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कुसुमपुरक_वेश्यावाटिका_आ_भाणक_रसिक_यथार्थ.m4a
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- 0:00–0:30बिमर्शक एही मंज पर आहाक सवागत अछि, जगन हम सब प्राषीं संस्क्रित साहित्य क विशे में सोचे जी, तप प्राया मतलब हमरा सब एक मोन में, पवित्र मंत्र, कत्होर दर्म्शास्त्री नियम, वा मोक्षक खोज में लागल सन्यासी सवैक चित्र आवाई तच्छि
- 0:30–0:36भी वीमर्शक केंधर मतलब जकर हिर्दाय प्राचीन कुसम्पूर अथात पातली पुत्रक वेश्या वाटिका आचे
- 0:36–0:39जताय जूवा आचे चल आचे
- 0:39–0:44भिल्कु, आवेश्य आचे से नुकाक निकली रहेल पाखन्दी सादू सभेक वरनन आचे
- 0:44–0:49आजोक विमर्ष्यक केंदर में आचे प्राचीन संस्क्रिच साहिते के चारेत अट्यंत प्रसिद रच्ना
- 0:49–0:52पद्म प्रब्रत्तकम दूर्त विट सम्वादा
- 0:53–0:55उभया भिसारिका आप पादा ताडेतकम
- 0:56–0:58इचारू रच्ना बान विदाक अंटर्गत आवेत चे
- 0:58–1:03जे वास्तव में एक प्रकार का एक लाप नाटक होई ता चे नहीं?
- 1:03–1:13आप एक दम जते एक ता मात्र पात्र मंच पर तारदबखा आखाश भाशितक माद्ध्यम सा अथा तक कलपित पात्र सबसंद्संग गप करे त पुरा समाज का चित्र प्रस्त॥ करे त ची.
- 1:13–1:19गजजद्र ताकुर द्फाड़ा कायल गेल एह चारो भान कम मेठली अनुवादक अदार पर हम सब आजुक यी विष्लेशन कराओ.
- 1:19–1:27आर आजुक विमर्ष्क क मुख्य प्रष्न जे आची, जे की इग्रन्त सव, तत्कालीन समाज का वैश्या अन नागरेक संस्क्रिति के,
- 1:27–1:33यह तब आद्ट्ट्टाउट्टी के एक तव उच्ट्ट्ट्ट्मक्वा कहु बोद्टेक अबहावात्मक चरमोद कष मानेताची
- 1:33–1:39वावा, यह यह यह पोड़ता स्वार्ती अ नहीतिक रूप से पतन्शील समाजक तीखषन आलोचना थेग
- 1:39–2:09इसे अपने बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बा
- 2:09–2:14खलाक उच्सव नहीं आची, इग्रन्त बहुत सुख्श्मतासा इग्देखवाई तची,
- 2:14–2:20जे कोना वासना अदनक लोब में मनुश्षक बोद्धिक अननेटिक पतन होई तची.
- 2:20–2:23मुदा एह में प्रेमक से हुद तवरनान आची?
- 2:23–2:27आहा जक्रा एक्ता उच्छ प्रेम वा रसिक्ताक नाम्दार रहल ची
- 2:27–2:31वास्तव में मात्र एक्ता व्यापारिक च्यल आची
- 2:31–2:35ग्रन्त स्वायन एक्रा लेलेक शट्ता शब्द प्रवोक करे तची
- 2:35–2:39इबहान साहित्ते मानव खलोब वासना
- 2:39–2:42आमुर्खताक एक्ता यतार्थ वादी दस्तावेच थिक
- 2:42–2:45जते आब भावना कुनोस्ठान नहीं आची
- 2:45–2:47केवल स्वार्त सर्वो परी आची
- 2:47–2:51हम्रा लगी तची आची है, केवल स्वार्त हाशत्ता पर किंद्रिद भार्राजी
- 2:51–2:55मुदा इग्रन्त कुसुम्पूर के एक ता एहन स्वर्ग के रूप में वरनित करे ता चे
- 2:55–3:01जटे मतलब जटे कला गान वाद्द दिया रसिक्ता क असीम सम्मान आचे
- 3:01–3:04स्वर्ग? वेश्या वाटिका के हा स्वर्ग कहर रहल ची
- 3:04–3:10अम्रा विचार राखबाक दियाओ, विमर्षक प्रारंब रहा, प्रेम के स्वरूप सकरएची,
- 3:10–3:15अहा कनुसार इमात्रे एक तव्यापार्थेक, मुदा स्रोट समगरी में,
- 3:15–3:19प्रेम के ज़, ज़ सुख्श्म मनोविच्यान वरनेत अचे,
- 3:19–3:21उक्रा आंकोना देखा कर सकेच्छी?
- 3:21–3:26पद्म प्राभ्रितकम में देवसेना काम्रो कोवरनन देखू।
- 3:26–3:32आप, मुदा उक्र सन्ताः, उक्र अश्वू, उक्र निश्वास की सब जूत है?
- 3:32–3:35वेश्या जखन अपन प्रेमिक प्रतिक्षा करत आची,
- 3:35–3:39तो उकर अवस्ता कोनो तपस्विनी से कम नहीं होई तची.
- 3:39–3:45हम्रा एहन लगाई तची, जना जना एक तप कुशल संगीत कार वीना तार सवर निकाले थची,
- 3:45–3:51तहीना एही गरनत में कामुक पूरष और वेश्या एक तुसरक भावनाध तान च्डे तची.
- 3:51–3:55दूनु दिस्सा एक तबवद्दिक अबहावात्मक क्रीडा चलाईता ची
- 3:55–3:58आख वीना कुदारन बहुत सुन्दर अची
- 3:58–4:01मुदा आहा इभिसरी दहल ची
- 4:01–4:03जे वेश्या वीना तार नहीं
- 4:03–4:06बलकी उही कामी पूरुष्के बजा रहा लगी
- 4:06–4:07बजा रहा लगी
- 4:07–4:09इत बड़ा कदोर द्रिष्टिकों भेल
- 4:09–4:13कदोर मुदासत्य आ अहो कोनो भावात्मक कारन्से नहीं
- 4:13–4:15केवल दन के कारन्से
- 4:15–4:19आहा जक्रा सुंदर ये बोद आप प्रेम को मनो विग्यान कही रहल ची
- 4:19–4:21गरन्त उक्रा उप्चार कही तची
- 4:21–4:22उप्चार
- 4:22–4:24आहा उप्चार
- 4:24–4:29अद्तात बनावदी विवहार, जे केवल ग्राख के पहस्वेत अची.
- 4:29–4:34उभ्या भिसारिका में मादव सेनाक प्रसंग आहाख कोना भिसरी सके ची.
- 4:34–4:36कि मादव सेने अदे स्वादीन अची?
- 4:37–4:41अकर माए अक्रद दन के लोब में समुद्र दट्सन एक्ता अंचाह,
- 4:41–4:45कुरुप मुदा दनी पूरुष्लगा जबर्दस्ती पटादेई तची
- 4:45–4:47अतम माएक क्रूर्ता आजी
- 4:47–4:52भिल्कुल मुदा अते मादव सेना के प्रेमक जूट नाटक
- 4:52–4:55आथात बनावती रती करे परे तची
- 4:55–4:58भोर होई ते वो हताशा क्लान तची
- 4:58–5:08की यहां क सुंदर ये बोद है जताये एक ता इस्त्री के अपनिक्चाके विरद केवल दनाक लेल पूरुश संक प्रेमक अबहिनै करे परे ता ची.
- 5:08–5:11दनादत सार्थवाहक पूत्र दन्मित्र कता देखो.
- 5:11–5:15दन्मित्र के स्तितिता वास्तमे दैनी आची.
- 5:15–5:25इक्दम, उ अपन समपुन समपती वेश्या पर लूता देईता ची, अजगन उन निर्दन भोजाईता ची, तो वेश्याक माए उक्रा बाते बाटे बार निकाली देईता ची.
- 5:25–5:29इप्रेम के क्रिडा नहीं, क्रूर आर्थिक यदार्त थेक.
- 5:29–5:32दूगत विट समवाद हमेते इस पफ्ष्ट्रूप से कहल गेल आची
- 5:32–5:36जे वेश्याक माए एक ता बडवानल अ समद्द्रक भीट्रक
- 5:36–5:39उ आगी खिख जे कामी जनक सरवस्वभज्म कर देता चे
- 5:39–5:43हम सहमद ची जे य आर्थिक यदार्त
- 5:43–5:45उआई समाजक एक ता हिसाय है
- 5:45–5:50अम एकरा नकारी नहीं रोल ची, वेश्चय जननी एं क्रूर्ता सत्ते आचे,
- 5:50–5:57मुदा आहा इदिखो, जे इआख्यान, मदलप इग कता हम्रा सब दरी पुचा की रोल है.
- 5:57–6:02एह नाटक कजे मुख्य वक्ता आची जकरा विट कहल जाईत आचे.
- 6:02–6:03विट.
- 6:03–6:05जे स्वयम फ़ाल आचे
- 6:05–6:07मुदा वेट कोनु सादारन व्यक्ती नहाँ आची
- 6:07–6:09ओ समाजक और रसिक
- 6:09–6:12सु संसक्रत अब बड़िक नागरिक थेख
- 6:12–6:16जे यद्देपी आपन दंगमा चुकल आचे
- 6:16–6:18मुदा उकर प्रग्या तीख्षना आचे
- 6:18–6:22अहा एक रा एक ता आदूनिक युख का च्टन्दब कोमेटिन जगा देखी सकेई ची
- 6:22–6:24च्टन्दब कोमेटिन?
- 6:24–6:26इते किछ भेसी बहुगिले?
- 6:26–6:29नहने विचार करू, उसमाजक केनार पधाड अचे
- 6:29–6:32जकर ला खोबाक लेल किछो ने आचे
- 6:32–6:36अदाई कारन उ समाजक सब से पएक पाकंदिस सवक पोल खोली सके ची
- 6:36–6:40विट खुलीन वरगक चद्म आच्रनपा प्रहार करे तचे
- 6:40–6:42आह वईया करन दद्तकलच के देखु
- 6:42–6:45उजे स्त्री सब से व्याक्रनक कगब करे थचे
- 6:45–6:53अज्त्री सब सब प्रेम कगब कर बाक ठाम पन्निक कठों गयाक्रन का नियम जखाग बजेत ची, अस्त्री सब के दरा देत ची,
- 6:53–6:58विटो करे ही मुर्खताप रहसेत ची, चद्मवेशी वैशनब पवित्रक के देखू,
- 6:58–7:02जे मुहामेत च्वाचुत अपवित्रताक गब करेता ची
- 7:02–7:04मुदा वार्भाडवा भिलासीका नामक
- 7:04–7:08वेश्याक वस्त्र अपना लगन नुका कवेश्यापूरी में फसल आची
- 7:08–7:11इप्रसंग एस यसपड अवश्याचे
- 7:11–7:13वा ओबोद भिख्षु संगिलग
- 7:13–7:18जे भिक्षुक का पवित्र वस्त्र पहिर ने मुदा वेश्याक आंगन से निकली रहाल आची.
- 7:18–7:21देखु विट एही पाकहन्थ समुखत आची.
- 7:21–7:24उ मानव का आदिम प्रविर्तिक याथार्ट के सुईकार कर अची.
- 7:24–7:29आओ समाजक तता कतित पवित्र थेके दार सब सकतो भेशी सत्तिनिष्त हैची
- 7:29–7:30विट् सत्तिनिष्त अची
- 7:30–7:34मुदा की अपना स्वयंक दूर्दशाक प्रती सत्तिनिष्त अची
- 7:34–7:40आहा विटके मतलब समाजक एक्त महान क्रान्तिकारी आलोचक करूप में प्रस्तूत कर रहाल ची,
- 7:40–7:46मुदा ग्रन्त ता विटक अपन आत्मा प्रवंचना उकर स्ल्फ्ट्टिस्आप्षन पर व्यंग करे लाची.
- 7:46–7:49आत्मु प्रववचना को ना भेल, उते याद्धारत देखी रहा हो लाची.
- 7:49–7:53दूर्थ विट सम्वाद़, में विट स्वेम के स्विकार करे तची.
- 7:53–7:59उ कहे तची, जे जुवा आवेश्या व्यसनक कारन, उकर सर्वस्वन नष्ट बोगे लचे.
- 7:59–8:01अखर लग मात्र देज बचेन अचे,
- 8:01–8:06जाडक समय में अखरा लग दूसर वस्त्र दरी नहीं चे जो पहीर सकै.
- 8:06–8:09आई महान बडदिक विट की को रहल चे?
- 8:09–8:10औए यूवक सवके.
- 8:10–8:11आए,
- 8:11–8:14अगत नव्यूवक क्रिषनिलग के बेटे तची,
- 8:14–8:17अवक्रा पन पिताग विरुद भड़का रहल ची
- 8:17–8:18अवक्रा आपन पिताग विरुद भड़का रहल ची
- 8:18–8:20अवक्रा आपन पिताग विरुद भड़का रहल ची
- 8:20–8:22अवक्रा आपन पिताग विरुद बड़का रहल ची
- 8:22–8:24अवक्रा आपन पिताग बूड़ बूड़ बागिला
- 8:44–8:50गरन्त, हम्रा सब के एदेखार है लगची, जे कोना एक ता सु संट्क्रत वक्ती सो हो,
- 8:50–8:54वासना में पडगका अपन समपुन विवे गमा ले तची,
- 8:54–8:59आ, आ, अपन पतन के दर्षन कर नाम्दव का उचिट्ठेरावक चेष्टा करे तची.
- 8:59–9:08आज, हम माने ची, जे विट बहूतिक रूप से दरिद्र अवश्या ची, मुदा बोदिक आर रसात्मक रूप से अ अत्यातिक दनी आची.
- 9:08–9:15अकर दरिद्रता अकर वहूतिक बन्दन से मुक्त करे थाची, जाहिसे अ निदर भो का सत्य बजे थाची.
- 9:15–9:23अज्द्यत्द्दरी दर्शनक्गाप अची, इग्रन्तेक्ता अद्यन्त क्रान्तिकारी विचार इस्थापित करए तची, जग्रा आहा अंदेखा कर रहल ची.
- 9:23–9:25कोनो क्रान्तिकारी विचार?
- 9:25–9:31गरन्त मे विट श्पष्ट रूप से वेश्या के कुल्वदू अर्थाद समाज का समानित विवाहित पतनी से स्रेष्ट माने तची
- 9:31–9:34तटकालीन समाज मे एकोनो चोट गप नहीं ची
- 9:34–9:40विट कतर्क आची जे कुल्वदू लज्या अ समाजिक मर्यादा का बन्दन में बान्दल आची.
- 9:40–9:43उ आपन इक्षा वेक्त नहीं कर सके तची.
- 9:43–9:46उ अंदार में गुंगत में भेभीद भोर रती करे तची.
- 9:46–9:48मुदा दोसर दीस वेश्या ची.
- 9:48–9:50जिकर लग दाख्षन्या जी
- 9:50–9:52दाख्षन्या
- 9:52–9:54मतलब अनुकुलता
- 9:54–9:56आआ, दाख्षन्या अरतात उ अनुकुलता
- 9:56–9:58अ कलात्मक कोशल
- 9:58–10:00जतै उ पूरुसके
- 10:00–10:02बअद्धिक अ शारीरिक
- 10:02–10:04तुन्नो अस्तर पर चुनाती दे सकेची
- 10:04–10:06वेश्या गीत गवेट ची
- 10:06–10:36अद्रादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादा
- 10:36–10:41प्राचीन व्यंगे पर्ठोपी रहल ची, इस कोनु स्वादिन्ता नहीं आची,
- 10:41–10:44इसे एक दब रहम थिक, जिक्रा कामुक पूरुष पाली नहीं आची.
- 10:44–10:49आवू, हम पादतारित कम कवो ही बहुचर्चित प्रसंग पर्विमर्ष करे ची,
- 10:49–10:53जतेई सा आहाक एही स्वादिन्ताक अस्लियत् स्पष्ट्वीच्छे
- 10:53–10:56आहा विश्नु नागक कताक गब करहल्ची
- 10:56–11:02आही मैं, विश्नु नागक कता आचे, विश्नु नाग एक्ता कुलीन,
- 11:02–11:07सु संस्क्रित व्यक्ती आचे, जे वेश्या मदन सेनि का सा प्रेम करेत चे,
- 11:07–11:13प्रेमक कोनो विवाद मैं मदन सेनी का विष्नू नागक मात पर लाप मारत छे
- 11:13–11:17अब यी तताता कतिट स्वादिन वेश्याक प्रेमी की करत छे
- 11:17–11:19अप प्रायशचित खोजातछे
- 11:19–11:24अप कायर जका ब्रामभर सबख लगजा प्रायश्चित खोजातछे
- 11:24–11:26उ समाज में गावेत फिर हैता चे,
- 11:26–11:29जे हमर माथ पर वेश्याक लाथ लागल चे,
- 11:29–11:33हम आप पवित्र भोगेल ची, हमरा पवित्र करू।
- 11:33–11:35आहा एक रास त्त्री स्वादिन्ता कहब?
- 11:35–11:38इप्रसंग इदेखावेत ची,
- 11:38–11:40जे कामुक पूरुष कते कायर,
- 11:40–11:43गरी माहीन आहा स्यास्पत भजायते चे
- 11:43–11:44मुदा?
- 11:44–11:47वेश्याक तता कतिट स्वादिनता
- 11:47–11:49वास्तव में कामुक कक मतिव्रम थेक
- 11:49–11:51जते पूरुष वासनाक कारन
- 11:51–11:54अपनाके वेश्याक दास बना ले तची
- 11:54–11:58अ समपून समाजक उपहासक पात्र बने तची
- 11:58–12:01विश्नु नागेक मुर्खता स्ट्रीक स्वादिन्ता नहीं
- 12:01–12:04अपितु पूर्शार्त वहीनताक व्यंग्या जे
- 12:04–12:09विश्या उक्रा लात मारे तची कि एक तो पूरूश उही योग्या जे
- 12:09–12:13लेखख शामिलेक एही ताम एदेका रहा चतिन
- 12:13–12:18जे वास्ना कोना एक्ता विद्वान के कीरा जका पमाल को देता चे
- 12:18–12:23दिको, आहा विष्नुनागे कप्रसंग के केवल दर्म शास्त्र के दिश्टी से देख्राल ची
- 12:23–12:27जकन की एही नातक कमुल आदार काम्शास्त्र थेक
- 12:27–12:29काम्शास्त्र, अके ना?
- 12:29–12:31काम शास्त्र में मानिनी इस्त्री
- 12:31–12:34अथात उप्रेमिका जे अपन प्रेमिसे रुष्त अची
- 12:34–12:36उकर ढ़ारा मारल गे लात अप्मान नहीं
- 12:36–12:39आपी तु प्रेम के चरम अवस्ताम आनल जाईत अची
- 12:39–12:41उएक ता पूरसकार थेक
- 12:41–12:42इदिखावे तची
- 12:42–12:46जे इस्त्री आ पूरुश निर्बाद प्रेम के उईस्तर पर आची
- 12:46–12:48जे तै ख्रित्रम सम्मनक कुनोस तान नहीं
- 12:48–12:50आ पूरुशकार
- 12:50–12:52आ विश्नुनागे क मुर्कता इई आची
- 12:52–12:54जे उक्रवेश्षक लात लगल
- 12:54–12:57वित आन लेखकक द्रिष्टी से वोकर मुर्खता ही आची
- 12:57–13:00जे ओ कामशास्तरक उही प्रेमिक प्रषाद के
- 13:00–13:04दर्म्शास्तरक अनुसार पाप आर अपवित्रता मानी ले लक.
- 13:04–13:06वित विष्नुनाक के गदा कहेत आची
- 13:06–13:08कि एक तो रती क्रीडाक अन्तरंग छनके
- 13:08–13:11समाजिक आद्धर्मिक अप्मान्बुजी लेलक
- 13:11–13:13अस्वा सबा में प्राएस्चित खोजल्फिरल
- 13:13–13:14मुदा उता
- 13:14–13:17इग्रन्त टीक एही बात पर जोड देताची
- 13:17–13:21जे कामशास्त्र अद्धर्म्शास्त्र का जगत �alaga lagachi
- 13:21–13:22जे वेश्या पूरी में आची
- 13:22–13:26अखराइस्म्रितिक वद्ध्ध्व्शास्त्रक चश्मा से नहीं दिखल जास्गेताची
- 13:26–13:30उते वेश्या देवी आची अखामुक अखर आरादधख
- 13:30–13:32इग्रन्त इस �thepid करेताची
- 13:32–13:35जे प्रेमक अपना एक ता स्वतंत्र लोक आची
- 13:35–13:37जकर नियम समाज कर नियमा से बिश्नाची
- 13:37–13:41मुदा इस्वतन्त्र लोक जकर नियम बिश्नाची
- 13:41–13:44उ मानवक के कते लजाईता ची
- 13:44–13:46कि उकनो उतकर्ष दिस लजाईता ची
- 13:46–13:47नहीं
- 13:47–13:49उही विश्नु नागक अवस्ता दिकू
- 13:49–13:53उकर मान्सिक सन्तुलन बिगर्गेल, आहां जगरा प्रेमग प्रशाथ कहे रहल ची,
- 13:53–13:57उकर शामिलक इस पष्ट रूप से मुर्क्ता कप पराखाश्टा दिखाश्टा दिखाई रहल चाती.
- 13:57–14:00हम्रा उक्ता सुन्दर या बोध भुजाईता ची.
- 14:00–14:02अगर दुख में की कला त्मकता आची
- 14:02–14:06जकन आख महान दाशनिक विट दासिक पुट्र सुकुमारे रका
- 14:06–14:11जे अगर नपूंसक आची, अख्रा से बच्बाक लेल गल्ली गल्ली भागत फिरे तची
- 14:11–14:13तो उते की कला आची
- 14:13–14:16तकन उकर दुख में की कलात्मकता आची
- 14:16–14:21जकन आख महान दाशनिक विट दासिक पुत्र सुकुमारे रका
- 14:21–14:26जे एक ता नपूंसक आची, उक्रासे बच्बाक लेल गल्ली गल्ली भागत फिरेत आची
- 14:26–14:27तो उते की कला आची
- 14:27–14:29उते हास्से आची
- 14:29–14:35उते केवल समाजक एक्ता बिक्रित्र रूपक यदार्द्वादी नगन चित्रना चे
- 14:35–14:42लेक्ख आहाके हसार हल चे, मुद संगे संग चेतावनी सोहो दोर हो लग ची
- 14:42–14:45जे विश्वाटिका एक ता एहन माया जाल अचे,
- 14:46–14:49जते दार्म, अर्थ, आम मोक्ष्त दूर,
- 14:49–14:52कामुक सो हो वास्तविक आनन्द नहीं बेते ता चे,
- 14:53–14:56मात्र उकर भिदंबना पुन पतन होई ता चे.
- 14:56–14:59ता हमी अवश्ष्ष्विकार करे ची,
- 14:59–15:00जे एक ग्रन्त सब में,
- 15:00–15:06कामुकक दूर्दशाक, वोकर आर्थिक अस सामाजिक पतनक यतार्थ चित्रन अची.
- 15:06–15:11मुदा हम्रा एण नहीं भिसर बाखचाही, जे साहिते केबल उबदेश नहीं होई तची.
- 15:11–15:19इग्रन्त मानवभ्वनावक, वोकर दूबलतावक, आवकर कलात्मक प्रव्रिट्तिक एक्ता उत्क्रिष्ट उच्सब सोथेक.
- 15:19–15:21एक्ता सी मादھरी, हाँ.
- 15:21–15:24इते वेस्या वाटी केवल एक्ता बतन का खत्ता नहीं अची.
- 15:24–15:32ये अज्द थान अची, जटे कुलीन ताक मुखोता खसी जाई तची, आम मनुश आपन नगन यतार्ठ मे थारा हुई तची.
- 15:32–15:39उई यतार्ठ मे चलक संगे-संगे दाख्षिन न आची, संगी तची, आब बवद्दिक चातुरी आची.
- 15:39–15:44इग्रन्त तत्कालीन समाच के एक टाहन रूप प्रस्तूत करायत अची
- 15:44–15:48जटे पूरुश आ इस्त्री एक दोसरक बोद्दिक समकक्ष अची
- 15:48–15:50एह में ब्यंगया ची
- 15:50–15:54मुत्ता उ ब्यंगय मानवक उई आदिम प्रव्रुत्ती के नकारइत नहीं
- 15:54–15:57अपी तु उक्रा सम्पून रंग के संज्स्विकार करायताची
- 15:57–16:00हम से हो इश्विकार करब,
- 16:00–16:01जे एही ग्रन्त सब में,
- 16:01–16:03निष्चित रूप से एक ता अद्बूद,
- 16:03–16:05साहित्यक कलात्मकता अची.
- 16:05–16:08गजिंदर ताकुरक अनुवाद में से हो,
- 16:08–16:09उप्रवामयता अची,
- 16:09–16:12जब पाटख के बान्दिकर रख़े तची
- 16:12–16:15मुदा मतलब केवल भाशाक सुन्दर रे
- 16:15–16:17एकर मोल व्यंग्यात्मक स्वरके
- 16:17–16:18नहीं दवापावे तची
- 16:18–16:21जखन कुलीनताक मुखव्धा कहसे तची
- 16:21–16:22जना की आहा कहलों
- 16:22–16:25तची नगन यतारत सोजा आवे तची
- 16:25–16:26उस्सुंदर नहीं आचे
- 16:26–16:27उको ना
- 16:27–16:30उलोभी, कायर, अपाकहूरी आचे
- 16:30–16:35इचारो भान, विट, अखामुकक द्रिष्टी डोषक माद्ध्यम सं
- 16:35–16:39ततकालीं समाजक नेटिक्स खलन के उजागर करे तच्छुए।
- 16:39–16:42इग्रन्त मानवक, उईख्वोख्लापन के
- 16:42–16:48साहित्यक सुन्दर वस्ट्रा भूशन पहराक क, हम्रा सब कष्वार अग्टाची
- 16:48–16:52जैसा हम सब वोक्रा चिन्नी सकी, वोक्रा पर हसी सकी,
- 16:52–16:57आँ समबवता अपना भीतरक ओई प्रव्रित्ती के से हो देख सकी.
- 16:57–17:02यह दम अ समबवता यही विमर्ष्का वास्तविक सवन्दरे आच्छ
- 17:02–17:05जे एक कही गरन्त के एक कही प्रसंग के पडिका
- 17:05–17:10हम सब दूनु एते क भिन्न मुदा प्रामानिक निष्कर्स्प पहुज सकेट चीए
- 17:10–17:13आआ, साहित्ते गेराईते यह आची
- 17:13–17:14बलकुल!
- 17:14–17:16तप्राछीन संस्क्रितिक इभान साहित्ते
- 17:16–17:18मानबाक आदिम प्रव्रितिक
- 17:18–17:21उकर रसिगता अख्कलाक उच्सव आची
- 17:21–17:25वा उकर लोव आन्नेटिक पतन का एक ता निरमभ्दर्पन
- 17:25–17:27इवही बात पन निरभर करे तची
- 17:27–17:29जे आहा कोनो गतना के
- 17:29–17:31काम शास्त्र का चच्मासा देखी रहल ची
- 17:31–17:33वा यदार्त वादक चच्मासा
- 17:33–17:34सत्ते कालो
- 17:34–17:37दूनु पक्षक आपन आपन आदार एच
- 17:37–17:40इग ग्रन्त जतेक रस्भाइत आची
- 17:40–17:42ततो भेसी सुचने पर विवष करएट ची
- 17:42–17:44हम्रा सबक स्रोता सब के
- 17:44–17:47इविचार करवाकलेल हम सब प्रेरिद करेची
- 17:47–17:51जो उस्वेम आही साहित्र के गेराई ने जाकर ताए करती.
- 17:51–17:53इएक ता एहन प्रष्न आची
- 17:53–17:57जे सदिकन साहित प्रेमे सबखबीच विमर्ष्का विशे बनल रहत.
- 17:57–17:59आजुग विमर्ष हम सब यतिये समाप्त करेची.
- 17:59–18:01जुद बाक लिल द्हनेवाद
- 18:01–18:02द्हनेवाद
Plain text
बिमर्शक एही मंज पर आहाक सवागत अछि, जगन हम सब प्राषीं संस्क्रित साहित्य क विशे में सोचे जी, तप प्राया मतलब हमरा सब एक मोन में, पवित्र मंत्र, कत्होर दर्म्शास्त्री नियम, वा मोक्षक खोज में लागल सन्यासी सवैक चित्र आवाई तच्छि भी वीमर्शक केंधर मतलब जकर हिर्दाय प्राचीन कुसम्पूर अथात पातली पुत्रक वेश्या वाटिका आचे जताय जूवा आचे चल आचे भिल्कु, आवेश्य आचे से नुकाक निकली रहेल पाखन्दी सादू सभेक वरनन आचे आजोक विमर्ष्यक केंदर में आचे प्राचीन संस्क्रिच साहिते के चारेत अट्यंत प्रसिद रच्ना पद्म प्रब्रत्तकम दूर्त विट सम्वादा उभया भिसारिका आप पादा ताडेतकम इचारू रच्ना बान विदाक अंटर्गत आवेत चे जे वास्तव में एक प्रकार का एक लाप नाटक होई ता चे नहीं? आप एक दम जते एक ता मात्र पात्र मंच पर तारदबखा आखाश भाशितक माद्ध्यम सा अथा तक कलपित पात्र सबसंद्संग गप करे त पुरा समाज का चित्र प्रस्त॥ करे त ची. गजजद्र ताकुर द्फाड़ा कायल गेल एह चारो भान कम मेठली अनुवादक अदार पर हम सब आजुक यी विष्लेशन कराओ. आर आजुक विमर्ष्क क मुख्य प्रष्न जे आची, जे की इग्रन्त सव, तत्कालीन समाज का वैश्या अन नागरेक संस्क्रिति के, यह तब आद्ट्ट्टाउट्टी के एक तव उच्ट्ट्ट्ट्मक्वा कहु बोद्टेक अबहावात्मक चरमोद कष मानेताची वावा, यह यह यह पोड़ता स्वार्ती अ नहीतिक रूप से पतन्शील समाजक तीखषन आलोचना थेग इसे अपने बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बादे बा खलाक उच्सव नहीं आची, इग्रन्त बहुत सुख्श्मतासा इग्देखवाई तची, जे कोना वासना अदनक लोब में मनुश्षक बोद्धिक अननेटिक पतन होई तची. मुदा एह में प्रेमक से हुद तवरनान आची? आहा जक्रा एक्ता उच्छ प्रेम वा रसिक्ताक नाम्दार रहल ची वास्तव में मात्र एक्ता व्यापारिक च्यल आची ग्रन्त स्वायन एक्रा लेलेक शट्ता शब्द प्रवोक करे तची इबहान साहित्ते मानव खलोब वासना आमुर्खताक एक्ता यतार्थ वादी दस्तावेच थिक जते आब भावना कुनोस्ठान नहीं आची केवल स्वार्त सर्वो परी आची हम्रा लगी तची आची है, केवल स्वार्त हाशत्ता पर किंद्रिद भार्राजी मुदा इग्रन्त कुसुम्पूर के एक ता एहन स्वर्ग के रूप में वरनित करे ता चे जटे मतलब जटे कला गान वाद्द दिया रसिक्ता क असीम सम्मान आचे स्वर्ग? वेश्या वाटिका के हा स्वर्ग कहर रहल ची अम्रा विचार राखबाक दियाओ, विमर्षक प्रारंब रहा, प्रेम के स्वरूप सकरएची, अहा कनुसार इमात्रे एक तव्यापार्थेक, मुदा स्रोट समगरी में, प्रेम के ज़, ज़ सुख्श्म मनोविच्यान वरनेत अचे, उक्रा आंकोना देखा कर सकेच्छी? पद्म प्राभ्रितकम में देवसेना काम्रो कोवरनन देखू। आप, मुदा उक्र सन्ताः, उक्र अश्वू, उक्र निश्वास की सब जूत है? वेश्या जखन अपन प्रेमिक प्रतिक्षा करत आची, तो उकर अवस्ता कोनो तपस्विनी से कम नहीं होई तची. हम्रा एहन लगाई तची, जना जना एक तप कुशल संगीत कार वीना तार सवर निकाले थची, तहीना एही गरनत में कामुक पूरष और वेश्या एक तुसरक भावनाध तान च्डे तची. दूनु दिस्सा एक तबवद्दिक अबहावात्मक क्रीडा चलाईता ची आख वीना कुदारन बहुत सुन्दर अची मुदा आहा इभिसरी दहल ची जे वेश्या वीना तार नहीं बलकी उही कामी पूरुष्के बजा रहा लगी बजा रहा लगी इत बड़ा कदोर द्रिष्टिकों भेल कदोर मुदासत्य आ अहो कोनो भावात्मक कारन्से नहीं केवल दन के कारन्से आहा जक्रा सुंदर ये बोद आप प्रेम को मनो विग्यान कही रहल ची गरन्त उक्रा उप्चार कही तची उप्चार आहा उप्चार अद्तात बनावदी विवहार, जे केवल ग्राख के पहस्वेत अची. उभ्या भिसारिका में मादव सेनाक प्रसंग आहाख कोना भिसरी सके ची. कि मादव सेने अदे स्वादीन अची? अकर माए अक्रद दन के लोब में समुद्र दट्सन एक्ता अंचाह, कुरुप मुदा दनी पूरुष्लगा जबर्दस्ती पटादेई तची अतम माएक क्रूर्ता आजी भिल्कुल मुदा अते मादव सेना के प्रेमक जूट नाटक आथात बनावती रती करे परे तची भोर होई ते वो हताशा क्लान तची की यहां क सुंदर ये बोद है जताये एक ता इस्त्री के अपनिक्चाके विरद केवल दनाक लेल पूरुश संक प्रेमक अबहिनै करे परे ता ची. दनादत सार्थवाहक पूत्र दन्मित्र कता देखो. दन्मित्र के स्तितिता वास्तमे दैनी आची. इक्दम, उ अपन समपुन समपती वेश्या पर लूता देईता ची, अजगन उन निर्दन भोजाईता ची, तो वेश्याक माए उक्रा बाते बाटे बार निकाली देईता ची. इप्रेम के क्रिडा नहीं, क्रूर आर्थिक यदार्त थेक. दूगत विट समवाद हमेते इस पफ्ष्ट्रूप से कहल गेल आची जे वेश्याक माए एक ता बडवानल अ समद्द्रक भीट्रक उ आगी खिख जे कामी जनक सरवस्वभज्म कर देता चे हम सहमद ची जे य आर्थिक यदार्त उआई समाजक एक ता हिसाय है अम एकरा नकारी नहीं रोल ची, वेश्चय जननी एं क्रूर्ता सत्ते आचे, मुदा आहा इदिखो, जे इआख्यान, मदलप इग कता हम्रा सब दरी पुचा की रोल है. एह नाटक कजे मुख्य वक्ता आची जकरा विट कहल जाईत आचे. विट. जे स्वयम फ़ाल आचे मुदा वेट कोनु सादारन व्यक्ती नहाँ आची ओ समाजक और रसिक सु संसक्रत अब बड़िक नागरिक थेख जे यद्देपी आपन दंगमा चुकल आचे मुदा उकर प्रग्या तीख्षना आचे अहा एक रा एक ता आदूनिक युख का च्टन्दब कोमेटिन जगा देखी सकेई ची च्टन्दब कोमेटिन? इते किछ भेसी बहुगिले? नहने विचार करू, उसमाजक केनार पधाड अचे जकर ला खोबाक लेल किछो ने आचे अदाई कारन उ समाजक सब से पएक पाकंदिस सवक पोल खोली सके ची विट खुलीन वरगक चद्म आच्रनपा प्रहार करे तचे आह वईया करन दद्तकलच के देखु उजे स्त्री सब से व्याक्रनक कगब करे थचे अज्त्री सब सब प्रेम कगब कर बाक ठाम पन्निक कठों गयाक्रन का नियम जखाग बजेत ची, अस्त्री सब के दरा देत ची, विटो करे ही मुर्खताप रहसेत ची, चद्मवेशी वैशनब पवित्रक के देखू, जे मुहामेत च्वाचुत अपवित्रताक गब करेता ची मुदा वार्भाडवा भिलासीका नामक वेश्याक वस्त्र अपना लगन नुका कवेश्यापूरी में फसल आची इप्रसंग एस यसपड अवश्याचे वा ओबोद भिख्षु संगिलग जे भिक्षुक का पवित्र वस्त्र पहिर ने मुदा वेश्याक आंगन से निकली रहाल आची. देखु विट एही पाकहन्थ समुखत आची. उ मानव का आदिम प्रविर्तिक याथार्ट के सुईकार कर अची. आओ समाजक तता कतित पवित्र थेके दार सब सकतो भेशी सत्तिनिष्त हैची विट् सत्तिनिष्त अची मुदा की अपना स्वयंक दूर्दशाक प्रती सत्तिनिष्त अची आहा विटके मतलब समाजक एक्त महान क्रान्तिकारी आलोचक करूप में प्रस्तूत कर रहाल ची, मुदा ग्रन्त ता विटक अपन आत्मा प्रवंचना उकर स्ल्फ्ट्टिस्आप्षन पर व्यंग करे लाची. आत्मु प्रववचना को ना भेल, उते याद्धारत देखी रहा हो लाची. दूर्थ विट सम्वाद़, में विट स्वेम के स्विकार करे तची. उ कहे तची, जे जुवा आवेश्या व्यसनक कारन, उकर सर्वस्वन नष्ट बोगे लचे. अखर लग मात्र देज बचेन अचे, जाडक समय में अखरा लग दूसर वस्त्र दरी नहीं चे जो पहीर सकै. आई महान बडदिक विट की को रहल चे? औए यूवक सवके. आए, अगत नव्यूवक क्रिषनिलग के बेटे तची, अवक्रा पन पिताग विरुद भड़का रहल ची अवक्रा आपन पिताग विरुद भड़का रहल ची अवक्रा आपन पिताग विरुद भड़का रहल ची अवक्रा आपन पिताग विरुद बड़का रहल ची अवक्रा आपन पिताग बूड़ बूड़ बागिला गरन्त, हम्रा सब के एदेखार है लगची, जे कोना एक ता सु संट्क्रत वक्ती सो हो, वासना में पडगका अपन समपुन विवे गमा ले तची, आ, आ, अपन पतन के दर्षन कर नाम्दव का उचिट्ठेरावक चेष्टा करे तची. आज, हम माने ची, जे विट बहूतिक रूप से दरिद्र अवश्या ची, मुदा बोदिक आर रसात्मक रूप से अ अत्यातिक दनी आची. अकर दरिद्रता अकर वहूतिक बन्दन से मुक्त करे थाची, जाहिसे अ निदर भो का सत्य बजे थाची. अज्द्यत्द्दरी दर्शनक्गाप अची, इग्रन्तेक्ता अद्यन्त क्रान्तिकारी विचार इस्थापित करए तची, जग्रा आहा अंदेखा कर रहल ची. कोनो क्रान्तिकारी विचार? गरन्त मे विट श्पष्ट रूप से वेश्या के कुल्वदू अर्थाद समाज का समानित विवाहित पतनी से स्रेष्ट माने तची तटकालीन समाज मे एकोनो चोट गप नहीं ची विट कतर्क आची जे कुल्वदू लज्या अ समाजिक मर्यादा का बन्दन में बान्दल आची. उ आपन इक्षा वेक्त नहीं कर सके तची. उ अंदार में गुंगत में भेभीद भोर रती करे तची. मुदा दोसर दीस वेश्या ची. जिकर लग दाख्षन्या जी दाख्षन्या मतलब अनुकुलता आआ, दाख्षन्या अरतात उ अनुकुलता अ कलात्मक कोशल जतै उ पूरुसके बअद्धिक अ शारीरिक तुन्नो अस्तर पर चुनाती दे सकेची वेश्या गीत गवेट ची अद्रादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादा प्राचीन व्यंगे पर्ठोपी रहल ची, इस कोनु स्वादिन्ता नहीं आची, इसे एक दब रहम थिक, जिक्रा कामुक पूरुष पाली नहीं आची. आवू, हम पादतारित कम कवो ही बहुचर्चित प्रसंग पर्विमर्ष करे ची, जतेई सा आहाक एही स्वादिन्ताक अस्लियत् स्पष्ट्वीच्छे आहा विश्नु नागक कताक गब करहल्ची आही मैं, विश्नु नागक कता आचे, विश्नु नाग एक्ता कुलीन, सु संस्क्रित व्यक्ती आचे, जे वेश्या मदन सेनि का सा प्रेम करेत चे, प्रेमक कोनो विवाद मैं मदन सेनी का विष्नू नागक मात पर लाप मारत छे अब यी तताता कतिट स्वादिन वेश्याक प्रेमी की करत छे अप प्रायशचित खोजातछे अप कायर जका ब्रामभर सबख लगजा प्रायश्चित खोजातछे उ समाज में गावेत फिर हैता चे, जे हमर माथ पर वेश्याक लाथ लागल चे, हम आप पवित्र भोगेल ची, हमरा पवित्र करू। आहा एक रास त्त्री स्वादिन्ता कहब? इप्रसंग इदेखावेत ची, जे कामुक पूरुष कते कायर, गरी माहीन आहा स्यास्पत भजायते चे मुदा? वेश्याक तता कतिट स्वादिनता वास्तव में कामुक कक मतिव्रम थेक जते पूरुष वासनाक कारन अपनाके वेश्याक दास बना ले तची अ समपून समाजक उपहासक पात्र बने तची विश्नु नागेक मुर्खता स्ट्रीक स्वादिन्ता नहीं अपितु पूर्शार्त वहीनताक व्यंग्या जे विश्या उक्रा लात मारे तची कि एक तो पूरूश उही योग्या जे लेखख शामिलेक एही ताम एदेका रहा चतिन जे वास्ना कोना एक्ता विद्वान के कीरा जका पमाल को देता चे दिको, आहा विष्नुनागे कप्रसंग के केवल दर्म शास्त्र के दिश्टी से देख्राल ची जकन की एही नातक कमुल आदार काम्शास्त्र थेक काम्शास्त्र, अके ना? काम शास्त्र में मानिनी इस्त्री अथात उप्रेमिका जे अपन प्रेमिसे रुष्त अची उकर ढ़ारा मारल गे लात अप्मान नहीं आपी तु प्रेम के चरम अवस्ताम आनल जाईत अची उएक ता पूरसकार थेक इदिखावे तची जे इस्त्री आ पूरुश निर्बाद प्रेम के उईस्तर पर आची जे तै ख्रित्रम सम्मनक कुनोस तान नहीं आ पूरुशकार आ विश्नुनागे क मुर्कता इई आची जे उक्रवेश्षक लात लगल वित आन लेखकक द्रिष्टी से वोकर मुर्खता ही आची जे ओ कामशास्तरक उही प्रेमिक प्रषाद के दर्म्शास्तरक अनुसार पाप आर अपवित्रता मानी ले लक. वित विष्नुनाक के गदा कहेत आची कि एक तो रती क्रीडाक अन्तरंग छनके समाजिक आद्धर्मिक अप्मान्बुजी लेलक अस्वा सबा में प्राएस्चित खोजल्फिरल मुदा उता इग्रन्त टीक एही बात पर जोड देताची जे कामशास्त्र अद्धर्म्शास्त्र का जगत �alaga lagachi जे वेश्या पूरी में आची अखराइस्म्रितिक वद्ध्ध्व्शास्त्रक चश्मा से नहीं दिखल जास्गेताची उते वेश्या देवी आची अखामुक अखर आरादधख इग्रन्त इस �thepid करेताची जे प्रेमक अपना एक ता स्वतंत्र लोक आची जकर नियम समाज कर नियमा से बिश्नाची मुदा इस्वतन्त्र लोक जकर नियम बिश्नाची उ मानवक के कते लजाईता ची कि उकनो उतकर्ष दिस लजाईता ची नहीं उही विश्नु नागक अवस्ता दिकू उकर मान्सिक सन्तुलन बिगर्गेल, आहां जगरा प्रेमग प्रशाथ कहे रहल ची, उकर शामिलक इस पष्ट रूप से मुर्क्ता कप पराखाश्टा दिखाश्टा दिखाई रहल चाती. हम्रा उक्ता सुन्दर या बोध भुजाईता ची. अगर दुख में की कला त्मकता आची जकन आख महान दाशनिक विट दासिक पुट्र सुकुमारे रका जे अगर नपूंसक आची, अख्रा से बच्बाक लेल गल्ली गल्ली भागत फिरे तची तो उते की कला आची तकन उकर दुख में की कलात्मकता आची जकन आख महान दाशनिक विट दासिक पुत्र सुकुमारे रका जे एक ता नपूंसक आची, उक्रासे बच्बाक लेल गल्ली गल्ली भागत फिरेत आची तो उते की कला आची उते हास्से आची उते केवल समाजक एक्ता बिक्रित्र रूपक यदार्द्वादी नगन चित्रना चे लेक्ख आहाके हसार हल चे, मुद संगे संग चेतावनी सोहो दोर हो लग ची जे विश्वाटिका एक ता एहन माया जाल अचे, जते दार्म, अर्थ, आम मोक्ष्त दूर, कामुक सो हो वास्तविक आनन्द नहीं बेते ता चे, मात्र उकर भिदंबना पुन पतन होई ता चे. ता हमी अवश्ष्ष्विकार करे ची, जे एक ग्रन्त सब में, कामुकक दूर्दशाक, वोकर आर्थिक अस सामाजिक पतनक यतार्थ चित्रन अची. मुदा हम्रा एण नहीं भिसर बाखचाही, जे साहिते केबल उबदेश नहीं होई तची. इग्रन्त मानवभ्वनावक, वोकर दूबलतावक, आवकर कलात्मक प्रव्रिट्तिक एक्ता उत्क्रिष्ट उच्सब सोथेक. एक्ता सी मादھरी, हाँ. इते वेस्या वाटी केवल एक्ता बतन का खत्ता नहीं अची. ये अज्द थान अची, जटे कुलीन ताक मुखोता खसी जाई तची, आम मनुश आपन नगन यतार्ठ मे थारा हुई तची. उई यतार्ठ मे चलक संगे-संगे दाख्षिन न आची, संगी तची, आब बवद्दिक चातुरी आची. इग्रन्त तत्कालीन समाच के एक टाहन रूप प्रस्तूत करायत अची जटे पूरुश आ इस्त्री एक दोसरक बोद्दिक समकक्ष अची एह में ब्यंगया ची मुत्ता उ ब्यंगय मानवक उई आदिम प्रव्रुत्ती के नकारइत नहीं अपी तु उक्रा सम्पून रंग के संज्स्विकार करायताची हम से हो इश्विकार करब, जे एही ग्रन्त सब में, निष्चित रूप से एक ता अद्बूद, साहित्यक कलात्मकता अची. गजिंदर ताकुरक अनुवाद में से हो, उप्रवामयता अची, जब पाटख के बान्दिकर रख़े तची मुदा मतलब केवल भाशाक सुन्दर रे एकर मोल व्यंग्यात्मक स्वरके नहीं दवापावे तची जखन कुलीनताक मुखव्धा कहसे तची जना की आहा कहलों तची नगन यतारत सोजा आवे तची उस्सुंदर नहीं आचे उको ना उलोभी, कायर, अपाकहूरी आचे इचारो भान, विट, अखामुकक द्रिष्टी डोषक माद्ध्यम सं ततकालीं समाजक नेटिक्स खलन के उजागर करे तच्छुए। इग्रन्त मानवक, उईख्वोख्लापन के साहित्यक सुन्दर वस्ट्रा भूशन पहराक क, हम्रा सब कष्वार अग्टाची जैसा हम सब वोक्रा चिन्नी सकी, वोक्रा पर हसी सकी, आँ समबवता अपना भीतरक ओई प्रव्रित्ती के से हो देख सकी. यह दम अ समबवता यही विमर्ष्का वास्तविक सवन्दरे आच्छ जे एक कही गरन्त के एक कही प्रसंग के पडिका हम सब दूनु एते क भिन्न मुदा प्रामानिक निष्कर्स्प पहुज सकेट चीए आआ, साहित्ते गेराईते यह आची बलकुल! तप्राछीन संस्क्रितिक इभान साहित्ते मानबाक आदिम प्रव्रितिक उकर रसिगता अख्कलाक उच्सव आची वा उकर लोव आन्नेटिक पतन का एक ता निरमभ्दर्पन इवही बात पन निरभर करे तची जे आहा कोनो गतना के काम शास्त्र का चच्मासा देखी रहल ची वा यदार्त वादक चच्मासा सत्ते कालो दूनु पक्षक आपन आपन आदार एच इग ग्रन्त जतेक रस्भाइत आची ततो भेसी सुचने पर विवष करएट ची हम्रा सबक स्रोता सब के इविचार करवाकलेल हम सब प्रेरिद करेची जो उस्वेम आही साहित्र के गेराई ने जाकर ताए करती. इएक ता एहन प्रष्न आची जे सदिकन साहित प्रेमे सबखबीच विमर्ष्का विशे बनल रहत. आजुग विमर्ष हम सब यतिये समाप्त करेची. जुद बाक लिल द्हनेवाद द्हनेवाद