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मैथिली-अंग्रेज़ी_थिसॉरस.mp4

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Part 7 · VIDEHA MITHILA MAITHILI DISCUSSION CRITICISM SERIES PART 7
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  1. 0:00–0:10तु चलिए इस इस इक्स्पलेनर में सीदे मुद्दे पर आते हैं और देखते हैं कि कैसे एक अकेला शब्द्खोष, यानी थिसवरस, किसी पुरी सबभिता की आत्मा को उजागर कर सकता है.
  2. 0:10–0:14आज हम गजेंदर ताकुर दवारा संकलिट मैठिली इंगलिष् त्फ्शोरस पर चचचा करेंगे.
  3. 0:14–0:16ख़र ये सर्फ एक मोटी सी किताब नहीं है,
  4. 0:16–0:20ये समजने की एक खिलकी है, की एक समाज कैसे जीता है,
  5. 0:20–0:23कैसे सुचता है, और उसकी परमपर आई क्या है.
  6. 0:23–0:34यहां जो सब से चोकाने बात हैं वह एस दिखषनरी का अकार एक ही वलुम में एक लाग, पन्ताली सचार, एक सोचवाली सेंट्रीस. ये अक्डा सच में हेरान कर देने वाला है.
  7. 0:34–0:42ये कुई आम कलेक्ष्यन नहीं है, ये दश्कों की अटूट महनत अर किसी बाशा के प्रती एक बेहत गेरे समरपन का जीता जागता प्रुमान है.
  8. 0:42–0:47इस बाशा की गेराई और सगंता को हम इस तरहां समथ सकते हैं.
  9. 0:47–0:50वडनमाला का सर्फ पहला अक्षर ले लिजे.
  10. 0:50–0:51अँ.
  11. 0:51–0:52सर्फ अज़ से शुरू हूने वाली,
  12. 0:52–0:55दस हजार से जाडा रग रग गलग ठीज हैं हैं हैं.
  13. 0:56–0:59आग के लिए 3,000 और एग के लिए लगबबग 600.
  14. 1:00–1:00जर अज़ सुचिए,
  15. 1:00–1:03सर्फ एक अखषर मेही इतनी विविद्ध्था.
  16. 1:03–1:04ये बताता है,
  17. 1:04–1:08कि मैत्ली बाशा का शब्द बंदार कितना विशाल और सम्रिद है.
  18. 1:08–1:13जब हम विदे हे गिट हब प्रोजेक्त से लीगए इस श्रोथ समगरी पर नज़ डालते है,
  19. 1:13–1:18तो उस बारी महनत का तुरन्त अह्साज जाता है, जो इसके पीचे लगी है.
  20. 1:18–1:22मैत्ली लिपी के तीग बगल में उसकी अंग्रेजी परिबाशा है
  21. 1:22–1:25और समनारती शब्डों को जिस बारीकी से दरज किया गया है
  22. 1:25–1:27वो कमाल का है
  23. 1:27–1:29इसकी जटिल्ता अपने आप में एक मिसाल है
  24. 1:29–1:33कि इन शब्डों कितने वेवस्त्तिडध्धंग से सनजोया गया है
  25. 1:33–1:40चली ए अब आते हैं इस चर्चा के पहले मुख्य विषे पर दे लंगवज अव दे लन्द यानी माटी की बाशा
  26. 1:40–1:46यहां से हम देख पाएंगे की मैठिली लोगों और केती किसानी के बीच कितना अटूट समबंद है
  27. 1:46–1:52जब हम किसी क्रिषी अदारेत समाज की बात करते हैं, तो एक बड़ा दिल्चस्प सवाल उड़ता है.
  28. 1:52–1:58खेती की रोसमर्रा की जिन्दगी वहा भोली जाने बाशा को आखिर कितनी गेराइ से अकार देती है.
  29. 1:58–2:02अगर आगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर
  30. 2:02–2:05अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर
  31. 2:05–2:09अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर
  32. 2:09–2:13अगर गन्ने के उस उप्री हिस्फें को कहते हैं जिसे बीज के ले काटा जाता हैं.
  33. 2:13–2:16अगृरेल वो गन्ना हैं जिस में अभी अग्व्षुटा हो.
  34. 2:16–2:20और अग्वार का मत्लब है माग महीने में होने वाली गन्ने की पहली खुदाई.
  35. 2:20–2:23माग महीने में होने वाली गन्ने की पहली कुदाई.
  36. 2:23–2:26फस्लो के विकास के हर चोटे से चोटे चरन के लिए
  37. 2:26–2:28इनके पास एक बिलकु स्पेज़िक शब्द है.
  38. 2:28–2:31इसी तरहा एक बडा अनोका शब्द है
  39. 2:31–2:34अनित ये शब्द केट में जगा
  40. 2:34–2:36और श्रमिकों के काम के बारे में
  41. 2:50–2:53मिट्ती दोते वक्त कुदाल चलाने वाले के पास रहता है.
  42. 2:53–2:55अंगरेजी में से समजजाने के लिए
  43. 2:55–2:57पूरा एक लंभा वागके चहीए.
  44. 2:57–2:59पर मेठली में बस एक शब्द.
  45. 2:59–3:02और अंगारिया शब्द को तो बिलकुल मिस नहीं कर सकते.
  46. 3:02–3:04ये अपने अपने पूरे समाजिक
  47. 3:04–3:09समाजिक और आर्टिक लिन्देन को एक छोटे सी शब्द में कैट कर लेता है.
  48. 3:09–3:13इसकार्द उस मस्दूर से है, जो केट के मालिक का हल तीन दिन तक चलाता है,
  49. 3:13–3:18ताकी बदले में उसे एक दिन वही हल अपने केट में चलाने को मिल सके.
  50. 3:18–3:23बाशा किस खुबसुर्ती से समाजिक वेवस्था को दर्षाती है, ये इसका बहतरीन प्रमान है.
  51. 3:24–3:30केतों के इस कठिन दुन्या से निकल कर चलिये अप पारंपरिक गरों, आंगन और चूलहे के तरव चलते हैं.
  52. 3:30–3:33यहां के उपकरनो की शब्दाबली भी उतनी हैर दंगेज है.
  53. 3:33–3:38एक सादारन्द से हुक को कितनी तरीको से दिसक्रएब किया जा सकता है.
  54. 3:38–3:40आम तोर पे हम इसे बस हुक ही कैंगेना,
  55. 3:40–3:44लेकिन ये थिसवरस दिकाता है कि एक आम से अजार के लिए भी
  56. 3:44–3:47बाशा में कितनी अदबुत विषिष्टता
  57. 3:47–3:50यानी स्पेश्टलाइशेशन मोजुद हो सकती है.
  58. 3:50–3:52मैठली में अलग �alag kaamoh ke hisaap se,
  59. 3:52–3:54हुक के लिए �alag alag,
  60. 3:54–3:56बेहत सतीक शबद हैं.
  61. 3:56–3:59अंकुड कोला कुरेदने वाले लोहे के आकूश
  62. 3:59–4:02वाश्वों को दागने वाले आखुस को कहते है,
  63. 4:02–4:07यहादक के दर्वाजे जोडने वाले विषेश हुख को भी अंकुर ही कहाजाता है.
  64. 4:07–4:14वही अंकुस का इस्तमाल, ताडी के बहरे या खाली बर्टनो को आसानी से उठाने वाले हुख के लिये होता है.
  65. 4:14–4:17बाशा की आईसी सटिक्ता वाखई काभिले तारीफ है.
  66. 4:17–4:20चूलहा किसी भी परमपारिग गर का दिल होता है.
  67. 4:20–4:22और ये देखना सच्मे दिल्चस्प है,
  68. 4:22–4:25की आग के अंगारो से ज़ए हर एक काम किलिए
  69. 4:25–4:27एक समरपित शब्द मोईजुद है.
  70. 4:27–4:38अंगार कुन्दन, यानी आमबर रेक, अंगार चम्ता, यानी आमबर तोंगs, अंगार जाडन का अर्थ है, आमबर ब्रष्छ, और अंगार दान का मतलब अंगारे रखने का बर्टन.
  71. 4:38–4:40रहे एक चोटी चीस पर कितना दियान दिया गया है?
  72. 4:40–4:45जब हम इं सबी शब्दों को एक साज स्रोट समगरी के एक ही पनने पर देकते है,
  73. 4:45–4:49तो यह भिलकुल सपष्ट हो जाता है, कि एक खेसारस, दरसल देनेक जीवन,
  74. 4:49–4:52और गरेलु कामो का एक भाशाई नक्षा होता है.
  75. 4:52–4:58यहां दर्ज रहे के अंट्री अपने आप में एक सबबहता के जीने के तरीके की कहानी बयां करती है.
  76. 4:58–5:04अब हम थोडा और गज्राए में जाएंगे, और इस रोस मर्रा की विष्च्ट शब्दावली पर एक नजर डालेंगे.
  77. 5:04–5:09ये आज्ट्टी शब्द हैं जो आम चीजों के कल्ट्ट्रल दीने को पुरी तरहा से सामने लाकर रग देते हैं.
  78. 5:09–5:14जहां अंग्रेजी या कही अन्ये बहाशाव में प्रक्रती की बारी कीँं को समजाने के लिए
  79. 5:14–5:18अखसर लंभे-लंबे अज्जक्टिवस को एक साथ जोडना परता है,
  80. 5:18–5:20वही मैठली भाशा प्रक्तिकली तेलर्ट,
  81. 5:20–5:22अकेले शब्डों का इस्तिमाल करती है.
  82. 5:22–5:24ये सीधे तोर पर दिखाता है,
  83. 5:24–5:26कि इन लोगों का अपने आस्पास के महाल
  84. 5:26–5:29अद्या पदार्तो से कैसा अटूट और गेरा रिष्था रहा होगा.
  85. 5:29–5:32ये जो सतीग केटलोगिं यहां देखने को मिलती है,
  86. 5:32–5:35वो एक अधवूथ वनस्पाते ग्यान को दिखाती है.
  87. 5:35–5:38किसी भीज के अंकुरित होने बिन्दू से लेकर,
  88. 5:38–5:40किसी प्ड़के अंदर की सतीक बनावड़ तक,
  89. 5:40–5:43हर एक चीस को कितनी बारीकी से दरज किया गया है.
  90. 5:43–5:48आपने आपने ज़ेसे किसी बाशा विग्यानी और किसान ने मिलकर इसे लिखा हो.
  91. 5:48–5:52अब भीजों के इस ग्रनूलरेटी यानी बारीकी को ही ले ले लिगीई.
  92. 5:52–5:56दिल्च्छ बात यह कि यह आप पलों को सर्फ उनके ताइप से नहीं
  93. 5:56–5:59बलकि उन में परिशान करने बीजों के आकार
  94. 5:59–6:01या मात्रा के आदार पर भी पचाना जाता है.
  95. 6:01–6:04अन्तिया कर, यानी बीज वाला केला,
  96. 6:04–6:07अन्तिया लीची, यानी बड़े भीज वाली लीची,
  97. 6:07–6:10और अंत्या बल, जिस में गुदे से जाडा भीज भरे हों.
  98. 6:10–6:14बाशा सीदे तोर पर एक अन्सान के स्वाद और अनुबहव को बयाग कर रहे है.
  99. 6:14–6:19और ये देफनिशन पडते ही तो सच में चहरे पर मुस्कान आजाती है.
  100. 6:19–6:23अन्ति अमर्त, इसका इस्तमाल विशेश रुब से उस आम किलिए होता है,
  101. 6:23–6:26तो सर्फ अपनी गुट्ली के तीक आस पास कथा होता है.
  102. 6:26–6:31ज़र अच आम काते वक्त होने वाली एक चोटी सी निराशा को पकडने किलिए,
  103. 6:31–6:35इंके पास पुरा एक शब्द है, ये भाशा को भेहत जीवन्त बनाता है.
  104. 6:35–6:38तो अब हम इस एक्स्प्लेश्ट्टर के अंथ की तरव बड़ रहे हैं.
  105. 6:38–6:40एक कल्च्रल ताईम काईश्यूल.
  106. 6:40–6:43इन सभी अदबुध शब्डोपर चर्चा करने के बाद
  107. 6:43–6:46अब ये बिल्कुल साफ होटा है कि गजजेंद्र ताखूर ने
  108. 6:46–7:16तब आद बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद�
  109. 7:16–7:18अग, शच में कमाल की बात बताव।
  110. 7:18–7:21गिटब जैसे बिलकुल मोडन और टेकनिकल प्लट्फाम पर
  111. 7:21–7:23प्राचीन क्रिषी शब्दावली की ए मुजुदगी,
  112. 7:23–7:27विदेहा प्रोजेक का ये प्रैयास एकदम प्रफेक्ट्टी एलट्ट्ट्टाः है,
  113. 7:27–7:30कि दिजिटल युग में इस प्रचुर सान्सक्रितिक द्डवोर को
  114. 7:30–7:33जिन्दा रखना कितना ज़रूरी अर असर्दार है.
  115. 7:33–7:36पूराने ग्यान और नहीं टेकनूलगी का सबसे बहतरीन संगम है
  116. 7:36–7:38इस चर्चा को खत्म करते हुए
  117. 7:38–7:40एक विचार जरूर मन में आता है
  118. 7:40–7:44के हमारी देनिक भोल्चाल के इन आम से शब्डों के पीचे
  119. 7:44–7:47आखर कितना इतिखास खमोषी से सांस लेडा होता है
  120. 7:47–7:59वाँद्र बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बा�

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तु चलिए इस इस इक्स्पलेनर में सीदे मुद्दे पर आते हैं और देखते हैं कि कैसे एक अकेला शब्द्खोष, यानी थिसवरस, किसी पुरी सबभिता की आत्मा को उजागर कर सकता है. आज हम गजेंदर ताकुर दवारा संकलिट मैठिली इंगलिष् त्फ्शोरस पर चचचा करेंगे. ख़र ये सर्फ एक मोटी सी किताब नहीं है, ये समजने की एक खिलकी है, की एक समाज कैसे जीता है, कैसे सुचता है, और उसकी परमपर आई क्या है. यहां जो सब से चोकाने बात हैं वह एस दिखषनरी का अकार एक ही वलुम में एक लाग, पन्ताली सचार, एक सोचवाली सेंट्रीस. ये अक्डा सच में हेरान कर देने वाला है. ये कुई आम कलेक्ष्यन नहीं है, ये दश्कों की अटूट महनत अर किसी बाशा के प्रती एक बेहत गेरे समरपन का जीता जागता प्रुमान है. इस बाशा की गेराई और सगंता को हम इस तरहां समथ सकते हैं. वडनमाला का सर्फ पहला अक्षर ले लिजे. अँ. सर्फ अज़ से शुरू हूने वाली, दस हजार से जाडा रग रग गलग ठीज हैं हैं हैं. आग के लिए 3,000 और एग के लिए लगबबग 600. जर अज़ सुचिए, सर्फ एक अखषर मेही इतनी विविद्ध्था. ये बताता है, कि मैत्ली बाशा का शब्द बंदार कितना विशाल और सम्रिद है. जब हम विदे हे गिट हब प्रोजेक्त से लीगए इस श्रोथ समगरी पर नज़ डालते है, तो उस बारी महनत का तुरन्त अह्साज जाता है, जो इसके पीचे लगी है. मैत्ली लिपी के तीग बगल में उसकी अंग्रेजी परिबाशा है और समनारती शब्डों को जिस बारीकी से दरज किया गया है वो कमाल का है इसकी जटिल्ता अपने आप में एक मिसाल है कि इन शब्डों कितने वेवस्त्तिडध्धंग से सनजोया गया है चली ए अब आते हैं इस चर्चा के पहले मुख्य विषे पर दे लंगवज अव दे लन्द यानी माटी की बाशा यहां से हम देख पाएंगे की मैठिली लोगों और केती किसानी के बीच कितना अटूट समबंद है जब हम किसी क्रिषी अदारेत समाज की बात करते हैं, तो एक बड़ा दिल्चस्प सवाल उड़ता है. खेती की रोसमर्रा की जिन्दगी वहा भोली जाने बाशा को आखिर कितनी गेराइ से अकार देती है. अगर आगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर गन्ने के उस उप्री हिस्फें को कहते हैं जिसे बीज के ले काटा जाता हैं. अगृरेल वो गन्ना हैं जिस में अभी अग्व्षुटा हो. और अग्वार का मत्लब है माग महीने में होने वाली गन्ने की पहली खुदाई. माग महीने में होने वाली गन्ने की पहली कुदाई. फस्लो के विकास के हर चोटे से चोटे चरन के लिए इनके पास एक बिलकु स्पेज़िक शब्द है. इसी तरहा एक बडा अनोका शब्द है अनित ये शब्द केट में जगा और श्रमिकों के काम के बारे में मिट्ती दोते वक्त कुदाल चलाने वाले के पास रहता है. अंगरेजी में से समजजाने के लिए पूरा एक लंभा वागके चहीए. पर मेठली में बस एक शब्द. और अंगारिया शब्द को तो बिलकुल मिस नहीं कर सकते. ये अपने अपने पूरे समाजिक समाजिक और आर्टिक लिन्देन को एक छोटे सी शब्द में कैट कर लेता है. इसकार्द उस मस्दूर से है, जो केट के मालिक का हल तीन दिन तक चलाता है, ताकी बदले में उसे एक दिन वही हल अपने केट में चलाने को मिल सके. बाशा किस खुबसुर्ती से समाजिक वेवस्था को दर्षाती है, ये इसका बहतरीन प्रमान है. केतों के इस कठिन दुन्या से निकल कर चलिये अप पारंपरिक गरों, आंगन और चूलहे के तरव चलते हैं. यहां के उपकरनो की शब्दाबली भी उतनी हैर दंगेज है. एक सादारन्द से हुक को कितनी तरीको से दिसक्रएब किया जा सकता है. आम तोर पे हम इसे बस हुक ही कैंगेना, लेकिन ये थिसवरस दिकाता है कि एक आम से अजार के लिए भी बाशा में कितनी अदबुत विषिष्टता यानी स्पेश्टलाइशेशन मोजुद हो सकती है. मैठली में अलग �alag kaamoh ke hisaap se, हुक के लिए �alag alag, बेहत सतीक शबद हैं. अंकुड कोला कुरेदने वाले लोहे के आकूश वाश्वों को दागने वाले आखुस को कहते है, यहादक के दर्वाजे जोडने वाले विषेश हुख को भी अंकुर ही कहाजाता है. वही अंकुस का इस्तमाल, ताडी के बहरे या खाली बर्टनो को आसानी से उठाने वाले हुख के लिये होता है. बाशा की आईसी सटिक्ता वाखई काभिले तारीफ है. चूलहा किसी भी परमपारिग गर का दिल होता है. और ये देखना सच्मे दिल्चस्प है, की आग के अंगारो से ज़ए हर एक काम किलिए एक समरपित शब्द मोईजुद है. अंगार कुन्दन, यानी आमबर रेक, अंगार चम्ता, यानी आमबर तोंगs, अंगार जाडन का अर्थ है, आमबर ब्रष्छ, और अंगार दान का मतलब अंगारे रखने का बर्टन. रहे एक चोटी चीस पर कितना दियान दिया गया है? जब हम इं सबी शब्दों को एक साज स्रोट समगरी के एक ही पनने पर देकते है, तो यह भिलकुल सपष्ट हो जाता है, कि एक खेसारस, दरसल देनेक जीवन, और गरेलु कामो का एक भाशाई नक्षा होता है. यहां दर्ज रहे के अंट्री अपने आप में एक सबबहता के जीने के तरीके की कहानी बयां करती है. अब हम थोडा और गज्राए में जाएंगे, और इस रोस मर्रा की विष्च्ट शब्दावली पर एक नजर डालेंगे. ये आज्ट्टी शब्द हैं जो आम चीजों के कल्ट्ट्रल दीने को पुरी तरहा से सामने लाकर रग देते हैं. जहां अंग्रेजी या कही अन्ये बहाशाव में प्रक्रती की बारी कीँं को समजाने के लिए अखसर लंभे-लंबे अज्जक्टिवस को एक साथ जोडना परता है, वही मैठली भाशा प्रक्तिकली तेलर्ट, अकेले शब्डों का इस्तिमाल करती है. ये सीधे तोर पर दिखाता है, कि इन लोगों का अपने आस्पास के महाल अद्या पदार्तो से कैसा अटूट और गेरा रिष्था रहा होगा. ये जो सतीग केटलोगिं यहां देखने को मिलती है, वो एक अधवूथ वनस्पाते ग्यान को दिखाती है. किसी भीज के अंकुरित होने बिन्दू से लेकर, किसी प्ड़के अंदर की सतीक बनावड़ तक, हर एक चीस को कितनी बारीकी से दरज किया गया है. आपने आपने ज़ेसे किसी बाशा विग्यानी और किसान ने मिलकर इसे लिखा हो. अब भीजों के इस ग्रनूलरेटी यानी बारीकी को ही ले ले लिगीई. दिल्च्छ बात यह कि यह आप पलों को सर्फ उनके ताइप से नहीं बलकि उन में परिशान करने बीजों के आकार या मात्रा के आदार पर भी पचाना जाता है. अन्तिया कर, यानी बीज वाला केला, अन्तिया लीची, यानी बड़े भीज वाली लीची, और अंत्या बल, जिस में गुदे से जाडा भीज भरे हों. बाशा सीदे तोर पर एक अन्सान के स्वाद और अनुबहव को बयाग कर रहे है. और ये देफनिशन पडते ही तो सच में चहरे पर मुस्कान आजाती है. अन्ति अमर्त, इसका इस्तमाल विशेश रुब से उस आम किलिए होता है, तो सर्फ अपनी गुट्ली के तीक आस पास कथा होता है. ज़र अच आम काते वक्त होने वाली एक चोटी सी निराशा को पकडने किलिए, इंके पास पुरा एक शब्द है, ये भाशा को भेहत जीवन्त बनाता है. तो अब हम इस एक्स्प्लेश्ट्टर के अंथ की तरव बड़ रहे हैं. एक कल्च्रल ताईम काईश्यूल. इन सभी अदबुध शब्डोपर चर्चा करने के बाद अब ये बिल्कुल साफ होटा है कि गजजेंद्र ताखूर ने तब आद बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद� अग, शच में कमाल की बात बताव। गिटब जैसे बिलकुल मोडन और टेकनिकल प्लट्फाम पर प्राचीन क्रिषी शब्दावली की ए मुजुदगी, विदेहा प्रोजेक का ये प्रैयास एकदम प्रफेक्ट्टी एलट्ट्ट्टाः है, कि दिजिटल युग में इस प्रचुर सान्सक्रितिक द्डवोर को जिन्दा रखना कितना ज़रूरी अर असर्दार है. पूराने ग्यान और नहीं टेकनूलगी का सबसे बहतरीन संगम है इस चर्चा को खत्म करते हुए एक विचार जरूर मन में आता है के हमारी देनिक भोल्चाल के इन आम से शब्डों के पीचे आखर कितना इतिखास खमोषी से सांस लेडा होता है वाँद्र बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बाशा बा�

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