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ज्ञान_का_सच_और_दिमागी_धोखा.m4a

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Part 8 · VIDEHA MITHILA MAITHILI DISCUSSION CRITICISM SERIES PART 8
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  1. 0:00–0:10तो दिबेट मैं आपका सुआगत है, उं, सोची ए आप एक तप्ते हुए रेगिस्टान में बभतक रहे हैं, आपको दूर एक दम तप्ती रेथ पर पानी चमकता हुए दिकता है.
  2. 0:10–0:13वुआत थी ख्लास्स्से कुदारन है.
  3. 0:13–0:16अप अपनी पुरी ताकत लगाखार वहां बाकते हैं
  4. 0:16–0:19लेकिन वहां पाजते हैं तो हैं
  5. 0:19–0:20सुखी रेत मिलती हैं
  6. 0:20–0:22ये एक सादारन सा दोका है
  7. 0:22–0:24जिसे आम प्रिग त्रिष्ना कहते हैं
  8. 0:24–0:25बिलकुल
  9. 0:25–0:26लेकिन मजदार बात यह है
  10. 0:26–0:28की अगर में आप से कहुए कि
  11. 0:28–0:33इस एक दोके ने बारतिये दर्षन में सद्यों पुरानी एक अईसी बहस चिर दी थी,
  12. 0:33–0:35जो आज तक अनसुल जी है.
  13. 0:35–0:37और टीक यही हमारी आज की चर्चा का केंदर है.
  14. 0:37–0:40मतलब वो पानी आखिर आया कहा से?
  15. 0:40–0:43क्या वो सर्फ आपकी आखो का दोका था?
  16. 0:43–0:46या अपके दिमाग ने उसे एक तरह से सक्रियरुब से बनाया था.
  17. 0:46–0:47सईबात है.
  18. 0:47–0:49हम ज्यान मिमान सा,
  19. 0:49–0:51यानी अपिस्टमोलोगी की बात कर रहे है.
  20. 0:51–0:53ज्यान कैसे पैदा होता है,
  21. 0:53–0:56और हम कैसे तैकरते हैं कि वो सच है या जुट.
  22. 0:56–1:00तो आजकी इस भहेस के लिए हमारा आदार है,
  23. 1:00–1:03चोदवी शताब्दी के महान नयाया एक,
  24. 1:03–1:05गंगेश उपाद्धयाया का गरन्त,
  25. 1:05–1:06तत्व चिन्तामनी.
  26. 1:06–1:08और उंँ विशेश रूप से,
  27. 1:08–1:10गजेंद्र ताकृर दूरा किया गया,
  28. 1:10–1:12इसका जो हालीया अनुवाद है,
  29. 1:12–1:15अदर्टियान को भी बाहरी कसोटी पर पर परखना परता है
  30. 1:15–1:18और हमारा दिमाग सक्रिये रूप से ब्रम पैडा कर सक्ता है
  31. 1:18–1:23और मैं मी मान्सक तर्षन विषेश रूप से प्रभाकर मी मान्सक के द्रिष्टी कोन का प्रतीनिदे दिनागा
  32. 1:23–1:53भी बवाश्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्व
  33. 1:53–1:57वर जिसे आब भ्रम कहते है, वो दिमाग की कोई रचनात्मक चाल नहीं है.
  34. 1:58–2:01वो बस सच को पुरी तर न देख पाने की एक चूक है.
  35. 2:02–2:05तीक है, तो चलिए ग्यान के जन्म से ही शुरू करते हैं.
  36. 2:06–2:09नियाए दरशन में इसे परतह प्रमाने अवाद कहा जाता है.
  37. 2:09–2:12आप परत्टा यानी बाहरी
  38. 2:12–2:15आप इसका बहुत सीथा सा मतलब है
  39. 2:15–2:18के जब कोई ज्यान आपके दिमाग में आता है
  40. 2:18–2:22उवो मैं सच हुँ का कोई सर्टिटिकेट लेकर पैदा नहीं होता
  41. 2:22–2:25सत्तिता की पुष्ती बाहर से बाद में होती है
  42. 2:25–2:27लेकिन मैं से सहमत नहीं हूँ
  43. 2:27–2:27एक मिनेट
  44. 2:27–2:29मुझे अपना पूरा करने दीजे
  45. 2:30–2:33मान लीजे आप पहली बार कोई नहीं दिवाईस देकते हैं
  46. 2:33–2:39अपको तुरन्त सो प्रतिषद यकीनो जाता है कि वो क्या है और कैसे काम करती है?
  47. 2:39–2:40खेर नहीं पर
  48. 2:40–2:41नहीं होता ना
  49. 2:41–2:44गंगेश इसे अनब्यास दशा कयते है
  50. 2:44–2:48वो अस्तिती जहां हमें पहले से कोई अनुबहव नहीं है
  51. 2:48–2:50वहां हमें हमें अईशा सन्दे होता है
  52. 2:50–2:55अगर आपका मिमान सक सद्दान्त सही होता, के हर गयान स्वताह सत्या है,
  53. 2:55–2:59तो अनसान को कभी किसी नहीं चीस पर शकी नहीं होना चाही है ता.
  54. 2:59–3:02अग, मैं आपके संचय वाले पुझंट को समझ रही हूं.
  55. 3:02–3:05लिकिन दिक्ये आप आप इसे मनोविग्यानिक नजर्ये से देक्रे हैं
  56. 3:05–3:07दाशनिक नजर्ये से नहीं
  57. 3:07–3:10दर्षन और मनोविग्यन अलक छोडी है अंसान किलिये
  58. 3:10–3:11आ, आ, बलक्ल है
  59. 3:11–3:14हमारा सद्दानत है, स्वताह प्रमानवाद
  60. 3:14–3:20अगर दिया जली रहा है तो मुझे शक क्यो है कि यह रोशनी है यह नहीं
  61. 3:20–3:24सन्खे तब होता है जब यान की सामगगे अपन लगा नहीं
  62. 3:24–3:54तो उग़ान उपन लगान उपन लगान उपन लगान उपन लगान उपन लगान उपन लगान उपन लगान उपन लगान उपन लगान उपन लगान उपन लगान उपन लगान उपन लगान उपन लगान उपन लगान उपन लगान उपन लगान उपन लगान उपन लगान उ�
  63. 3:54–4:24अगर आप को पहले गयन को साभित करने के लिए दूसरे गयन की ज़रूरत है, अगर अप कब आप कब आप कब आप कब आप कब आप कब आप कब आप कब आप कब आप कब आप कब आप कब आप कब आप कब आप कब आप कब आप कब आप कब आप कब आप कब आप कब आप कब
  64. 4:24–4:29अप अप अज़ी नहींगे, अप अप मेशश्वक करते रहंगे, मानव मस्टिष्क अईसे काम नहीं कर सकता.
  65. 4:30–4:37मैं आप की बाथ से पुरी टरा सैमथ होता, अगर नयाई दर्षन ने इसका एक बहुती शांदार समथान ना दिया होता.
  66. 4:37–4:39अदेयानाचारे ने यह से बहुत अच्छे समजगया था
  67. 4:39–4:41प्रव्रित्ती सामर्थे है
  68. 4:41–4:43मतलब सफल कार्या
  69. 4:43–4:45प्रग्मातिक सक्सेस
  70. 4:45–4:47इक्डम सही, प्रग्मातिक कन्त्रादिक्छन की बात है,
  71. 4:47–4:49मान लीजे मुझे प्यास लगी है
  72. 4:49–4:51मैंने एक गलास में पानी दिखा
  73. 4:51–4:52प्रग्माटिक सक्सेस
  74. 4:52–4:53इक दम सही
  75. 4:53–4:55प्रग्माटिक कंट्रादिक्छन की बात है आप
  76. 4:55–4:57मान लीजे मुझे प्यास लगी है
  77. 4:57–4:59मैंने एक बलास में पानी देखा
  78. 4:59–4:59तीख है
  79. 4:59–5:00मुझे शक हुए
  80. 5:00–5:02कि यह सच में पानी है या
  81. 5:02–5:03कोई और केमिटल
  82. 5:03–5:04मैंने उसे पीया
  83. 5:04–5:09अब प्यास कबुजना कोई दार्षनिक सिद्धानत नहीं है, जिसके लिए मुझे किसी और प्रमान की जरूड़ हो.
  84. 5:09–5:10पर
  85. 5:10–5:17ये एक जीवन्त शारीरिक अनुबहव है, मेरी सफल क्रिया ने उस संचे के लूप को वही काट दिया.
  86. 5:17–5:20याने उसच्छे के लूप को वही काड दिया
  87. 5:20–5:23जान्यमित और सपल व्यवार होरा है
  88. 5:23–5:25वाई सच्छे तिखी नहीं सकता
  89. 5:25–5:29माव की जेगा लेकिन ख्या आप देक्रहे है के आप वही वापिस आगे है
  90. 5:29–5:31जहां से हम ने शुरू किया था
  91. 5:31–5:32मतलप मैं कैसे वापिस आगे है
  92. 5:32–5:36आपने कहा, मैंने पानी पीया और प्यास भुजगगगग.
  93. 5:36–5:39लेकिन ये अहसास के मेरी प्यास भुजगगगगग,
  94. 5:39–5:41क्या ये अपने आपने ज्यान नहीं है?
  95. 5:41–5:43भिलकल है, ये एक अनुबहव है.
  96. 5:43–5:46तो फिर इस नहीं ज्यान को कोन प्रमानित करेगा?
  97. 5:46–5:47औरे?
  98. 5:47–5:53अपको ये सावित करने के लिए एक अर टेस्ट नहीं करना पड़ेगा के अपकी प्यास सच्मे बुजी है
  99. 5:53–5:56या आप सरफ महसुस कर रहे है कि प्यास बुजगगगग?
  100. 5:56–6:02नहीं क्योंकी प्यास का बुजना एक स्वता सिथ जैवेख वास्ते विक्ता है
  101. 6:02–6:05अब दार्ष्निक तर्क को उस हत्तक खीच रही हैं
  102. 6:05–6:08जहां वो सामान ने बुद्दी
  103. 6:08–6:10या कोमन सेंस के खिलाथ चला जाता है
  104. 6:10–6:12मैं कोमन सेंस के खिलाथ नहीं जारही
  105. 6:12–6:15मैं बस आपके तर्क की कमजोरी दिखा रही हूं
  106. 6:15–6:18अगर मैं कहुं की मुझे दर्द होरा है,
  107. 6:18–6:20तो मुझे यह साभिट करने के लिए
  108. 6:20–6:23किसी और प्रमान की जरूरत नहीं है की मुझे दर्द होरा है.
  109. 6:23–6:26सफल क्रिया खुद में एक पूँड विराम है.
  110. 6:26–6:28लेकिन दर्षन में पूँँड विराम हमारी
  111. 6:28–6:58भी बच्टान की बच्टान की बच्टान की बच्टान की बच्टान की बच्टान की बच्टान की बच्टान की बच्टान की बच्टान की बच्टान की बच्टान की बच्टान की बच्टान की बच्टान की बच्टान की बच्टान की बच्टान की बच्टान की बच्टान की
  112. 6:58–7:02विफल हो गई अब इस ब्रम को आप कैसे समजाएंगे?
  113. 7:02–7:06इसे ब्हारतिया दर्षन के सबसे प्रसिध द्रष्टान्त से समचते हैं.
  114. 7:06–7:11समुद्र किनारे पडी सीप जो दूप में चान्दी जैसी चमक रही है.
  115. 7:11–7:14विक्ती उसे देकता हैं और उसे चान्दी समज लिता है.
  116. 7:14–7:15बिल्कुल
  117. 7:15–7:18न्याए दर्षन के अनुसार यह अन्निधाख्याती है
  118. 7:18–7:21अन्निधाख का मतलब है, अन्ने रूप में
  119. 7:21–7:23और ख्याती का मतलब है, यान
  120. 7:23–7:28विक्ती एक चीस को सकरी ये रूप से किसी दूस्री चीस के रूप में देक रहा है
  121. 7:28–7:33अगर यही मीमासक आप से पुरी तरह असहमत है, हम इसे अख्याती कहते है.
  122. 7:33–7:36अख्याती, यहनी गयान का नहुना?
  123. 7:36–7:40हा, हम मानते है कि ब्रहम कोई नहीं गलत रचना नहीं है,
  124. 7:40–7:44वाँ वास्तो में, तो गलक-गलक सत्तिर एक सात मोईजुद है,
  125. 7:44–7:48बस्दिमाग उनके बीच का फास्ला नहीं देख बारा है
  126. 7:48–7:54दो अलग अलग सत्टिर, सीप को चान्दी समजना सत्टि कैसे हो सकता है
  127. 7:54–7:59इसे बहत धियान से सूनीगा, क्योंकी ये मानव मनोविग्यान का बहत कहरा विष्लेशन है
  128. 7:59–8:06जब व्यक्ती सीप को देखता है, तो उसे दूरी या दूप की चकाचाउंत के कारन सीप का सीप पन नहीं दिखता.
  129. 8:06–8:07तीक है.
  130. 8:07–8:11उसे सर्फ एक चमकती हुई सपट चीज दिखती है. यह पहला गयान है.
  131. 8:11–8:14प्रत्यक्ष यह सच है कि वहां कुच चमक रहा है.
  132. 8:14–8:23अब दुस्रा ग्यान उस चमक को देक्कर विक्ती के दिमाग में अटीत में देखी गई चांदी की याद आती है.
  133. 8:23–8:27ये स्म्रिती है. ये भी सच है कि उसने कभी चांदी देखी ती.
  134. 8:27–8:29आम ब्याम।री
  135. 8:29–8:34प्रभाकर मीमान्सा कहते हैं, के विक्ती के दिमाग में स्म्रिती तो आती है,
  136. 8:34–8:38लेकिन वो ये बहुल जाता है कि ये एक याद है.
  137. 8:38–8:42इसे दर्षन में स्म्रिती प्रमोष कहा गया है.
  138. 8:42–8:44मतलब, मैमूरी रोबरी.
  139. 8:44–8:45बिल्कुल.
  140. 8:45–8:51तो एक तरफ है सामने मोझुद ये चमक्ती चीज, और दूस्री तरफ है स्म्रिती से आई चान्दी.
  141. 8:51–8:56व्यक्ती बस इन दोनो के बीच के भेद यानी अंतर को नहीं पकर पाता.
  142. 8:56–9:00मतलब आप कह रही है, कि दिमाग ने दो सही फाइलों को मिला दिया,
  143. 9:00–9:04लेकिन वो कोई गल्ती नहीं कर रहा है, वो बस अंटर देखने से चुक्रहा है.
  144. 9:04–9:11एक दम सही. जैसे किसी अंदेरे कम्रे में रक्खी दो गल्गलक कुषीया आपको एक बडी कुषी लगे.
  145. 9:11–9:13अपने कोई नहीं कुडसी पैदा नहीं की,
  146. 9:13–9:16बस उनके बीज की खाली जगा अपको नहीं दिखी?
  147. 9:16–9:19ये केवल भेद का अग्यान है.
  148. 9:19–9:22जिसे हम भेदा ग्रह कहते है.
  149. 9:22–9:26दिके आपकी ये व्याख्यास सुन्ने में बहुत शान्ती पून
  150. 9:26–9:27और तार्किक लकती है.
  151. 9:27–9:29लेकिन इस में बहुत बडा चेद है.
  152. 9:29–9:31अच्छा वो क्या?
  153. 9:31–9:35अगर में सर्फ दो चीजों के बीज का अंटर नहीं पकड़ पारा हूं
  154. 9:35–9:39मेरे मतलब है, अगर ये सर्फ एक पैस्सेविया निष्क्री अवस्ता है
  155. 9:39–9:43तो मैं उस चान्दी को उठाने के लिए आपना हात क्यो बड़ाता हूँ?
  156. 9:43–9:45विकि आप को लकता है कि वो चान्दी है?
  157. 9:45–9:50औरे लिकिन लगने के लिए दिमाग को एक सक्रिये निरने लेना परता है ना?
  158. 9:50–9:53कोई भी अनसान किसी चीस की तरफ तब थक हात नहीं बड़ाता
  159. 9:53–9:58तो अपके इसाप से दिमाक ख़ाग गया कर रहा है वहां
  160. 9:58–10:01दिमाक एक बहुत ही चालाक और सक्रीय मशीन है
  161. 10:01–10:05वो खाँई ख़ाग बादा पर प्रविर्ती के लिए एक सिंगल यूनिफाईड गयान चाहीए
  162. 10:05–10:08तो आपके इसाप से दिमाक ख़ाग गया कर रहा है वहां
  163. 10:08–10:12तो इस से मेरे आंदर उसे पाने की लाल्सा पैदा नहीं हो सकती.
  164. 10:12–10:16प्रविर्ती के लिए एक सिंगल यूनीफाइट गयान चहीए.
  165. 10:16–10:19तो आपके इसाप से दिमाक ख्या कर रहा है वहां.
  166. 10:19–10:22दिमाक एक बहुत ही चालाक और सक्करी आमशीन है.
  167. 10:22–10:27उखाली कानवस पर रंग बरता है, गंगेश इसे बहुत सतीकता से समजाते है.
  168. 10:27–10:32व्यक्ती उस सामने रक्फी सीप को एक बेस बनाता है,
  169. 10:32–10:37फिर वो आपनी यादो के बंडार से रजत्व, यानी चान्दीपन को निकालता है,
  170. 10:37–10:43अगर उस चान्दिपन को उस्सीप पर सक्रिय रूप से आरोपिट कर देता है, सुपर इमपोस कर देता है.
  171. 10:43–10:49मतलब आप केरे हैं कि दिमाग सच्मुच एक जूके यधहर्त की रच्ना कर रहें.
  172. 10:49–10:53बिल्कुल, वो सीप पर चान्दिपन को आईसे चिपका देता है
  173. 10:53–10:55जैसे वो उसी का हिस्सा हो
  174. 10:55–10:58जैसे कोई प्रोजेक्तर किसी सफेथ दिवार पर फिल्म चला रहा हो
  175. 10:58–11:01यह तु बहुत इजठल प्रक्रिया बतारे है आप
  176. 11:01–11:05दिवार अस्ली है, फिल्म की रील कही और से आई है,
  177. 11:05–11:08लेकिन जो तस्वीर बन रही है, वो एक ब्रहमित यधारत है.
  178. 11:08–11:11न्याई दर्षन इसे प्रमाना भास कहता है.
  179. 11:11–11:15ये केवल एक चूक नहीं है, ये एक चक्रिया बूल है.
  180. 11:15–11:20लेकिन एक मिन्नट रूकिये, आप मान रहे हैं कि मानव मस्तिषक एक अईसी फक्त्री है,
  181. 11:20–11:22जो गलत चीजें गडटी है.
  182. 11:22–11:23आप वो करता है आजा.
  183. 11:23–11:26पर कोई बैक्ती जान बुजकर खुद को दोका क्यो देगा?
  184. 11:26–11:30मी मान सक का अख्याती वाद सिद्धान्त इसले बहतर है,
  185. 11:45–12:15तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो �
  186. 12:15–12:19सत्तिग्रान करनेवाला मान्ना अदिक सरल और स्पष्ट है
  187. 12:19–12:22दिके मैं मानता हूँ के अर्थलागव एक बहतरीन तूल है
  188. 12:23–12:24चीजो को सरल होना चाहीए
  189. 12:25–12:30लेकिन, सरल्ता की कीमट पर हम तत्फ्यों को इगनोर नहीं कर सकते
  190. 12:30–12:32आपका सिद्धनत सरल तो है
  191. 12:32–12:34लिकिन सतीक नहीं है
  192. 12:34–12:36आप यह सा क्यो कहते हैं?
  193. 12:36–12:39क्यो कि अनसान का दिमाख कोई परफेक्त आदर्ष मशीन नहीं है
  194. 12:39–12:41हम पतन्षील हैं, फलेबिल हैं
  195. 12:41–12:44हमारे अंदर लालच हैं, दर हैं, पुर्वाग रहें
  196. 12:44–12:47आप दर्षिन में मनोवि यान को लागें
  197. 12:47–12:49ये दार्षनिक बहेस है
  198. 12:49–12:52क्योंकि ज्यान एक अन्सान ही तो ग्रहन कर रहा है
  199. 12:52–12:54जब एक लालची वेक्ती सीप को देखता है
  200. 12:54–12:58तुसकी चान्दी पाने की तीव रिच्छा उसके प्रत्टक्ष को प्रभवित करती है
  201. 12:58–13:00उसच्मुच वहां चान्दी देखता है
  202. 13:00–13:03तब दो चीजो में अंटर करने से नहीं चुकता.
  203. 13:03–13:06गंगेश का सिदानत इसली अपना महान है,
  204. 13:06–13:10कुकि उनो ने ग्यान को एक बहुती सक्त लोगिकल और गनित्ये डान्ची में बान्दा,
  205. 13:10–13:13जिसे नव्य न्याय कहा गया.
  206. 13:13–13:18दिक्ये मैं गंगेश की तारके क्षम्ता का पूरा सम्मान करती हूं
  207. 13:18–13:27तत्व चिंतामनी ने जिस तरहा से सन्निकर्ष यानी अई अई अई अई विशय के समपरक को परीभाशित की आई
  208. 13:27–13:29वो व्ँँ याँ चच में अदबुत है.
  209. 13:29–13:30बलकुल.
  210. 13:30–13:32गंगेश पक्तिव ग्यान की बात करते हैं.
  211. 13:32–13:34वो कहतें की ग्यान दो तरह का होता है.
  212. 13:34–13:39प्रमा यानी यतार्द ग्यान और अप्रमा यानी अप्रमा यानी अप्यार्द ग्यान.
  213. 13:39–13:40आँँँ.
  214. 13:40–13:42ये उनका मुख्य वर्गी करन है.
  215. 13:42–13:45जब हमारी आखे ठीक हों और रोशनी अच्छी हो,
  216. 13:45–13:50तो हमारी अंद्रिय और सीप का समपरक एक सही ज्यान पैदा करता है.
  217. 13:50–13:52लेकिन जब कोई दोश होता है,
  218. 13:52–13:54जैसे दूरी या आखो में पीलिया,
  219. 13:54–13:57पीलिया तो वे जुटा गयान पैदा करता है
  220. 13:57–13:59पीलिया वाला उदारन तो बहत आम है
  221. 13:59–13:59आँ
  222. 14:00–14:03पीलिया का मरीज सफेट दिवार को पीला दिकता है
  223. 14:03–14:07वो केवल दिवार और पीला पन में अंथर करने से नहीं चुकरा है
  224. 14:07–14:11उसकी आखे सच्मुच उस दिवार पर पीलापन आरोपिद कर रही है.
  225. 14:11–14:14रही एक मजबूत उदारन है.
  226. 14:14–14:18मैं मानती हूँ की पीलिया वाले मामले में सक्रिय आरोपन दिकता है.
  227. 14:18–14:24लेकिन मैं वापस मीमान सक के मुख्य उद्टेश्यषपर लोटन चाहूंगी.
  228. 14:24–14:28जिव शाएद गंगेश के इस कडे लोजिक में कही खोजाता है
  229. 14:28–14:29और वो उदेश्ख क्या है?
  230. 14:29–14:33ग्यान की गर्वां और मानव जीवन का निरबाद प्रवाज
  231. 14:33–14:36सुचे अगर हम नयाए की बात मान लें
  232. 14:36–14:39की हर ग्यान जन्न से ही शक्के गेरे में है
  233. 14:39–14:43यह ज़ाना दिमाग किसीबी पल एक जूटी फिल्म चला सकता है
  234. 14:43–14:46तो क्या हम कभी चैन से जीपाएंगे
  235. 14:46–14:50सुबहा उटकर चब आप अप अपनी कोफी का कब उटाते है
  236. 14:50–14:52तो क्या आप पहले ये टेस्ट करते है
  237. 14:52–14:55के ये कप अस्ली है या मेरे दिमाग कभ्रम
  238. 14:55–15:00आा, हम रर चीस टेस नहीं करते, क्योंकी हमें अपने पिछले सफल कारियों,
  239. 15:00–15:04यानी उसी प्रव्रित्ती सामर्थ पर भरोसा होता है.
  240. 15:04–15:06लेकिन उस भरोसे के बून्यात क्या है?
  241. 15:06–15:12हमारी दुन्या इसलीए चलती है, कुकी अन्सान बाई दिफाल्ट दुन्यापर भरोसा करता है.
  242. 15:12–15:16मी मान्सक इसी नैसर्गेग भरोसे को दर्षन करुब देते है.
  243. 15:16–15:18मतलब दिफाल्ट रास्ट?
  244. 15:18–15:19बलकुल!
  245. 15:19–15:27स्वत्तह प्रमानेवाद कहता है, कि जब तक कोई स्पष्ट विरुदाबास सामने न आए, ज्यान को सच मानिये.
  246. 15:27–15:33अगर आप रह आप प पर नय ज्यान को अडालत के कदगरे में कड़ा कर देंगे, तो जीवन पंगु हो जाएगा.
  247. 15:33–15:37अमारा सिद्दान्त, हमें उस दाूट के पैरालिसिच से बचाटा है
  248. 15:37–15:40दिके, मैं आपकी इस बाथ से पुरी तरा सहमत हु,
  249. 15:40–15:44कि रोज मर्रा के जिन्दिगी में, हम स्वताः प्रमाने वाद के सहारे ही चलते हैं
  250. 15:44–15:45हा, वही तो
  251. 15:45–15:48अम रपल एक दार्षनिक की तर है, शक्ष नहीं कर सकतें।
  252. 15:48–15:52और गंगेश भी ये नहीं कहतें कि आप रपल शक्ष करें।
  253. 15:52–15:57वो बस ये स्तापित कर रहें कि सत्टि की परिभाशा क्या है।
  254. 15:57–15:59और वो परिभाशा बहुत कथोर है।
  255. 15:59–16:01कि उसे कथोर हूना ही चाहीं।
  256. 16:01–16:03गंगेश का नववे नयाय हमे बताता है,
  257. 16:03–16:05की सत्तिवो नहीं है,
  258. 16:05–16:07जो हमे सच लगता है.
  259. 16:07–16:08सत्तिवो है,
  260. 16:08–16:10जो परिक्षन में खराउतरता है.
  261. 16:10–16:12लेकिन परिक्षन की भी तो सीमाए है?
  262. 16:12–16:13है,
  263. 16:13–16:15पर मानव मन की ए खुभी है,
  264. 16:15–16:17कि वो सकरे रूप से गल्तिया कर सकता है.
  265. 16:17–16:23जब हम इस बात को स्विकार करते हैं, तब ही हम ज्यानो मीमान्सा के परती अदिक सतर को पाते हैं.
  266. 16:23–16:26गंगेश ने तत्व छिंतामनी में यही किया.
  267. 16:26–16:32उनो ने हमें वो तारकिग भाशा दी, जिस से हम अपने ही विचारों का, एक तरा से एकसरे कर सकें.
  268. 16:32–16:37अग्स्रे ये वही अनालगी है जिसे हम ने शाएद अपनी चर्चा का विचार शूरू किया था.
  269. 16:37–16:43आप अब आब अप देख सकते है कि जान की दुन्या में, कोई भी एक सरे मशीन परफेक्त नहीं है.
  270. 16:43–16:48कभी कभी मशीन कھुद वो तूटी भी हड़ी दिखा देती है, जो वहां है ही नहीं.
  271. 16:48–16:54और कभी-कभी वाँशीन दो गलग-गलग हद्धीों के बीच्ट्ट्टर देखी नहीं पाती.
  272. 16:54–17:01सतीख का अपने. मुझे लगता है कि आजकी इस चर्चा में हमने दोनो पक्षों के सबसे मस्वुद तर्कों को सामने रख्खा है.
  273. 17:01–17:02बिल्कुल.
  274. 17:02–17:06न्याई दर्शन का परत्धफ प्रमानेवाद और अन्निताग ख्याती
  275. 17:06–17:09हमे यतार्त्वादी वेग्यानिक और सतर्ग बनाता है
  276. 17:09–17:12वो हमे बताता है कि हमारा दिमाग कैसे
  277. 17:12–17:14चक्रिय रुब से ब्रम्रज सकता है
  278. 17:14–17:19और वही मीमान्सक दर्शन का स्वताह प्रमानेवाद और अख्याती
  279. 17:19–17:25हमें ये यह यह दिलाता है, की मानव मन मोल रूप सत्यकी ओर ही जुका हूँए
  280. 17:25–17:29और ग्यान की गरीमा उस पर दीफाल्ट रूप से बहरोसा करने में हैं
  281. 17:29–17:33वरना हम तर्कों के अंतहीं चक्कर व्यूं में फसे रहाईगे.
  282. 17:33–17:35और सबसे खुबसुलित बात यह है,
  283. 17:35–17:38की गंगेश उपाद्धाय के तत्ट चिन्तामनी में,
  284. 17:38–17:40इन दोनो पक्षों का जो तक्राव है,
  285. 17:40–17:44उसने भार्दिय दर्षन को एक असी बोद्धिक उचाए दी है,
  286. 17:44–17:46जिसका दियन आज सद्यों बाद भी हम कर रहे हैं.
  287. 17:46–17:52आप और गजेंद्र ताकुची के अनुवाद ने इसे हमारे ले और भी सुलब बना दिया है.
  288. 17:52–17:57श्रोताओ को ये भी बतादे, कि गयान मीमान सा तु बस इस गरन्त का एक हिस्सा है.
  289. 17:57–17:58बिलकुल.
  290. 17:58–18:04इस में अनुमान व्याग्ती, जैसे कई अन्ने गेरे विश्वे हैं, जो अपने आप में एक �alag dunya hai.
  291. 18:04–18:08वो सच में पूरा महसागर है, जिस पर किसी और दिन दुपकी लगाई जासकती है.
  292. 18:08–18:14तो आजकी इस गेहन चर्चा के बाद, हम आपको वापस उसी रेगिस्तान की म्रिद त्रिष्ना के पास चोड जाते हैं.
  293. 18:14–18:19अगली बार जब आपको जीवन में कोई चीस बलकल साप, सपष्ट और सत्ते लगे,
  294. 18:19–18:22तो सरा एक पल किलि रूकिगेगा और खुट से पूचिएगा.
  295. 18:22–18:26क्या ये सच इसलिये है किकि ये आपके मन में सुत्टा हूट्पन उपन वहा है?
  296. 18:26–18:29या ये सच इसलिये है किकि आपने इसे आजः
  297. 18:30–18:33अपनी व्यावारिक दुनिया की कसवोटी पर कस कर देखा है?
  298. 18:33–18:37अपके दिमाग ने एक खाली कानवस पर अपनी ही लाल साँँ का रंग बहर दिया है?
  299. 18:37–18:42सत्टे की पहचान उसके उदगम से होती है, या उसके परनाम से.
  300. 18:42–18:45ये प्रश्न अब आपकी विवेक पर है.
  301. 18:45–18:58अपका बज़दिक सब़दिक सब़दिक सब़दिक सब़दिक सबदिक सबदिक सबदिक सबदिक सबदिक सबदिक सबदिक सबदिक सबदिक सबदिक सबदिक सबदिक सबदिक सबदिक सबदिक सबदिक सबदिक सबदिक सबदिक सबदिक सबदिक सबदिक सबदिक सबदिक सब

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तो दिबेट मैं आपका सुआगत है, उं, सोची ए आप एक तप्ते हुए रेगिस्टान में बभतक रहे हैं, आपको दूर एक दम तप्ती रेथ पर पानी चमकता हुए दिकता है. वुआत थी ख्लास्स्से कुदारन है. अप अपनी पुरी ताकत लगाखार वहां बाकते हैं लेकिन वहां पाजते हैं तो हैं सुखी रेत मिलती हैं ये एक सादारन सा दोका है जिसे आम प्रिग त्रिष्ना कहते हैं बिलकुल लेकिन मजदार बात यह है की अगर में आप से कहुए कि इस एक दोके ने बारतिये दर्षन में सद्यों पुरानी एक अईसी बहस चिर दी थी, जो आज तक अनसुल जी है. और टीक यही हमारी आज की चर्चा का केंदर है. मतलब वो पानी आखिर आया कहा से? क्या वो सर्फ आपकी आखो का दोका था? या अपके दिमाग ने उसे एक तरह से सक्रियरुब से बनाया था. सईबात है. हम ज्यान मिमान सा, यानी अपिस्टमोलोगी की बात कर रहे है. ज्यान कैसे पैदा होता है, और हम कैसे तैकरते हैं कि वो सच है या जुट. तो आजकी इस भहेस के लिए हमारा आदार है, चोदवी शताब्दी के महान नयाया एक, गंगेश उपाद्धयाया का गरन्त, तत्व चिन्तामनी. और उंँ विशेश रूप से, गजेंद्र ताकृर दूरा किया गया, इसका जो हालीया अनुवाद है, अदर्टियान को भी बाहरी कसोटी पर पर परखना परता है और हमारा दिमाग सक्रिये रूप से ब्रम पैडा कर सक्ता है और मैं मी मान्सक तर्षन विषेश रूप से प्रभाकर मी मान्सक के द्रिष्टी कोन का प्रतीनिदे दिनागा भी बवाश्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्वाद्व वर जिसे आब भ्रम कहते है, वो दिमाग की कोई रचनात्मक चाल नहीं है. वो बस सच को पुरी तर न देख पाने की एक चूक है. तीक है, तो चलिए ग्यान के जन्म से ही शुरू करते हैं. नियाए दरशन में इसे परतह प्रमाने अवाद कहा जाता है. आप परत्टा यानी बाहरी आप इसका बहुत सीथा सा मतलब है के जब कोई ज्यान आपके दिमाग में आता है उवो मैं सच हुँ का कोई सर्टिटिकेट लेकर पैदा नहीं होता सत्तिता की पुष्ती बाहर से बाद में होती है लेकिन मैं से सहमत नहीं हूँ एक मिनेट मुझे अपना पूरा करने दीजे मान लीजे आप पहली बार कोई नहीं दिवाईस देकते हैं अपको तुरन्त सो प्रतिषद यकीनो जाता है कि वो क्या है और कैसे काम करती है? खेर नहीं पर नहीं होता ना गंगेश इसे अनब्यास दशा कयते है वो अस्तिती जहां हमें पहले से कोई अनुबहव नहीं है वहां हमें हमें अईशा सन्दे होता है अगर आपका मिमान सक सद्दान्त सही होता, के हर गयान स्वताह सत्या है, तो अनसान को कभी किसी नहीं चीस पर शकी नहीं होना चाही है ता. अग, मैं आपके संचय वाले पुझंट को समझ रही हूं. लिकिन दिक्ये आप आप इसे मनोविग्यानिक नजर्ये से देक्रे हैं दाशनिक नजर्ये से नहीं दर्षन और मनोविग्यन अलक छोडी है अंसान किलिये आ, आ, बलक्ल है हमारा सद्दानत है, स्वताह प्रमानवाद अगर दिया जली रहा है तो मुझे शक क्यो है कि यह रोशनी है यह नहीं सन्खे तब होता है जब यान की सामगगे अपन लगा नहीं तो उग़ान उपन लगान उपन लगान उपन लगान उपन लगान उपन लगान उपन लगान उपन लगान उपन लगान उपन लगान उपन लगान उपन लगान उपन लगान उपन लगान उपन लगान उपन लगान उपन लगान उपन लगान उपन लगान उपन लगान उ� अगर आप को पहले गयन को साभित करने के लिए दूसरे गयन की ज़रूरत है, अगर अप कब आप कब आप कब आप कब आप कब आप कब आप कब आप कब आप कब आप कब आप कब आप कब आप कब आप कब आप कब आप कब आप कब आप कब आप कब आप कब आप कब आप कब अप अप अज़ी नहींगे, अप अप मेशश्वक करते रहंगे, मानव मस्टिष्क अईसे काम नहीं कर सकता. मैं आप की बाथ से पुरी टरा सैमथ होता, अगर नयाई दर्षन ने इसका एक बहुती शांदार समथान ना दिया होता. अदेयानाचारे ने यह से बहुत अच्छे समजगया था प्रव्रित्ती सामर्थे है मतलब सफल कार्या प्रग्मातिक सक्सेस इक्डम सही, प्रग्मातिक कन्त्रादिक्छन की बात है, मान लीजे मुझे प्यास लगी है मैंने एक गलास में पानी दिखा प्रग्माटिक सक्सेस इक दम सही प्रग्माटिक कंट्रादिक्छन की बात है आप मान लीजे मुझे प्यास लगी है मैंने एक बलास में पानी देखा तीख है मुझे शक हुए कि यह सच में पानी है या कोई और केमिटल मैंने उसे पीया अब प्यास कबुजना कोई दार्षनिक सिद्धानत नहीं है, जिसके लिए मुझे किसी और प्रमान की जरूड़ हो. पर ये एक जीवन्त शारीरिक अनुबहव है, मेरी सफल क्रिया ने उस संचे के लूप को वही काट दिया. याने उसच्छे के लूप को वही काड दिया जान्यमित और सपल व्यवार होरा है वाई सच्छे तिखी नहीं सकता माव की जेगा लेकिन ख्या आप देक्रहे है के आप वही वापिस आगे है जहां से हम ने शुरू किया था मतलप मैं कैसे वापिस आगे है आपने कहा, मैंने पानी पीया और प्यास भुजगगगग. लेकिन ये अहसास के मेरी प्यास भुजगगगगग, क्या ये अपने आपने ज्यान नहीं है? भिलकल है, ये एक अनुबहव है. तो फिर इस नहीं ज्यान को कोन प्रमानित करेगा? औरे? अपको ये सावित करने के लिए एक अर टेस्ट नहीं करना पड़ेगा के अपकी प्यास सच्मे बुजी है या आप सरफ महसुस कर रहे है कि प्यास बुजगगगग? नहीं क्योंकी प्यास का बुजना एक स्वता सिथ जैवेख वास्ते विक्ता है अब दार्ष्निक तर्क को उस हत्तक खीच रही हैं जहां वो सामान ने बुद्दी या कोमन सेंस के खिलाथ चला जाता है मैं कोमन सेंस के खिलाथ नहीं जारही मैं बस आपके तर्क की कमजोरी दिखा रही हूं अगर मैं कहुं की मुझे दर्द होरा है, तो मुझे यह साभिट करने के लिए किसी और प्रमान की जरूरत नहीं है की मुझे दर्द होरा है. सफल क्रिया खुद में एक पूँड विराम है. लेकिन दर्षन में पूँँड विराम हमारी भी बच्टान की बच्टान की बच्टान की बच्टान की बच्टान की बच्टान की बच्टान की बच्टान की बच्टान की बच्टान की बच्टान की बच्टान की बच्टान की बच्टान की बच्टान की बच्टान की बच्टान की बच्टान की बच्टान की बच्टान की विफल हो गई अब इस ब्रम को आप कैसे समजाएंगे? इसे ब्हारतिया दर्षन के सबसे प्रसिध द्रष्टान्त से समचते हैं. समुद्र किनारे पडी सीप जो दूप में चान्दी जैसी चमक रही है. विक्ती उसे देकता हैं और उसे चान्दी समज लिता है. बिल्कुल न्याए दर्षन के अनुसार यह अन्निधाख्याती है अन्निधाख का मतलब है, अन्ने रूप में और ख्याती का मतलब है, यान विक्ती एक चीस को सकरी ये रूप से किसी दूस्री चीस के रूप में देक रहा है अगर यही मीमासक आप से पुरी तरह असहमत है, हम इसे अख्याती कहते है. अख्याती, यहनी गयान का नहुना? हा, हम मानते है कि ब्रहम कोई नहीं गलत रचना नहीं है, वाँ वास्तो में, तो गलक-गलक सत्तिर एक सात मोईजुद है, बस्दिमाग उनके बीच का फास्ला नहीं देख बारा है दो अलग अलग सत्टिर, सीप को चान्दी समजना सत्टि कैसे हो सकता है इसे बहत धियान से सूनीगा, क्योंकी ये मानव मनोविग्यान का बहत कहरा विष्लेशन है जब व्यक्ती सीप को देखता है, तो उसे दूरी या दूप की चकाचाउंत के कारन सीप का सीप पन नहीं दिखता. तीक है. उसे सर्फ एक चमकती हुई सपट चीज दिखती है. यह पहला गयान है. प्रत्यक्ष यह सच है कि वहां कुच चमक रहा है. अब दुस्रा ग्यान उस चमक को देक्कर विक्ती के दिमाग में अटीत में देखी गई चांदी की याद आती है. ये स्म्रिती है. ये भी सच है कि उसने कभी चांदी देखी ती. आम ब्याम।री प्रभाकर मीमान्सा कहते हैं, के विक्ती के दिमाग में स्म्रिती तो आती है, लेकिन वो ये बहुल जाता है कि ये एक याद है. इसे दर्षन में स्म्रिती प्रमोष कहा गया है. मतलब, मैमूरी रोबरी. बिल्कुल. तो एक तरफ है सामने मोझुद ये चमक्ती चीज, और दूस्री तरफ है स्म्रिती से आई चान्दी. व्यक्ती बस इन दोनो के बीच के भेद यानी अंतर को नहीं पकर पाता. मतलब आप कह रही है, कि दिमाग ने दो सही फाइलों को मिला दिया, लेकिन वो कोई गल्ती नहीं कर रहा है, वो बस अंटर देखने से चुक्रहा है. एक दम सही. जैसे किसी अंदेरे कम्रे में रक्खी दो गल्गलक कुषीया आपको एक बडी कुषी लगे. अपने कोई नहीं कुडसी पैदा नहीं की, बस उनके बीज की खाली जगा अपको नहीं दिखी? ये केवल भेद का अग्यान है. जिसे हम भेदा ग्रह कहते है. दिके आपकी ये व्याख्यास सुन्ने में बहुत शान्ती पून और तार्किक लकती है. लेकिन इस में बहुत बडा चेद है. अच्छा वो क्या? अगर में सर्फ दो चीजों के बीज का अंटर नहीं पकड़ पारा हूं मेरे मतलब है, अगर ये सर्फ एक पैस्सेविया निष्क्री अवस्ता है तो मैं उस चान्दी को उठाने के लिए आपना हात क्यो बड़ाता हूँ? विकि आप को लकता है कि वो चान्दी है? औरे लिकिन लगने के लिए दिमाग को एक सक्रिये निरने लेना परता है ना? कोई भी अनसान किसी चीस की तरफ तब थक हात नहीं बड़ाता तो अपके इसाप से दिमाक ख़ाग गया कर रहा है वहां दिमाक एक बहुत ही चालाक और सक्रीय मशीन है वो खाँई ख़ाग बादा पर प्रविर्ती के लिए एक सिंगल यूनिफाईड गयान चाहीए तो आपके इसाप से दिमाक ख़ाग गया कर रहा है वहां तो इस से मेरे आंदर उसे पाने की लाल्सा पैदा नहीं हो सकती. प्रविर्ती के लिए एक सिंगल यूनीफाइट गयान चहीए. तो आपके इसाप से दिमाक ख्या कर रहा है वहां. दिमाक एक बहुत ही चालाक और सक्करी आमशीन है. उखाली कानवस पर रंग बरता है, गंगेश इसे बहुत सतीकता से समजाते है. व्यक्ती उस सामने रक्फी सीप को एक बेस बनाता है, फिर वो आपनी यादो के बंडार से रजत्व, यानी चान्दीपन को निकालता है, अगर उस चान्दिपन को उस्सीप पर सक्रिय रूप से आरोपिट कर देता है, सुपर इमपोस कर देता है. मतलब आप केरे हैं कि दिमाग सच्मुच एक जूके यधहर्त की रच्ना कर रहें. बिल्कुल, वो सीप पर चान्दिपन को आईसे चिपका देता है जैसे वो उसी का हिस्सा हो जैसे कोई प्रोजेक्तर किसी सफेथ दिवार पर फिल्म चला रहा हो यह तु बहुत इजठल प्रक्रिया बतारे है आप दिवार अस्ली है, फिल्म की रील कही और से आई है, लेकिन जो तस्वीर बन रही है, वो एक ब्रहमित यधारत है. न्याई दर्षन इसे प्रमाना भास कहता है. ये केवल एक चूक नहीं है, ये एक चक्रिया बूल है. लेकिन एक मिन्नट रूकिये, आप मान रहे हैं कि मानव मस्तिषक एक अईसी फक्त्री है, जो गलत चीजें गडटी है. आप वो करता है आजा. पर कोई बैक्ती जान बुजकर खुद को दोका क्यो देगा? मी मान सक का अख्याती वाद सिद्धान्त इसले बहतर है, तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो � सत्तिग्रान करनेवाला मान्ना अदिक सरल और स्पष्ट है दिके मैं मानता हूँ के अर्थलागव एक बहतरीन तूल है चीजो को सरल होना चाहीए लेकिन, सरल्ता की कीमट पर हम तत्फ्यों को इगनोर नहीं कर सकते आपका सिद्धनत सरल तो है लिकिन सतीक नहीं है आप यह सा क्यो कहते हैं? क्यो कि अनसान का दिमाख कोई परफेक्त आदर्ष मशीन नहीं है हम पतन्षील हैं, फलेबिल हैं हमारे अंदर लालच हैं, दर हैं, पुर्वाग रहें आप दर्षिन में मनोवि यान को लागें ये दार्षनिक बहेस है क्योंकि ज्यान एक अन्सान ही तो ग्रहन कर रहा है जब एक लालची वेक्ती सीप को देखता है तुसकी चान्दी पाने की तीव रिच्छा उसके प्रत्टक्ष को प्रभवित करती है उसच्मुच वहां चान्दी देखता है तब दो चीजो में अंटर करने से नहीं चुकता. गंगेश का सिदानत इसली अपना महान है, कुकि उनो ने ग्यान को एक बहुती सक्त लोगिकल और गनित्ये डान्ची में बान्दा, जिसे नव्य न्याय कहा गया. दिक्ये मैं गंगेश की तारके क्षम्ता का पूरा सम्मान करती हूं तत्व चिंतामनी ने जिस तरहा से सन्निकर्ष यानी अई अई अई अई विशय के समपरक को परीभाशित की आई वो व्ँँ याँ चच में अदबुत है. बलकुल. गंगेश पक्तिव ग्यान की बात करते हैं. वो कहतें की ग्यान दो तरह का होता है. प्रमा यानी यतार्द ग्यान और अप्रमा यानी अप्रमा यानी अप्यार्द ग्यान. आँँँ. ये उनका मुख्य वर्गी करन है. जब हमारी आखे ठीक हों और रोशनी अच्छी हो, तो हमारी अंद्रिय और सीप का समपरक एक सही ज्यान पैदा करता है. लेकिन जब कोई दोश होता है, जैसे दूरी या आखो में पीलिया, पीलिया तो वे जुटा गयान पैदा करता है पीलिया वाला उदारन तो बहत आम है आँ पीलिया का मरीज सफेट दिवार को पीला दिकता है वो केवल दिवार और पीला पन में अंथर करने से नहीं चुकरा है उसकी आखे सच्मुच उस दिवार पर पीलापन आरोपिद कर रही है. रही एक मजबूत उदारन है. मैं मानती हूँ की पीलिया वाले मामले में सक्रिय आरोपन दिकता है. लेकिन मैं वापस मीमान सक के मुख्य उद्टेश्यषपर लोटन चाहूंगी. जिव शाएद गंगेश के इस कडे लोजिक में कही खोजाता है और वो उदेश्ख क्या है? ग्यान की गर्वां और मानव जीवन का निरबाद प्रवाज सुचे अगर हम नयाए की बात मान लें की हर ग्यान जन्न से ही शक्के गेरे में है यह ज़ाना दिमाग किसीबी पल एक जूटी फिल्म चला सकता है तो क्या हम कभी चैन से जीपाएंगे सुबहा उटकर चब आप अप अपनी कोफी का कब उटाते है तो क्या आप पहले ये टेस्ट करते है के ये कप अस्ली है या मेरे दिमाग कभ्रम आा, हम रर चीस टेस नहीं करते, क्योंकी हमें अपने पिछले सफल कारियों, यानी उसी प्रव्रित्ती सामर्थ पर भरोसा होता है. लेकिन उस भरोसे के बून्यात क्या है? हमारी दुन्या इसलीए चलती है, कुकी अन्सान बाई दिफाल्ट दुन्यापर भरोसा करता है. मी मान्सक इसी नैसर्गेग भरोसे को दर्षन करुब देते है. मतलब दिफाल्ट रास्ट? बलकुल! स्वत्तह प्रमानेवाद कहता है, कि जब तक कोई स्पष्ट विरुदाबास सामने न आए, ज्यान को सच मानिये. अगर आप रह आप प पर नय ज्यान को अडालत के कदगरे में कड़ा कर देंगे, तो जीवन पंगु हो जाएगा. अमारा सिद्दान्त, हमें उस दाूट के पैरालिसिच से बचाटा है दिके, मैं आपकी इस बाथ से पुरी तरा सहमत हु, कि रोज मर्रा के जिन्दिगी में, हम स्वताः प्रमाने वाद के सहारे ही चलते हैं हा, वही तो अम रपल एक दार्षनिक की तर है, शक्ष नहीं कर सकतें। और गंगेश भी ये नहीं कहतें कि आप रपल शक्ष करें। वो बस ये स्तापित कर रहें कि सत्टि की परिभाशा क्या है। और वो परिभाशा बहुत कथोर है। कि उसे कथोर हूना ही चाहीं। गंगेश का नववे नयाय हमे बताता है, की सत्तिवो नहीं है, जो हमे सच लगता है. सत्तिवो है, जो परिक्षन में खराउतरता है. लेकिन परिक्षन की भी तो सीमाए है? है, पर मानव मन की ए खुभी है, कि वो सकरे रूप से गल्तिया कर सकता है. जब हम इस बात को स्विकार करते हैं, तब ही हम ज्यानो मीमान्सा के परती अदिक सतर को पाते हैं. गंगेश ने तत्व छिंतामनी में यही किया. उनो ने हमें वो तारकिग भाशा दी, जिस से हम अपने ही विचारों का, एक तरा से एकसरे कर सकें. अग्स्रे ये वही अनालगी है जिसे हम ने शाएद अपनी चर्चा का विचार शूरू किया था. आप अब आब अप देख सकते है कि जान की दुन्या में, कोई भी एक सरे मशीन परफेक्त नहीं है. कभी कभी मशीन कھुद वो तूटी भी हड़ी दिखा देती है, जो वहां है ही नहीं. और कभी-कभी वाँशीन दो गलग-गलग हद्धीों के बीच्ट्ट्टर देखी नहीं पाती. सतीख का अपने. मुझे लगता है कि आजकी इस चर्चा में हमने दोनो पक्षों के सबसे मस्वुद तर्कों को सामने रख्खा है. बिल्कुल. न्याई दर्शन का परत्धफ प्रमानेवाद और अन्निताग ख्याती हमे यतार्त्वादी वेग्यानिक और सतर्ग बनाता है वो हमे बताता है कि हमारा दिमाग कैसे चक्रिय रुब से ब्रम्रज सकता है और वही मीमान्सक दर्शन का स्वताह प्रमानेवाद और अख्याती हमें ये यह यह दिलाता है, की मानव मन मोल रूप सत्यकी ओर ही जुका हूँए और ग्यान की गरीमा उस पर दीफाल्ट रूप से बहरोसा करने में हैं वरना हम तर्कों के अंतहीं चक्कर व्यूं में फसे रहाईगे. और सबसे खुबसुलित बात यह है, की गंगेश उपाद्धाय के तत्ट चिन्तामनी में, इन दोनो पक्षों का जो तक्राव है, उसने भार्दिय दर्षन को एक असी बोद्धिक उचाए दी है, जिसका दियन आज सद्यों बाद भी हम कर रहे हैं. आप और गजेंद्र ताकुची के अनुवाद ने इसे हमारे ले और भी सुलब बना दिया है. श्रोताओ को ये भी बतादे, कि गयान मीमान सा तु बस इस गरन्त का एक हिस्सा है. बिलकुल. इस में अनुमान व्याग्ती, जैसे कई अन्ने गेरे विश्वे हैं, जो अपने आप में एक �alag dunya hai. वो सच में पूरा महसागर है, जिस पर किसी और दिन दुपकी लगाई जासकती है. तो आजकी इस गेहन चर्चा के बाद, हम आपको वापस उसी रेगिस्तान की म्रिद त्रिष्ना के पास चोड जाते हैं. अगली बार जब आपको जीवन में कोई चीस बलकल साप, सपष्ट और सत्ते लगे, तो सरा एक पल किलि रूकिगेगा और खुट से पूचिएगा. क्या ये सच इसलिये है किकि ये आपके मन में सुत्टा हूट्पन उपन वहा है? या ये सच इसलिये है किकि आपने इसे आजः अपनी व्यावारिक दुनिया की कसवोटी पर कस कर देखा है? अपके दिमाग ने एक खाली कानवस पर अपनी ही लाल साँँ का रंग बहर दिया है? सत्टे की पहचान उसके उदगम से होती है, या उसके परनाम से. ये प्रश्न अब आपकी विवेक पर है. अपका बज़दिक सब़दिक सब़दिक सब़दिक सब़दिक सबदिक सबदिक सबदिक सबदिक सबदिक सबदिक सबदिक सबदिक सबदिक सबदिक सबदिक सबदिक सबदिक सबदिक सबदिक सबदिक सबदिक सबदिक सबदिक सबदिक सबदिक सबदिक सबदिक सबदिक सब

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