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खेती_से_कोडिंग_तक_मैथिली_थिसॉरस.m4a

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Part 7 · VIDEHA MITHILA MAITHILI DISCUSSION CRITICISM SERIES PART 7
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  1. 0:00–0:12अगर कोई ये दावा करे की एक आजी जगा है जहां सदीो पुरानी खेती के तरीके या फिर प्राषीन लोग गीत और और अग़्िनसानी फित्रत पर कसे गय तीखे तनज के साथ सात,
  2. 0:12–0:16मोडन कमपुटर स्व्ट्वेर का कोड भी मोजुद है. तो...
  3. 0:16–0:19तो शाइत पहली बार में इस बात पर यकीन करना बहुत मुझकल होगा
  4. 0:19–0:20बलकल
  5. 0:20–0:23मतलब आसा लगेगा जैसे किसीने इतिहास के पन्नो को सीदे
  6. 0:23–0:25सिलिकों वाली के सरवर के साथ जोर दियाो
  7. 0:25–0:26आप सईभात है
  8. 0:26–0:29लेकिन आजके हमारे जिहन अद्धियन में या कहें इस
  9. 0:29–0:32विशेश चर्चाँ में जो श्रोथ हमारे सामने है,
  10. 0:32–0:35उस में तीक एसा ही कुछ देखने को मिलता है.
  11. 0:35–0:39आजका विशेः कोई सादारन किताब या लेक नहीं है.
  12. 0:39–0:40ने भिलकोल नहीं.
  13. 0:40–0:42ये एक येसा दस्तावेज है,
  14. 0:42–0:45जो किसी समाज की रगो में दोडने वाले खून को,
  15. 0:45–0:47शब्दों के जरी हमारे सामने रखतेता है.
  16. 0:47–0:50आँ, और में बतादों की ये दस्तावेज है,
  17. 0:50–0:53अंग्रेजी मेठली तिसोरस.
  18. 0:53–0:55गजंद्र ताकुर दवारा तेयार किया यह ये,
  19. 0:55–0:56ये कोई आम शब्द कोष नहीं है.
  20. 0:56–0:58मलग ये एक एक हन्ट,
  21. 0:58–1:00यानी सिंगल वल्युमबर एक विशाल प्रोजेक्त है
  22. 1:01–1:06और इस में 3,01,989 ब्रविष्ट्टिया मोईजुद हैं
  23. 1:07–1:11औरे बाप्रे, इतनी सारी प्रविष्ट्टिया एक अकेले व्यक्ति दवारा
  24. 1:11–1:15इतने बड़े पैमाने पर शब्दों को संकलित करना
  25. 1:15–1:19विदे हनामक प्रथम मेठली पाखषिक एजरनल के तहाज चलने वाला एक निरन्तर गिटह प्रोजेक्त है.
  26. 1:19–1:21तो चल्ये इसे ज़राए से समझते है.
  27. 1:21–1:28आज हमारा मकसत केविल यह जानन न नहीं है कि अंगरेजी के किस शब्द को मेठली में क्या पुकारा जाता है.
  28. 1:28–1:35अज आमारा मक्सत केवल यह जानन नहीं है कि अंग्रेजी के किस शब्द को मैठिली में क्या पुकारा जाता है
  29. 1:35–1:37आप वो तो कोई भी दिक्षनरी बतादेगी
  30. 1:37–1:45सही कहा, हमारा उदेश उस तन्तर को दीकोड करना है, जो यह बताता है कि कैसे एक शब्द कोष असल में
  31. 1:45–1:48किसी कषेत्र, उसकी जमीन, उसके क्रिषी आदारिद जीवन
  32. 1:48–1:52और उसकी सुख्ष्मताओं का पुरा दीने होता है
  33. 1:52–1:57रहां, इक अईसा दीने जिसे पडने से हमें उस पूरी संसक्रती का बलूप्रिंट मिल जाता है.
  34. 1:57–2:02बिलकुल, और इस बलूप्रिंट को समजने की शिर्वात हम बिलकुल बुन्यादी चीज्से कर सकते हैं.
  35. 2:02–2:05मतलप ववन माला के पहले अख्षर ए से.
  36. 2:05–2:06आख्षर ए.
  37. 2:06–2:10स्रोथ्ट में एक अखषर के इतिहास पर जो विव्रन दियागया आना
  38. 2:10–2:14आहाँ वो किसी सस्पन्स ध्रिलर से कम नहीं है
  39. 2:14–2:16मैंने तो हमेशा यही माना ता की
  40. 2:16–2:19ए बस अंग्रेजी का एक अखषर है
  41. 2:19–2:21हम सब यही मानते है
  42. 2:21–2:51अगरेजी का अख्षर ए अचानक से किसी शुन्ने से पैडा नहीं हूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ�
  43. 2:51–2:53लेकिन कहानी यहावी नहीं रूबती
  44. 2:53–2:53हा?
  45. 2:53–2:56यूनानियों ने भी यस अच्छर काविषकार खुड नहीं किया था?
  46. 2:56–2:57अच्छा, तो नो नहीं कहाँ से लिया?
  47. 2:57–3:01नो नहीं से पिनीशिन वर्नमाला के पहले अच्छर अलिप से लिया था
  48. 3:01–3:31उग़ा दिए बाशावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावा�
  49. 3:31–3:35तो यूनानियो के सामने एक बडी समस्स्या कडी हो गे
  50. 3:35–3:36कैसी समस्या
  51. 3:36–3:39उनकी अपनी भाशा में स्वर धूनियो को लिखने के ले कोई
  52. 3:39–3:41अलकसे चिन् मुजुदी नी ते
  53. 3:41–3:44और स्वरों के बिना वे अपनी कविताया और साईते नहीं लिक सकते थे
  54. 3:44–3:46आा, तो उनो ने क्या क्या?
  55. 3:46–3:49उनो ने बहुती समाथ भाशाई जुगाड क्या
  56. 3:49–3:52उनो ने इस गले से बोले जाने वेंजन अलिप को
  57. 3:52–3:54को अपने काम के हिसाब से डल कर
  58. 3:54–3:57एक स्वर अल्फा में तब्deal कर दिया
  59. 3:57–4:27और और बवाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़
  60. 4:27–4:33बलकी बलके खुला राजमार गय, जहाग विचार और दून्या लगातार यात्रा करती रहती रहती है.
  61. 4:34–4:40और भाशा की यात्रा में केवल दून्या इनही, बलकी जटिल दार्षनिक विचार भी सपर करते है.
  62. 4:41–4:42आप आप मैंने भी स्रोट में ये देखा.
  63. 4:42–4:46अगर अम इस तिसवोरस के पन्नो में ग़राई से उतरें, तो ये देकर आश्चरे होता है,
  64. 4:46–4:52कि पश्च्टिमी दर्षन् स्शास्त्र, और कला से जुडे बहत विषिष्ट और अकाद्दमिक शब्दों को भी,
  65. 4:52–4:55भी मैठली में कितनी सहच्ता से सबष्ट किया गया है.
  66. 4:55–4:59उदारन के लिए संगीट की दून्या का एक इतालवी शब्द है
  67. 4:59–5:01एक पिला
  68. 5:01–5:05मुझे भी स्वोट परतेवे शब्द ने अपनी तरव कीचा
  69. 5:05–5:11एक आपिला का मतलब होता है बिना किसी वाद्ध्य यंप्र के स्फ गले से गाना
  70. 5:11–5:22तिस्वारुस इसे बहुत इस चती क्रूप से समजाता है, मतलब लिखा है, वाद्दिय संगत रहित पुरानी च्र्च शैली या च्र्च वा प्रात्नाग्रेश शैली में.
  71. 5:22–5:33इक शेट्री यब हाशा के शब्द कोश में यूरोपीय संगीत की इस पुरानी विदा को इस तरहां स्पष्ट करना यह सावित करता है कि दस्तावेज स्थ स्थ श्थ फ्फ चानी ये बातो तक सीमित नहीं है।
  72. 5:33–6:03और्शन्शास्त्रकिक शेट्र में तो ये दस्तावेज इमनानूल काँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ
  73. 6:03–6:06और दूस्री तरव एपोस्टीर्योरी है
  74. 6:06–6:07बलकोल
  75. 6:07–6:09जिसे अनुबवव जन्ने बताया गया है
  76. 6:09–6:14यान वो ग्यान जो जिसी प्रयोग को करने दून्या को देखने
  77. 6:14–6:17और साखचे कट्था करने के बाद प्राथ होता है
  78. 6:17–6:20जिसे हम आगमनात्मक या अईन्ट्टिप तर्क कहते हैं
  79. 6:20–6:26हूँ, इन बारी बरकं पश्विमि अव्दारनाव का मेठली में इतनी स्पष्टता से मोझुद होना
  80. 6:26–6:32ये बताता है कि ये बहाशा सरफ रोज मर्रा की बाद्षीट का सादन नहीं है
  81. 6:32–6:36ये किसी भी वैश्विक बोद्धिक विमरष्खा माद्दा रकती है.
  82. 6:36–6:37बिलकुल सही.
  83. 6:37–6:42जब कोई शब्द कोश, विदेशी दार्षनिक शब्दों को अपने भीतर जगा देता है,
  84. 6:42–6:47तो आसल में आपने बोलनेवालों किलिए दूनिया को समजने की एक नहीं क्डिखी कोल रहा होता है.
  85. 6:47–6:53जब उस गर की अपनी बुन्याद मस्वुत हो.
  86. 6:53–7:00इसलिये बाशा के इस वैशविक और दारशनिक आसमान से निकल कर अब हमे थोड़ जमीन की तरव बी देखना चाहीए.
  87. 7:00–7:02और वो जमीन बहुत ही उपजाओ है.
  88. 7:02–7:03वह आख.
  89. 7:03–7:07क्युकी श्रोथ का जो हिस्सा सबसे जयाद ध्यान खीच्टा है,
  90. 7:07–7:11वो मित्ला की क्रिष्ची और उसके जैव विवधथा से जुडा है
  91. 7:11–7:11बिलकुल
  92. 7:11–7:17इसे पड़तेवे एसा प्रतीथ होता है कि ये महेज अंग्रेजी से मेठली का अनवाद नहीं है
  93. 7:17–7:22बलकी एक खेती बाई और ग्रामीड जीवन का एक महाग गरन्त है
  94. 7:22–7:23हाँ
  95. 7:23–7:27स्रोथ्ट में दान और मच्छलीों की जो सुच्छीं आ दी गई है
  96. 7:27–7:30वे आज्टा लकते जेसे कभी कबी खटमी नी हूंगी
  97. 7:30–7:33और अगर किसी समाज के मुल्लिों और उसकी प्रात्मिक्ताउं को मापना हो
  98. 7:33–7:39तो हमेशा ये देखना चाही कि उस समाजने किस चीज किलिये सबसे जबदावली गडी है?
  99. 7:39–7:43जैसे कहा जाता है कि एसकीमो लोगों के पास बरफ किलिये कईशबद होते हैं
  100. 7:43–7:45बलकोल, किकि उकि उकि उकि जीवन उसी पर निरभर है
  101. 7:45–8:15और मिठ्छला के संदरप में वो निरभरता सबष्ष्ट्रूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ
  102. 8:15–8:21वो मांगो, तिंग्रा, बच्वा, भुला जैसी दरजनो प्रजातियों के नाम दरज हैं.
  103. 8:21–8:24बाध सिथ दान और मचली तक सीमित नहीं है,
  104. 8:24–8:28जमीन और मिट्टी के प्रकारों को परिभाषिट करने किलिए भी एक पुरी टिक्षनरी मोईजुद है.
  105. 8:29–8:29आच्छा?
  106. 8:29–8:30जैसे?
  107. 8:30–8:30जेसे?
  108. 8:30–8:34गोराहा, भीट, मतका, और दो मत.
  109. 8:34–8:40यहां तक की खेछ जोतने बेलो की भी इतनी सुखश मश्रेनिया बनाई गई नहीं की,
  110. 8:40–8:43की, की रर भेल की खास्यत उसके नाम से पता चल जाती है.
  111. 8:43–8:43औरे वा!
  112. 8:43–8:48जेसे चर्खा, यहनी सपेद भेल, लंग़, जो तोडा लंगला कर चलता हो,
  113. 8:48–8:51चवरा, जिसकी पूच चमर जैसी हो.
  114. 8:51–8:54आच्छा, यहा मुझे तोडा रूक कर एक सवाल उठाना है.
  115. 8:55–9:00क्या यह जानकारी की अदिकता, जिसे हम इन्फमेश्यन अवर्डव्ड कैते,
  116. 9:00–9:02वैसा मामला नहीं लकता.
  117. 9:02–9:03अगर लग लग.
  118. 9:03–9:07आज के समय में जब दुन्या इतनी तेजगती से आगे बड़रे है,
  119. 9:07–9:14किसी भी व्यक्ती को बैलों की दस अलग �alag-alag श्रेनियों या मिट्टी के पच्छीस प्रकारों को जानने की क्या जरूरत है.
  120. 9:14–9:15नहीं हूना चाही था?
  121. 9:30–9:33या आखा है जीवन बचाने का सादन
  122. 9:33–9:34सवाईटल टूल कित
  123. 9:34–9:36ये एक किसान के लिए
  124. 9:36–9:39मिट्टी का प्रकार सर्फ विग्यान की किताब का एक शब नहीं होता
  125. 9:39–9:43वो यह तैक अरता है कि उस साल उसके परवार को बहरपेट खाना मिलेगा या नहीं
  126. 9:43–9:45ये सवाईवल तूल कित कैसे काम करता है?
  127. 9:46–9:48इसे तोड़ा और विस्तार से समजाएएग.
  128. 9:48–9:51तो मान लिजे, कि किसी किसान के पास मत्का मिट्टी वाला केट है.
  129. 9:52–9:55ये मिट्टी पानी को ज़ादा देर तक रोक कर रकती है.
  130. 9:55–10:25तो उस में आजी फसल लगागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागाग
  131. 10:25–10:27ये ये कितने दिन में पक्कर तध्यारोगा.
  132. 10:27–10:31इतने सारे शब्द इस बात कब पुक्ता प्रमान है,
  133. 10:31–10:35के मित्ला के लोगों ने प्रक्रती को केवल दूर से निहारा नहीं है,
  134. 10:35–10:37बलके उसे बहुत बारी की से प्ड़ा है.
  135. 10:37–10:40और उसके हर मिजाज के हिसाब से अपने जीवन को ड़ाला है
  136. 10:40–10:44सुव से ज़ादा तरे के दान के नाम होना कोई शब्दाडंबर नहीं है
  137. 10:44–10:48यो समाज की खाथ दे सुरक्षा का एक अती विखसित तन्त्र है
  138. 10:48–10:52वाखगी ये नजर्या पूरे संदर्प को बबडल देता है
  139. 10:52–10:59यानी शब्द जितने ज्यादा विषिष्ट हुगे, प्रक्रती के सात उस समाज का रिष्टा उतना ही बारीक और गेह्रा हूगा.
  140. 10:59–11:00बलकुल सही.
  141. 11:00–11:05खेट और खलिहान से बाहर निकल कर, अगर हम अईनसानी समाज के भीतर जागे,
  142. 11:05–11:12तो मानव सवबहाव और रोज मर्रा के व्यवावार को दरशाने वाले शब्द भी कम दिलचस्त नहीं है.
  143. 11:12–11:16भाशा सर्फ काम की चीजे नहीं बताती. उस समाज का आईना भी होती है.
  144. 11:16–11:20जगा अईन्सान की कम्मियों, उसके आदतों
  145. 11:20–11:24और उसके हाज्से व्यंगे को बडी खुबसुर्ती से दर्ज किया जाता है.
  146. 11:24–11:29बाशा वास्तों में सामाजिक नियंट्रन का एक बहुत शक्तिशारी हत्यार अती है.
  147. 11:29–11:32कोई समाज आपने आस्पास के लोगों के वेवार को कैसे आखता है?
  148. 11:32–11:34यो उन शब्डो से पता चलता है,
  149. 11:34–11:36जो वे एक तुसरे के लिए अस्तमाल करते हैं?
  150. 11:36–11:41स्रोतो में अदतों को बयां करने वाले कुछ शब्द इतने सजीव हैं,
  151. 11:41–11:46कि उंका अंग्रेजी अनुवाद उनके आगे बहुत फीका लकता है
  152. 11:46–11:47जैसे कोंषे शब्द
  153. 11:47–11:50उदारन के लिए अंग्रेजी में अच्छेता बोक्स कहाजाता है
  154. 11:50–11:53जो काफी सादारन्सा लकता है
  155. 11:53–11:56लिकि मेठिली में इसके लिए शब्दिया गया है
  156. 11:56–11:57बद्बनुवा
  157. 11:57–11:59और वाज, बद्बन्वाज
  158. 11:59–12:04आँ, जो दिन बर बाते बनातर ए, जिसके बातो का कोई सिरा नहो
  159. 12:04–12:11या पिर एक और बहुत इप रासंगी कषब्द है, ए बलाईंड फोलोवाज, जिसके लिए मेठली षब्द है, पिद्दू
  160. 12:11–12:15पिद्दु, अगर हम पिद्दु शब्द के सामाजिक कारे काई काईईशने खेशन करें,
  161. 12:15–12:18तो ये सिफ इक शब नहीं, बलकी एक सामाजिक फैस्ला है.
  162. 12:18–12:20सामाजिक फैस्ला, वो कैसे?
  163. 12:20–12:25बिना सोचे समजे आग बन करके किसी के पीचे चलने वाले को जब पिद्दू कहा जाता है,
  164. 12:25–12:27तो उस में एक आँसा तीखा व्यंगे होता है,
  165. 12:27–12:30जो सामने वाले को उसकी बोद्धिक शुन्यता का अईसास करा देता है.
  166. 12:30–12:31हूँ, बलक्ल.
  167. 12:31–12:35ये दिखाता है कि वो समाज अंद भक्ती को किस नजरये से देखता था,
  168. 12:35–12:38और कैसे हास्से के जरये उस पर प्रहार करता था.
  169. 12:38–12:45इसी तरा ए वे मरसलस रेच यानी एक भेहद क्रूर और निरमव अन्सान के लिए चंडाल शबद का प्रयोग किया आगा है.
  170. 12:45–12:46आए चंडाल?
  171. 12:46–12:49जो अपने आप में एक फोफ पैडा करता है.
  172. 12:49–12:52और एक बहुती मजदार शबद है अकरन,
  173. 12:52–12:55जिस का मतलब है, एप परसन हुँ स्लीप स्मच
  174. 12:55–12:58मतलब जो अईन्सान अपनी नीन में दना कोया रहे,
  175. 12:58–13:00कि दून्या की किसी बात का उस पर आसर ना हो?
  176. 13:00–13:05हाँ, ये शब्द बताते है के अईन्सान की फित्रत सद्यों से एक जैसी ही रही है.
  177. 13:05–13:10बस बस हर संस्क्रिती ने उसपर तिप्ष्नी करने का अपना एक अलगन्दाजी जात कर लिया है.
  178. 13:10–13:11बलकुल.
  179. 13:11–13:17इन शब्डों से यह श्पष्ट होता है कि यह कोई रूखी सूखी यह महस तकनी की दिक्षनरी नहीं है.
  180. 13:17–13:20इस में मानवी एद़कन साफ मेशूस की जासकती है
  181. 13:20–13:25इसके अलावा समाच को जीवन्त बनाने वाली चीजें
  182. 13:25–13:30जेसे त्योहार, कला और कहानपान भी इसके पन्नो में गेराई से रचे बसे है
  183. 13:30–13:36त्यो रारो की बात करें, तो च्छत, यान च्छत पूजा और सत्वाएन का जिक्र मिलता है.
  184. 13:36–13:40भिल्ल्कुल, सत्वाएन केवल सत्वूखाने का दिन नहीं है.
  185. 13:40–13:45बलकी ये मोसम के बडलाव और नहीं फसल के अगमन का एक पूरा सांस्क्रितिक जच्ने है.
  186. 13:45–13:48और कला के शेत्र में जटा जटिन का नाम दर्ज है
  187. 13:48–13:52जो मित्फिला का एक पारंप्रेक लोकन्रत्योर प्रेम गाता है
  188. 13:52–13:56और किसी भी उच्सव का सबसे हैम हिस्सा होता है भोजन
  189. 13:56–13:57हा वो तो है
  190. 13:57–14:00स्रोत में मलपूँ रस्गुल्ला दही बडा चम्चम
  191. 14:00–14:02जैसी मिठायो के नाम मोगजुद है?
  192. 14:02–14:09ये महेंज विएंजनो के नाम नहीं है, ये वो शबद हैं जो किसी भी शोवव सर, शादी भ्या या महमान नवाजी की पूरी तस्वीर आखो के सामने कीच देते हैं.
  193. 14:09–14:14बिलकल, उट्सवों की इसी कडी में संगीत के वाद्द्य यंट्रों का भी जिक्राता है.
  194. 14:14–14:16अगर आखो के सामने कीच देते हैं.
  195. 14:16–14:20बलकोल. उट्सवों की इसी कडी में संगीद के वाद्धे यंट्रों का भी जिक राता है.
  196. 14:20–14:24संगीद की शब्दावली इस बात के प्रमान है कि इस समाज में
  197. 14:24–14:27शास्तरिया और लोक कलाओं का अदबुत संटुलन ता.
  198. 14:27–14:35तिसवरस में हमें सरोद, तानपुरा और सरंगी, यहनी सरंगी, जैसे गंभीर शास्तरी ये वाद्दे यंद्रों के नाम मिलते हैं.
  199. 14:35–14:40इसके तीक समझनतर खुर्दक जैसे अनोखे वाद्दे यंद्र का भी जिक रहे हैं.
  200. 14:40–14:42खुर्दक, ये क्या होता है?
  201. 14:42–14:45खुर्दक शहनाई के साथ बजने वाला एक चोटा डूल होता है,
  202. 14:45–14:48जो आम तोर पर मांगलिक कारियो में बजाया जाता है.
  203. 14:48–14:49आचा.
  204. 14:49–14:52ये दरषाता है की एक तरव जहां दरबारी या शास्तरी कलाउं का सम्मान ता,
  205. 14:52–14:56वही लोग संगीत की अप्मी एक �alag और मस्वुज जगागा थी
  206. 14:56–14:59यहाद तक पहुच्ते पहुच्ते ये बात पुरी तरा साभित हो जाती है
  207. 14:59–15:06की ये थिसवारिस परमपराव, लोग गीतो, क्रिषी और समाज का एक भेजोड एतिहासिक दस्तावेज है
  208. 15:06–15:07बिलकोल
  209. 15:07–15:10लिकिन यहाँ बात और भी दिल्च्छ फोजाती है
  210. 15:10–15:15किकि ये दस्तावे स्रफ अटीट की तरव पीट कर के नहीं कडा है
  211. 15:15–15:19ये पुरी शिद्दत के साथ भविश्ष्य की तरव भी देख्रा है
  212. 15:19–15:22श्रोथ का वो हिस्सा जो सबसे जाडदा चोगाने वाला है
  213. 15:22–15:27वो है पारमपर एक शब्डों की भीड के भीज एक आईटी गलोसरी की मोझुत की.
  214. 15:27–15:30आँ, सुचना प्रद्द्योगी की शब्दावली.
  215. 15:30–15:36और ये कुई नाम्मात्र की सुची नहीं है, इस में बाइस्सो चार प्रविष्टिया है,
  216. 15:36–15:41जो पूरी तरहा से, कम्वॆटर और दिज़़ल दून्या को समर्पित है
  217. 15:41–15:45थु एक प्राचीन और शेट्री आबाशा के शब्द कोश में
  218. 15:45–15:47अईटी शब्दावली का हुना कोई चोटी गटना नी है
  219. 15:47–15:50ये बाशा विग्यान के नजर्यय से एक बड़ बलाकगदम है
  220. 15:50–15:53ज़रा इस विरोदा भास और संगम की कलपना करें
  221. 15:53–15:56एक तरफ हमारे पास आरगा जैसा शबद है
  222. 15:56–15:57आरगा
  223. 15:57–15:59जो सदियो से दार्मे कनुष्टानो में
  224. 15:59–16:03जल या दूट च़ाने किले अस्तमाल होने वाला एक तामभे या पीटल का पात्र है
  225. 16:04–16:05और तीक उसी दस्ता वेज में
  226. 16:05–16:35यह जीट़ब आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ�
  227. 16:35–16:43जब ज़ेसे एक अथ्तिदिक तकनी की, कोडिग वाले प्लट्फोम का अस्तमाल, किसी शेट्रिए बहाशा के ले करते हैं,
  228. 16:43–16:49तो क्या इसे उस बहाशा का जो मोखिक अकर्षन है, औरल चाम वो खत्मनी हो जाता?
  229. 16:49–16:52ये एक बहुती जायस चिंता है.
  230. 16:52–16:59मतलब मैत्टिली जैसी बाशाइ, जो चोपालों, खेतों और दादी नानी की कहानिो में पिःए,
  231. 16:59–17:03किया उने इस तरहा एक दिजितल रिपोजटरी में मानकी करित करने से,
  232. 17:03–17:33वहाँ बाशा बज़ादा गदाई पर प्रजादाई पर प्रजादाई पर प्रजादाई पर प्रजादाई पर प्रजादाई पर प्रजादाई पर प्रजादाई पर प्रजादाई पर प्रजादाई पर प्रजादाई प्रजादाई पर प्रजादाई पर प्रजादाई प
  233. 17:33–18:03अच्छा तुरन्त इस प्रुज्ट में जोडा जाएजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाज
  234. 18:03–18:07अगर हम आजके इस पूरी चर्चा को समेटने की कोशिष करें
  235. 18:07–18:11तो गजेंद्र ताकृर का ये अंग्रेजी मेठली तिसवारस
  236. 18:11–18:14महेज शब्दो का एक संग्रहा नहीं है
  237. 18:14–18:18ये एक संसक्रती का चलता फिरता संग्रहाल है
  238. 18:18–18:21इस एक दस्तावेज के भीतर
  239. 18:21–18:25यूनानी दर्षन शास्त्र की अप प्रायोरी जैसी जटिल अवदारनाय भी है
  240. 18:26–18:29मित्फिला के खेट की दोमट मिट्टी की महेग भी है
  241. 18:30–18:35पिद्दू और बत्भनोवा जैसे शब्दों के जरये अनसान की फित्रत पर कसागया व्यंग भी है
  242. 18:35–18:39और और मलपुवा की मिट्हास के साथ साथ
  243. 18:39–18:43गिट्हप पर मोजुद एक दिजिटल भविष्ष्ष्वी की नीव भी है
  244. 18:43–18:44बहुत सही कहा
  245. 18:44–18:45और इस पूरी यात्रा के अंप में
  246. 18:45–18:47एक यासा विचार अबखर सामने आता है
  247. 18:47–18:50यह तो इस पर हम सब को बहुत गंविरता से विचार करना चाईएए.
  248. 18:50–18:51कैसा विचार?
  249. 18:51–18:53हमने चरचाय की, कि इस थिसट्शोरस में
  250. 18:53–18:57दान और मचलियों की दरजनो विषिष्ट प्रजातियों के नाम दरज हैं.
  251. 18:57–18:59बतासा दान, सुगा पंकि दान,
  252. 18:59–19:02अग, कतला बच्वा भोला मच्लिया
  253. 19:02–19:04अग, लेकिन आज जलवायु परीवर्टन,
  254. 19:04–19:06नदियों के प्रदूषन,
  255. 19:06–19:08और अंदादुन् अद्द्योगी करन के कारन,
  256. 19:08–19:12इन में से कईप्रजातिया विलुप्त होने की कगार पर पहुट चूकी है.
  257. 19:12–19:14उंग ये तो एक कदवी सच्चाई है,
  258. 19:14–19:19जमीने बंजर हो रही है, और नदिया अपने पुराने स्वरूब को खो रही है.
  259. 19:19–19:20बलकल.
  260. 19:20–19:23तो असली और सबसे गधरा सवाल ये है,
  261. 19:23–19:25कि जब आने वले समय में,
  262. 19:25–19:27केथ से वो बतासा,
  263. 19:27–19:29या सुगा पंकी दान,
  264. 19:29–19:36उब आप आप बज़ाईगा जब नद्यो में वो बच्वा या तिंग्रा मच्ली अपना अस्तित्व को देगी
  265. 19:37–19:41तब इस शब्द कोश में मोझुद उन शब्दों का क्या बहुविश्षे होगा
  266. 19:41–20:11अग आप बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद�
  267. 20:11–20:41अदियागा दियागा दियागा दियागा दियागा दियागा दियागा दियागा दियागा दियागा दियागा दियागा दियागा दियागा दियागा दियागा दियागा दियागा दियागा दियागा दियागा दियागा दियागा दियागा दियागा दियागा दियागा दिया
  268. 20:41–20:47अद़्ावेज ने कईई परते खोली है और सोचने के लिए एक बहुत बड़ा कैनवास चोर दिया है.
  269. 20:47–20:52मिलते है अगली चर्चा में एक नैविश्य और नैजान कारियो के साथ.

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अगर कोई ये दावा करे की एक आजी जगा है जहां सदीो पुरानी खेती के तरीके या फिर प्राषीन लोग गीत और और अग़्िनसानी फित्रत पर कसे गय तीखे तनज के साथ सात, मोडन कमपुटर स्व्ट्वेर का कोड भी मोजुद है. तो... तो शाइत पहली बार में इस बात पर यकीन करना बहुत मुझकल होगा बलकल मतलब आसा लगेगा जैसे किसीने इतिहास के पन्नो को सीदे सिलिकों वाली के सरवर के साथ जोर दियाो आप सईभात है लेकिन आजके हमारे जिहन अद्धियन में या कहें इस विशेश चर्चाँ में जो श्रोथ हमारे सामने है, उस में तीक एसा ही कुछ देखने को मिलता है. आजका विशेः कोई सादारन किताब या लेक नहीं है. ने भिलकोल नहीं. ये एक येसा दस्तावेज है, जो किसी समाज की रगो में दोडने वाले खून को, शब्दों के जरी हमारे सामने रखतेता है. आँ, और में बतादों की ये दस्तावेज है, अंग्रेजी मेठली तिसोरस. गजंद्र ताकुर दवारा तेयार किया यह ये, ये कोई आम शब्द कोष नहीं है. मलग ये एक एक हन्ट, यानी सिंगल वल्युमबर एक विशाल प्रोजेक्त है और इस में 3,01,989 ब्रविष्ट्टिया मोईजुद हैं औरे बाप्रे, इतनी सारी प्रविष्ट्टिया एक अकेले व्यक्ति दवारा इतने बड़े पैमाने पर शब्दों को संकलित करना विदे हनामक प्रथम मेठली पाखषिक एजरनल के तहाज चलने वाला एक निरन्तर गिटह प्रोजेक्त है. तो चल्ये इसे ज़राए से समझते है. आज हमारा मकसत केविल यह जानन न नहीं है कि अंगरेजी के किस शब्द को मेठली में क्या पुकारा जाता है. अज आमारा मक्सत केवल यह जानन नहीं है कि अंग्रेजी के किस शब्द को मैठिली में क्या पुकारा जाता है आप वो तो कोई भी दिक्षनरी बतादेगी सही कहा, हमारा उदेश उस तन्तर को दीकोड करना है, जो यह बताता है कि कैसे एक शब्द कोष असल में किसी कषेत्र, उसकी जमीन, उसके क्रिषी आदारिद जीवन और उसकी सुख्ष्मताओं का पुरा दीने होता है रहां, इक अईसा दीने जिसे पडने से हमें उस पूरी संसक्रती का बलूप्रिंट मिल जाता है. बिलकुल, और इस बलूप्रिंट को समजने की शिर्वात हम बिलकुल बुन्यादी चीज्से कर सकते हैं. मतलप ववन माला के पहले अख्षर ए से. आख्षर ए. स्रोथ्ट में एक अखषर के इतिहास पर जो विव्रन दियागया आना आहाँ वो किसी सस्पन्स ध्रिलर से कम नहीं है मैंने तो हमेशा यही माना ता की ए बस अंग्रेजी का एक अखषर है हम सब यही मानते है अगरेजी का अख्षर ए अचानक से किसी शुन्ने से पैडा नहीं हूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ� लेकिन कहानी यहावी नहीं रूबती हा? यूनानियों ने भी यस अच्छर काविषकार खुड नहीं किया था? अच्छा, तो नो नहीं कहाँ से लिया? नो नहीं से पिनीशिन वर्नमाला के पहले अच्छर अलिप से लिया था उग़ा दिए बाशावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावा� तो यूनानियो के सामने एक बडी समस्स्या कडी हो गे कैसी समस्या उनकी अपनी भाशा में स्वर धूनियो को लिखने के ले कोई अलकसे चिन् मुजुदी नी ते और स्वरों के बिना वे अपनी कविताया और साईते नहीं लिक सकते थे आा, तो उनो ने क्या क्या? उनो ने बहुती समाथ भाशाई जुगाड क्या उनो ने इस गले से बोले जाने वेंजन अलिप को को अपने काम के हिसाब से डल कर एक स्वर अल्फा में तब्deal कर दिया और और बवाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ा बाज़ बलकी बलके खुला राजमार गय, जहाग विचार और दून्या लगातार यात्रा करती रहती रहती है. और भाशा की यात्रा में केवल दून्या इनही, बलकी जटिल दार्षनिक विचार भी सपर करते है. आप आप मैंने भी स्रोट में ये देखा. अगर अम इस तिसवोरस के पन्नो में ग़राई से उतरें, तो ये देकर आश्चरे होता है, कि पश्च्टिमी दर्षन् स्शास्त्र, और कला से जुडे बहत विषिष्ट और अकाद्दमिक शब्दों को भी, भी मैठली में कितनी सहच्ता से सबष्ट किया गया है. उदारन के लिए संगीट की दून्या का एक इतालवी शब्द है एक पिला मुझे भी स्वोट परतेवे शब्द ने अपनी तरव कीचा एक आपिला का मतलब होता है बिना किसी वाद्ध्य यंप्र के स्फ गले से गाना तिस्वारुस इसे बहुत इस चती क्रूप से समजाता है, मतलब लिखा है, वाद्दिय संगत रहित पुरानी च्र्च शैली या च्र्च वा प्रात्नाग्रेश शैली में. इक शेट्री यब हाशा के शब्द कोश में यूरोपीय संगीत की इस पुरानी विदा को इस तरहां स्पष्ट करना यह सावित करता है कि दस्तावेज स्थ स्थ श्थ फ्फ चानी ये बातो तक सीमित नहीं है। और्शन्शास्त्रकिक शेट्र में तो ये दस्तावेज इमनानूल काँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ और दूस्री तरव एपोस्टीर्योरी है बलकोल जिसे अनुबवव जन्ने बताया गया है यान वो ग्यान जो जिसी प्रयोग को करने दून्या को देखने और साखचे कट्था करने के बाद प्राथ होता है जिसे हम आगमनात्मक या अईन्ट्टिप तर्क कहते हैं हूँ, इन बारी बरकं पश्विमि अव्दारनाव का मेठली में इतनी स्पष्टता से मोझुद होना ये बताता है कि ये बहाशा सरफ रोज मर्रा की बाद्षीट का सादन नहीं है ये किसी भी वैश्विक बोद्धिक विमरष्खा माद्दा रकती है. बिलकुल सही. जब कोई शब्द कोश, विदेशी दार्षनिक शब्दों को अपने भीतर जगा देता है, तो आसल में आपने बोलनेवालों किलिए दूनिया को समजने की एक नहीं क्डिखी कोल रहा होता है. जब उस गर की अपनी बुन्याद मस्वुत हो. इसलिये बाशा के इस वैशविक और दारशनिक आसमान से निकल कर अब हमे थोड़ जमीन की तरव बी देखना चाहीए. और वो जमीन बहुत ही उपजाओ है. वह आख. क्युकी श्रोथ का जो हिस्सा सबसे जयाद ध्यान खीच्टा है, वो मित्ला की क्रिष्ची और उसके जैव विवधथा से जुडा है बिलकुल इसे पड़तेवे एसा प्रतीथ होता है कि ये महेज अंग्रेजी से मेठली का अनवाद नहीं है बलकी एक खेती बाई और ग्रामीड जीवन का एक महाग गरन्त है हाँ स्रोथ्ट में दान और मच्छलीों की जो सुच्छीं आ दी गई है वे आज्टा लकते जेसे कभी कबी खटमी नी हूंगी और अगर किसी समाज के मुल्लिों और उसकी प्रात्मिक्ताउं को मापना हो तो हमेशा ये देखना चाही कि उस समाजने किस चीज किलिये सबसे जबदावली गडी है? जैसे कहा जाता है कि एसकीमो लोगों के पास बरफ किलिये कईशबद होते हैं बलकोल, किकि उकि उकि उकि जीवन उसी पर निरभर है और मिठ्छला के संदरप में वो निरभरता सबष्ष्ट्रूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ वो मांगो, तिंग्रा, बच्वा, भुला जैसी दरजनो प्रजातियों के नाम दरज हैं. बाध सिथ दान और मचली तक सीमित नहीं है, जमीन और मिट्टी के प्रकारों को परिभाषिट करने किलिए भी एक पुरी टिक्षनरी मोईजुद है. आच्छा? जैसे? जेसे? गोराहा, भीट, मतका, और दो मत. यहां तक की खेछ जोतने बेलो की भी इतनी सुखश मश्रेनिया बनाई गई नहीं की, की, की रर भेल की खास्यत उसके नाम से पता चल जाती है. औरे वा! जेसे चर्खा, यहनी सपेद भेल, लंग़, जो तोडा लंगला कर चलता हो, चवरा, जिसकी पूच चमर जैसी हो. आच्छा, यहा मुझे तोडा रूक कर एक सवाल उठाना है. क्या यह जानकारी की अदिकता, जिसे हम इन्फमेश्यन अवर्डव्ड कैते, वैसा मामला नहीं लकता. अगर लग लग. आज के समय में जब दुन्या इतनी तेजगती से आगे बड़रे है, किसी भी व्यक्ती को बैलों की दस अलग �alag-alag श्रेनियों या मिट्टी के पच्छीस प्रकारों को जानने की क्या जरूरत है. नहीं हूना चाही था? या आखा है जीवन बचाने का सादन सवाईटल टूल कित ये एक किसान के लिए मिट्टी का प्रकार सर्फ विग्यान की किताब का एक शब नहीं होता वो यह तैक अरता है कि उस साल उसके परवार को बहरपेट खाना मिलेगा या नहीं ये सवाईवल तूल कित कैसे काम करता है? इसे तोड़ा और विस्तार से समजाएएग. तो मान लिजे, कि किसी किसान के पास मत्का मिट्टी वाला केट है. ये मिट्टी पानी को ज़ादा देर तक रोक कर रकती है. तो उस में आजी फसल लगागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागागाग ये ये कितने दिन में पक्कर तध्यारोगा. इतने सारे शब्द इस बात कब पुक्ता प्रमान है, के मित्ला के लोगों ने प्रक्रती को केवल दूर से निहारा नहीं है, बलके उसे बहुत बारी की से प्ड़ा है. और उसके हर मिजाज के हिसाब से अपने जीवन को ड़ाला है सुव से ज़ादा तरे के दान के नाम होना कोई शब्दाडंबर नहीं है यो समाज की खाथ दे सुरक्षा का एक अती विखसित तन्त्र है वाखगी ये नजर्या पूरे संदर्प को बबडल देता है यानी शब्द जितने ज्यादा विषिष्ट हुगे, प्रक्रती के सात उस समाज का रिष्टा उतना ही बारीक और गेह्रा हूगा. बलकुल सही. खेट और खलिहान से बाहर निकल कर, अगर हम अईनसानी समाज के भीतर जागे, तो मानव सवबहाव और रोज मर्रा के व्यवावार को दरशाने वाले शब्द भी कम दिलचस्त नहीं है. भाशा सर्फ काम की चीजे नहीं बताती. उस समाज का आईना भी होती है. जगा अईन्सान की कम्मियों, उसके आदतों और उसके हाज्से व्यंगे को बडी खुबसुर्ती से दर्ज किया जाता है. बाशा वास्तों में सामाजिक नियंट्रन का एक बहुत शक्तिशारी हत्यार अती है. कोई समाज आपने आस्पास के लोगों के वेवार को कैसे आखता है? यो उन शब्डो से पता चलता है, जो वे एक तुसरे के लिए अस्तमाल करते हैं? स्रोतो में अदतों को बयां करने वाले कुछ शब्द इतने सजीव हैं, कि उंका अंग्रेजी अनुवाद उनके आगे बहुत फीका लकता है जैसे कोंषे शब्द उदारन के लिए अंग्रेजी में अच्छेता बोक्स कहाजाता है जो काफी सादारन्सा लकता है लिकि मेठिली में इसके लिए शब्दिया गया है बद्बनुवा और वाज, बद्बन्वाज आँ, जो दिन बर बाते बनातर ए, जिसके बातो का कोई सिरा नहो या पिर एक और बहुत इप रासंगी कषब्द है, ए बलाईंड फोलोवाज, जिसके लिए मेठली षब्द है, पिद्दू पिद्दु, अगर हम पिद्दु शब्द के सामाजिक कारे काई काईईशने खेशन करें, तो ये सिफ इक शब नहीं, बलकी एक सामाजिक फैस्ला है. सामाजिक फैस्ला, वो कैसे? बिना सोचे समजे आग बन करके किसी के पीचे चलने वाले को जब पिद्दू कहा जाता है, तो उस में एक आँसा तीखा व्यंगे होता है, जो सामने वाले को उसकी बोद्धिक शुन्यता का अईसास करा देता है. हूँ, बलक्ल. ये दिखाता है कि वो समाज अंद भक्ती को किस नजरये से देखता था, और कैसे हास्से के जरये उस पर प्रहार करता था. इसी तरा ए वे मरसलस रेच यानी एक भेहद क्रूर और निरमव अन्सान के लिए चंडाल शबद का प्रयोग किया आगा है. आए चंडाल? जो अपने आप में एक फोफ पैडा करता है. और एक बहुती मजदार शबद है अकरन, जिस का मतलब है, एप परसन हुँ स्लीप स्मच मतलब जो अईन्सान अपनी नीन में दना कोया रहे, कि दून्या की किसी बात का उस पर आसर ना हो? हाँ, ये शब्द बताते है के अईन्सान की फित्रत सद्यों से एक जैसी ही रही है. बस बस हर संस्क्रिती ने उसपर तिप्ष्नी करने का अपना एक अलगन्दाजी जात कर लिया है. बलकुल. इन शब्डों से यह श्पष्ट होता है कि यह कोई रूखी सूखी यह महस तकनी की दिक्षनरी नहीं है. इस में मानवी एद़कन साफ मेशूस की जासकती है इसके अलावा समाच को जीवन्त बनाने वाली चीजें जेसे त्योहार, कला और कहानपान भी इसके पन्नो में गेराई से रचे बसे है त्यो रारो की बात करें, तो च्छत, यान च्छत पूजा और सत्वाएन का जिक्र मिलता है. भिल्ल्कुल, सत्वाएन केवल सत्वूखाने का दिन नहीं है. बलकी ये मोसम के बडलाव और नहीं फसल के अगमन का एक पूरा सांस्क्रितिक जच्ने है. और कला के शेत्र में जटा जटिन का नाम दर्ज है जो मित्फिला का एक पारंप्रेक लोकन्रत्योर प्रेम गाता है और किसी भी उच्सव का सबसे हैम हिस्सा होता है भोजन हा वो तो है स्रोत में मलपूँ रस्गुल्ला दही बडा चम्चम जैसी मिठायो के नाम मोगजुद है? ये महेंज विएंजनो के नाम नहीं है, ये वो शबद हैं जो किसी भी शोवव सर, शादी भ्या या महमान नवाजी की पूरी तस्वीर आखो के सामने कीच देते हैं. बिलकल, उट्सवों की इसी कडी में संगीत के वाद्द्य यंट्रों का भी जिक्राता है. अगर आखो के सामने कीच देते हैं. बलकोल. उट्सवों की इसी कडी में संगीद के वाद्धे यंट्रों का भी जिक राता है. संगीद की शब्दावली इस बात के प्रमान है कि इस समाज में शास्तरिया और लोक कलाओं का अदबुत संटुलन ता. तिसवरस में हमें सरोद, तानपुरा और सरंगी, यहनी सरंगी, जैसे गंभीर शास्तरी ये वाद्दे यंद्रों के नाम मिलते हैं. इसके तीक समझनतर खुर्दक जैसे अनोखे वाद्दे यंद्र का भी जिक रहे हैं. खुर्दक, ये क्या होता है? खुर्दक शहनाई के साथ बजने वाला एक चोटा डूल होता है, जो आम तोर पर मांगलिक कारियो में बजाया जाता है. आचा. ये दरषाता है की एक तरव जहां दरबारी या शास्तरी कलाउं का सम्मान ता, वही लोग संगीत की अप्मी एक �alag और मस्वुज जगागा थी यहाद तक पहुच्ते पहुच्ते ये बात पुरी तरा साभित हो जाती है की ये थिसवारिस परमपराव, लोग गीतो, क्रिषी और समाज का एक भेजोड एतिहासिक दस्तावेज है बिलकोल लिकिन यहाँ बात और भी दिल्च्छ फोजाती है किकि ये दस्तावे स्रफ अटीट की तरव पीट कर के नहीं कडा है ये पुरी शिद्दत के साथ भविश्ष्य की तरव भी देख्रा है श्रोथ का वो हिस्सा जो सबसे जाडदा चोगाने वाला है वो है पारमपर एक शब्डों की भीड के भीज एक आईटी गलोसरी की मोझुत की. आँ, सुचना प्रद्द्योगी की शब्दावली. और ये कुई नाम्मात्र की सुची नहीं है, इस में बाइस्सो चार प्रविष्टिया है, जो पूरी तरहा से, कम्वॆटर और दिज़़ल दून्या को समर्पित है थु एक प्राचीन और शेट्री आबाशा के शब्द कोश में अईटी शब्दावली का हुना कोई चोटी गटना नी है ये बाशा विग्यान के नजर्यय से एक बड़ बलाकगदम है ज़रा इस विरोदा भास और संगम की कलपना करें एक तरफ हमारे पास आरगा जैसा शबद है आरगा जो सदियो से दार्मे कनुष्टानो में जल या दूट च़ाने किले अस्तमाल होने वाला एक तामभे या पीटल का पात्र है और तीक उसी दस्ता वेज में यह जीट़ब आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� जब ज़ेसे एक अथ्तिदिक तकनी की, कोडिग वाले प्लट्फोम का अस्तमाल, किसी शेट्रिए बहाशा के ले करते हैं, तो क्या इसे उस बहाशा का जो मोखिक अकर्षन है, औरल चाम वो खत्मनी हो जाता? ये एक बहुती जायस चिंता है. मतलब मैत्टिली जैसी बाशाइ, जो चोपालों, खेतों और दादी नानी की कहानिो में पिःए, किया उने इस तरहा एक दिजितल रिपोजटरी में मानकी करित करने से, वहाँ बाशा बज़ादा गदाई पर प्रजादाई पर प्रजादाई पर प्रजादाई पर प्रजादाई पर प्रजादाई पर प्रजादाई पर प्रजादाई पर प्रजादाई पर प्रजादाई पर प्रजादाई प्रजादाई पर प्रजादाई पर प्रजादाई प अच्छा तुरन्त इस प्रुज्ट में जोडा जाएजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाजाज अगर हम आजके इस पूरी चर्चा को समेटने की कोशिष करें तो गजेंद्र ताकृर का ये अंग्रेजी मेठली तिसवारस महेज शब्दो का एक संग्रहा नहीं है ये एक संसक्रती का चलता फिरता संग्रहाल है इस एक दस्तावेज के भीतर यूनानी दर्षन शास्त्र की अप प्रायोरी जैसी जटिल अवदारनाय भी है मित्फिला के खेट की दोमट मिट्टी की महेग भी है पिद्दू और बत्भनोवा जैसे शब्दों के जरये अनसान की फित्रत पर कसागया व्यंग भी है और और मलपुवा की मिट्हास के साथ साथ गिट्हप पर मोजुद एक दिजिटल भविष्ष्ष्वी की नीव भी है बहुत सही कहा और इस पूरी यात्रा के अंप में एक यासा विचार अबखर सामने आता है यह तो इस पर हम सब को बहुत गंविरता से विचार करना चाईएए. कैसा विचार? हमने चरचाय की, कि इस थिसट्शोरस में दान और मचलियों की दरजनो विषिष्ट प्रजातियों के नाम दरज हैं. बतासा दान, सुगा पंकि दान, अग, कतला बच्वा भोला मच्लिया अग, लेकिन आज जलवायु परीवर्टन, नदियों के प्रदूषन, और अंदादुन् अद्द्योगी करन के कारन, इन में से कईप्रजातिया विलुप्त होने की कगार पर पहुट चूकी है. उंग ये तो एक कदवी सच्चाई है, जमीने बंजर हो रही है, और नदिया अपने पुराने स्वरूब को खो रही है. बलकल. तो असली और सबसे गधरा सवाल ये है, कि जब आने वले समय में, केथ से वो बतासा, या सुगा पंकी दान, उब आप आप बज़ाईगा जब नद्यो में वो बच्वा या तिंग्रा मच्ली अपना अस्तित्व को देगी तब इस शब्द कोश में मोझुद उन शब्दों का क्या बहुविश्षे होगा अग आप बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद़ बद� अदियागा दियागा दियागा दियागा दियागा दियागा दियागा दियागा दियागा दियागा दियागा दियागा दियागा दियागा दियागा दियागा दियागा दियागा दियागा दियागा दियागा दियागा दियागा दियागा दियागा दियागा दियागा दिया अद़्ावेज ने कईई परते खोली है और सोचने के लिए एक बहुत बड़ा कैनवास चोर दिया है. मिलते है अगली चर्चा में एक नैविश्य और नैजान कारियो के साथ.

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