MACHINE ASR ACCESSIBILITY AID
मैथिली_गजलक_व्याकरण_आ_छन्दक_बहस.m4a
Timestamped machine output
- 0:00–0:09वल्क्म तो देबेट, कल्पना करू, जे आहा आपन शहरक सबसे बहव्या अस्सुन्दर भवनक कात में तार ची,
- 0:09–0:15अकर गुमबच, अकर खम्मा, अकर देवाल, सब किछ मने एक्दम अदबुत अची.
- 0:15–0:18आए, एक्दम, देखाई में बहुत सुन्दर लागे तोईत.
- 0:18–0:25सत्य, मुदा जक्हन आहा उकर भीतर जाइच्छी ता आहा के अचानक सब दाचले ता ची,
- 0:25–0:29जे इप पूरा वास्तूकला एक ता गनितिय जुट पर थाड़ा ची.
- 0:29–0:33गनितिय जुट? मने उकर नीप ग़बड़ा ची?
- 0:33–0:39एक्दम सा खम्हा के कोन नब दिगरी नहीं अची नीबक संतुलन गडबड़ आची
- 0:39–0:44तकना हा की कहब की ओब हवन आपन सुन्दरता क कारने तार आची
- 0:44–0:49वा कोनो दिन इगनिती अ गडबड़ी क कारने बर भराग क खसी पडदत
- 0:49–0:53आई हम्रा सबख विमर्ष्क विशे कुछ आहने आची
- 0:53–0:56आई आई बहुत रोचक विशे आची
- 0:56–1:02हम्रा सबख केंद्र में आची गाजेंद्र ताकृ आर आशीश अंछिनहार दवारा संपादित
- 1:02–1:06अट्यंत महत्वपुर्न पुस्तक मेठिलीक प्रतिनिदी गजल
- 1:06–1:08इस अंकलन मात्र कविताक पोठी नहीं आची
- 1:08–1:12बलकी मेत्फिली गजलक एक शताबदी सा अदिकक
- 1:12–1:15ए तिहासिक यात्रा के टाप प्रामानिक दस्तावेज आची
- 1:15–1:19आई पोठी एक टाब बहुत बाग विमर्षक किनजन मदेत आची
- 1:19–1:27मैत्टिली गजल मे वण्व्रत माने मात्रा के गनेत आग कछोर चंदक के निमग अनीवार्यता के ते कछी.
- 1:27–1:30की गजल के प्रान उक्रा व्याक्रन में आची?
- 1:30–1:31वा!
- 1:31–1:32वा!
- 1:32–1:37एक रा सरल वारनिक बहर सविस्तापित काईल जासके तची,
- 1:37–2:07जदे बहाँ प्रदान्ता अ चन्दक शितिल्ता किन सुएकार काए लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा ल�
- 2:07–2:10देव प्रगतिषील होई ताची, औ़ साज़ ले ताची,
- 2:10–2:13सरल वारनिक भहर, वा चंद में चुट देभे,
- 2:13–2:17कोनो पतन नहीं, बलकी मैठिली भाशा का प्रक्रिती,
- 2:17–2:19और गजल अख सवबहविक विकासक एक ता,
- 2:19–2:22मने अबहिन नहीस सा थिक.
- 2:22–2:28तच्छलू, हम आपन पक्ष पष्ट रूपे राख दी, गजल कोनो सादारन कविता नहीं तच्छ,
- 2:28–2:31जे आहा किछ पंकती लिखदेलू आ उ गजल भोगेल.
- 2:31–2:37इ मात्रा अच्ठ जेकरा वन्व्रत वब बहर कहल जाए तच्छ,
- 2:37–2:40तकर एक ता पुन गनितिय अखलात्मक संद्रचना थेख
- 2:40–2:42मुदा बाशा तक गनितने थेख ने?
- 2:42–2:44बाशा गनितने ही ची
- 2:44–2:50मुदा शिल्प तव जे ना कोनो गाडिक इंजन में एक ता टामिंग बेल्ट होई तची
- 2:50–2:54जो अ बेल्ट एक मिलिमिटर सि हु आपन जगा सक्फिसकी जाए
- 2:54–2:57तपूरा इंजन मिस्फार करे लागा तची
- 2:57–3:01तची, तची आहा वर्ण व्रित्त के इंजन के बेल्ट मानी रहा जी
- 3:01–3:05दिएदम गजल में वर्ण व्रित्त उही तामिंग बेल्ट ग काज करे तची
- 3:05–3:08आहा संकलनक भूमिका के जन दियान से देखव,
- 3:08–3:11तक गजंदर जी औआशीश जी सपच्ट रूपन उलेक के निचत्छतिन,
- 3:11–3:14जो उनी सच्टर सद्वाजार आप दरिक समय में,
- 3:14–3:17जे तताकतित क्रान्तिकारी गजल कार सबेला,
- 3:17–3:20उलोकनी सहित्या काद्मी पुरस्कारक लोब में
- 3:20–3:22गजल का कोदो बारी उजाडी देल थिन
- 3:22–3:25पाप्रे! कोदो बारी उजाडी देल थिन
- 3:25–3:27इता बड़ा कदोर शब्द भागलन
- 3:27–3:28कदोर! मुदा यतारत
- 3:28–3:32मने उलोकनी इंजनक बेल्टे निकाल कफेखी देलने
- 3:32–3:36व्याक्रनक भिस्री, जेना तेना गजल लिखब गजल का आत्मा के मारब्थिक
- 3:36–3:40एकर वेप्रीट, कवीवर सीटाराम जा, काशी कन्त मिष्रम वधुप
- 3:40–3:46अब बाद में जग्दीश छन्र ताकृर अनिल, योगा नन्द रीए, अव जेनाद जाजेना गजल कार
- 3:46–3:52इप्रमानित केलने, जे मेपुन व्यक्रनिक शुद्द्धाख सं गजल लिखल जासके तची.
- 3:52–3:56आ, उनका लोकने काज्त महत्त पून आची उ मानवे परत.
- 3:56–4:02तखान जखनी दिगग ज्लोकनी नियमक परिदिमे रहक, उतक्रिष्ट रचना का सके चला,
- 4:02–4:05तब आदक लोकनी व्याक्रन् सकी एक भागला है
- 4:05–4:08गजल मे अनुसासन सर्वो परी आची
- 4:08–4:11देखो, इएक ता प्रभाव शाली तर कछी
- 4:11–4:14मुदा की आहा विचार केलू है जी
- 4:14–4:17बाशा आब भाउ सब आएक कोनो दाशा नहीं भचकत आची
- 4:17–4:19आहा इंजनक बेल्टक उदारन देलों
- 4:19–4:21मुदा भाशा कोनो मशीन नहीं देक
- 4:21–4:24मुदा दाशा भीना भाशा गजल कुन बनत
- 4:24–4:27बुजली ए, मुदा गजलक उपत्ती
- 4:27–4:29प्रेमि आ प्रेमिकाग भीचक समवाद सभेल आची
- 4:29–4:31वहे में बहाउ का प्रबलता हूए ते ची
- 4:31–4:34संकलन में इस वहम सुईकार के ले लग ची
- 4:34–4:37जे पन्द जीवन जा आ यदूना जा यदूवर जका
- 4:37–4:39प्रारमभिग गजलकार सबक रषना में
- 4:39–4:43मातर सथर असी परतीषेत वरनव्रुत चल
- 4:43–4:48अग, जक्रा पानी चलकनाई कही रहूल ची हम अग्रा अनुशासन हींता कहे चे.
- 4:48–5:18आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ�
- 5:18–5:23भाओ अ समप्रेशनक लेल चन्द में चुड देव कुन वप्राद न नहीं थेक
- 5:23–5:26हम भूजी रहाल ची जहाएना की एक सुची रहाल ची
- 5:26–5:29मुदा हम आहाके एक ता विन्ना द्रिष्टिकोंड ड़ारहाल ची
- 5:29–5:33आहा जीवन जा आयदूवर जिक प्रारंभिक त्रूटी कर बात करो होल ची
- 5:33–5:38मुदा संकलन इहो तक है तची जे उजे प्रारंभिक गलती चल
- 5:38–5:42उक्रा कवीवर सीटाराम जा आम दूभची पूनता दूरुस्त कोदिलने
- 5:42–5:45माने उलोकनी नदी के बक्सा मे फित कोदिलने
- 5:45–6:15आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� �
- 6:15–6:22अजन के पुण रूप सत्तून कर देलेनी, तफिर पाचा भुरब आन्यम तोडब मुर्खता नहीं तकी थिक.
- 6:22–6:28चामा करव हमरा इबुजही दियो. आहा जक्रा अशुद्दिः वा गल्ती कही रहाल ची,
- 6:28–6:33अग, कि उ वास्त्तो में गल्ती चल, वा एक ता सच्येत बाशिक स्वतन्त्रता?
- 6:33–6:38बाशिक स्वतन्त्रता, व्याकरन तोडब स्वतन्त्रता कोन भहस अके तची?
- 6:38–6:44कि एक ता संकलन में अश्पष्त उल्लेक है जे प्रारमबिक गजलकार लोगनी चन्द निर्वाहलेल,
- 6:44–7:14उद्याई ता बाजाग जाई ता था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था
- 7:14–7:16अगरा खारिज की एक केल जाए?
- 7:16–7:18खारिज एह लेल की लेल जाए,
- 7:18–7:22की एक तग खाजलग एक ता सुतन्त्र विद्खागत परी भाशा आची.
- 7:22–7:24तो उखरा खारिज की एक खालजाए
- 7:24–7:27खारिज एह लेल की एक तगजल एक ता सुत्ट्र विदागत परी भाशा आची
- 7:27–7:30देखु आहा लोग गी तक लेल में लिखफ, तो खरा लोग गीट कहुना, गजल की अची
- 7:30–7:33मुदा गजल से हो तगाबल जायत अची
- 7:33–7:35गबल जायत ची
- 7:52–7:55मुदा परी भाशाग अस्पष्ट्तार हवाख्चा ही
- 7:55–7:59गजलक नियम अरुजी मने चन्जास्त्र से चलगते चे
- 7:59–8:04आब आव, उनिस्व सथटर से दूहँजार आप्टकर उही कतित क्रान्तिकारी युग पर
- 8:04–8:07जक्रा हम अंद्खार युग कहत ची
- 8:07–8:08अंद्खार युग?
- 8:08–8:10इहा बहुत पैग आख्शेप लगा रहल ची.
- 8:10–8:15आख्शेप नहीं इस अंकलन अटिहासिक तत्ते रखाई तचे
- 8:15–8:18जे इस समय अनुशासन हींताक चरम चल.
- 8:18–8:23दोक्तर राम देवज्या उनिस्थोच्छरासीग रच्ना पत्रिका में जे गजलक आलोचना लिख्ठल नहीं
- 8:23–8:28उही में सरस, रमेश, वियोगी जैन लोकनिक के गजलकार कुरुप में गिनादल नहीं
- 8:28–8:31जे वस्तुता गजलकार चले नहीं
- 8:31–8:34मुदा हुंका लोकनिक संदेश तो महतुपून चल नहीं
- 8:34–8:36रक लालसा नहीं चल
- 8:36–8:39लोक गजलक फाम के अपनाबे चाहे चला
- 8:39–8:44की अगते ही लोग प्री आबहाराल चल, मुडा उकर महनत से बहागई चला.
- 8:44–8:51बिना गनेट सीखेने इंजीनीर बनवाखी प्रयास गजल के वास्तू कलाके मने एक दम भद्दा को देलक.
- 8:51–8:54नहीं नहीं, हम रही तरक पचीने रोल अची.
- 8:54–8:55हम बता एच्छी की एक.
- 8:55–9:00आँ वही कालखन्ड के के वल पुरुस्कारक लाल्साग कही का खारिज करोल ची
- 9:00–9:04इवही समाजिक आज साहितिक उठल पुठलक संण अन्याय जी
- 9:04–9:06अन्याय को ना तत्ते ता सामने आची
- 9:06–9:09की अगत ओँएक संदेशक की उगचल
- 9:09–9:15लोग चाहे च्छला जे गजल राजदर्बारवा पन्दित का गोष्टी से निकली कड चोपाल पराबे
- 9:15–9:19आजे लोग व्याक्रन के पकष में ख़ा च्छला तिनकर इस्तिती पर स्योत विचार करूू
- 9:19–9:23तिनकर इस्तिती एक दम स्पष्ट जी ओलोगनी नियम मानल है
- 9:23–9:29अग, विजेनाद जाजिक नाम लेल हूँ, जे अनुशासन कबडका जंडा उठाबे वाला चला.
- 9:29–9:34मुदद संकलन में यहो बात देल गेल अची, जे विजेनाद जी गजल मिसो एक ता नियम उलंगन वेटे तची.
- 9:34–9:36नियम उलंगन? कते?
- 9:36–9:42उ, शब्दक शुरुबला दीरग के लगु माने च्छला, आब आई नी सोचु,
- 9:42–9:49जा सबसः उत्तम व्याक्रन शास्त्री, जे गजलक शिल्प कवीवर सी ताराम जायुगक मानल जाई तची,
- 9:49–9:54उनका सद्से हो इच्छुट भोजे तची, तची उक्रा हा लापर वाही कोना कहब?
- 9:55–9:59उ लापर वाही नहीं चल, उ ततकालीन ब्रामक नीमक प्रभाव चल.
- 10:00–10:04हम्रा लागे तची, उक्रा मेतली भाशाक प्रकिर्ती कहल जेवाक चाही.
- 10:04–10:13मैत्लिक उच्छारन्प्रवर्ती अर्भी फार्सी से भिन आएज अब विजेनात जीजे का कवी इबात अच्छेतन रूप से बुजेचला है.
- 10:13–10:18हा, इएक का रोचक बिन्दू आच्छे, यदपी हम एक रा भिन्दू रूपे रखभ.
- 10:18–10:24विजेनाज्जी गजल में जी चुट आची उक्रा समपादक लोकनी स्विकार के लन ही आची
- 10:24–10:28जे उ ततकालीन व्याकरन शास्तरी सबग दोश चल
- 10:28–10:32उलोकनी ब्रामक नियम बना दे लन ही कवी कदोश ने चली
- 10:32–10:33माने गलती तबहेल
- 10:33–10:36उही समय किच नियम सपष्ट नहीं चल
- 10:48–10:55जराक स्पस्ट करु श्रोता कलेल, जे इ मात्राक नियम काज कुना करेतेची, कि एक ती बहुद जतिल लागेतेची.
- 10:55–11:04आ, एक दम, देखु वरनव्रित में प्रतेक शब्दद के लगु माने एक मात्रा, अदिर्ग माने दू मात्रा में तोलल जाएतेची.
- 11:04–11:15जेना चंद्र बिन्दु युक्त लगु के पहले पन्दि दीन बन्दु जाहां के समय से दिर्ग मानल जाईत चल, मुदा आब उक्रा वेकल्पिक औवस्ठा में दिर्ग मानल जाईत ची.
- 11:15–11:18रही तो व्याकरनक गार आई बहुगे ले.
- 11:18–11:24आ आरो सुनु, सै युक ताक्छर सा पहलुक अक्षरक के दिर्ग मानबाक जन्यम आची,
- 11:24–11:30जिना सत्टि शब्द में सच लगु होई तो आगा आदात्त होबा कारने सच दिर्ग बहुजाई तची.
- 11:30–11:34इकोन वन मानी नहीं थिक, इदोनिक विग्यान थिक.
- 11:34–11:36विग्यान अच्छी मुदा कितिक लोग इबुजध?
- 11:36–11:38जगन इग गनित पूरा होईता ची
- 11:38–11:41तकन गजल मे एक ता वजन आवेत ची
- 11:41–11:44इवजना कारने गजल कान मे रस गोरेत ची
- 11:44–11:47सरल वारनिक बहर केवल उकर ले लेगता चूट ची
- 11:47–11:52जे इ दोनिक विग्यान वा वरन व्रत लिख्वा में माने एक्दम असमर्त चती.
- 11:52–11:57औफ, मुदा इ असमर्ता के चुट वाला बाद्सा हम कतो सवमत ने चीए.
- 11:57–12:022008 का बादक खन्द में सरल वारनिक बहर कजे अस्थान दिलगे लची,
- 12:02–12:07उ अई श्पष्ट करएत अची, जे इएक ता स्वतन्त्र आमान न विदा बनी चुकल अची.
- 12:07–12:10स्वतन्त्र विदावा व्याक्रन सा बहाग बाक बहाना
- 12:10–12:16बहाना नही आची, आहा इराक मल लेक, स्वाती लाल, वा मुन्ना जी गजल पडू,
- 12:16–12:20उही में जे समकालीन वीमर्स अची, जे भावक तिवरुता अची,
- 12:20–12:24उक्रा आहा केवल एकर आदार पर खारिज नेका सकेची,
- 12:24–12:27जे उही में सन्युक्ताख्ष्रक पहिल अच्छर दिर्गनी भेल.
- 12:27–12:30मुदा गजलक शिल्प तक श्वर भागेल ने.
- 12:30–12:37सम्पादक लोकने स्वेम मानलने अची, जे इ नव गजलकार सबके जोडबाक एक ता ससक्त माद्ध्यम अचे.
- 12:37–12:41इ नव पुस्ता के लेल गजलक लोक्तान्त्रिकी करन थी.
- 12:41–12:45सहित ते कोनो बंद कमराक समपती नहीं भहसकेत अचे.
- 12:45–12:50मुदलोक तान्त्रीकी करनक नाम पर आहा विदाक मुल्या क्हन्दित करहल चीने?
- 12:50–12:54इत उही बात भेल जे हवाख ले गर क्दिवाल तोर दी?
- 12:54–12:57नहीं, हम विदाक के विस्तार देरहल ची.
- 12:57–13:01और आहा जे गनित असुद्द्धाक इत्टिक वकालत करहल ची,
- 13:01–13:04उही पर हम एक अट्यंत गंबेर प्रषन उटाब चाहे ची.
- 13:04–13:06कहु की प्रषन अची?
- 13:06–13:10इसंकलन एक ता पैग रहस्योद गातन करीत ची.
- 13:10–13:14सम्पादकी अच्तक्षेप आम मूल पाधक शुद्दhata क विशाई में.
- 13:14–13:18आहा आहम जे प्रामाडिक तक बात कोरहल ची,
- 13:18–13:20उ कते क्दिख विष्वस्वनी आची
- 13:20–13:22जकन हम्रा सव लग
- 13:22–13:24मुल पान्दूलीपी आची एह नहीं
- 13:24–13:28आजे च्याई उ सम्पादकक द्रिष्टी सविक्रित बही चुकल आची
- 13:28–13:30तकन उही तताथा कतेद
- 13:30–13:32शुद्दता पर ये देक हद्की आची
- 13:32–13:34अगा की इशारा कत जार हैं जे?
- 13:34–13:41हमर इशारा अची दोक्तर राम देवजा अच्चन्द्रनात मिश्र आमरजे का दिगगज समपादक लोकनिस दिस
- 13:41–13:47जे जीवनजा आ यदूवरजिक मूल वरतनी अच्चन्दक अपन ही सामे बदल देलनी
- 13:47–13:48बदली दिलने? कुना?
- 13:48–13:51संकलन मैं, एक ता बहुत पैग उदारन देला ची,
- 13:51–13:56या दूवर जीक एक ता गजलक पंक्ती चल, भग्वान हमर इ मित्ला.
- 13:56–14:01दोक्तर राम देव जाएक रा समपादित करी देलनेस, भग्वान हमर इ मित्ला.
- 14:01–14:02ता एमे की गर बडी एची?
- 14:02–14:05बवगवान तशुदद है व्याक्रनक द्र्ष्टी सा?
- 14:05–14:07गद्यक व्याक्रनक द्र्ष्टी सा, है?
- 14:07–14:08मुदद चन दग द्र्ष्टी सा?
- 14:08–14:10आप एक रषंगी तक ताल पर भुजु.
- 14:10–14:13बववान कमात्रा क्रम अची,
- 14:13–14:14दूई दूई एक,
- 14:14–14:17मानु, इतबलक दादिन्ता आची
- 14:17–14:19आबभगवन कमात्रा क्रम अची
- 14:19–14:21एक-ेक दुई
- 14:21–14:22माने तातादिन
- 14:23–14:26बाप्रे, इत पुरा वजन बदली गे ल्एक दम
- 14:26–14:29सम्पादक व्याक्रन शुद्द करवाक चक्कर में
- 14:29–14:32बभगवान के बभगवन कदिल नहीं
- 14:32–14:37अप सोचु, जकुन गजल कार धादिन्ता पर गजल लेबद केने अची
- 14:37–14:41अज सम्पादक उक्रा बीच में ताता दिन कडे तकी है ते
- 14:41–14:45आँ, गजलक लेए ब्रभरा का खसी परत
- 14:45–14:47आ, नर तक मुहक बर कषत
- 14:47–14:50सम्पादक लोकनी गजलक मूल वरतनी के
- 14:50–14:52सम्पादित कोकर मात्रा क्रमक के
- 14:52–14:55मानेोकर तामिंग बेल्ट के ग़बर कदिल हैं
- 14:55–14:58तकन आई हम आधा जे शुद्द्धा
- 14:58–15:01वावन्व्रित का वकालत कर रहल ची
- 15:01–15:02उ कतिक प्रमानी कची
- 15:02–15:04इते एक ता बहुद वीचारनी ये बात ची
- 15:04–15:10एक दम जखन इतिहासक पाना में समपादक आपन मन्मानी सच्छन्द बिगाडी चुकल चतिन,
- 15:10–15:14तकन गजल के के वल गनितक तराजूपर तोलप कतिक नयाय संगत अची.
- 15:14–15:20इत उही बातक समर्ठन भेल जि गजल के अकर बहाव आप रवाज सपरकल जाए,
- 15:20–15:23नकी समपादित आस सन्दिक दमात्रा क्रम्सा
- 15:23–15:26दिको ये ये ये टा बहुत पैग आहा मोमेंत थिक
- 15:26–15:29इपो थिक आहाक प्रश्नश्वत प्रतिषत जायाज अची
- 15:29–15:34आम मूल पात्ख विक्रितिक जेई उदारन गजेंदर ताकृ
- 15:34–15:36आआशिश अंचिनार जी प्रस्थत्के लें आची
- 15:36–15:39उ हम्रा सबक लेल एक ता चितावनी थिक
- 15:39–15:43आआआ, इबहुत रास अटिहासिक तत्ते के उजागर करे तची
- 15:43–15:47इबतावे तची जी भविश्यक शोदार्थी लोकनी के
- 15:47–15:52बिना कोनो आर्थिक लोबवक मुल पान्दूलिपिके खुजबाक आवशकता चे
- 15:52–15:59मुदा हमर्तर कच्छि, जे यी विक्रति यी नहीं प्रमानित करे तच्छे नियम होई बिना करे
- 15:59–16:01तए की प्रमानित करे तच्छे?
- 16:01–16:09इत इप्रमानित करे तच्ये, जि सम्पादक लोक्निक के नियमक वा गजलक, बहरक सम्यक ज्यान नहीं चलनी.
- 16:09–16:15उ लोक्निक गद्यक व्याकरन आप पद्यक चंदक भीचक अंतर नहीं भूँच सक्ला.
- 16:15–16:21जाहे कारने उ अग्यान्तावः मात्र वर्तनीक शुद्ध करबाक फेर में
- 16:21–16:23चंदक लैए बिगार देल नहीं
- 16:23–16:26माने आहा अगा अग आते से हो नियमक ही पक्ष लेब
- 16:26–16:27एक दम
- 16:27–16:31जा हुनका वरन व्रित तक औहे गने तक ज्यान रहतेनी
- 16:31–16:35तो उ भगवान के कखनो भगवन नहीं करेत्तेनी,
- 16:35–16:38ताहिलेल हमर बात आरो पुष्थ होगताची,
- 16:38–16:43गजलक व्याक्रनक ज्यान आहु भेशी आवश्षक भोजाईताची,
- 16:43–16:46जब हिसे इ एतिहासिक भूल के पचाडल जासके,
- 16:46–16:49आम वुल पाथक पुनर निर्माण केल जासके
- 16:49–16:54नियमक अग्यानता, नियमक अंदक कारन नहीं बनी सके तची
- 16:54–16:57आम आहाक एहर चिंता के समान करे ची
- 16:57–17:00मुदा समादानक दिशा भिन न देखाईचे
- 17:00–17:03चन्द आवरन व्रुत तच्यान आवश्यक आच्छ
- 17:03–17:05इह हम कतो से नहीं नकाडी रहल ची
- 17:05–17:09मुदा भाशा जकन समयक संग आगा बड़ेता ची
- 17:09–17:11तो अपन नियम सुयन गड़ेता ची
- 17:11–17:16मुदा नव नियमक नामप पुरान वास्तुकना बद्कावे पडद
- 17:16–17:19बद्कावे नहीं उक्रा विस्तार दिवे पडद
- 17:19–17:23सरल वारनिग भेहर एक ता नवा नीम तेक कुनो अराजकता नहीं?
- 17:23–17:29आहा उही काल कहन्ध के अंद्खार युग कहछ छी, जते लोक नीम नहीं मानलनीं.
- 17:29–17:35मुदा उही युग मैं गजल क समप्रेष्नियता समाजक सादारन लोक दरी पहुझ्चल.
- 17:35–17:39सादारन लोग दरी पहुचल मुदगजल आपन सोंदरे खोदिलेक
- 17:39–17:45नहीं, जखन गजल राजदरभार वप पन्दितग गोष्टी सनिकलीक चोपाल पराभी जैत ची,
- 17:45–17:51तो उआपन भारी बरकम व्याक्रन कपरिदान त्यागी कष्सरल भाशाक वस्ट्र दारन करी टची.
- 17:51–17:54इक रा पतन नही विस्तार कहल जायते थाची
- 17:54–17:57गजेंदर जी आ आशीजगी का इ विशाल संकलन
- 17:57–17:59इस पष्ट रूपें दिखा रहा लगची
- 17:59–18:02जे मैत्हिली गजल के यात्रा समावेशी आची
- 18:02–18:05उ गजल के मात्र गनतक यक विदान ही
- 18:05–18:07बलकी लोग कविदा बनाई वाचा है तची
- 18:07–18:09उं...
- 18:09–18:10समावेशी हुए
- 18:10–18:12मुदा स्वरूप हीन न नहीं
- 18:12–18:14गजल आपन बहरा मात्राक
- 18:14–18:16गनिच सुन्दर है तची
- 18:16–18:18येक ता अकाट्टे तची हो जे
- 18:18–18:23जैना राग यमन के जाहा बिनावकर विषिष्ट स्वर संगती के गावबा,
- 18:23–18:28तो यमन नही रहत, तैंईा गजल आपन व्याक्रनक बिना गजल नही रहत ची.
- 18:28–18:30उता आख अपना संदरे बोद हची.
- 18:30–18:36अव्याक्रनिक शुद्द्धाः पर कोनो समजोता कलक संदर्यके मलीन करे तची
- 18:36–18:38यद्दपी हमी बाथ से पुझन सहमत ची
- 18:38–18:41जगजेंद्र ताकृ आशीशन जिनार जीक
- 18:41–18:45इसंकलन मेत्टिली गजलक अटियासिक मुल्यांकन लेल
- 18:45–18:47इक ता विशाल आमहत्व पूँँग चाज अचे.
- 18:47–18:53इस शंकलन बिना कुन पूर्वाग्रेक दूटूक बात रख्चाई तच्छद्म संपादकी
- 18:53–18:58रस्तक्शेप पर सपर्दा उठ़वाई तच्छि इग गेहिन बहेस के संबभब बने लचे.
- 18:58–18:59एक दम, एक दम.
- 18:59–19:04दोनु द्रिष्टि कोन के एक ठाम रख्वाग जे सासिक खाज इसम्पादक दुयक केलिनी आची,
- 19:04–19:06उकर जतिक प्रसंसा केल जै कम आची.
- 19:06–19:11उलुकनी वन व्रित्ता सरल वाडनिक बहर दुनुक के पोठी में स्थान दिलनी,
- 19:11–19:14जे सहित्यक यत्हार्त्वादी चित्र प्रस्थूत करईता चे
- 19:14–19:18इदेखार अची, जे इतिहास में जते जते नियम तुटल ची
- 19:18–19:21उते-ुते किछ नव प्रेोख सुहुब है लची
- 19:21–19:24सत्याच, हमरा सबक एही विमर्ष में
- 19:24–19:28कोनो अन्तिम निरने वा विजेता गोषित नहीं काल जासकाईता चे.
- 19:28–19:32हमर मानिता उत्ते आचे जे गजल का ब्रान,
- 19:32–19:36उकर कतोर जामिती सन्रचना आव्याक्रन में बसाइत आचे,
- 19:36–19:40जाहे सा उ नाद साअंदर्या असंगीत उत्पन नहीत चे,
- 19:40–19:42जकर कोनो सानी नहीं.
- 19:42–19:48अ रमर मान्यता जे गजल कप्राण वोकर भाव बाशाक स्वबाविक ले
- 19:48–19:55अ समएक संभेल वोकर संभजनात्मक करानती में बसआईत जक्रा सरल वारनेक बहर अपन स्थान डेलग अचे.
- 19:55–20:02इनिरनै आब स्रोता पर अचे, जे ओ गजलक व्याक्रनी कठूरता के अकर आत्मा माने चती,
- 20:02–20:05वा समेख संगभेल अकर संद्रचनात्मक शित्हिल ताके,
- 20:05–20:09जे नहम प्रारम में भवन अवास्तु कलाक बात केने रही,
- 20:09–20:17कि आजाके अबहवन प्रिया जकर खम्मा अदिवाल एक दम सतीक गनितियन नियन प्रठाडा चे जे कालजई या चे
- 20:17–20:24वा अबहवन जदे नियमक किछ दिल दख नव हवाकलेल खिडकी खोली देल गल जे जैसा भित्रक लोक साँस लसकआइत
- 20:24–20:28मैठ्टिली गजलक एही विशाल सन्सार में प्रवेश करू,
- 20:28–20:29इसंकलन पडू,
- 20:29–20:31अस्वैं अनुबहव करू,
- 20:31–20:33जे आहाक मन कते रमाईत अचे.
- 20:33–20:36विमर्ष्के एही अंक में हम्रा सबख संजूडवाक लेल,
- 20:36–20:38आहा सब का बहुत-बहुत द्धन्नेवाद.
Plain text
वल्क्म तो देबेट, कल्पना करू, जे आहा आपन शहरक सबसे बहव्या अस्सुन्दर भवनक कात में तार ची, अकर गुमबच, अकर खम्मा, अकर देवाल, सब किछ मने एक्दम अदबुत अची. आए, एक्दम, देखाई में बहुत सुन्दर लागे तोईत. सत्य, मुदा जक्हन आहा उकर भीतर जाइच्छी ता आहा के अचानक सब दाचले ता ची, जे इप पूरा वास्तूकला एक ता गनितिय जुट पर थाड़ा ची. गनितिय जुट? मने उकर नीप ग़बड़ा ची? एक्दम सा खम्हा के कोन नब दिगरी नहीं अची नीबक संतुलन गडबड़ आची तकना हा की कहब की ओब हवन आपन सुन्दरता क कारने तार आची वा कोनो दिन इगनिती अ गडबड़ी क कारने बर भराग क खसी पडदत आई हम्रा सबख विमर्ष्क विशे कुछ आहने आची आई आई बहुत रोचक विशे आची हम्रा सबख केंद्र में आची गाजेंद्र ताकृ आर आशीश अंछिनहार दवारा संपादित अट्यंत महत्वपुर्न पुस्तक मेठिलीक प्रतिनिदी गजल इस अंकलन मात्र कविताक पोठी नहीं आची बलकी मेत्फिली गजलक एक शताबदी सा अदिकक ए तिहासिक यात्रा के टाप प्रामानिक दस्तावेज आची आई पोठी एक टाब बहुत बाग विमर्षक किनजन मदेत आची मैत्टिली गजल मे वण्व्रत माने मात्रा के गनेत आग कछोर चंदक के निमग अनीवार्यता के ते कछी. की गजल के प्रान उक्रा व्याक्रन में आची? वा! वा! एक रा सरल वारनिक बहर सविस्तापित काईल जासके तची, जदे बहाँ प्रदान्ता अ चन्दक शितिल्ता किन सुएकार काए लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा ल� देव प्रगतिषील होई ताची, औ़ साज़ ले ताची, सरल वारनिक भहर, वा चंद में चुट देभे, कोनो पतन नहीं, बलकी मैठिली भाशा का प्रक्रिती, और गजल अख सवबहविक विकासक एक ता, मने अबहिन नहीस सा थिक. तच्छलू, हम आपन पक्ष पष्ट रूपे राख दी, गजल कोनो सादारन कविता नहीं तच्छ, जे आहा किछ पंकती लिखदेलू आ उ गजल भोगेल. इ मात्रा अच्ठ जेकरा वन्व्रत वब बहर कहल जाए तच्छ, तकर एक ता पुन गनितिय अखलात्मक संद्रचना थेख मुदा बाशा तक गनितने थेख ने? बाशा गनितने ही ची मुदा शिल्प तव जे ना कोनो गाडिक इंजन में एक ता टामिंग बेल्ट होई तची जो अ बेल्ट एक मिलिमिटर सि हु आपन जगा सक्फिसकी जाए तपूरा इंजन मिस्फार करे लागा तची तची, तची आहा वर्ण व्रित्त के इंजन के बेल्ट मानी रहा जी दिएदम गजल में वर्ण व्रित्त उही तामिंग बेल्ट ग काज करे तची आहा संकलनक भूमिका के जन दियान से देखव, तक गजंदर जी औआशीश जी सपच्ट रूपन उलेक के निचत्छतिन, जो उनी सच्टर सद्वाजार आप दरिक समय में, जे तताकतित क्रान्तिकारी गजल कार सबेला, उलोकनी सहित्या काद्मी पुरस्कारक लोब में गजल का कोदो बारी उजाडी देल थिन पाप्रे! कोदो बारी उजाडी देल थिन इता बड़ा कदोर शब्द भागलन कदोर! मुदा यतारत मने उलोकनी इंजनक बेल्टे निकाल कफेखी देलने व्याक्रनक भिस्री, जेना तेना गजल लिखब गजल का आत्मा के मारब्थिक एकर वेप्रीट, कवीवर सीटाराम जा, काशी कन्त मिष्रम वधुप अब बाद में जग्दीश छन्र ताकृर अनिल, योगा नन्द रीए, अव जेनाद जाजेना गजल कार इप्रमानित केलने, जे मेपुन व्यक्रनिक शुद्द्धाख सं गजल लिखल जासके तची. आ, उनका लोकने काज्त महत्त पून आची उ मानवे परत. तखान जखनी दिगग ज्लोकनी नियमक परिदिमे रहक, उतक्रिष्ट रचना का सके चला, तब आदक लोकनी व्याक्रन् सकी एक भागला है गजल मे अनुसासन सर्वो परी आची देखो, इएक ता प्रभाव शाली तर कछी मुदा की आहा विचार केलू है जी बाशा आब भाउ सब आएक कोनो दाशा नहीं भचकत आची आहा इंजनक बेल्टक उदारन देलों मुदा भाशा कोनो मशीन नहीं देक मुदा दाशा भीना भाशा गजल कुन बनत बुजली ए, मुदा गजलक उपत्ती प्रेमि आ प्रेमिकाग भीचक समवाद सभेल आची वहे में बहाउ का प्रबलता हूए ते ची संकलन में इस वहम सुईकार के ले लग ची जे पन्द जीवन जा आ यदूना जा यदूवर जका प्रारमभिग गजलकार सबक रषना में मातर सथर असी परतीषेत वरनव्रुत चल अग, जक्रा पानी चलकनाई कही रहूल ची हम अग्रा अनुशासन हींता कहे चे. आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� भाओ अ समप्रेशनक लेल चन्द में चुड देव कुन वप्राद न नहीं थेक हम भूजी रहाल ची जहाएना की एक सुची रहाल ची मुदा हम आहाके एक ता विन्ना द्रिष्टिकोंड ड़ारहाल ची आहा जीवन जा आयदूवर जिक प्रारंभिक त्रूटी कर बात करो होल ची मुदा संकलन इहो तक है तची जे उजे प्रारंभिक गलती चल उक्रा कवीवर सीटाराम जा आम दूभची पूनता दूरुस्त कोदिलने माने उलोकनी नदी के बक्सा मे फित कोदिलने आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� � अजन के पुण रूप सत्तून कर देलेनी, तफिर पाचा भुरब आन्यम तोडब मुर्खता नहीं तकी थिक. चामा करव हमरा इबुजही दियो. आहा जक्रा अशुद्दिः वा गल्ती कही रहाल ची, अग, कि उ वास्त्तो में गल्ती चल, वा एक ता सच्येत बाशिक स्वतन्त्रता? बाशिक स्वतन्त्रता, व्याकरन तोडब स्वतन्त्रता कोन भहस अके तची? कि एक ता संकलन में अश्पष्त उल्लेक है जे प्रारमबिक गजलकार लोगनी चन्द निर्वाहलेल, उद्याई ता बाजाग जाई ता था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था था अगरा खारिज की एक केल जाए? खारिज एह लेल की लेल जाए, की एक तग खाजलग एक ता सुतन्त्र विद्खागत परी भाशा आची. तो उखरा खारिज की एक खालजाए खारिज एह लेल की एक तगजल एक ता सुत्ट्र विदागत परी भाशा आची देखु आहा लोग गी तक लेल में लिखफ, तो खरा लोग गीट कहुना, गजल की अची मुदा गजल से हो तगाबल जायत अची गबल जायत ची मुदा परी भाशाग अस्पष्ट्तार हवाख्चा ही गजलक नियम अरुजी मने चन्जास्त्र से चलगते चे आब आव, उनिस्व सथटर से दूहँजार आप्टकर उही कतित क्रान्तिकारी युग पर जक्रा हम अंद्खार युग कहत ची अंद्खार युग? इहा बहुत पैग आख्शेप लगा रहल ची. आख्शेप नहीं इस अंकलन अटिहासिक तत्ते रखाई तचे जे इस समय अनुशासन हींताक चरम चल. दोक्तर राम देवज्या उनिस्थोच्छरासीग रच्ना पत्रिका में जे गजलक आलोचना लिख्ठल नहीं उही में सरस, रमेश, वियोगी जैन लोकनिक के गजलकार कुरुप में गिनादल नहीं जे वस्तुता गजलकार चले नहीं मुदा हुंका लोकनिक संदेश तो महतुपून चल नहीं रक लालसा नहीं चल लोक गजलक फाम के अपनाबे चाहे चला की अगते ही लोग प्री आबहाराल चल, मुडा उकर महनत से बहागई चला. बिना गनेट सीखेने इंजीनीर बनवाखी प्रयास गजल के वास्तू कलाके मने एक दम भद्दा को देलक. नहीं नहीं, हम रही तरक पचीने रोल अची. हम बता एच्छी की एक. आँ वही कालखन्ड के के वल पुरुस्कारक लाल्साग कही का खारिज करोल ची इवही समाजिक आज साहितिक उठल पुठलक संण अन्याय जी अन्याय को ना तत्ते ता सामने आची की अगत ओँएक संदेशक की उगचल लोग चाहे च्छला जे गजल राजदर्बारवा पन्दित का गोष्टी से निकली कड चोपाल पराबे आजे लोग व्याक्रन के पकष में ख़ा च्छला तिनकर इस्तिती पर स्योत विचार करूू तिनकर इस्तिती एक दम स्पष्ट जी ओलोगनी नियम मानल है अग, विजेनाद जाजिक नाम लेल हूँ, जे अनुशासन कबडका जंडा उठाबे वाला चला. मुदद संकलन में यहो बात देल गेल अची, जे विजेनाद जी गजल मिसो एक ता नियम उलंगन वेटे तची. नियम उलंगन? कते? उ, शब्दक शुरुबला दीरग के लगु माने च्छला, आब आई नी सोचु, जा सबसः उत्तम व्याक्रन शास्त्री, जे गजलक शिल्प कवीवर सी ताराम जायुगक मानल जाई तची, उनका सद्से हो इच्छुट भोजे तची, तची उक्रा हा लापर वाही कोना कहब? उ लापर वाही नहीं चल, उ ततकालीन ब्रामक नीमक प्रभाव चल. हम्रा लागे तची, उक्रा मेतली भाशाक प्रकिर्ती कहल जेवाक चाही. मैत्लिक उच्छारन्प्रवर्ती अर्भी फार्सी से भिन आएज अब विजेनात जीजे का कवी इबात अच्छेतन रूप से बुजेचला है. हा, इएक का रोचक बिन्दू आच्छे, यदपी हम एक रा भिन्दू रूपे रखभ. विजेनाज्जी गजल में जी चुट आची उक्रा समपादक लोकनी स्विकार के लन ही आची जे उ ततकालीन व्याकरन शास्तरी सबग दोश चल उलोकनी ब्रामक नियम बना दे लन ही कवी कदोश ने चली माने गलती तबहेल उही समय किच नियम सपष्ट नहीं चल जराक स्पस्ट करु श्रोता कलेल, जे इ मात्राक नियम काज कुना करेतेची, कि एक ती बहुद जतिल लागेतेची. आ, एक दम, देखु वरनव्रित में प्रतेक शब्दद के लगु माने एक मात्रा, अदिर्ग माने दू मात्रा में तोलल जाएतेची. जेना चंद्र बिन्दु युक्त लगु के पहले पन्दि दीन बन्दु जाहां के समय से दिर्ग मानल जाईत चल, मुदा आब उक्रा वेकल्पिक औवस्ठा में दिर्ग मानल जाईत ची. रही तो व्याकरनक गार आई बहुगे ले. आ आरो सुनु, सै युक ताक्छर सा पहलुक अक्षरक के दिर्ग मानबाक जन्यम आची, जिना सत्टि शब्द में सच लगु होई तो आगा आदात्त होबा कारने सच दिर्ग बहुजाई तची. इकोन वन मानी नहीं थिक, इदोनिक विग्यान थिक. विग्यान अच्छी मुदा कितिक लोग इबुजध? जगन इग गनित पूरा होईता ची तकन गजल मे एक ता वजन आवेत ची इवजना कारने गजल कान मे रस गोरेत ची सरल वारनिक बहर केवल उकर ले लेगता चूट ची जे इ दोनिक विग्यान वा वरन व्रत लिख्वा में माने एक्दम असमर्त चती. औफ, मुदा इ असमर्ता के चुट वाला बाद्सा हम कतो सवमत ने चीए. 2008 का बादक खन्द में सरल वारनिक बहर कजे अस्थान दिलगे लची, उ अई श्पष्ट करएत अची, जे इएक ता स्वतन्त्र आमान न विदा बनी चुकल अची. स्वतन्त्र विदावा व्याक्रन सा बहाग बाक बहाना बहाना नही आची, आहा इराक मल लेक, स्वाती लाल, वा मुन्ना जी गजल पडू, उही में जे समकालीन वीमर्स अची, जे भावक तिवरुता अची, उक्रा आहा केवल एकर आदार पर खारिज नेका सकेची, जे उही में सन्युक्ताख्ष्रक पहिल अच्छर दिर्गनी भेल. मुदा गजलक शिल्प तक श्वर भागेल ने. सम्पादक लोकने स्वेम मानलने अची, जे इ नव गजलकार सबके जोडबाक एक ता ससक्त माद्ध्यम अचे. इ नव पुस्ता के लेल गजलक लोक्तान्त्रिकी करन थी. सहित ते कोनो बंद कमराक समपती नहीं भहसकेत अचे. मुदलोक तान्त्रीकी करनक नाम पर आहा विदाक मुल्या क्हन्दित करहल चीने? इत उही बात भेल जे हवाख ले गर क्दिवाल तोर दी? नहीं, हम विदाक के विस्तार देरहल ची. और आहा जे गनित असुद्द्धाक इत्टिक वकालत करहल ची, उही पर हम एक अट्यंत गंबेर प्रषन उटाब चाहे ची. कहु की प्रषन अची? इसंकलन एक ता पैग रहस्योद गातन करीत ची. सम्पादकी अच्तक्षेप आम मूल पाधक शुद्दhata क विशाई में. आहा आहम जे प्रामाडिक तक बात कोरहल ची, उ कते क्दिख विष्वस्वनी आची जकन हम्रा सव लग मुल पान्दूलीपी आची एह नहीं आजे च्याई उ सम्पादकक द्रिष्टी सविक्रित बही चुकल आची तकन उही तताथा कतेद शुद्दता पर ये देक हद्की आची अगा की इशारा कत जार हैं जे? हमर इशारा अची दोक्तर राम देवजा अच्चन्द्रनात मिश्र आमरजे का दिगगज समपादक लोकनिस दिस जे जीवनजा आ यदूवरजिक मूल वरतनी अच्चन्दक अपन ही सामे बदल देलनी बदली दिलने? कुना? संकलन मैं, एक ता बहुत पैग उदारन देला ची, या दूवर जीक एक ता गजलक पंक्ती चल, भग्वान हमर इ मित्ला. दोक्तर राम देव जाएक रा समपादित करी देलनेस, भग्वान हमर इ मित्ला. ता एमे की गर बडी एची? बवगवान तशुदद है व्याक्रनक द्र्ष्टी सा? गद्यक व्याक्रनक द्र्ष्टी सा, है? मुदद चन दग द्र्ष्टी सा? आप एक रषंगी तक ताल पर भुजु. बववान कमात्रा क्रम अची, दूई दूई एक, मानु, इतबलक दादिन्ता आची आबभगवन कमात्रा क्रम अची एक-ेक दुई माने तातादिन बाप्रे, इत पुरा वजन बदली गे ल्एक दम सम्पादक व्याक्रन शुद्द करवाक चक्कर में बभगवान के बभगवन कदिल नहीं अप सोचु, जकुन गजल कार धादिन्ता पर गजल लेबद केने अची अज सम्पादक उक्रा बीच में ताता दिन कडे तकी है ते आँ, गजलक लेए ब्रभरा का खसी परत आ, नर तक मुहक बर कषत सम्पादक लोकनी गजलक मूल वरतनी के सम्पादित कोकर मात्रा क्रमक के मानेोकर तामिंग बेल्ट के ग़बर कदिल हैं तकन आई हम आधा जे शुद्द्धा वावन्व्रित का वकालत कर रहल ची उ कतिक प्रमानी कची इते एक ता बहुद वीचारनी ये बात ची एक दम जखन इतिहासक पाना में समपादक आपन मन्मानी सच्छन्द बिगाडी चुकल चतिन, तकन गजल के के वल गनितक तराजूपर तोलप कतिक नयाय संगत अची. इत उही बातक समर्ठन भेल जि गजल के अकर बहाव आप रवाज सपरकल जाए, नकी समपादित आस सन्दिक दमात्रा क्रम्सा दिको ये ये ये टा बहुत पैग आहा मोमेंत थिक इपो थिक आहाक प्रश्नश्वत प्रतिषत जायाज अची आम मूल पात्ख विक्रितिक जेई उदारन गजेंदर ताकृ आआशिश अंचिनार जी प्रस्थत्के लें आची उ हम्रा सबक लेल एक ता चितावनी थिक आआआ, इबहुत रास अटिहासिक तत्ते के उजागर करे तची इबतावे तची जी भविश्यक शोदार्थी लोकनी के बिना कोनो आर्थिक लोबवक मुल पान्दूलिपिके खुजबाक आवशकता चे मुदा हमर्तर कच्छि, जे यी विक्रति यी नहीं प्रमानित करे तच्छे नियम होई बिना करे तए की प्रमानित करे तच्छे? इत इप्रमानित करे तच्ये, जि सम्पादक लोक्निक के नियमक वा गजलक, बहरक सम्यक ज्यान नहीं चलनी. उ लोक्निक गद्यक व्याकरन आप पद्यक चंदक भीचक अंतर नहीं भूँच सक्ला. जाहे कारने उ अग्यान्तावः मात्र वर्तनीक शुद्ध करबाक फेर में चंदक लैए बिगार देल नहीं माने आहा अगा अग आते से हो नियमक ही पक्ष लेब एक दम जा हुनका वरन व्रित तक औहे गने तक ज्यान रहतेनी तो उ भगवान के कखनो भगवन नहीं करेत्तेनी, ताहिलेल हमर बात आरो पुष्थ होगताची, गजलक व्याक्रनक ज्यान आहु भेशी आवश्षक भोजाईताची, जब हिसे इ एतिहासिक भूल के पचाडल जासके, आम वुल पाथक पुनर निर्माण केल जासके नियमक अग्यानता, नियमक अंदक कारन नहीं बनी सके तची आम आहाक एहर चिंता के समान करे ची मुदा समादानक दिशा भिन न देखाईचे चन्द आवरन व्रुत तच्यान आवश्यक आच्छ इह हम कतो से नहीं नकाडी रहल ची मुदा भाशा जकन समयक संग आगा बड़ेता ची तो अपन नियम सुयन गड़ेता ची मुदा नव नियमक नामप पुरान वास्तुकना बद्कावे पडद बद्कावे नहीं उक्रा विस्तार दिवे पडद सरल वारनिग भेहर एक ता नवा नीम तेक कुनो अराजकता नहीं? आहा उही काल कहन्ध के अंद्खार युग कहछ छी, जते लोक नीम नहीं मानलनीं. मुदा उही युग मैं गजल क समप्रेष्नियता समाजक सादारन लोक दरी पहुझ्चल. सादारन लोग दरी पहुचल मुदगजल आपन सोंदरे खोदिलेक नहीं, जखन गजल राजदरभार वप पन्दितग गोष्टी सनिकलीक चोपाल पराभी जैत ची, तो उआपन भारी बरकम व्याक्रन कपरिदान त्यागी कष्सरल भाशाक वस्ट्र दारन करी टची. इक रा पतन नही विस्तार कहल जायते थाची गजेंदर जी आ आशीजगी का इ विशाल संकलन इस पष्ट रूपें दिखा रहा लगची जे मैत्हिली गजल के यात्रा समावेशी आची उ गजल के मात्र गनतक यक विदान ही बलकी लोग कविदा बनाई वाचा है तची उं... समावेशी हुए मुदा स्वरूप हीन न नहीं गजल आपन बहरा मात्राक गनिच सुन्दर है तची येक ता अकाट्टे तची हो जे जैना राग यमन के जाहा बिनावकर विषिष्ट स्वर संगती के गावबा, तो यमन नही रहत, तैंईा गजल आपन व्याक्रनक बिना गजल नही रहत ची. उता आख अपना संदरे बोद हची. अव्याक्रनिक शुद्द्धाः पर कोनो समजोता कलक संदर्यके मलीन करे तची यद्दपी हमी बाथ से पुझन सहमत ची जगजेंद्र ताकृ आशीशन जिनार जीक इसंकलन मेत्टिली गजलक अटियासिक मुल्यांकन लेल इक ता विशाल आमहत्व पूँँग चाज अचे. इस शंकलन बिना कुन पूर्वाग्रेक दूटूक बात रख्चाई तच्छद्म संपादकी रस्तक्शेप पर सपर्दा उठ़वाई तच्छि इग गेहिन बहेस के संबभब बने लचे. एक दम, एक दम. दोनु द्रिष्टि कोन के एक ठाम रख्वाग जे सासिक खाज इसम्पादक दुयक केलिनी आची, उकर जतिक प्रसंसा केल जै कम आची. उलुकनी वन व्रित्ता सरल वाडनिक बहर दुनुक के पोठी में स्थान दिलनी, जे सहित्यक यत्हार्त्वादी चित्र प्रस्थूत करईता चे इदेखार अची, जे इतिहास में जते जते नियम तुटल ची उते-ुते किछ नव प्रेोख सुहुब है लची सत्याच, हमरा सबक एही विमर्ष में कोनो अन्तिम निरने वा विजेता गोषित नहीं काल जासकाईता चे. हमर मानिता उत्ते आचे जे गजल का ब्रान, उकर कतोर जामिती सन्रचना आव्याक्रन में बसाइत आचे, जाहे सा उ नाद साअंदर्या असंगीत उत्पन नहीत चे, जकर कोनो सानी नहीं. अ रमर मान्यता जे गजल कप्राण वोकर भाव बाशाक स्वबाविक ले अ समएक संभेल वोकर संभजनात्मक करानती में बसआईत जक्रा सरल वारनेक बहर अपन स्थान डेलग अचे. इनिरनै आब स्रोता पर अचे, जे ओ गजलक व्याक्रनी कठूरता के अकर आत्मा माने चती, वा समेख संगभेल अकर संद्रचनात्मक शित्हिल ताके, जे नहम प्रारम में भवन अवास्तु कलाक बात केने रही, कि आजाके अबहवन प्रिया जकर खम्मा अदिवाल एक दम सतीक गनितियन नियन प्रठाडा चे जे कालजई या चे वा अबहवन जदे नियमक किछ दिल दख नव हवाकलेल खिडकी खोली देल गल जे जैसा भित्रक लोक साँस लसकआइत मैठ्टिली गजलक एही विशाल सन्सार में प्रवेश करू, इसंकलन पडू, अस्वैं अनुबहव करू, जे आहाक मन कते रमाईत अचे. विमर्ष्के एही अंक में हम्रा सबख संजूडवाक लेल, आहा सब का बहुत-बहुत द्धन्नेवाद.