MACHINE ASR ACCESSIBILITY AID
तत्त्वचिन्तामणि_और_सत्य_की_सटीक_परख.m4a
Timestamped machine output
- 0:00–0:05ये गंगेश वौपाद्याय के गरन्त, तत्व छिन्तामनी के मुख्य विचारों का एक तवरित साराव्च है.
- 0:05–0:13दिक्हिए, चोद्वीन सदी का ये अटिहास गरन्त असल में भारतिये नव नियाय दरषन की नीव है,
- 0:13–0:16जो हमें सिखाता है कि हम सच्च को साबित कैसे करें
- 0:16–0:19और हमारी सोच में क्या क्या कमिया रहे जाती हैं
- 0:19–0:20तो पहला सवाल
- 0:20–0:22हम सच्टे को पहचानते कैसे हैं
- 0:22–0:24पुराने विचारक मानते ते
- 0:24–0:27कि ज्यान अपनी सच्चाई कुछ साबित कर देता है
- 0:27–0:29लेकिन गंगेश कहते हैं
- 0:43–0:45तरको में च्फिपी शर्टें जिने हम उपादी कहते हैं
- 0:45–1:15अपने अपने प्रज़ेगाँ प्रज़ेगाँ जाए अपने अपने अपने अपने अपने अपने अपने अपने अपने अपने अपने अपने अपने अपने अपने अपने अपने अपने अपने अपने अपने अपने अपने अपने अपने अपने अपने अपने अपने अप
- 1:15–1:18अम अख्सर कहते हैं अग्सर कहते हैं कि जहा आग है वहां दूवा है
- 1:18–1:20पर क्या ये हमेशा सच है?
- 1:20–1:21बिलकुल नहीं
- 1:21–1:24सूखी लक्डी की आग में दूवा नहीं होता
- 1:24–1:26दूवा तो तभी उट्टा है जब लक्डी गीली हो
- 1:26–1:29यहां गीली लक्डी वो चिपी शर्थ है
- 1:29–1:31जो आप का पुरा तर्क पलट्सक्ती है
- 1:31–1:34संख्शेप में, तत्व चिन्तामनी हमें सिखाती है
- 1:34–1:36कि सत्टे को हमेशा परिनामो से परखें
- 1:36–1:38दिमागी ब्रमो से बचें
- 1:38–1:41और किसी भी निशकर्स से फहले चिपी शर्टें जरूर पहचानें
- 1:41–1:48तो अगली बार, जब आप किसी जानकारी को सच मान ले, तो रुक कर खुथ से पूचें, कि कही आप भी सीप में चांदी तो नहीं देख रहें?
Plain text
ये गंगेश वौपाद्याय के गरन्त, तत्व छिन्तामनी के मुख्य विचारों का एक तवरित साराव्च है. दिक्हिए, चोद्वीन सदी का ये अटिहास गरन्त असल में भारतिये नव नियाय दरषन की नीव है, जो हमें सिखाता है कि हम सच्च को साबित कैसे करें और हमारी सोच में क्या क्या कमिया रहे जाती हैं तो पहला सवाल हम सच्टे को पहचानते कैसे हैं पुराने विचारक मानते ते कि ज्यान अपनी सच्चाई कुछ साबित कर देता है लेकिन गंगेश कहते हैं तरको में च्फिपी शर्टें जिने हम उपादी कहते हैं अपने अपने प्रज़ेगाँ प्रज़ेगाँ जाए अपने अपने अपने अपने अपने अपने अपने अपने अपने अपने अपने अपने अपने अपने अपने अपने अपने अपने अपने अपने अपने अपने अपने अपने अपने अपने अपने अपने अपने अप अम अख्सर कहते हैं अग्सर कहते हैं कि जहा आग है वहां दूवा है पर क्या ये हमेशा सच है? बिलकुल नहीं सूखी लक्डी की आग में दूवा नहीं होता दूवा तो तभी उट्टा है जब लक्डी गीली हो यहां गीली लक्डी वो चिपी शर्थ है जो आप का पुरा तर्क पलट्सक्ती है संख्शेप में, तत्व चिन्तामनी हमें सिखाती है कि सत्टे को हमेशा परिनामो से परखें दिमागी ब्रमो से बचें और किसी भी निशकर्स से फहले चिपी शर्टें जरूर पहचानें तो अगली बार, जब आप किसी जानकारी को सच मान ले, तो रुक कर खुथ से पूचें, कि कही आप भी सीप में चांदी तो नहीं देख रहें?