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चतुर्भाणीक_मैथिली_अनुवाद_आ_तीक्ष्ण_व्यङ्ग्य.m4a
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- 0:00–0:04इई चतृर भानिक मैठली अनुवाद पर आहाक तवरित सारावन्ष फीजी.
- 0:04–0:10गजेंद्र ताकृर द्वारा संस्क्रिट से मैठली में अनुदित इचारीता प्राचीन नाटकक संग्र हा,
- 0:10–0:16आहा के प्राछीन भार्तिय समाजक रंगीन आप पाखश्ण विरोदी रुप से जद्ता परचित करादैई तची.
- 0:16–0:20पहल्गप यी सब नाटक भाण विदाक कची.
- 0:20–0:23आब आहा सोची थोएप जे यी भाँट की थिक.
- 0:23–0:26देखो एकर सीदा अर्ठ ची एक आलाप,
- 0:26–0:30जते पूरा नातक मे एक्के ता पात्र मंच्पर रहीता ची,
- 0:30–0:34आ उ एक्कले भिन भिन लोकक समवादक अबिने करी तची.
- 0:34–0:38की हमरा सब एकरा प्राचीन काल के च्टन्डब कोमेटी नहीं कही सकेची,
- 0:38–0:42जदे एक ता वेक्ती आपन गब्प से पुरा मह्फिल लूटी लेत अची.
- 0:42–0:46तो सर एही में चारी ता प्रमुक नातक अची,
- 0:46–0:50जे कर नाम जदे एक भारी अची, अर्थ उते बे रूचक अची.
- 0:50–0:54जेना शुद्रक रचित पद्म प्राभ्रितकम माने कमलक भेट,
- 0:54–1:00इश्वर्दद्तक दूर्त विट समवादध, माने दूर्त आद लालक बात विचार,
- 1:00–1:04वरु रुचीक उभ्याभिसारीका, वा परस्पर प्रेम पलायन,
- 1:04–1:07आश्या मिलक पाद तारीतकम, जिकर अर्थ छे लात.
- 1:07–1:11मुदा नाम से बेसी महतुपून अची एकर भीत्रक कता.
- 1:11–1:17अन्त में कताक गब करीता इचारू नातक ततकालीन पातली पुत्रजका नगरक जीवन,
- 1:17–1:21वेश्या, कामी जाना अद्दूर्ती लोकनिक जीवन पर केंद्रित अची.
- 1:21–1:29एही में समाजक पाखन्दी बूत भिक्षू, वयाक्रना आ आदमभरी पन्दित सबक प्रव्रित्ती पर ऑहिन तिख्षन व्यंगे आची,
- 1:29–1:32जे आहा सोचने पर विवष भोजाएब जे,
- 1:32–1:35की हाजारो वर्ष पहिल क मनुश्षक मूल प्रव्रुत्ती,
- 1:35–1:38आपाकहन्द, आएकालिक समाज साभ भिन्नचल,
- 1:38–1:39भिलकुले नहीं.
- 1:39–1:43संख्षेप में इच्टूर भानी प्राछीन भारतिय समाजक श्रिंगार,
- 1:43–1:47विंग ये आयातारत वादक एक ता एहन शान्दार दरपन चे
- 1:47–1:49जेकर चमक हाजारो वर्स के बादो
- 1:49–1:51तनी कु कम नहीं बहलत्खी
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इई चतृर भानिक मैठली अनुवाद पर आहाक तवरित सारावन्ष फीजी. गजेंद्र ताकृर द्वारा संस्क्रिट से मैठली में अनुदित इचारीता प्राचीन नाटकक संग्र हा, आहा के प्राछीन भार्तिय समाजक रंगीन आप पाखश्ण विरोदी रुप से जद्ता परचित करादैई तची. पहल्गप यी सब नाटक भाण विदाक कची. आब आहा सोची थोएप जे यी भाँट की थिक. देखो एकर सीदा अर्ठ ची एक आलाप, जते पूरा नातक मे एक्के ता पात्र मंच्पर रहीता ची, आ उ एक्कले भिन भिन लोकक समवादक अबिने करी तची. की हमरा सब एकरा प्राचीन काल के च्टन्डब कोमेटी नहीं कही सकेची, जदे एक ता वेक्ती आपन गब्प से पुरा मह्फिल लूटी लेत अची. तो सर एही में चारी ता प्रमुक नातक अची, जे कर नाम जदे एक भारी अची, अर्थ उते बे रूचक अची. जेना शुद्रक रचित पद्म प्राभ्रितकम माने कमलक भेट, इश्वर्दद्तक दूर्त विट समवादध, माने दूर्त आद लालक बात विचार, वरु रुचीक उभ्याभिसारीका, वा परस्पर प्रेम पलायन, आश्या मिलक पाद तारीतकम, जिकर अर्थ छे लात. मुदा नाम से बेसी महतुपून अची एकर भीत्रक कता. अन्त में कताक गब करीता इचारू नातक ततकालीन पातली पुत्रजका नगरक जीवन, वेश्या, कामी जाना अद्दूर्ती लोकनिक जीवन पर केंद्रित अची. एही में समाजक पाखन्दी बूत भिक्षू, वयाक्रना आ आदमभरी पन्दित सबक प्रव्रित्ती पर ऑहिन तिख्षन व्यंगे आची, जे आहा सोचने पर विवष भोजाएब जे, की हाजारो वर्ष पहिल क मनुश्षक मूल प्रव्रुत्ती, आपाकहन्द, आएकालिक समाज साभ भिन्नचल, भिलकुले नहीं. संख्षेप में इच्टूर भानी प्राछीन भारतिय समाजक श्रिंगार, विंग ये आयातारत वादक एक ता एहन शान्दार दरपन चे जेकर चमक हाजारो वर्स के बादो तनी कु कम नहीं बहलत्खी