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तत्त्वचिन्तामणि.mp4

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Part 8 · VIDEHA MITHILA MAITHILI DISCUSSION CRITICISM SERIES PART 8
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  1. 0:00–0:03नमस्ते, और इस बेहत खास दार्षनिक विष्लेशन मे आपका स्वागत है
  2. 0:03–0:07आज हम एक आजे अटिहासे ग्रन्त की गेरायो में उतरने वाले है,
  3. 0:07–0:10जिसने भार्तिय तरक्षास्ट्र की पुरी नीव हिलाकर रक्ती थी,
  4. 0:10–0:13गंगे शुपाद्याय की तत्वट चिंतामनी.
  5. 0:13–0:16विषेश रूप से, हम इसके मेठली अनुवाद के नजरये से,
  6. 0:16–0:21इसके विशाल, संस्क्रितिक और दाशनिक वजन को समजने का प्रैयास करेंगे.
  7. 0:21–0:23तो चलिए बिना किसी देरी के शुग करते हैं?
  8. 0:23–0:26चलिए, सीदेस के अंदर गोता लगाते हैं.
  9. 0:26–0:30इस गरन्त का दाईरा सच्कहुटो बिलकुल अगल्कल्पनियो है.
  10. 0:30–1:00प्रत्ट्ख्छ्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्�
  11. 1:00–1:04अम सच्छ में कैसे जानते हैं के जो हम अपनी आखो से देख रहें एं
  12. 1:04–1:09वो असल में सच्छ हैं? ये सवाल सिझ पुराने जमाने के दार्षिनिको का नहीं है.
  13. 1:09–1:14बलकी ये एक अज्सा सार्व भहूमें क प्रश्न हैं जो हम सब के अनुबवव से जुडा है.
  14. 1:14–1:18अदियान के प्रामानने के विवाद पर जाएंगे, ब्रहम के कारनो को समजंगे,
  15. 1:18–1:21अनुमान और व्याप्ती के सिद्धान्त को देखेंगे,
  16. 1:21–1:25अर अंत में उपादी के प्रभाव पर चर्चा करेंगे.
  17. 1:25–1:28तो चलिए, अपने पहले पडाउसी शुरू करते है,
  18. 1:28–1:33ब्रहम के कारनो को समजेंगे, अनुमान और व्याप्ती के सिद्धान्त को देखेंगे,
  19. 1:33–1:36और अन्त में उपादी के प्रभाव पर चर्चा करेंगे.
  20. 1:36–1:40तो चलिये अपने पहले पडाव से शुभूकरते हैं,
  21. 1:40–1:42मंगला चरन का दार्ष्निक महत्व.
  22. 1:42–1:48अब इस लाईद में जो सबस्सिदिल्चास बात है वो ये है, यहां दो बड़े दर्षनामने सामने है.
  23. 1:48–1:53मी मान्सा वाले कहते हैं कि मंगला चरन बस इसले किया जाता है ताकी किताप पूरी होजाए.
  24. 1:53–1:59अदाब पूरी होजाए, सिम्पल, लेकिन गंगेश का न्याए दर्ष्छन कैता है, नहीं अजा नहीं है,
  25. 1:59–2:04उनके अनुसार इसका सीथा काम किताप पूरा करना नहीं, बलकी विगन नाश है,
  26. 2:04–2:10यानी उन अन अदेकी बादावों को ज़र से खत्म करना जो आपकी काम को रोक सकती हैं.
  27. 2:10–2:13लेकिन यहाए एक बहुती शांदार लूपहोल सामने आता है.
  28. 2:13–2:17सोची अगर कोई नास्ते क्या कोई बहुती लापर्वा लेक्ख,
  29. 2:17–2:20बिना कोई मंगला चरन की ही आपनी किता पूरी कर ले.
  30. 2:20–2:24तो गंगेश यहा क्या गजब का तरक देते हैं.
  31. 2:24–2:28वो केते हैं कि भी हो सकता है उस वेक्ती के पिछले जनमो के अच्छे करम हो.
  32. 2:28–2:30या फिर कोई बादा पहले से मुझुदी ना हो.
  33. 2:30–2:32जिसे विगना बहाव केते हैं.
  34. 2:47–3:17यहां फिर से एक जोर दार दार्षनिक बहिस च्डी हूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ�
  35. 3:17–3:21याएक एक येशा सवाल दाकते हैं, जो सीदा निशाने पर लकता है.
  36. 3:21–3:24अगर हर ग्यान अपने आप में भिलकुल सच है,
  37. 3:24–3:27तो हम अनसानो को कभी किसी चीस पर शक क्यों होता है.
  38. 3:27–3:31जर ज़ा सोच ये अगर हर नहीं जानकारी तुरन सच साभित हो जाती,
  39. 3:31–3:36तु क्या हम कभी हिचकि चाते? क्या कभी दूविद्धा में परते? बिलकुल नहीं.
  40. 3:36–3:42और यही वो तर्ख है, जो स्वताह प्रमानिये वाद की त्यरी को पूरी तरह से हिला कर रग देता है.
  41. 3:42–3:47आब आते है, तीस्रे हिस्से पर, ब्रम् और प्रव्रित्ती के कारन,
  42. 3:47–3:51मतलप, हमारा दिमा कभी कभी चीजों को गलत क्यो समज लेता है?
  43. 3:52–3:54इस पूरी गॉथ्ती को सुलजाने के लिए,
  44. 3:54–3:58प्राचीन भारतिया दर्षन का वो सब से मशूर उदारन लेते है.
  45. 3:58–4:01किसीने एक सीप को चान्दी क्यो समज लिया?
  46. 4:01–4:31जब कोई के नारे पर पडी एक चमकती हूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ
  47. 4:31–5:01अगे बड़ने से पहले अनुमिती की इस थोडी भारी भरकम तक्नी की परीभाशा को दिए अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अ�
  48. 5:01–5:03अगर दिख़़ करना बहुत ज़ोडी है.
  49. 5:03–5:06नियाए दर्षन कहता है कि अनुमिती वो ग्यान है,
  50. 5:06–5:08जो तब पैडा हुता है,
  51. 5:08–5:11जब हम ये समचते है कि किसी पकष में
  52. 5:11–5:13एक हास हेतू मोझुद है
  53. 5:13–5:15अर वो व्याप्ती से जड़ा हूए
  54. 5:15–5:18इस पूरे लोगिकल प्रोस्सेस को परामश भी कहते हैं
  55. 5:18–5:21है मुझे पता है ये तोडा मुशकिल लगरा है
  56. 5:21–5:25तुच चलिए इसे एक बहुत ही क्लासिक रोज मर्रा के उदारन्से समचते है
  57. 5:25–5:55याग बज़ादिया तो बज़ादिया तो बज़ादिया तो बज़ादिया तो बज़ादिया तो बज़ादिया तो बज़ादिया तो बज़ादिया तो बज़ादिया तो बज़ादिया तो बज़ादिया तो बज़ादिया तो बज़ादिया तो बज़ादिया तो बज़ा�
  58. 5:55–5:56कभी ना तुटने वाला रिष्ता है.
  59. 5:57–5:59अगर इस रिष्ते में जरासी भी खोट है.
  60. 5:59–6:03यानी अगर ये अव यवविचारी नहीं तो समज लिजे,
  61. 6:03–6:05क्याप का पूरा का पूरा तारकिक निषकर्ष,
  62. 6:06–6:08ताश के पत्तों की तरा वही देजाएगा.
  63. 6:08–6:12इतिहास के पन्नो को पलतें तो व्याप्ती को परिबाशित करने किलिए
  64. 6:12–6:16कई पुरानी कोशिशे हूँई ती, जैसे व्याप्ती पन्चक,
  65. 6:16–6:21यानी पाज पुरानी परिबाशाए, या फिर वो मशूर सिंग व्याग्र लक्षन,
  66. 6:21–6:29लेकिन गंगेश उनो आपने टीखे तर्को से इन पुराने मोडल्स का एक एक करके अँसा कहन्दन किया कि पुच्छेमत।
  67. 6:29–6:36उनो अँने सावित कर दिया कि ये पुरानी परिबाशाइ खास स्थितियो में पुरी तरह फेल हो जाती है।
  68. 6:36–7:06अभी भी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बाद
  69. 7:06–7:12अन्त में हम अपने पाच्वे और आख्च्री भागबर आते हैं अनुमान में उपादी कप्रबाव.
  70. 7:12–7:16क्या होता है जब कोई लोगिक उपर से तो बिलकुल सही दिखे.
  71. 7:16–7:20लेकिन अंदर यंदर उस में कोई गुप्त खामी हो।
  72. 7:20–7:24उपादी का सीद़ा समतलब है, एक छिपी हूए शर्थ.
  73. 7:24–7:28दर्षन शास्टर में ये एक आज्टष्पा हूए विलन है,
  74. 7:28–7:31जो आपके तार्गित यानी साद्धे के साथ तो हमेशा रहता है,
  75. 7:31–7:35लिकन आपके सबुत यानी हेतू के साथ हमेशा रहता.
  76. 7:35–7:40और ये जो असंतुलन है ना यापके पूरे अनुमान को दूशित कर दिता है,
  77. 7:40–7:42उसे अंदर से खोखला कर दिता है.
  78. 7:42–7:46इसे गीले इंदन के उस शान्दार उदाहरन से समजते है.
  79. 7:46–7:49हम कहते है, पहाड पर दूवा है, क्योंकि वहां आग है.
  80. 7:49–7:52लकता तो एक दम सही है,
  81. 7:52–7:55लेकिन यहां गीली लक्डी वो छिपी हुपादी है.
  82. 7:55–8:00सच तो यह कि आग अकेले हमेशा दूवा पहदा नहीं करती.
  83. 8:00–8:04दूवा तो तब उट्टा है जब आग गीली लक्डी के समपरक में आती है.
  84. 8:04–8:07तो ये उपादी साभिद कर देती है,
  85. 8:07–8:10कि आग और दूए का रिष्ता पुरी तरह से स्वतन्त्र नहीं,
  86. 8:10–8:13बलकी इस एक छिपी हूई शर्थ पर तिका है.
  87. 8:13–8:15तो लब्बो लुबाब ये है,
  88. 8:15–8:17कि गंगेश इन छिपी हूई शर्थों को,
  89. 8:17–8:19तो हिस्सो में बादते है.
  90. 8:19–8:25पहली है निश्चित उपादी, जो आपके लोगिक को पूरी तरा से चकना चूर कर देती है,
  91. 8:25–8:29कुकि वो साव साविट कर देती है कि आपका निशकर्ष सश्षर्थ है,
  92. 8:29–8:36उदुस्री है संदिख्द उपादि, जो आपकी मन में एक गेहरी हिचके चाहत और संदेह पैदा कर देती है,
  93. 8:36–8:39जिस से आप कभी किसी पक्के नतीजे पर पहुँची नहीं पाते.
  94. 8:39–8:42तो जाते-जाते, जरा इस पर विचार की जे,
  95. 8:42–8:48अमारी रोज मर्रा की जिन्गी में, हम जो इतने सारे फैसले लेते हैं, निशकर्ष निकालते हैं,
  96. 8:48–8:53उनवेसे कितनो के पीचे आसी अंदेकी उपाद्या, या चिपी हूँई शर्टे काम कर रही हूंगी?
  97. 8:53–8:58क्या हमारा सच, सच्मुच में सच है, या किसी चिपी हुई शर्थ का मोताच है?
  98. 8:58–9:04इसी गेरे सवाल के साथ, हमारे इस दार्षनिक विष्लेशन का सच्फर यही समाप्त होता है.
  99. 9:04–9:06दर्शन और तर्ख की इस भूल भुलया में,
  100. 9:06–9:09हमारे साथ चलने के लिए बहुत-बहुत द्श्वाद.

Plain text

नमस्ते, और इस बेहत खास दार्षनिक विष्लेशन मे आपका स्वागत है आज हम एक आजे अटिहासे ग्रन्त की गेरायो में उतरने वाले है, जिसने भार्तिय तरक्षास्ट्र की पुरी नीव हिलाकर रक्ती थी, गंगे शुपाद्याय की तत्वट चिंतामनी. विषेश रूप से, हम इसके मेठली अनुवाद के नजरये से, इसके विशाल, संस्क्रितिक और दाशनिक वजन को समजने का प्रैयास करेंगे. तो चलिए बिना किसी देरी के शुग करते हैं? चलिए, सीदेस के अंदर गोता लगाते हैं. इस गरन्त का दाईरा सच्कहुटो बिलकुल अगल्कल्पनियो है. प्रत्ट्ख्छ्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्ख्� अम सच्छ में कैसे जानते हैं के जो हम अपनी आखो से देख रहें एं वो असल में सच्छ हैं? ये सवाल सिझ पुराने जमाने के दार्षिनिको का नहीं है. बलकी ये एक अज्सा सार्व भहूमें क प्रश्न हैं जो हम सब के अनुबवव से जुडा है. अदियान के प्रामानने के विवाद पर जाएंगे, ब्रहम के कारनो को समजंगे, अनुमान और व्याप्ती के सिद्धान्त को देखेंगे, अर अंत में उपादी के प्रभाव पर चर्चा करेंगे. तो चलिए, अपने पहले पडाउसी शुरू करते है, ब्रहम के कारनो को समजेंगे, अनुमान और व्याप्ती के सिद्धान्त को देखेंगे, और अन्त में उपादी के प्रभाव पर चर्चा करेंगे. तो चलिये अपने पहले पडाव से शुभूकरते हैं, मंगला चरन का दार्ष्निक महत्व. अब इस लाईद में जो सबस्सिदिल्चास बात है वो ये है, यहां दो बड़े दर्षनामने सामने है. मी मान्सा वाले कहते हैं कि मंगला चरन बस इसले किया जाता है ताकी किताप पूरी होजाए. अदाब पूरी होजाए, सिम्पल, लेकिन गंगेश का न्याए दर्ष्छन कैता है, नहीं अजा नहीं है, उनके अनुसार इसका सीथा काम किताप पूरा करना नहीं, बलकी विगन नाश है, यानी उन अन अदेकी बादावों को ज़र से खत्म करना जो आपकी काम को रोक सकती हैं. लेकिन यहाए एक बहुती शांदार लूपहोल सामने आता है. सोची अगर कोई नास्ते क्या कोई बहुती लापर्वा लेक्ख, बिना कोई मंगला चरन की ही आपनी किता पूरी कर ले. तो गंगेश यहा क्या गजब का तरक देते हैं. वो केते हैं कि भी हो सकता है उस वेक्ती के पिछले जनमो के अच्छे करम हो. या फिर कोई बादा पहले से मुझुदी ना हो. जिसे विगना बहाव केते हैं. यहां फिर से एक जोर दार दार्षनिक बहिस च्डी हूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ� याएक एक येशा सवाल दाकते हैं, जो सीदा निशाने पर लकता है. अगर हर ग्यान अपने आप में भिलकुल सच है, तो हम अनसानो को कभी किसी चीस पर शक क्यों होता है. जर ज़ा सोच ये अगर हर नहीं जानकारी तुरन सच साभित हो जाती, तु क्या हम कभी हिचकि चाते? क्या कभी दूविद्धा में परते? बिलकुल नहीं. और यही वो तर्ख है, जो स्वताह प्रमानिये वाद की त्यरी को पूरी तरह से हिला कर रग देता है. आब आते है, तीस्रे हिस्से पर, ब्रम् और प्रव्रित्ती के कारन, मतलप, हमारा दिमा कभी कभी चीजों को गलत क्यो समज लेता है? इस पूरी गॉथ्ती को सुलजाने के लिए, प्राचीन भारतिया दर्षन का वो सब से मशूर उदारन लेते है. किसीने एक सीप को चान्दी क्यो समज लिया? जब कोई के नारे पर पडी एक चमकती हूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ अगे बड़ने से पहले अनुमिती की इस थोडी भारी भरकम तक्नी की परीभाशा को दिए अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अ� अगर दिख़़ करना बहुत ज़ोडी है. नियाए दर्षन कहता है कि अनुमिती वो ग्यान है, जो तब पैडा हुता है, जब हम ये समचते है कि किसी पकष में एक हास हेतू मोझुद है अर वो व्याप्ती से जड़ा हूए इस पूरे लोगिकल प्रोस्सेस को परामश भी कहते हैं है मुझे पता है ये तोडा मुशकिल लगरा है तुच चलिए इसे एक बहुत ही क्लासिक रोज मर्रा के उदारन्से समचते है याग बज़ादिया तो बज़ादिया तो बज़ादिया तो बज़ादिया तो बज़ादिया तो बज़ादिया तो बज़ादिया तो बज़ादिया तो बज़ादिया तो बज़ादिया तो बज़ादिया तो बज़ादिया तो बज़ादिया तो बज़ादिया तो बज़ा� कभी ना तुटने वाला रिष्ता है. अगर इस रिष्ते में जरासी भी खोट है. यानी अगर ये अव यवविचारी नहीं तो समज लिजे, क्याप का पूरा का पूरा तारकिक निषकर्ष, ताश के पत्तों की तरा वही देजाएगा. इतिहास के पन्नो को पलतें तो व्याप्ती को परिबाशित करने किलिए कई पुरानी कोशिशे हूँई ती, जैसे व्याप्ती पन्चक, यानी पाज पुरानी परिबाशाए, या फिर वो मशूर सिंग व्याग्र लक्षन, लेकिन गंगेश उनो आपने टीखे तर्को से इन पुराने मोडल्स का एक एक करके अँसा कहन्दन किया कि पुच्छेमत। उनो अँने सावित कर दिया कि ये पुरानी परिबाशाइ खास स्थितियो में पुरी तरह फेल हो जाती है। अभी भी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बाद अन्त में हम अपने पाच्वे और आख्च्री भागबर आते हैं अनुमान में उपादी कप्रबाव. क्या होता है जब कोई लोगिक उपर से तो बिलकुल सही दिखे. लेकिन अंदर यंदर उस में कोई गुप्त खामी हो। उपादी का सीद़ा समतलब है, एक छिपी हूए शर्थ. दर्षन शास्टर में ये एक आज्टष्पा हूए विलन है, जो आपके तार्गित यानी साद्धे के साथ तो हमेशा रहता है, लिकन आपके सबुत यानी हेतू के साथ हमेशा रहता. और ये जो असंतुलन है ना यापके पूरे अनुमान को दूशित कर दिता है, उसे अंदर से खोखला कर दिता है. इसे गीले इंदन के उस शान्दार उदाहरन से समजते है. हम कहते है, पहाड पर दूवा है, क्योंकि वहां आग है. लकता तो एक दम सही है, लेकिन यहां गीली लक्डी वो छिपी हुपादी है. सच तो यह कि आग अकेले हमेशा दूवा पहदा नहीं करती. दूवा तो तब उट्टा है जब आग गीली लक्डी के समपरक में आती है. तो ये उपादी साभिद कर देती है, कि आग और दूए का रिष्ता पुरी तरह से स्वतन्त्र नहीं, बलकी इस एक छिपी हूई शर्थ पर तिका है. तो लब्बो लुबाब ये है, कि गंगेश इन छिपी हूई शर्थों को, तो हिस्सो में बादते है. पहली है निश्चित उपादी, जो आपके लोगिक को पूरी तरा से चकना चूर कर देती है, कुकि वो साव साविट कर देती है कि आपका निशकर्ष सश्षर्थ है, उदुस्री है संदिख्द उपादि, जो आपकी मन में एक गेहरी हिचके चाहत और संदेह पैदा कर देती है, जिस से आप कभी किसी पक्के नतीजे पर पहुँची नहीं पाते. तो जाते-जाते, जरा इस पर विचार की जे, अमारी रोज मर्रा की जिन्गी में, हम जो इतने सारे फैसले लेते हैं, निशकर्ष निकालते हैं, उनवेसे कितनो के पीचे आसी अंदेकी उपाद्या, या चिपी हूँई शर्टे काम कर रही हूंगी? क्या हमारा सच, सच्मुच में सच है, या किसी चिपी हुई शर्थ का मोताच है? इसी गेरे सवाल के साथ, हमारे इस दार्षनिक विष्लेशन का सच्फर यही समाप्त होता है. दर्शन और तर्ख की इस भूल भुलया में, हमारे साथ चलने के लिए बहुत-बहुत द्श्वाद.

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