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गोहि_सभक_बीच_जलसमाधि.mp4
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- 0:00–0:30सवागद है आजके इस अच्प्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्�
- 0:30–0:32तो तोड़ा इस बारे में सोची एग.
- 0:32–0:35क्या होगागर नदी के वो खतरनाक मगर मुच
- 0:35–0:39पानी से निकलकर सीदे हमारे मोबाल फोंस की चमकती सक्रीन के भीतर उतर आए?
- 0:39–0:42सुन्ने में थोड़ा जीब अदरामना लकता है ना
- 0:42–0:46तो यही वो गेरा और जरूरी सवाल है, जो हमारी आज की कता की नीव रकता है.
- 0:46–0:53ये एक आँसा विषे है, जो गाँके बहुतिक जीवन और आज के जिजिल खत्रों के भीज एक बहुती असादारन पूल बनाता है.
- 0:53–0:56तो इस पूरी चर्चा का आदार आखिर है क्या?
- 0:56–1:03यह है गजेंदर ताकुर जी के मेठली उपन्यास का कि शोर संस करन जिसका नाम है गोही सबह के भीज जल समादी.
- 1:03–1:07ये किताब लिटरली एक मास्टर ख्लास है और अपने अपने बिलकल अनुच्छा प्रयोग है.
- 1:07–1:37योग है, पताई क्यो? क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यो
- 1:37–1:41या आदिरात की कबद्ट्टी और चन्ना गाची कर रहेसे आँ।
- 1:41–1:44इस रोंक्ते कडे कर देने वाली कठा का संटर है,
- 1:44–1:47गड नारिकेल नाम का एक गाउ और सच मानिये,
- 1:47–1:50यहां की राते बilkul आम नहीं होती है।
- 1:50–1:53चन्ना गाची नाम के विशाल पेड के नीचे
- 1:53–1:55अगाची कर रहेस से आँग.
- 1:55–1:58इस रोंक्ते कड़े कर देने वाली कता का संटर है,
- 1:58–2:00गडड नारिकेल नाम का एक गाज़,
- 2:00–2:04और सच मानिए, यहागी राते बिल्खुल आम नहीं होती है.
- 2:04–2:07चन्ना गाची नाम के बिषाल पेड के निछे,
- 2:07–2:10गड नारिकेल के बूथ आदिराद को कबद्टी के लिके है
- 2:10–2:12लिके ये कोई आम बूथ नहीं है
- 2:12–2:15ये उन शोशित मज्दूरों के आतमाय है
- 2:15–2:19जिनके नाम सरकारी काएखजों और भिरोक्रसी ने हमेशा के लिए मिता दिये
- 2:19–2:26ये आत्माय, अपने इन्साफ और अपने पहचान को जिन्डार रखने किल ये एक अन्लिस कबड़ी का खेल खेल रही हैं,
- 2:26–2:29जहां मुद के बाद भी उनका संगर्ष रुका नहीं है।
- 2:29–2:34और इनकी इस लडाए की आत्मा बसती है गाँँ के चोट लोग गीत में,
- 2:34–2:36जो पूरी किताब में बिख्रे हूए है,
- 2:36–2:38ये सरफ गाने नहीं है,
- 2:38–2:41बलकी गाँँ की समोहिक समरटी को जिन्दा रखने का जर्या है.
- 2:41–2:43सूचकर देखे इस लाईन को,
- 2:43–2:46चन्ना पेड के नीचे नामो की रक्वाली करते हुए,
- 2:46–2:48भोर की पहली पारी खेलो.
- 2:48–2:50बद्यां बहुत फीखुब्सुर्ती से दर्षाती है,
- 2:50–2:54कि कैसे समवदाए उन लोगों की याद को बचाने किलिए जद्दू जहद कर रहा है,
- 2:54–2:57जिने सिस्टम ने पुरी तरहे से बुला दिया.
- 2:57–2:59आते है कहानी के दूसरे पहलूपर,
- 2:59–3:02कागज और सिस्टम दवारा नामो का मिटाया जाना.
- 3:02–3:06अप सुछने वाली बाद ये है, कि इन आतमाव की ये हालत आखिर हुई कैसे?
- 3:06–3:09ये ट्रागिक सच्चाई इस बात में छिपी है,
- 3:09–3:12कि एक तरब सरकारी बाबु अपने कागजों के देर में कोई हूए है,
- 3:12–3:19अदिश़्ी तरव कमजोर और लाचार लोग, बिरोक्रसी और नेए नियम कानून की लंभी नदी में डूब रही है.
- 3:19–3:22किताब में एक बहुती जग्जोर देने वाली दीटेल्स दीगाई है.
- 3:22–3:25सरकारी रेजिस्च्टर के हिसाप से च्रिफ तीस नाम दरज है,
- 3:25–3:29तीस्णाम दर्ज हैं, जबकी हकीकत में, तीन सो लाषे नदी में बहेच चुकी हैं.
- 3:30–3:33बाखिके तो सथबतर नाम, सरकारी लेक्वट से हमेशा के लिए गाएब.
- 3:34–3:35कितना दर्धनाग है यें.
- 3:36–3:38यही पर एक बहुती पावफल कोट आती है.
- 3:38–3:42नदी मैद काटती है दार से कागस गाँँ काटता है तारीक से
- 3:42–3:47इसका सीथा समब अब यह है कि जिस तरा नदी का अफान किनारो को तबा कर देता है
- 3:47–3:50बलकल उसी तरा कोड की अनन्त तारीक है
- 3:50–3:55सर्कारी महर और दव्तरी रेट टेप आम लोगों की जिन्दगी को दिरे-दिरे कब ख़त्म कर दिती हैं.
- 3:55–4:00यहापर कागस का एक तुक्डा किसी कष्टरना क हत्यार से काम नहीं हैं.
- 4:00–4:03अब बभते है कहानी के तीस्रे और सबसे दिल्च्छ भिऽ्से पर.
- 4:03–4:08अज ग़ाद़े नहीं बाद़ा देखाड़ तो बग़ाद़ तर बग़ाद़ ता है
- 4:08–4:12पुरानी बहुतिक नदी ने लोगो के शरीर और नकी महनत को निगाला था
- 4:12–4:14तो दोनों का अंतर बहुत क्लीर हो जाता है.
- 4:14–4:18पूरानी बहुत इक नदी ने लोगों के शरीर और उनकी महनत को निगाला था.
- 4:18–4:20लेकिन आजकी ये दिजितल दार,
- 4:20–4:24ये फोंकी श्क्रीन वाले श्क्रीनग गोही लोगों की निजी पहचान,
- 4:24–4:30जी पहचान उनकी प्रवेसी और उनके जीवन बरकी गाडी कमाई को लिटरली एक पल में निगल रहे हैं
- 4:30–4:36तो सवाल योडता है कि ये नहीं दिजितल मगर मच अखिर शिकार करते कैसे हैं
- 4:36–4:39कहानी का मुख्यविलेन चंद्रपाल बत्रा
- 4:39–4:42इस साईबर क्राईम को अन्जाम देने के लिए
- 4:42–4:44तीन मेंस्तेप्स युस करता है
- 4:44–4:47पहला जोटे सिएँनल्स या फेक धमकिया बेजना
- 4:47–4:50तुस्रा लोगों की दिजिटल पहचान
- 4:50–5:20अगर दर अगर बच्छाँपड़ तो बच्छाँपड़ तो वो बच्छाँपड़ तो बच्छाँपड़ तो वो बच्छाँपड़ तो वो बच्छाँपड़ तो वो बच्छाँपड़ तो वो बच्छाँपड़ तो वो बच्छाँपड़ तो वो बच्छाँपड़ त
- 5:20–5:23उगर बद्यागे रूप में एक बहुती प्यारा फोक सुंग दिया गया है.
- 5:23–5:25इसका मेसेज बहुत साफ है.
- 5:25–5:28जब राद को स्क्रीन चंखे तो अकिले मत रहो.
- 5:28–5:30किसी अपने के साथ काई का दीभ जलाओ.
- 5:30–5:33क्योंकी जिन्दिगी किसी हारे हुए नम्वर
- 5:33–5:36उगर लूटगे पैसे से बहुत बड़ी है.
- 5:36–5:39चलिये आगे बड़ते है अपने चोथे बहाग की तरफ
- 5:39–5:42पहचान की रक्षा और नामो को बचाना.
- 5:42–5:46आखिर इस अंदेर नगरी में लोग अपना नाम
- 5:46–5:48अपना अस्तित्व कैसे बचाएई?
- 5:48–5:52गर नारेकल के गाँवालों की अप्रोच यहां सबसे अप्से अप्सेण्पारिएग है
- 5:52–5:54उनो नहीं हम्मत नहीं हारी
- 5:54–5:57उनो अपने साद्वियो पुराने रीती रिवाजों को
- 5:57–6:00सबूथ एकठा करने के आदूनिक तरीकों के साज़ जोर दिया
- 6:00–6:04उगर नारकिल की इस कहानी से हमे क्या सीक मिलती है?
- 6:04–6:06कुछ बहुती प्राक्तिकल लेसन्स
- 6:06–6:09पहला, अपने देटा और नाम के प्रयोग के लिए
- 6:09–6:12हमेशा कन्सेंट यानी मनजुरी की मांग करना
- 6:12–6:14तुस्रा, अपनी परस्टल प्राँँप्राँए
- 6:14–6:16यही उनका अस्ली हट्यार है.
- 6:16–6:19तो गर नारकिल की इस कहानी से हमें क्या सीक मिलती है?
- 6:19–6:21कुछ बहुती प्रक्टिकल लेसन्स.
- 6:21–6:24पहला, अपने देटा और नाम के प्रयोग के लिए
- 6:24–6:27हमेशा कन्सेंट यानी मन्जूरी की मांग करना.
- 6:27–6:32उद्री की मांग करना, दूस्रा अपनी परस्टल प्रविसी को पुरी ताकत से बचाना,
- 6:32–6:36तीस्रा सुसाइती में हमेशा कम्जोर लोगो के साथ कफ़े रहना,
- 6:36–6:41और चोथा दिजिटल चाप से ज्यादा अपनी सामूहीक स्मूहीक को बचाथ कर रखना.
- 6:41–6:47यही वो तरीके हैं जिन से चाहे ब्रष्ट भाबू हो या साइबर ठाग दोनो को हराया जासकता है.
- 6:47–6:53और इन सारे प्रयासों को दरषाने किलिए एक बहुती खुबसुरत मेटफर का यूस किया गया है.
- 6:53–6:55एक चमकता हूँ आन नारिल का पत्ता.
- 6:55–7:00ये पत्ता ब्रष्टचार और लालज की उस काली अंदेरी नदी पर तेरता तो रहता है,
- 7:00–7:02लेकिन कभी दूपता नहीं है.
- 7:02–7:06इसका सीदा समब अब है कि अंदेरा चाहे कितना भी गेरा क्यून रहो,
- 7:06–7:09सच्चाए और समूहिक यादें हमेशा तेरती रहती है,
- 7:09–7:13अदेरे में चमक कर हमें आगे का रस्ता दिखाती हैं
- 7:13–7:20और अब एस एकस्प्लेनर क्यान्त में एक बहुत बड़ा सवाल जो हम सब को सोचने पर मजबोर कर देता है
- 7:20–7:24आजकी स्तेज रफ्तार और बहरी हुई दिजिटल नद्यों के इस दोर में
- 7:24–7:29अपना नाम, अपनी नीजी पहचान, और अपना अस्तित्व आखिर कैसे सुरक्षित रक सकते हैं.
- 7:30–7:33जब हर तरणफ, हर पल, स्क्रीन के मगर मज गूम रहे हैं,
- 7:33–7:36तो हम अपनी गरीमा का पत्ता कैसे तेरतवा रक सकते हैं.
- 7:36–7:39सोचे जोर, आजके 6planner में बस इतना ही.
- 7:39–7:44इस दिल्च्छप और ज़ोरी सफर में हमारे साथ जुडने किलिए आपका बहुत-बहुत दहनिवाद
Plain text
सवागद है आजके इस अच्प्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्� तो तोड़ा इस बारे में सोची एग. क्या होगागर नदी के वो खतरनाक मगर मुच पानी से निकलकर सीदे हमारे मोबाल फोंस की चमकती सक्रीन के भीतर उतर आए? सुन्ने में थोड़ा जीब अदरामना लकता है ना तो यही वो गेरा और जरूरी सवाल है, जो हमारी आज की कता की नीव रकता है. ये एक आँसा विषे है, जो गाँके बहुतिक जीवन और आज के जिजिल खत्रों के भीज एक बहुती असादारन पूल बनाता है. तो इस पूरी चर्चा का आदार आखिर है क्या? यह है गजेंदर ताकुर जी के मेठली उपन्यास का कि शोर संस करन जिसका नाम है गोही सबह के भीज जल समादी. ये किताब लिटरली एक मास्टर ख्लास है और अपने अपने बिलकल अनुच्छा प्रयोग है. योग है, पताई क्यो? क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यो या आदिरात की कबद्ट्टी और चन्ना गाची कर रहेसे आँ। इस रोंक्ते कडे कर देने वाली कठा का संटर है, गड नारिकेल नाम का एक गाउ और सच मानिये, यहां की राते बilkul आम नहीं होती है। चन्ना गाची नाम के विशाल पेड के नीचे अगाची कर रहेस से आँग. इस रोंक्ते कड़े कर देने वाली कता का संटर है, गडड नारिकेल नाम का एक गाज़, और सच मानिए, यहागी राते बिल्खुल आम नहीं होती है. चन्ना गाची नाम के बिषाल पेड के निछे, गड नारिकेल के बूथ आदिराद को कबद्टी के लिके है लिके ये कोई आम बूथ नहीं है ये उन शोशित मज्दूरों के आतमाय है जिनके नाम सरकारी काएखजों और भिरोक्रसी ने हमेशा के लिए मिता दिये ये आत्माय, अपने इन्साफ और अपने पहचान को जिन्डार रखने किल ये एक अन्लिस कबड़ी का खेल खेल रही हैं, जहां मुद के बाद भी उनका संगर्ष रुका नहीं है। और इनकी इस लडाए की आत्मा बसती है गाँँ के चोट लोग गीत में, जो पूरी किताब में बिख्रे हूए है, ये सरफ गाने नहीं है, बलकी गाँँ की समोहिक समरटी को जिन्दा रखने का जर्या है. सूचकर देखे इस लाईन को, चन्ना पेड के नीचे नामो की रक्वाली करते हुए, भोर की पहली पारी खेलो. बद्यां बहुत फीखुब्सुर्ती से दर्षाती है, कि कैसे समवदाए उन लोगों की याद को बचाने किलिए जद्दू जहद कर रहा है, जिने सिस्टम ने पुरी तरहे से बुला दिया. आते है कहानी के दूसरे पहलूपर, कागज और सिस्टम दवारा नामो का मिटाया जाना. अप सुछने वाली बाद ये है, कि इन आतमाव की ये हालत आखिर हुई कैसे? ये ट्रागिक सच्चाई इस बात में छिपी है, कि एक तरब सरकारी बाबु अपने कागजों के देर में कोई हूए है, अदिश़्ी तरव कमजोर और लाचार लोग, बिरोक्रसी और नेए नियम कानून की लंभी नदी में डूब रही है. किताब में एक बहुती जग्जोर देने वाली दीटेल्स दीगाई है. सरकारी रेजिस्च्टर के हिसाप से च्रिफ तीस नाम दरज है, तीस्णाम दर्ज हैं, जबकी हकीकत में, तीन सो लाषे नदी में बहेच चुकी हैं. बाखिके तो सथबतर नाम, सरकारी लेक्वट से हमेशा के लिए गाएब. कितना दर्धनाग है यें. यही पर एक बहुती पावफल कोट आती है. नदी मैद काटती है दार से कागस गाँँ काटता है तारीक से इसका सीथा समब अब यह है कि जिस तरा नदी का अफान किनारो को तबा कर देता है बलकल उसी तरा कोड की अनन्त तारीक है सर्कारी महर और दव्तरी रेट टेप आम लोगों की जिन्दगी को दिरे-दिरे कब ख़त्म कर दिती हैं. यहापर कागस का एक तुक्डा किसी कष्टरना क हत्यार से काम नहीं हैं. अब बभते है कहानी के तीस्रे और सबसे दिल्च्छ भिऽ्से पर. अज ग़ाद़े नहीं बाद़ा देखाड़ तो बग़ाद़ तर बग़ाद़ ता है पुरानी बहुतिक नदी ने लोगो के शरीर और नकी महनत को निगाला था तो दोनों का अंतर बहुत क्लीर हो जाता है. पूरानी बहुत इक नदी ने लोगों के शरीर और उनकी महनत को निगाला था. लेकिन आजकी ये दिजितल दार, ये फोंकी श्क्रीन वाले श्क्रीनग गोही लोगों की निजी पहचान, जी पहचान उनकी प्रवेसी और उनके जीवन बरकी गाडी कमाई को लिटरली एक पल में निगल रहे हैं तो सवाल योडता है कि ये नहीं दिजितल मगर मच अखिर शिकार करते कैसे हैं कहानी का मुख्यविलेन चंद्रपाल बत्रा इस साईबर क्राईम को अन्जाम देने के लिए तीन मेंस्तेप्स युस करता है पहला जोटे सिएँनल्स या फेक धमकिया बेजना तुस्रा लोगों की दिजिटल पहचान अगर दर अगर बच्छाँपड़ तो बच्छाँपड़ तो वो बच्छाँपड़ तो बच्छाँपड़ तो वो बच्छाँपड़ तो वो बच्छाँपड़ तो वो बच्छाँपड़ तो वो बच्छाँपड़ तो वो बच्छाँपड़ तो वो बच्छाँपड़ त उगर बद्यागे रूप में एक बहुती प्यारा फोक सुंग दिया गया है. इसका मेसेज बहुत साफ है. जब राद को स्क्रीन चंखे तो अकिले मत रहो. किसी अपने के साथ काई का दीभ जलाओ. क्योंकी जिन्दिगी किसी हारे हुए नम्वर उगर लूटगे पैसे से बहुत बड़ी है. चलिये आगे बड़ते है अपने चोथे बहाग की तरफ पहचान की रक्षा और नामो को बचाना. आखिर इस अंदेर नगरी में लोग अपना नाम अपना अस्तित्व कैसे बचाएई? गर नारेकल के गाँवालों की अप्रोच यहां सबसे अप्से अप्सेण्पारिएग है उनो नहीं हम्मत नहीं हारी उनो अपने साद्वियो पुराने रीती रिवाजों को सबूथ एकठा करने के आदूनिक तरीकों के साज़ जोर दिया उगर नारकिल की इस कहानी से हमे क्या सीक मिलती है? कुछ बहुती प्राक्तिकल लेसन्स पहला, अपने देटा और नाम के प्रयोग के लिए हमेशा कन्सेंट यानी मनजुरी की मांग करना तुस्रा, अपनी परस्टल प्राँँप्राँए यही उनका अस्ली हट्यार है. तो गर नारकिल की इस कहानी से हमें क्या सीक मिलती है? कुछ बहुती प्रक्टिकल लेसन्स. पहला, अपने देटा और नाम के प्रयोग के लिए हमेशा कन्सेंट यानी मन्जूरी की मांग करना. उद्री की मांग करना, दूस्रा अपनी परस्टल प्रविसी को पुरी ताकत से बचाना, तीस्रा सुसाइती में हमेशा कम्जोर लोगो के साथ कफ़े रहना, और चोथा दिजिटल चाप से ज्यादा अपनी सामूहीक स्मूहीक को बचाथ कर रखना. यही वो तरीके हैं जिन से चाहे ब्रष्ट भाबू हो या साइबर ठाग दोनो को हराया जासकता है. और इन सारे प्रयासों को दरषाने किलिए एक बहुती खुबसुरत मेटफर का यूस किया गया है. एक चमकता हूँ आन नारिल का पत्ता. ये पत्ता ब्रष्टचार और लालज की उस काली अंदेरी नदी पर तेरता तो रहता है, लेकिन कभी दूपता नहीं है. इसका सीदा समब अब है कि अंदेरा चाहे कितना भी गेरा क्यून रहो, सच्चाए और समूहिक यादें हमेशा तेरती रहती है, अदेरे में चमक कर हमें आगे का रस्ता दिखाती हैं और अब एस एकस्प्लेनर क्यान्त में एक बहुत बड़ा सवाल जो हम सब को सोचने पर मजबोर कर देता है आजकी स्तेज रफ्तार और बहरी हुई दिजिटल नद्यों के इस दोर में अपना नाम, अपनी नीजी पहचान, और अपना अस्तित्व आखिर कैसे सुरक्षित रक सकते हैं. जब हर तरणफ, हर पल, स्क्रीन के मगर मज गूम रहे हैं, तो हम अपनी गरीमा का पत्ता कैसे तेरतवा रक सकते हैं. सोचे जोर, आजके 6planner में बस इतना ही. इस दिल्च्छप और ज़ोरी सफर में हमारे साथ जुडने किलिए आपका बहुत-बहुत दहनिवाद