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मोती_दाई__भक्ति_और_नियति.mp4
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- 0:00–0:10अपने कभी गव्र किया है? कुछ नाम महेंज शबद नहीं होते, उन में पूरे एक जिंदिगी, एक गेरा दर्द, और कभी ना तुटने वाली आस्था चिपी होती है.
- 0:10–0:12हमारी आजकी स्रोथ समगरी की एक पंगती देख्यें
- 0:13–0:16एक आजकी स्रोथ समगरी की एक पंगती देख्यें
- 0:17–0:18मोती दाई
- 0:18–0:21अब जाहर सी बात है, आपके मन में भी ये सवाल उट्रा होगा
- 0:21–0:23कि आखिर इस नाम मैं आजक या है
- 0:23–0:30अज़े अज़ी सी गेराई में उतरते हैं और इस असादारन कथा के हरेक पहलु को समजने की कोशिष करते हैं.
- 0:30–0:34मोती दाई की कथा बक्ती, दुक और नियती.
- 0:34–0:38मोदी दाई की कदा, बकती, दुख और नियती.
- 0:38–0:41आजके इस विष्लेशन में हम गजंद्र ताकुरजी की लिख्खी
- 0:41–0:44एक बेहद ही मार्मेक मेठिली कदापर चर्चा कर रहे हैं.
- 0:44–0:46ये कोई आम कहानी नहीं है.
- 0:46–0:49ये अनसान के दिल के सबसे गेरे कोनो जैसे
- 0:49–0:51हमारी भक्ती, हमारे दुक
- 0:51–0:54और इस नियती के अजीबो गरीप खेल का
- 0:54–0:56एक बहुत ही बारीएक विष्लेशन है.
- 0:56–0:58तो आए बिना किसी देरी के
- 0:58–1:00मोती दाए के जीवन के पन्ने पलडते हैं
- 1:00–1:01और देखते हैं,
- 1:01–1:04के बिल्कुल सादारन्सी लगने वाली स्त्री की कहानी
- 1:04–1:07हमें जिन्दगी के कितने बड़े सबक सिखा सकती है.
- 1:08–1:09हमारी एक अहानी शुग होती है,
- 1:09–1:12मित्फला के एक बहुत ही प्यारे से गाँसे,
- 1:12–1:12उजनी.
- 1:13–1:15और इस गाँँ का पुरा अद्ध्यात में केंद्र क्या है पता है.
- 1:16–1:17गाहिल माता का स्थान.
- 1:17–1:24सुचिये एक नीन का पेड है, उसके नीचे मिट्टी का एक बिलकुल सादारन साजशवूट्रा बना है, जिस पर थोड़ा सिंदूर लगावा है.
- 1:24–1:29बस अब गाहिल माता कोई बहुत उग्रोया क्रोदित होने वाली देवी नहीं मानी जाती.
- 1:29–1:32बलकी वो तो पहती कोमल पहती दयालू माता है.
- 1:32–1:36गाँ वालों का मानना है कि वहां से कभी कभी खाली हाथ नहीं लोडता.
- 1:36–1:41मतला भी ये चोटी सी जगा पूरे गाँँ के बहरोसे और आस्था का सबसे मस्वुत पिलर है.
- 1:41–1:44अब इस गाँ कर दान्चा फोड़ा समज लेते हैं.
- 1:44–1:47उजनी गाँ अलग-अलग बस्टियो में बटा हूँ आद.
- 1:47–1:50जैसे आहीरों की गली अलग, दोभीों की गली अलग,
- 1:50–1:53रव बस्टी का अपना एक तै काम था.
- 1:53–1:57यहादक्की नदी के किनारे भी सब के अलग अलग बटे हुए ते
- 1:57–2:01सब कुछ एक रूटीन में एक नियम से चल रहा था
- 2:01–2:04लेकिन इतनी दूर्यों और बट्वारे के बावजुद
- 2:04–2:07गाहिल माता का स्थान एक लोती असी जगद फी
- 2:07–2:10जहां आखर ये सब लोग एक हूँ जाते दे.
- 2:10–2:13सारे भेदबाव जैसे वही खतम हुँजाते दे.
- 2:13–2:15पर क्या सच्मे एसा था?
- 2:15–2:18माता की स्थान पर तो सब एक बराभर दिकते थे.
- 2:18–2:22लेकिन अगर सच्कहूँ तो ये महेजेग दिखावा था.
- 2:22–2:26उपर सिः सब शान्त पर अंदर की हकीकत कुछ और ही ती.
- 2:26–2:32गाँका समाज असल में बहुत ही कडे नियमो और लोगों के कथोर फैसलों से जक्डा हूँए ता.
- 2:32–2:37और इसी कडवी सच्चाई के भीच हमारी कहानी की मुख्या पात्र,
- 2:37–3:07अदर बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ �
- 3:07–3:16अद्मा का क्या? यही पर कहानी दिल्चस फोती है, उनकी अद्मा की शान्ती बस्ती ती सिर्फ और सिर्फ गाहिल माता की सेवा में.
- 3:16–3:23उनका ये सेवा बहाव इतना गेहरा इतना सच्चा था की पूरे गाउने उने कहास नाम दे दिया था.
- 3:23–3:26बगतिन, यानी सच्ची बखता.
- 3:26–3:28और पता है, मोती डाई के लिए,
- 3:28–3:32ये एक शवद किसी बड़े रास सिंगासन से भी कही बगगर था.
- 3:32–3:34वो अप सिर्फ एक दोबिन नहीं फी,
- 3:34–3:37वो माता की सबसे लाडली सेवादार थी.
- 3:37–3:41अर उनकी ये भक्ती स्र्फ मन के अंदर तक सीमित नहीं ती
- 3:41–3:45ये उनके हर रोज के कामो में साप दिखाए देती थी
- 3:45–3:47सुबे सुबे माता के स्थान पर ज़ादू लगाना
- 3:47–3:50उस मिट्टी के चबूत्रे पर तासा लेप लगाना
- 3:50–3:52भोर कषब से बहला दिया जलाना
- 3:52–3:55अप्र दोप पूल अख्षच चडशाना
- 3:55–3:59यह सब कुछ मोती दाए के जीवन का एसा हिससा था, चुग कभी नहीं चोटता था.
- 3:59–4:04सच कहो तो उनके हातो से ही, हर सुभे माता का वो दरबार सचता था.
- 4:04–4:10लिकिन इतनी गेहरी भकती, और हमेशा शांत दिखने वाले उस चहरे के पीछे,
- 4:10–4:14इक बहुत बडा, बहुती गेरा दर्द चिपा था.
- 4:14–4:19शादी को कई साल भी चुके ते, पर उनकी गोड अब तक सूनी ती.
- 4:19–4:23अब, मोती दाई ने अपना ये दर्द कभी किसी से साजा नहीं किया.
- 4:23–4:25वैसे भी वो किस से कहती.
- 4:25–4:29उनो ने बस यही मान लिया कि उनकी माता सब देख रही है,
- 4:29–4:33और वो चुप चाःप रही रोज अपने दिये की बाती टीक करती रही.
- 4:33–4:37पर उजनी गाँउका समाज वो इतना दयालू नहीं ता.
- 4:37–4:41स्रोथ समगरी में एक बहुड़ी चुभने वाली बात लिख है.
- 4:41–4:44किसी दूस्री औरत की सूनी गोद का हिसाब रखना.
- 4:44–4:48जी हा, गाँकी औरतें उनकी पीट पीचे यही सब बाते करती थी.
- 4:48–4:54उस समें के समाज में बिना बच्छे के होना किसी बड़े कलंक से कम नहीं माना जाता था.
- 4:54–4:56लोग उने बाँईच कैकर बुलाते थे.
- 4:56–5:03अगे एक आँसा शब्द था एक आसा दर्द था जो रडिन उने अंदर यंदर चलनी करता रहता था.
- 5:03–5:09इतने ताने इतनी कठोर समाजिक प्रताडना फिर भी मोटी दाएने कभी पलटकर कोई शिकायत नहीं की.
- 5:09–5:13उनका वो जो अटोट विश्वास ताना बस वही उनका एक लोट्टा सहारा था
- 5:13–5:19उने पुरा यकीन ता कि दून्या चाहे उने जोबी कहे उनकी देवी उनकी खामोची को सून सकते हैं
- 5:19–5:24और इसी बजज़ से गाहिल माता कि उस चट्टे से दरबार में ही उने अपना अस्ली सुकून मिलता था.
- 5:24–5:30और फिर नियती ने एक एसा अख्कल्पनिया मूल लिया जिस ने सब कुछ बडल दिया.
- 5:30–5:33चै ये सर्फेख नमवर नहीं है.
- 5:33–5:39ये इस पूरी कत्हा का सबसे मार्मिक, सबसे ज़ादा दिल चीर देने वाल अक्ष्चन है.
- 5:39–5:45इतने सालों की प्रार्ठनाउ के बाद, अखिरकार मोटीदाय की गोध बर गए उने एक संटान की प्राप्तिव है.
- 5:45–6:15अब गाँँँ की नजरो मे देखें, नियेती के स्क्रूर मजाक ने, दरसल मोटीदाई की पहचान को हमेशा-हमेशा के ले बडल दिया, अब वो बाँज मोटीदाई नहीं रहे गगे थी, अब वो एक अईसी माथ थी, अब आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप �
- 6:15–6:45तो तो बज़ाई तो बज़ाई तो तो तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ा
- 6:45–6:47गाहिल माता के इस्थान पर लोडी,
- 6:47–6:50लेकिन इस भार वो स्व्व दिया जलाने नहीं आई आई आई आई दी.
- 6:50–6:52अब उनोने गाहिल माता के बाव को,
- 6:52–6:55खुदके भीटर दारन करना शुरू कर दिया था.
- 6:55–6:57जब देवी उनके शरीर में प्रवेश कर दी,
- 6:57–7:02तो वो एक सादारन सी भक्ता से बबलकर एक बेहत शक्ती शाली अद्यात में भाद्ध्धिम बन जाती ती.
- 7:03–7:06अपनी इस नई अवस्था में मोती डाई ने क्या किया?
- 7:06–7:09उनो आप उसी गाउके लोगो का दूक तूर करना शूरू कर दिया.
- 7:09–7:12जिन लोगोंने कभी उने तने दीए थे,
- 7:12–7:15गाउके जिनने भी भीमार, जिनने भी पीरटित लोग थे,
- 7:15–7:19सब उनके पास आने लगे, और देवी की क्रुपासे वो तीक भी होने लगे.
- 7:19–7:21ये कितनी अजीब और खुबसुरत बातेना,
- 7:21–7:23कि उनका अपना वो गेरा दूक,
- 7:23–7:26इक आजी चमतकार एक शकती में बडल गया
- 7:26–7:29जिसने पूरे समवुदाय को तीक करने का काम किया
- 7:29–7:32तो आखिर कार हम इस कत्हा के मुल सन्देश पर पहुचते है
- 7:32–7:36बात दरसल यह है कि जो चीस नियती हम से चीन लेती है
- 7:36–7:40सچ्छी भक्ती अकसर हमें वो किसी और ही रूप में लवता देती है.
- 7:40–7:43मोती दाई का वो चे दिन का बेटा तो चला गया,
- 7:43–7:47लेकिन उस माग का नाम इतिहास में हमेशा के लिये आमर हो गया.
- 7:47–7:52आज भी उजनी गाँ की बूरी अद्टें किसी की सूनी गोद का दुख समजाने किलिए
- 7:52–7:54मोटी दाए की ही कहानी सूनाती है.
- 7:54–7:59इस पूरे सफर के बाद अब आप आप आप बहुती गेरे सवाल के साथ कटे हैं.
- 7:59–8:03अज ख़ाई के निज़क सफर को हम यही विराम देखें.
- 8:03–8:06इस कता के मर्म पर एक बार विचार ज़ोर कीजेगा.
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अपने कभी गव्र किया है? कुछ नाम महेंज शबद नहीं होते, उन में पूरे एक जिंदिगी, एक गेरा दर्द, और कभी ना तुटने वाली आस्था चिपी होती है. हमारी आजकी स्रोथ समगरी की एक पंगती देख्यें एक आजकी स्रोथ समगरी की एक पंगती देख्यें मोती दाई अब जाहर सी बात है, आपके मन में भी ये सवाल उट्रा होगा कि आखिर इस नाम मैं आजक या है अज़े अज़ी सी गेराई में उतरते हैं और इस असादारन कथा के हरेक पहलु को समजने की कोशिष करते हैं. मोती दाई की कथा बक्ती, दुक और नियती. मोदी दाई की कदा, बकती, दुख और नियती. आजके इस विष्लेशन में हम गजंद्र ताकुरजी की लिख्खी एक बेहद ही मार्मेक मेठिली कदापर चर्चा कर रहे हैं. ये कोई आम कहानी नहीं है. ये अनसान के दिल के सबसे गेरे कोनो जैसे हमारी भक्ती, हमारे दुक और इस नियती के अजीबो गरीप खेल का एक बहुत ही बारीएक विष्लेशन है. तो आए बिना किसी देरी के मोती दाए के जीवन के पन्ने पलडते हैं और देखते हैं, के बिल्कुल सादारन्सी लगने वाली स्त्री की कहानी हमें जिन्दगी के कितने बड़े सबक सिखा सकती है. हमारी एक अहानी शुग होती है, मित्फला के एक बहुत ही प्यारे से गाँसे, उजनी. और इस गाँँ का पुरा अद्ध्यात में केंद्र क्या है पता है. गाहिल माता का स्थान. सुचिये एक नीन का पेड है, उसके नीचे मिट्टी का एक बिलकुल सादारन साजशवूट्रा बना है, जिस पर थोड़ा सिंदूर लगावा है. बस अब गाहिल माता कोई बहुत उग्रोया क्रोदित होने वाली देवी नहीं मानी जाती. बलकी वो तो पहती कोमल पहती दयालू माता है. गाँ वालों का मानना है कि वहां से कभी कभी खाली हाथ नहीं लोडता. मतला भी ये चोटी सी जगा पूरे गाँँ के बहरोसे और आस्था का सबसे मस्वुत पिलर है. अब इस गाँ कर दान्चा फोड़ा समज लेते हैं. उजनी गाँ अलग-अलग बस्टियो में बटा हूँ आद. जैसे आहीरों की गली अलग, दोभीों की गली अलग, रव बस्टी का अपना एक तै काम था. यहादक्की नदी के किनारे भी सब के अलग अलग बटे हुए ते सब कुछ एक रूटीन में एक नियम से चल रहा था लेकिन इतनी दूर्यों और बट्वारे के बावजुद गाहिल माता का स्थान एक लोती असी जगद फी जहां आखर ये सब लोग एक हूँ जाते दे. सारे भेदबाव जैसे वही खतम हुँजाते दे. पर क्या सच्मे एसा था? माता की स्थान पर तो सब एक बराभर दिकते थे. लेकिन अगर सच्कहूँ तो ये महेजेग दिखावा था. उपर सिः सब शान्त पर अंदर की हकीकत कुछ और ही ती. गाँका समाज असल में बहुत ही कडे नियमो और लोगों के कथोर फैसलों से जक्डा हूँए ता. और इसी कडवी सच्चाई के भीच हमारी कहानी की मुख्या पात्र, अदर बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ बाद़ � अद्मा का क्या? यही पर कहानी दिल्चस फोती है, उनकी अद्मा की शान्ती बस्ती ती सिर्फ और सिर्फ गाहिल माता की सेवा में. उनका ये सेवा बहाव इतना गेहरा इतना सच्चा था की पूरे गाउने उने कहास नाम दे दिया था. बगतिन, यानी सच्ची बखता. और पता है, मोती डाई के लिए, ये एक शवद किसी बड़े रास सिंगासन से भी कही बगगर था. वो अप सिर्फ एक दोबिन नहीं फी, वो माता की सबसे लाडली सेवादार थी. अर उनकी ये भक्ती स्र्फ मन के अंदर तक सीमित नहीं ती ये उनके हर रोज के कामो में साप दिखाए देती थी सुबे सुबे माता के स्थान पर ज़ादू लगाना उस मिट्टी के चबूत्रे पर तासा लेप लगाना भोर कषब से बहला दिया जलाना अप्र दोप पूल अख्षच चडशाना यह सब कुछ मोती दाए के जीवन का एसा हिससा था, चुग कभी नहीं चोटता था. सच कहो तो उनके हातो से ही, हर सुभे माता का वो दरबार सचता था. लिकिन इतनी गेहरी भकती, और हमेशा शांत दिखने वाले उस चहरे के पीछे, इक बहुत बडा, बहुती गेरा दर्द चिपा था. शादी को कई साल भी चुके ते, पर उनकी गोड अब तक सूनी ती. अब, मोती दाई ने अपना ये दर्द कभी किसी से साजा नहीं किया. वैसे भी वो किस से कहती. उनो ने बस यही मान लिया कि उनकी माता सब देख रही है, और वो चुप चाःप रही रोज अपने दिये की बाती टीक करती रही. पर उजनी गाँउका समाज वो इतना दयालू नहीं ता. स्रोथ समगरी में एक बहुड़ी चुभने वाली बात लिख है. किसी दूस्री औरत की सूनी गोद का हिसाब रखना. जी हा, गाँकी औरतें उनकी पीट पीचे यही सब बाते करती थी. उस समें के समाज में बिना बच्छे के होना किसी बड़े कलंक से कम नहीं माना जाता था. लोग उने बाँईच कैकर बुलाते थे. अगे एक आँसा शब्द था एक आसा दर्द था जो रडिन उने अंदर यंदर चलनी करता रहता था. इतने ताने इतनी कठोर समाजिक प्रताडना फिर भी मोटी दाएने कभी पलटकर कोई शिकायत नहीं की. उनका वो जो अटोट विश्वास ताना बस वही उनका एक लोट्टा सहारा था उने पुरा यकीन ता कि दून्या चाहे उने जोबी कहे उनकी देवी उनकी खामोची को सून सकते हैं और इसी बजज़ से गाहिल माता कि उस चट्टे से दरबार में ही उने अपना अस्ली सुकून मिलता था. और फिर नियती ने एक एसा अख्कल्पनिया मूल लिया जिस ने सब कुछ बडल दिया. चै ये सर्फेख नमवर नहीं है. ये इस पूरी कत्हा का सबसे मार्मिक, सबसे ज़ादा दिल चीर देने वाल अक्ष्चन है. इतने सालों की प्रार्ठनाउ के बाद, अखिरकार मोटीदाय की गोध बर गए उने एक संटान की प्राप्तिव है. अब गाँँँ की नजरो मे देखें, नियेती के स्क्रूर मजाक ने, दरसल मोटीदाई की पहचान को हमेशा-हमेशा के ले बडल दिया, अब वो बाँज मोटीदाई नहीं रहे गगे थी, अब वो एक अईसी माथ थी, अब आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप � तो तो बज़ाई तो बज़ाई तो तो तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ा गाहिल माता के इस्थान पर लोडी, लेकिन इस भार वो स्व्व दिया जलाने नहीं आई आई आई आई दी. अब उनोने गाहिल माता के बाव को, खुदके भीटर दारन करना शुरू कर दिया था. जब देवी उनके शरीर में प्रवेश कर दी, तो वो एक सादारन सी भक्ता से बबलकर एक बेहत शक्ती शाली अद्यात में भाद्ध्धिम बन जाती ती. अपनी इस नई अवस्था में मोती डाई ने क्या किया? उनो आप उसी गाउके लोगो का दूक तूर करना शूरू कर दिया. जिन लोगोंने कभी उने तने दीए थे, गाउके जिनने भी भीमार, जिनने भी पीरटित लोग थे, सब उनके पास आने लगे, और देवी की क्रुपासे वो तीक भी होने लगे. ये कितनी अजीब और खुबसुरत बातेना, कि उनका अपना वो गेरा दूक, इक आजी चमतकार एक शकती में बडल गया जिसने पूरे समवुदाय को तीक करने का काम किया तो आखिर कार हम इस कत्हा के मुल सन्देश पर पहुचते है बात दरसल यह है कि जो चीस नियती हम से चीन लेती है सچ्छी भक्ती अकसर हमें वो किसी और ही रूप में लवता देती है. मोती दाई का वो चे दिन का बेटा तो चला गया, लेकिन उस माग का नाम इतिहास में हमेशा के लिये आमर हो गया. आज भी उजनी गाँ की बूरी अद्टें किसी की सूनी गोद का दुख समजाने किलिए मोटी दाए की ही कहानी सूनाती है. इस पूरे सफर के बाद अब आप आप आप बहुती गेरे सवाल के साथ कटे हैं. अज ख़ाई के निज़क सफर को हम यही विराम देखें. इस कता के मर्म पर एक बार विचार ज़ोर कीजेगा.