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मोती_दाईक_विद्रोह_आ_छह_दिनक_मातृत्व.m4a

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Part 7 · VIDEHA MITHILA MAITHILI DISCUSSION CRITICISM SERIES PART 7
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  1. 0:00–0:05आई हम सब मिफिलाक उजेनी गामक एक ता मारमिक कता पर चर्चा करो हल ची,
  2. 0:05–0:14जते बाजपनक ताना सुनी क गाहिल माईदरी आपन क्रूर प्रषन लोजाय एवाली मुती दाएके चो दिन के लेल मात्रित्वक्वर्ज्दान बेटेथ छे,
  3. 0:14–0:17अफेर जीवन भरिक लिए अद्यात्मिक शान्ती
  4. 0:17–0:19तो देखू कत्ठा कगती
  5. 0:19–0:21आम मुतिदा एक मंदिर कहनइत कालक
  6. 0:21–0:25बहुनात्मक अवस्ता के औरु भेसी विस्तारक आवस्स्टा आची
  7. 0:25–0:28जाही साइकर प्रभाओ पुन रुपन पाथक तक पहुची सकई
  8. 0:28–0:43आद दो सर दिन भोर में मंदिर कहनट कालक भीज कजे कथा विस्तार अचीने से बहुत हलबडी में लिखल गेल भुजाई तची.
  9. 0:43–0:46बलकुल जिन लागे चेजे की चुट गेला ची भीज में.
  10. 0:46–0:50अग, लेखनी सोजे अप्मान सविद्रो द़री चली जाई तखछी
  11. 0:50–0:56जैसन पाथख के मोती दाएक का मानसिक दुन्द भुजवाक पर्याप चमे ने बहते चे
  12. 0:56–0:59कताख एह प्हर गोर करू, तसाज के समय आची
  13. 0:59–1:02मोती दाएक हाद गोबर से सनल आची
  14. 1:02–1:32अग गामाक औरती सब अते सा गुज्राइत हुँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ
  15. 1:32–1:39एकर भीच कजे मनोवे ज्यानिक उतल पुतल अची, उ एठाम पोड रुपें गाया बची.
  16. 1:39–1:45जकन कोनो इस्त्री जे आपन समपोड जीवन एक ता देविक सेवा में समरपित कचुकल होएत,
  17. 1:45–1:50उनका एते क्रूर सामाजिक प्रहारक सामना करे परेत चने,
  18. 1:50–1:55तहुंकर पहल प्रतिक्रिया सीथा क्रोद वविद्रों नहीं होईत चो.
  19. 1:55–1:59आप पहल प्रतिक्रियात शुन्यता आविश्वासक होईत चे.
  20. 1:59–2:02बिल्ल्कुल. आविश्वास आग्गेर निराशा.
  21. 2:02–2:07पाथक के उही मान्सिक संक्रमन सवन्चित कर दिल गेले ची,
  22. 2:07–2:18अभी बाद पुर्न रूपेन गुजीराल ची जखन कोनो बद भार आगात लागत चे तमस्तिश्क अख्रा तुरन्त प्रोषेस नहीं को पावेत अचे.
  23. 2:18–2:28आँ ख़बात आज़ जे गदनाक्रम एस पष्ट आजी मुदा अकर पाचुक जे कारन आँ मानसिक प्रक्रिया आजी अकरा अस्तापित नहीं केल गल आजचे.
  24. 2:28–2:32अग, लेखक सोजे उनका विद्रोही बना देत चे
  25. 2:32–2:35जाएस समोती दाएक चरित्र विकास
  26. 2:35–2:38एक रेक्ही मने वन दीमेंचनल बहेजाए तची
  27. 2:38–2:41तची एही रातिक ब्रिष्खे दीमा करू
  28. 2:41–2:45आउनकर भीतर चली रहल अविष्वास निराशा
  29. 2:45–2:49अगर दुक्के नीक जकास थापित करू।
  30. 2:49–2:52उनकर माँन पीडा के मुखर करभाक लेल,
  31. 2:52–2:55के चो अत्रिक्त वाक्के वा अनुच्छेद जोडू,
  32. 2:55–2:58जाए सा अगाडिक गतना सबहाविक लागे।
  33. 2:58–3:00देखू, उदाहरनक लेल,
  34. 3:00–3:02एक ता द्रिष्य राखल जासके तची,
  35. 3:02–3:08जते मोती दाई राती में उचान के खाली हिस्चा की चूभी का देखेत चती.
  36. 3:08–3:10ओ, यी बहुतनी इक दिश्वर हात.
  37. 3:10–3:14आ, वा खिरकी सब बाहर अन्यार राती में निहारेत.
  38. 3:14–3:19आपन बरकोक निष्ठा आपनक भेटल अप्मानक तुलना करेत चतीन.
  39. 3:19–3:27एकर बाद जगन अभोर में कोदारी उठावे च्छतिन, तो उक रोद भेसी स्वबहाविक अगगेर भुजाएद.
  40. 3:27–3:30उही रातिक सन्नाता के महसुस कर अगद्या पाथखे.
  41. 3:30–3:34माने उआपन खाली हाद के निहारी सके च्छतिन.
  42. 3:34–3:38इक्दम उ आपन हाथख्रेखा सब के निहारी सके छतीन
  43. 3:38–3:42उ हाथ जे गाहिल माएक वेदी लिपेट लिपेट किया गेल आची
  44. 3:42–3:45मुदवही में कुनु संटानक लेखा नहीं अचे
  45. 3:45–3:51मस्तिष्कक इज द्वंद हूँ आचे जे की एते एक दिनक सेवाक फल इचे चे
  46. 3:51–3:55ब्यादिबाद्या दादे लासां कि माए गाहिल हूंकर खाली हाद नहीं देखे च्छती.
  47. 3:55–3:59बिल्कोल, यी सब कताग पन्नापर आवे के चाही.
  48. 3:59–4:04जखन उ राती भहनेक एह शुन्नियता नमान्सिक मन्तन संगुजरती
  49. 4:04–4:07तकने भोर में कोदाडी उठाओभ,
  50. 4:07–4:37अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अ�
  51. 4:37–4:42अदर नही जाही जे अद्ते दिक मनो वैग्यानिक विष्लेशन सा कता अपन मुल श्यली सब अद्की जायत.
  52. 4:43–4:46देखु, ये एक ता तारकिक छिन्ता आची.
  53. 4:46–4:51मुदा लोग कता क श्यली में से हो मुख्या पात्राक वेदना अस्तापित करव आवष्ष्च्छे,
  54. 4:51–4:55जही सपात्खक कण सहनवूती पुन रुपें हुनका संग जूडी सकः.
  55. 4:55–5:01लोक कता बहले संख्षिप छो तची, मुदा उ मानव भावना सवहीं नहीं हो तची.
  56. 5:01–5:02आ, इद चच है.
  57. 5:02–5:07वास्तव में, लोक कता सवह में गहर भावना के वेक्त करभा के लिल,
  58. 5:07–5:10प्रतिकात मक कारेक उप्योग हैचे
  59. 5:10–5:14चकनाहा कोनो पात्रक पीडा के गराईस नहीं देखवें
  60. 5:14–5:18तब पात्ठक खूंकर जे इ अबुद्पूर्व विद्रोह अची
  61. 5:18–5:21एक ता देविक मंद्र कनी देनाई
  62. 5:21–5:24उक्रास कोनो लगाव वा अचित्ति नहीं बेटते
  63. 5:24–5:25सही बात अची
  64. 5:25–5:28जम्मोती दाई राटी बर कनई च्छतीन
  65. 5:28–5:32तो उही कनाबा में जि लोक तत्व अची
  66. 5:32–5:35उ कताएक संछिपता के नुक्सान नहीं पहुचायत
  67. 5:35–5:39बलकी उक्रा आरो भेसी पुरानेक अप्रब्हाव्शाली बनोते
  68. 5:39–5:41यी बहावनाक विस्तार नहीं
  69. 5:41–5:45बावनाक गनी करन मने कन्दन्सेशन आची
  70. 5:45–5:47बहुत नीक बात कहलो आहा
  71. 5:47–5:51तजगन उही राद की पीडा के हम सव विस्तार ददेव
  72. 5:51–5:54तग कताक अंत्मे जो नका समादान भेते चन्णी
  73. 5:54–5:58उही पर सो हु एक तनव द्रिष्टी सविजार करे परत
  74. 5:58–6:00समाज क कलंक मिताबक लेल
  75. 6:00–6:05च्छे दिन का मात्रत्वा अब बच्चाक म्रित्विष्यगत समादान अच्छी
  76. 6:05–6:08ताईलेल गहर मनुवग्यानी कादारक आवशकता आच्छी
  77. 6:08–6:15अग, कताक अन्त में जखन च्छा दिन का मात्रत्वाग बच्चाक म्रित्विव भोजाए तची
  78. 6:15–6:18तक्हन कत्हा बहुत जल्दी एही बात पर चली जायते ची,
  79. 6:18–6:21जो हुंकर बाज हो मैं कलंक, मिटी गेल,
  80. 6:21–6:24आो गाहिल माएक सीविका बनी गली है,
  81. 6:24–6:27जे की बहुत हरभरी में समेटल गेल लागते ची.
  82. 6:27–6:28एक दम!
  83. 6:28–6:30एता बच्चा गमा बाक शोक,
  84. 6:30–6:35अख्लंक मेट्बाक सन्तोश एहे दूनुख परस्पर विरोदी भावना के भीज
  85. 6:35–6:38कोनो मनोवैग्यानिक तेराव नहीं चे.
  86. 6:38–6:43इहे सा कताक सबस नाजुक असमबवत सबसत त्रूती पूँँण मोड अची.
  87. 6:43–6:46आहां के इबात हमरा एक्धम सही लागी रहाल अची.
  88. 6:46–7:16सोचुना, एक ता एस्त्री जे बरको सा बच्चा के लिल तर्सी रहल चली, जकन हुनका एश्वर ये हस्तक शेप सा बच्चा बेटे चने, अफेर मात्र चाउ दिन के बाद उबच्चा मरी जाएच छे, तकी हुनका तुरन्त एही बातक सन्तोष भहुस अक अगचे जे हुनक
  89. 7:16–7:17सब सब पएग त्राज्दी चे
  90. 7:18–7:20कता इप त्राज्दी के लांगिता
  91. 7:20–7:22सोजे समाजिक विजैएप पर पहुची जाएत ची
  92. 7:23–7:27जाएसा मोती दाएक मात्रत्व अस्वाबवेक असते ही भुजहाए लागे चे
  93. 7:27–7:29आप इब रहुत सब पच्ट ची
  94. 7:29–7:33जे एते कता में एक तब भारी गाप जी.
  95. 7:33–7:38लेखख बच्चक मरत्टिव केन, केवल एक तप प्लोट दिवाईज़का उप्योग कर रहल चती,
  96. 7:38–7:41जही सामाजिक कलंक मिताल जासके.
  97. 7:41–7:46मुदा उही इस्त्री केन, उही शोक सा गुजरे नही दोर रहल चती.
  98. 7:46–7:47सही कहलू.
  99. 7:47–7:57तब बच्च्च म्रित्ट्युक तीक बादग किच समय के कता संजोडू जदे मोती दाई एई अपार्शोग अ अद्ध्यात्मिक मुक्तिक भीच सामन्जस बिठाभी रहल होगीत.
  100. 7:57–8:02उनकर मत्रित्तोक पुव्नताकें केवल समाजक ताना मेटल हरी सीमित नहीं कोके,
  101. 8:02–8:05उक्रा एक ता उच्छे अद्ध्यात्मिक छेतना संजोडू.
  102. 8:05–8:10इपरिवर्तन अचानक नहीं जाही, बलकी एक ता क्रमिक भोद होना एक जाही.
  103. 8:10–8:17जिना की एक तक शनक वरनन बहुत सके थे, जटै मोती दाई आपन खलियात के दिखे थे शती,
  104. 8:17–8:22मुदा एही बेर उक्रामे केवल दुख का बदला पूरनताक बाव अची.
  105. 8:22–8:27उई महसुस करे थ चीन जे उच्छा दीनक प्रेम हुनकर एटेक शक्ती दोडे लक,
  106. 8:27–8:32जे आब उ पुरा गामवक कष्ट हराईल माएक माद्यम बनी सकेच शती.
  107. 8:32–8:34इदनू भावलाके भीचक पूल बनत.
  108. 8:34–8:43आईक ता एहन द्रषे जदे उ बच्चक म्रित देखे गाहिल माएक वेदी लग रक्छ चती.
  109. 8:43–8:47उनक राक सनोर कहसे डाल चे, उ विख्षिप्त चती,
  110. 8:47–8:52मुदा उही शोग के भीज उनका इग़ेर अनबूती हो इच्चनी
  111. 8:52–8:57जे इच्छा दिनक मात्रत्व कोनो लोकिक सुख नहीं
  112. 8:57–9:00बलकी गाहिल माएक एक ता वर्दान चल
  113. 9:00–9:03जे उनके संसारक मोग सा मुक्त कर बाकले दिल्गे ल्चल
  114. 9:03–9:04बहुत सुन्दर
  115. 9:04–9:10उनका बुजहे दिया, जे इबच्छा उनका समाज कन नजर्ये में पुर्न बने बाक ले नाए,
  116. 9:10–9:14बलकी स्वयंक नजर्ये में पुर्न बने बाक ले आए ल्चल.
  117. 9:14–9:15मुदप्यर एक तब आद सोचु,
  118. 9:15–9:20इत अहिना भेल, जना कुनु बद्पाएक तूफानक,
  119. 9:20–9:25बादके शान्ती देखावसा पहीने, तूफानक तबाही के देखावसा परहेज कर लेजा.
  120. 9:25–9:55अगर दिख अगर दिख अगर दिख अगर दिख अगर दिख अगर दिख अगर दिख अगर दिख अगर दिख अगर दिख अगर दिख अगर दिख अगर दिख अगर दिख अगर दिख अगर दिख अगर दिख अगर दिख अगर दिख अगर दिख अगर दिख अगर दिख अ�
  121. 9:55–9:57अर प्रेरना डायक बनेवत,
  122. 9:57–10:00जगा हम तूफान के तबाही नहीं देखब,
  123. 10:00–10:05ता हम उही तबाही के भीच तादभेल गाज के मस्वुति कोन भुजब.
  124. 10:05–10:07आ, इतो ची.
  125. 10:07–10:10सहित की एक तम वूलभूट सिद्धान्त चे,
  126. 10:10–10:13जिक खेतार्सस, मने बहाव विरेचन,
  127. 10:13–10:17जखन पाथक पोरन रूपेड उही पीडा सगुज्रे चे
  128. 10:17–10:21मोती दाई के उही अठा शोख सगुज्रे देल जाए
  129. 10:21–10:23जाए सहूंकर विजे वास्तविक लाग़
  130. 10:23–10:28बलकोल, जखन उही शोग के गेराए सवूथी का अंत में
  131. 10:28–10:30गाहिल माएक सेवीका बने चती
  132. 10:30–10:33तक्हन पार्ठक यी महसुस कर सकत चच्छे,
  133. 10:33–10:36कोनो रारल भेल इस्ट्रीक समज़ोता नहीं आची,
  134. 10:36–10:40बलकी एक ता एहन इस्ट्रीक महान विजेया ची,
  135. 10:40–10:44जी जीवन के सबसे बड़ा दुख के पार कच्छुकल आची.
  136. 10:44–10:46इजनकर आद्द्यात्मिक शक्ती चे,
  137. 10:46–10:53जए आई पीडा के नुकालेब, ता आई उकर पार पेलक जे अद्यात्मेक उचाएचे उक्रा से हो चोट कदेप.
  138. 10:53–10:55उंग, एक दम सही बात.
  139. 10:55–11:01तजवां सब दक माद्दियम सों कताक एही बहावनात्मक गेराए के दूरुस्त को लेल जाए,
  140. 11:01–11:07ता उक्रा बाद जे द्रिष् समगरी अची उक्रा से हो एही कताख सुर में सुर मिलावे पडद.
  141. 11:08–11:11कताद में प्रियोगत आमुर्त अच्यामितिये चित्र कला,
  142. 11:11–11:15मित्ला गोंक एगेर संसक्रितिक अबहावनात्मक कताद सं,
  143. 11:15–11:17शेलिगत रूपे मेल नहीं कहीता ची.
  144. 11:17–11:47वूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ�
  145. 11:47–11:50कताक मानविय संभेदना सों दूर कर देचे.
  146. 11:50–11:53जामित्य अकार सवबाव सोकतोर,
  147. 11:53–11:55बोद्धिक और आदोनिक होएचे.
  148. 11:55–11:58जकना हा त्रिभुज व्रित देखे ची,
  149. 11:58–12:01ताहाक मस्तिष्क आनलेतिकल मोड में चली जाएचे.
  150. 12:01–12:03आप अगरा दिकोड कर लगाई ता ची.
  151. 12:03–12:33बिल्कुल, मुदा एक दफा एक दम माटी संजोडलग, एक ता गामक सादारन विस्त्रीक पीडा, गोईत्हा गंद, कोदारेक पहार, माटी गूरी सब किच्छ जैवेक और इस परष्च्निया च्छ, आमोद चित्र, पात्ठ के भावना महसुस करबाक बदला, उक्रा दीको�
  152. 12:33–12:37इलेक्त्रूनिक सिंथे साईजर पर बजाएल जारा होगगगग
  153. 12:37–12:38एक्दम सती कुदारन
  154. 12:38–12:42तईही चित्र सबख शेली में किचु बदलाओ को रू
  155. 12:42–12:45जाही सा उ कत्ठाग लोगपत्व, माने फोक एलिमेंट,
  156. 12:45–12:49अ भावना के भेसी सजी वूरुप में प्रस्तुत को सकीए.
  157. 12:49–12:59चित्र के कताक च्चरम भावनात्मक श़ज्संग मिलाओ, अमुर्त अकार सा भावनाक ओना नहीं दहरी सकेता, जना एक ता मानवाक्रती वा पारमपरिक कला.
  158. 12:59–13:05यही कताग जे आत्मा ची उक्रा द्रिश्व रूप में उतारवाक लेल बहुत विष्ट्ता कावश्ष्टा आच्छे.
  159. 13:05–13:09आदारन् सो रूप जगन औरद सब ताना देट ची,
  160. 13:09–13:12तकन केवल आमुर्त रंबिरंगक आकारिक बदला,
  161. 13:12–13:17मोदी दाएक जूकल दे, आमातिक गुइताक अस्पष्ट चित्रन भासकईताज.
  162. 13:17–13:19जे भेसी प्रभाव्शाली लागत.
  163. 13:19–13:26आ, मन्दिर खनाइत काड, कोदारिक चोट, औमातिक उड़ाएत दूर के दिखावे वला,
  164. 13:26–13:30कोनो पारमपरिक मित्लाच्ट्रकलाक उप्योक कायल जासके चे
  165. 13:30–13:33जाही सो क्रोद अवेदना अस्पष्ट जल कै.
  166. 13:33–13:37मित्लाच्ट्रकलाक अपने एक्ता सम्रिध्ट्च्ट्रकलाः परमपरा चे
  167. 13:37–13:40जटै रेखा सब में लैहोए चे
  168. 13:40–13:44जे प्राक्रतिक और मान्विय भावना के बहुत नीक जका विक्त कराई चे
  169. 13:44–13:50जे मित्या अकार के बदला जा पारमपरे क्रेक्हा चित्रक उप्योक का याई जाए
  170. 13:50–13:53जटै एं मोतिदाएक आख्खिक भावस पष्ट होगे
  171. 13:53–13:56तो उपाट्ख के कताक आत्मा द्रीलो जाएत
  172. 13:56–14:07मुदा की इ आमुर्त कला जाएन भूजी का नहीं दिल गल अच्छे, जाईसा इ कता कोनो एक गाँक नहीं भूँक ग़, यूनिवर्सल वस सार्व भूमिक लागए.
  173. 14:07–14:10मने आहा कहब चे जे लेक्ख चाहत चाथ चती जे?
  174. 14:10–14:17अग, समबवतलेखक यी दिखावे चाहा चे ती, जे बाज पनक पीरा वा अद्यात्मिक खोज,
  175. 14:17–14:22किवल उजैनी गोंक मोती दाएक नहीं, बलकी सन्सार के कोनो भी इस्ट्रिक भहसके च्छे.
  176. 14:22–14:28तकी इ आदूनिक आमूर्त कला एक्रा उ सार्व भोमिक्ता नहीं दरहाल अचे,
  177. 14:28–14:33जाही सा पाथक एक्रा एक्ता सीमित इस्ठानिय लोग कता मात्र नहीं माने?
  178. 14:33–14:38बुजलम अग बात, मुदा देखू, सार्व भोमिक् बनेवा की चकर में,
  179. 14:38–14:43अपन अस्टानियता अब्वाँनात्मक ज़र से कती नहीं जाए,
  180. 14:44–14:48एह लेल कम से कम पात्रक भाओ भंगिमात अस्पष्ट हुबाक चाही.
  181. 14:49–14:52कला अस्टाइत्यक यी एक ता बहुत सुन्दर विरोदबास अची,
  182. 14:53–14:56जि कोनो भी कता सार भोमिक तकने बने च्याए,
  183. 14:56–15:26जखनो आपन इस्ठानियता मे पुरन रूपेन प्रामानिक मने अठेंतेख हूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ
  184. 15:26–15:31अगर महत अजविक रूप हूनाए जाही जे एक आख्यान मे अची.
  185. 15:31–15:37जगन आहा कोनो विष्छ्ट गामख, विष्छ्ट पीडा के सत्तिता के संग दिखावेद ची,
  186. 15:37–15:43तकने विष्व के कोनो आन कोना में बैसल पाधख, उकरा से अपन पीडा के जोड भाभेत अची.
  187. 15:43–15:48बिल्कुल आमुर्ती करन्थ से जुडाओ नहीं बलकी दूरी पैदा हो इच्छे.
  188. 15:48–15:56एक दम सही कहलो वहां. ते एही समपुरन चर्चा के समेटित लेक्खक लेल तींटा मुख्छे सुजाव अचे.
  189. 15:56–16:01पहल मंदिर कहनेथ कालक मोती दाइट क्रान्तिकारी कदम से पहले,
  190. 16:01–16:05उनकर रादिब हरेक मानसिक ध्वन्वके विस्तार दिया
  191. 16:05–16:08उही सन्नाताके कताक पन्नापर उतराए दिया
  192. 16:08–16:11हा, एप बहुत जरुरी आची
  193. 16:11–16:13दो सर, बच्चाक म्रित्य।
  194. 16:13–16:15अक्कलंक मिट्वाक सन्तोष दरिक
  195. 16:15–16:17मनो वेग्यानिक यात्रा में
  196. 16:17–16:19उगटा बहुनात्मक तह्राओ लाओ
  197. 16:19–16:21उनका येगो माएक रूप में
  198. 16:21–16:23उही शोग के महसुस करे दिया
  199. 16:23–16:25जाए से हुंकर अंतिम अद्यात्मिक शानती
  200. 16:25–16:27भेसी यतार्त्त लागे
  201. 16:27–16:28एक दम
  202. 16:28–16:31अटेसर अमुर्त चित्रांकन के कताक
  203. 16:31–16:35गज़ीर सांस्क्रतिक आमारमिक सुर के संग मिलाओ.
  204. 16:35–16:37इग कता बहुत शमतावान अचे
  205. 16:37–16:41आप प्राशब के आहाके एही रस्ना के संशोदित रूप में
  206. 16:41–16:43फेर सा पदवाख प्रतिक्चा रहत.
  207. 16:43–16:46आपन काज फेर सा रहमरा सब के लग पताओ
  208. 16:46–16:48अम सब एक रफेर सदेखब

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आई हम सब मिफिलाक उजेनी गामक एक ता मारमिक कता पर चर्चा करो हल ची, जते बाजपनक ताना सुनी क गाहिल माईदरी आपन क्रूर प्रषन लोजाय एवाली मुती दाएके चो दिन के लेल मात्रित्वक्वर्ज्दान बेटेथ छे, अफेर जीवन भरिक लिए अद्यात्मिक शान्ती तो देखू कत्ठा कगती आम मुतिदा एक मंदिर कहनइत कालक बहुनात्मक अवस्ता के औरु भेसी विस्तारक आवस्स्टा आची जाही साइकर प्रभाओ पुन रुपन पाथक तक पहुची सकई आद दो सर दिन भोर में मंदिर कहनट कालक भीज कजे कथा विस्तार अचीने से बहुत हलबडी में लिखल गेल भुजाई तची. बलकुल जिन लागे चेजे की चुट गेला ची भीज में. अग, लेखनी सोजे अप्मान सविद्रो द़री चली जाई तखछी जैसन पाथख के मोती दाएक का मानसिक दुन्द भुजवाक पर्याप चमे ने बहते चे कताख एह प्हर गोर करू, तसाज के समय आची मोती दाएक हाद गोबर से सनल आची अग गामाक औरती सब अते सा गुज्राइत हुँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ एकर भीच कजे मनोवे ज्यानिक उतल पुतल अची, उ एठाम पोड रुपें गाया बची. जकन कोनो इस्त्री जे आपन समपोड जीवन एक ता देविक सेवा में समरपित कचुकल होएत, उनका एते क्रूर सामाजिक प्रहारक सामना करे परेत चने, तहुंकर पहल प्रतिक्रिया सीथा क्रोद वविद्रों नहीं होईत चो. आप पहल प्रतिक्रियात शुन्यता आविश्वासक होईत चे. बिल्ल्कुल. आविश्वास आग्गेर निराशा. पाथक के उही मान्सिक संक्रमन सवन्चित कर दिल गेले ची, अभी बाद पुर्न रूपेन गुजीराल ची जखन कोनो बद भार आगात लागत चे तमस्तिश्क अख्रा तुरन्त प्रोषेस नहीं को पावेत अचे. आँ ख़बात आज़ जे गदनाक्रम एस पष्ट आजी मुदा अकर पाचुक जे कारन आँ मानसिक प्रक्रिया आजी अकरा अस्तापित नहीं केल गल आजचे. अग, लेखक सोजे उनका विद्रोही बना देत चे जाएस समोती दाएक चरित्र विकास एक रेक्ही मने वन दीमेंचनल बहेजाए तची तची एही रातिक ब्रिष्खे दीमा करू आउनकर भीतर चली रहल अविष्वास निराशा अगर दुक्के नीक जकास थापित करू। उनकर माँन पीडा के मुखर करभाक लेल, के चो अत्रिक्त वाक्के वा अनुच्छेद जोडू, जाए सा अगाडिक गतना सबहाविक लागे। देखू, उदाहरनक लेल, एक ता द्रिष्य राखल जासके तची, जते मोती दाई राती में उचान के खाली हिस्चा की चूभी का देखेत चती. ओ, यी बहुतनी इक दिश्वर हात. आ, वा खिरकी सब बाहर अन्यार राती में निहारेत. आपन बरकोक निष्ठा आपनक भेटल अप्मानक तुलना करेत चतीन. एकर बाद जगन अभोर में कोदारी उठावे च्छतिन, तो उक रोद भेसी स्वबहाविक अगगेर भुजाएद. उही रातिक सन्नाता के महसुस कर अगद्या पाथखे. माने उआपन खाली हाद के निहारी सके च्छतिन. इक्दम उ आपन हाथख्रेखा सब के निहारी सके छतीन उ हाथ जे गाहिल माएक वेदी लिपेट लिपेट किया गेल आची मुदवही में कुनु संटानक लेखा नहीं अचे मस्तिष्कक इज द्वंद हूँ आचे जे की एते एक दिनक सेवाक फल इचे चे ब्यादिबाद्या दादे लासां कि माए गाहिल हूंकर खाली हाद नहीं देखे च्छती. बिल्कोल, यी सब कताग पन्नापर आवे के चाही. जखन उ राती भहनेक एह शुन्नियता नमान्सिक मन्तन संगुजरती तकने भोर में कोदाडी उठाओभ, अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अ� अदर नही जाही जे अद्ते दिक मनो वैग्यानिक विष्लेशन सा कता अपन मुल श्यली सब अद्की जायत. देखु, ये एक ता तारकिक छिन्ता आची. मुदा लोग कता क श्यली में से हो मुख्या पात्राक वेदना अस्तापित करव आवष्ष्च्छे, जही सपात्खक कण सहनवूती पुन रुपें हुनका संग जूडी सकः. लोक कता बहले संख्षिप छो तची, मुदा उ मानव भावना सवहीं नहीं हो तची. आ, इद चच है. वास्तव में, लोक कता सवह में गहर भावना के वेक्त करभा के लिल, प्रतिकात मक कारेक उप्योग हैचे चकनाहा कोनो पात्रक पीडा के गराईस नहीं देखवें तब पात्ठक खूंकर जे इ अबुद्पूर्व विद्रोह अची एक ता देविक मंद्र कनी देनाई उक्रास कोनो लगाव वा अचित्ति नहीं बेटते सही बात अची जम्मोती दाई राटी बर कनई च्छतीन तो उही कनाबा में जि लोक तत्व अची उ कताएक संछिपता के नुक्सान नहीं पहुचायत बलकी उक्रा आरो भेसी पुरानेक अप्रब्हाव्शाली बनोते यी बहावनाक विस्तार नहीं बावनाक गनी करन मने कन्दन्सेशन आची बहुत नीक बात कहलो आहा तजगन उही राद की पीडा के हम सव विस्तार ददेव तग कताक अंत्मे जो नका समादान भेते चन्णी उही पर सो हु एक तनव द्रिष्टी सविजार करे परत समाज क कलंक मिताबक लेल च्छे दिन का मात्रत्वा अब बच्चाक म्रित्विष्यगत समादान अच्छी ताईलेल गहर मनुवग्यानी कादारक आवशकता आच्छी अग, कताक अन्त में जखन च्छा दिन का मात्रत्वाग बच्चाक म्रित्विव भोजाए तची तक्हन कत्हा बहुत जल्दी एही बात पर चली जायते ची, जो हुंकर बाज हो मैं कलंक, मिटी गेल, आो गाहिल माएक सीविका बनी गली है, जे की बहुत हरभरी में समेटल गेल लागते ची. एक दम! एता बच्चा गमा बाक शोक, अख्लंक मेट्बाक सन्तोश एहे दूनुख परस्पर विरोदी भावना के भीज कोनो मनोवैग्यानिक तेराव नहीं चे. इहे सा कताक सबस नाजुक असमबवत सबसत त्रूती पूँँण मोड अची. आहां के इबात हमरा एक्धम सही लागी रहाल अची. सोचुना, एक ता एस्त्री जे बरको सा बच्चा के लिल तर्सी रहल चली, जकन हुनका एश्वर ये हस्तक शेप सा बच्चा बेटे चने, अफेर मात्र चाउ दिन के बाद उबच्चा मरी जाएच छे, तकी हुनका तुरन्त एही बातक सन्तोष भहुस अक अगचे जे हुनक सब सब पएग त्राज्दी चे कता इप त्राज्दी के लांगिता सोजे समाजिक विजैएप पर पहुची जाएत ची जाएसा मोती दाएक मात्रत्व अस्वाबवेक असते ही भुजहाए लागे चे आप इब रहुत सब पच्ट ची जे एते कता में एक तब भारी गाप जी. लेखख बच्चक मरत्टिव केन, केवल एक तप प्लोट दिवाईज़का उप्योग कर रहल चती, जही सामाजिक कलंक मिताल जासके. मुदा उही इस्त्री केन, उही शोक सा गुजरे नही दोर रहल चती. सही कहलू. तब बच्च्च म्रित्ट्युक तीक बादग किच समय के कता संजोडू जदे मोती दाई एई अपार्शोग अ अद्ध्यात्मिक मुक्तिक भीच सामन्जस बिठाभी रहल होगीत. उनकर मत्रित्तोक पुव्नताकें केवल समाजक ताना मेटल हरी सीमित नहीं कोके, उक्रा एक ता उच्छे अद्ध्यात्मिक छेतना संजोडू. इपरिवर्तन अचानक नहीं जाही, बलकी एक ता क्रमिक भोद होना एक जाही. जिना की एक तक शनक वरनन बहुत सके थे, जटै मोती दाई आपन खलियात के दिखे थे शती, मुदा एही बेर उक्रामे केवल दुख का बदला पूरनताक बाव अची. उई महसुस करे थ चीन जे उच्छा दीनक प्रेम हुनकर एटेक शक्ती दोडे लक, जे आब उ पुरा गामवक कष्ट हराईल माएक माद्यम बनी सकेच शती. इदनू भावलाके भीचक पूल बनत. आईक ता एहन द्रषे जदे उ बच्चक म्रित देखे गाहिल माएक वेदी लग रक्छ चती. उनक राक सनोर कहसे डाल चे, उ विख्षिप्त चती, मुदा उही शोग के भीज उनका इग़ेर अनबूती हो इच्चनी जे इच्छा दिनक मात्रत्व कोनो लोकिक सुख नहीं बलकी गाहिल माएक एक ता वर्दान चल जे उनके संसारक मोग सा मुक्त कर बाकले दिल्गे ल्चल बहुत सुन्दर उनका बुजहे दिया, जे इबच्छा उनका समाज कन नजर्ये में पुर्न बने बाक ले नाए, बलकी स्वयंक नजर्ये में पुर्न बने बाक ले आए ल्चल. मुदप्यर एक तब आद सोचु, इत अहिना भेल, जना कुनु बद्पाएक तूफानक, बादके शान्ती देखावसा पहीने, तूफानक तबाही के देखावसा परहेज कर लेजा. अगर दिख अगर दिख अगर दिख अगर दिख अगर दिख अगर दिख अगर दिख अगर दिख अगर दिख अगर दिख अगर दिख अगर दिख अगर दिख अगर दिख अगर दिख अगर दिख अगर दिख अगर दिख अगर दिख अगर दिख अगर दिख अगर दिख अ� अर प्रेरना डायक बनेवत, जगा हम तूफान के तबाही नहीं देखब, ता हम उही तबाही के भीच तादभेल गाज के मस्वुति कोन भुजब. आ, इतो ची. सहित की एक तम वूलभूट सिद्धान्त चे, जिक खेतार्सस, मने बहाव विरेचन, जखन पाथक पोरन रूपेड उही पीडा सगुज्रे चे मोती दाई के उही अठा शोख सगुज्रे देल जाए जाए सहूंकर विजे वास्तविक लाग़ बलकोल, जखन उही शोग के गेराए सवूथी का अंत में गाहिल माएक सेवीका बने चती तक्हन पार्ठक यी महसुस कर सकत चच्छे, कोनो रारल भेल इस्ट्रीक समज़ोता नहीं आची, बलकी एक ता एहन इस्ट्रीक महान विजेया ची, जी जीवन के सबसे बड़ा दुख के पार कच्छुकल आची. इजनकर आद्द्यात्मिक शक्ती चे, जए आई पीडा के नुकालेब, ता आई उकर पार पेलक जे अद्यात्मेक उचाएचे उक्रा से हो चोट कदेप. उंग, एक दम सही बात. तजवां सब दक माद्दियम सों कताक एही बहावनात्मक गेराए के दूरुस्त को लेल जाए, ता उक्रा बाद जे द्रिष् समगरी अची उक्रा से हो एही कताख सुर में सुर मिलावे पडद. कताद में प्रियोगत आमुर्त अच्यामितिये चित्र कला, मित्ला गोंक एगेर संसक्रितिक अबहावनात्मक कताद सं, शेलिगत रूपे मेल नहीं कहीता ची. वूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ� कताक मानविय संभेदना सों दूर कर देचे. जामित्य अकार सवबाव सोकतोर, बोद्धिक और आदोनिक होएचे. जकना हा त्रिभुज व्रित देखे ची, ताहाक मस्तिष्क आनलेतिकल मोड में चली जाएचे. आप अगरा दिकोड कर लगाई ता ची. बिल्कुल, मुदा एक दफा एक दम माटी संजोडलग, एक ता गामक सादारन विस्त्रीक पीडा, गोईत्हा गंद, कोदारेक पहार, माटी गूरी सब किच्छ जैवेक और इस परष्च्निया च्छ, आमोद चित्र, पात्ठ के भावना महसुस करबाक बदला, उक्रा दीको� इलेक्त्रूनिक सिंथे साईजर पर बजाएल जारा होगगगग एक्दम सती कुदारन तईही चित्र सबख शेली में किचु बदलाओ को रू जाही सा उ कत्ठाग लोगपत्व, माने फोक एलिमेंट, अ भावना के भेसी सजी वूरुप में प्रस्तुत को सकीए. चित्र के कताक च्चरम भावनात्मक श़ज्संग मिलाओ, अमुर्त अकार सा भावनाक ओना नहीं दहरी सकेता, जना एक ता मानवाक्रती वा पारमपरिक कला. यही कताग जे आत्मा ची उक्रा द्रिश्व रूप में उतारवाक लेल बहुत विष्ट्ता कावश्ष्टा आच्छे. आदारन् सो रूप जगन औरद सब ताना देट ची, तकन केवल आमुर्त रंबिरंगक आकारिक बदला, मोदी दाएक जूकल दे, आमातिक गुइताक अस्पष्ट चित्रन भासकईताज. जे भेसी प्रभाव्शाली लागत. आ, मन्दिर खनाइत काड, कोदारिक चोट, औमातिक उड़ाएत दूर के दिखावे वला, कोनो पारमपरिक मित्लाच्ट्रकलाक उप्योक कायल जासके चे जाही सो क्रोद अवेदना अस्पष्ट जल कै. मित्लाच्ट्रकलाक अपने एक्ता सम्रिध्ट्च्ट्रकलाः परमपरा चे जटै रेखा सब में लैहोए चे जे प्राक्रतिक और मान्विय भावना के बहुत नीक जका विक्त कराई चे जे मित्या अकार के बदला जा पारमपरे क्रेक्हा चित्रक उप्योक का याई जाए जटै एं मोतिदाएक आख्खिक भावस पष्ट होगे तो उपाट्ख के कताक आत्मा द्रीलो जाएत मुदा की इ आमुर्त कला जाएन भूजी का नहीं दिल गल अच्छे, जाईसा इ कता कोनो एक गाँक नहीं भूँक ग़, यूनिवर्सल वस सार्व भूमिक लागए. मने आहा कहब चे जे लेक्ख चाहत चाथ चती जे? अग, समबवतलेखक यी दिखावे चाहा चे ती, जे बाज पनक पीरा वा अद्यात्मिक खोज, किवल उजैनी गोंक मोती दाएक नहीं, बलकी सन्सार के कोनो भी इस्ट्रिक भहसके च्छे. तकी इ आदूनिक आमूर्त कला एक्रा उ सार्व भोमिक्ता नहीं दरहाल अचे, जाही सा पाथक एक्रा एक्ता सीमित इस्ठानिय लोग कता मात्र नहीं माने? बुजलम अग बात, मुदा देखू, सार्व भोमिक् बनेवा की चकर में, अपन अस्टानियता अब्वाँनात्मक ज़र से कती नहीं जाए, एह लेल कम से कम पात्रक भाओ भंगिमात अस्पष्ट हुबाक चाही. कला अस्टाइत्यक यी एक ता बहुत सुन्दर विरोदबास अची, जि कोनो भी कता सार भोमिक तकने बने च्याए, जखनो आपन इस्ठानियता मे पुरन रूपेन प्रामानिक मने अठेंतेख हूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ अगर महत अजविक रूप हूनाए जाही जे एक आख्यान मे अची. जगन आहा कोनो विष्छ्ट गामख, विष्छ्ट पीडा के सत्तिता के संग दिखावेद ची, तकने विष्व के कोनो आन कोना में बैसल पाधख, उकरा से अपन पीडा के जोड भाभेत अची. बिल्कुल आमुर्ती करन्थ से जुडाओ नहीं बलकी दूरी पैदा हो इच्छे. एक दम सही कहलो वहां. ते एही समपुरन चर्चा के समेटित लेक्खक लेल तींटा मुख्छे सुजाव अचे. पहल मंदिर कहनेथ कालक मोती दाइट क्रान्तिकारी कदम से पहले, उनकर रादिब हरेक मानसिक ध्वन्वके विस्तार दिया उही सन्नाताके कताक पन्नापर उतराए दिया हा, एप बहुत जरुरी आची दो सर, बच्चाक म्रित्य। अक्कलंक मिट्वाक सन्तोष दरिक मनो वेग्यानिक यात्रा में उगटा बहुनात्मक तह्राओ लाओ उनका येगो माएक रूप में उही शोग के महसुस करे दिया जाए से हुंकर अंतिम अद्यात्मिक शानती भेसी यतार्त्त लागे एक दम अटेसर अमुर्त चित्रांकन के कताक गज़ीर सांस्क्रतिक आमारमिक सुर के संग मिलाओ. इग कता बहुत शमतावान अचे आप प्राशब के आहाके एही रस्ना के संशोदित रूप में फेर सा पदवाख प्रतिक्चा रहत. आपन काज फेर सा रहमरा सब के लग पताओ अम सब एक रफेर सदेखब

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