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चतुर्भाणी_में_श्रृंगार_और_सामाजिक_पाखंड.m4a
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- 0:00–0:02वल्क्म तो देबेट
- 0:02–0:05जरा एक दिष्षी की कलपना कीजीए
- 0:05–0:08एक बहत कतर ब्रम्हन है
- 0:08–0:12एक अँसा इनसान जो खुद को इतना पवित्र मानता है
- 0:12–0:15कि सरक पर चलते हुए, मतलब आम लोगों से
- 0:15–0:17चुवा चुथ के दर से बच्टा फिरता है
- 0:17–0:18आ, बिल्कुल
- 0:18–0:22तभी रब ब्राम्वन कब्राया है, पसीने से तर बतर है,
- 0:22–0:27और और मनु या वशिष्ट जैसे महान रिष्यों के दर्मशास्तरों के पन्ने पलड़त रहा है.
- 0:27–0:31और मजदार बात येना कि वो पागलों कि तरा ये दूँड़ा है,
- 0:31–0:33तो के दर्मशास्त्रों के पन्ने पलट रहा है
- 0:33–0:34वुुुुुुुुुुुु
- 0:34–0:35और मजदार बात यहना
- 0:35–0:37कि वो पागलों कि तरा यह दूँड़ा है
- 0:37–0:39कि वेश्या की लाथ खाने के
- 0:39–0:42इस महापाप का प्रैश्षी ताखिर क्या है
- 0:42–0:43सही कहा
- 0:43–0:46अर सब से बड़ी विडवना यह है कि दरमशास्तरो में देखे है,
- 0:46–0:50हर चीस का नियम है, लेकेन इस अजीबो गरीब गधना का कोई जिकर ही नहीं है,
- 0:50–0:53अप शुरतान को लक सकता है कि यह एक आजका स्टन्डब कोमटी शो है.
- 0:53–0:55आप भी बज़ादिया के बाद तादितकम नाम के लिए नाटक से लिया गया है.
- 0:55–0:58तो जब हम प्राचीन संसक्रित साहित्ते के बारे में सुचते है,
- 0:58–1:01तो हमारे मन में अकसर एक बहुत लिए आद्यात में,
- 1:01–1:05शान्त और मतलब विववस्तिद दून्या की चवी उबरती है.
- 1:23–1:33जिसे बाश़ कहा जाता है, वहा उस शान्त मनदर के तीक पीचे स्तित एक शोर शराभे वाले रंगीन और सान्सालिग भाजार की कहानी है.
- 1:33–1:42जो श्रूता एस विद्धा से परचित नहीं है, उनके बतादों की बाश़ एक प्रकार का एक अलाप या वन मैंचो होता है.
- 1:42–1:44यानी मंच्पर किवल एक ही अभी निता होता है
- 1:44–1:45बिलकुल
- 1:45–1:47वो पूरे शहर से
- 1:47–1:49खासकर वेश्याँ के मुहली से गुजरता है
- 1:49–1:52हवामे कालपनिक लोगों से बाते करता है
- 1:52–1:54उनके जबाब दोर आता है
- 1:54–1:55और और दर्षकों को
- 1:55–1:57उस समय के समाज के
- 1:57–2:00सब से अंतरंग हिस्तों में लेजाता है.
- 2:00–2:02मैं आज इसी विमष्क का नित्रत्व करूंगा
- 2:02–2:03और मेरा मानना है,
- 2:03–2:05कि ये रचना है,
- 2:05–2:08मानविय इच्ठावों का एक परिष्क्रत उट्सव है.
- 2:08–2:10और मैं आजके इस विमष्क में,
- 2:10–2:12तुसरे पहलु को सामने रखूंगी.
- 2:12–2:19मेरा मानना है, कि ये रचना है असल में समाज के पाकशनद पर एक बहुत्ही गेरा अर तीखा व्यंगय है.
- 2:19–2:22तो यही से आजके हमारे विमर्ष्का मुक्छे सवाल जन मिलेता है.
- 2:22–2:26आज हम गुब्त काल के असपास रची गय चार प्रमुक भाँन रचनाउ,
- 2:26–2:29जिने सामुहिक रूप से चत्रबानी कहाजाता है,
- 2:29–2:31उनके इर्द गिड़ अपनी चर्चा रखेंगे.
- 2:31–2:33आआ, उवो चार प्रमुख रच्नाये.
- 2:33–2:35जी, और सवाल ये है,
- 2:35–2:39क्या ये शास्तरिय पात मुख्य रूप से मानविय सान्दर्ये?
- 2:39–2:45काम, मतलब इच्छा, और प्रेम, और एक परिष्क्रिज जीवन शहली का महिममन दन करते हैं?
- 2:45–2:54या फिर क्या ये उस समयके समाज के पाक्च्ण, लालग्च और खोक्ले नैटिक आदर्षों पर किया गया एक बहुत इख्चा विंगे है?
- 2:54–3:02देके मेरी दलील ये है कि ये पात मानविय मनोविग यान और संदरे शास्तर के अद्दिनत परष्क्रित दस्टबेज है.
- 3:02–3:08ये उस युक्की कलात्मक परिपक्वता को दरषाते है, जिसने मानव जीवन के सबसे रंगीन पहलु,
- 3:08–3:17बद्दिक और दार्ष्निक उचाई दी अच्छा दार्ष्निक उचाई बलकुल ये साहिद ते इच्छाँ को दबाने के बजाई,
- 3:17–3:24मलगप उने समच्छता है और उच्छल मनाता है आप जीसे कलात्मक परिपक्वता कह रहे है ना,
- 3:24–3:27मैं उसे एक बिल्कुल अलक चष्मे से देकती हूँ
- 3:27–3:30मिरा मानना है के इन रच्नाउ के किंद्र में
- 3:30–3:34एक बहुत्थी क्रूर और और ट्रन्ज्श्शनल र्यालिति है
- 3:34–3:37मथलब लें देन पर्टिका याठार्थ मोझुद है
- 3:37–3:38क्रूर याठार्थ
- 3:38–3:39हां, बिल्कुल
- 3:39–3:53ये कोई आदर्श्वादी दुन्या नहीं है, ये समाज के दुगलेपन, स्वार्ती रिष्तों और उन सत्तादादारी वर्गों का पर्दा बाश है, जो जो दिन में तो द्ध्र्म का उब्देष देते हैं, लेकिन रात में वास्ना के गुलाम बन जाते हैं.
- 3:53–3:56देखे आप इसे क्रूर वास्त्विक्ता कहरे हैं
- 3:56–3:59लेकिन अगर अगर अप इन गरन्तों की गेराई में उत्रें
- 3:59–4:00तो हमें वहां
- 4:00–4:02काम और श्रिंगार रस्का
- 4:02–4:04एक बहुती गेरा
- 4:04–4:06मनोवेग्यानिक विष्लिषन मिलता है
- 4:06–4:07ये रच्नाए
- 4:07–4:10तुब आप देख या शारिरिक लाल्सा तक सीमित नहीं हैं
- 4:10–4:12तुफिर और क्या है न में
- 4:12–4:18आप देख ही खी लेकह कोने मान्वी अबहावनाव को प्रक्रिती के साथ कैसे पिरोया है
- 4:18–4:21जब वसन त्रितु का उलास दिखाया जाता है
- 4:21–4:24तो वो के ल खेल मोसम कब बडलना नहीं होता
- 4:24–4:28वो मन के भीतर पनप्रही इच्छाँ का आईना बन जाता है
- 4:28–4:32एन रचनाव में गनिकाँ यानी वेश्वाँ का जो वरनन है
- 4:32–4:34उनके मुस्कृराने का तरीका
- 4:34–4:36उनकी तिर्ची नजरें
- 4:36–4:39उनके आबूशनो का इतनी बारी की से क्या गया चित्रन
- 4:40–4:45ये सब बताता है कि उस समाज में सून्दर्या को कितनी गंविर्ता से लिया जाता ता
- 4:46–4:51ये एक आईसे समाज का चित्रन है, जास्सुक भोगना कोई अप्राद नहीं, बलकी एक कला थी
- 4:51–4:56ख़ेर आप आप ने गनिकाओ की मुस्कान और आबुशनों की बात की
- 4:56–5:00ये सुन्ने में मतलब बहुत काव्यात्मक लकता है
- 5:00–5:03लेकिन उस मुस्कान के पिछे की आस्ली वजा क्या है
- 5:03–5:06इस तताख कतित सुंदर्या शास्तर की नीव
- 5:06–5:09इक बहुत ही निंदनिया और व्यवारिग जमीं पटिकी है
- 5:09–5:10बो कैसे?
- 5:10–5:15आप उबहयाब ही सारिका में राम सेना नाम की वेश्या माता के चरित्र को ही ले ले लिगे
- 5:15–5:18उसका लालग इतने नंगे रूप में सामने आता है
- 5:18–5:22कि आप आप आप उसे किसी कलात्मक आवरन में नहीं चिपा सकते.
- 5:22–5:23लिकिन वो तो...
- 5:23–5:27एक मिनेट, सामगरी सपष्ट रूप से दिखाती है,
- 5:27–5:30कि कैसे ये माताये अपनी ही पुत्रियों को,
- 5:30–5:33उन प्रेमियों से बेरहमी से दूर कर देती हैं,
- 5:33–5:35जिन के पास आप पैसा नहीं बचा है
- 5:35–5:39और उने नेए आमीर ग्राहाकों को सुवप देती है
- 5:39–5:42यहां कोई आदर्श्वादी प्रेम नहीं है
- 5:42–5:48देखे, हर भावना, हर आज, और हर उस तिर्ची नजर की एक कीमत तै है
- 5:48–5:50मैं आप की बाद समझ रहा हूं
- 5:50–5:52अद्तमा वेश्या काभी तो विस्तार से वरनन है
- 5:52–5:54उत्मा वो है जो किसी दानी गुडमाश नाद्ग रादाग
- 5:54–5:56तो वेश्या लागा वेश्या तो विस्तार से वरनन है
- 5:56–5:58उत्मा वो है जो किसी दानी गुडमाश नादाग
- 5:58–6:00तो उत्मा वेश्या काभी तो विस्तार से वरनन है
- 6:00–6:05उत्मा वो है जो किसी दानी, गूडमान और यूवा पूर्षे सच्चा प्रेम करती है
- 6:05–6:07सच्चा प्रेम उस भाजार में
- 6:07–6:08यलकुल
- 6:08–6:11पाट में सच्ची प्रेमिका के लाएट्ची माता है
- 6:11–6:13केवल दन के लिए प्रेम का नाटक करती है.
- 6:13–6:17लेके वही उत्मा वेश्या का भी तो विस्तार से वरनन है.
- 6:17–6:22उत्मा वो है जो किसी दानी, गुणमान और यूवापुर्ष से सच्चा प्रेम करती है.
- 6:22–6:24सच्चा प्रेम उस भाजार में.
- 6:24–6:25बलकल.
- 6:25–6:55पाट में सच्ची प्रेमिका के लक्षन बहुत गेराई से बताएगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगग�
- 6:55–6:57वियोग का कावियात्मक वरनन जरूर है,
- 6:58–7:01लेकिन उसी सास में लेक्ख हमें चेतावनी भी तो देता है.
- 7:01–7:02कैसी चेतावनी?
- 7:03–7:04सामगरी में साव साव कहा गया है,
- 7:05–7:08कि कामुक व्यकती के लिए वेश्याई एक बडवानल की तर है.
- 7:09–7:10बडवानल समझ रहे ना?
- 7:10–7:12आँ समुदर के भीटर की आग
- 7:12–7:15इक दम वो आग जो सब कुछ निगल जाती है
- 7:15–7:17और वापस कुछ नहीं देती
- 7:17–7:19पाट कैता है कि वेश्याँ का हिरदे
- 7:19–7:21कभी विष्वसन यह नहीं होता
- 7:21–7:23और तो और इस पूरी विवस्ता में
- 7:23–7:25शथता, यानी दूरतता
- 7:25–7:26और दोखे बाजी
- 7:40–7:45दन कदम हुने पर जिस तरा लोगों को बाहर कर आस्ता दिखाया जाता है,
- 7:45–7:50वो यस बात का सबूथ है, कि ये ये सच्चा अनुराग अकसर इग ब्रहम है.
- 7:50–7:54एक इल्जिन है, जिसे बहुत चालाकी से बेचा जारा है.
- 7:54–8:04अब जिसे पुरी तरसे शोषन और दिखावा मान रही है, मैं उसे उस समाज का नगन यतारत मानता हूँ, जहां काम सर्वो परी शकती है.
- 8:04–8:07और यही से हमारी चर्चा उस दिशा में मुड़ी है
- 8:07–8:09जहां तत्कालीन समाज के दार्मेक
- 8:09–8:12और सत्तादारी वर्गो का चित्रन की आगे है
- 8:12–8:14आव वो बहुत जोरी हिस्सा है
- 8:14–8:17शाए दिये पैसा और प्यार का खेल आप को इसली द्ना कथोर लग रहा है
- 8:17–8:21कुकि आप इसे, मतलब आजकी नटिक्ता से ताल रही हैं.
- 8:21–8:25उस समय के समाज में काम को जो सर्वोच चस्थान प्रापते ता,
- 8:25–8:27वो दारमेक कर्मकान्डो से भी उपर ता.
- 8:27–8:30देखिए, अगर काम सर्वोच ता,
- 8:30–8:36तो फिर इं गरन्तो में दार्मेक और विद्वान लोगों का इतना बहयंकर मजाक क्यो उडाया गया है?
- 8:36–8:42मेरी राय में ये मजाक ही इस सामगरी के वेंज्यात्मक होने का सब से बड़ा प्रमाड है.
- 8:42–8:45आचा तो आप इसे सिझ चिफ मजाक मानती है?
- 8:45–8:50बलकुल, मेरा मतलव है पद्मप्राबद्कम में एक बोद्धबिखषू है.
- 8:50–8:54संगेलक, वो खुत को बुद्धध कानुयाई कहता है,
- 8:54–8:56लोगो को पन्चषील के उबदेज देता है,
- 8:56–9:01वेश्याँ की गली से चिपकर अपना गेरूवा वस्ट्र समेटेवे निकल रहा है
- 9:01–9:04किँकी वो वासना में पुरी तरे लिपत है
- 9:04–9:06आँ वो प्रसंग है
- 9:06–9:09इसी तर है एक वेश्नव है, पवित्रक
- 9:09–9:13वो राजपत पर चलते हुए चूए चूए चूए त का नाटक करता है
- 9:13–9:43लोगो से कहता है, मुझ से दूर रहो, मैं अपवित रहो जाूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ�
- 9:43–9:46बवद्दिख और दार्मिक दाचे का खुला उबहास है,
- 9:46–9:48कोई-कृई श्रिंगार का उद्सव नहीं.
- 9:48–9:52रहीं, ये सारे उदारन् बिलकुल सतीख है,
- 9:52–9:55और पाट में मोजुद है, मैं से इंकार नहीं कर रहा.
- 9:55–10:00बिखशुवाँ ब्रामवनो और विद्वानो का ये पाखन्ड वास्तो में रास्से पैदा करता है.
- 10:00–10:04लेकिन लेकिन जरा एक चित्रकार के बारे में सोचीए.
- 10:04–10:06चित्रकार? यहां चित्रकार कहां से आगया?
- 10:06–10:09दिक्ये, जब एक चित्रकार किसी विषाल कानवस पर,
- 10:09–10:12किसी विषेश हिस्से पर तेज रोषनी दिखाना चाता है.
- 10:12–10:13तो वो क्या करता है?
- 10:13–10:18वो उस रोषनी के तीक पीछे गेरे काले रंगो का अईस्तमाल करता है.
- 10:18–10:20यहां व्यंग, वो गेरा रंग है,
- 10:20–10:23रग है और काम का उट्सव वू रोशनी है
- 10:23–10:25दिलचस्त
- 10:25–10:29मैं ये बिलकुल नहीं मानता कि लेखक का मुख्य उद्टेशे
- 10:29–10:32केवल समाज सुदारक बनकर वेंगे करना था
- 10:32–10:35इसके पीचे एक बहुती गेरा डारषनिक विचार है
- 10:35–10:38लेखक ये स्तापित कर रहा है काम
- 10:38–10:41और मान्विय इच्छाँ की शक्ती इतनी प्रच्चन्ध है,
- 10:41–10:44कि उसके आगे बड़े-बड़े द्रमशास्त्र,
- 10:44–10:47वेराग्य के उब देश और ग्यान का हंकार,
- 10:47–10:48सब भुटने टिक देते हैं.
- 10:48–10:50तो आपकी कहने कारत है के,
- 10:50–10:52दर्मगुरुओ का ये दोगला पन,
- 10:52–10:58महज एक एक तूल है, ये सावित करने के लिए की वासना सबसे ताकतवर है?
- 10:58–10:59वासना नहीं काम.
- 10:59–11:04और काम में वासना, प्रेम, सुन्दर ये सब सामिल है.
- 11:04–11:07इस सामगरी का सबसे क्रानतिकारी हिस्सा वो है,
- 11:07–11:11ज़ाह यह यह सीदे तोर पर स्वर्ग के सुक के तुन्ना प्रिथवी के सुक से करती है
- 11:11–11:13स्वर्ग के तुन्ना?
- 11:13–11:17आप देखे स्वर्ग को हमेशा अंतिम लक्ष माना जाता है
- 11:17–11:21लेकेन ये पार्ट स्वर्ग को कितना उबाओ और रूडी वादी बताता है
- 11:21–11:25लेखा केता है कि स्वर्ग में अपसराए, अपनी मरजी से नहीं,
- 11:25–11:28बलकि देवताओ के शाप के दर से नाचती है.
- 11:28–11:31और वहां के पेरो के पते सोने के हैं.
- 11:31–11:33आप सोने के पेरो वाला वरनें.
- 11:33–11:37अप सोच ये, अगर पते अर फूल सोने के हैं,
- 11:37–11:41तो उन में आस्ली फूलों की कोमलता और सुगन्त कहा से आएगी?
- 11:41–11:45वहां कोई मान मनावल नहीं, कोई रूथना मनाना नहीं?
- 11:45–11:47वो सोने के पेरो वाली बात.
- 11:47–11:49पाट्स पर्ष्ट्रूब से कहता है,
- 11:49–11:52कि जिस स्वर्ग में किसी बात पर एर्षा नहीं होती,
- 11:52–12:22तो बगादा था नहीं तो बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा �
- 12:22–12:27सोने के पेडो बाड असल में परफेक्ष्टन की कमी को ही असली खुबसुरती मानती है.
- 12:27–12:29येक एक शान्दार तर्ख है.
- 12:29–12:30बलकोल.
- 12:30–12:36लेकित अगर ये प्रेम और मानबिये बावनाउं का इतना ही पवित्रा और गेरा उट्सव है.
- 12:36–12:41तो चल ये इस पूरी विवस्ता को चलाने वाले मुख्धिसूत्रदार पनिजर डालते हैं
- 12:41–12:43मैं बात कर रही हूँ विट की
- 12:43–12:44आज विट
- 12:44–12:48रहार भाड का मुख्धिपात्र और मद्धिस्त विट ही होता है
- 12:48–12:51अगर ये सुंदरे शास्तर का उच्सव है
- 12:51–12:55तो विट्ट का चरित्र तना जोड तोड करने वाला इतना चालाक क्यो है?
- 12:56–12:59विट्ट के वल एक चालाक मद्धस्त कहना,
- 12:59–13:02मुझे लकता है उसके चरित्र के साथ बहुत बड़ा नयाय होगा.
- 13:02–13:06जो श्रोता नहीं जानते, उने बतादू कि विट आम तोर पर एक नागरक,
- 13:06–13:10या उपने नहीं बद्वाग, या नहीं बद्वाग, या वो बड़ालिखा तो है.
- 13:10–13:13वह स्त्री मनोविग्यान का एक असादारन पारकी है.
- 13:13–13:17वह कोई दलाल नहीं है, वह मान्विए भावनाउ का विद्ध्यार थी है.
- 13:17–13:19वह वह पडालिखा तो है?
- 13:19–13:21वह वह स्त्री मनो विग्यान का एक असादारन पारकी है
- 13:21–13:23वह कोई दलाल नहीं है
- 13:23–13:25वह मानविए भावनाउ का विद्ड्यार थी है
- 13:25–13:27दूर्त विट सन्वादव में
- 13:27–13:29जब ये सवाल उट्ता है
- 13:29–13:31कि रूथी हूई स्फ्री को कैसे मनाया जाए
- 13:31–13:32वद्ट का विष्लेशन सूनीए
- 13:32–13:33या क्या खटा है वो?
- 13:33–13:38वा खटा है कि केवल पेरो में गिर जाना कोई शूर वीरता नहीं है
- 13:38–13:44वद्टर्क देता है कि बूडे और कुरुब ब्रामनो के खुडवृरे पेर भी तो रोज चूए जाते हैं
- 13:44–13:48तो फ़रे कोमल सुन्दर स्त्री के पैर चूने में क्या खास बात रहे गयी?
- 13:48–13:51देखे, वो बात को गूमाने में माहिर है.
- 13:51–13:53वो महेंस बात नहीं गूमा रहा,
- 13:53–13:58वो बतारहा है कि रूप या शारीरिक सुन्दरता से कही अदिक महत्वोपोण है,
- 13:58–14:09अनुकुलता, या दाक्शिन, मतलब ग्रेज, वह बताता है कि यसी स्त्री को हास्से से, परोपकार से, या कभी कभी बल्पुर्वक चुम्बन से कैसे मनाया जाता है.
- 14:09–14:15वह चार प्रकार के सुरत, यानी मिलन का विस्तार से मनोवैग्यानिक विष्लेशन करता है.
- 14:15–14:18क्रोद शान्त होने के बाद का मिलन, पहली मुलकाद का मिलन,
- 14:19–14:23प्रेमी के परदेश जाते समय का मिलन, और और लोटकर आने पर मिलन,
- 14:23–14:28और वह निषकर्ष निकालता है, कि रूथने मनाने के बाद का जो मिलन होता है,
- 14:28–14:29वो सब से उतक्रिष्ट है.
- 14:29–14:31ये कुई चला की नहीं है?
- 14:31–14:32तो फिर ये क्या है?
- 14:32–14:34यह एक आजे विक्ती की आवाज है,
- 14:34–14:38जो जानता है की प्रेम केवल बहावनाव का अंदाजवार नहीं है,
- 14:38–14:41बलकी एक नाजुक कला है, जिसे सहेजना परता है.
- 14:41–14:44आपकी बाद सुनने में बहुत अची लकती है.
- 14:44–14:52लेकिन विट की ये तथा कतिट समज और मनोविट यान वास्तव में एक बेहत चतृर व्यापारी के रननीती है.
- 14:52–14:56वो मनोविट यान का विद्यारती नहीं है, वो बावनाउ का ब्रोकर है.
- 14:56–14:58ये बहुत सकत शबद है.
- 14:58–15:03लेकिन सच हैं? आप उसके उन उबदेशों को क्यों बहुल जाते हैं?
- 15:03–15:06जागा वो खुले तोर पर बेववापाई के तरीके सिखाता हैं?
- 15:06–15:10उसी सामगरी में विट अपने एक मित्र को सला देता हैं,
- 15:10–15:13कि अगर कोई नहीं और यूवा प्रेमिका जीवन में आजाए,
- 15:13–15:16तो पुरानी प्रेमिका से कैसे पिच़ा च़़ायाई?
- 15:16–15:20वो सिक्ठा आता है कि दोनों को एक साथ कैसे दोके में रखा जा सकता है?
- 15:20–15:22क्या ये प्रेम की कला है?
- 15:22–15:25दिक्ये ये ततकालीन समाच का यधारत है.
- 15:25–15:28ये एक भेहद निन्दक और सिनिकल द्रिष्टिकोन है.
- 15:28–15:30विट का एक मशुर समवाद है,
- 15:30–15:33जवा वो केता है कि कारन से उपन्प्रेम,
- 15:33–15:35कारन से ही कतम हो जाता है,
- 15:35–15:38और आकारन प्रेम आकारन ही कतम हो सकता है.
- 15:39–15:43क्या आप को लकता है के ये कोई महान दार्षनिक बोल रहा है?
- 15:43–15:48नहीं, ये प्रेम को एक शत्रन्ज के खेल की देकता है,
- 15:48–15:51जहां भावना है, केवल महरे है.
- 15:51–15:53विट इस बात को भली बहाती जानता है,
- 15:53–15:56के इस वेश्या बाजार में कोन बिक रहा है,
- 15:56–15:58और कोन खरीद रहा है.
- 15:58–16:02वो बस इस पाकहन्डी दुन्या का सबसे चतृर खिलाडी है
- 16:02–16:04आप उसे संदर्गे का पार्खी के रहे हैं
- 16:04–16:09जबके असल में वो उन कम्जोरियों का फप्डा उठाने वाला मास्टमाइन्द है
- 16:09–16:11वं...
- 16:11–16:13क्या एक चतृर खिलाडी होना
- 16:13–16:16और मनोविग्यान को गेराई से समजना,
- 16:16–16:19क्या ये दोनो बाते एक साथ मोजुद नहीं हो सकती?
- 16:19–16:21वेट यतार्थवादी है,
- 16:21–16:22वो कोई संथ नहीं है.
- 16:22–16:24भिलकुल, संथ तो वो कते है.
- 16:24–16:28वो जनता है के ये समाज ये बाजार कैसे काम करता है.
- 16:28–16:35लेकिन उसका ये यत्हार्थ वाद उसका व्यात्मक्ता को कम नहीं करता जो अपने समवादो मेलाता है.
- 16:35–16:43जवो वर्षर्थु का वरनन करता है और काले मन्डराते बादलों की तुलना एक विरहिनी नाइका के मन की उडासी से करता है,
- 16:43–16:47तो उसके शब्द किसी महान कवी के शब्डो से कम नहीं होते.
- 16:47–16:52ये एक अईसा समाज है, जो अपनी खामियो को जानता है,
- 16:52–16:56जो राम सेना के लालच और विशनुनाग की मुर्खता को पहचानता है,
- 16:56–17:01लेकिन फिर भी अपनी एंद्रियों और कला का जच्न मनाना चुनता है.
- 17:13–17:15मैं दखने की कोशिष नहीं कर रहा हो.
- 17:16–17:19अगर मुजे अपनी पूरी दलील को एक जगा समेटना हो,
- 17:19–17:22तो मैं यही कहुंगी की यह विमर्ष श्पष्ट करता है,
- 17:22–17:25की यह प्राचीन संसक्रिद भाँन केवल श्रिंगार,
- 17:25–17:27काम यह सुंदरे शास्तर के गरन्त नहीं है.
- 17:27–17:31ये एक आईसे समाज का कतू और कडवा यतारत हैं
- 17:31–17:38जहां लालच, पाकहन्ट और शाररेक आकर्षन ने नैतिक्ता को पूरी तरहा से हाँश्ये पर दھकेल दिया है.
- 17:38–17:42अपनी ही भेत्यों का सवदा करने वाली लाल्ची माताएं
- 17:42–17:54दर्म का लबादा ओडे वासना के शिकार पाखन्दी भिख्षू और और प्रेम का नाटक करने वाले चालाक मद्ध्यस ये सब ततकालीन समाच के दोहरे माप्दन्नो का एक अत्यन्प्रामानिक वियंग है.
- 17:54–18:01इसी केवल काम का उट्सव मान लिना इस साहिट्ते की सबसे सहसेक और विद्रो ही अवाज को दबादेने जैसा होगा.
- 18:01–18:04ये साहिट्ते उस समाज को आईना दिखारा है.
- 18:04–18:09देखिए आप जो आईना दिख रही हैं वो निष्चित रूभ से वहा मोईजुद है.
- 18:09–18:12आपके तर्कोने उस यतार्त को बहुत मस्बूती से सामने रखा है.
- 18:13–18:15लेकिन अगर मैं आपने दिष्टिकोन को संख्षेप में रखूं,
- 18:16–18:18तो मेरा अभी यही मानना है कि,
- 18:18–18:20ये सामगरी मुख्धे मानव जीवन के,
- 18:20–18:23सबसे जतिल और और रंगीन पहलू,
- 18:23–18:28यानी काम और श्रिंगार का एक अत्यंत सुख्श्म दस्तावेज है
- 18:28–18:31राई राई और दोनो के नजर्ये स्पष्ट्रूब से अलग है
- 18:31–18:34बिल्कुल ये केवल एक व्यंगय नहीं है
- 18:34–18:37व्यंगय तो केवल वो गेरा रंग है
- 18:37–18:39जो मुख्य चित्र को उबारता है
- 18:39–18:43अस्ली चित्र उस युग्की कलात्मक परिपक्कुता का है
- 18:43–18:45जो मानविये इच्छाओ को दबाने
- 18:45–18:49या या उने पाप के हैकर खारिज करने के बजाए
- 18:49–18:51उने समजता है उनका विष्लेशान करता है
- 18:51–18:54और उने एक दार्षनिक उचाई देता है
- 18:54–18:57ये समाज की खामियो को नकारता नहीं है,
- 18:57–19:00बलकी उन खामियो के भीच भी मानविये सुन्दर्ये,
- 19:00–19:03प्रेम और कला की समबावनावो को तलाजता है.
- 19:03–19:07ख़र, शायद यतारत्वाद और आदर स्वाद की बहिस
- 19:07–19:09कभी पुरी तरह से खट्म नहीं हो सकती.
- 19:09–19:14विंग्या और उद्साव दोनो के ही इतने पुख्ता प्रमाण एं गरन्तो में मोजुद है,
- 19:14–19:18की ये मतलब पाटख पर निरभर करता है की वो क्या देखना चाहता है?
- 19:18–19:21बिलकुल. और विमर्ष के खुबसुरती यही है,
- 19:21–19:25कि हमे यहां किसी एक पक्ष को विजेता गोषित करने की आवश्शकता नहीं है.
- 19:25–19:29बोदिक असहमती हमारी समच को सीमित नहीं करती,
- 19:29–19:31बलकि उसे और दहारदार बनाती है.
- 19:31–19:32एक दम सही कहा.
- 19:32–19:36हम अपने श्रोताओ के विचारार आरत ये निशकर्ष छोडते है,
- 19:36–20:06कि अपने अपने बद्वाग़ी बद्वाग़ी बद्वाग़ी आपने आपने आपने आपने आपने आपने आपने आपने आपने आपने आपने आपने आपने आपने आपने आपने आपने आपने आपने आपने आपने आपने आपने आपने आपने आपने आपने आपने आ
- 20:06–20:11संस्क्रित साहित्ते के उस बभवे, शान्त और आद्यात्मिक मंदर के दर्षन करने जाएं,
- 20:11–20:17तो याद रख्येगा अस्ली कहानिया, अस्ली इन्सान और अस्ली जीवन की दधकन,
- 20:17–20:21शाएद उस मंदर के पीछे वाले उस्छोर, शराभे वाले बाजार मेही बसती है?
- 20:21–20:23अब आपका है
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वल्क्म तो देबेट जरा एक दिष्षी की कलपना कीजीए एक बहत कतर ब्रम्हन है एक अँसा इनसान जो खुद को इतना पवित्र मानता है कि सरक पर चलते हुए, मतलब आम लोगों से चुवा चुथ के दर से बच्टा फिरता है आ, बिल्कुल तभी रब ब्राम्वन कब्राया है, पसीने से तर बतर है, और और मनु या वशिष्ट जैसे महान रिष्यों के दर्मशास्तरों के पन्ने पलड़त रहा है. और मजदार बात येना कि वो पागलों कि तरा ये दूँड़ा है, तो के दर्मशास्त्रों के पन्ने पलट रहा है वुुुुुुुुुुुु और मजदार बात यहना कि वो पागलों कि तरा यह दूँड़ा है कि वेश्या की लाथ खाने के इस महापाप का प्रैश्षी ताखिर क्या है सही कहा अर सब से बड़ी विडवना यह है कि दरमशास्तरो में देखे है, हर चीस का नियम है, लेकेन इस अजीबो गरीब गधना का कोई जिकर ही नहीं है, अप शुरतान को लक सकता है कि यह एक आजका स्टन्डब कोमटी शो है. आप भी बज़ादिया के बाद तादितकम नाम के लिए नाटक से लिया गया है. तो जब हम प्राचीन संसक्रित साहित्ते के बारे में सुचते है, तो हमारे मन में अकसर एक बहुत लिए आद्यात में, शान्त और मतलब विववस्तिद दून्या की चवी उबरती है. जिसे बाश़ कहा जाता है, वहा उस शान्त मनदर के तीक पीचे स्तित एक शोर शराभे वाले रंगीन और सान्सालिग भाजार की कहानी है. जो श्रूता एस विद्धा से परचित नहीं है, उनके बतादों की बाश़ एक प्रकार का एक अलाप या वन मैंचो होता है. यानी मंच्पर किवल एक ही अभी निता होता है बिलकुल वो पूरे शहर से खासकर वेश्याँ के मुहली से गुजरता है हवामे कालपनिक लोगों से बाते करता है उनके जबाब दोर आता है और और दर्षकों को उस समय के समाज के सब से अंतरंग हिस्तों में लेजाता है. मैं आज इसी विमष्क का नित्रत्व करूंगा और मेरा मानना है, कि ये रचना है, मानविय इच्ठावों का एक परिष्क्रत उट्सव है. और मैं आजके इस विमष्क में, तुसरे पहलु को सामने रखूंगी. मेरा मानना है, कि ये रचना है असल में समाज के पाकशनद पर एक बहुत्ही गेरा अर तीखा व्यंगय है. तो यही से आजके हमारे विमर्ष्का मुक्छे सवाल जन मिलेता है. आज हम गुब्त काल के असपास रची गय चार प्रमुक भाँन रचनाउ, जिने सामुहिक रूप से चत्रबानी कहाजाता है, उनके इर्द गिड़ अपनी चर्चा रखेंगे. आआ, उवो चार प्रमुख रच्नाये. जी, और सवाल ये है, क्या ये शास्तरिय पात मुख्य रूप से मानविय सान्दर्ये? काम, मतलब इच्छा, और प्रेम, और एक परिष्क्रिज जीवन शहली का महिममन दन करते हैं? या फिर क्या ये उस समयके समाज के पाक्च्ण, लालग्च और खोक्ले नैटिक आदर्षों पर किया गया एक बहुत इख्चा विंगे है? देके मेरी दलील ये है कि ये पात मानविय मनोविग यान और संदरे शास्तर के अद्दिनत परष्क्रित दस्टबेज है. ये उस युक्की कलात्मक परिपक्वता को दरषाते है, जिसने मानव जीवन के सबसे रंगीन पहलु, बद्दिक और दार्ष्निक उचाई दी अच्छा दार्ष्निक उचाई बलकुल ये साहिद ते इच्छाँ को दबाने के बजाई, मलगप उने समच्छता है और उच्छल मनाता है आप जीसे कलात्मक परिपक्वता कह रहे है ना, मैं उसे एक बिल्कुल अलक चष्मे से देकती हूँ मिरा मानना है के इन रच्नाउ के किंद्र में एक बहुत्थी क्रूर और और ट्रन्ज्श्शनल र्यालिति है मथलब लें देन पर्टिका याठार्थ मोझुद है क्रूर याठार्थ हां, बिल्कुल ये कोई आदर्श्वादी दुन्या नहीं है, ये समाज के दुगलेपन, स्वार्ती रिष्तों और उन सत्तादादारी वर्गों का पर्दा बाश है, जो जो दिन में तो द्ध्र्म का उब्देष देते हैं, लेकिन रात में वास्ना के गुलाम बन जाते हैं. देखे आप इसे क्रूर वास्त्विक्ता कहरे हैं लेकिन अगर अगर अप इन गरन्तों की गेराई में उत्रें तो हमें वहां काम और श्रिंगार रस्का एक बहुती गेरा मनोवेग्यानिक विष्लिषन मिलता है ये रच्नाए तुब आप देख या शारिरिक लाल्सा तक सीमित नहीं हैं तुफिर और क्या है न में आप देख ही खी लेकह कोने मान्वी अबहावनाव को प्रक्रिती के साथ कैसे पिरोया है जब वसन त्रितु का उलास दिखाया जाता है तो वो के ल खेल मोसम कब बडलना नहीं होता वो मन के भीतर पनप्रही इच्छाँ का आईना बन जाता है एन रचनाव में गनिकाँ यानी वेश्वाँ का जो वरनन है उनके मुस्कृराने का तरीका उनकी तिर्ची नजरें उनके आबूशनो का इतनी बारी की से क्या गया चित्रन ये सब बताता है कि उस समाज में सून्दर्या को कितनी गंविर्ता से लिया जाता ता ये एक आईसे समाज का चित्रन है, जास्सुक भोगना कोई अप्राद नहीं, बलकी एक कला थी ख़ेर आप आप ने गनिकाओ की मुस्कान और आबुशनों की बात की ये सुन्ने में मतलब बहुत काव्यात्मक लकता है लेकिन उस मुस्कान के पिछे की आस्ली वजा क्या है इस तताख कतित सुंदर्या शास्तर की नीव इक बहुत ही निंदनिया और व्यवारिग जमीं पटिकी है बो कैसे? आप उबहयाब ही सारिका में राम सेना नाम की वेश्या माता के चरित्र को ही ले ले लिगे उसका लालग इतने नंगे रूप में सामने आता है कि आप आप आप उसे किसी कलात्मक आवरन में नहीं चिपा सकते. लिकिन वो तो... एक मिनेट, सामगरी सपष्ट रूप से दिखाती है, कि कैसे ये माताये अपनी ही पुत्रियों को, उन प्रेमियों से बेरहमी से दूर कर देती हैं, जिन के पास आप पैसा नहीं बचा है और उने नेए आमीर ग्राहाकों को सुवप देती है यहां कोई आदर्श्वादी प्रेम नहीं है देखे, हर भावना, हर आज, और हर उस तिर्ची नजर की एक कीमत तै है मैं आप की बाद समझ रहा हूं अद्तमा वेश्या काभी तो विस्तार से वरनन है उत्मा वो है जो किसी दानी गुडमाश नाद्ग रादाग तो वेश्या लागा वेश्या तो विस्तार से वरनन है उत्मा वो है जो किसी दानी गुडमाश नादाग तो उत्मा वेश्या काभी तो विस्तार से वरनन है उत्मा वो है जो किसी दानी, गूडमान और यूवा पूर्षे सच्चा प्रेम करती है सच्चा प्रेम उस भाजार में यलकुल पाट में सच्ची प्रेमिका के लाएट्ची माता है केवल दन के लिए प्रेम का नाटक करती है. लेके वही उत्मा वेश्या का भी तो विस्तार से वरनन है. उत्मा वो है जो किसी दानी, गुणमान और यूवापुर्ष से सच्चा प्रेम करती है. सच्चा प्रेम उस भाजार में. बलकल. पाट में सच्ची प्रेमिका के लक्षन बहुत गेराई से बताएगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगग� वियोग का कावियात्मक वरनन जरूर है, लेकिन उसी सास में लेक्ख हमें चेतावनी भी तो देता है. कैसी चेतावनी? सामगरी में साव साव कहा गया है, कि कामुक व्यकती के लिए वेश्याई एक बडवानल की तर है. बडवानल समझ रहे ना? आँ समुदर के भीटर की आग इक दम वो आग जो सब कुछ निगल जाती है और वापस कुछ नहीं देती पाट कैता है कि वेश्याँ का हिरदे कभी विष्वसन यह नहीं होता और तो और इस पूरी विवस्ता में शथता, यानी दूरतता और दोखे बाजी दन कदम हुने पर जिस तरा लोगों को बाहर कर आस्ता दिखाया जाता है, वो यस बात का सबूथ है, कि ये ये सच्चा अनुराग अकसर इग ब्रहम है. एक इल्जिन है, जिसे बहुत चालाकी से बेचा जारा है. अब जिसे पुरी तरसे शोषन और दिखावा मान रही है, मैं उसे उस समाज का नगन यतारत मानता हूँ, जहां काम सर्वो परी शकती है. और यही से हमारी चर्चा उस दिशा में मुड़ी है जहां तत्कालीन समाज के दार्मेक और सत्तादारी वर्गो का चित्रन की आगे है आव वो बहुत जोरी हिस्सा है शाए दिये पैसा और प्यार का खेल आप को इसली द्ना कथोर लग रहा है कुकि आप इसे, मतलब आजकी नटिक्ता से ताल रही हैं. उस समय के समाज में काम को जो सर्वोच चस्थान प्रापते ता, वो दारमेक कर्मकान्डो से भी उपर ता. देखिए, अगर काम सर्वोच ता, तो फिर इं गरन्तो में दार्मेक और विद्वान लोगों का इतना बहयंकर मजाक क्यो उडाया गया है? मेरी राय में ये मजाक ही इस सामगरी के वेंज्यात्मक होने का सब से बड़ा प्रमाड है. आचा तो आप इसे सिझ चिफ मजाक मानती है? बलकुल, मेरा मतलव है पद्मप्राबद्कम में एक बोद्धबिखषू है. संगेलक, वो खुत को बुद्धध कानुयाई कहता है, लोगो को पन्चषील के उबदेज देता है, वेश्याँ की गली से चिपकर अपना गेरूवा वस्ट्र समेटेवे निकल रहा है किँकी वो वासना में पुरी तरे लिपत है आँ वो प्रसंग है इसी तर है एक वेश्नव है, पवित्रक वो राजपत पर चलते हुए चूए चूए चूए त का नाटक करता है लोगो से कहता है, मुझ से दूर रहो, मैं अपवित रहो जाूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ� बवद्दिख और दार्मिक दाचे का खुला उबहास है, कोई-कृई श्रिंगार का उद्सव नहीं. रहीं, ये सारे उदारन् बिलकुल सतीख है, और पाट में मोजुद है, मैं से इंकार नहीं कर रहा. बिखशुवाँ ब्रामवनो और विद्वानो का ये पाखन्ड वास्तो में रास्से पैदा करता है. लेकिन लेकिन जरा एक चित्रकार के बारे में सोचीए. चित्रकार? यहां चित्रकार कहां से आगया? दिक्ये, जब एक चित्रकार किसी विषाल कानवस पर, किसी विषेश हिस्से पर तेज रोषनी दिखाना चाता है. तो वो क्या करता है? वो उस रोषनी के तीक पीछे गेरे काले रंगो का अईस्तमाल करता है. यहां व्यंग, वो गेरा रंग है, रग है और काम का उट्सव वू रोशनी है दिलचस्त मैं ये बिलकुल नहीं मानता कि लेखक का मुख्य उद्टेशे केवल समाज सुदारक बनकर वेंगे करना था इसके पीचे एक बहुती गेरा डारषनिक विचार है लेखक ये स्तापित कर रहा है काम और मान्विय इच्छाँ की शक्ती इतनी प्रच्चन्ध है, कि उसके आगे बड़े-बड़े द्रमशास्त्र, वेराग्य के उब देश और ग्यान का हंकार, सब भुटने टिक देते हैं. तो आपकी कहने कारत है के, दर्मगुरुओ का ये दोगला पन, महज एक एक तूल है, ये सावित करने के लिए की वासना सबसे ताकतवर है? वासना नहीं काम. और काम में वासना, प्रेम, सुन्दर ये सब सामिल है. इस सामगरी का सबसे क्रानतिकारी हिस्सा वो है, ज़ाह यह यह सीदे तोर पर स्वर्ग के सुक के तुन्ना प्रिथवी के सुक से करती है स्वर्ग के तुन्ना? आप देखे स्वर्ग को हमेशा अंतिम लक्ष माना जाता है लेकेन ये पार्ट स्वर्ग को कितना उबाओ और रूडी वादी बताता है लेखा केता है कि स्वर्ग में अपसराए, अपनी मरजी से नहीं, बलकि देवताओ के शाप के दर से नाचती है. और वहां के पेरो के पते सोने के हैं. आप सोने के पेरो वाला वरनें. अप सोच ये, अगर पते अर फूल सोने के हैं, तो उन में आस्ली फूलों की कोमलता और सुगन्त कहा से आएगी? वहां कोई मान मनावल नहीं, कोई रूथना मनाना नहीं? वो सोने के पेरो वाली बात. पाट्स पर्ष्ट्रूब से कहता है, कि जिस स्वर्ग में किसी बात पर एर्षा नहीं होती, तो बगादा था नहीं तो बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा � सोने के पेडो बाड असल में परफेक्ष्टन की कमी को ही असली खुबसुरती मानती है. येक एक शान्दार तर्ख है. बलकोल. लेकित अगर ये प्रेम और मानबिये बावनाउं का इतना ही पवित्रा और गेरा उट्सव है. तो चल ये इस पूरी विवस्ता को चलाने वाले मुख्धिसूत्रदार पनिजर डालते हैं मैं बात कर रही हूँ विट की आज विट रहार भाड का मुख्धिपात्र और मद्धिस्त विट ही होता है अगर ये सुंदरे शास्तर का उच्सव है तो विट्ट का चरित्र तना जोड तोड करने वाला इतना चालाक क्यो है? विट्ट के वल एक चालाक मद्धस्त कहना, मुझे लकता है उसके चरित्र के साथ बहुत बड़ा नयाय होगा. जो श्रोता नहीं जानते, उने बतादू कि विट आम तोर पर एक नागरक, या उपने नहीं बद्वाग, या नहीं बद्वाग, या वो बड़ालिखा तो है. वह स्त्री मनोविग्यान का एक असादारन पारकी है. वह कोई दलाल नहीं है, वह मान्विए भावनाउ का विद्ध्यार थी है. वह वह पडालिखा तो है? वह वह स्त्री मनो विग्यान का एक असादारन पारकी है वह कोई दलाल नहीं है वह मानविए भावनाउ का विद्ड्यार थी है दूर्त विट सन्वादव में जब ये सवाल उट्ता है कि रूथी हूई स्फ्री को कैसे मनाया जाए वद्ट का विष्लेशन सूनीए या क्या खटा है वो? वा खटा है कि केवल पेरो में गिर जाना कोई शूर वीरता नहीं है वद्टर्क देता है कि बूडे और कुरुब ब्रामनो के खुडवृरे पेर भी तो रोज चूए जाते हैं तो फ़रे कोमल सुन्दर स्त्री के पैर चूने में क्या खास बात रहे गयी? देखे, वो बात को गूमाने में माहिर है. वो महेंस बात नहीं गूमा रहा, वो बतारहा है कि रूप या शारीरिक सुन्दरता से कही अदिक महत्वोपोण है, अनुकुलता, या दाक्शिन, मतलब ग्रेज, वह बताता है कि यसी स्त्री को हास्से से, परोपकार से, या कभी कभी बल्पुर्वक चुम्बन से कैसे मनाया जाता है. वह चार प्रकार के सुरत, यानी मिलन का विस्तार से मनोवैग्यानिक विष्लेशन करता है. क्रोद शान्त होने के बाद का मिलन, पहली मुलकाद का मिलन, प्रेमी के परदेश जाते समय का मिलन, और और लोटकर आने पर मिलन, और वह निषकर्ष निकालता है, कि रूथने मनाने के बाद का जो मिलन होता है, वो सब से उतक्रिष्ट है. ये कुई चला की नहीं है? तो फिर ये क्या है? यह एक आजे विक्ती की आवाज है, जो जानता है की प्रेम केवल बहावनाव का अंदाजवार नहीं है, बलकी एक नाजुक कला है, जिसे सहेजना परता है. आपकी बाद सुनने में बहुत अची लकती है. लेकिन विट की ये तथा कतिट समज और मनोविट यान वास्तव में एक बेहत चतृर व्यापारी के रननीती है. वो मनोविट यान का विद्यारती नहीं है, वो बावनाउ का ब्रोकर है. ये बहुत सकत शबद है. लेकिन सच हैं? आप उसके उन उबदेशों को क्यों बहुल जाते हैं? जागा वो खुले तोर पर बेववापाई के तरीके सिखाता हैं? उसी सामगरी में विट अपने एक मित्र को सला देता हैं, कि अगर कोई नहीं और यूवा प्रेमिका जीवन में आजाए, तो पुरानी प्रेमिका से कैसे पिच़ा च़़ायाई? वो सिक्ठा आता है कि दोनों को एक साथ कैसे दोके में रखा जा सकता है? क्या ये प्रेम की कला है? दिक्ये ये ततकालीन समाच का यधारत है. ये एक भेहद निन्दक और सिनिकल द्रिष्टिकोन है. विट का एक मशुर समवाद है, जवा वो केता है कि कारन से उपन्प्रेम, कारन से ही कतम हो जाता है, और आकारन प्रेम आकारन ही कतम हो सकता है. क्या आप को लकता है के ये कोई महान दार्षनिक बोल रहा है? नहीं, ये प्रेम को एक शत्रन्ज के खेल की देकता है, जहां भावना है, केवल महरे है. विट इस बात को भली बहाती जानता है, के इस वेश्या बाजार में कोन बिक रहा है, और कोन खरीद रहा है. वो बस इस पाकहन्डी दुन्या का सबसे चतृर खिलाडी है आप उसे संदर्गे का पार्खी के रहे हैं जबके असल में वो उन कम्जोरियों का फप्डा उठाने वाला मास्टमाइन्द है वं... क्या एक चतृर खिलाडी होना और मनोविग्यान को गेराई से समजना, क्या ये दोनो बाते एक साथ मोजुद नहीं हो सकती? वेट यतार्थवादी है, वो कोई संथ नहीं है. भिलकुल, संथ तो वो कते है. वो जनता है के ये समाज ये बाजार कैसे काम करता है. लेकिन उसका ये यत्हार्थ वाद उसका व्यात्मक्ता को कम नहीं करता जो अपने समवादो मेलाता है. जवो वर्षर्थु का वरनन करता है और काले मन्डराते बादलों की तुलना एक विरहिनी नाइका के मन की उडासी से करता है, तो उसके शब्द किसी महान कवी के शब्डो से कम नहीं होते. ये एक अईसा समाज है, जो अपनी खामियो को जानता है, जो राम सेना के लालच और विशनुनाग की मुर्खता को पहचानता है, लेकिन फिर भी अपनी एंद्रियों और कला का जच्न मनाना चुनता है. मैं दखने की कोशिष नहीं कर रहा हो. अगर मुजे अपनी पूरी दलील को एक जगा समेटना हो, तो मैं यही कहुंगी की यह विमर्ष श्पष्ट करता है, की यह प्राचीन संसक्रिद भाँन केवल श्रिंगार, काम यह सुंदरे शास्तर के गरन्त नहीं है. ये एक आईसे समाज का कतू और कडवा यतारत हैं जहां लालच, पाकहन्ट और शाररेक आकर्षन ने नैतिक्ता को पूरी तरहा से हाँश्ये पर दھकेल दिया है. अपनी ही भेत्यों का सवदा करने वाली लाल्ची माताएं दर्म का लबादा ओडे वासना के शिकार पाखन्दी भिख्षू और और प्रेम का नाटक करने वाले चालाक मद्ध्यस ये सब ततकालीन समाच के दोहरे माप्दन्नो का एक अत्यन्प्रामानिक वियंग है. इसी केवल काम का उट्सव मान लिना इस साहिट्ते की सबसे सहसेक और विद्रो ही अवाज को दबादेने जैसा होगा. ये साहिट्ते उस समाज को आईना दिखारा है. देखिए आप जो आईना दिख रही हैं वो निष्चित रूभ से वहा मोईजुद है. आपके तर्कोने उस यतार्त को बहुत मस्बूती से सामने रखा है. लेकिन अगर मैं आपने दिष्टिकोन को संख्षेप में रखूं, तो मेरा अभी यही मानना है कि, ये सामगरी मुख्धे मानव जीवन के, सबसे जतिल और और रंगीन पहलू, यानी काम और श्रिंगार का एक अत्यंत सुख्श्म दस्तावेज है राई राई और दोनो के नजर्ये स्पष्ट्रूब से अलग है बिल्कुल ये केवल एक व्यंगय नहीं है व्यंगय तो केवल वो गेरा रंग है जो मुख्य चित्र को उबारता है अस्ली चित्र उस युग्की कलात्मक परिपक्कुता का है जो मानविये इच्छाओ को दबाने या या उने पाप के हैकर खारिज करने के बजाए उने समजता है उनका विष्लेशान करता है और उने एक दार्षनिक उचाई देता है ये समाज की खामियो को नकारता नहीं है, बलकी उन खामियो के भीच भी मानविये सुन्दर्ये, प्रेम और कला की समबावनावो को तलाजता है. ख़र, शायद यतारत्वाद और आदर स्वाद की बहिस कभी पुरी तरह से खट्म नहीं हो सकती. विंग्या और उद्साव दोनो के ही इतने पुख्ता प्रमाण एं गरन्तो में मोजुद है, की ये मतलब पाटख पर निरभर करता है की वो क्या देखना चाहता है? बिलकुल. और विमर्ष के खुबसुरती यही है, कि हमे यहां किसी एक पक्ष को विजेता गोषित करने की आवश्शकता नहीं है. बोदिक असहमती हमारी समच को सीमित नहीं करती, बलकि उसे और दहारदार बनाती है. एक दम सही कहा. हम अपने श्रोताओ के विचारार आरत ये निशकर्ष छोडते है, कि अपने अपने बद्वाग़ी बद्वाग़ी बद्वाग़ी आपने आपने आपने आपने आपने आपने आपने आपने आपने आपने आपने आपने आपने आपने आपने आपने आपने आपने आपने आपने आपने आपने आपने आपने आपने आपने आपने आपने आ संस्क्रित साहित्ते के उस बभवे, शान्त और आद्यात्मिक मंदर के दर्षन करने जाएं, तो याद रख्येगा अस्ली कहानिया, अस्ली इन्सान और अस्ली जीवन की दधकन, शाएद उस मंदर के पीछे वाले उस्छोर, शराभे वाले बाजार मेही बसती है? अब आपका है