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गोहि_सभक_बीच_जलसमाधि बाल संस्करण.mp4
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- 0:00–0:05ज़र आचिर ताखर किस की होगी। आजके इस खास विष्लेषन में हमें आजिएखी कहानी की गेरायो में उतरने वाले हैं.
- 0:05–0:08इक आजिएखी कहानी जो पहँजान सिस्टम से मिलने वाला न्याए,
- 0:08–0:12और हमारी लोग कताजों कि उस असीमिद ताखत को सामने रकती है,
- 0:12–0:16अगर मच्छ शरीर कहाते हैं नाम नहीं अगर वगाजा की इस भेहत गेरी और अर्थपोण कहावत का मतलब है, मगर मच्छ शरीर कहाते हैं नाम नहीं.
- 0:16–0:20मिठ्ली भाजा की इस भेहद गेरी और अर्थपोण कहावत का मतलब है,
- 0:20–0:22मगर मच शरीर काते है, नाम नहीं.
- 0:22–0:26दिखा जाये तो यही विचार इस पूरी कहानी का दर्ष्ने कादार है.
- 0:26–0:30अगर सब बहुज़ार विज़ार बाजागी लिए बहुज़ार
- 0:30–0:34बहुज़ार बाजागी बहुज़ार बाजागी बाजागी बाजागी
- 0:34–0:38बाजागी बाजागी बाजागी बाजागी बाजागी बाजागी
- 0:38–0:41कहने का मतलब है, मगर मच शरीर कहाते है, नाम नहीं.
- 0:41–0:45दिखाजाए तो यही विचार एस पूरी कहानी का दरष्ने कादार है.
- 0:45–0:48कहने का मतलब यह है कि कोई भी ब्रष्ट व्यवस्था यह सिस्टम,
- 0:48–0:51किसी अनसान के शरीर को तो नश्थ कर सकता है,
- 0:51–0:52उसे मिता सकता है,
- 0:52–0:55अगर समाज उस अजन्सान की पहचान को,
- 0:55–0:57उसके नाम को अपनी यादो में जिन्दा रखे,
- 0:57–0:59तो उसका वजुद कभी खट्मन नहीं होता.
- 0:59–1:04आज हम गजेंद्र थाकोची के लिखे एक बेहद प्रभाव शाली उपन्यास,
- 1:04–1:08गोही सबग भीच जल समादी के बाल संसकरन का विषलेशन कर रहे है.
- 1:09–1:13इस किताब में मुखे रूप से, तो दूडन्याग का बड़ादा टक्राव दिखाया आगया है.
- 1:13–1:16एक तरव है नोकर शाही की वो तन्दी कागजी दून्या,
- 1:16–1:19ज़हां आम इन्सान सरफ इक नमवर या आक्डा है
- 1:19–1:22और दूसी तरव है गडनारी केल नाम के गाँँगी
- 1:22–1:25एक बेहत जीवन्त अद्ध्यात्मिक दून्या
- 1:25–1:28जवां रहां इन्सान का नाम और उसकी कहानी
- 1:28–1:30हमेशा-हमेशा के लिए दरज हो जाती है.
- 1:30–1:37अब इस से पहले की हम आगे बड़ें, एक नजर डाल लेते हैं की आज हम किन किन आहम पडावों से गुजरेंगे.
- 1:37–1:42हम इस कई पीडियो तक फहली कहानी को समजेंगे, शुर्वात करेंगे पुल डहने की त्रास्दी से.
- 1:42–1:45फिर देखेंगे ब्रष्टाचार कवो गेरा जाल,
- 1:45–1:48उसके बाज जानेगे रहेस सिमय भूथो की अदालत के बारे में,
- 1:48–1:52फिर न्याय की लड़ाई और अंत में चर्चा करेंगे जन अभी लेग के.
- 1:52–1:56तो चलिये कहानी के पहले हिस्से से शुर्वात करते हैं,
- 1:56–2:02पूल दहने की त्रास्दी और कैसे कागजों के जर्ये लोगों का अस्तित्व मिता दिया गया.
- 2:02–2:10बात है 1978 की एक निर्माना दिन पूल अचानक देजाता है और नदी में काम कर है कैं मस्दूरों की जान चली जाती है.
- 2:10–2:40अगर बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बा
- 2:40–2:46कि जब लोग नदी में दूब रहे थे तीक उसी वक्त श़शी भूशन देव और विक्तर हल्दन जैसे अदिकारी
- 2:46–2:48बैट कर अपने आख्डो में हिर भेर कर रहे थे.
- 2:48–2:50वो अपनी फाएलों को दूरुस कर रहे थे.
- 2:50–2:54लिकिन इस पूरे सिस्टम में नन्दारुक्षन नामका एक जून्यर अंजन्यर भी ता,
- 2:54–2:58जो इस संस्त्थागद धांज्री का पहला गवा बनता है.
- 2:58–3:03उसे बहुज जल ये समज आजाता है, कि सरकारी काखजो से उट्ने वाली ये जो गंद है,
- 3:03–3:06ये दर असल स्याही की नहीं बलकी मुद और गुटालों की गंद है.
- 3:06–3:09यहां से हम आते है आपने दुस्रे पडावफ पर
- 3:09–3:11जो दिखाता है की ब्रष्टाचार का ये जाल
- 3:11–3:13सर्फ एक पूल तक सीमित नहीं ता
- 3:13–3:15बलकी दिजिटल गुटालों तक कैसे पहला.
- 3:15–3:17अब ज़रा एस देटा पर गवर करते हैं.
- 3:17–3:20ये आप्रादिक नेट्वोग कोई रातो रात नहीं बना,
- 3:20–3:23बलकी समय के साथ और भी मस्वूथ होता चला गया.
- 3:23–3:26देखिए कैसे दिल्ली में बेठे बटुकनात रही हरन,
- 3:26–3:29पूरे सिस्टम को कानूनी सन्रक्षन देते हैं.
- 3:29–3:33उदर मेरठ में चंद्र पाल बाटा लोगों को फसाने किलिए,
- 3:33–3:34दिजिटल ठगी का जाल बिचाते है.
- 3:34–3:37और ये सारा काला पैसा अंथ में कहा जाता है?
- 3:37–3:41हूंकोंग में बेटे लाओ किन हंग जैसे अप्राधियों तक.
- 3:41–3:43ये एक प�रा अंथर रष्ट्रे एको सिस्तम है,
- 3:43–3:47जिसका एक मात्र मक्सध कम्зोर लोगों का शिकार करना है.
- 3:47–3:51शोशन का ये पूरा दाचा अपना रूप कैसे बडलता है?
- 3:51–3:53ये देखना वाकगी चोकाने वाला है.
- 3:53–3:56जो तेकेदा नाईंटीन सेवटी एट में
- 3:56–3:59पूल निरमान में हुई मोतो पर परदा डाल रहे थे,
- 3:59–4:05बिल्कुल वही लोग 2020 की महमारी के दोरान दवा और अकसिजन की सपलाय का गोटाला भी कर रहे थे.
- 4:05–4:13इतना ही नहीं, राजा रन्ती नाम के जूवा अपने उज्वलजाए से कई यूवाँ को ब्लैक्मेल करके आत्महत्या करने पर मजबूर कर दिया.
- 4:13–4:18और सुर्या आश्रे नाम की एक संस्ता, जो भलाए का मुख़टा पहने ती,
- 4:18–4:21उसकी आड में फूल्मती जैसी लगकिं मानवत असकरी की गई.
- 4:21–4:26मतलब अप्राद का तरीका बडल गया, लेकिं शोष़ करने वाले वही रहें.
- 4:26–4:31अब हम कहानी के एक बहुत ही रहें स्यमाई और गेरे हिस्से में प्रवेश कर रहें हैं,
- 4:31–4:35भूथों की अदालत और गर नारी केल की आतमाई.
- 4:35–4:39हम बात कर रहें है गर नारी केल गाँँ के चनना गाची की.
- 4:39–4:43यहां राद के सननाटे में एक अद्रिश्व अदालत लकती है.
- 4:43–4:46कहनी में कोई दराने वाली बात नहीं है,
- 4:46–4:48बलके एक बहुत ही गेरा रूपक है.
- 4:48–4:52सन्देश यहें कि जब जीवित लोगो की अदालतें
- 4:52–4:55और उनका पूरा न्याए तन्त्र नाकाम हो जाता है.
- 4:55–4:59तब गाँँके पूर्वज और वो आत्माए उस सच को याद रकती है,
- 4:59–5:02जिसे सिस्टम ने कागजों से मिता दिया दिया था.
- 5:02–5:06और इसी जगगापर एक अनोखा खेल खेल खेला जाता है,
- 5:06–5:07बूत कबद्दी.
- 5:07–5:09नाम सुनकर अजीब लख्सकता है,
- 5:09–5:11लेकिन ये कोई मामूली केल नहीं है
- 5:11–5:15ये आत्माउ के अपने अस्तित्वो को बचाने की आक्डी लडाई है
- 5:15–5:19हूलासी जैसी कई आत्माउए इस खेल का हिस्सा बनती है
- 5:19–5:23जहां उने रेखा पार करके अपना अस्ली नाम जोर से बोलना होता है
- 5:23–5:24आफ्सा क्यो?
- 5:24–5:30क्योंकि अपना नाम याद रखना और उसे पुकारना ही उस ब्रष्ट व्यवस्था के किलाफ सबसे बड़ा विद्वो है,
- 5:30–5:34जिसने उने जीते जी कागजो पर महेज एक संख्या बना के चोर दिया था.
- 5:34–5:37इसके बाद शुर्वात होती है न्याए की लडाए की.
- 5:37–5:42कागजी जूटके किलाव जमीन पर लडागया एक लंबा संगरश.
- 5:42–5:44ये हिस सा बडी खुबसुर्ती से दिखाता है,
- 5:44–5:47कि कैसे कभी कभी बहुत चोटे चोटे सबूथ,
- 5:47–5:50बड़े-बड़े कागजी जूटकी बुन्याद रहा देते हैं.
- 5:50–5:55नन्द आरुक्शन जब आदालत में गवाई देने जाते हैं, तो अपने साथ क्या ले जाते हैं?
- 5:55–6:00पूल हाज से में मारे गय मस्टूर बिसेसर पास्वान का सर्फ एक जुता,
- 6:00–6:05वही एक सादारन्सा जुता आदालत में इस बात का सबसित फोस प्रमान बन जाता है,
- 6:05–6:07कि वो इंसान उस दिन वहां मोजुद था,
- 6:07–6:11बले ये सरकारी रजिस्टर उसे अनुपस्थट क्योना बतारा हो,
- 6:11–6:13लेकिन सच उस जुते में चिपा था.
- 6:13–6:16और इस लडाई का एक बहुत बडा उसुल था,
- 6:16–6:18नदी सर्फ एक कोपी नहीं रक्ती.
- 6:18–6:24न्याई की लड़ाई लड़़े गोपकुमार और एरा औरुक्षन को ये बात अच्छे से समझ आच्छूकी ती,
- 6:24–6:28के सच्चाई को स्व्ची किसी एक सरकारी दफ्तर के बहरो से नहीं चोडा जासकता.
- 6:28–6:29इसी लि उनो ने क्या किया?
- 6:29–6:33उन्होंने सच्चाई के सारे सबूटो को दिजिटली एंग्रिप्ट क्या
- 6:33–6:36और उने दून्या के अलग �alag kono mein chupaadhya
- 6:36–6:38यहादक की एक मैमरी दिवाईस को गाँओं के
- 6:38–6:41उस प्राचीन पीपल के पेड की खोखल मे भी च्पाद्गया
- 6:41–6:45उन्हु पुरी समज्दारी से सच्चाई का वीख केंध्री करन कर दिया.
- 6:45–6:49ये सारी महनत और तयारी हमें लेजाती है,
- 6:49–6:52कहानी के सबसे बहावुक और एहम्ट्क्लामाखस की और.
- 6:52–6:53अदालत का दिष्च.
- 6:53–6:56जहां सत्टिव्रत महता जो कुद एक सरकारी वकील है,
- 6:56–7:01अखिर कार ब्रष्ट वेवस्था का साथ चोडगर न्याय का रास्ता चुन लेते हैं.
- 7:01–7:04वे अदालत में कोई मोटी सरकारी फाई लेकर नहीं आते,
- 7:04–7:07बलकी एक सुखा हूँा नारिल का पत्ता लेकर आते हैं.
- 7:07–7:10और उस पत्ते पर उन सभी म्रितकों के आस्ली नाम
- 7:10–7:13बहुत इस शुख्श्म अख्शरो में दर्ज ते,
- 7:13–7:16जिने कागजो ने बहुत पहले ही गाएप कर दिया था.
- 7:16–7:18तीन सुअ से भी ज्यादा नाम,
- 7:18–7:24सत्व्रत महता उस भरी आडालत में एक एक कर के वो सारे नाम पन्ना शुरू करते हैं.
- 7:24–7:28दश्खों से जो मुन उन दीवारो में केट ता वो पहली भार तूरता है.
- 7:28–7:31जब उन सेक्रो नामो को एक साथ पुकारा गया,
- 7:31–7:35तो नामो के उस पहार ने अप रादियों के गमन्द को चूर चूर कर दिया.
- 7:35–7:41काखजी सुरक्षा का जाल उनो इतने सालों की चालाकी से बूना दा वो पल बर में बिखर गया.
- 7:41–7:46और अब हम आते है इस कहानी के आखरी और सब से महत्वोपूरन हिस से पर,
- 7:46–7:51जिसे कहाग या है जन अभी लेक, यानी लोगो का अपना रेकोट.
- 7:51–7:56अदालत में जीत मिलने के बाद कहानी के नायक कोई बड़ा जच्न नहीं मनाते.
- 7:56–8:00इसके बजाए वो सीदे अपने गाँ लोडते हैं.
- 8:00–8:06देविका और मीरा जैसे यूवा गाँ के उसी प्राचीन पेड की ज़डो के पास एकखथा होते हैं.
- 8:06–8:09और एक अबहुत पूर पहल की शुर्वात करते हैं,
- 8:09–8:13वो तैक रते हैं की अब से वो अपना रिकोड खुड बनाएंगे,
- 8:13–8:16ताकी बहुविष्ष में कोई भी वेवस था,
- 8:16–8:21कोई भी सिस्टम उनके लोगो कर नाम फेर से मिताने की हिम्मत ना कर सके.
- 8:21–8:26उनो ने जन अबही लेख के चार बहुत ही सबष्ट और शक्तीषाली नियम बनाए.
- 8:26–8:27आई ये देकते हैं.
- 8:27–8:30पहला नियम इस में कोई सरकारी नाम नहीं
- 8:30–8:33बलकी गर का वो आस्ली नाम लिखा जाएगा,
- 8:33–8:35जिस से लोग उने हे पुकारते थे.
- 8:35–8:41तुस्रा, इस में स्वट एक हाद्से के नहीं, बलकी सिस्टम के सताए सब ही लोगों को जगा मिलेगी.
- 8:42–8:48तुस्रा, जो लोग अपनी पहचान शबाना चाते हैं, उनकी निज्टा का सम्मान करते हुए प्रतीकों का अस्तमाल की आजाएगा.
- 8:48–8:55अर च्छाथा सबसे ज़रूरीनियम जो कुछ नहीं कहना चाते उनके माँन को भी पुरी इजजध दी जाएगी.
- 8:55–9:01ये जन अभी लेग अईन्सानी पहचान को मिताने वाली रही और साजच को हमेशा के लें नाकाम कर देता है.
- 9:01–9:05इसी के साथ आजका हमारा ये विषलेशन पूरा हूता है
- 9:05–9:09लेकिन जाते जाते ये हमारे सामने क बेहत गेहरा सवाल चोर जाता है
- 9:09–9:12ज़र शोच ये इतिहास वास्तव में कोन लिकता है
- 9:12–9:16क्या वो चंद ताकतवर लोग जो सरकारी कागजों पर महर लगाते है
- 9:16–9:22या वो आम लोग जो अपने गीतों अपने लोग कताँ और अपने यादों में सच को हमेशा जिन्दा रकते हैं.
- 9:22–9:29ये कहानी हमें बताती है के अस्ली नियाए अदालतों की फाणलो से नहीं बलकी समाच के भीटर से जन्वे लेता है.
- 9:29–9:35आज औमारे साज जुडने के लिए बहुत भुड़ द्श्वाद उमीद है ये विचार आपको भी लंभे समें तक सोचने पर मुज्बूर करेगा.
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ज़र आचिर ताखर किस की होगी। आजके इस खास विष्लेषन में हमें आजिएखी कहानी की गेरायो में उतरने वाले हैं. इक आजिएखी कहानी जो पहँजान सिस्टम से मिलने वाला न्याए, और हमारी लोग कताजों कि उस असीमिद ताखत को सामने रकती है, अगर मच्छ शरीर कहाते हैं नाम नहीं अगर वगाजा की इस भेहत गेरी और अर्थपोण कहावत का मतलब है, मगर मच्छ शरीर कहाते हैं नाम नहीं. मिठ्ली भाजा की इस भेहद गेरी और अर्थपोण कहावत का मतलब है, मगर मच शरीर काते है, नाम नहीं. दिखा जाये तो यही विचार इस पूरी कहानी का दर्ष्ने कादार है. अगर सब बहुज़ार विज़ार बाजागी लिए बहुज़ार बहुज़ार बाजागी बहुज़ार बाजागी बाजागी बाजागी बाजागी बाजागी बाजागी बाजागी बाजागी बाजागी कहने का मतलब है, मगर मच शरीर कहाते है, नाम नहीं. दिखाजाए तो यही विचार एस पूरी कहानी का दरष्ने कादार है. कहने का मतलब यह है कि कोई भी ब्रष्ट व्यवस्था यह सिस्टम, किसी अनसान के शरीर को तो नश्थ कर सकता है, उसे मिता सकता है, अगर समाज उस अजन्सान की पहचान को, उसके नाम को अपनी यादो में जिन्दा रखे, तो उसका वजुद कभी खट्मन नहीं होता. आज हम गजेंद्र थाकोची के लिखे एक बेहद प्रभाव शाली उपन्यास, गोही सबग भीच जल समादी के बाल संसकरन का विषलेशन कर रहे है. इस किताब में मुखे रूप से, तो दूडन्याग का बड़ादा टक्राव दिखाया आगया है. एक तरव है नोकर शाही की वो तन्दी कागजी दून्या, ज़हां आम इन्सान सरफ इक नमवर या आक्डा है और दूसी तरव है गडनारी केल नाम के गाँँगी एक बेहत जीवन्त अद्ध्यात्मिक दून्या जवां रहां इन्सान का नाम और उसकी कहानी हमेशा-हमेशा के लिए दरज हो जाती है. अब इस से पहले की हम आगे बड़ें, एक नजर डाल लेते हैं की आज हम किन किन आहम पडावों से गुजरेंगे. हम इस कई पीडियो तक फहली कहानी को समजेंगे, शुर्वात करेंगे पुल डहने की त्रास्दी से. फिर देखेंगे ब्रष्टाचार कवो गेरा जाल, उसके बाज जानेगे रहेस सिमय भूथो की अदालत के बारे में, फिर न्याय की लड़ाई और अंत में चर्चा करेंगे जन अभी लेग के. तो चलिये कहानी के पहले हिस्से से शुर्वात करते हैं, पूल दहने की त्रास्दी और कैसे कागजों के जर्ये लोगों का अस्तित्व मिता दिया गया. बात है 1978 की एक निर्माना दिन पूल अचानक देजाता है और नदी में काम कर है कैं मस्दूरों की जान चली जाती है. अगर बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बा कि जब लोग नदी में दूब रहे थे तीक उसी वक्त श़शी भूशन देव और विक्तर हल्दन जैसे अदिकारी बैट कर अपने आख्डो में हिर भेर कर रहे थे. वो अपनी फाएलों को दूरुस कर रहे थे. लिकिन इस पूरे सिस्टम में नन्दारुक्षन नामका एक जून्यर अंजन्यर भी ता, जो इस संस्त्थागद धांज्री का पहला गवा बनता है. उसे बहुज जल ये समज आजाता है, कि सरकारी काखजो से उट्ने वाली ये जो गंद है, ये दर असल स्याही की नहीं बलकी मुद और गुटालों की गंद है. यहां से हम आते है आपने दुस्रे पडावफ पर जो दिखाता है की ब्रष्टाचार का ये जाल सर्फ एक पूल तक सीमित नहीं ता बलकी दिजिटल गुटालों तक कैसे पहला. अब ज़रा एस देटा पर गवर करते हैं. ये आप्रादिक नेट्वोग कोई रातो रात नहीं बना, बलकी समय के साथ और भी मस्वूथ होता चला गया. देखिए कैसे दिल्ली में बेठे बटुकनात रही हरन, पूरे सिस्टम को कानूनी सन्रक्षन देते हैं. उदर मेरठ में चंद्र पाल बाटा लोगों को फसाने किलिए, दिजिटल ठगी का जाल बिचाते है. और ये सारा काला पैसा अंथ में कहा जाता है? हूंकोंग में बेटे लाओ किन हंग जैसे अप्राधियों तक. ये एक प�रा अंथर रष्ट्रे एको सिस्तम है, जिसका एक मात्र मक्सध कम्зोर लोगों का शिकार करना है. शोशन का ये पूरा दाचा अपना रूप कैसे बडलता है? ये देखना वाकगी चोकाने वाला है. जो तेकेदा नाईंटीन सेवटी एट में पूल निरमान में हुई मोतो पर परदा डाल रहे थे, बिल्कुल वही लोग 2020 की महमारी के दोरान दवा और अकसिजन की सपलाय का गोटाला भी कर रहे थे. इतना ही नहीं, राजा रन्ती नाम के जूवा अपने उज्वलजाए से कई यूवाँ को ब्लैक्मेल करके आत्महत्या करने पर मजबूर कर दिया. और सुर्या आश्रे नाम की एक संस्ता, जो भलाए का मुख़टा पहने ती, उसकी आड में फूल्मती जैसी लगकिं मानवत असकरी की गई. मतलब अप्राद का तरीका बडल गया, लेकिं शोष़ करने वाले वही रहें. अब हम कहानी के एक बहुत ही रहें स्यमाई और गेरे हिस्से में प्रवेश कर रहें हैं, भूथों की अदालत और गर नारी केल की आतमाई. हम बात कर रहें है गर नारी केल गाँँ के चनना गाची की. यहां राद के सननाटे में एक अद्रिश्व अदालत लकती है. कहनी में कोई दराने वाली बात नहीं है, बलके एक बहुत ही गेरा रूपक है. सन्देश यहें कि जब जीवित लोगो की अदालतें और उनका पूरा न्याए तन्त्र नाकाम हो जाता है. तब गाँँके पूर्वज और वो आत्माए उस सच को याद रकती है, जिसे सिस्टम ने कागजों से मिता दिया दिया था. और इसी जगगापर एक अनोखा खेल खेल खेला जाता है, बूत कबद्दी. नाम सुनकर अजीब लख्सकता है, लेकिन ये कोई मामूली केल नहीं है ये आत्माउ के अपने अस्तित्वो को बचाने की आक्डी लडाई है हूलासी जैसी कई आत्माउए इस खेल का हिस्सा बनती है जहां उने रेखा पार करके अपना अस्ली नाम जोर से बोलना होता है आफ्सा क्यो? क्योंकि अपना नाम याद रखना और उसे पुकारना ही उस ब्रष्ट व्यवस्था के किलाफ सबसे बड़ा विद्वो है, जिसने उने जीते जी कागजो पर महेज एक संख्या बना के चोर दिया था. इसके बाद शुर्वात होती है न्याए की लडाए की. कागजी जूटके किलाव जमीन पर लडागया एक लंबा संगरश. ये हिस सा बडी खुबसुर्ती से दिखाता है, कि कैसे कभी कभी बहुत चोटे चोटे सबूथ, बड़े-बड़े कागजी जूटकी बुन्याद रहा देते हैं. नन्द आरुक्शन जब आदालत में गवाई देने जाते हैं, तो अपने साथ क्या ले जाते हैं? पूल हाज से में मारे गय मस्टूर बिसेसर पास्वान का सर्फ एक जुता, वही एक सादारन्सा जुता आदालत में इस बात का सबसित फोस प्रमान बन जाता है, कि वो इंसान उस दिन वहां मोजुद था, बले ये सरकारी रजिस्टर उसे अनुपस्थट क्योना बतारा हो, लेकिन सच उस जुते में चिपा था. और इस लडाई का एक बहुत बडा उसुल था, नदी सर्फ एक कोपी नहीं रक्ती. न्याई की लड़ाई लड़़े गोपकुमार और एरा औरुक्षन को ये बात अच्छे से समझ आच्छूकी ती, के सच्चाई को स्व्ची किसी एक सरकारी दफ्तर के बहरो से नहीं चोडा जासकता. इसी लि उनो ने क्या किया? उन्होंने सच्चाई के सारे सबूटो को दिजिटली एंग्रिप्ट क्या और उने दून्या के अलग �alag kono mein chupaadhya यहादक की एक मैमरी दिवाईस को गाँओं के उस प्राचीन पीपल के पेड की खोखल मे भी च्पाद्गया उन्हु पुरी समज्दारी से सच्चाई का वीख केंध्री करन कर दिया. ये सारी महनत और तयारी हमें लेजाती है, कहानी के सबसे बहावुक और एहम्ट्क्लामाखस की और. अदालत का दिष्च. जहां सत्टिव्रत महता जो कुद एक सरकारी वकील है, अखिर कार ब्रष्ट वेवस्था का साथ चोडगर न्याय का रास्ता चुन लेते हैं. वे अदालत में कोई मोटी सरकारी फाई लेकर नहीं आते, बलकी एक सुखा हूँा नारिल का पत्ता लेकर आते हैं. और उस पत्ते पर उन सभी म्रितकों के आस्ली नाम बहुत इस शुख्श्म अख्शरो में दर्ज ते, जिने कागजो ने बहुत पहले ही गाएप कर दिया था. तीन सुअ से भी ज्यादा नाम, सत्व्रत महता उस भरी आडालत में एक एक कर के वो सारे नाम पन्ना शुरू करते हैं. दश्खों से जो मुन उन दीवारो में केट ता वो पहली भार तूरता है. जब उन सेक्रो नामो को एक साथ पुकारा गया, तो नामो के उस पहार ने अप रादियों के गमन्द को चूर चूर कर दिया. काखजी सुरक्षा का जाल उनो इतने सालों की चालाकी से बूना दा वो पल बर में बिखर गया. और अब हम आते है इस कहानी के आखरी और सब से महत्वोपूरन हिस से पर, जिसे कहाग या है जन अभी लेक, यानी लोगो का अपना रेकोट. अदालत में जीत मिलने के बाद कहानी के नायक कोई बड़ा जच्न नहीं मनाते. इसके बजाए वो सीदे अपने गाँ लोडते हैं. देविका और मीरा जैसे यूवा गाँ के उसी प्राचीन पेड की ज़डो के पास एकखथा होते हैं. और एक अबहुत पूर पहल की शुर्वात करते हैं, वो तैक रते हैं की अब से वो अपना रिकोड खुड बनाएंगे, ताकी बहुविष्ष में कोई भी वेवस था, कोई भी सिस्टम उनके लोगो कर नाम फेर से मिताने की हिम्मत ना कर सके. उनो ने जन अबही लेख के चार बहुत ही सबष्ट और शक्तीषाली नियम बनाए. आई ये देकते हैं. पहला नियम इस में कोई सरकारी नाम नहीं बलकी गर का वो आस्ली नाम लिखा जाएगा, जिस से लोग उने हे पुकारते थे. तुस्रा, इस में स्वट एक हाद्से के नहीं, बलकी सिस्टम के सताए सब ही लोगों को जगा मिलेगी. तुस्रा, जो लोग अपनी पहचान शबाना चाते हैं, उनकी निज्टा का सम्मान करते हुए प्रतीकों का अस्तमाल की आजाएगा. अर च्छाथा सबसे ज़रूरीनियम जो कुछ नहीं कहना चाते उनके माँन को भी पुरी इजजध दी जाएगी. ये जन अभी लेग अईन्सानी पहचान को मिताने वाली रही और साजच को हमेशा के लें नाकाम कर देता है. इसी के साथ आजका हमारा ये विषलेशन पूरा हूता है लेकिन जाते जाते ये हमारे सामने क बेहत गेहरा सवाल चोर जाता है ज़र शोच ये इतिहास वास्तव में कोन लिकता है क्या वो चंद ताकतवर लोग जो सरकारी कागजों पर महर लगाते है या वो आम लोग जो अपने गीतों अपने लोग कताँ और अपने यादों में सच को हमेशा जिन्दा रकते हैं. ये कहानी हमें बताती है के अस्ली नियाए अदालतों की फाणलो से नहीं बलकी समाच के भीटर से जन्वे लेता है. आज औमारे साज जुडने के लिए बहुत भुड़ द्श्वाद उमीद है ये विचार आपको भी लंभे समें तक सोचने पर मुज्बूर करेगा.