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विदेह_अंग्रेजी-मैथिली_शब्दकोष.mp4
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- 0:00–0:08तो चलीए आजके स्विष्लेषन में सीदे गोता लगाते हैं आज हम एक बहुत ही खास, भाशाई और संसक्रतिक सफर पे निकलने वाले हैं.
- 0:08–0:16हम बात कर रहे हैं विदेह अंग्रेजी मेठली शब्द कोश की, जो असल में सरफ एक बहरी भरकम किताब नहीं है,
- 0:16–0:23बलके एक पूरी कि पूरी संसक्रती की पहचान को सहेजने का एक बहुत ही शान्दार और बागिरत प्रयास है.
- 0:23–0:27आजकी इस चर्चा में हम कुछ दिल्चस्प पडावों से गुजरेंगे.
- 0:27–0:33सब से पहले लेक्सिको ग्राफी यानी शब्द कोश बनाने की कला का इतिहास देखेंगे.
- 0:33–0:38फिर मैठली भाशा के सांसक्रितिक शेत्रद और उसे बोलने वालो की गिनती पर नज़ाड़ेंगे.
- 0:38–0:42उसके बाद हम सीदे विदेज शब्द कोश पर्योजना
- 0:42–0:45और यश शान्दार दिक्षनरी के पन्नो के अंदर चलिएंगे.
- 0:45–0:49तो आए ये सब से बहले बात करते है लेक्सिको ग्राफी की कला
- 0:49–0:52और यसके बहुती दिल्चस्प वैश्विक इतिहास की.
- 0:52–0:55इन्सान के अंदर हमेशा से भाशाँ को समेटने
- 0:55–0:58और उने सहेजने की जवे गेरी इच्छा रही है ना
- 0:58–1:01ये उसी की कहनी है. अब सुच्ये
- 1:01–1:04दिक्शनरी बनाने का ये सवर शुरू कहा से हुए?
- 1:04–1:06ये सवर सच में बहुत पुराना है.
- 1:07–1:12सीर्या में मिली तेइस्सो इसा पूर्व की प्राचीन सुमेर्यन अक्काद्यन सब्सुच्यो से लेकर,
- 1:12–1:19पहली शताबदी के ग्रीक लेक्सिकोन और फिर चटी शताबदी में संसक्रित के महान आमर्कोष को देखे.
- 1:19–1:24और हाँ, सत्रासो पच्पन की सामूल जोंसन वाली अंग्रेजी टिक्षनरी तक आते आते,
- 1:24–1:27ये कला लगा तार निखठरती गई है.
- 1:27–1:33लेकिन आजके जमाने में एक सही आदूनिक दिक्षनरी बनाना कोई बच्छो का खेल नहीं है.
- 1:33–1:36इसके लिए बहुत इस सक्त दाचे की जरूरत होती है.
- 1:36–1:40जैसे की फनेटिक सिम्बल्स, यानी ध्वन्यात्मक प्रतिक होने चाही है,
- 1:40–1:43शब्दों के जडे कहा से जुडी है, इसका पता होना चाईए,
- 1:43–1:46और बोलिएँ के �alag alag roob bhi shamel ho ne chaye.
- 1:46–1:51मतलव, शब्दों को सुझप आलपबेट के हिसाप से लगाना ही कापी नहीं है,
- 1:51–1:53बलकी क्रोस रेफरेट्रन्स जैसे टूल्स भी चाएए,
- 1:53–1:56ताकि कोई भी ये से असानी से अस्तमाल कर सके.
- 1:56–2:00क्यर दिनिया बहरके यें दिक्षनरी मानको को समजने के बाद
- 2:00–2:02अब हम अपने दुस्रे पडाव की तरव बडदते है,
- 2:02–2:04मैठली संसक्रतिक शेट्र,
- 2:04–2:07यानी इस हुप्सुरत भाशा का बूगोल.
- 2:07–2:13आखेर विदे है दिक्षनरी जैसे इतने बड़े प्रुजेक्त की ज़ूरत पडी ही क्यो?
- 2:13–2:17और यही पर दिमाग में एक बहुत ही लाजमी सवाल आता है.
- 2:17–2:22आखेर ये मैठली बहाशा मुख्ये रूप से किन रिलाको में बोली जाती है.
- 2:22–2:25इसका अपना सांस्क्रितिक दाईरा कितना बडा है?
- 2:25–2:27इसका जवाब दोडा पेचीदा है.
- 2:27–2:31देखे, बिहार के गंगा के मैडानी इलाको से लेकर,
- 2:31–2:34निपाल के तराए शेट्र तक ये भाशा पहली हूँई है.
- 2:34–2:36लेकिन, दिल्च्यस्प बात ये है,
- 2:36–2:39की इसकी सीमाए पानी की तरल है.
- 2:39–2:40अप कोसी नदी को ही लेली जी,
- 2:40–2:44जिसने पिछले दोसो सालो में सात बार अपना रास्ता बडला है.
- 2:44–2:48उसके उपर से लगातार बनते, भिगरते, जिले, और राजनी तिग बडलाव,
- 2:48–2:53इन सबने इस भाशाई शेट्र की सीमाव को कभी एक जैसा ने रहने दिया.
- 2:53–2:57बूगोल की इस हल्चल को समजने के बाद अप तीसरे हिस से में आते है.
- 2:57–3:01वकताओ की ओईंती, ब्रामक देटा बनाम सच.
- 3:01–3:04जब हम जन सांख्खिकी या देमोग्राफिक्स को देखते है,
- 3:04–3:09तो इतिहास के पन्नो में एक बहुत इरहस्यमाई और थोडी उलजाने वाली तस्वीर सामने आती है.
- 3:10–3:13आदिकार एक जन गरना के इन आक्डो को देखिये,
- 3:13–3:18उननीस्स्सो एक्यावन से एक सथ के भीच मेठिली बोलने वालो की संख्या में
- 3:18–3:23अचानक बाइस प्रतिषत से भी जादा का उच्फाल दिक्रा है, ये कैसे मुमकिन है?
- 3:23–3:28प्रोफेसर उदैनाराएंच्खे मुताबेक ये अक्डे बिल्कुल अव वास्तविक है.
- 3:28–3:32उनका तरक है कि ये एक तरह की गलत जानकारी प्यलाए गब आई गई ती,
- 3:32–3:37ताकी क्रित्रम्रुब से हिंदी बोलनेवालो की संक्या को बडाच़ाकर दिखाया जासके.
- 3:38–3:42लेकिन अगर उन अजीबो गरीब सरकारी आक्डो को एक तरफ रख दें,
- 3:42–3:44तो अस्ली संक्या सच्मुच चोका आनेवाली है.
- 3:44–3:50अनुमान है की मैठिली बोलने वालो की वास्टविक संख्या करीब चार करोड है?
- 3:50–3:52जी हां चालीस मिल्यन लोग.
- 3:52–3:57जाहर है इतने बड़े जन समूए को अपनी भाश्षा सहेजने के लिए
- 3:57–4:00एक बेहत मस्वुद और समरपित तूल की जरूड तो थी ही.
- 4:00–4:04अगी आजी तो आप आप बजागा विद्यानन्द जागी कडी महनत का नतीजा
- 4:04–4:08अगी आजी तो आप बजागा विद्यानन्द जागी कडी महनत का नतीजा
- 4:08–4:12अगी अगी बजागा विद्यानन्द जागी कडी महनत का नतीजा
- 4:12–4:16अदिक्शनरी का वो जो मशुडवा मच्ली वाला प्रतीक हैं तुछ अग़ा इं चार करोड लोगों के लिए एक बहुत बड़े सांसक्रितिक मील के पत्धर कितर हैं.
- 4:17–4:20वैसे यहा एक बहुत्टी कमाल की बात देखने को मिलती है.
- 4:20–4:24विदेहा अंग्रेजी मैठ्टिली शब्द्खोश सामने आया
- 4:24–4:30गजेंद्र ताकोर, नागेंद्र कुमार जा, और पंजीकर विद्यानन्द जा की कडी महनत का जा
- 4:30–4:34इस दिक्षनरी का वो जो मशहुर जूडवा मच्ली वाला प्रतीक हैना
- 4:34–4:38वो इं चार करोड लोगों के लिए एक बहुत बड़े संसक्रितिक मील के पट्धर की पट्धर की तरा है.
- 4:38–4:42वैसे यहा एक बहुतिक कमाल की बात देखने को मिलती है.
- 4:42–4:46शुर्वात में मैठली को जो आदिकारिक सम्यदानिक मानिता नहीं मिली,
- 4:46–4:51वो असल में इसके लिए एक वर्दान साभेत हूए, प्रुफेसे सिंका ये कोड बलकु सतीक है,
- 4:51–4:57कि इसी उपेखषाने आग में गी का काम किया. इस से हुए ये कि भाशा को बोलनेवालो के
- 4:57–5:01अंदर अपनी प्चान बचाने की अईसी जद पैडा हूए, जिसने मैठली
- 5:01–5:04अगरेजी जैसी बाशा को मेठली के टेट सान्सक्रितिक साचे में
- 5:04–5:07डालने का ये बहारी बहरकं काम काम की आगे से.
- 5:07–5:10दर असल, दिक्षनरी बनाने वालो के सामने कोई चोटी
- 5:10–5:11मोटी चनाती नहीं ती.
- 5:11–5:14मेठली बाशा अकेले तो बोली नहीं जाए प्रजाए
- 5:14–5:17आई ए दिकते हैं कि इस दिक्षनरी को बनाने वालों ने,
- 5:17–5:22अंगरेजी जैसी बाशा को मेठली के टेट संसक्रितिक साचे में डालने का,
- 5:22–5:24ये बारी बहर्कं काम काम की आ कैसे?
- 5:24–5:28दर असल दिक्षनरी बनाने वालों के सामने कोई चोटी मोटी चनाती नहीं ती.
- 5:28–5:31मैत्ली बाशा अकेले तो बोली नहीं जाती,
- 5:31–5:35इसके आस्पास बाराह से जाडा अन्यक शेत्री अबचाशाए साच ले रही हैं.
- 5:35–5:40उपर से हिंदी, बोज्पूरी और मगही कभी इसपर गेरा प्रभाव है.
- 5:40–5:45अर सब से बड़ी बाद मुष्किल से पाज प्रतिषद मेठली बाशी आसे हूंगे,
- 5:45–5:47जो अच्छी अंग्रेजी बोल लेते हूं,
- 5:47–5:52जब की वो अपनी रोज मर्रा की जिन्दगी में अंग्रेजी के आदूनिक शब्डों को दड़ल्ले सिद्एम रहे हैं.
- 5:52–5:57अगना इक दम अनोकि स्तिती? विदे दिक्षनरी का ये जो द्वी भाशी टाइटलाब देक रहें
- 5:57–6:01वो इसी पूरे उल्जन को सुल्जाने का एक शान्दार तरीका है.
- 6:01–6:04इस में स्व्फ पूराने टेट शब्व्दो को ही नहीं
- 6:04–6:07बलकी उन अंग्रेजी शब्डो को भी जगा दीगगगे है,
- 6:07–6:10जिने मैठली ने पूरी तरहा से अपना लिया है.
- 6:10–6:13ये खास तोर पर उन लोगो के ले एक वर्दान है,
- 6:13–6:16जो अंग्रेजी उतनी अच्छी तरहा नहीं समचते,
- 6:16–6:19लेकिन अपनी भाशा में उसकपृत ज़रूर चाहते हैं
- 6:19–6:21अब जरा इसकी वर्तनी
- 6:21–6:23यानी अर्ठाग्रफी पर नज़र डालिए
- 6:23–6:26ये बहुत फी ज्यानेक और सतीक है
- 6:26–6:30एक दम सही उचारन के लिए इस में अपनेटिक आलपबेट
- 6:30–6:32यानी IPS symbols का इस्तमाल की आगया है
- 6:32–6:36और वो भी भिलकल पारमपरेक, देवनागरी और मितलाक्षर
- 6:36–6:39जिसे हम तिरहुता भी कैते है, उसके तीक सामने रक्खखगर.
- 6:39–6:44बाशा विग्यान को इतने सुन्दर और तकनी की रूप में पिरोया गया है कि क्या कहने?
- 6:44–6:49इसे और गेहराई से समझने के लिए इस एक प्रविष्टी यानी अंट्री को देख्ये.
- 6:50–6:54जैसे अंग्रेजी का एक शब्द है अबआन्दन अब इसे अनुवाद करने,
- 6:55–6:59ये बताने की ये ववव है या नाून, इसका सतीक फूनेटिक उच्चरन लिखने
- 6:59–7:04अप्र देवनागरी में इसका अथ बताने में जो बारी की और महनत
- 7:04–7:08लगी एना वो सच्मुच कमाल की है. इस चोटे से तेबल से वो पुरी
- 7:08–7:12महनत साथ चलकती है. और सब से अच्छी बात तो ये है की
- 7:12–7:16विदेह दिक्षनरी केवल किसी आल्मारी मैं सजी दूल
- 7:16–7:22अज ग़ादीवी किताब नहीं बल की ये भविश्ष्वे की तकनीक की तरव एक बहुड बडी च्छलाग है.
- 7:22–7:28आज के दिजिटल योग किलिए, अनलाई एजीन, वेब टेटाबेस, और मुबाल गलोसरी
- 7:28–7:58तो यह तो बवाड़ा बवाड़ा बवाड़ा बवाड़ा बवाड़ा बवाड़ा बवाड़ा बवाड़ा बवाड़ा बवाड़ा बवाड़ा बवाड़ा बवाड़ा बवाड़ा बवाड़ा बवाड़ा बवाड़ा बवाड़ा बवाड़ा बवाड़ा बवाड़ा बव
- 7:58–8:01बाशाई विरासत को हमेशा किलिए महफुज रक सकतेगा
- 8:01–8:05ये एक अईसा सवाल है जिस पर हम सब को ज़ुर विचार करना चाहीए
- 8:05–8:10क्यर आजके इस दिलचस बाशाई सबर में सात बने रहने किलिए बहुत बहुत शुक्रिया
Plain text
तो चलीए आजके स्विष्लेषन में सीदे गोता लगाते हैं आज हम एक बहुत ही खास, भाशाई और संसक्रतिक सफर पे निकलने वाले हैं. हम बात कर रहे हैं विदेह अंग्रेजी मेठली शब्द कोश की, जो असल में सरफ एक बहरी भरकम किताब नहीं है, बलके एक पूरी कि पूरी संसक्रती की पहचान को सहेजने का एक बहुत ही शान्दार और बागिरत प्रयास है. आजकी इस चर्चा में हम कुछ दिल्चस्प पडावों से गुजरेंगे. सब से पहले लेक्सिको ग्राफी यानी शब्द कोश बनाने की कला का इतिहास देखेंगे. फिर मैठली भाशा के सांसक्रितिक शेत्रद और उसे बोलने वालो की गिनती पर नज़ाड़ेंगे. उसके बाद हम सीदे विदेज शब्द कोश पर्योजना और यश शान्दार दिक्षनरी के पन्नो के अंदर चलिएंगे. तो आए ये सब से बहले बात करते है लेक्सिको ग्राफी की कला और यसके बहुती दिल्चस्प वैश्विक इतिहास की. इन्सान के अंदर हमेशा से भाशाँ को समेटने और उने सहेजने की जवे गेरी इच्छा रही है ना ये उसी की कहनी है. अब सुच्ये दिक्शनरी बनाने का ये सवर शुरू कहा से हुए? ये सवर सच में बहुत पुराना है. सीर्या में मिली तेइस्सो इसा पूर्व की प्राचीन सुमेर्यन अक्काद्यन सब्सुच्यो से लेकर, पहली शताबदी के ग्रीक लेक्सिकोन और फिर चटी शताबदी में संसक्रित के महान आमर्कोष को देखे. और हाँ, सत्रासो पच्पन की सामूल जोंसन वाली अंग्रेजी टिक्षनरी तक आते आते, ये कला लगा तार निखठरती गई है. लेकिन आजके जमाने में एक सही आदूनिक दिक्षनरी बनाना कोई बच्छो का खेल नहीं है. इसके लिए बहुत इस सक्त दाचे की जरूरत होती है. जैसे की फनेटिक सिम्बल्स, यानी ध्वन्यात्मक प्रतिक होने चाही है, शब्दों के जडे कहा से जुडी है, इसका पता होना चाईए, और बोलिएँ के �alag alag roob bhi shamel ho ne chaye. मतलव, शब्दों को सुझप आलपबेट के हिसाप से लगाना ही कापी नहीं है, बलकी क्रोस रेफरेट्रन्स जैसे टूल्स भी चाएए, ताकि कोई भी ये से असानी से अस्तमाल कर सके. क्यर दिनिया बहरके यें दिक्षनरी मानको को समजने के बाद अब हम अपने दुस्रे पडाव की तरव बडदते है, मैठली संसक्रतिक शेट्र, यानी इस हुप्सुरत भाशा का बूगोल. आखेर विदे है दिक्षनरी जैसे इतने बड़े प्रुजेक्त की ज़ूरत पडी ही क्यो? और यही पर दिमाग में एक बहुत ही लाजमी सवाल आता है. आखेर ये मैठली बहाशा मुख्ये रूप से किन रिलाको में बोली जाती है. इसका अपना सांस्क्रितिक दाईरा कितना बडा है? इसका जवाब दोडा पेचीदा है. देखे, बिहार के गंगा के मैडानी इलाको से लेकर, निपाल के तराए शेट्र तक ये भाशा पहली हूँई है. लेकिन, दिल्च्यस्प बात ये है, की इसकी सीमाए पानी की तरल है. अप कोसी नदी को ही लेली जी, जिसने पिछले दोसो सालो में सात बार अपना रास्ता बडला है. उसके उपर से लगातार बनते, भिगरते, जिले, और राजनी तिग बडलाव, इन सबने इस भाशाई शेट्र की सीमाव को कभी एक जैसा ने रहने दिया. बूगोल की इस हल्चल को समजने के बाद अप तीसरे हिस से में आते है. वकताओ की ओईंती, ब्रामक देटा बनाम सच. जब हम जन सांख्खिकी या देमोग्राफिक्स को देखते है, तो इतिहास के पन्नो में एक बहुत इरहस्यमाई और थोडी उलजाने वाली तस्वीर सामने आती है. आदिकार एक जन गरना के इन आक्डो को देखिये, उननीस्स्सो एक्यावन से एक सथ के भीच मेठिली बोलने वालो की संख्या में अचानक बाइस प्रतिषत से भी जादा का उच्फाल दिक्रा है, ये कैसे मुमकिन है? प्रोफेसर उदैनाराएंच्खे मुताबेक ये अक्डे बिल्कुल अव वास्तविक है. उनका तरक है कि ये एक तरह की गलत जानकारी प्यलाए गब आई गई ती, ताकी क्रित्रम्रुब से हिंदी बोलनेवालो की संक्या को बडाच़ाकर दिखाया जासके. लेकिन अगर उन अजीबो गरीब सरकारी आक्डो को एक तरफ रख दें, तो अस्ली संक्या सच्मुच चोका आनेवाली है. अनुमान है की मैठिली बोलने वालो की वास्टविक संख्या करीब चार करोड है? जी हां चालीस मिल्यन लोग. जाहर है इतने बड़े जन समूए को अपनी भाश्षा सहेजने के लिए एक बेहत मस्वुद और समरपित तूल की जरूड तो थी ही. अगी आजी तो आप आप बजागा विद्यानन्द जागी कडी महनत का नतीजा अगी आजी तो आप बजागा विद्यानन्द जागी कडी महनत का नतीजा अगी अगी बजागा विद्यानन्द जागी कडी महनत का नतीजा अदिक्शनरी का वो जो मशुडवा मच्ली वाला प्रतीक हैं तुछ अग़ा इं चार करोड लोगों के लिए एक बहुत बड़े सांसक्रितिक मील के पत्धर कितर हैं. वैसे यहा एक बहुत्टी कमाल की बात देखने को मिलती है. विदेहा अंग्रेजी मैठ्टिली शब्द्खोश सामने आया गजेंद्र ताकोर, नागेंद्र कुमार जा, और पंजीकर विद्यानन्द जा की कडी महनत का जा इस दिक्षनरी का वो जो मशहुर जूडवा मच्ली वाला प्रतीक हैना वो इं चार करोड लोगों के लिए एक बहुत बड़े संसक्रितिक मील के पट्धर की पट्धर की तरा है. वैसे यहा एक बहुतिक कमाल की बात देखने को मिलती है. शुर्वात में मैठली को जो आदिकारिक सम्यदानिक मानिता नहीं मिली, वो असल में इसके लिए एक वर्दान साभेत हूए, प्रुफेसे सिंका ये कोड बलकु सतीक है, कि इसी उपेखषाने आग में गी का काम किया. इस से हुए ये कि भाशा को बोलनेवालो के अंदर अपनी प्चान बचाने की अईसी जद पैडा हूए, जिसने मैठली अगरेजी जैसी बाशा को मेठली के टेट सान्सक्रितिक साचे में डालने का ये बहारी बहरकं काम काम की आगे से. दर असल, दिक्षनरी बनाने वालो के सामने कोई चोटी मोटी चनाती नहीं ती. मेठली बाशा अकेले तो बोली नहीं जाए प्रजाए आई ए दिकते हैं कि इस दिक्षनरी को बनाने वालों ने, अंगरेजी जैसी बाशा को मेठली के टेट संसक्रितिक साचे में डालने का, ये बारी बहर्कं काम काम की आ कैसे? दर असल दिक्षनरी बनाने वालों के सामने कोई चोटी मोटी चनाती नहीं ती. मैत्ली बाशा अकेले तो बोली नहीं जाती, इसके आस्पास बाराह से जाडा अन्यक शेत्री अबचाशाए साच ले रही हैं. उपर से हिंदी, बोज्पूरी और मगही कभी इसपर गेरा प्रभाव है. अर सब से बड़ी बाद मुष्किल से पाज प्रतिषद मेठली बाशी आसे हूंगे, जो अच्छी अंग्रेजी बोल लेते हूं, जब की वो अपनी रोज मर्रा की जिन्दगी में अंग्रेजी के आदूनिक शब्डों को दड़ल्ले सिद्एम रहे हैं. अगना इक दम अनोकि स्तिती? विदे दिक्षनरी का ये जो द्वी भाशी टाइटलाब देक रहें वो इसी पूरे उल्जन को सुल्जाने का एक शान्दार तरीका है. इस में स्व्फ पूराने टेट शब्व्दो को ही नहीं बलकी उन अंग्रेजी शब्डो को भी जगा दीगगगे है, जिने मैठली ने पूरी तरहा से अपना लिया है. ये खास तोर पर उन लोगो के ले एक वर्दान है, जो अंग्रेजी उतनी अच्छी तरहा नहीं समचते, लेकिन अपनी भाशा में उसकपृत ज़रूर चाहते हैं अब जरा इसकी वर्तनी यानी अर्ठाग्रफी पर नज़र डालिए ये बहुत फी ज्यानेक और सतीक है एक दम सही उचारन के लिए इस में अपनेटिक आलपबेट यानी IPS symbols का इस्तमाल की आगया है और वो भी भिलकल पारमपरेक, देवनागरी और मितलाक्षर जिसे हम तिरहुता भी कैते है, उसके तीक सामने रक्खखगर. बाशा विग्यान को इतने सुन्दर और तकनी की रूप में पिरोया गया है कि क्या कहने? इसे और गेहराई से समझने के लिए इस एक प्रविष्टी यानी अंट्री को देख्ये. जैसे अंग्रेजी का एक शब्द है अबआन्दन अब इसे अनुवाद करने, ये बताने की ये ववव है या नाून, इसका सतीक फूनेटिक उच्चरन लिखने अप्र देवनागरी में इसका अथ बताने में जो बारी की और महनत लगी एना वो सच्मुच कमाल की है. इस चोटे से तेबल से वो पुरी महनत साथ चलकती है. और सब से अच्छी बात तो ये है की विदेह दिक्षनरी केवल किसी आल्मारी मैं सजी दूल अज ग़ादीवी किताब नहीं बल की ये भविश्ष्वे की तकनीक की तरव एक बहुड बडी च्छलाग है. आज के दिजिटल योग किलिए, अनलाई एजीन, वेब टेटाबेस, और मुबाल गलोसरी तो यह तो बवाड़ा बवाड़ा बवाड़ा बवाड़ा बवाड़ा बवाड़ा बवाड़ा बवाड़ा बवाड़ा बवाड़ा बवाड़ा बवाड़ा बवाड़ा बवाड़ा बवाड़ा बवाड़ा बवाड़ा बवाड़ा बवाड़ा बवाड़ा बवाड़ा बव बाशाई विरासत को हमेशा किलिए महफुज रक सकतेगा ये एक अईसा सवाल है जिस पर हम सब को ज़ुर विचार करना चाहीए क्यर आजके इस दिलचस बाशाई सबर में सात बने रहने किलिए बहुत बहुत शुक्रिया