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मैथिली_कंप्यूटर_शब्दकोश_और_डिजिटल_भविष्य.m4a
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- 0:00–0:10दर दिबेट में आपका सुआगत है, सोची ए, कल सुबा आप सोकर उट्ते है, और पाते है के अप इंट्रनेट से आपकी मात्र भाषा पुरी तर से गायब हो चुकी है.
- 0:10–0:13बाप्रे, ये तो मतलप किसी भ्यानक सपने जैसा है?
- 0:13–0:14बिलकुल
- 0:14–0:16आप ना कोई e-mail लिख पारे हैं
- 0:16–0:20ना सीरी या आलेकसा से आपनी भाशा में बात कर सकते हैं
- 0:20–0:22और कोई सुझट्वेर भी काम नहीं कर रहा
- 0:22–0:26सुझने में ये किसी साईंच्ट्ट्विक्ष्ट्विक्ष्ट्विल्म जैसा लक सकता है
- 0:26–0:31लेकिन दून्या की सेक्रो आधियासे के बाशाँ के लिए आज यही कदवी सच्चाई है
- 0:31–0:36आज कि जिस बाशा का अपना तकनी की और दिजितल दाचा न नहीं है
- 0:36–0:40वो इक्किस्वी सदी में दिरे-दिरे विलुप थोने की और बट रही है
- 0:40–0:41सही का अपने
- 0:41–0:44और इसी लिए आज हमारी चर्चा का केंदर है,
- 0:44–0:47गजेंदर ताकृर, नागेंदर कुमार जा,
- 0:47–0:50और पंजिकार विद्यनन्द जा दुरा संकलित
- 0:50–0:53अंग्रेजी मेठिलिक कमपुटर शब्द्खोष.
- 0:53–0:56और साति हम बात करेंगे प्रुफैसर उदेनाराएंच सिंग दॉरा
- 0:56–1:01इसकी अद्यन्त विस्त्रित और दिर्चास प्रस्तावना पर भी.
- 1:01–1:04आप, दिक्ये ये केवल एक किताब नहीं.
- 1:04–1:10मतलब ये एक भाशा को दिजितल युग में जिन्दा रखने का एक बहुत बड़ा ब्लूप्रिंट है.
- 1:10–1:17और आज की चर्चा में मेरे सपष्ट मानना है, कि किसी भी शेत्रिया बहाशा को बचाने के लिए,
- 1:17–1:22उसे संस्तागत सन्रक्षन और सून्योजत मानकि करन की सक्त जरूरत है.
- 1:22–1:27बिना इस तकने की शब्दावली के कोई भी बहाशा बहविष्ष्य में नहीं जासकती.
- 1:27–1:34जब आशा की आसल उर्जा उसकी जविक सान्सक्रितिक जीवन्तता, सडको पर होने वाले समवाद अगर बहुबाशिक वास्ट्विक्ता में बसती है.
- 1:34–2:04अट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्या�
- 2:04–2:08अप यह तरम दाचा के बिना किसी दाचे के एक इमारत कैसी दहडी होगी
- 2:09–2:14हम सीदे प्रुफेसर सिंकी प्रस्तावना में मोझुद उस विरोद़ा बास से शुर्वात करते हैं
- 2:15–2:17जिसने मुजे सबसे जादा सोचने पर मजबूर किया
- 2:17–2:20कि बिना किसी दाचे के एक इमारत कैसी दहडी होगी?
- 2:21–2:24हम सीदे प्रुफेसर सिंकी प्रस्तावना में मोझुद
- 2:24–2:26उस विरोद़ा भाज से शुर्वाद करते है,
- 2:27–2:29जिसने मुझे सबसे जादा सोचने पर मजबोर किया.
- 2:30–2:33उनोने जिक्र किया है कि लंभे समय तक मैठिली को
- 2:33–2:36समविदान की आप्वी अनुसुची में जगे नहीं मिली थी
- 2:36–2:39आप अगर उनो ने बहुत बेबाखी से लिखा है
- 2:39–2:42कि समविदाने कदिकारों से वनच्ट रहना
- 2:42–2:46मैठिली किलिए वास्तव में भेश में एक वर्दान साभेत हूँँँ
- 2:46–2:48यानी एक बून इन दिसगाएस
- 2:48–2:57अग, लेकिन बिना किसी राजकी ये सन्रक्षन के, बिना किसी संस्तागत समर्ठन के, बाशा अपने दंपर संगष कर रही थी.
- 2:57–3:01आप अप सर कहती है कि इस संगष नहीं बाशा को अस्ली उर्जा दी.
- 3:01–3:02बिलकल दी है.
- 3:02–3:05लेकिन केवल कविताया और लोग गीत लिक कर
- 3:05–3:10हम किसी बाशा को कोडिंग और साप्टवेर देबलप्मन्त की दूनिया में इस्थापित कर सकते है?
- 3:10–3:14आत्वी अनुसुची का दर्जा महेज एक राजनितिक सम्मान नहीं है?
- 3:14–3:19ये वो बून्यादी दाचा खूलता है, जिस से बाशा में दिजिटल काम हो सके.
- 3:19–3:23दिक्ये, हमें इस सन्रक्षन वाले पहलू को तोडा करीप से देखना होगा.
- 3:23–3:29जब सत्ता आपको किनारे कर देती है, तो समाज के भीतर अपनी पहचान साभित करने की
- 3:29–3:32अबुद्पूर्व्जित प्यदा होती है
- 3:32–3:35मैं जित को नकार नहीं रहा हों
- 3:35–3:39इसी जित और संगर्ष ने मैत्ली साहित्ते को वो उर्जा दी
- 3:39–3:41कि बिना किसी सरकारी बैसाखी के
- 3:41–3:44इसने मनी पुरी, कोंकनी और सिंदी जैसी
- 3:44–3:46उन बाशागो को साहित्ते कुपादन में
- 3:46–3:50तो बवाँनाय उफान पर होती हैं और बहतरीन कवीटाय लिखी जाती हैं
- 3:50–3:55मैठली की जो वैश्विक पहचान बनी है, वो किसी सरकारी शब्द्कोष के कारन नहीं बनी,
- 3:55–3:59बलकी मदूबनी पेंटिंग जैसी जैविक कलाओ की कारन बनी है.
- 3:59–4:02सत्ता का रस्तक शेप अकसरोस प्राक्रुतिकाएक को बुजहा देता है.
- 4:02–4:08संगर्श्छे कला और साहित्ते का जर्म होता है, इस अटियासिक सच्चाई से में भिल्ल्कुल इनकार नहीं कर रहा.
- 4:08–4:14जब आप हाँश्ये पर होते हैं, तो भाअनाई अफान पर होती हैं, और बहतरीन कविताये लिखी जाती हैं.
- 4:14–4:44अप भी बजादा अगा देटागा देटागा लगा तो वो बजा तो बजा देटागा लगा तो बजादा तो बजादा तो वो बजादा तो वो बजादा तो वो बजादा तो वो बजादा तो वो बजादा तो वो बजादा तो वो बजादा तो वो बजादा तो वो बजाद
- 4:44–4:49अद्राश्व्ट्याद्मक वर्ण्माला देवनाग्री और तिरहुता लिपी में वेवस्तित करनाही होगा,
- 4:49–4:54बिना संस्तागत समर्ठन के आप ये विशाल कोडिं का काम कैसे करेंगी?
- 4:54–4:57मुझे लकता है कि यही पर हम एक बडी भूल कर रहे है,
- 4:57–5:05तो उसे अंतराश्व्य दून्यात्मक वर्ण्माला देवनागरी और तिरहुता लिपी में वेवस्तित करना ही होगा.
- 5:05–5:10बिना संस्तागत समर्ठन के आप ये विशाल कोडिं का काम कैसे करेंगी?
- 5:10–5:13मुझे लकता है कि यही पर हम एक बडी भूल कर रहे है.
- 5:13–5:21अप मान रहे हैं के दिजिटल भून्यादी दाचा बनाने के लिए हमें भाशा की आत्मा को ही अंजनिर करना होगा
- 5:21–5:24अंजनिर नहीं बल की उसे सक्शम बनाना होगा
- 5:24–5:30लिकिन जब आप राज्य संस्ठाऊँ और कोशकारों को पूरी कमान सोप देते हैं
- 5:30–5:34तो आप दर असल नोकर शाही को बाशा में प्रवेश दे देते हैं
- 5:34–5:38बाशा एक प्रोजेक्त बन जाती है, औरजा सड़कों से हदखर
- 5:38–5:42अकाद मिक विषेशग्यों की मेज पराजा जाती है।
- 5:42–5:47फिर ये विषेशग्य तैकरने लकते हैं, की लोगों को कैसे बोलना चाही है
- 6:00–6:06अगर हमी से सही संदर में कहें, तो लेक्सिको ग्राफर्स की मेज पर ही उस सतिक्ता का जन्म होता है,
- 6:06–6:08जिसके बिना तक्नि कामी नहीं कर सकती.
- 6:08–6:10अच्छा कैसी सतिक्ता?
- 6:10–6:15चलिये, स्रोथ समगरी पर आते हैं और देखते हैं कि लेक्खो को ने वास्तम में क्या किया है.
- 6:15–6:19उनो ने पश्च्मी सिद्दान्तो का उप्योख कर के जटिल शब्दो का निरमान किया है
- 6:19–6:23उदारन के लिए उनो अनलोग के लिए सिम्मतिये शब्दे ग़ा है
- 6:23–6:27बाइत के लिए आश्टक का निरमान किया है
- 6:27–6:31और आलगारिदम को अबही मुक्ती विधिकल्प कहा है
- 6:31–6:36अग, माझफ की जेगा, लेकिन क्या सच्छ में? अबहीं मुक्ती विधिकल्प?
- 6:36–6:42आप, सत्तह पर ये अनुवाद लक्सकता है, लेकिन इसके पीचे के विग्यान को समजीए.
- 6:42–6:46बाइत, कम्पुटर विग्यान में 8 बिट्स का एक समुझ होता है.
- 6:46–6:50इसली उनोने संसक्रित की ज़द से आश्टक शब्द लिया
- 6:50–6:52ये महजेक शबद नहीं है
- 6:52–6:54ये बाशा की शमता का निरमान है
- 6:54–6:58जब कोई सोफ़र एंजीन्यर कल को
- 6:58–7:01मैठिली में अपरेटिंटिंग सिस्टम देशाँन करेगा
- 7:01–7:03तो उसे दीले डाले शब्दो की नहीं
- 7:03–7:06बल की इसी गनती ए सटीक्ता की आविषक्ता होगी?
- 7:06–7:09ये विग्यान हो सकता है,
- 7:09–7:12लेकिन अगर मुजे कमपूटो पर महिज एक फाटल खोलनी है,
- 7:12–7:14और मुजे ये कहा जाए,
- 7:14–7:16के माउसे क्लिक करने को,
- 7:16–7:21मैठली में मुष्किपंज दबा के मुचन कही,
- 7:21–7:23तो मैं शाइत कमपुटर ही बन्त कर दूंगी
- 7:23–7:28और करसर के लिए दिश्मान चमका इतनेदेशक चिन्द
- 7:28–7:29गडना
- 7:29–7:31मेरा मतलब है गडना
- 7:31–7:34ये सतीक्ता नहीं है ये भाशा पर अथ्त्याचार है
- 7:34–7:37अथ्याचार ये तोडा जेआदा हो गया
- 7:37–7:41बाशा अन्तत है अन्सानो के भीज समवागता एक उपकरन है
- 7:41–7:43कोई गड़ित का फरमूला नहीं
- 7:43–7:47आपको ये देखना होगा कि जिन बाशावने सप्फलता पुरवक तकनिक को अपनाया है
- 7:47–7:49उनहोने ये कैसे किया?
- 7:49–7:51अंगरेजी का ही उदारान लीजे
- 7:51–7:57जब कम्पूट़विज्यान विखसित हो रहा था, तो नोने लाटन या गरीख से बहरी भरकम शब नहीं गड़े.
- 7:57–8:01नोने अपने रोज मर्रा के शब्दों को बस एक नया अर्थ दे दिया.
- 8:01–8:04माوس, जो एक जान्वर था, दिवाईस बन गया,
- 8:04–8:07वेब यंटनेट बन गया, बग, सुफ्ट्वर का अरर बन गया.
- 8:07–8:11ये बाश्चा का प्रक्रितिग जैविक तरीका है,
- 8:11–8:14जब आप क्रित्रेम और इतने बारी शब्द गरते है,
- 8:14–8:18तो आप आम आद्मी को उसकी ही मात्रबाशा से दरारे होते हैं
- 8:18–8:21बास्तविक्ता यही है कि यह गड़ेविष्षब्द
- 8:21–8:24इस सोला कहन्डो वाले विशाल शब्द्कोष मेही दूल कहेंगे
- 8:24–8:27कोई आस्ली वकता एंका अस्तमाल नहीं करेगा
- 8:27–8:33मैं ये मानुगा की दिश्यमान, चमकेत, निर्देशक, चिन, जैसे शब्द पहली बार सुन्ने में,
- 8:34–8:37बोछग अजीब और भोजिल लकते हैं. आपकी ये बाद जायस है,
- 8:37–8:39की आम जिन्दिगी में कोई से नहीं बोलेगा.
- 8:39–8:40बिलकुल नहीं बोलेगा.
- 8:40–8:44लेकिन आपको इस शब्द्कोश के पीछे के उदेश्षे को समजना होगा
- 8:44–8:46इसे एक उदारेन से समचते हैं
- 8:46–8:49जैसे गाँ की पग दंदिया होती हैं
- 8:49–8:51वे बहुत प्राक्रुतिक होती हैं
- 8:51–8:53आप कही से भी मुर्षकते हैं
- 8:53–8:55ये हमारी लोक भाशा है
- 8:55–8:58अग, और लोग सदियों से उनपर चलते आए है.
- 8:58–9:02बलकल, लेकिन अगर आपको ट्रको से माल ढूलाई करनी है,
- 9:02–9:07पूरी आर्थ वेवस्था को चलाना है, तो आपको कनक्रीट के हैवे बनाने ही पड़िंगे.
- 9:07–9:12शुर्वात में जब हैवे बनते हैं तो वे बहत अप्राक्रूतिक लकते हैं
- 9:12–9:14लेकिन उनके बिना बहारी काम नहीं हो सकता
- 9:14–9:20जब 18 सदी में सैमिल जोंसन ने अंग्रेजी का पहला विवस्तित शब्द कोष बनाया
- 9:20–9:23या जब संसक्रित में आमर कोष लिखा गया
- 9:23–9:29तो उनका उदेश्छ ये नहीं ता, की आम लोग बजार में सबजी कहरीते समें उन सारे शब्डो का प्रियोग करें.
- 9:29–9:30तो फिर क्या उदेश्छ ये आ?
- 9:30–9:35उनका उदेश्छ ये एक रूट सिस्टम या आदार तयार करना था.
- 9:35–9:39अज भी आम भोल्चाल में सब कमपूटर ही कहते हैं
- 9:39–9:44कहते हैं, लेकिन जब भारद सरकार कोई अप्चारेक तकनी की नीती बनाती है,
- 9:44–9:49तो संगर अख शबद उस नीती को कानूनी और अकाडमिक वजन देता है.
- 9:49–9:52इस मैतली शब्द कोश का लक्षिये नहीं है,
- 9:52–9:56संगरक शब्द उस नीती को कानूनी और अकाटमिक वजन देता है
- 9:56–9:58इस मैतली शब्द कोश का लक्षिये नहीं है
- 9:59–10:02कोई यूा कैफे में बेटकर अभी मुक्ती विदिकल्प बोले
- 10:03–10:04इसका अस्ली लक्ष्ठ ये है
- 10:04–10:08कि कल को जब कोई उन्वर्सिती मेतली में कम्ठौटर साँईंस का पाटिक्रम शूरू करे,
- 10:08–10:11तो उनके पास एक मान की क्रित आदार हो.
- 10:11–10:14हाईवे करूपक बहुट शान्दार है.
- 10:14–10:15अं...
- 10:15–10:18लेकिन आप ये बहुल रहे है कि हाईवे वहाँ बनाय जाते हैं,
- 10:18–10:24यह ज़हां कोई आबादी हो जो उस हैवे का इस्तमाल करना चाती हो
- 10:24–10:26चार करोड वकता है मैठली के
- 10:26–10:31आप जर अब जर उन लोगो की बात करते है यह नी लक्षित उप्योग करता
- 10:31–10:36प्रफेसर सिंग की प्रस्तावना में जन गारना के आख़्ों का जो विष्लेशन है
- 10:36–10:40अदर बदादा है कि जमीनी हकीकत इन अकाटमिक कमरों से कितनी अलग है
- 10:41–10:45अथारसो इक्यानवे में गरीयासन के भाशाई सरवेक्षन कि अनुसार
- 10:46–10:49मैठली वक्ताउं कि संक्या लगबभग नभभे लाग थी
- 10:50–10:52फिर उनीसो इक्सट की जंगरना में
- 10:52–10:56ये संक्या आश्चर ये जनक रूप से गिरकर मात्र पचास लाक रह गगेई
- 10:56–10:58और ये राजनीतिक वजगों से ता
- 10:58–11:03और फिर 2001 में ये उचलकर एक दशम्लव दो एक करोड होगेगेगेगे
- 11:03–11:07विखच्छा उनीस्ट में अचानक लोग गायब हो गए थे?
- 11:07–11:15नहीं, ये हमें बताता है कि इस इलाके के लोग एक अत्यदिक जटिल बहुबाशिक हकिकत में जीते हैं.
- 11:15–11:19आज ये शेट्र बारा अन्ये बाशाँ के साजा किया जाता है.
- 11:19–11:27यहां का आम आदमी, हिन्दी, भोज्पूरी, मगही, और अंग्रेजी के बीच लगातार सुईच करता है.
- 11:27–11:29मेठली कोई अलक खलक द्वीप नहीं है.
- 11:29–11:33तो क्या उने उनकी भाशा में तकनी की शबद नहीं रहीं नहीं जाहीं है?
- 11:33–11:38मेरा मतलव है, कि जब वे अपने फोंपर, कोडिंग या वाट्साप के लिए,
- 11:38–11:43अंग्रेजी और हिंदी के तकनी की शब्डों का सपलता पूर्वक उप्योख कर रहे है,
- 11:43–11:48तो उनपर एक शुद्द और क्रत्रिम मेठली तकनी की शब्डावली क्यो थोपीजाए?
- 11:48–11:52जन्गनना के आख़ों का यह विषलेशन बिलकुल सकीख है
- 11:54–11:57लिकिन आब जो तर्क देरही हैं वो मुझे तोडा परिशान करता है
- 11:57–11:57क्यो?
- 11:57–12:00आप खेर रही हैं कि कि वो लोग बहु भाशी हैं
- 12:00–12:03और वे हिंदी या अंग्रेजी में काम चला लेते हैं
- 12:03–12:07इसलि हमे में मेतली में तकनी की शब्द बनाने की कोई जरूरत नहीं हैं
- 12:07–12:12यह तो एक तरह से भाशाई समरपन, यह नि लिंविस्टिक सरिंटर की वकालत करना हूँँँँ
- 12:12–12:15मैं समरपन की वकालत नहीं कर रही हूँँ
- 12:15–12:17जरा सोची ए, इसका मतलब क्या है?
- 12:17–12:20प्रुफेसर सिंग आपनी प्रस्तावना में स्पष्ट करते हैं
- 12:20–12:24कि इस पूरेक शेटर में बमुशकिल 3-5 प्रतिषत लोगी आऽसे हैं
- 12:24–12:28जो अंग्रेजी को प्रभावी द्हंख से लिख्या बोल सकते हैं
- 12:28–12:30बाखी पंचानवे प्रतिषत अबादिका क्या?
- 12:30–12:37जब आप उन पन्चानवे प्रतिषत लोगों को उनकी मात्र भाशा में तकनीकी ज्यान या दिजितल उपकरन नहीं देते,
- 12:37–12:40तो आप परोख्ष रुप से उने एक सन्टेश दे रहे होते हैं.
- 12:40–12:44आप उने बता रहे होते हैं की विग्यान, तकनीक और भविष्च,
- 12:44–12:47केवल अंग्रेजी बुलनेवालो की बपूथी है
- 12:47–12:48अईसा नहीं है
- 12:48–12:50और तुमारी जो मात्र भाशा है
- 12:50–12:53वो केवल त्योहारो में लोगी द्गाने के ही लायक है
- 12:53–12:56लिखखोने साइबर स्पेस के लिए
- 12:56–12:58सांगने का वकाश
- 12:58–12:59जैसा शब्द गडा है
- 12:59–13:04ये कुई जिद नहीं है, ये तकनीक को लोग्तान्त्रिक बनाने का प्रैयास है.
- 13:04–13:08नहीं, मैं समरपन की वकालत बलकुल नहीं कर रहीं।
- 13:08–13:13मैं बाशा के जैविक विकास और उसके स्वबहाविक लचीले पन की वकालत कर रहीं।
- 13:13–13:18अंग्रेजी या हिंदी से तकनी की शब्द सीदे तोर पर उदार लेना कोई रार नहीं है.
- 13:18–13:23ये तो बाशावों के जीवित रेने का सब से पुराना और प्राक्रतिक तरीका है
- 13:23–13:27प्रुफेसर सिंग खुध प्रस्तावना में इस बात को स्विकार करते है
- 13:27–13:32के आदूनिक बारतिय बाशावों में अंग्रेजी से उदार लेना बहुत आम बात है
- 13:32–13:34इस में कुज़ भी खलत या अप्मानजनक नहीं है
- 13:35–13:36उदार लेना टीक है
- 13:36–13:40लेकिन पुरा दिजिटल दाचा तो उदार नहीं लिया जासकताना
- 13:40–13:43जब भारत में पहली बार ट्रेन आईए
- 13:43–13:47तो हमने उसके लिए लोग पत गामीनी जैसा क्रित्रिम शब्द गडा
- 13:47–13:51लेकिन आम आद्मीने ट्रेन शब्द को ही आपनी भाशा में पचालिया.
- 13:51–13:53मैठिली के वकता बहुत समजदार है.
- 13:53–13:57वे आश्टक जैसे अप रिचित शब्द को रतने के बजाए,
- 13:57–14:00बाइत और क्लिक को अपने ध्वन्नियात्मक साथचे में डाल लेंगे.
- 14:00–14:05आप भाशा को पूरी तरहे से शुद्द बनाने की जो कोशिष कर रहे हैं,
- 14:05–14:09वो आसल में उनीस्वी सदी के राश्टर राजज़ वाली सोच है.
- 14:09–14:14लेकिन हम एक कीस्वी सदी के एक भेहद हाईब्रेट धिजिटल युग में है.
- 14:14–14:21यहां शुद्धाता से जाडा एहमियत इस बात की है, कि लोग कितनी आसानी से तक्दीक का अईस्तमाल कर पारहे हैं.
- 14:21–14:26मैं शुद्धाता की बात नहीं कर रहा, मैं सन्रचनात्मक मस्वुती की बात कर रहा हूं.
- 14:26–14:29लिकिन स्वाबहाविक बोली भी समय के साथ बड़लती है.
- 14:44–14:48बारन्माला में लाको तकनी की शब्डो का एक सुन्योजत रिकोट बनाते हैं
- 14:48–14:52तो हम भाशा को एक आसी सन्द्ष्नात्मक मस्बूती प्रदान करते हैं
- 14:52–14:54जिसे कोई मिता नहीं सकता.
- 14:55–14:58अगर कल को गुगल अपने सिस्टम को मैठली में डालना चाहे
- 14:58–15:02तो वे गाँँँँँ जाकर लोगों की बोली का सरवे नहींगे.
- 15:02–15:04वे एक मानकी क्रत लेक्सिकन माँगेंगे.
- 15:04–15:06ये शब्द कोश वही लेक्सिकन है.
- 15:06–15:08ये क्रित्रिम लक सकता है,
- 15:08–15:12लेक्सिको बाशा को दिजिटल विलुप्ती से बचाने का सबसे थोस तरीका है.
- 15:12–15:22अर मैं अंत में यही कहुंगी कि लेक्हो को और लेक्सिको ग्राफरस का यह प्रियास बोद्धिक रुप से बहुत विशाल है, मैं सके शम का सम्मान करती हूं.
- 15:22–15:52अब आप बाशा या वहाशा नहीं अपने प्रदी प्रदी प्रदी प्रदी प्रदी प्रदी प्रदी प्रदी प्रदी प्रदी प्रदी प्रदी प्रदी प्रदी प्रदी प्रदी प्रदी प्रदी प्रदी प्रदी प्रदी प्रदी प्रदी प्रदी प्रदी प्रदी प्रद
- 15:52–15:55अदिटल मशीनो के योग्गे बनाती है।
- 15:55–15:58और दूस्री तरफ है बभाशा के स्वत्तन्त्र जैविक जड़ें।
- 15:58–16:00तो तो तो तो अपना बनाती है।
- 16:00–16:07ये एक अचाईसा बोदिक तनाव है जिसका कोई आसान या सीथा उत्तर नहीं है
- 16:07–16:13एक तरव हमारे पास भाशा की एंजिनेरिंग है जोसे दिजिटल मशीनो के योग्गे बनाती है
- 16:13–16:17और दुस्री तरव है भाशा की स्वत्तन्त्र जैविक जड़ें
- 16:17–16:19यो से अईन्सानो के योगि बनाती है
- 16:19–16:21कोसी नदी के बारे में कहाजाता है कि
- 16:21–16:23वो अपना रास्ता खुट बनाती है
- 16:23–16:25वो किसी नक्षे की महताज नहीं होती
- 16:25–16:27बाशा भी बहुत रहत्तक वैसी ही है
- 16:27–16:29बिलकुल
- 16:29–16:59तो आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आ� आप आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ�
- 16:59–17:21आप श्वताँ के विवेख पर चोडते है, कि बाशा का बहुश्छ लबविष्छ लबविष्छ लबविष्छ लबविष्छ लबविष्छ लबविष्छ लबविष्छ लबविष्छ लबविष्छ लबविष्छ लबविष्छ लबविष्छ लबविष्छ लबविष्�
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दर दिबेट में आपका सुआगत है, सोची ए, कल सुबा आप सोकर उट्ते है, और पाते है के अप इंट्रनेट से आपकी मात्र भाषा पुरी तर से गायब हो चुकी है. बाप्रे, ये तो मतलप किसी भ्यानक सपने जैसा है? बिलकुल आप ना कोई e-mail लिख पारे हैं ना सीरी या आलेकसा से आपनी भाशा में बात कर सकते हैं और कोई सुझट्वेर भी काम नहीं कर रहा सुझने में ये किसी साईंच्ट्ट्विक्ष्ट्विक्ष्ट्विल्म जैसा लक सकता है लेकिन दून्या की सेक्रो आधियासे के बाशाँ के लिए आज यही कदवी सच्चाई है आज कि जिस बाशा का अपना तकनी की और दिजितल दाचा न नहीं है वो इक्किस्वी सदी में दिरे-दिरे विलुप थोने की और बट रही है सही का अपने और इसी लिए आज हमारी चर्चा का केंदर है, गजेंदर ताकृर, नागेंदर कुमार जा, और पंजिकार विद्यनन्द जा दुरा संकलित अंग्रेजी मेठिलिक कमपुटर शब्द्खोष. और साति हम बात करेंगे प्रुफैसर उदेनाराएंच सिंग दॉरा इसकी अद्यन्त विस्त्रित और दिर्चास प्रस्तावना पर भी. आप, दिक्ये ये केवल एक किताब नहीं. मतलब ये एक भाशा को दिजितल युग में जिन्दा रखने का एक बहुत बड़ा ब्लूप्रिंट है. और आज की चर्चा में मेरे सपष्ट मानना है, कि किसी भी शेत्रिया बहाशा को बचाने के लिए, उसे संस्तागत सन्रक्षन और सून्योजत मानकि करन की सक्त जरूरत है. बिना इस तकने की शब्दावली के कोई भी बहाशा बहविष्ष्य में नहीं जासकती. जब आशा की आसल उर्जा उसकी जविक सान्सक्रितिक जीवन्तता, सडको पर होने वाले समवाद अगर बहुबाशिक वास्ट्विक्ता में बसती है. अट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्याट्या� अप यह तरम दाचा के बिना किसी दाचे के एक इमारत कैसी दहडी होगी हम सीदे प्रुफेसर सिंकी प्रस्तावना में मोझुद उस विरोद़ा बास से शुर्वात करते हैं जिसने मुजे सबसे जादा सोचने पर मजबूर किया कि बिना किसी दाचे के एक इमारत कैसी दहडी होगी? हम सीदे प्रुफेसर सिंकी प्रस्तावना में मोझुद उस विरोद़ा भाज से शुर्वाद करते है, जिसने मुझे सबसे जादा सोचने पर मजबोर किया. उनोने जिक्र किया है कि लंभे समय तक मैठिली को समविदान की आप्वी अनुसुची में जगे नहीं मिली थी आप अगर उनो ने बहुत बेबाखी से लिखा है कि समविदाने कदिकारों से वनच्ट रहना मैठिली किलिए वास्तव में भेश में एक वर्दान साभेत हूँँँ यानी एक बून इन दिसगाएस अग, लेकिन बिना किसी राजकी ये सन्रक्षन के, बिना किसी संस्तागत समर्ठन के, बाशा अपने दंपर संगष कर रही थी. आप अप सर कहती है कि इस संगष नहीं बाशा को अस्ली उर्जा दी. बिलकल दी है. लेकिन केवल कविताया और लोग गीत लिक कर हम किसी बाशा को कोडिंग और साप्टवेर देबलप्मन्त की दूनिया में इस्थापित कर सकते है? आत्वी अनुसुची का दर्जा महेज एक राजनितिक सम्मान नहीं है? ये वो बून्यादी दाचा खूलता है, जिस से बाशा में दिजिटल काम हो सके. दिक्ये, हमें इस सन्रक्षन वाले पहलू को तोडा करीप से देखना होगा. जब सत्ता आपको किनारे कर देती है, तो समाज के भीतर अपनी पहचान साभित करने की अबुद्पूर्व्जित प्यदा होती है मैं जित को नकार नहीं रहा हों इसी जित और संगर्ष ने मैत्ली साहित्ते को वो उर्जा दी कि बिना किसी सरकारी बैसाखी के इसने मनी पुरी, कोंकनी और सिंदी जैसी उन बाशागो को साहित्ते कुपादन में तो बवाँनाय उफान पर होती हैं और बहतरीन कवीटाय लिखी जाती हैं मैठली की जो वैश्विक पहचान बनी है, वो किसी सरकारी शब्द्कोष के कारन नहीं बनी, बलकी मदूबनी पेंटिंग जैसी जैविक कलाओ की कारन बनी है. सत्ता का रस्तक शेप अकसरोस प्राक्रुतिकाएक को बुजहा देता है. संगर्श्छे कला और साहित्ते का जर्म होता है, इस अटियासिक सच्चाई से में भिल्ल्कुल इनकार नहीं कर रहा. जब आप हाँश्ये पर होते हैं, तो भाअनाई अफान पर होती हैं, और बहतरीन कविताये लिखी जाती हैं. अप भी बजादा अगा देटागा देटागा लगा तो वो बजा तो बजा देटागा लगा तो बजादा तो बजादा तो वो बजादा तो वो बजादा तो वो बजादा तो वो बजादा तो वो बजादा तो वो बजादा तो वो बजादा तो वो बजादा तो वो बजाद अद्राश्व्ट्याद्मक वर्ण्माला देवनाग्री और तिरहुता लिपी में वेवस्तित करनाही होगा, बिना संस्तागत समर्ठन के आप ये विशाल कोडिं का काम कैसे करेंगी? मुझे लकता है कि यही पर हम एक बडी भूल कर रहे है, तो उसे अंतराश्व्य दून्यात्मक वर्ण्माला देवनागरी और तिरहुता लिपी में वेवस्तित करना ही होगा. बिना संस्तागत समर्ठन के आप ये विशाल कोडिं का काम कैसे करेंगी? मुझे लकता है कि यही पर हम एक बडी भूल कर रहे है. अप मान रहे हैं के दिजिटल भून्यादी दाचा बनाने के लिए हमें भाशा की आत्मा को ही अंजनिर करना होगा अंजनिर नहीं बल की उसे सक्शम बनाना होगा लिकिन जब आप राज्य संस्ठाऊँ और कोशकारों को पूरी कमान सोप देते हैं तो आप दर असल नोकर शाही को बाशा में प्रवेश दे देते हैं बाशा एक प्रोजेक्त बन जाती है, औरजा सड़कों से हदखर अकाद मिक विषेशग्यों की मेज पराजा जाती है। फिर ये विषेशग्य तैकरने लकते हैं, की लोगों को कैसे बोलना चाही है अगर हमी से सही संदर में कहें, तो लेक्सिको ग्राफर्स की मेज पर ही उस सतिक्ता का जन्म होता है, जिसके बिना तक्नि कामी नहीं कर सकती. अच्छा कैसी सतिक्ता? चलिये, स्रोथ समगरी पर आते हैं और देखते हैं कि लेक्खो को ने वास्तम में क्या किया है. उनो ने पश्च्मी सिद्दान्तो का उप्योख कर के जटिल शब्दो का निरमान किया है उदारन के लिए उनो अनलोग के लिए सिम्मतिये शब्दे ग़ा है बाइत के लिए आश्टक का निरमान किया है और आलगारिदम को अबही मुक्ती विधिकल्प कहा है अग, माझफ की जेगा, लेकिन क्या सच्छ में? अबहीं मुक्ती विधिकल्प? आप, सत्तह पर ये अनुवाद लक्सकता है, लेकिन इसके पीचे के विग्यान को समजीए. बाइत, कम्पुटर विग्यान में 8 बिट्स का एक समुझ होता है. इसली उनोने संसक्रित की ज़द से आश्टक शब्द लिया ये महजेक शबद नहीं है ये बाशा की शमता का निरमान है जब कोई सोफ़र एंजीन्यर कल को मैठिली में अपरेटिंटिंग सिस्टम देशाँन करेगा तो उसे दीले डाले शब्दो की नहीं बल की इसी गनती ए सटीक्ता की आविषक्ता होगी? ये विग्यान हो सकता है, लेकिन अगर मुजे कमपूटो पर महिज एक फाटल खोलनी है, और मुजे ये कहा जाए, के माउसे क्लिक करने को, मैठली में मुष्किपंज दबा के मुचन कही, तो मैं शाइत कमपुटर ही बन्त कर दूंगी और करसर के लिए दिश्मान चमका इतनेदेशक चिन्द गडना मेरा मतलब है गडना ये सतीक्ता नहीं है ये भाशा पर अथ्त्याचार है अथ्याचार ये तोडा जेआदा हो गया बाशा अन्तत है अन्सानो के भीज समवागता एक उपकरन है कोई गड़ित का फरमूला नहीं आपको ये देखना होगा कि जिन बाशावने सप्फलता पुरवक तकनिक को अपनाया है उनहोने ये कैसे किया? अंगरेजी का ही उदारान लीजे जब कम्पूट़विज्यान विखसित हो रहा था, तो नोने लाटन या गरीख से बहरी भरकम शब नहीं गड़े. नोने अपने रोज मर्रा के शब्दों को बस एक नया अर्थ दे दिया. माوس, जो एक जान्वर था, दिवाईस बन गया, वेब यंटनेट बन गया, बग, सुफ्ट्वर का अरर बन गया. ये बाश्चा का प्रक्रितिग जैविक तरीका है, जब आप क्रित्रेम और इतने बारी शब्द गरते है, तो आप आम आद्मी को उसकी ही मात्रबाशा से दरारे होते हैं बास्तविक्ता यही है कि यह गड़ेविष्षब्द इस सोला कहन्डो वाले विशाल शब्द्कोष मेही दूल कहेंगे कोई आस्ली वकता एंका अस्तमाल नहीं करेगा मैं ये मानुगा की दिश्यमान, चमकेत, निर्देशक, चिन, जैसे शब्द पहली बार सुन्ने में, बोछग अजीब और भोजिल लकते हैं. आपकी ये बाद जायस है, की आम जिन्दिगी में कोई से नहीं बोलेगा. बिलकुल नहीं बोलेगा. लेकिन आपको इस शब्द्कोश के पीछे के उदेश्षे को समजना होगा इसे एक उदारेन से समचते हैं जैसे गाँ की पग दंदिया होती हैं वे बहुत प्राक्रुतिक होती हैं आप कही से भी मुर्षकते हैं ये हमारी लोक भाशा है अग, और लोग सदियों से उनपर चलते आए है. बलकल, लेकिन अगर आपको ट्रको से माल ढूलाई करनी है, पूरी आर्थ वेवस्था को चलाना है, तो आपको कनक्रीट के हैवे बनाने ही पड़िंगे. शुर्वात में जब हैवे बनते हैं तो वे बहत अप्राक्रूतिक लकते हैं लेकिन उनके बिना बहारी काम नहीं हो सकता जब 18 सदी में सैमिल जोंसन ने अंग्रेजी का पहला विवस्तित शब्द कोष बनाया या जब संसक्रित में आमर कोष लिखा गया तो उनका उदेश्छ ये नहीं ता, की आम लोग बजार में सबजी कहरीते समें उन सारे शब्डो का प्रियोग करें. तो फिर क्या उदेश्छ ये आ? उनका उदेश्छ ये एक रूट सिस्टम या आदार तयार करना था. अज भी आम भोल्चाल में सब कमपूटर ही कहते हैं कहते हैं, लेकिन जब भारद सरकार कोई अप्चारेक तकनी की नीती बनाती है, तो संगर अख शबद उस नीती को कानूनी और अकाडमिक वजन देता है. इस मैतली शब्द कोश का लक्षिये नहीं है, संगरक शब्द उस नीती को कानूनी और अकाटमिक वजन देता है इस मैतली शब्द कोश का लक्षिये नहीं है कोई यूा कैफे में बेटकर अभी मुक्ती विदिकल्प बोले इसका अस्ली लक्ष्ठ ये है कि कल को जब कोई उन्वर्सिती मेतली में कम्ठौटर साँईंस का पाटिक्रम शूरू करे, तो उनके पास एक मान की क्रित आदार हो. हाईवे करूपक बहुट शान्दार है. अं... लेकिन आप ये बहुल रहे है कि हाईवे वहाँ बनाय जाते हैं, यह ज़हां कोई आबादी हो जो उस हैवे का इस्तमाल करना चाती हो चार करोड वकता है मैठली के आप जर अब जर उन लोगो की बात करते है यह नी लक्षित उप्योग करता प्रफेसर सिंग की प्रस्तावना में जन गारना के आख़्ों का जो विष्लेशन है अदर बदादा है कि जमीनी हकीकत इन अकाटमिक कमरों से कितनी अलग है अथारसो इक्यानवे में गरीयासन के भाशाई सरवेक्षन कि अनुसार मैठली वक्ताउं कि संक्या लगबभग नभभे लाग थी फिर उनीसो इक्सट की जंगरना में ये संक्या आश्चर ये जनक रूप से गिरकर मात्र पचास लाक रह गगेई और ये राजनीतिक वजगों से ता और फिर 2001 में ये उचलकर एक दशम्लव दो एक करोड होगेगेगेगे विखच्छा उनीस्ट में अचानक लोग गायब हो गए थे? नहीं, ये हमें बताता है कि इस इलाके के लोग एक अत्यदिक जटिल बहुबाशिक हकिकत में जीते हैं. आज ये शेट्र बारा अन्ये बाशाँ के साजा किया जाता है. यहां का आम आदमी, हिन्दी, भोज्पूरी, मगही, और अंग्रेजी के बीच लगातार सुईच करता है. मेठली कोई अलक खलक द्वीप नहीं है. तो क्या उने उनकी भाशा में तकनी की शबद नहीं रहीं नहीं जाहीं है? मेरा मतलव है, कि जब वे अपने फोंपर, कोडिंग या वाट्साप के लिए, अंग्रेजी और हिंदी के तकनी की शब्डों का सपलता पूर्वक उप्योख कर रहे है, तो उनपर एक शुद्द और क्रत्रिम मेठली तकनी की शब्डावली क्यो थोपीजाए? जन्गनना के आख़ों का यह विषलेशन बिलकुल सकीख है लिकिन आब जो तर्क देरही हैं वो मुझे तोडा परिशान करता है क्यो? आप खेर रही हैं कि कि वो लोग बहु भाशी हैं और वे हिंदी या अंग्रेजी में काम चला लेते हैं इसलि हमे में मेतली में तकनी की शब्द बनाने की कोई जरूरत नहीं हैं यह तो एक तरह से भाशाई समरपन, यह नि लिंविस्टिक सरिंटर की वकालत करना हूँँँँ मैं समरपन की वकालत नहीं कर रही हूँँ जरा सोची ए, इसका मतलब क्या है? प्रुफेसर सिंग आपनी प्रस्तावना में स्पष्ट करते हैं कि इस पूरेक शेटर में बमुशकिल 3-5 प्रतिषत लोगी आऽसे हैं जो अंग्रेजी को प्रभावी द्हंख से लिख्या बोल सकते हैं बाखी पंचानवे प्रतिषत अबादिका क्या? जब आप उन पन्चानवे प्रतिषत लोगों को उनकी मात्र भाशा में तकनीकी ज्यान या दिजितल उपकरन नहीं देते, तो आप परोख्ष रुप से उने एक सन्टेश दे रहे होते हैं. आप उने बता रहे होते हैं की विग्यान, तकनीक और भविष्च, केवल अंग्रेजी बुलनेवालो की बपूथी है अईसा नहीं है और तुमारी जो मात्र भाशा है वो केवल त्योहारो में लोगी द्गाने के ही लायक है लिखखोने साइबर स्पेस के लिए सांगने का वकाश जैसा शब्द गडा है ये कुई जिद नहीं है, ये तकनीक को लोग्तान्त्रिक बनाने का प्रैयास है. नहीं, मैं समरपन की वकालत बलकुल नहीं कर रहीं। मैं बाशा के जैविक विकास और उसके स्वबहाविक लचीले पन की वकालत कर रहीं। अंग्रेजी या हिंदी से तकनी की शब्द सीदे तोर पर उदार लेना कोई रार नहीं है. ये तो बाशावों के जीवित रेने का सब से पुराना और प्राक्रतिक तरीका है प्रुफेसर सिंग खुध प्रस्तावना में इस बात को स्विकार करते है के आदूनिक बारतिय बाशावों में अंग्रेजी से उदार लेना बहुत आम बात है इस में कुज़ भी खलत या अप्मानजनक नहीं है उदार लेना टीक है लेकिन पुरा दिजिटल दाचा तो उदार नहीं लिया जासकताना जब भारत में पहली बार ट्रेन आईए तो हमने उसके लिए लोग पत गामीनी जैसा क्रित्रिम शब्द गडा लेकिन आम आद्मीने ट्रेन शब्द को ही आपनी भाशा में पचालिया. मैठिली के वकता बहुत समजदार है. वे आश्टक जैसे अप रिचित शब्द को रतने के बजाए, बाइत और क्लिक को अपने ध्वन्नियात्मक साथचे में डाल लेंगे. आप भाशा को पूरी तरहे से शुद्द बनाने की जो कोशिष कर रहे हैं, वो आसल में उनीस्वी सदी के राश्टर राजज़ वाली सोच है. लेकिन हम एक कीस्वी सदी के एक भेहद हाईब्रेट धिजिटल युग में है. यहां शुद्धाता से जाडा एहमियत इस बात की है, कि लोग कितनी आसानी से तक्दीक का अईस्तमाल कर पारहे हैं. मैं शुद्धाता की बात नहीं कर रहा, मैं सन्रचनात्मक मस्वुती की बात कर रहा हूं. लिकिन स्वाबहाविक बोली भी समय के साथ बड़लती है. बारन्माला में लाको तकनी की शब्डो का एक सुन्योजत रिकोट बनाते हैं तो हम भाशा को एक आसी सन्द्ष्नात्मक मस्बूती प्रदान करते हैं जिसे कोई मिता नहीं सकता. अगर कल को गुगल अपने सिस्टम को मैठली में डालना चाहे तो वे गाँँँँँ जाकर लोगों की बोली का सरवे नहींगे. वे एक मानकी क्रत लेक्सिकन माँगेंगे. ये शब्द कोश वही लेक्सिकन है. ये क्रित्रिम लक सकता है, लेक्सिको बाशा को दिजिटल विलुप्ती से बचाने का सबसे थोस तरीका है. अर मैं अंत में यही कहुंगी कि लेक्हो को और लेक्सिको ग्राफरस का यह प्रियास बोद्धिक रुप से बहुत विशाल है, मैं सके शम का सम्मान करती हूं. अब आप बाशा या वहाशा नहीं अपने प्रदी प्रदी प्रदी प्रदी प्रदी प्रदी प्रदी प्रदी प्रदी प्रदी प्रदी प्रदी प्रदी प्रदी प्रदी प्रदी प्रदी प्रदी प्रदी प्रदी प्रदी प्रदी प्रदी प्रदी प्रदी प्रदी प्रद अदिटल मशीनो के योग्गे बनाती है। और दूस्री तरफ है बभाशा के स्वत्तन्त्र जैविक जड़ें। तो तो तो तो अपना बनाती है। ये एक अचाईसा बोदिक तनाव है जिसका कोई आसान या सीथा उत्तर नहीं है एक तरव हमारे पास भाशा की एंजिनेरिंग है जोसे दिजिटल मशीनो के योग्गे बनाती है और दुस्री तरव है भाशा की स्वत्तन्त्र जैविक जड़ें यो से अईन्सानो के योगि बनाती है कोसी नदी के बारे में कहाजाता है कि वो अपना रास्ता खुट बनाती है वो किसी नक्षे की महताज नहीं होती बाशा भी बहुत रहत्तक वैसी ही है बिलकुल तो आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आ� आप आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आप श्वताँ के विवेख पर चोडते है, कि बाशा का बहुश्छ लबविष्छ लबविष्छ लबविष्छ लबविष्छ लबविष्छ लबविष्छ लबविष्छ लबविष्छ लबविष्छ लबविष्छ लबविष्छ लबविष्छ लबविष्छ लबविष्�