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सरकारी_फाइलों_और_यादों_का_न्याय.m4a
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- 0:00–0:04गजिंद्र ताकृर के मैठली उपन्यास गोही सबखबीच जल समादी के
- 0:05–0:08बाल संसकरन के इस तवरित सारांख्ष में आपका स्वागत है
- 0:08–0:13या दिल्चस्प कहानी हमें दिखाती है, कैसे ब्रष्ट विवस्ठाःए
- 0:13–0:16अनसानी सच्चाई को फाणलो में दफन कर देती हैं
- 0:16–0:21और कैसे एक गाँ अपनी साजी यादों के जर ये उस सच को फिर से जिन्दा करता है.
- 0:21–0:25पहला, कहानी गड नारी केल गाँ से शुरू हुती है,
- 0:25–0:30जहां एक पूल गिरने से, भिसे सर पास्वान जैसे कई ज़ुए जान चली जाती है.
- 0:30–0:37लिकिन जरा सोचीए वो ब्रष्ट अदिकारी मुतो का अक्डा तीनसो से गटा कर सर्फ तीस कैसे करते हैं
- 0:37–0:41वो बस सर्कारी रजिस्टर में उने अनुपस्थित लिग देते हैं
- 0:41–0:43जबकी गतना स्थल पर बिख्रे हुए जुते
- 0:43–0:47जैसी जमीनी सच्चाया चीक चीक कर सज बता रही थी
- 0:47–0:51अब आपी बताएए, क्या कोई अन्सान महेज एक सरकारी आक्डा हो सकता है?
- 0:51–0:55तुस्रा, यह ब्रष्टा चार स्व एक पूल तक सीमित नहीं रहता
- 0:55–1:00बलकी यह दिजितल दूखाद़ी और देध व्यापार जैसे अप्रादो तक जोर जाता है.
- 1:00–1:04जब अदालतें विफल हो जाती हैं, तो गाम वाले बिलकुल हार नहीं मानते.
- 1:04–1:07वो चन्ना गाशी इनाम के एक पेड के नीचे जुटते हैं.
- 1:07–1:12कहा जाता है कि यहां भूथ आपनी पहचान बचाने के लिए कबद्टी केलते हैं
- 1:12–1:15यही पर वो अपनी कुटकी नाम पनजी तयार करते हैं
- 1:15–1:18ताकि कोई भी पीडद कभी गुमनाम न रहें
- 1:18–1:21सच में जब कानुन की आखे बन दोजाएं
- 1:21–1:26अद्द़़, बतुकनात और चंद्रपाल जैसे ब्रहष्ट दलालो की आस्ली हार किसी कानुनी अदालत में अद्दी।
- 1:27–1:32उनकी हार थो तब होती है, जब उनके अपने ही बच्चे उनके गुनाहो पर सवाल उठाने लकते है।
- 1:32–1:36जब उनके अपने ही बच्चे उनके गुनाहों पर सवाल उठाने लकते हैं
- 1:36–1:39ये बलकुल एक बंद कम्रे की बासी हवाजैसा है
- 1:39–1:42जो एक ना एक दिन बाहर निकल ही जाती है
- 1:42–1:46और पीडियो के यही सवाल उने अंदर से पुरी तरा खोखला कर देते हैं
- 1:46–1:50अन्याय के खिलाज सबसे बड़ा हद्यार स्वर्फ आदालते नहीं है
- 1:50–1:53बलकी शोषितों के नामों और उनकी कहानियों को बूलने से
- 1:53–1:56साफ इंकार कर देना ही सच्ची जीत है
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गजिंद्र ताकृर के मैठली उपन्यास गोही सबखबीच जल समादी के बाल संसकरन के इस तवरित सारांख्ष में आपका स्वागत है या दिल्चस्प कहानी हमें दिखाती है, कैसे ब्रष्ट विवस्ठाःए अनसानी सच्चाई को फाणलो में दफन कर देती हैं और कैसे एक गाँ अपनी साजी यादों के जर ये उस सच को फिर से जिन्दा करता है. पहला, कहानी गड नारी केल गाँ से शुरू हुती है, जहां एक पूल गिरने से, भिसे सर पास्वान जैसे कई ज़ुए जान चली जाती है. लिकिन जरा सोचीए वो ब्रष्ट अदिकारी मुतो का अक्डा तीनसो से गटा कर सर्फ तीस कैसे करते हैं वो बस सर्कारी रजिस्टर में उने अनुपस्थित लिग देते हैं जबकी गतना स्थल पर बिख्रे हुए जुते जैसी जमीनी सच्चाया चीक चीक कर सज बता रही थी अब आपी बताएए, क्या कोई अन्सान महेज एक सरकारी आक्डा हो सकता है? तुस्रा, यह ब्रष्टा चार स्व एक पूल तक सीमित नहीं रहता बलकी यह दिजितल दूखाद़ी और देध व्यापार जैसे अप्रादो तक जोर जाता है. जब अदालतें विफल हो जाती हैं, तो गाम वाले बिलकुल हार नहीं मानते. वो चन्ना गाशी इनाम के एक पेड के नीचे जुटते हैं. कहा जाता है कि यहां भूथ आपनी पहचान बचाने के लिए कबद्टी केलते हैं यही पर वो अपनी कुटकी नाम पनजी तयार करते हैं ताकि कोई भी पीडद कभी गुमनाम न रहें सच में जब कानुन की आखे बन दोजाएं अद्द़़, बतुकनात और चंद्रपाल जैसे ब्रहष्ट दलालो की आस्ली हार किसी कानुनी अदालत में अद्दी। उनकी हार थो तब होती है, जब उनके अपने ही बच्चे उनके गुनाहो पर सवाल उठाने लकते है। जब उनके अपने ही बच्चे उनके गुनाहों पर सवाल उठाने लकते हैं ये बलकुल एक बंद कम्रे की बासी हवाजैसा है जो एक ना एक दिन बाहर निकल ही जाती है और पीडियो के यही सवाल उने अंदर से पुरी तरा खोखला कर देते हैं अन्याय के खिलाज सबसे बड़ा हद्यार स्वर्फ आदालते नहीं है बलकी शोषितों के नामों और उनकी कहानियों को बूलने से साफ इंकार कर देना ही सच्ची जीत है