल लेती है. बाड़ी का एक बहानक रिला आता है, और रातो रात पुरे के पूरे गाँँँ, केथ, पुरीँ पुरानी बस्तिया सब कुईज बहेजाता है. तुछ तुछ बहुत खोफनाक मनजर है. अगर बजाग़ खुचा समझेटते हैं, मीलो दूर किसी नहीं अजज़गे पर जागे पर जाखे बस जातें. अब या एक सवाल उटता है. क्या सवाल? सवाल यह है कि जब अब अपनी जमीन से उज़ड़ता है, तो क्या उसके शब्द भी उस बाड के पानी में बहेजाते है? या थिर फिर वो शब्द उस नहीं जगे पर जाकर किसी और भाशा के साथ मिलकर एक नया अकार ले ले लेते हैं? दिखे ये एक बहुत भी गेरा सवाल है. कुई कि अखसर हम यही मान कर चलते है, कि बाशा तो बस किताबो से, या फिर व्याक्रन के उन सक्त नियमो से बनती है. और कुल, इसकूल में तो यही सक्वाया जाता है. आप, लेकिन सच तो यह के बाशा उस जमीन से बनती है, ज़ाई ज़ाई वो बोली जाती है, उन नदियो से बनती है जो उसके बूगोल को तैकरती है। और सबसे बड़ी बात उन लोगों के संगर्ष से बनती है, जो रव विस्थापन के बाद अपनी पहचान बचाने की जध्डो जहत करते है। क्या बाथ है? और आज हम जिस विष्चय की गेराई में जाने वाले है, वो इसी विस्ठापन, इसी संगर्ष, और इक भाशा के जिन्दा रहने की, बहुत इं, मडलब शान्दार कहानी है. जे भिल्कोल. आज हमारी चर्चा के के खिंदर में कोई आम किताब नहीं है. आज हम बात कर रहे हैं, साल 2012 में प्रकाशित, विदेहा, अंग्रेजी मेठली शब्द्खोष की, जिसे गजेंदर ताकृर, नागेंदर कुमारजा, और पंजिकर विद्याननजाने मिलकर तगयार किया है. और ये कोई चोटी मोटी उपलप्डी नहीं है? ये एक दम सेगी कहा. तो आजका हमारा मिशन स्व इन पन्नो में चबए शबडो का अर्थ कोजना नहीं है. हमें दर सल ये समजना है की कैसे एक टिक्षनरी. मथलब एक शबद कोच किसी भी भाशा, उसकी संसक्रती और उसके बोलने वालो के वजुद का एक जीता जागता दस्तावेज होता है. तीक हैं, तो आई ये ये से खोल कर देकते हैं. आप, और इस पूरी चर्चा को सही दिशा देने के लिए ना, इस शब्द्कोश की प्रस्टावना का जिक्र करना बहुत जरूरी हो जाता है आच्चा, जो प्रफेसर उदेन आराईन सिंगने लिकिया? बिलकोल, प्रफेसर सिंग का जो विष्लेशन है, वो दिक्षनरी को देखने का हमारा नजरया ही पुरी तरह से बडल देता है. वो बताते है, की एक शब्द को श्वास्टव में एक ताईम काप्सूल कितरा होता है. एक ताईम काप्सूल? मतलब जो समय को कैद कर ले? हाँ, बilkul वही. हमें से सर्व एक बाशा से दूसके बाशा में अनुवाद करने वाले किसी तूल कितरा नहीं देक सकते. उम ये अपने भीतर उस पूरे समाज की सोच को, उसके इतिहास के उतार च़ाफ को, और उसके क्रमिक विकास को हमीशा के लेग कैत कर लेग गद कर लेगता है. ये बाद मुझे सच में सोचने पे मजबोर कर रही है, के अखर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर � लो गे ही सुचते हैं? बलकुल! तो क्या ये सच नहीं है? नहीं, ये ब्रानती बहुत आम है, लेकिं सच नहीं है. अगर हम इतिहास के पन्नो को तोडा और पीचे पल्तें, तो शब्दुकोष बनाने की परम पराए, इस से हजारो साल पुरानी है. अजके सीर्या के आस्पास के हिस्ट्सा है वहां सुमेर्यन अखकादिन शब्दों की बाकाईदा एक दूी भाशी सुची तैआर की गगी गगी तीश्ट्सो इसापुर्व अगा इबला नाम की जगापर मिट्टी के ताबलेट्स यहनी तक्तिया मिलिया ना अद्याश्पास का हिस्ट्सा है, वहां सुमेरियन अखादियन शब्दों की बाकाईदा उग दूई भाशी सुची तैआर की लेए गाई ती तीस सो इसापूर अआ एबला नाम की जगापर मिट्टी के जो ताबलेट्स यहनी तक्तिया मिली आना वो अनसान दवारा शब्दों को सहेजने के सबसे पुराने गयाथ प्रयास माने जाते है अग, में ने नहीं भी नहीं, मुझे यहां थोडा सन्दे हो रहा है. पुच्छे. सीरिया के वो प्राचीन मिट्टी के ताबलेट्स, तो मुख्हे रूप से राजागो के हिसाप किताब रह्गने, व्यापार एक लें देन या राच्चाई फरमानो के लिए होते तेना आप, काफी हत तक और हम या 2012 की एक आदूनिक दिक्षनरी की बात कर रहे है, तो पूरी तरह से एक रेफ्रेंज बुक है. हम इन दोनो की तुलना एकी तराजू पर कैसे कर सकते हैं? ये तो सेव और संट्रे की तुल्ना करने जासा होगया मैं समथ सकती हों, ये सवाल बहुत लाजमी है देखने में ये दोनो चीज ये अग्ड़ाग लक सकती है लेकिन अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर पीचे की वजज़़ पर गवर करें मतला उनके मक्सध पर? बिलकुल उनके क्यूपर गवर करें तो दोनो का मुल मक्सध एक ही है अपने नजरीये और अपने ग्यान को विलुप थोने से बचाना प्राचीन काल से ही शब्दुकोशो का उदेश्छ केवल एक बाशा से दुस्री बाशा में अनुवाद करना नहीं रहा है अच्छ? तो और क्या उद्डेशि था? अगर हम अपने भाराद कही उदारन लें तो इसा पूर्व साथसो के आस्पास निगगंटुं की रच्ना हुई अब उसका मकसत क्या था? उसका मकसत ता वेदों के उन कतीं शब्दों को सहेजना और समजाना जिने लोग दिरे दिरे बूल रहेते है. यानी शब्दों को सहेजना असल में एक पूरी सभबहका की याद्दाश्ट को सहेजने जैसा है. बलकों सतीग बात कही आपने. ज़ेसे हम जमीन कोदकर दाईनोसर की हद्डिया निकालते हैं और लिक पुरा दाचा तब तब आजा तेरे ना वैसी एक शब्द्खोष भी एक भाशाई जीवाश्म की तरा है एक लिंविस्टिक फोसिल रिकोट तो आप आप दोग नहीं तो बज़ाड़ा है कि तो बज़ाड़ा बज़ाड़ा बज़ाड़ा बज़ाड़ा बज़ाड़ा बज़ाड़ा बज़ाड़ा बज़ाड़ा बज़ाड़ा बज़ाड़ाड़ा बज़ाड़ाड़ा बज़ाड़ाड़ा बज़ाड़ाड़ाड़ अमर सिंग का रचा हुए अमर कोष सामने आया इस गरन्द की एहमियत का अंदाजा पिसी बाट से लगा सकते है के इस पर चालीस से अदिक तीकाए लिख ही गएं चालीस इस ज़ाद कोमेंट्रीस सरफ एक शब्द कोष पर आदुनेक दोर में पश्छमी शिक्षा का प्रब़ाव बड़ा तभी ये सल्सला थमा नहीं आना. मैंने पड़ा था की 1813 में एच एच विल्सन ने पश्छमी सिद्धानतों पर पहला संसक्रित अंगरेजी शब्छ प्च्छ बनाया था. यह तो सच्मी कमाल है. और आदूनिक दोर में जो पश्चमी शिक्षा का प्रभाव बड़ा, तब यह सल्सला ठमा नहीं है ना. मैंने पड़ा था की, 1813 में एच एच विलसन ने पश्चमी सिद्धानतों पर पहला संसक्रित अंग्रेजी शब्द्खोष बनाया था. बलकों सही बलकों सही बलकों सही बलकों सही बलकों सही बलकों सही बलकों सही बलकों सही बलकों सही बलकों सही बलकों सही बलकों सही बलकों सही बलकों सही बलकों सही बलकों सही बलकों सही बलकों सही बलकों सही बलकों सही बलकों सही बलकों सही बलकों सही बलकों सही बलकों स बद़ा बड़ा रही होती है, ये सिझफ एक चबने की बात नहीं है, ये ये इस बात का सीदा एलान है, कि मैठली बहाशा में दूनिया के किसी भी आदूनिक विचार, तकनीक या विग्यान को वेक्त करने की पूरी पूरी कषम्ता है. अग, और ये विख्सित नात रात विख्सित नहीं होती? इसके पिचे यक बहुत लंबा बहुले कोर समाजिक मन्तन रहा होगा? बिलकुल, सदियों का मन्तन तो इतिहाज से निकल कर अब हमें उस जमीन पर आना चीए जहां मैठली वास्तो में सांस लेती है मैं बद्ला का शेट्र अपने ज़ो बद्लाग बदलने की जो कलपना की ती ना आज जो सच में बहुत ड़ावनी ती वो दर सल कोई मन गरमत कहानी नहीं बल के मित्ला का एक बहुती कठोर सच आच आच यहा मामला सच में बहुत दिल्चस फोजाता है तो किसी भी बाशा का बूगोल उसे सबसे जयादा प्रभाविद करता है जोज अब्राहिम ग्रियरसन ने उनीसो आप में मित्लाक शेट्र का जो बाशाई सरवेख्षन किया तना वो आज कि स्तिती से बहुत अलग है अग, उगर बड़ा कारन वो बहुगलिक सीमाय है, जो हमेशा से चलाईमान रही है. बलकोल. ये बहुत हेरान करने वात है, मड़ब जब हम सीमाय बडलने की बात करते है, तो दिमाग में किसी युद्ध यह राजने तिक संदी का खयाल आता है. यहां बूगोल बदलने का सब से बड़ा कारन तो कोसी नदी है. जी हां, कोसी नदी जिसे अकसर भीहार का शोक भी कहाजाता है. आपको पता है, इसने पिछले 200 वर्षो में कम साथ बार अपना मारक बडला है. साथ बार? बाप्रे? अब इसे इस तरह से समचते हैं, जब कोई नदी अचानक पचास यस सो किलोमिटर दूर से बहने लकती है, तो पुराने गाँई दूब जाते है, लोग अपना सब को चोडक न नई अजान जगोगवपर जाकर बसते हैं. और इस प्रक्रिया में प्रशासनिक जिलों की सीमाए भी बार भार पुनरगधित होती हैं बिलकुल नहीं जगापर गये हूंगे तो जाहर है वो नहीं बहाशाँं के समपरक में आई हूंगे नहीं शब्द उनके दैनिक जीवन का हिस्सा बने हूंगे अर यही वो बिन्दो है ज़ा मैठिली का अस्ली लचीला पन नजर आता है. अगर हम इसे बड़े परीद्श्ष्य से जोडखर देखे, तो अकसर माना जाता है के जब कोई भाशा दूस्री ताकत्वर भाशाँं कि समपरक में आती है, तो उसका मूल स्वरुब नश्ट होने लकता है आँ लोग केतें कि बशाशा ब्रष्ट होगगे बलक्ल, लेकिन मैठिली कोई अलक खलक पडा दूएप नहीं है या एक आसे बहुबजाशी समाज में जीवित है जाहां इसके आसपास भोजपूरी और मगी जैसी सम्रिद बाशाये बोली जाती हैं साति हिंदी एक बहुत बड़े समपरक सुत्र का काम करती है और प्रस्तावना में तो ये भी बताया गया है के इस लाके में नेपाली, बंगाली और संथाली बोलने वाले भी अच्छी कासी संख्या में मोगजुत हैं इतना ही नहीं जो मेठिली बोलने वाले जारकंट के खषेट्रो में पहले में हैं उनका समपरक, उराम, मुन्दारी, और हो जैसी अस्ट्रिक भाशाँँ से हूँ आज्चा, अच्छा अस्ट्रिक भाशाँँ से जी अप सोची किसका बाशा की सन्रचना पे क्या सर पडा होगा? अस्ट्रिक भाशाँँ ने मेठ्टिली के वाख के विन्यास को, यानी वाक्यों को गड़ने के तरीके को सीदे तोर पर प्रभाविद किया आरे वा और दूसरी तरफ उर्दूर अन्ने बाशावने इसके शब्द भंडार को और भी सम्रिध्ध किया है आक्डे बताते हैं कि किवल प्चीस से तीस प्रतीषत लोग यह आसे हैं तो ये विदेश शब्द्कोश इसी बाशाई मिलावद को इस खुफसुरत बाशाई मिलावद को इस खुफसुरत बाशाई मिलावद को आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आ� खिचडी को एक तरहां से प्रमानिक्ता देता है और गजेंद्र ताकृर और उनकी तीम की यह बहुत बड़ी उपलबदी है कि उनोने इन अपनाए गय शब्डो को अच्छुत नहीं माना बलकी उने दिक्षनरी में पुरे सम्मान के साथ जगा दी लेकिन देक्ये, यहां एक बात मुझे कब रही है. क्या? अगर ये भाशा इतने बगलिख शेटर में पहली हूँई है, और इतने सारे अलगलक समुदायों की जिन्दगी का हिस्चा है, तो इसे बुलनेवालों की गिन्ती करना इतना विवादित कि रहा है. आप दो बज़ाद कर देखाद बाज़ा था था बज़ाद कर था था था ज़ाद कर था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था � 1891 क्यानवे में ग्री आर्षन ने अन्मान लगा आ गब कि लग बबग नबभे लाक यानी नाईईप्वाँ तुम्यों लोग मेतली बोलते हैं. फिर उन्निस्थ क्यानवे में जंगन ना आती अग्ब आपी से भी कमोग कर महेंज उन्चास लाक रेजाती हैं. और थे चवमत्कार देखिये, 2001 में ये फिर से उचाल मारती है, और एक करोर भीस लाक से जाडा हुजाती है। रही कैसे संबहव है? ये बहरी उतार चडाव हमें ये सुचने पर मजुवूर करता है के अदिकारिक अखडे हमेश्या जमीनी हकीकत नहीं बताते. कئी बार यह आँता है किसी बाशा को बोलने लोग खुड आपनी बाशा को आदिकारिक दस्टाबेजो में दर्ज नहीं करवाते यह सा क्यो? मैटलब आपनी मात्र बाशा को कोई क्यों चुपाएगा? इसके काई कारन हो सकते है कभी कभी उने लगता है कि अगर वो किसी बडी या कहें की मुख्धारा की बाशा को अपनी मात्र बाशा बताएंगे तो उने शिक्षा या रूजगार में जी आदा असानी होगी हम यहां कोई राजनितिक पक्ष नहीं ले रहे है लिकिन हम बस इतना कैसकते हैं कि पहचान और अदिकारिक आख्रों के भीच हमेशा एक गेहरी रस्सा कषी चलती रहती है. और शाएद इसी रस्सा कषी के भीच एक बहुत बडा मिठाग भी गड़ा गया. अकसरे कहा जाने लगा, की मैठली तो सरफ ए खास जाती मुख्य रुब से ब्राह्मनो की बाशा है. मैं इसे थोडा रग दंग से देकती हूँ. ये एक बहुती सीमित और गलत नजर्या था, जिसे इस शब्द्कोष की प्रस्तावना में, बवाशा बवाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बा तब आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आ� आ� आप आप आप आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� तित्तु किलि लड़ना परता है. दबाव में निकरती है. बिलकुल समविदाने कदिकारों से इस बलंभे समयतक वंच्चना ले वास्तव में मिठिला में एक संसक्रतिक पुनरुद्धान को जन्म दिया. लोगों ने महसुस किया कि अगर सरकार उनकी भाशा को नहीं गिनेगी, तो ने खुद अपनी संसक्रती को दुन्या के सामने लाना होगा. और इसी दोर में बहत्रीं सहत्रे रचा गया होगा. आआ, और विष्व प्रस्छद भादुबनी पेंटिंग भी, इसी सांस्क्रितिक अस्मिता को जताने का एक सशक्त माद्यम बन कर अब्री और इसी लंभे संगर्ष कही परडाम ता कि अंतता मैत्हली को बारतिय संविदान की आप्वी अनुसुची में शामिल कर लिया गया ये के अईसी जीत ती जिस ने बता दिया की बाशा का स्तितव कागजोंपर नहीं बलकी लोगों के दिलो में होता है. बलकल सही बाथ है. और अब जब इसे समविद्धानिक मानिता मिल चुकी है, तो अगा सतवाल ये है की आगे क्या? इक बाशा को आप स्वर्ष्टिक पुरानी कविताँ या लोग गीतों तक तो सीमत ने रक सकतेना और यही पर ये विदे हे अंग्रेजी मेठेली शब्द्खोश फिर से बहुत प्रासंगे को जाता है तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो � तिरहुता लिपि को एक आदूनिक दिखष्टरी में दिखना सच में बहुत शान्दार अनुभव्व्रा मेरे लिए आम तोर पर जुक शेट्रिय बहाशागो के शब्द्कोष होते है ना उन में हमें आब्दोमन जिसका अथ अत्री या पेट दिया है या एसे ही आम शब्द आसानी से मिल जाते है लेकिन जो चीज मुझे सबसे जाडा मजदार लगी वो तिक्नीकी शब्दों का समावेश आँ, किसी बी भाशा का अस्ली इम्तिहान तो यही होता है कि क्या उ आजके विग्यान और आदूनिक तकनीक को समजा सकती है या नहीं? और मेठिली ने ये इम्तिहान बहुत अची तरह पास किया है. मतलब इस दिक्षनरी में आबकस के लिए, गिनेबला खलोना शब्द गड़ा गया है. ये बहुत फी रचनात्मक है. इतना ही नहीं, कमपुटर अर इंट्रनेट की दुनिया के बारी भरकम शब्डों को भी मेठली के साचे में बहुत खुबसुरती से डाला गया है. जैसे अपसलूट यौर्रेल किलिए इस में लिखा है निरपेखष सार्व केत या चेतर नाम्युक्त अंतरजाल संकेत. और अक्तिव सेल के लिए सक्व्रीए कक्ष का प्रेजोग की आगया है और आलगोरिखम जटल तकनी की शब्द को कलन विधी कह कर समजगा आगया है मतलब ये देखकर मुझे एक �alaghi romanch mein susua ये साभिट करता है कि ये बाशा किसी मुзिम में सजाकर रखने की चीज नहीं है? बलकल नहीं ये आजके इस तेस्तरार, दिजितल युग में पुरी तरा सास ले रहीं बलकी मैं तो कहुँगा दोड रही है और ये बहुत ज़ोरी भी है वोगा पीटी है, वो मबाल फोँन, एजीन और वेब दिक्षनरी के जर ये ही दुनिया को समचती है आँ, उनके लिए तो इंटनेटी सब कुछ है अगर कोई बाशा यें दिजिटल माद्यमो पर प्लप्द्ध नहीं है, तो वो पहड जल्दी लिए विलुप्त हो सकती है. विदे शब्द कोश दरसल ये सूनिष्च्ट करता है, के जो भी ज्यान चाहने वाले है, चाहे वो चात्र हों, लेअनर्स हों, या शोथ करता उने अपनी मात्र भाशा में जानकारी हासल करने किले बारी बरकं सुचनाों के शोर्गुल में ना भबतक ना पडे या गिसी दुसरी भाशा पे निरभर ना रहना रहना पडे अज भी जर्चा या सच मे बहुत या दबुद रही है विदे हे अंग्रेजी मेठली शब्दकोष के पन्ने पलडटटेवे हमने देखा कि ये सरफ दो बाशागो का मिलन न नहीं है? जी ये एक आसी बाशा के अदम में सहास की कहानी है जिसने नद्यों की विनाशकारी बाड को जिला, बबदलते हुए नक्षों के भीच अपनी जगा बनाई, जनगडना के उन उतार च़ाव वाले आक्रो को माद्द दी, और आज कमठूटर की सक्रीन पर पुरी शान से कडी है. ये उस भाशाई लचीलेपन की जीथ है, जो अस्ट्रिक से लेकर उर्दू और अंग्रेजी तक, हर भाशा के अच्छे शब्दों को अपनाता तो है, लेकिन अपनी आत्मा, यानि अपनी मूल पहचान को कवी नहीक होता. बिलकुल सही. लेकिन इस चर्चा को समेटने से पहले मैं चाहता हूं के हम एक अजे विचार पर चिन्तन करें जो आज की तकनीक से सीदे तोर पर जुडा है. वताएए. हम सब जानते है, की बाशा हमारे सोचने के तरीके को अब ज़़ाई को ज़ाई को ज़ाई को ज़ाई को ज़ाई को ज़ाई को ज़ाई को ज़ाई को ज़ाई को ज़ाई को ज़ाई को ज़ाई को ज़ाई को ज़ाई को ज़ाई को ज़ाई को ज़ाई को ज़ाई को ज़ाई को ज़ाई को ज़ाई को ज़ाई को ज़ाई को ज़ाई को � यह बद्दाँ के मुहावरों को और तिरहुता जैसी प्राचीन लिप्यों को अगर निद्टानेट और कोडिंग की दुन्या में दिजितल रूप देरे हैं तो इसके बवविश्ष्य में क्या परिनाम होंगे और वाज, क्या बात है? क्या आजा हो सकता है कि बवविश्वे के आलगोरिदम भी हमारी तर है अलग �alag-alag सांसक्रतिक नजर्यों से सोचना सीकेंगे? यही तो सोचने वाली बात है मतलब क्या तकनीक की बाशा अभी अवट्याई बाज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो ब अर गेरे सवाल के साथ, हम आजकी इस चर्चा को यही विराम देतें ग्यान के एक ने विशें और एक ने नजरीए के साथ आप लोगो से फिर मिलेंगे.