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गोहि_सभक_बीच_जलसमाधि किशोर संस्करण.mp4
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- 0:00–0:08नमशकार, गजेंद्र ताकुर्क लिखल मैथिली किषोर साहित्य, गोई सबखबीच जल समादिः पर आई हम सब चर्चा करब.
- 0:08–0:11इखोनु सादारन कता बलकुल नहीं चे बुजलो.
- 0:11–0:19इगाम के गाज नदी अपुर्खाख स्म्रितिक संग आदूनिक व्यवस्थाख कतू सत्ते के बड नीगजगा सोजा इनेच्छी.
- 0:19–0:23तथी कचे आओ हम सब एही विशयक गेराई में प्रवेष करव,
- 0:23–0:29तब आव प्रवेश करव, जटै लोग संस्क्रती अ दिजिटल युग के अप्राद एक दोस्रा सांग तक्राईत ची.
- 0:29–0:33इचर्चा कोना आगा बरहत से पहले कनी बता देचे.
- 0:33–0:36हम सब पाच्ता मुख्छे बाग परगब करव.
- 0:36–0:38पहल गोहिक प्रतिका मैं अर्थ.
- 0:38–0:49अद्त, दो सर गर नारी के लग भूथ, तेसर व्यवस्ता, अस्म्रतिक संगर्ष, चारिम आदूनिक अप्रादख नव्रुप, आ अन्त में नामा के लेल संगर्ष.
- 0:49–0:57ता आव पहिल कहन्चा रंब करे ची, इगोई आखिर आइच की, एकर प्रतिकात्मक अर्थबुजनाई बडज़ूरी आईच्छु।
- 0:57–1:02कतो इभ्रम में नहीं रहाब, जे इताए गोई माने केवल नदिक कोनो जन्तू अची.
- 1:02–1:08इग्दम नाई, उपन्यास में इलालच, जूट, वेवस्ताक, दर आ आदूनिक शोषनक प्रतीक अची.
- 1:08–1:12सोचो, इगोही कक्नो जूट बनीका, कक्नो अन्याई बनीका,
- 1:12–1:16तकक्नो मुबायल के वितर चिपल, दिजिटल ठागी बनीका सोजा बैद अची.
- 1:16–1:19इं मुखे रूप से कमजोर लोकिन अपन शिकार बन वेद अची
- 1:19–1:23मैंने गो ही औशिकारी वेवस्ताची
- 1:23–1:25जे चारो दिस्पसरल अची
- 1:25–1:27अप्राद आब के वल पानी में नहें
- 1:27–1:29हम्रा सब के देनिक जीवनाक लिस्सा बन चुका लची
- 1:29–1:32आब दोसर कहन्द देश चले ची
- 1:32–1:35ग़नारिकेल गावक बूथ
- 1:35–1:38कता अब बद्द रोचक बजाएत छी
- 1:38–1:41अब एही ताम ज़ सव से रोचक बात अचे
- 1:41–1:44से ई जे ग़नारिकेल अख छन्ना गाची मे
- 1:44–1:47राद्टी के समय अकाल म्रित्यो से मरल लोकक अतमा
- 1:47–1:50बूथ, प्रेट, अराकश, कबवड़ी खेले तचे
- 1:50–1:54अबुडवा भूट ये निनायक के बूमि का मेच है थी.
- 1:54–1:56मुदै कोनो सादारन खेल नहीं आचे.
- 1:56–1:59इवो ही लोकल लिल एक ता अद्यात्मे कादालत आचे
- 1:59–2:01जकर अवास दबादिल गिल.
- 2:01–2:03जकन जीवित लोक नियाए नहीं डासके तचे
- 2:03–2:09तकन इं म्रित आत्मा सब चन्ना गाच्छिक नीचा कबद्टीक माध्यम सब आपन न्याई मागे तची.
- 2:09–2:14हलाची पन्दुभी आलोथ सा आत्मा एते आविका आपन अपन दुखख कता गहे तचे.
- 2:14–2:22पोथिक एक ता पांती दियान से सूनू, जी ए जीवद चुप रहे चे, उते भूट सब कबद्दी से मुकद्मा लडे चे.
- 2:22–2:25इपंक्तिता जिना पूरा उपन्यासक मर्म आची.
- 2:25–2:28जगन इदुन्या न्याई देबा मे विफल बहेजाई तची,
- 2:28–2:58अ अन्याए देक का लोक मों सादिलई तखफन लोक कता आई रह समए गाम स्म्रितिक अडालत बन जाई तखफन जाई खफनो मराइत नहीं अछी इलोक स्म्रिति में गाज पात अ गामक इ वदन्ति में जीवित रहे तखफन जाई तखफन जाई तखफन जाई तखफन जाई
- 2:58–3:28तक्राव. सुचका देखो. एक दिस दव्ट्रक कागच का गट्धर, लालपीता अस्सरकारी मुहर अची, जे बाड अ नयाय में दूबत लोक के अन्देखा कर हल अची. अदो सर दिस विशालकारी नयाय विवस्ताक बूल भूलया, जते सत्यकवाज चिपा जायतची. पोतिक
- 3:28–3:31सादारन लोग बस पाईलक नीचा दब कर एजाई तच्छे
- 3:31–3:35ता एक तप पएग कानुनी दर्षनजे पोटी रखे तच्छे
- 3:35–3:40से एच्छी जे एक देस नदीच जे दार से मेड काटे तच्छी
- 3:40–3:42और लोकक देज लिली जाई तच्छी
- 3:42–3:48तो सर्दिस इखागजी विवस्ताएच जे तारीक से गाम आ लोकक नाम काटेटची
- 3:48–3:54उपन्यास एक्दम स्पष्ट करे तची जे नदिक मार सभेसी खतरनाग कागजक मार अचे
- 3:54–4:01जगर म्रित्यो पर नाम नहीं दर्ज होई तची उ कागजी रूप से मात्रेक्ता तारीख बन करही जाई तची
- 4:01–4:08उकर अस्तित्वे खतम, तारीखक गोही उ गोही आची जे लोकक नाम अन्याए दूनूके खाजाई तची
- 4:08–4:12आप चारिम्क्हन्द आदूनिक अप्रादख चारी रूप
- 4:12–4:18इदेखव बद्ध जरूरी एचे जे आदूनिक समय में इगोहि कोना अपनन रूप बडलै टची
- 4:18–4:22इगोही आएकाली चाई नव रूप में सुजहा आबे टचे
- 4:22–4:26चन्रपाल बत्रा रागव संकेट चे का पात्रक माद्यम से कदा देखागे तचे
- 4:26–4:30जे कखनो इप पूलक मस्दूरक अद्रिष्यम्रित्य। बनजाई तचे
- 4:30–4:32जे तीन सो गोटिक मरल देख कोनो नाम नहीं.
- 4:32–4:34सब अद्रिष्य.
- 4:34–4:36कखनों महामारी में सासक व्यापार बने तचे,
- 4:36–4:40कखनों इ उज्वलजका यूवाखलेल जेब मेराखल सक्रीन के गोही,
- 4:40–4:44यानी मोबाल आप से होईवला दिजितर तगी बन जाई तचे,
- 4:44–4:47आप फुल मतीजका लोका के लिल, दे बाजारक ब्लाक मेल.
- 4:47–4:50इसब उही शिकारी वेवस्ताक �alag alag roopachhe,
- 4:50–4:53जे कमजोर लोक के निगली रहाल आचे.
- 4:53–4:57आब हम सब पन्चम और सब से महत्वपोण कहनपर आबाई ची,
- 4:57–4:59नामक रक्षाक लेल संगष,
- 4:59–5:01इग खताक चरम बिन्दू आची,
- 5:01–5:04जते लोक एह मिताएबक विरुद थाड होई ताछी.
- 5:05–5:09इगगबड सुन्दर जका दर्षावल गेल अच्छे गाँक लोक अपन पुर्खा
- 5:09–5:12और भिस्रादे लोक के कोना मों राखे तचे.
- 5:12–5:15इनाराखवा पोखर जल में चबाक दूनिक माध्द्यम सा,
- 5:15–5:19गाँक महिला सब आईन लिख्धानामक सन्रक्षन करेतची
- 5:19–5:22जगन सरकारी बही में नाम नहीं चडेतची
- 5:22–5:25तकन इलोक संस्क्रती उहींामक रक्षा करेतची
- 5:25–5:27पोती अस्पर्ष्ट करेतची
- 5:27–5:30जगन लोक अपन पुर्खाक नामक उचारन करेतची
- 5:30–5:34उक्रा मोहर और लाल पीता सोथ नहीं मेंता सके तच्ये,
- 5:34–5:38इस्म्रती कोनो भी कागस सब एसी सक्तीषाली होई तच्ये.
- 5:38–5:43कताक अलग-लक पात्र अपन अपन तरीका से एह विवस्तासा लडी रहल चतिं.
- 5:43–5:47गोप्कुमार, दिजिटल तगी आम्युल अकाउंट के निशान खोजगछ छतिन,
- 5:47–5:52इरा हवावत के मंच्सा निजिता अन नेटिक्ता पर सहसिक प्रष्न करए चतिन,
- 5:52–5:56जिनेटिक्ता के नाम पर भरहल पाकहन्के उजागर करए तचे.
- 5:56–6:01सत्ट्व्रत् महता, कानूनी वेवस्ताके वितर सच्व्चाप मुदा बड्मस्बुती सलडएक छतिन.
- 6:01–6:07आऔर, गामाक लोग गरनरी के लक चन्नागाची के पातक के माध्यम सा नाम के सुरक्षित करईता चे.
- 6:07–6:14इसबके संगर्षकर बस एकता उदिश्या चे नाम के मिट्वा सबचेनाय असत्ये के बचाई कराखव.
- 6:14–6:21ता अन्तिम अमहत्वपोण बात इए ची जे कारी नदीक उपर तेरे चंके इत नारी के लक्पातक जद्रिष्य आची,
- 6:21–6:25अगर खोई ब्रष्ट वेश्ट वेवस्था नहीं निगली सकते थाची
- 6:25–6:27कारी नदी रूपी ब्रष्ट चारग भीच
- 6:27–6:30इहर्यर चमकेट पात एक ता नव आशा अ अदम्य साहसक कता कहे थाची
- 6:30–6:32अ अन्त में जाएत-जाएत एक ता पैग प्रष्ष्न पर विचार करू
- 6:32–6:34जल पर वा गाजख पात पर लिखल जाइता ची
- 6:34–6:37उक्रा कोनो गोही वकोनो ब्रष्ट वेवस्टा नहीं निगली सकए तची
- 6:38–6:40कारी नदी रूपी ब्रष्टा चारग भीच
- 6:40–6:45इहर्यर चमके इत पात एक ता नव आशा आ अदम्यस साहसक कता कहे तची
- 6:45–7:15आ अन्त में जाएत-जाएत एक्ता पैक प्रष्न पर विचार करू आएके ए दिजितल थागी आ कतोर कागजी वेवस्ता के भीछ कक्कर ककर नाम मिताल जार हल अची आ अकर अस्मरिती जीवित राख्वा के जमदारी कक्कर अची गोही सबखक भीछ जल समादी केवल एकता उ�
- 7:15–7:17आज़ सब कब बहुत भहुत दश्वाद
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नमशकार, गजेंद्र ताकुर्क लिखल मैथिली किषोर साहित्य, गोई सबखबीच जल समादिः पर आई हम सब चर्चा करब. इखोनु सादारन कता बलकुल नहीं चे बुजलो. इगाम के गाज नदी अपुर्खाख स्म्रितिक संग आदूनिक व्यवस्थाख कतू सत्ते के बड नीगजगा सोजा इनेच्छी. तथी कचे आओ हम सब एही विशयक गेराई में प्रवेष करव, तब आव प्रवेश करव, जटै लोग संस्क्रती अ दिजिटल युग के अप्राद एक दोस्रा सांग तक्राईत ची. इचर्चा कोना आगा बरहत से पहले कनी बता देचे. हम सब पाच्ता मुख्छे बाग परगब करव. पहल गोहिक प्रतिका मैं अर्थ. अद्त, दो सर गर नारी के लग भूथ, तेसर व्यवस्ता, अस्म्रतिक संगर्ष, चारिम आदूनिक अप्रादख नव्रुप, आ अन्त में नामा के लेल संगर्ष. ता आव पहिल कहन्चा रंब करे ची, इगोई आखिर आइच की, एकर प्रतिकात्मक अर्थबुजनाई बडज़ूरी आईच्छु। कतो इभ्रम में नहीं रहाब, जे इताए गोई माने केवल नदिक कोनो जन्तू अची. इग्दम नाई, उपन्यास में इलालच, जूट, वेवस्ताक, दर आ आदूनिक शोषनक प्रतीक अची. सोचो, इगोही कक्नो जूट बनीका, कक्नो अन्याई बनीका, तकक्नो मुबायल के वितर चिपल, दिजिटल ठागी बनीका सोजा बैद अची. इं मुखे रूप से कमजोर लोकिन अपन शिकार बन वेद अची मैंने गो ही औशिकारी वेवस्ताची जे चारो दिस्पसरल अची अप्राद आब के वल पानी में नहें हम्रा सब के देनिक जीवनाक लिस्सा बन चुका लची आब दोसर कहन्द देश चले ची ग़नारिकेल गावक बूथ कता अब बद्द रोचक बजाएत छी अब एही ताम ज़ सव से रोचक बात अचे से ई जे ग़नारिकेल अख छन्ना गाची मे राद्टी के समय अकाल म्रित्यो से मरल लोकक अतमा बूथ, प्रेट, अराकश, कबवड़ी खेले तचे अबुडवा भूट ये निनायक के बूमि का मेच है थी. मुदै कोनो सादारन खेल नहीं आचे. इवो ही लोकल लिल एक ता अद्यात्मे कादालत आचे जकर अवास दबादिल गिल. जकन जीवित लोक नियाए नहीं डासके तचे तकन इं म्रित आत्मा सब चन्ना गाच्छिक नीचा कबद्टीक माध्यम सब आपन न्याई मागे तची. हलाची पन्दुभी आलोथ सा आत्मा एते आविका आपन अपन दुखख कता गहे तचे. पोथिक एक ता पांती दियान से सूनू, जी ए जीवद चुप रहे चे, उते भूट सब कबद्दी से मुकद्मा लडे चे. इपंक्तिता जिना पूरा उपन्यासक मर्म आची. जगन इदुन्या न्याई देबा मे विफल बहेजाई तची, अ अन्याए देक का लोक मों सादिलई तखफन लोक कता आई रह समए गाम स्म्रितिक अडालत बन जाई तखफन जाई खफनो मराइत नहीं अछी इलोक स्म्रिति में गाज पात अ गामक इ वदन्ति में जीवित रहे तखफन जाई तखफन जाई तखफन जाई तखफन जाई तक्राव. सुचका देखो. एक दिस दव्ट्रक कागच का गट्धर, लालपीता अस्सरकारी मुहर अची, जे बाड अ नयाय में दूबत लोक के अन्देखा कर हल अची. अदो सर दिस विशालकारी नयाय विवस्ताक बूल भूलया, जते सत्यकवाज चिपा जायतची. पोतिक सादारन लोग बस पाईलक नीचा दब कर एजाई तच्छे ता एक तप पएग कानुनी दर्षनजे पोटी रखे तच्छे से एच्छी जे एक देस नदीच जे दार से मेड काटे तच्छी और लोकक देज लिली जाई तच्छी तो सर्दिस इखागजी विवस्ताएच जे तारीक से गाम आ लोकक नाम काटेटची उपन्यास एक्दम स्पष्ट करे तची जे नदिक मार सभेसी खतरनाग कागजक मार अचे जगर म्रित्यो पर नाम नहीं दर्ज होई तची उ कागजी रूप से मात्रेक्ता तारीख बन करही जाई तची उकर अस्तित्वे खतम, तारीखक गोही उ गोही आची जे लोकक नाम अन्याए दूनूके खाजाई तची आप चारिम्क्हन्द आदूनिक अप्रादख चारी रूप इदेखव बद्ध जरूरी एचे जे आदूनिक समय में इगोहि कोना अपनन रूप बडलै टची इगोही आएकाली चाई नव रूप में सुजहा आबे टचे चन्रपाल बत्रा रागव संकेट चे का पात्रक माद्यम से कदा देखागे तचे जे कखनो इप पूलक मस्दूरक अद्रिष्यम्रित्य। बनजाई तचे जे तीन सो गोटिक मरल देख कोनो नाम नहीं. सब अद्रिष्य. कखनों महामारी में सासक व्यापार बने तचे, कखनों इ उज्वलजका यूवाखलेल जेब मेराखल सक्रीन के गोही, यानी मोबाल आप से होईवला दिजितर तगी बन जाई तचे, आप फुल मतीजका लोका के लिल, दे बाजारक ब्लाक मेल. इसब उही शिकारी वेवस्ताक �alag alag roopachhe, जे कमजोर लोक के निगली रहाल आचे. आब हम सब पन्चम और सब से महत्वपोण कहनपर आबाई ची, नामक रक्षाक लेल संगष, इग खताक चरम बिन्दू आची, जते लोक एह मिताएबक विरुद थाड होई ताछी. इगगबड सुन्दर जका दर्षावल गेल अच्छे गाँक लोक अपन पुर्खा और भिस्रादे लोक के कोना मों राखे तचे. इनाराखवा पोखर जल में चबाक दूनिक माध्द्यम सा, गाँक महिला सब आईन लिख्धानामक सन्रक्षन करेतची जगन सरकारी बही में नाम नहीं चडेतची तकन इलोक संस्क्रती उहींामक रक्षा करेतची पोती अस्पर्ष्ट करेतची जगन लोक अपन पुर्खाक नामक उचारन करेतची उक्रा मोहर और लाल पीता सोथ नहीं मेंता सके तच्ये, इस्म्रती कोनो भी कागस सब एसी सक्तीषाली होई तच्ये. कताक अलग-लक पात्र अपन अपन तरीका से एह विवस्तासा लडी रहल चतिं. गोप्कुमार, दिजिटल तगी आम्युल अकाउंट के निशान खोजगछ छतिन, इरा हवावत के मंच्सा निजिता अन नेटिक्ता पर सहसिक प्रष्न करए चतिन, जिनेटिक्ता के नाम पर भरहल पाकहन्के उजागर करए तचे. सत्ट्व्रत् महता, कानूनी वेवस्ताके वितर सच्व्चाप मुदा बड्मस्बुती सलडएक छतिन. आऔर, गामाक लोग गरनरी के लक चन्नागाची के पातक के माध्यम सा नाम के सुरक्षित करईता चे. इसबके संगर्षकर बस एकता उदिश्या चे नाम के मिट्वा सबचेनाय असत्ये के बचाई कराखव. ता अन्तिम अमहत्वपोण बात इए ची जे कारी नदीक उपर तेरे चंके इत नारी के लक्पातक जद्रिष्य आची, अगर खोई ब्रष्ट वेश्ट वेवस्था नहीं निगली सकते थाची कारी नदी रूपी ब्रष्ट चारग भीच इहर्यर चमकेट पात एक ता नव आशा अ अदम्य साहसक कता कहे थाची अ अन्त में जाएत-जाएत एक ता पैग प्रष्ष्न पर विचार करू जल पर वा गाजख पात पर लिखल जाइता ची उक्रा कोनो गोही वकोनो ब्रष्ट वेवस्टा नहीं निगली सकए तची कारी नदी रूपी ब्रष्टा चारग भीच इहर्यर चमके इत पात एक ता नव आशा आ अदम्यस साहसक कता कहे तची आ अन्त में जाएत-जाएत एक्ता पैक प्रष्न पर विचार करू आएके ए दिजितल थागी आ कतोर कागजी वेवस्ता के भीछ कक्कर ककर नाम मिताल जार हल अची आ अकर अस्मरिती जीवित राख्वा के जमदारी कक्कर अची गोही सबखक भीछ जल समादी केवल एकता उ� आज़ सब कब बहुत भहुत दश्वाद