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मैथिली_शब्दकोश_और_डिजिटल_तकनीक_का_मेल.m4a
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- 0:00–0:24साल 2009 ये वो समय ता जब दूनिया में आईफों कब शुर्वाती ड़ चल रादा, पल अप सोषल मीट्या की लड़ बस शुगी हूई उई ती, और अप अप भाषा विग्यानी इक बहुती अलक तरेके मिष्झन पर काम कर रहे थे,
- 0:24–0:40मतलब वे इस बात कताना बाना बून रहे थे, की वी अईपी, वीटियो कोनफ्रिन्सिंग, या देटा पालेट, जैसी एक दम नई तकनी की अवदारनाव को एक अईची बहाशा में कैसे बोलाजाए, जिसकी जरें हसारो साल पुरानी क्रिषी और दरशन से जुडी है.
- 0:40–0:42ये वाके एक दिल्चवस्प कोंट्रास्ट है
- 0:42–0:44है ना, ये एक आँसा प्रयास था
- 0:44–0:46जो प्राची नितिहास
- 0:46–0:48और सिलिकोन वाली के भीजने एक सीथा पूल बना रा था
- 0:48–0:50तो चली इस पर तोरा विस्तार से चर्चा करते हैं
- 0:50–1:20अग़ा बावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावा
- 1:20–1:24तो बज़ाता है कि कोई संसक्रिती कैसे सांस लेती है
- 1:24–1:27या नहीं चुनातियों को कैसे सुएकार करती है
- 1:27–1:29और आजके स्विस्थ विष्ट्रित विष्ट्रेशन में
- 1:29–1:31हम जिस दस्तावेस को कंगालने वाले है
- 1:31–1:34उ बलकोल आजा ही एक संसक्रितिक पूल है
- 1:34–1:36मदव आज हमारे पास जो मुखिस्रोथ है,
- 1:36–1:39वर्ष 2009 में श्रूती पब्लिकेशन भारा प्रकाषित,
- 1:39–1:41मैत्ली अंग्रेजी शब्द्खोश है.
- 1:41–1:45जो की कोई चोटी मोटी पोकेट दिक्षनरी नहीं है.
- 1:45–1:46एक दम नहीं.
- 1:46–1:49ये एक से लेकर सोला कहन्डो में प्यलावा एक विशाल महागरन्ध है
- 1:49–1:53इसके पीछे गजें़र ताकूर, नागें़र कुमार जा
- 1:53–1:57और पंजीकार विद्यानन जा जैसे विद्वानो का बहुत बडाशोद है
- 1:57–2:04अज हमारा मिशन यही समजना है कि कैसे यह सोला कहन्डो का शब्दकोश महजेक व्याकरन का गरनत नहीं बलकी
- 2:04–2:14यह यह ताईमशीन है दिखे यह शब्दकोश की भव्यता का अंदाजा इसके अकार और इसकी कीमद से भी लगाया जासकता है
- 2:14–2:44वर्ष 2009 में इसकी कीमत पाथ सुर्पे या एक सो सार्ट आमेरीकी डॉलर रख्टी गई गई गई गई गई गई गई गई गई गई गई गई गई गई गई गई गई गई गई गई गई गई गई गई गई गई गई गई गई गई गई गई गई गई गई गई गई गई ग�
- 2:44–2:50तब आप निसके पन्ने देकते हैं तो रव शब्द को प्रस्थूट करने का तरीका वाखगे चोका देता है
- 2:50–2:52इस में इक त्री दिमेशनल द्रिष्टी कोन अपनाया गया है
- 2:52–2:55आप उद त्री आयामी द्रिष्टी कोन बहुत खास है
- 2:55–3:00बिल्कुल प्रतेग प्रविष्टी में सब से पहले अंतराश्व्ट्री ए द्वनियात्नक वण्माला
- 3:00–3:03जिसे हम आईपी ए कहते है, उसका अस्तमाल क्या गया है.
- 3:04–3:08फिर देलनागरी लिपी है, और उसके सात मेत्फिली की अपनी सबसे मुल लिपी
- 3:08–3:10मित्लाक्शर का भी उप्लोक की आगे
- 3:10–3:12ये बहुत यी वेग्यानिक सुच थी
- 3:12–3:18मतलब, ये किसी बाशा के लिए आदूनिक दोर का रोजेता स्टोन होने जैसा है
- 3:18–3:22जा एक ही जानकरी को एक हिंदी पडने वाला व्यकती
- 3:22–3:24प्राचीन लिप्यों का जानकार
- 3:24–3:26और एक अंतराश्ट्रे बाशा विग्यानी
- 3:26–3:29एक ही पनने पर एक साथ समथ सकते है
- 3:29–3:30एक दम सेखा आपने
- 3:30–3:33देके बाशा के मुल स्वरुप को सुरक्षिद रकने की
- 3:33–3:34ये विग्यानेग जिद ही
- 3:34–3:36इस काम को अतिहासिक बनाती है
- 3:36–3:39अद्र बारत के बहुत बड़े पाटक वरक से जुड देता है
- 3:39–3:42ताखि उने मेठली के शबद आसानी से समझ जाज़े
- 3:42–3:46बलकुल, लेकिन बाशा विग्यान के द्रिष्टी से
- 3:46–3:48सरफ देव नागरी कापी नहीं होती
- 3:48–3:50रब आपनी एक विषेष ध्हनी होती है
- 3:50–3:52इक विशेश उचारन श्यली होती है,
- 3:52–3:56जो किसी दूसरी लिपी में पुरी तरा से कभी निवतर पाती.
- 3:56–3:58यहनी अगर उचारन का सलीका को गया,
- 3:58–4:00तो समजो बाशा की आदिया आत्मा वही खतम होगगे.
- 4:00–4:01यही बाद है.
- 4:01–4:06और यही पर अप्योग एक वाश्टर श्टोग साभेत होता है
- 4:06–4:10अप्ये ये सुनिष्चित करता है कि बाशा का मुल उच्चारन कभी भी नक होए
- 4:10–4:16अगर आज से दोसो साल बाद दून्या की किसी तुसरे कोने में बैटा व्यक्ती इसे पड़ेगा
- 4:16–4:22तो भी वो IPA के माद्धियम से जान सकेगा की इसे सतीक तरीके से कैसे बोला जाता था.
- 4:22–4:24ये तो बहुती दूर्दर्षी सोच है.
- 4:24–4:29और रही बात मितलाक शर की तो उसे शामिल कर के लेक्खोने सर्फ एक लिपी को नहीं
- 4:29–4:31बलकी पूरी प्राचीन पहचान को सहज लिया है.
- 4:31–4:36लिकिन ये शब्द कोष शिव कागस के पननो तक खुद को सीमित नहीं रकता.
- 4:36–4:38आप इस में दिजितल पहलू भी है.
- 4:38–4:42भिल्कुल. श्रोथ में एक बहुती महतुपोंबात का जिकर किया आप यागे.
- 4:42–4:46इल्क्त्रानिक दोनो तरह के कोश में उप्योखता किलिए प्रवेश मार्क बतन.
- 4:46–4:50मतलब इसका सीदा आरत है कि इस में चफेवे संसक्रन के साथ साथ
- 4:50–4:53दिजितल अंट्र्फेस का भी पुरा द्यान रखा गया है.
- 4:53–4:55दिजितल पहुच की बात की गई है,
- 4:55–5:01ये स्वाबहावे क्रूब से बाशा को तकनीक की दुन्या से तक्राने पर मजबोर कर देता है.
- 5:01–5:05आईक तरव प्राचीन मितलाकशर और दुसरी तरव दिजितल दुन्या का अच्स बट्टन.
- 5:05–5:13बिल्कुल, ये सिद करता है के बाशा को बचाने का मतलब उसे किसी मॉзिम में सजाकर रखना नहीं है.
- 5:13–5:18बलकी, उसे आदूने कुपकरनो के अस्तिमाल के योग्य बनाना है.
- 5:18–5:20ये एक बहतरीं तर्क है.
- 5:20–5:23और ये हमें तकनीक के उस हसे की और लेजाता है,
- 5:23–5:25ज़हां ये दस्ताविज सब से जबते रहान करता है
- 5:26–5:29जब हम इस शब्द कोशके तकनीकी शब्द वाले हिस्चे को देखते है
- 5:30–5:31तो आसा लकता है ज़ेसे
- 5:31–5:33कलिफोरनिया के सिलिगन वली का
- 5:33–5:36मितला के किसी शांत गाँँ के साथ सीदा समवाद चल रहा हो
- 5:36–5:42तकनी की शब्दावली का निरमान करना, वाखे सब से बड़ी चनाउती होती है, किसी भी पारमपरी बाशा के लिए.
- 5:42–5:46और इन शब्दों की बनावड़ पर गोर करना दिलचास्प होगा.
- 5:46–5:50जसे एक शबद है, off-line काज करू, जिसका आर्थ है, work off-line.
- 5:50–5:54तिर एक शब्द है, अंकरा पालट यानी देटा पालट.
- 5:54–5:57ये अनवाद बहुत फीज शुच समच कर की एगा हैं.
- 5:57–6:01बिलकुल, इसके लावा आलोकन रीती जिस का मतलब है,
- 6:01–6:05हाईलाइट मोड, आवाज नियंत्रक, यानी वोल्युम कंट्रोल,
- 6:05–6:10और एक बहुती शान्दार प्रविष्टी है, बारा कांक्रामा लेगी,
- 6:10–6:13जिस का मतलब है, लिंक तु एकस्टरनल डेटा.
- 6:13–6:17दिके इन शब्डों को गडने के पीचे के लोगिक को समचना बहुत जरूरी है.
- 6:17–6:22ये स्र्व अंग्रेजी शब्दों का अंदादोंद या आल्ट्सी अनवाद नहीं है
- 6:22–6:24उदारन के लिए आलोकन रीती को हिलें
- 6:24–6:27आलोक का अर्थ होता है प्रकाश
- 6:27–6:28इक दम सही
- 6:28–6:31आलोक का अर्थ है प्रकाश या रोषनी मिलाना
- 6:31–6:34और रीती का अर्थ है तरीका या मोड
- 6:34–6:37तो, हाईलाइट मोड के लिए, आलोकन रीती एक आसा शबद है,
- 6:37–6:40जो तकनी की काम को भी समजारा है,
- 6:40–6:44और बाशा की आपनी पारमपलिक ज़ोग बी नहीं चोड रहा है.
- 6:44–6:47इसी तरब, डेटा के लिए अंकला,
- 6:47–6:50और पालेट को जोड कर अंकला पालेट बनाना भी कमाल है.
- 6:50–6:58लेगिन यह यह एक पहुत्ती स्वबाविक सवाल उटाए, वह किया किसी गाँ में बेटा वेक्ती, वाखगी आलोकन रीती जैसे सबडो का इस्तमाल करेगा?
- 6:58–7:02यह यह यह सिल विद्वानो के कमरे में ग़ा गया एक किताबी प्रेयोग है.
- 7:02–7:03उख़ेती जाए सवाल है
- 7:03–7:05मड़ब क्या किसी गाँ में बेटा वेक्ती
- 7:05–7:08वाखगी आलोकन रीती जैसे सबडो का इस्तमाल करेगा
- 7:09–7:12या ये सिल विद्वानो के कमरे में ग़ागया एक किताभी प्रेयोग है
- 7:13–7:13मैं सोच रा था
- 7:13–7:20कि ये आज़ाना के एक वीर हेट्सेट पहना दिया गया हो।
- 7:20–7:25लेकिन हैरानी की बात ये है कि वो बुजुर गुस गजेट से गबराता नहीं है
- 7:25–7:28बलकी उसे बिलकुल पता है कि इसके बटन कैसे दबान है
- 7:28–7:31दिक्ये ये बाशा विग्यान का एक गेरा सवाल है
- 7:31–7:36लेकिन बाशाये कोई रुकिवए जील नहीं होती, वे बहती नदी की तरह होती हैं.
- 7:36–7:38यानी उने समय के साथ बडलना परता है.
- 7:38–7:42बिलकुल, जब भी कोई नहीं तकनीक आती है,
- 7:42–7:44तो बाशा को नहीं शब्द गडने ही परते हैं.
- 7:44–7:46अगर वो यह अज़ा नहीं करेगी,
- 7:46–7:49तो लोग नहीं तक्निक का इस्तमाद करने किलिए,
- 7:49–7:53किसी दुसरी बहाशा जैसे अंग्रेजी का सहारा लेने लगेंगे.
- 7:53–7:57और दिरे-दिरे उनकी मात्र बहाशा अदूनिक जीवन से कडजाएगी.
- 7:57–8:00तो इन शब्दो को ठोपावा मानना सई नी होगा.
- 8:00–8:04इक्तम नहीं, ये किसी भी बाशा की सवाईवल स्वाईवल स्वाईवल श्वाईवल च्छी है
- 8:04–8:10और इस आत्मविष्वास का सब से बड़ा प्रमार वो शबत है जिस ने सब से जाडा द्यान कीचा है
- 8:10–8:13वी अविपी और वीट्टियो कुन्फ्रेंशिंग
- 8:13–8:43आई अई अई अगर नहीं तो बद्यागा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा ल�
- 8:43–8:46इसका इक बहुती खुबसुरत उदारन गरे लूप करनो में मिलता है
- 8:47–8:49शुब दियागे है, बैटी
- 8:49–8:52इसका इक बहुती खुबसुरत उदारन, गरेलूब करनो में मिलता है
- 8:53–8:55शुरोत में इक शब दिया गया है, बैटी
- 8:56–8:58इसका अर्थ बताया गया है, पैरो से दबाकर सबजीं कातने वाला हंस्या नुमा चाकू
- 8:59–9:01जिसे कई जगा हंस्या या दराती भी कहते है
- 9:01–9:05इसका एक बहुती खुबसुरत उदारन गरे लूपकरनो में मिलता है.
- 9:06–9:09शुबत में एक शब दिया गया है, बैटी.
- 9:10–9:14इसका अथ बताया गया है, पैरो से दबाकर सबजिया कातने वाला
- 9:15–9:16रनस्या नुमा चाकू।
- 9:17–9:19जिसे कई जगा रनस्या या दराती भी कहते है?
- 9:19–9:49आज बगाज बगाज बगाज बगाज बगाज बगाज बगाज बगाज बगाज बगाज बगाज बगाज बगाज बगाज बगाज बगाज बगाज बगाज बगाज बगाज बगाज बगाज बगाज बगाज बगाज बगाज बगाज बगाज बगाज बगाज बगाज ब
- 9:49–9:53तबजी कातने की वो पुरी परमपरा हमेशा के लिए तिहास से मिट जाएगी?
- 9:53–9:58यही बात शब्द कोष को एक मानव शास्तरिये दस्तावेज बनाती है.
- 9:58–10:04जब कोई शब्द मरता है, तो स्वफ अख्षर नहीं मरते, एक पूरी कला मर जाती है.
- 10:04–10:10इसी तरा, मिट्टी के बरतन पकाने वाड्टी के लिए आवावाशवद का जिक्र क्या गया है
- 10:10–10:16या सीधे तोर पर कुमानो के जीवन और उस्थानिया अर्थवेवस्था से जुडा है
- 10:16–10:21और आबूशनो की बात करें, तो समाज की सानस्क्रितिक बारी क्या और भी सपष्ट हो जाती है.
- 10:21–10:24एक शबद है, उनहन या उन्ठा.
- 10:25–10:28इसका अथ है, पैर की उंगलियो में पहने जाने वाले,
- 10:28–10:31विषेश चान्दी के आबूशन, जिसे तोरिंग भी केतें.
- 10:31–10:34ये विशेशर बुजुर्ग महिलाँ किलिए होता है
- 10:34–10:38येग आबूशन को उम्र और अवस्ता के साथ जोड कर देखना
- 10:38–10:42बताता है कि महिलाँ के श्रिंगार को लेकर कितनी गेहरी समज मोजुद है
- 10:42–10:44और जब भात एक ख्रिषी प्रदान समाज की होना
- 10:44–10:49तो खेती और कानपान के शब्डों के बिना कोई भी दस्तावे जदूरा है.
- 10:49–10:54इस शब्द कोश में बाक्ख्डा और बाक्सर जैसे शब्द दर्ज हैं,
- 10:54–10:58जो दान, यानी चावल की विषिष्ट किस्मों के नाम है.
- 10:58–11:01अदूनिक शहरी जीवन में तो चावल स्रिफ चावल होता है
- 11:01–11:04आँ या जेद़ से जेदा बास्मती होता है
- 11:04–11:07लेकिन एक क्रिषक समाज में जमीन की प्रक्रती
- 11:08–11:11उपपच के समए और स्वाद के अदार पर
- 11:11–11:13दार्जनो अलग �alag-alag-naam होते है
- 11:13–11:16ये उनके गेरे पर्यावरन गयान का सबूथ है
- 11:16–11:20खान पान के विग्यान का एक अर बहतरीन उदारन है अनहां
- 11:20–11:24इसका अर्ठ दिया गया है बाहरी गर्मी से बंद बरतन में उबालना
- 11:24–11:25जिसे आज हम स्लोग कुकिं कहतें
- 11:25–11:26भिल्कल
- 11:26–11:31आज दून्या के बड़़ बड़े श्व्व जिसे दंपुख्त या तर्मब्डानमिक्स के सिदान्त केते हैं
- 11:31–11:35उसके लिए इस पारंपरि ग्रामिल जीवन में सद्दियों से इतना सकीक शब्द मोझुद हैं
- 11:35–11:41ये दर्षाता है के रसोई महेंज खाना पकाने की जगा नहीं बलकी एक प्रयोग शाला थी.
- 11:41–11:46ये सब ही उदारन बताते हैं कि समाज बारी गरे लु कामो से कितनी गेराई से ज़़ा हूँ आथा
- 11:47–11:53जब तक ये शबद शबद कोश में सुरक्षित हैं, वो पुरा ग्यान विग्यान बवविष्वे की पीडियों के ले सुरक्षित हैं
- 11:53–11:57भी बाशा अवेशा नहीं बोद्धिक गेराई का सब से पार्दरशी आईना हुतीए,
- 11:58–12:02जो समाज अपने मानसिक ध्वन्वो को जितने बहतर तरीके समच्चता है,
- 12:02–12:10बाद्टिक संट्स्क्रती से निकल्कर जब हम मनोवेग्यानेक और सामाजिक सब्दों की और बडदते हैं तो एक रगी गेराई सामने आती हैं.
- 12:10–12:15देखे बाशा हमेशा समाज के बाद्टिक गेराई का सबसे पारदरषी आईना होती है.
- 12:15–12:45तो आप दोगान बाज़ा दोगान तो बग़ान तो बग़ान तो बग़ान तो बग़ान तो बग़ान तो बग़ान तो बग़ान तो बग़ान तो बग़ान तो बग़ान तो बग़ान तो बग़ान तो बग़ान तो बग़ान तो बग़ान तो बग़ान तो बग़ान तो बग
- 12:45–12:53लेकिन ये देखना अदबुत है के एक पारमपर एक भारती ये भाशागे पास इस जटिल मानसिक अवस्ता को विक्त करने के लिए,
- 12:53–12:57आत्म वंच्ना जैसा इतना दार्षनिक और मारक शब्द मोगुद है?
- 12:57–12:59मैं कहोंगी की ये एक बहुती मैट्वपून बिन्दू है
- 13:00–13:05ये जद्दारना को चुनाती देता है की पारमपर एक समाच केवल क्रिषी
- 13:05–13:06या हस्त कलातक सीमित ते
- 13:07–13:11जब आम भोल चाल में कुद को दोखा देने किलिए एक विषिष्ट शब्द होता है
- 13:11–13:16तो इसका मतलब है कि उनोने मानविय मनोविग्यान का बहुत बारीकी से द्धिन किया है
- 13:16–13:19विजानते थे कि बाहरी दुन्या से लडना असान है
- 13:19–13:22लेकेन अजान का सबसे बड़ा ब्रम उसका अपना मन होता है
- 13:22–13:26और ये वेचारिक स्पष्टता स्र्फ एक शब्द तक सीमित नहीं है
- 13:26–13:31जैसे आत्मापरन, जिसका अर्थ है समपून आत्म समर्पन,
- 13:31–13:37अद्द्द्यट्य यानुशासन हींता और बाक्ला यानी बहुत जाडा बोलने वाला
- 13:37–13:42आप ये शब्द मानव स्वबाव के रव गग को बहुती सुख्श्मता से पक्वड़ते हैं
- 13:42–13:49और वेक्तिगत मनोविग्यान के साथ सामाजिक ताने बाने को भी समजने किल ये शब्द कोश एक खिडिकी हैं
- 13:49–13:54जेसे समजिक सन्रचना में बाबन जेसे वर्ग सुथ्टक सब्द मोगुद हैं
- 13:54–13:56जो समाच के स्तरिकरन को दर्षाते हैं
- 13:56–13:57बलकुड.
- 13:57–14:01लेके अटिहासिक द्रिष्टी से जो चीज सबसे जबसे जआदा चोकाने वाली है
- 14:01–14:03वो है इस भाशा की समवेशिता.
- 14:03–14:08अइस समवेशिता का सबसे पुखता सबूथ है ओलिया और ओलिया जैसे शबद
- 14:08–14:13श्रोथ सबष्ट करता है कि ओलिया शबद अस्लामी सन्तो के ले अच्तमाल हुता है
- 14:13–14:17और उसी के समनानतर ओलिया यहनी सिद शबद भी मोगुद है
- 14:17–14:21ये जानकारी मित्छलाक शेटर के लिए विशेश रूप से रोचक है,
- 14:21–14:24जेसे अखसर रूडिवादी परमपराव का केंदर माना जाता है.
- 14:24–14:28ये बताता है कि ये कोई बन समाज नहीं ता,
- 14:28–14:34उस में सूफी विचार दाराओं और बहारी धरमों के संतों के प्रती भी एक गेरा सम्मान था.
- 14:34–14:38बाशा में सूफी संतों के लिए सम्मान जनक शब्दावली का गुल मिल जाना
- 14:38–14:41एक बहुती मस्बुत साजा संसक्रिती की तस्फीर पेष करता है.
- 14:41–14:45वाशा कभी भी उस चीस को नहीं अपनाती
- 14:45–14:47जिसे समाच अंदर से खारिच कर दे.
- 14:47–14:48एक दम सही.
- 14:48–14:51अगर ये शबद शबद कोश में तो इसका मतलब है कि
- 14:51–14:53वो संसक्रती लोगो की दिलो में ती.
- 14:53–14:56और इस वेचार एक सफर के शिखर पर जो सबद बैटा है ना
- 14:56–15:02वो है बादरायन, स्रोथ में स्पष्ष्वूप से बादरायन का जिक्र विदान्त के जनक के रुपने कि आगया है.
- 15:02–15:06इस के साथ ही आत्म्तत्व जैसे बहरी भरकम दार्चनिक शब्द बी मोजुद है.
- 15:06–15:12देखे एक एक क्रिषी प्रदान समाज में, जहां लोग बारिष्का अंदाजा लगाने में विस्त रहते हो,
- 15:12–15:20वहां वेदान्त और आत्म तत्वः पर चिंतन करने की शब्दावली कहोना एक बहुत बडा विरोद हवास लकता है.
- 15:20–15:24यही पारम पर एक समाजों की खास्यत रही है
- 15:24–15:27वि सर्व जमीन से नहीं जुडे थे
- 15:27–15:33बिल्कुल नहीं वि जीवन के अंतिम सत्यव और ब्रमाड़ के रहेस्यों पर भी गेरी बहेस करते थे
- 15:33–15:39ग्यान को समजना और उसे लागु करना इस समाज का एक मुल मुल लिए रहा है
- 15:39–15:44तो स्रोतों को गेराई से कंगालने, के इस सफर को अगर पीचे मुडकर देखाई,
- 15:44–15:48तो यह पूरी यात्रा किसी रोमाचा कोछ से कम नहीं।
- 15:48–15:51श्रुवात में यह विचार सामने आया आता, के एक शब्द कोश,
- 15:51–15:55अपने बदलती दुनिया में अपनी पहँजान को कैसे काईम रकता है
- 15:55–16:01हमने मिठलाक्षर से बाज शुग की और देखा की कैसे वोही भाशा वी उइपी
- 16:01–16:05तो बज़़़़़़़़ की ये महेज अनुवाद करने का तूल नहीं है,
- 16:05–16:09ये सब़्द्यता की साँसों को महेज्सुस करने का एक जर्या है।
- 16:09–16:15अग, ये बताता है कि कोई भी समवदाई बदलती दुनिया में अपनी पहँचान को कैसे काईम रकता है.
- 16:15–16:23हमने मितलाक्षर से बाज शुरू की और देखा कि कैसे वोही भाशा वी वीवोईपी वीटिो कोंफरन्सिंग के साथ आदूनेक युग में कहडी है.
- 16:23–16:30अमने सबजी काटने की बेटी से लेकर आत्म वनचना और बाद्रायन तक का सपरताय किया
- 16:30–16:34जो ये साभित करता है कि जो समाज अपने शब्दो को सहेज लेता है
- 16:34–16:36वो अनतता अपनी आत्मा को सहेज लेता है
- 16:36–16:37दिलकोल
- 16:37–16:40अब इस चर्चा को विराम देने से पहले
- 16:40–16:45एक आँ सावाल पिछे चुड़ाता है, जिस पर गंभीरता से विचार किया जाना जाहीए.
- 16:45–16:51आजके दोर में हम सब समाथफोंज और सोषल मीट्या की अजीबो गरीब दुन्या में गिरे हुए है.
- 16:51–16:57अम रोज मरा के जीवन में कुछ अईसे खास, सलांगs और शोट कर्ट सिस्तमाल करते हैं,
- 16:57–17:00जो हमारी आज की तकनी की निरभरता को दर्षाते हैं.
- 17:00–17:03राँ भाशा बहुत तेजी से बड़ल रही हैं.
- 17:03–17:08तो अगर आज के हमारे इं देनिक जीवन में स्तमाल होने वाले,
- 17:08–17:12इन नीजी तकनी की शब्डों का कोई अज़े ही विस्त्रिच शब्ट्खोश बनाया जाए
- 17:12–17:15और उसे एक बक्से में बन्द कर के रग दिया जाए
- 17:15–17:19तो बहुविष्खे के तिहास कार जब सो साल बाद उस शब्ट्खोश को खोजेंगे
- 17:19–17:23तो वे शब्द हमारी आजकी संसक्रिती के बारे में क्या कहानी सूनाएंगे?
- 17:23–17:25ये वाखगे ये बहुत ये गेरा विचार है?
- 17:25–17:29या वो बहुविष्य का शब्द कोश नहें हमारी किसी वेचारिग गेराई के बारे में बताएगा?
- 17:29–17:41यह उ स्व्व और उज़्ने के लिए थाई तो बज़ाएगा तो बज़ाएगा तो बज़ाएगा तो बज़ाएगा तो बज़ाएगा तो बज़ाएगा तो बज़ाएगा तो बज़ाएगा तो बज़ाएगा तो बज़ाएगा तो बज़ाएगा तो बज़ाएगा तो बज
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साल 2009 ये वो समय ता जब दूनिया में आईफों कब शुर्वाती ड़ चल रादा, पल अप सोषल मीट्या की लड़ बस शुगी हूई उई ती, और अप अप भाषा विग्यानी इक बहुती अलक तरेके मिष्झन पर काम कर रहे थे, मतलब वे इस बात कताना बाना बून रहे थे, की वी अईपी, वीटियो कोनफ्रिन्सिंग, या देटा पालेट, जैसी एक दम नई तकनी की अवदारनाव को एक अईची बहाशा में कैसे बोलाजाए, जिसकी जरें हसारो साल पुरानी क्रिषी और दरशन से जुडी है. ये वाके एक दिल्चवस्प कोंट्रास्ट है है ना, ये एक आँसा प्रयास था जो प्राची नितिहास और सिलिकोन वाली के भीजने एक सीथा पूल बना रा था तो चली इस पर तोरा विस्तार से चर्चा करते हैं अग़ा बावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावा तो बज़ाता है कि कोई संसक्रिती कैसे सांस लेती है या नहीं चुनातियों को कैसे सुएकार करती है और आजके स्विस्थ विष्ट्रित विष्ट्रेशन में हम जिस दस्तावेस को कंगालने वाले है उ बलकोल आजा ही एक संसक्रितिक पूल है मदव आज हमारे पास जो मुखिस्रोथ है, वर्ष 2009 में श्रूती पब्लिकेशन भारा प्रकाषित, मैत्ली अंग्रेजी शब्द्खोश है. जो की कोई चोटी मोटी पोकेट दिक्षनरी नहीं है. एक दम नहीं. ये एक से लेकर सोला कहन्डो में प्यलावा एक विशाल महागरन्ध है इसके पीछे गजें़र ताकूर, नागें़र कुमार जा और पंजीकार विद्यानन जा जैसे विद्वानो का बहुत बडाशोद है अज हमारा मिशन यही समजना है कि कैसे यह सोला कहन्डो का शब्दकोश महजेक व्याकरन का गरनत नहीं बलकी यह यह ताईमशीन है दिखे यह शब्दकोश की भव्यता का अंदाजा इसके अकार और इसकी कीमद से भी लगाया जासकता है वर्ष 2009 में इसकी कीमत पाथ सुर्पे या एक सो सार्ट आमेरीकी डॉलर रख्टी गई गई गई गई गई गई गई गई गई गई गई गई गई गई गई गई गई गई गई गई गई गई गई गई गई गई गई गई गई गई गई गई गई गई गई गई गई गई ग� तब आप निसके पन्ने देकते हैं तो रव शब्द को प्रस्थूट करने का तरीका वाखगे चोका देता है इस में इक त्री दिमेशनल द्रिष्टी कोन अपनाया गया है आप उद त्री आयामी द्रिष्टी कोन बहुत खास है बिल्कुल प्रतेग प्रविष्टी में सब से पहले अंतराश्व्ट्री ए द्वनियात्नक वण्माला जिसे हम आईपी ए कहते है, उसका अस्तमाल क्या गया है. फिर देलनागरी लिपी है, और उसके सात मेत्फिली की अपनी सबसे मुल लिपी मित्लाक्शर का भी उप्लोक की आगे ये बहुत यी वेग्यानिक सुच थी मतलब, ये किसी बाशा के लिए आदूनिक दोर का रोजेता स्टोन होने जैसा है जा एक ही जानकरी को एक हिंदी पडने वाला व्यकती प्राचीन लिप्यों का जानकार और एक अंतराश्ट्रे बाशा विग्यानी एक ही पनने पर एक साथ समथ सकते है एक दम सेखा आपने देके बाशा के मुल स्वरुप को सुरक्षिद रकने की ये विग्यानेग जिद ही इस काम को अतिहासिक बनाती है अद्र बारत के बहुत बड़े पाटक वरक से जुड देता है ताखि उने मेठली के शबद आसानी से समझ जाज़े बलकुल, लेकिन बाशा विग्यान के द्रिष्टी से सरफ देव नागरी कापी नहीं होती रब आपनी एक विषेष ध्हनी होती है इक विशेश उचारन श्यली होती है, जो किसी दूसरी लिपी में पुरी तरा से कभी निवतर पाती. यहनी अगर उचारन का सलीका को गया, तो समजो बाशा की आदिया आत्मा वही खतम होगगे. यही बाद है. और यही पर अप्योग एक वाश्टर श्टोग साभेत होता है अप्ये ये सुनिष्चित करता है कि बाशा का मुल उच्चारन कभी भी नक होए अगर आज से दोसो साल बाद दून्या की किसी तुसरे कोने में बैटा व्यक्ती इसे पड़ेगा तो भी वो IPA के माद्धियम से जान सकेगा की इसे सतीक तरीके से कैसे बोला जाता था. ये तो बहुती दूर्दर्षी सोच है. और रही बात मितलाक शर की तो उसे शामिल कर के लेक्खोने सर्फ एक लिपी को नहीं बलकी पूरी प्राचीन पहचान को सहज लिया है. लिकिन ये शब्द कोष शिव कागस के पननो तक खुद को सीमित नहीं रकता. आप इस में दिजितल पहलू भी है. भिल्कुल. श्रोथ में एक बहुती महतुपोंबात का जिकर किया आप यागे. इल्क्त्रानिक दोनो तरह के कोश में उप्योखता किलिए प्रवेश मार्क बतन. मतलब इसका सीदा आरत है कि इस में चफेवे संसक्रन के साथ साथ दिजितल अंट्र्फेस का भी पुरा द्यान रखा गया है. दिजितल पहुच की बात की गई है, ये स्वाबहावे क्रूब से बाशा को तकनीक की दुन्या से तक्राने पर मजबोर कर देता है. आईक तरव प्राचीन मितलाकशर और दुसरी तरव दिजितल दुन्या का अच्स बट्टन. बिल्कुल, ये सिद करता है के बाशा को बचाने का मतलब उसे किसी मॉзिम में सजाकर रखना नहीं है. बलकी, उसे आदूने कुपकरनो के अस्तिमाल के योग्य बनाना है. ये एक बहतरीं तर्क है. और ये हमें तकनीक के उस हसे की और लेजाता है, ज़हां ये दस्ताविज सब से जबते रहान करता है जब हम इस शब्द कोशके तकनीकी शब्द वाले हिस्चे को देखते है तो आसा लकता है ज़ेसे कलिफोरनिया के सिलिगन वली का मितला के किसी शांत गाँँ के साथ सीदा समवाद चल रहा हो तकनी की शब्दावली का निरमान करना, वाखे सब से बड़ी चनाउती होती है, किसी भी पारमपरी बाशा के लिए. और इन शब्दों की बनावड़ पर गोर करना दिलचास्प होगा. जसे एक शबद है, off-line काज करू, जिसका आर्थ है, work off-line. तिर एक शब्द है, अंकरा पालट यानी देटा पालट. ये अनवाद बहुत फीज शुच समच कर की एगा हैं. बिलकुल, इसके लावा आलोकन रीती जिस का मतलब है, हाईलाइट मोड, आवाज नियंत्रक, यानी वोल्युम कंट्रोल, और एक बहुती शान्दार प्रविष्टी है, बारा कांक्रामा लेगी, जिस का मतलब है, लिंक तु एकस्टरनल डेटा. दिके इन शब्डों को गडने के पीचे के लोगिक को समचना बहुत जरूरी है. ये स्र्व अंग्रेजी शब्दों का अंदादोंद या आल्ट्सी अनवाद नहीं है उदारन के लिए आलोकन रीती को हिलें आलोक का अर्थ होता है प्रकाश इक दम सही आलोक का अर्थ है प्रकाश या रोषनी मिलाना और रीती का अर्थ है तरीका या मोड तो, हाईलाइट मोड के लिए, आलोकन रीती एक आसा शबद है, जो तकनी की काम को भी समजारा है, और बाशा की आपनी पारमपलिक ज़ोग बी नहीं चोड रहा है. इसी तरब, डेटा के लिए अंकला, और पालेट को जोड कर अंकला पालेट बनाना भी कमाल है. लेगिन यह यह एक पहुत्ती स्वबाविक सवाल उटाए, वह किया किसी गाँ में बेटा वेक्ती, वाखगी आलोकन रीती जैसे सबडो का इस्तमाल करेगा? यह यह यह सिल विद्वानो के कमरे में ग़ा गया एक किताबी प्रेयोग है. उख़ेती जाए सवाल है मड़ब क्या किसी गाँ में बेटा वेक्ती वाखगी आलोकन रीती जैसे सबडो का इस्तमाल करेगा या ये सिल विद्वानो के कमरे में ग़ागया एक किताभी प्रेयोग है मैं सोच रा था कि ये आज़ाना के एक वीर हेट्सेट पहना दिया गया हो। लेकिन हैरानी की बात ये है कि वो बुजुर गुस गजेट से गबराता नहीं है बलकी उसे बिलकुल पता है कि इसके बटन कैसे दबान है दिक्ये ये बाशा विग्यान का एक गेरा सवाल है लेकिन बाशाये कोई रुकिवए जील नहीं होती, वे बहती नदी की तरह होती हैं. यानी उने समय के साथ बडलना परता है. बिलकुल, जब भी कोई नहीं तकनीक आती है, तो बाशा को नहीं शब्द गडने ही परते हैं. अगर वो यह अज़ा नहीं करेगी, तो लोग नहीं तक्निक का इस्तमाद करने किलिए, किसी दुसरी बहाशा जैसे अंग्रेजी का सहारा लेने लगेंगे. और दिरे-दिरे उनकी मात्र बहाशा अदूनिक जीवन से कडजाएगी. तो इन शब्दो को ठोपावा मानना सई नी होगा. इक्तम नहीं, ये किसी भी बाशा की सवाईवल स्वाईवल स्वाईवल श्वाईवल च्छी है और इस आत्मविष्वास का सब से बड़ा प्रमार वो शबत है जिस ने सब से जाडा द्यान कीचा है वी अविपी और वीट्टियो कुन्फ्रेंशिंग आई अई अई अगर नहीं तो बद्यागा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा ल� इसका इक बहुती खुबसुरत उदारन गरे लूप करनो में मिलता है शुब दियागे है, बैटी इसका इक बहुती खुबसुरत उदारन, गरेलूब करनो में मिलता है शुरोत में इक शब दिया गया है, बैटी इसका अर्थ बताया गया है, पैरो से दबाकर सबजीं कातने वाला हंस्या नुमा चाकू जिसे कई जगा हंस्या या दराती भी कहते है इसका एक बहुती खुबसुरत उदारन गरे लूपकरनो में मिलता है. शुबत में एक शब दिया गया है, बैटी. इसका अथ बताया गया है, पैरो से दबाकर सबजिया कातने वाला रनस्या नुमा चाकू। जिसे कई जगा रनस्या या दराती भी कहते है? आज बगाज बगाज बगाज बगाज बगाज बगाज बगाज बगाज बगाज बगाज बगाज बगाज बगाज बगाज बगाज बगाज बगाज बगाज बगाज बगाज बगाज बगाज बगाज बगाज बगाज बगाज बगाज बगाज बगाज बगाज बगाज ब तबजी कातने की वो पुरी परमपरा हमेशा के लिए तिहास से मिट जाएगी? यही बात शब्द कोष को एक मानव शास्तरिये दस्तावेज बनाती है. जब कोई शब्द मरता है, तो स्वफ अख्षर नहीं मरते, एक पूरी कला मर जाती है. इसी तरा, मिट्टी के बरतन पकाने वाड्टी के लिए आवावाशवद का जिक्र क्या गया है या सीधे तोर पर कुमानो के जीवन और उस्थानिया अर्थवेवस्था से जुडा है और आबूशनो की बात करें, तो समाज की सानस्क्रितिक बारी क्या और भी सपष्ट हो जाती है. एक शबद है, उनहन या उन्ठा. इसका अथ है, पैर की उंगलियो में पहने जाने वाले, विषेश चान्दी के आबूशन, जिसे तोरिंग भी केतें. ये विशेशर बुजुर्ग महिलाँ किलिए होता है येग आबूशन को उम्र और अवस्ता के साथ जोड कर देखना बताता है कि महिलाँ के श्रिंगार को लेकर कितनी गेहरी समज मोजुद है और जब भात एक ख्रिषी प्रदान समाज की होना तो खेती और कानपान के शब्डों के बिना कोई भी दस्तावे जदूरा है. इस शब्द कोश में बाक्ख्डा और बाक्सर जैसे शब्द दर्ज हैं, जो दान, यानी चावल की विषिष्ट किस्मों के नाम है. अदूनिक शहरी जीवन में तो चावल स्रिफ चावल होता है आँ या जेद़ से जेदा बास्मती होता है लेकिन एक क्रिषक समाज में जमीन की प्रक्रती उपपच के समए और स्वाद के अदार पर दार्जनो अलग �alag-alag-naam होते है ये उनके गेरे पर्यावरन गयान का सबूथ है खान पान के विग्यान का एक अर बहतरीन उदारन है अनहां इसका अर्ठ दिया गया है बाहरी गर्मी से बंद बरतन में उबालना जिसे आज हम स्लोग कुकिं कहतें भिल्कल आज दून्या के बड़़ बड़े श्व्व जिसे दंपुख्त या तर्मब्डानमिक्स के सिदान्त केते हैं उसके लिए इस पारंपरि ग्रामिल जीवन में सद्दियों से इतना सकीक शब्द मोझुद हैं ये दर्षाता है के रसोई महेंज खाना पकाने की जगा नहीं बलकी एक प्रयोग शाला थी. ये सब ही उदारन बताते हैं कि समाज बारी गरे लु कामो से कितनी गेराई से ज़़ा हूँ आथा जब तक ये शबद शबद कोश में सुरक्षित हैं, वो पुरा ग्यान विग्यान बवविष्वे की पीडियों के ले सुरक्षित हैं भी बाशा अवेशा नहीं बोद्धिक गेराई का सब से पार्दरशी आईना हुतीए, जो समाज अपने मानसिक ध्वन्वो को जितने बहतर तरीके समच्चता है, बाद्टिक संट्स्क्रती से निकल्कर जब हम मनोवेग्यानेक और सामाजिक सब्दों की और बडदते हैं तो एक रगी गेराई सामने आती हैं. देखे बाशा हमेशा समाज के बाद्टिक गेराई का सबसे पारदरषी आईना होती है. तो आप दोगान बाज़ा दोगान तो बग़ान तो बग़ान तो बग़ान तो बग़ान तो बग़ान तो बग़ान तो बग़ान तो बग़ान तो बग़ान तो बग़ान तो बग़ान तो बग़ान तो बग़ान तो बग़ान तो बग़ान तो बग़ान तो बग़ान तो बग लेकिन ये देखना अदबुत है के एक पारमपर एक भारती ये भाशागे पास इस जटिल मानसिक अवस्ता को विक्त करने के लिए, आत्म वंच्ना जैसा इतना दार्षनिक और मारक शब्द मोगुद है? मैं कहोंगी की ये एक बहुती मैट्वपून बिन्दू है ये जद्दारना को चुनाती देता है की पारमपर एक समाच केवल क्रिषी या हस्त कलातक सीमित ते जब आम भोल चाल में कुद को दोखा देने किलिए एक विषिष्ट शब्द होता है तो इसका मतलब है कि उनोने मानविय मनोविग्यान का बहुत बारीकी से द्धिन किया है विजानते थे कि बाहरी दुन्या से लडना असान है लेकेन अजान का सबसे बड़ा ब्रम उसका अपना मन होता है और ये वेचारिक स्पष्टता स्र्फ एक शब्द तक सीमित नहीं है जैसे आत्मापरन, जिसका अर्थ है समपून आत्म समर्पन, अद्द्द्यट्य यानुशासन हींता और बाक्ला यानी बहुत जाडा बोलने वाला आप ये शब्द मानव स्वबाव के रव गग को बहुती सुख्श्मता से पक्वड़ते हैं और वेक्तिगत मनोविग्यान के साथ सामाजिक ताने बाने को भी समजने किल ये शब्द कोश एक खिडिकी हैं जेसे समजिक सन्रचना में बाबन जेसे वर्ग सुथ्टक सब्द मोगुद हैं जो समाच के स्तरिकरन को दर्षाते हैं बलकुड. लेके अटिहासिक द्रिष्टी से जो चीज सबसे जबसे जआदा चोकाने वाली है वो है इस भाशा की समवेशिता. अइस समवेशिता का सबसे पुखता सबूथ है ओलिया और ओलिया जैसे शबद श्रोथ सबष्ट करता है कि ओलिया शबद अस्लामी सन्तो के ले अच्तमाल हुता है और उसी के समनानतर ओलिया यहनी सिद शबद भी मोगुद है ये जानकारी मित्छलाक शेटर के लिए विशेश रूप से रोचक है, जेसे अखसर रूडिवादी परमपराव का केंदर माना जाता है. ये बताता है कि ये कोई बन समाज नहीं ता, उस में सूफी विचार दाराओं और बहारी धरमों के संतों के प्रती भी एक गेरा सम्मान था. बाशा में सूफी संतों के लिए सम्मान जनक शब्दावली का गुल मिल जाना एक बहुती मस्बुत साजा संसक्रिती की तस्फीर पेष करता है. वाशा कभी भी उस चीस को नहीं अपनाती जिसे समाच अंदर से खारिच कर दे. एक दम सही. अगर ये शबद शबद कोश में तो इसका मतलब है कि वो संसक्रती लोगो की दिलो में ती. और इस वेचार एक सफर के शिखर पर जो सबद बैटा है ना वो है बादरायन, स्रोथ में स्पष्ष्वूप से बादरायन का जिक्र विदान्त के जनक के रुपने कि आगया है. इस के साथ ही आत्म्तत्व जैसे बहरी भरकम दार्चनिक शब्द बी मोजुद है. देखे एक एक क्रिषी प्रदान समाज में, जहां लोग बारिष्का अंदाजा लगाने में विस्त रहते हो, वहां वेदान्त और आत्म तत्वः पर चिंतन करने की शब्दावली कहोना एक बहुत बडा विरोद हवास लकता है. यही पारम पर एक समाजों की खास्यत रही है वि सर्व जमीन से नहीं जुडे थे बिल्कुल नहीं वि जीवन के अंतिम सत्यव और ब्रमाड़ के रहेस्यों पर भी गेरी बहेस करते थे ग्यान को समजना और उसे लागु करना इस समाज का एक मुल मुल लिए रहा है तो स्रोतों को गेराई से कंगालने, के इस सफर को अगर पीचे मुडकर देखाई, तो यह पूरी यात्रा किसी रोमाचा कोछ से कम नहीं। श्रुवात में यह विचार सामने आया आता, के एक शब्द कोश, अपने बदलती दुनिया में अपनी पहँजान को कैसे काईम रकता है हमने मिठलाक्षर से बाज शुग की और देखा की कैसे वोही भाशा वी उइपी तो बज़़़़़़़़ की ये महेज अनुवाद करने का तूल नहीं है, ये सब़्द्यता की साँसों को महेज्सुस करने का एक जर्या है। अग, ये बताता है कि कोई भी समवदाई बदलती दुनिया में अपनी पहँचान को कैसे काईम रकता है. हमने मितलाक्षर से बाज शुरू की और देखा कि कैसे वोही भाशा वी वीवोईपी वीटिो कोंफरन्सिंग के साथ आदूनेक युग में कहडी है. अमने सबजी काटने की बेटी से लेकर आत्म वनचना और बाद्रायन तक का सपरताय किया जो ये साभित करता है कि जो समाज अपने शब्दो को सहेज लेता है वो अनतता अपनी आत्मा को सहेज लेता है दिलकोल अब इस चर्चा को विराम देने से पहले एक आँ सावाल पिछे चुड़ाता है, जिस पर गंभीरता से विचार किया जाना जाहीए. आजके दोर में हम सब समाथफोंज और सोषल मीट्या की अजीबो गरीब दुन्या में गिरे हुए है. अम रोज मरा के जीवन में कुछ अईसे खास, सलांगs और शोट कर्ट सिस्तमाल करते हैं, जो हमारी आज की तकनी की निरभरता को दर्षाते हैं. राँ भाशा बहुत तेजी से बड़ल रही हैं. तो अगर आज के हमारे इं देनिक जीवन में स्तमाल होने वाले, इन नीजी तकनी की शब्डों का कोई अज़े ही विस्त्रिच शब्ट्खोश बनाया जाए और उसे एक बक्से में बन्द कर के रग दिया जाए तो बहुविष्खे के तिहास कार जब सो साल बाद उस शब्ट्खोश को खोजेंगे तो वे शब्द हमारी आजकी संसक्रिती के बारे में क्या कहानी सूनाएंगे? ये वाखगे ये बहुत ये गेरा विचार है? या वो बहुविष्य का शब्द कोश नहें हमारी किसी वेचारिग गेराई के बारे में बताएगा? यह उ स्व्व और उज़्ने के लिए थाई तो बज़ाएगा तो बज़ाएगा तो बज़ाएगा तो बज़ाएगा तो बज़ाएगा तो बज़ाएगा तो बज़ाएगा तो बज़ाएगा तो बज़ाएगा तो बज़ाएगा तो बज़ाएगा तो बज़ाएगा तो बज