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मैथिली-अंग्रेजी_शब्दकोश.mp4

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Part 7 · VIDEHA MITHILA MAITHILI DISCUSSION CRITICISM SERIES PART 7
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  1. 0:00–0:05नमसकार! आज्गे इस विषेश विष्लेषन में हम एक आज्ई बाषा की बाद करने वाले है,
  2. 0:05–0:08जो सर्फ अपनी पारम पर एक संसक्रिती की द़्ोहर नहीं है,
  3. 0:08–0:13बलकी आज्गे इस आदूनिक दिजितल युग में भी पूरी तरषे प्रासंगिख है.
  4. 0:13–0:22सच कहा जाए तो ये शब्द कोश सर्फ शब्दो की एक लिस्ट नहीं है, ये मानव विकास का एक पूरा नक्षा है, तो चलिए इस दिल्च्छप कोज में आगे बरते हैं.
  5. 0:22–0:27जल्दी से एक नजर डाल लेते हैं आज की इस चर्षा के मुख्यबिन्दूवाँ पर.
  6. 0:27–0:30बहला मैठली शब्द कोश को समजना
  7. 0:30–0:33दुस्रा तीन लिप्या और एक भाशा
  8. 0:33–0:36तीस्रा पारमपर एक संसक्रती की जलक
  9. 0:36–0:38चोथा दिजितल युग में मैठली
  10. 0:38–0:40और पाच्वा स्वयम का दरषन
  11. 0:40–0:43तो शर्वात करते हैं पहले हिससे से
  12. 0:43–0:45मैठली शब्द कोश को समजना
  13. 0:45–0:48अप्श्वूटी पब्लिकेशन के इस प्रतिक पर द्यान दीजीए.
  14. 0:48–0:53ये जो दो मच्लियो का निशान है ना ये इस विशाल ग्रन्त की पहचान है.
  15. 0:53–0:57इस बेहत शोद बहरे और विद्वद्वत्ता पून कार्यो को संकलित किया है,
  16. 0:57–1:01गजेंद्र ताकृर, नागेंद्र कुमार जा, और पनजीकार विद्यनन्द जाने
  17. 1:01–1:06ये कोई आम किताब नहीं है, बलकी बरसो की लगन और कत्फिन परिष्वम का नतीजा है.
  18. 1:07–1:10आगे बडते है, तुस्रे खणद पर, तीन लिप्या एक भाशा.
  19. 1:10–1:18अब यहां जो सबसे दिलच्यस्प बात निकल कर आती है, वो इसकी अनुथी त्री लिपी सन्दचना है.
  20. 1:18–1:24एक ही शब्द को देखे, किसे पता था कि उसे एक साथ अंतर राष्ट्रीय दूनेात्मक वरन्माला,
  21. 1:24–1:30यानी आईपीई, देवनागरी और मिठलाक्षर में प्रस्थुट किया जा सकता है.
  22. 1:30–1:32सात में अंग्रेजी आर्थ तो है ही.
  23. 1:32–1:36ये बाशा विग्यान के नजर्ये से एक मास्टर स्टोक है.
  24. 1:36–1:41एक ही जगापर उच्चारन और मूल लिपी दोनो को सहेज कर रखा गया है.
  25. 1:41–1:45चलिए अब आते है तीस्रेखशन्ट पर परमपर एक संस्क्रिती की जलक
  26. 1:45–1:49यहा आमे कुछ अज़े शब्द मेंगे जो शाया दी कही और सूने हो
  27. 1:49–1:54जैसे ये शब्द लीजे अंथा अब आम तोर पर हमे से कोई भी अंगूती समज लेंगे
  28. 1:54–1:59लेकि नहीं ये विश्छेश रूप से पैर के अंगुटे के लिए चांदी का आबूषन है.
  29. 1:59–2:03आजसे सतीक शब्द बताते है, कि इस भाशा कि भीटर,
  30. 2:03–2:07वेशबूशा और संसक्रती कि कितनी गेरी ज़डे मोझुद है.
  31. 2:07–2:13अग्टी किसानी के इक चोटे से हिसे और स्थानी नवाचार को बताने के लिए एक पूरा शबद
  32. 2:13–2:18एक शब तेही खेत और बगीचे का पूरा दिश्छे दिमाग में चब जाता है
  33. 2:18–2:22खाना बनाने की विदियों की बारी किया भी कमाल की है
  34. 2:22–2:25उस्तानिये नवाचार को बताने के लिए एक पूरा शब्द
  35. 2:25–2:29एक शब्द सुनते ही, केट और बगीचे का पूर द्रिष्ष दिमाग में चब जाता है.
  36. 2:30–2:33खाना बनाने की विद्यों की बारी किया भी कमाल की है.
  37. 2:34–2:35औन हर शब्द ही ले ले लिए.
  38. 2:35–2:41इसक्कम दब है, एक सील बंद बर्टन में बाहर से गर्मी देकर उबाला गया भोजन.
  39. 2:41–2:45दियान देने वाली बात ये है, के इस एक अकेले मेठली शब्द को,
  40. 2:45–2:49हिंदी या अंग्रेजी में समजाने के लिए हमें एक पूरे वाख्के की ज़ुरत परती है.
  41. 2:49–2:51यही तो बाशा की गेराई होती है,
  42. 2:51–2:55लिकिन खेती और गेहने ही सब कुछ नहीं है,
  43. 2:55–2:59पाव्रानिक और दार्मिक किसे भी इन पन्नो में जिन्दा है,
  44. 2:59–3:02आस्टिक का अर्थ यहा सर्फ आस्टिक होना नहीं है,
  45. 3:02–3:05ये उस विषेश रिषी को संदर बित करता है,
  46. 3:05–3:13तक्षक साप के रक्षक हैं. दिखा जाए तो प्राचीन, मिठक और कताएं इन शब्डो के जर ये आज भी साच ले रही हैं.
  47. 3:14–3:18अब बडते है चोथे कहन की तरव. दिजिटल योग में मैठली.
  48. 3:18–3:26यहां आकर चीजे सच्छ में है, चल ये देखते है, कि ये बाशा कितनी पुरानी होकर भी कितनी नहीं है.
  49. 3:26–3:32एक तरफ हमारे पास आस्तित जैसा प्राषीन शब्द है, जिसका अर्थ है आस्वन ये दिस्तिलेशन,
  50. 3:32–3:36अग्छी जेसे बास के उपकरन की बात हो रही है और अग्ले ही पल
  51. 3:36–3:40सीदे अईपी टलफनी पर आगे यानी अईपी टलफनी वीवोईपी
  52. 3:40–3:45और विडियो कुन्फ्रन्सिंग ये बिलकुल साभित कर देता है तो वो आपने
  53. 3:45–3:49ये किसी टाईम ट्रवल से कम नहीं लकता.
  54. 3:49–3:53एक पल में अंख्सी जैसे बास के उपकरन की बात होगी है,
  55. 3:53–3:56और अगले ही पल सीदे अपी टलफनी पर आगे,
  56. 3:56–4:00यानी अपी टलफनी, वीो अपी और विडिो कोंट्व्रन्ट्खिंचिंग.
  57. 4:00–4:02ये बिलकुल सावित कर देता है,
  58. 4:15–4:20ये साथ दिकाता है के दिजितल देटा प्रबंदन की आधूनिक सब्दावली
  59. 4:20–4:24कितनी आसानी से इस प्राचीन भाशाई दाचे में खुल मिल गगे है.
  60. 4:24–4:27वो भी बिना आपने मूल स्वरुप के साथ कोई समजोता किये.
  61. 4:27–4:32और अब इस चर्चा के आखरी और सब से गेरे हिस्से पर आते हैं
  62. 4:32–4:34खंड पाच स्वायम का दर्षन.
  63. 4:34–4:39तो यहां सब से एहिम बात यहें कि मानव अस्तित्वड
  64. 4:39–4:42और दर्षन की पूरी समज एक मूल शब्द पर आकर टिक जाती है
  65. 4:42–4:44और वो शब्द है आत्मा.
  66. 4:44–4:51ये शब्दि स्वर्फ किसी जीव को नहीं दर्षाता, बलकी ये प्रानी की चेतना और स्वयम की हूने का बोड है.
  67. 4:51–4:57इसे आदार बनाकर अगर आगे बड़ें, तो मानव मनूविग्यान के कई रूप सामने आते हैं.
  68. 4:57–5:27आप ज़रा शब्दों की इस तेज श्रिंख्ला को देखे आप आत्म निरभरता, स्वयम पर निरभर हूना, आत्म दमन, खुद को संयमित करना, अपने आवेगो पर काबूपाना, आत्म समरपन, अपना सब कुछ सुवप देना, आत्म गात, स्वयम को नष्ट कर लेना, और �
  69. 5:27–5:34समजाते हैं. और फिर इंसब के बीज आता है ये एक बेहत खास शब्द, आत्मेविस्म्रित,
  70. 5:34–5:38जिसका अर्थ है अपने स्वयम के अस्थिट्व को ही भूल जाना.
  71. 5:38–5:42एक पल किले रूकिये और इस बाद की गेराए को महसुस की जी.
  72. 5:42–5:47ये स्र्फिक शब नहीं बलकी द्यान और अद्यात्म की एक पूरी अवस्ता है
  73. 5:47–5:52तो ये सब हमें एक बहुत ही प्रा संगेक और गेहरे विचार के साथ चोर जाता है
  74. 5:52–5:54बाशाई सन्द्रक्षन के ये जो उपकरन है
  75. 5:54–5:59जेसे की ये शब्द्कोश ये हमारे प्राचीन मानवितिहास और तेजी से आगे बरते
  76. 5:59–6:03दिजितल भविष्खे के बीच एक मस्वुथ सेटु का काम कैसे करते हैं?
  77. 6:03–6:08बाशा का ये लचीलापन इसकी जीवन्त्ता सच्में मंत्र मुध्ध कर देने वाली है.
  78. 6:08–6:10आजका ये विष्लेशन यही समापत होता है,
  79. 6:10–6:15लेकिन आजके ही विष्याँ को समझने की ये जिग्यासा आगे भी जारी रहनी चाहिए.

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नमसकार! आज्गे इस विषेश विष्लेषन में हम एक आज्ई बाषा की बाद करने वाले है, जो सर्फ अपनी पारम पर एक संसक्रिती की द़्ोहर नहीं है, बलकी आज्गे इस आदूनिक दिजितल युग में भी पूरी तरषे प्रासंगिख है. सच कहा जाए तो ये शब्द कोश सर्फ शब्दो की एक लिस्ट नहीं है, ये मानव विकास का एक पूरा नक्षा है, तो चलिए इस दिल्च्छप कोज में आगे बरते हैं. जल्दी से एक नजर डाल लेते हैं आज की इस चर्षा के मुख्यबिन्दूवाँ पर. बहला मैठली शब्द कोश को समजना दुस्रा तीन लिप्या और एक भाशा तीस्रा पारमपर एक संसक्रती की जलक चोथा दिजितल युग में मैठली और पाच्वा स्वयम का दरषन तो शर्वात करते हैं पहले हिससे से मैठली शब्द कोश को समजना अप्श्वूटी पब्लिकेशन के इस प्रतिक पर द्यान दीजीए. ये जो दो मच्लियो का निशान है ना ये इस विशाल ग्रन्त की पहचान है. इस बेहत शोद बहरे और विद्वद्वत्ता पून कार्यो को संकलित किया है, गजेंद्र ताकृर, नागेंद्र कुमार जा, और पनजीकार विद्यनन्द जाने ये कोई आम किताब नहीं है, बलकी बरसो की लगन और कत्फिन परिष्वम का नतीजा है. आगे बडते है, तुस्रे खणद पर, तीन लिप्या एक भाशा. अब यहां जो सबसे दिलच्यस्प बात निकल कर आती है, वो इसकी अनुथी त्री लिपी सन्दचना है. एक ही शब्द को देखे, किसे पता था कि उसे एक साथ अंतर राष्ट्रीय दूनेात्मक वरन्माला, यानी आईपीई, देवनागरी और मिठलाक्षर में प्रस्थुट किया जा सकता है. सात में अंग्रेजी आर्थ तो है ही. ये बाशा विग्यान के नजर्ये से एक मास्टर स्टोक है. एक ही जगापर उच्चारन और मूल लिपी दोनो को सहेज कर रखा गया है. चलिए अब आते है तीस्रेखशन्ट पर परमपर एक संस्क्रिती की जलक यहा आमे कुछ अज़े शब्द मेंगे जो शाया दी कही और सूने हो जैसे ये शब्द लीजे अंथा अब आम तोर पर हमे से कोई भी अंगूती समज लेंगे लेकि नहीं ये विश्छेश रूप से पैर के अंगुटे के लिए चांदी का आबूषन है. आजसे सतीक शब्द बताते है, कि इस भाशा कि भीटर, वेशबूशा और संसक्रती कि कितनी गेरी ज़डे मोझुद है. अग्टी किसानी के इक चोटे से हिसे और स्थानी नवाचार को बताने के लिए एक पूरा शबद एक शब तेही खेत और बगीचे का पूरा दिश्छे दिमाग में चब जाता है खाना बनाने की विदियों की बारी किया भी कमाल की है उस्तानिये नवाचार को बताने के लिए एक पूरा शब्द एक शब्द सुनते ही, केट और बगीचे का पूर द्रिष्ष दिमाग में चब जाता है. खाना बनाने की विद्यों की बारी किया भी कमाल की है. औन हर शब्द ही ले ले लिए. इसक्कम दब है, एक सील बंद बर्टन में बाहर से गर्मी देकर उबाला गया भोजन. दियान देने वाली बात ये है, के इस एक अकेले मेठली शब्द को, हिंदी या अंग्रेजी में समजाने के लिए हमें एक पूरे वाख्के की ज़ुरत परती है. यही तो बाशा की गेराई होती है, लिकिन खेती और गेहने ही सब कुछ नहीं है, पाव्रानिक और दार्मिक किसे भी इन पन्नो में जिन्दा है, आस्टिक का अर्थ यहा सर्फ आस्टिक होना नहीं है, ये उस विषेश रिषी को संदर बित करता है, तक्षक साप के रक्षक हैं. दिखा जाए तो प्राचीन, मिठक और कताएं इन शब्डो के जर ये आज भी साच ले रही हैं. अब बडते है चोथे कहन की तरव. दिजिटल योग में मैठली. यहां आकर चीजे सच्छ में है, चल ये देखते है, कि ये बाशा कितनी पुरानी होकर भी कितनी नहीं है. एक तरफ हमारे पास आस्तित जैसा प्राषीन शब्द है, जिसका अर्थ है आस्वन ये दिस्तिलेशन, अग्छी जेसे बास के उपकरन की बात हो रही है और अग्ले ही पल सीदे अईपी टलफनी पर आगे यानी अईपी टलफनी वीवोईपी और विडियो कुन्फ्रन्सिंग ये बिलकुल साभित कर देता है तो वो आपने ये किसी टाईम ट्रवल से कम नहीं लकता. एक पल में अंख्सी जैसे बास के उपकरन की बात होगी है, और अगले ही पल सीदे अपी टलफनी पर आगे, यानी अपी टलफनी, वीो अपी और विडिो कोंट्व्रन्ट्खिंचिंग. ये बिलकुल सावित कर देता है, ये साथ दिकाता है के दिजितल देटा प्रबंदन की आधूनिक सब्दावली कितनी आसानी से इस प्राचीन भाशाई दाचे में खुल मिल गगे है. वो भी बिना आपने मूल स्वरुप के साथ कोई समजोता किये. और अब इस चर्चा के आखरी और सब से गेरे हिस्से पर आते हैं खंड पाच स्वायम का दर्षन. तो यहां सब से एहिम बात यहें कि मानव अस्तित्वड और दर्षन की पूरी समज एक मूल शब्द पर आकर टिक जाती है और वो शब्द है आत्मा. ये शब्दि स्वर्फ किसी जीव को नहीं दर्षाता, बलकी ये प्रानी की चेतना और स्वयम की हूने का बोड है. इसे आदार बनाकर अगर आगे बड़ें, तो मानव मनूविग्यान के कई रूप सामने आते हैं. आप ज़रा शब्दों की इस तेज श्रिंख्ला को देखे आप आत्म निरभरता, स्वयम पर निरभर हूना, आत्म दमन, खुद को संयमित करना, अपने आवेगो पर काबूपाना, आत्म समरपन, अपना सब कुछ सुवप देना, आत्म गात, स्वयम को नष्ट कर लेना, और � समजाते हैं. और फिर इंसब के बीज आता है ये एक बेहत खास शब्द, आत्मेविस्म्रित, जिसका अर्थ है अपने स्वयम के अस्थिट्व को ही भूल जाना. एक पल किले रूकिये और इस बाद की गेराए को महसुस की जी. ये स्र्फिक शब नहीं बलकी द्यान और अद्यात्म की एक पूरी अवस्ता है तो ये सब हमें एक बहुत ही प्रा संगेक और गेहरे विचार के साथ चोर जाता है बाशाई सन्द्रक्षन के ये जो उपकरन है जेसे की ये शब्द्कोश ये हमारे प्राचीन मानवितिहास और तेजी से आगे बरते दिजितल भविष्खे के बीच एक मस्वुथ सेटु का काम कैसे करते हैं? बाशा का ये लचीलापन इसकी जीवन्त्ता सच्में मंत्र मुध्ध कर देने वाली है. आजका ये विष्लेशन यही समापत होता है, लेकिन आजके ही विष्याँ को समझने की ये जिग्यासा आगे भी जारी रहनी चाहिए.

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