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सरकारी_फाइलों_से_वजूद_मिटाने_की_साज़िश.m4a
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- 0:00–0:02विमर्श्क यह समच पर आपका स्वागत है
- 0:02–0:07आज हम मतलब आज हम इक बहुती दिल्चास पुर शाए तुड़ा द्रावना विषे लेक रहे हैं
- 0:07–0:13ज़र आप सोच्छे अगर कल सुभा आप उटें और कोई आप से कहे की आपका कोई वजुद ही नहीं है
- 0:13–0:43आप आप बगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगग�
- 0:43–0:48बाल संस करन्ट पर केंद्रत है. ये कैसी कता है जो मस्दूरों,
- 0:48–0:53दिजितल थगी के शिकार यूवाँ और शोषित महिलाँँ के अस्तिट्वोग कागस से
- 0:53–0:57मिताने और फिर उसे वापस पाने के खोफनाक संगर्ष को दर्षाती है.
- 0:57–1:01तफफ़ उसे वापस पाने के खफनाक संगर्ष को दर्षाती है
- 1:01–1:05मैं इस पूरे विषे को एक कानोनी और संस्थागत लडाई के रुप में देखती हूँ
- 1:06–1:09अचा लेकिन मैं एसे तोडा अलग नजर ये से देखता हूँ
- 1:09–1:12इस पूरी कत्हा से जो सबसे बड़ा सवाल अवर कराता है,
- 1:12–1:16वो यह आप की जब कोई वेवस्ता आप को पूरी तरे से मिता देना चाहती है,
- 1:16–1:18तो सच्चा न्याय कहा से मिलता है?
- 1:18–1:23क्या न्याय अंततता, अदालतो, या मोहर लगे दस्तावेजो से मिलता है?
- 1:23–1:27मुल रुप से एक संस्तागत अदस्तावीजी संगर्ष है,
- 1:27–1:31उपन्यास में शोषक वर्ग ने लोगो को मिताने के लिए,
- 1:31–1:34कागज़ और दिजितल रिकोट्स का इस्तमाल किया.
- 1:34–1:36तो जब पीडद पलट्वार करते है,
- 1:36–1:38उनकी जीद भी सही दस्तावेजों,
- 1:38–1:42वेवास्ता को उसी के किल में हराना ही आस्ली न्याय है
- 1:42–1:44मैं समज रहूं अप ख्या क्या रहूं
- 1:44–1:47लेकिन मैं इसे बिलकुल अलग नजर्ये से देक्ताूं
- 1:47–1:52मैं अनना है कि संस्ताई अदालतें और कागज ये हमेशा अदूरे
- 1:52–1:57यह आप द़ालतें अगर लगाज यह भी आप द़ालतें अगर लगाज यह नहीं
- 1:57–2:01अगर वी वो बवाज़ा को उसी के खिल में हराना ही अस्टी नयाई है
- 2:01–2:03अदलत अदलत लग ज़े देकता हूँ।
- 2:03–2:06मेरा मानना है कि संस्ताई अदलते और कागज
- 2:06–2:09ये हमेशा अदूरे और अपर्याप्त हूँटे है।
- 2:09–2:12इस कता का मुल संदेश ये है कि सच्चा न्याए
- 2:12–2:14कागज के तुक्डों से नहीं बलकी
- 2:14–2:17तो बवागानी के उसे से पर गूर करे,
- 2:17–2:21जहान लद्तर ठाकृर एक बहुत्टी महत्वापून चेतावनी देते है,
- 2:21–2:24भीगे कागस की गंद सुंगना सीख हो,
- 2:24–2:27तो हमें समझ आता है कि लोग सम्रती से आता है.
- 2:27–2:29चनन गाची के सम्रती?
- 2:29–2:32ज़िल्ये इस चर्चा की श्रूएत बूनियादी स्थर्से करते हैं
- 2:33–2:35अगर हम कहानी के उस हसे पर गूर करे
- 2:35–2:39जहां लद्टर ठाकृर एक बहुती महत्वापून चेतावनी देते हैं
- 2:39–2:42भीगे कागस की गंद सुंगना सीख हो
- 2:42–2:45तो हमें समज आता है कि ए पूरी कहानी
- 2:45–2:47दस्तावेजो के इर्द गिर्द बूनी गई है
- 2:47–2:51जिरा सोची ए, शोशक वर्ग कुन है
- 2:51–2:53और उनो ने अप्राद कहा किये है
- 2:53–2:57चाहे वो ब्रष्ट पर्योजना प्रमुक शशीभूशंदेव हो
- 2:57–2:59वकील बटुकनात हरीहरन हो
- 2:59–3:03या फिर दिजितल तगी का जाल बिचाने वाल चंद्रपाल बत्रा
- 3:03–3:06और विदेशी अपरेटर लाओ किनहंग
- 3:06–3:09इन सभीने किसी को सीदे गोली नहीं मारी
- 3:09–3:13आँ उप तो है उनके हत्यार तकनीक और फाइले ती
- 3:13–3:16बलकोल उदारन के लिए जब प�ल हाथसे में मज्दूर
- 3:16–3:19बिसेसर पास्वान की दर्दनाक मुत होती है,
- 3:19–3:21तो सिस्टम उसे म्रित नहीं लिखता.
- 3:21–3:24विवस्ता के रजिस्टर में चालाकी से लिखती आ जाता है.
- 3:24–3:26काजिस्तल चोडि अनुपस्तित,
- 3:26–3:27यानी वो काम से गायाब है.
- 3:27–3:28सही कहा.
- 3:28–3:30और म्रित्तिव का मतलब है,
- 3:30–3:32भी बज़ा देना जिम्डारी लेना
- 3:32–3:36आँ, लेकिन अनुपस्तित का मतलब है कि वो व्यक्ती अपनी मरजी से चला गया
- 3:36–3:39उनोने कागस का इस्तमाल कर कि उसकी मुझ्त को ही गाएप कर दिया
- 3:39–3:42इसलिये मेरा तरक यह एक पीटितो को जो संगर्ष है
- 3:42–4:12अदर बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ ब
- 4:12–4:14ये एक बहुत फीज़े है.
- 4:15–4:18कागस किसी अनसान का वुजुद बचाचता है?
- 4:19–4:20श्रोटाओ को ये समजना होगा,
- 4:21–4:25कि इस कता की आप्सली आत्मा किसी आदारत के तन्धे कमरे में नहीं,
- 4:25–4:28बलकी गडनारी केल गाँँ की चन्ना गाची में बसती है.
- 4:28–4:30लेकिन वो तो एक रूपक है ना?
- 4:30–4:32नहीं, वो रूपक से कही बडखर है.
- 4:32–4:35ये बरगगद और पीपल के पेडों का वो जुरम॥ है.
- 4:35–4:38जहां गाँके म्रित लोगो की आतमाएं,
- 4:38–4:40जिने वेवस्ताने बुला दिया है,
- 4:40–4:42वो बूध बनकर कबद्टी खेलते है.
- 4:42–5:12अप नियास का वो मुल्वाक के आद कीजे गोही दे खाईत अच्छी नाम नहीं यानी मगर्मच आपके शरीर को खाँ सकता है लेकिन वो आपका नाम नियाँ नियाँ के नाम नियाँ के नाम नियाँ के नाम नियाँ के नाम नियाँ के नाम नियाँ के नाम नियाँ के नाम नि
- 5:12–5:42अगर देखाना देखाना था आप जाएजाड़ा देखादा था आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आ
- 5:42–5:46नाम पन्जी अपना कुत का जन अभिलेक बनाना शुप रहना शुप दिया था
- 5:46–5:50अस्ली लडाई लोगो की स्मरिती में जिन्दा रहने की है
- 5:50–5:53किसी सरकारी रजिस्टर में नाम दरज कराने की नहीं
- 5:53–5:56रूकिये, ये एक बहाती बहावुक द्रिष्टी कोड है
- 5:56–5:59पर आईए जर उत्पीडन के वास्तविक स्वरूप पर बाथ करते हैं
- 5:59–6:04हमें ये समझना होगा कि ये शोशन कोई आमुर्थ या अद्यात्मिक चीज नहीं ती
- 6:04–6:08ये पूरी तरह से प्रनालिगत और और आर्थेख शोशन ता
- 6:08–6:15विदेशी कमपनी ब्रुम कालर ने जो पोल गोटाला किया वो मुनाफे के लिए क्या गया ब्रष्टाचार था
- 6:15–6:25और जो दिजिटल ठगी का जाल लाओ किनहंग और चंद्र पालबत्रान ने बिचाया उसे देखे उनोने मासुम यूवाँ को मुल अकाूंस में फसाया
- 6:25–6:29मुझे लगता है कि यहां आमे थोडा रूक्कर सपष्ट करना जाहीए,
- 6:29–6:32कि यह मूल अकाून साखें काम कैसे करते हैं,
- 6:32–6:35कुंकि यही यही सुपन्नियास की एक बढी कडी है.
- 6:35–6:38बलक्ल, मतलप शूताउं के लिए यह से अज़े समजे,
- 6:38–6:41मान लिजे आपकी दिजिटल पहचान चुराली गई है
- 6:41–6:44आपका आदार आपका पैंकाड लिएस्तमाल करके
- 6:44–6:46जाल साजोने कोई बंक खाता खूल लिया है
- 6:46–6:47और आपको भनक तक नहीं?
- 6:47–6:50आपको पता भी नहीं क्यापके नाम पर कोई खाता है
- 6:50–6:54लिकिन उस खाते के जर ये करोनो रुपै के हेराफेरी की जारे है
- 6:54–6:57काला दन सपेट किया जारहा है
- 6:57–6:59आप अपने गर में आराम से बटेखे है
- 6:59–7:01और आचानक प�लिस दर्वाजे पर आती है
- 7:01–7:05कुकी कागजों के अनुसार वो सारा प्राद आपनी किया है
- 7:05–7:07आप रातो रात एक अप्रादी बन जाते हैं
- 7:07–7:08बिलकुल
- 7:08–7:11मालवेका ग्रीन का जो देहे व्यापार कराकिट ता
- 7:11–7:15वो बी इसी टरा की ब्लाक्मेलिंग और देटा के दमपर चल रहा था
- 7:15–7:18और उज्वल जाग का मामला तो इस से भी जादा ख्वापनाक था
- 7:18–7:23अज्वल जा उसके आत्महत्या कोई भावनात्मक कम्जोरी नहीं ती
- 7:23–7:27वो दिजितल अरेस्ट और आर्थिक बरभादी का सीथा पर अव्टी थी
- 7:27–7:30दिजितल अरेस्ट भी आजके समय का एक बहुत कढवा सच है
- 7:30–7:33सही कहा इस में होता यह के आपको एक विडिो कोल आता है
- 7:33–7:36श्क्रीन पर पूलिस की वर्दी में कुछ लोग होते है,
- 7:36–7:40वो खेटे है के आपका नाम किसी बहुत बडे मनी लाँण्रिं केस में आई आई आई,
- 7:40–7:44और जब जाज पूरी नहीं होती आप क्याम्रे के सामने से नहीं हद सकते.
- 7:44–7:46एक तरह की दिजितल कैद?
- 7:46–7:48आप तो आप को आपके ही गर में,
- 7:48–7:51श्क्रीन के जर ये कैध कर लेते हैं.
- 7:51–7:53वो आपको दराद हम काखर,
- 7:53–7:56आपके सारे पैसे अपने खातो में खाटों कर वालेते हैं.
- 7:56–7:59अनसान उस दर और मानसिक प्रतारना में,
- 7:59–8:01इतना तुट जाता है,
- 8:01–8:02कि वो अपनी जान दे देता है,
- 8:16–8:18जो इस शोशन के ती केंदर में है
- 8:18–8:20दिक है मुझे माव करें
- 8:20–8:22लिकिन मैं इस बाथ से बिलकुल सहमत नहीं हूं
- 8:22–8:24आप जिसे सर्फ आर्थिक नुक्सान
- 8:24–8:26या संस्तागत क्रूर्ता कहरें है
- 8:26–8:28वो इस पूरे अप्राद का
- 8:28–8:30केवल इक सतही बहुत थिक परिनाम है
- 8:30–8:38पैसे का जाना या जेल का दर असली चोट नहीं है, असली क्रूरता है किसी विक्ती का नाम और उसकी गरीमा को चीन लेना.
- 8:38–8:41लेकिन वो गरीमा तो आर्थिक शोषन से ही चिन रही है ना?
- 8:41–8:48अगर दिज़टल अरेस्ट के उस खोफ और स्क्रींग के खारन इतना सद्मे में है कि वो अपना नाम तक बूल गया है.
- 8:48–8:50वो अपना नाम नाम नहीं बता पाता.
- 8:50–8:53बिलकुल. वो अपना नाम नाम नहीं बूल पाता.
- 8:53–8:59अग, उब दिजटल अरेस्ट के उस खोफ और स्क्रींग के ब्रम के कारन इतना सद्मे में है,
- 8:59–9:01के वो अपना नाम तक बूल गया है.
- 9:01–9:04वूँ अपना नाम नहीं बतापाता
- 9:04–9:06भिलकु वूँ अपना नाम नहीं बोल पाता
- 9:06–9:09जब तक के हुलासी उसे जगजोर कर याद नहीं दिलाती
- 9:09–9:12के अंक छोड नाम भाज
- 9:12–9:14यानी नमबरों और देटा के दुन्या से बहारा
- 9:14–9:16और अपना नाम बोल
- 9:16–9:19मैं मानती हूँ की वो बहाती मार्मिक द्रिष्च है, लेकिन...
- 9:19–9:25और दरका कारण आर्थिक हो सकता है, लेकिन उसका प्रहार अन्सान की अस्मिता पर हुता है.
- 9:25–9:29जब देविका उन फसे हुए यूवाँ को बचाती है, तो उसका नारा क्या हुता है.
- 9:29–9:33वो ये नहीं कहती के हम तुमँरा पैसा वापस लाईंगे
- 9:33–9:36वो कहती है लाज अप्रादी की होनी चाहीए
- 9:36–9:39पीडद की नहीं ये बात कितनी गेरी है
- 9:39–9:40आव वो वागगे बात गेरी बात है
- 9:40–9:43ये केवल पैसो की लूट नहीं है
- 9:43–9:46ये अन्सान की सामाजिक गरीमा पर सीदा हमला है
- 9:46–9:50बलैक्मेल की शिकार मिडाले नी जब निष्ता की शपत लेती है
- 9:50–9:52तो वा आर्थिक नुक्सान की बात नहीं करती
- 9:53–9:55वो भआई और लाज से मुक्ती की बात करती है
- 9:56–9:58अगर वेवस्ता अपका सम्मान ही का ग़ा ग़ाई
- 9:58–10:01तो बेंक में वापसाए चन्द रूपः आपको निया कैसे दे सकते हैं?
- 10:01–10:04आपके बात में एक दाशनिग गेहराई जरूर है.
- 10:04–10:05मैं एसे इंकार नहीं करूंगी.
- 10:05–10:09लेकिन मैं आपको इसी कहानी से एक अलग द्रिष्टिकों देती हूँ.
- 10:09–10:10आच्छा?
- 10:10–10:15आगर ये लडाय केवल स्म्रिती गर्मा और लोग चेतना की ती
- 10:15–10:18तो प्रतिरोद की सब से महतो पुरन रननीती क्या थी
- 10:18–10:22ज़र शुचिए कहानी में गोप कुमार और इशान्दत क्या करते हैं
- 10:22–10:27वे तमाम साक्षों की, देटा की, तीन अलग-लग memory drive बनाते हैं
- 10:27–10:28आप यह उ बैकव बनाते हैं
- 10:28–10:31एक हाड्राय वो सत्टिवरत महता को देते हैं
- 10:31–10:33जो उसी सरकारी विवस्ता का हिस्चा है
- 10:33–10:37तुस्री प्रती वो देश के बाहर एरा को बेज्टे हैं
- 10:37–10:39ताकी अंतराश्ट्रियस तर परदबाश हो सके
- 10:39–10:41और तीस्री प्रती वो गाँ में
- 10:41–10:43पीपल के पेड के खोखर में चबाते हैं
- 10:43–10:45विलकुल वो से चबाते हैं
- 10:45–10:47लेकिन सवाल है कि क्यों?
- 10:47–10:49वे बहुत अची टरा जानते हैं
- 10:49–10:52के लोख स्म्रती या गर्मा को भी सुरक्षित रक्छट रह्गने कि लिए
- 10:53–10:54बहुतिक अगर दिजिटल साख्ष्य
- 10:54–10:57यानी देटा की ज़रूरत होती है
- 10:57–10:59अगर उनके पास वो हाड़्ाइव्स नहीं होती
- 10:59–11:02अगर उनके पास संस्तागत प्रमाँन नहीं होते
- 11:02–11:04तो क्या चन्नागाची का संगर्ष
- 11:04–11:07महेज एक स्थानिया भूतिया कहानी बनकर नहीं रहे जाता
- 11:07–11:11बिना सबूतों के विद्दन्या की इतनी बडी ताकतों से कैसे लड़ते?
- 11:11–11:13ये एक बहुती दिल्चस बिन्दू है,
- 11:13–11:16हला की मैंसे बिलकुल आलक दंग से प्रस्थ॥ करूंगा.
- 11:16–11:21वो तीन प्रत्या इसले नी बनाते क्यों कि उने संस्ताओं या कागजों पर बरोसा है.
- 11:21–11:27वो इसलि एसा करते हैं क्योंकि उने अच्छी तरा पता है कि संस्थाये ब्रष्ट हैं, वे कागज मिता देंगी.
- 11:27–11:31अपन्यस में बहुत खुबसुरत बात कही गगे है, नदी एक प्रती नहीं रकती.
- 11:31–11:34नदी एक प्रती नहीं रकती.
- 11:34–11:36आप बार बार सक्ष्यों की बात कर रहे हैं,
- 11:36–11:38लेकिन उस अदालत वाले दिश्ये पर वापस आईए.
- 11:38–11:41आप जाहा सत्वरत महता नाम परते हैं.
- 11:41–11:43आप लेकिन उसके बात क्या होता है.
- 11:43–11:46जब जीट मिलती है तो अदालत खाली है.
- 11:46–11:49लडाई का असली मेदान कोई नयाले नहीं ता,
- 11:49–11:51वो चन्ना गाँची का गाँ। ता.
- 11:51–11:53आब बार बार सक्ष्यो की बात कर रही हैं,
- 11:53–11:56लेकिन उस आदालत वाले दिशे पर वापस आईए.
- 11:56–11:58आप, जहाँ सद्वरत महता नाम परते हैं.
- 11:58–12:00आप उस्छन को कैसे नजर अंदास कर ता है?
- 12:00–12:02जब जीट मिलती है तो आदालत काली है
- 12:02–12:06वकील हरी हरन जिसने जीवन बर कानुनी दाउपेस देखे है
- 12:06–12:08वो हेरान रहे जाता है
- 12:08–12:11उसे समझ नहीं आता की जीटने वाले लोग जच्छन मनागे आदालत क्यो नहीं आए
- 12:11–12:41अप अदी आप अज़्ोर के अप आप अज़्ोर के अप आप अज़्ोर के अप अप अज़्ोर के अप अप अज़्ोर के अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अ�
- 12:41–12:45सर्यों की चूडी लेकर बारभा न्याले की चोखखड पर जाता है,
- 12:45–12:47तो वो जूता महेजिक भावना नहीं है.
- 12:48–12:50वो एक अकार्टे बहुत इक साखश है.
- 12:50–12:52आआ, वो द्रिष्च वाखे बहुत प्रभावी है.
- 12:52–12:55या उपन्यास का सब से शक्तिषाली श्रन है.
- 12:55–12:59जब स्रकारी वकील सत्तिवरत महता अदालत में कडाई होता है
- 12:59–13:04और अपने ही विभाग के सरकार के जुटे शबत पत्र को मानने से प्यटाई ता है
- 13:04–13:06वो एक भूकम्प की तरा था
- 13:06–13:08बलकुल, वो एक रोंगते कडे करने लापल ता
- 13:08–13:19अगना वो जजके सामने सील बंद लिफाफा खुलवाता है, सरकार ने जिन मस्दूरों की मुझ्छषिपाई ती जगा तीस सरकारी अदिकारियों के नाम दरज कर दिये ते.
- 13:19–13:26सद्तिवरत महता उन्तीज चुटे नामों को नहीं परता, बलकी तीन्सो वास्थविक मज्दूरो के नाम परता है.
- 13:26–13:30उस समें आदालत में जु सन्नाता चाजाता है, जर उसे महसुस की जीए.
- 13:30–13:34वो सन्नाता संस्तागत बदलाव की शुरूवात है.
- 13:34–13:38उसी सुची के पड़े जाने से चंद्रपाल बत्रा के कालेख हाते सील होते हैं
- 13:38–13:42ब्रष्ट बार कुन्सिल अद्ध्ध्ख्ष रही हरन्पर नोटिस जारी होता है
- 13:42–13:50नियाईपालिका के भीटर लडागाया ये कानुनी संगरषी वो हतोडा जिसने अप्राद्वियो के पूरे सामराज़े को तोर दिया.
- 13:50–13:54मैं ये बिलकुल नहीं कहाँ अदालत मुन अस्ली नामो का पडाजाना महतपोड नहीं ता.
- 13:54–13:56लेकिन वो केवल एक चिंगारी ती.
- 13:56–14:01आप कह रहीं कि पूरा बडलाव अदलत से आया, लेकिन आस्ली बडलाव तो समाजके भीतर से आता है.
- 14:02–14:05जब गावाले अपनी वो नाम पन्जी बनाते है, तो वो क्या करते है?
- 14:06–14:09वे सरकारी रिजिस्टो में लिखे गयो उन रूके नामो को नहीं लिकते है.
- 14:09–14:13वे उन आमो को दरज करते हैं जिन से वो वकती गर में पुकारा जाता ता
- 14:13–14:16अच्छ? तो वे उनके गरेलू आम लिकते है?
- 14:16–14:19आप वे उसके अस्ली वजुद को दरज करते हैं
- 14:19–14:22वे आसा करके राजजके सेकादिकार को चुनोती दे रहे हो ते हैं
- 14:22–14:24कि तुम तैं आई रही करोगे कि हम कों है?
- 14:24–14:25हम तैं करेंगे.
- 14:26–14:30यही पर मैं आप से एक सीथा सवाल करना चाहूंगी.
- 14:30–14:34आप ने कहाँ के गाँवाले अपनी नाम पनजी बनारे हैं.
- 14:34–14:37तो क्या वो रजिस्टर जिस्मे वे नाम लिख रहे हैं
- 14:37–14:41स्वायमे एक दस्तवेज याने कागस कही नैधारूप नहीं है?
- 14:41–14:43और नहीं आप इसे कागस से नहीं.
- 14:43–14:44नहीं सूँनिये.
- 14:44–14:47आप राजजे के कागस को बूरा बतारे हैं.
- 14:47–14:50लिकिन जन कागस को महान बतारे हैं.
- 14:50–14:54आफिर कार प्रक्रिया तो दस्तवेजी करन की है नहीं है.
- 15:07–15:10वे उस पीतल के दिबबे को जिस में साक्षियो रेदे हैं,
- 15:10–15:13नारिल के पेड की जर में गार देते हैं.
- 15:13–15:16उपन्यास में इसे गवाही की रोपनी कहा गया है.
- 15:16–15:19यानी गवाही को किसी केट्बे के तो बचागा रेदे हैं.
- 15:19–15:21अपन्यास में इसे गवाही की रोपनी कहा गया है
- 15:21–15:23यानी गवाही को किसी केट की तरब बोना
- 15:23–15:25गवाही को बोया
- 15:25–15:27ये शब्द प्रेयोग बहुत अनोखा है
- 15:27–15:29हाँ और फिर इसका परनाम क्या होता है
- 15:29–15:31उन नारिल के पत्तोंपर
- 15:31–15:35उपन्यास में इसे गवाही की रोपनी कहागया है
- 15:35–15:38यानी गवाही को किसी केट की तरब बोना
- 15:38–15:42गवाही को बोया ये शब्द प्रेोग बहुत अनोखा है
- 15:42–15:45आप फिर इसका परणाम क्या होता है
- 15:45–15:49उन नारिल के पत्तों पर प्रक्रितिक रुप से वो नाम उबहर कर आते है
- 15:49–15:53जब एरा विदेश में बेटकर अपना भाशन सून्ड़े होती है,
- 15:53–15:59तो उसे अदवर्ट ब्रुम का चेहरा उस नारिल के पते पर लिखी इभारत में बड़लतावा दिखाई दिता है.
- 15:59–16:03आब देख रही हैं, ये दस्तावेज अप किसी दराज में रक्षी फाट नहीं है.
- 16:03–16:05ये प्रक्रतिका हिस्सा बन चुका है
- 16:05–16:09हल्दी, काजल, और गंगाजल से लिखा गया वुजन अभिलेक
- 16:09–16:13राज्य के त्टन्डे, स्याही वाले कागज से बहुत अलग है
- 16:13–16:16उस सरकारी कागज में क्रूर्ता है
- 16:16–16:19जबकी गाँवालो के उस अभिलेक में
- 16:19–16:23उन शोशत लोगो का रक्त, पसीना और उनकी आत्मा शामिल है.
- 16:23–16:26देखेग, ये एक बेहत सुन्दर रूपक है.
- 16:26–16:32और मुझे ये स्विकार करना होगा कि लेखख ने प्रक्रती और स्म्रिती का ये गडज्जोड
- 16:32–16:35बहुत इखाव्यात्मक दंख से प्रस्थ॥ किया है.
- 16:35–16:41लेकिन रूपुकों और कवितांव से थोड़ा बाध निकलते है और बात कर दे है अप्रादियों के अन्जाम की.
- 16:41–16:44आखर उन अप्रादियों का पतन हुए कैसे?
- 16:44–16:46तो आपके हिसाप से कैसे हुए?
- 16:46–16:51अगर आप कहानी का अंद देखें, तो ये विषुध्द रूप से एक संस्थागत हार है.
- 16:51–16:54लाओकी नहंग के विदेशी कहाते सील होगै.
- 16:54–16:57अगर ये किसी जादू या बूदप्रेट का काम ता?
- 16:57–17:05नहीं, ये एीरा, गोपकुमार और देविका दवारा तभारा तभार कीगेगेगेट देटा और साक्षियों के जाल का परनाम था.
- 17:05–17:07लेकिन क्या वही आस्ली सजाजा थी?
- 17:07–17:13निश्छित रोप से अद्वार्द ब्रुम जैसे ताकत्वर विदेशी शोषक को अपनी कमपनी का नाम क्यों बड़ना पडा?
- 17:13–17:18क्यों की अईरा ने हाववर्द में जो तकनी की साखषे जो हाद्द़्ाएप प्रस्थ॥ की
- 17:18–17:48उस्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्
- 17:48–18:18अगर बड़ान्ता बद्रा रागव लोग इनहंग और ब्रुम प्रुम प्रुम प्रुम प्रुम प्रुम प्रुम प्रुम प्रुम प्रुम प्रुम प्रुम प्रुम प्रुम प्रुम प्रुम प्रुम प्रुम प्रुम प्रुम प्रुम प्रुम प्रुम प्रुम प्रुम प्
- 18:18–18:20के भीतर एक अदालत बैटती है
- 18:20–18:24अहो आप उस मनो विग्याने का दालत की बात कर रहे है
- 18:24–18:26ये सर्फ मनो विग्यान नहीं है
- 18:26–18:29ये एक अलोकिक तेसर कबड़ी है
- 18:29–18:32जिसे आप केवल गिल्ट या अप्राद बोद कहे रही है
- 18:32–18:34वो लोक चितना दवारा दीगे सजा है
- 18:34–18:44ज़रा उन द्रिश्खों को याद करे, जब क्रूर वकील बटुकनात नहाने जाता है, तो उसे अपने सनान के पानी में म्रित सर्यु देवी का नाम तेरता हुए दिखाई देता है.
- 18:44–18:49रागव, जिसने लोगो की आवास दबाए थी, वो अपनी आवास को बैटता है,
- 18:49–18:52और उसके प्रिंटर से अपने आप म्रितुकों के नाम चबने लगते है.
- 18:52–18:56आप, वेद्रिष्ष बहुत फी दरावने और प्रतिकात्मक है.
- 18:56–19:00लाओ के नंग अपने आलीशान शीष महल में एक ब्यानक सबना बेखता है
- 19:00–19:05जहाँ पानी में दूपते हुए मुवायल फोन उसे उसकी तखी का हिसाब मागते है
- 19:05–19:09उसर्फ प्रतिकात्मक नहीं है, वो अस्ली सचाजा है
- 19:09–19:39अपने अपने बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा �
- 19:39–19:42जेल जान्राया पैसेख होना बहुत असान है,
- 19:42–19:45लेकिन अपनी आत्मा में हर पल उस पाप को जीना,
- 19:45–19:48ये विषुथ रूप से नेटिक और आत्मिक न्याय है,
- 19:48–19:52जो उस चन्ना गाची की लोग चेतना ने उनपर ठोपा है.
- 19:52–19:55ये सच है, मैं आप की इस बाथ से पूरी तरा सहमत हूँ,
- 19:56–19:59कि अप्राद्यों का ये मनोवेग यानेक और आत्मिक पतन कता का
- 19:59–20:01एक बहुत फीप्रभाव शाली हिस्सा है.
- 20:02–20:05लेक्हक ने उनके अंताकरन के इस जागरन या उकहें कि
- 20:05–20:09उनके इस भ्यँंकर खौफ को बहुती गेराई से उके रहे है.
- 20:09–20:12जब वे अप्रादी टीक से नाम का उच्चारन नहीं कर पाते,
- 20:13–20:15जब उनके खुदके हस्ताक्षर दून्ले परने लकते है.
- 20:16–20:19तो ये उनके अप्राद बूद का एक शान्दार चित्रन है.
- 20:19–20:21तो फिर आप मानती है कि आस्ली सजा यही ते?
- 20:21–20:23एक हद तक है.
- 20:23–20:26लेकिन फिर भी मैपने मुल तरक पर वापस आँँगी.
- 20:26–20:28जरा विवाहरे खोकर सूचीए.
- 20:28–20:32क्या उनका ये पतन ये दर समब होता?
- 20:32–20:35अगर सत्टिवरत महता ने अदानत मे वो सुची नहीं पडी होती?
- 20:35–20:37देके वो तो बसे नहीं अगी
- 20:37–20:42अगर गोप कुमार और अईरा ने उनके खातों की गडबडी नहीं पक्डी होती
- 20:42–20:43तो क्या होता?
- 20:43–20:48वो जो भीत्री अडालत लगी वो बाहरी अडालत की कार्रेवाही के बाद ही शुरू हुई
- 20:48–20:54जब उने लगा क्या वो सिस्टम से भी नहीं बज्च्सकते, तब जाकर उनका वो अभिमान तुटा.
- 20:54–21:00गोही सबख भीच जल समादी में शोषितों का ये पूरा संगष राजे के जूथ,
- 21:00–21:08यहने उनके द़ारा बनाएगे जूटे कागस को सत्यड यहनी दस्तबेजी प्रमान से पराजिद करने के उत्क्रिष्ट गाता है.
- 21:08–21:11चिन जूटे कागजों ने मज्दूरों और युवाँँ को फसाया था,
- 21:11–21:16उनी सक्षों वाले सही कागजों ने आखिर कार उने आजादी दिलाई.
- 21:16–21:18और यही मैं आपनी बात को समझटना चाहूंगा.
- 21:18–21:20आपके पास तर्क मस्गुद हैं,
- 21:20–21:25और ये सच है कि इस लड़ाई में तकनी की और कानुनी सक्ष्यों ने एक हत्यार का काम किया.
- 21:25–21:31लेकिन अगर आप इस उपन्यास की आप्सली आत्मा को महजुस करें, तो वो किसी कोट्रुम की फाँलो में नहीं मिलेगी.
- 21:31–21:35वो आत्मा चन्ना गाची के उन बरगद और पीपल के पेडो में,
- 21:35–21:37उस हल्दी काजल वाली नाम पनजी में,
- 21:37–21:39और उस लोग स्म्रिती में बसती है.
- 21:39–21:43कानून आपका पैसा वापस दे सकता है.
- 21:43–21:45कानून आपको मुआव्जा दे सकता है.
- 21:45–21:50लेकिन आपकी मर्यादा आपकी गरीमा किवल समाज ही आपको लोटा सकता है.
- 21:50–21:54जब देविका और मिनल तैक करते हैं के चुप रहना थख की पहली कमाई है,
- 21:54–21:58और वे अपनी निच्ता की शपत लेते हैं तो वे कोई कानुन नहीं बबडल रहे होते हैं.
- 21:58–22:01वे पुरे समाज की सोच बदल रहे होते हैं
- 22:01–22:04मनुश्ष्य का नाम किसी भी कानुनी फैस्ले
- 22:04–22:09या सरकारी मिर्टु प्रमाडपत्र से कई गुना जाडा पवित्र और स्थाई होता है
- 22:09–22:11ये तो मैं बी मानती हूं
- 22:11–22:16तो आग लक सकती है, हार द्राइ मिटाई जासकती है, संस्ताई कहरीदी जासकती है,
- 22:16–22:20लेकिन चन्ना गाची का वो बुडह भूद, जो कबद्टी खिलाता है,
- 22:20–22:22वो कभी हार नहीं मानता.
- 22:22–22:27आप आप द़ाई तब होता है, जब एक समवदाई किसी भी अन्याय को बूलने से साफ इनकार कर दे.
- 22:27–22:34आप जानते है, हमारी इस लंभी और गेहरी चर्चा के बाद, मैं एक बाद पर आप से पुरी तरज़ा सैमत हों.
- 22:34–22:37आप चा, किस बाद पर?
- 22:37–22:42इसी बात पर के चाहे ये सनगर सद्टा के गल्यारो में
- 22:42–22:45फाईलों और हाद़्ाइवस के भीछ लडा जा रहा हो
- 22:45–22:51या फिर गरनारी केल गाँउंके, उस बरगत के पेड के नीचे लोग परमपराँउं के भीच,
- 22:51–22:56एस उपन्यास ने आस आदारन रूप से ये सिद किया है,
- 22:56–22:59कि दुन्या का सबसे बड़ा अप्राद किसी की जान लेना नहीं है,
- 22:59–23:04बलकी किसी की पहचान, किसी के वजुद और किसी के नाम को मिटाना है.
- 23:04–23:09बलकुल सही कहा अपने, किकि जब हम किसी का नाम पूरे सम्मान से पुकारते हैं,
- 23:09–23:12तो हम केवल कोई एक शबद नहीं बोल रहे होते.
- 23:12–23:18अँ उस अन्सान के पूरे अस्तितो को, उसकी पीडा को, और उसके संगर्ष को मानेता दे रहे होते हैं.
- 23:18–23:26एक दम सही कहा अपने, और इसी भिहद एहम विचार के साथ, हम आज की इस चर्चा के अंथ पर पहुज गये हैं.
- 23:26–23:30जो श्रोता इस विश्याय की गेरायो में और जाना चाहते हैं
- 23:30–23:34जो जानना चाहते हैं के कैसे एक छोटी सी जगे का संगर्ष
- 23:34–23:37पूरी दुन्या के शोषकों को चनाती दे सकता है
- 23:37–23:40उने निष्चित रूप से मुल सामगरी
- 23:40–24:10अदियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादिया�
- 24:10–24:14अपना जबाप खुद दूने की जमदारी आपकी है,
- 24:14–24:16हमारे साज जुनने के लिए दहनेवाद
Plain text
विमर्श्क यह समच पर आपका स्वागत है आज हम मतलब आज हम इक बहुती दिल्चास पुर शाए तुड़ा द्रावना विषे लेक रहे हैं ज़र आप सोच्छे अगर कल सुभा आप उटें और कोई आप से कहे की आपका कोई वजुद ही नहीं है आप आप बगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगग� बाल संस करन्ट पर केंद्रत है. ये कैसी कता है जो मस्दूरों, दिजितल थगी के शिकार यूवाँ और शोषित महिलाँँ के अस्तिट्वोग कागस से मिताने और फिर उसे वापस पाने के खोफनाक संगर्ष को दर्षाती है. तफफ़ उसे वापस पाने के खफनाक संगर्ष को दर्षाती है मैं इस पूरे विषे को एक कानोनी और संस्थागत लडाई के रुप में देखती हूँ अचा लेकिन मैं एसे तोडा अलग नजर ये से देखता हूँ इस पूरी कत्हा से जो सबसे बड़ा सवाल अवर कराता है, वो यह आप की जब कोई वेवस्ता आप को पूरी तरे से मिता देना चाहती है, तो सच्चा न्याय कहा से मिलता है? क्या न्याय अंततता, अदालतो, या मोहर लगे दस्तावेजो से मिलता है? मुल रुप से एक संस्तागत अदस्तावीजी संगर्ष है, उपन्यास में शोषक वर्ग ने लोगो को मिताने के लिए, कागज़ और दिजितल रिकोट्स का इस्तमाल किया. तो जब पीडद पलट्वार करते है, उनकी जीद भी सही दस्तावेजों, वेवास्ता को उसी के किल में हराना ही आस्ली न्याय है मैं समज रहूं अप ख्या क्या रहूं लेकिन मैं इसे बिलकुल अलग नजर्ये से देक्ताूं मैं अनना है कि संस्ताई अदालतें और कागज ये हमेशा अदूरे यह आप द़ालतें अगर लगाज यह भी आप द़ालतें अगर लगाज यह नहीं अगर वी वो बवाज़ा को उसी के खिल में हराना ही अस्टी नयाई है अदलत अदलत लग ज़े देकता हूँ। मेरा मानना है कि संस्ताई अदलते और कागज ये हमेशा अदूरे और अपर्याप्त हूँटे है। इस कता का मुल संदेश ये है कि सच्चा न्याए कागज के तुक्डों से नहीं बलकी तो बवागानी के उसे से पर गूर करे, जहान लद्तर ठाकृर एक बहुत्टी महत्वापून चेतावनी देते है, भीगे कागस की गंद सुंगना सीख हो, तो हमें समझ आता है कि लोग सम्रती से आता है. चनन गाची के सम्रती? ज़िल्ये इस चर्चा की श्रूएत बूनियादी स्थर्से करते हैं अगर हम कहानी के उस हसे पर गूर करे जहां लद्टर ठाकृर एक बहुती महत्वापून चेतावनी देते हैं भीगे कागस की गंद सुंगना सीख हो तो हमें समज आता है कि ए पूरी कहानी दस्तावेजो के इर्द गिर्द बूनी गई है जिरा सोची ए, शोशक वर्ग कुन है और उनो ने अप्राद कहा किये है चाहे वो ब्रष्ट पर्योजना प्रमुक शशीभूशंदेव हो वकील बटुकनात हरीहरन हो या फिर दिजितल तगी का जाल बिचाने वाल चंद्रपाल बत्रा और विदेशी अपरेटर लाओ किनहंग इन सभीने किसी को सीदे गोली नहीं मारी आँ उप तो है उनके हत्यार तकनीक और फाइले ती बलकोल उदारन के लिए जब प�ल हाथसे में मज्दूर बिसेसर पास्वान की दर्दनाक मुत होती है, तो सिस्टम उसे म्रित नहीं लिखता. विवस्ता के रजिस्टर में चालाकी से लिखती आ जाता है. काजिस्तल चोडि अनुपस्तित, यानी वो काम से गायाब है. सही कहा. और म्रित्तिव का मतलब है, भी बज़ा देना जिम्डारी लेना आँ, लेकिन अनुपस्तित का मतलब है कि वो व्यक्ती अपनी मरजी से चला गया उनोने कागस का इस्तमाल कर कि उसकी मुझ्त को ही गाएप कर दिया इसलिये मेरा तरक यह एक पीटितो को जो संगर्ष है अदर बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ ब ये एक बहुत फीज़े है. कागस किसी अनसान का वुजुद बचाचता है? श्रोटाओ को ये समजना होगा, कि इस कता की आप्सली आत्मा किसी आदारत के तन्धे कमरे में नहीं, बलकी गडनारी केल गाँँ की चन्ना गाची में बसती है. लेकिन वो तो एक रूपक है ना? नहीं, वो रूपक से कही बडखर है. ये बरगगद और पीपल के पेडों का वो जुरम॥ है. जहां गाँके म्रित लोगो की आतमाएं, जिने वेवस्ताने बुला दिया है, वो बूध बनकर कबद्टी खेलते है. अप नियास का वो मुल्वाक के आद कीजे गोही दे खाईत अच्छी नाम नहीं यानी मगर्मच आपके शरीर को खाँ सकता है लेकिन वो आपका नाम नियाँ नियाँ के नाम नियाँ के नाम नियाँ के नाम नियाँ के नाम नियाँ के नाम नियाँ के नाम नियाँ के नाम नि अगर देखाना देखाना था आप जाएजाड़ा देखादा था आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आ नाम पन्जी अपना कुत का जन अभिलेक बनाना शुप रहना शुप दिया था अस्ली लडाई लोगो की स्मरिती में जिन्दा रहने की है किसी सरकारी रजिस्टर में नाम दरज कराने की नहीं रूकिये, ये एक बहाती बहावुक द्रिष्टी कोड है पर आईए जर उत्पीडन के वास्तविक स्वरूप पर बाथ करते हैं हमें ये समझना होगा कि ये शोशन कोई आमुर्थ या अद्यात्मिक चीज नहीं ती ये पूरी तरह से प्रनालिगत और और आर्थेख शोशन ता विदेशी कमपनी ब्रुम कालर ने जो पोल गोटाला किया वो मुनाफे के लिए क्या गया ब्रष्टाचार था और जो दिजिटल ठगी का जाल लाओ किनहंग और चंद्र पालबत्रान ने बिचाया उसे देखे उनोने मासुम यूवाँ को मुल अकाूंस में फसाया मुझे लगता है कि यहां आमे थोडा रूक्कर सपष्ट करना जाहीए, कि यह मूल अकाून साखें काम कैसे करते हैं, कुंकि यही यही सुपन्नियास की एक बढी कडी है. बलक्ल, मतलप शूताउं के लिए यह से अज़े समजे, मान लिजे आपकी दिजिटल पहचान चुराली गई है आपका आदार आपका पैंकाड लिएस्तमाल करके जाल साजोने कोई बंक खाता खूल लिया है और आपको भनक तक नहीं? आपको पता भी नहीं क्यापके नाम पर कोई खाता है लिकिन उस खाते के जर ये करोनो रुपै के हेराफेरी की जारे है काला दन सपेट किया जारहा है आप अपने गर में आराम से बटेखे है और आचानक प�लिस दर्वाजे पर आती है कुकी कागजों के अनुसार वो सारा प्राद आपनी किया है आप रातो रात एक अप्रादी बन जाते हैं बिलकुल मालवेका ग्रीन का जो देहे व्यापार कराकिट ता वो बी इसी टरा की ब्लाक्मेलिंग और देटा के दमपर चल रहा था और उज्वल जाग का मामला तो इस से भी जादा ख्वापनाक था अज्वल जा उसके आत्महत्या कोई भावनात्मक कम्जोरी नहीं ती वो दिजितल अरेस्ट और आर्थिक बरभादी का सीथा पर अव्टी थी दिजितल अरेस्ट भी आजके समय का एक बहुत कढवा सच है सही कहा इस में होता यह के आपको एक विडिो कोल आता है श्क्रीन पर पूलिस की वर्दी में कुछ लोग होते है, वो खेटे है के आपका नाम किसी बहुत बडे मनी लाँण्रिं केस में आई आई आई, और जब जाज पूरी नहीं होती आप क्याम्रे के सामने से नहीं हद सकते. एक तरह की दिजितल कैद? आप तो आप को आपके ही गर में, श्क्रीन के जर ये कैध कर लेते हैं. वो आपको दराद हम काखर, आपके सारे पैसे अपने खातो में खाटों कर वालेते हैं. अनसान उस दर और मानसिक प्रतारना में, इतना तुट जाता है, कि वो अपनी जान दे देता है, जो इस शोशन के ती केंदर में है दिक है मुझे माव करें लिकिन मैं इस बाथ से बिलकुल सहमत नहीं हूं आप जिसे सर्फ आर्थिक नुक्सान या संस्तागत क्रूर्ता कहरें है वो इस पूरे अप्राद का केवल इक सतही बहुत थिक परिनाम है पैसे का जाना या जेल का दर असली चोट नहीं है, असली क्रूरता है किसी विक्ती का नाम और उसकी गरीमा को चीन लेना. लेकिन वो गरीमा तो आर्थिक शोषन से ही चिन रही है ना? अगर दिज़टल अरेस्ट के उस खोफ और स्क्रींग के खारन इतना सद्मे में है कि वो अपना नाम तक बूल गया है. वो अपना नाम नाम नहीं बता पाता. बिलकुल. वो अपना नाम नाम नहीं बूल पाता. अग, उब दिजटल अरेस्ट के उस खोफ और स्क्रींग के ब्रम के कारन इतना सद्मे में है, के वो अपना नाम तक बूल गया है. वूँ अपना नाम नहीं बतापाता भिलकु वूँ अपना नाम नहीं बोल पाता जब तक के हुलासी उसे जगजोर कर याद नहीं दिलाती के अंक छोड नाम भाज यानी नमबरों और देटा के दुन्या से बहारा और अपना नाम बोल मैं मानती हूँ की वो बहाती मार्मिक द्रिष्च है, लेकिन... और दरका कारण आर्थिक हो सकता है, लेकिन उसका प्रहार अन्सान की अस्मिता पर हुता है. जब देविका उन फसे हुए यूवाँ को बचाती है, तो उसका नारा क्या हुता है. वो ये नहीं कहती के हम तुमँरा पैसा वापस लाईंगे वो कहती है लाज अप्रादी की होनी चाहीए पीडद की नहीं ये बात कितनी गेरी है आव वो वागगे बात गेरी बात है ये केवल पैसो की लूट नहीं है ये अन्सान की सामाजिक गरीमा पर सीदा हमला है बलैक्मेल की शिकार मिडाले नी जब निष्ता की शपत लेती है तो वा आर्थिक नुक्सान की बात नहीं करती वो भआई और लाज से मुक्ती की बात करती है अगर वेवस्ता अपका सम्मान ही का ग़ा ग़ाई तो बेंक में वापसाए चन्द रूपः आपको निया कैसे दे सकते हैं? आपके बात में एक दाशनिग गेहराई जरूर है. मैं एसे इंकार नहीं करूंगी. लेकिन मैं आपको इसी कहानी से एक अलग द्रिष्टिकों देती हूँ. आच्छा? आगर ये लडाय केवल स्म्रिती गर्मा और लोग चेतना की ती तो प्रतिरोद की सब से महतो पुरन रननीती क्या थी ज़र शुचिए कहानी में गोप कुमार और इशान्दत क्या करते हैं वे तमाम साक्षों की, देटा की, तीन अलग-लग memory drive बनाते हैं आप यह उ बैकव बनाते हैं एक हाड्राय वो सत्टिवरत महता को देते हैं जो उसी सरकारी विवस्ता का हिस्चा है तुस्री प्रती वो देश के बाहर एरा को बेज्टे हैं ताकी अंतराश्ट्रियस तर परदबाश हो सके और तीस्री प्रती वो गाँ में पीपल के पेड के खोखर में चबाते हैं विलकुल वो से चबाते हैं लेकिन सवाल है कि क्यों? वे बहुत अची टरा जानते हैं के लोख स्म्रती या गर्मा को भी सुरक्षित रक्छट रह्गने कि लिए बहुतिक अगर दिजिटल साख्ष्य यानी देटा की ज़रूरत होती है अगर उनके पास वो हाड़्ाइव्स नहीं होती अगर उनके पास संस्तागत प्रमाँन नहीं होते तो क्या चन्नागाची का संगर्ष महेज एक स्थानिया भूतिया कहानी बनकर नहीं रहे जाता बिना सबूतों के विद्दन्या की इतनी बडी ताकतों से कैसे लड़ते? ये एक बहुती दिल्चस बिन्दू है, हला की मैंसे बिलकुल आलक दंग से प्रस्थ॥ करूंगा. वो तीन प्रत्या इसले नी बनाते क्यों कि उने संस्ताओं या कागजों पर बरोसा है. वो इसलि एसा करते हैं क्योंकि उने अच्छी तरा पता है कि संस्थाये ब्रष्ट हैं, वे कागज मिता देंगी. अपन्यस में बहुत खुबसुरत बात कही गगे है, नदी एक प्रती नहीं रकती. नदी एक प्रती नहीं रकती. आप बार बार सक्ष्यों की बात कर रहे हैं, लेकिन उस अदालत वाले दिश्ये पर वापस आईए. आप जाहा सत्वरत महता नाम परते हैं. आप लेकिन उसके बात क्या होता है. जब जीट मिलती है तो अदालत खाली है. लडाई का असली मेदान कोई नयाले नहीं ता, वो चन्ना गाँची का गाँ। ता. आब बार बार सक्ष्यो की बात कर रही हैं, लेकिन उस आदालत वाले दिशे पर वापस आईए. आप, जहाँ सद्वरत महता नाम परते हैं. आप उस्छन को कैसे नजर अंदास कर ता है? जब जीट मिलती है तो आदालत काली है वकील हरी हरन जिसने जीवन बर कानुनी दाउपेस देखे है वो हेरान रहे जाता है उसे समझ नहीं आता की जीटने वाले लोग जच्छन मनागे आदालत क्यो नहीं आए अप अदी आप अज़्ोर के अप आप अज़्ोर के अप आप अज़्ोर के अप अप अज़्ोर के अप अप अज़्ोर के अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अ� सर्यों की चूडी लेकर बारभा न्याले की चोखखड पर जाता है, तो वो जूता महेजिक भावना नहीं है. वो एक अकार्टे बहुत इक साखश है. आआ, वो द्रिष्च वाखे बहुत प्रभावी है. या उपन्यास का सब से शक्तिषाली श्रन है. जब स्रकारी वकील सत्तिवरत महता अदालत में कडाई होता है और अपने ही विभाग के सरकार के जुटे शबत पत्र को मानने से प्यटाई ता है वो एक भूकम्प की तरा था बलकुल, वो एक रोंगते कडे करने लापल ता अगना वो जजके सामने सील बंद लिफाफा खुलवाता है, सरकार ने जिन मस्दूरों की मुझ्छषिपाई ती जगा तीस सरकारी अदिकारियों के नाम दरज कर दिये ते. सद्तिवरत महता उन्तीज चुटे नामों को नहीं परता, बलकी तीन्सो वास्थविक मज्दूरो के नाम परता है. उस समें आदालत में जु सन्नाता चाजाता है, जर उसे महसुस की जीए. वो सन्नाता संस्तागत बदलाव की शुरूवात है. उसी सुची के पड़े जाने से चंद्रपाल बत्रा के कालेख हाते सील होते हैं ब्रष्ट बार कुन्सिल अद्ध्ध्ख्ष रही हरन्पर नोटिस जारी होता है नियाईपालिका के भीटर लडागाया ये कानुनी संगरषी वो हतोडा जिसने अप्राद्वियो के पूरे सामराज़े को तोर दिया. मैं ये बिलकुल नहीं कहाँ अदालत मुन अस्ली नामो का पडाजाना महतपोड नहीं ता. लेकिन वो केवल एक चिंगारी ती. आप कह रहीं कि पूरा बडलाव अदलत से आया, लेकिन आस्ली बडलाव तो समाजके भीतर से आता है. जब गावाले अपनी वो नाम पन्जी बनाते है, तो वो क्या करते है? वे सरकारी रिजिस्टो में लिखे गयो उन रूके नामो को नहीं लिकते है. वे उन आमो को दरज करते हैं जिन से वो वकती गर में पुकारा जाता ता अच्छ? तो वे उनके गरेलू आम लिकते है? आप वे उसके अस्ली वजुद को दरज करते हैं वे आसा करके राजजके सेकादिकार को चुनोती दे रहे हो ते हैं कि तुम तैं आई रही करोगे कि हम कों है? हम तैं करेंगे. यही पर मैं आप से एक सीथा सवाल करना चाहूंगी. आप ने कहाँ के गाँवाले अपनी नाम पनजी बनारे हैं. तो क्या वो रजिस्टर जिस्मे वे नाम लिख रहे हैं स्वायमे एक दस्तवेज याने कागस कही नैधारूप नहीं है? और नहीं आप इसे कागस से नहीं. नहीं सूँनिये. आप राजजे के कागस को बूरा बतारे हैं. लिकिन जन कागस को महान बतारे हैं. आफिर कार प्रक्रिया तो दस्तवेजी करन की है नहीं है. वे उस पीतल के दिबबे को जिस में साक्षियो रेदे हैं, नारिल के पेड की जर में गार देते हैं. उपन्यास में इसे गवाही की रोपनी कहा गया है. यानी गवाही को किसी केट्बे के तो बचागा रेदे हैं. अपन्यास में इसे गवाही की रोपनी कहा गया है यानी गवाही को किसी केट की तरब बोना गवाही को बोया ये शब्द प्रेयोग बहुत अनोखा है हाँ और फिर इसका परनाम क्या होता है उन नारिल के पत्तोंपर उपन्यास में इसे गवाही की रोपनी कहागया है यानी गवाही को किसी केट की तरब बोना गवाही को बोया ये शब्द प्रेोग बहुत अनोखा है आप फिर इसका परणाम क्या होता है उन नारिल के पत्तों पर प्रक्रितिक रुप से वो नाम उबहर कर आते है जब एरा विदेश में बेटकर अपना भाशन सून्ड़े होती है, तो उसे अदवर्ट ब्रुम का चेहरा उस नारिल के पते पर लिखी इभारत में बड़लतावा दिखाई दिता है. आब देख रही हैं, ये दस्तावेज अप किसी दराज में रक्षी फाट नहीं है. ये प्रक्रतिका हिस्सा बन चुका है हल्दी, काजल, और गंगाजल से लिखा गया वुजन अभिलेक राज्य के त्टन्डे, स्याही वाले कागज से बहुत अलग है उस सरकारी कागज में क्रूर्ता है जबकी गाँवालो के उस अभिलेक में उन शोशत लोगो का रक्त, पसीना और उनकी आत्मा शामिल है. देखेग, ये एक बेहत सुन्दर रूपक है. और मुझे ये स्विकार करना होगा कि लेखख ने प्रक्रती और स्म्रिती का ये गडज्जोड बहुत इखाव्यात्मक दंख से प्रस्थ॥ किया है. लेकिन रूपुकों और कवितांव से थोड़ा बाध निकलते है और बात कर दे है अप्रादियों के अन्जाम की. आखर उन अप्रादियों का पतन हुए कैसे? तो आपके हिसाप से कैसे हुए? अगर आप कहानी का अंद देखें, तो ये विषुध्द रूप से एक संस्थागत हार है. लाओकी नहंग के विदेशी कहाते सील होगै. अगर ये किसी जादू या बूदप्रेट का काम ता? नहीं, ये एीरा, गोपकुमार और देविका दवारा तभारा तभार कीगेगेगेट देटा और साक्षियों के जाल का परनाम था. लेकिन क्या वही आस्ली सजाजा थी? निश्छित रोप से अद्वार्द ब्रुम जैसे ताकत्वर विदेशी शोषक को अपनी कमपनी का नाम क्यों बड़ना पडा? क्यों की अईरा ने हाववर्द में जो तकनी की साखषे जो हाद्द़्ाएप प्रस्थ॥ की उस्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट् अगर बड़ान्ता बद्रा रागव लोग इनहंग और ब्रुम प्रुम प्रुम प्रुम प्रुम प्रुम प्रुम प्रुम प्रुम प्रुम प्रुम प्रुम प्रुम प्रुम प्रुम प्रुम प्रुम प्रुम प्रुम प्रुम प्रुम प्रुम प्रुम प्रुम प्रुम प् के भीतर एक अदालत बैटती है अहो आप उस मनो विग्याने का दालत की बात कर रहे है ये सर्फ मनो विग्यान नहीं है ये एक अलोकिक तेसर कबड़ी है जिसे आप केवल गिल्ट या अप्राद बोद कहे रही है वो लोक चितना दवारा दीगे सजा है ज़रा उन द्रिश्खों को याद करे, जब क्रूर वकील बटुकनात नहाने जाता है, तो उसे अपने सनान के पानी में म्रित सर्यु देवी का नाम तेरता हुए दिखाई देता है. रागव, जिसने लोगो की आवास दबाए थी, वो अपनी आवास को बैटता है, और उसके प्रिंटर से अपने आप म्रितुकों के नाम चबने लगते है. आप, वेद्रिष्ष बहुत फी दरावने और प्रतिकात्मक है. लाओ के नंग अपने आलीशान शीष महल में एक ब्यानक सबना बेखता है जहाँ पानी में दूपते हुए मुवायल फोन उसे उसकी तखी का हिसाब मागते है उसर्फ प्रतिकात्मक नहीं है, वो अस्ली सचाजा है अपने अपने बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा � जेल जान्राया पैसेख होना बहुत असान है, लेकिन अपनी आत्मा में हर पल उस पाप को जीना, ये विषुथ रूप से नेटिक और आत्मिक न्याय है, जो उस चन्ना गाची की लोग चेतना ने उनपर ठोपा है. ये सच है, मैं आप की इस बाथ से पूरी तरा सहमत हूँ, कि अप्राद्यों का ये मनोवेग यानेक और आत्मिक पतन कता का एक बहुत फीप्रभाव शाली हिस्सा है. लेक्हक ने उनके अंताकरन के इस जागरन या उकहें कि उनके इस भ्यँंकर खौफ को बहुती गेराई से उके रहे है. जब वे अप्रादी टीक से नाम का उच्चारन नहीं कर पाते, जब उनके खुदके हस्ताक्षर दून्ले परने लकते है. तो ये उनके अप्राद बूद का एक शान्दार चित्रन है. तो फिर आप मानती है कि आस्ली सजा यही ते? एक हद तक है. लेकिन फिर भी मैपने मुल तरक पर वापस आँँगी. जरा विवाहरे खोकर सूचीए. क्या उनका ये पतन ये दर समब होता? अगर सत्टिवरत महता ने अदानत मे वो सुची नहीं पडी होती? देके वो तो बसे नहीं अगी अगर गोप कुमार और अईरा ने उनके खातों की गडबडी नहीं पक्डी होती तो क्या होता? वो जो भीत्री अडालत लगी वो बाहरी अडालत की कार्रेवाही के बाद ही शुरू हुई जब उने लगा क्या वो सिस्टम से भी नहीं बज्च्सकते, तब जाकर उनका वो अभिमान तुटा. गोही सबख भीच जल समादी में शोषितों का ये पूरा संगष राजे के जूथ, यहने उनके द़ारा बनाएगे जूटे कागस को सत्यड यहनी दस्तबेजी प्रमान से पराजिद करने के उत्क्रिष्ट गाता है. चिन जूटे कागजों ने मज्दूरों और युवाँँ को फसाया था, उनी सक्षों वाले सही कागजों ने आखिर कार उने आजादी दिलाई. और यही मैं आपनी बात को समझटना चाहूंगा. आपके पास तर्क मस्गुद हैं, और ये सच है कि इस लड़ाई में तकनी की और कानुनी सक्ष्यों ने एक हत्यार का काम किया. लेकिन अगर आप इस उपन्यास की आप्सली आत्मा को महजुस करें, तो वो किसी कोट्रुम की फाँलो में नहीं मिलेगी. वो आत्मा चन्ना गाची के उन बरगद और पीपल के पेडो में, उस हल्दी काजल वाली नाम पनजी में, और उस लोग स्म्रिती में बसती है. कानून आपका पैसा वापस दे सकता है. कानून आपको मुआव्जा दे सकता है. लेकिन आपकी मर्यादा आपकी गरीमा किवल समाज ही आपको लोटा सकता है. जब देविका और मिनल तैक करते हैं के चुप रहना थख की पहली कमाई है, और वे अपनी निच्ता की शपत लेते हैं तो वे कोई कानुन नहीं बबडल रहे होते हैं. वे पुरे समाज की सोच बदल रहे होते हैं मनुश्ष्य का नाम किसी भी कानुनी फैस्ले या सरकारी मिर्टु प्रमाडपत्र से कई गुना जाडा पवित्र और स्थाई होता है ये तो मैं बी मानती हूं तो आग लक सकती है, हार द्राइ मिटाई जासकती है, संस्ताई कहरीदी जासकती है, लेकिन चन्ना गाची का वो बुडह भूद, जो कबद्टी खिलाता है, वो कभी हार नहीं मानता. आप आप द़ाई तब होता है, जब एक समवदाई किसी भी अन्याय को बूलने से साफ इनकार कर दे. आप जानते है, हमारी इस लंभी और गेहरी चर्चा के बाद, मैं एक बाद पर आप से पुरी तरज़ा सैमत हों. आप चा, किस बाद पर? इसी बात पर के चाहे ये सनगर सद्टा के गल्यारो में फाईलों और हाद़्ाइवस के भीछ लडा जा रहा हो या फिर गरनारी केल गाँउंके, उस बरगत के पेड के नीचे लोग परमपराँउं के भीच, एस उपन्यास ने आस आदारन रूप से ये सिद किया है, कि दुन्या का सबसे बड़ा अप्राद किसी की जान लेना नहीं है, बलकी किसी की पहचान, किसी के वजुद और किसी के नाम को मिटाना है. बलकुल सही कहा अपने, किकि जब हम किसी का नाम पूरे सम्मान से पुकारते हैं, तो हम केवल कोई एक शबद नहीं बोल रहे होते. अँ उस अन्सान के पूरे अस्तितो को, उसकी पीडा को, और उसके संगर्ष को मानेता दे रहे होते हैं. एक दम सही कहा अपने, और इसी भिहद एहम विचार के साथ, हम आज की इस चर्चा के अंथ पर पहुज गये हैं. जो श्रोता इस विश्याय की गेरायो में और जाना चाहते हैं जो जानना चाहते हैं के कैसे एक छोटी सी जगे का संगर्ष पूरी दुन्या के शोषकों को चनाती दे सकता है उने निष्चित रूप से मुल सामगरी अदियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादिया� अपना जबाप खुद दूने की जमदारी आपकी है, हमारे साज जुनने के लिए दहनेवाद