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मैथिली_गजलक_विकास_(1905-2022).mp4
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- 0:00–0:06नमस्कार, स्रोथ सामगरीक आई नाव आरोचक विष्लेषन में, हमाहा सब के स्वागत करेची.
- 0:06–0:15आई हम सब जे विषेपर चर्चा करब, सिसमान नहीं, बलकी मैठली गजलक एक सोसे अदिक वर्षक एकता अदबुत यात्रा थेक.
- 0:15–0:24इक ता आहन सपर अच्छी जे अपन त्रूटी पून श्रूवाथ से लोक आई कालिक अट्यान्त सतीक अ अदूनिक महारत दरी पूँचल अच्छी.
- 0:24–0:27तो चलू इजान्बा के ले हम्रा संगे बनी रहू.
- 0:27–0:34इगव शुरुकर बाँ से पहले चलू आम सब आपन मित्हिलाग उही सम्व्रिद्द साहित्यक संस्क्रूती में चलत्छी
- 0:34–0:39कल्प्ना करू, 1905 इस्वी कास्पास के समघे, जखन पन्दित जीवनजा संसंस था,
- 0:39–0:44पक कवी लोक नी मेठिली सहित्ते में गजल्क नी उराकी रहल चला.
- 0:44–0:48इए उदोर चल जखन किछ नाव ग़बा कुछ साह चरम पर चल.
- 0:48–0:57मुदा इजान बहुत जरूरी आफी जी इब भाशाई अग काव्य परमपडा कोनो एक ता राजनीतिक सीमाद्ठरी बान्दल नही आफी.
- 0:57–1:01इएक ता अख्व्यन्त जीवन्त अज्वापार संस्क्रतिक परी गतना थेख.
- 1:01–1:10एक दधडगन भारत अन नेपाल दूनो देशक समुदायके एक दूसरा सब पडी सुगन्ता सजोडे तची, जना दूता शरी रक एक तप रान होए.
- 1:10–1:14आएक हमरी चर्चा मुख्ये रुप सब पाच बहाग में बातल अची.
- 1:14–1:19पहल, मैत्ली गजलक परीच्य, दोसर, बहर आम मात्राक नियम,
- 1:19–1:24तेसर, प्रारमभेक अनवेशक अक्काज, चोतेम, बदलेद विष्य वस्तू,
- 1:24–1:26आप पाचम, आदूनिक महारतक युग.
- 1:26–1:29तच्छलू, पहल खंद से शुडूकरेएज्च्य,
- 1:29–1:33मैत्टिली गजलक परीच्टाए आएकर एक सताव्दी से अदिक कविकास
- 1:33–1:36आब आबाए चे दोसर कहन्द पर
- 1:36–1:40बहर आम मात्राकनीम आखेर इगजल चैक की
- 1:40–1:43दिख हो गजल कुनो आम कविदा नहीं चीक
- 1:43–1:46जे जेहना मुनभेल, जेना विचारायाल, लिख्देल हो।
- 1:46–1:50इद्यन्त तक्नी की आखध्होर गनीतिय लैधाल सब भन्धल रहीत अची
- 1:50–1:54वरनव्रित वब बहर गजलक उगध्होर डाचाची
- 1:54–1:57जही में प्रतेख पातिक मात्रा एक्दम समान
- 1:57–1:59सतीक अनिष्चित क्रम में होई वाख चाही
- 1:59–2:02इब लगु अदीर गस्वरक गनीत खेख
- 2:02–2:08ज़ सरल शब्द में कही तेक तनीक गजल लिखभ कुनु कथिन गनेतिया पहली के सुडजेबासनाची.
- 2:08–2:15आब आहा सब के इजान का आश्चर हैत चे समपादक लोकनी एक ता बड़ रोचक बातक रहिस च्यत गातन केलनी चद
- 2:15–2:18ये विद्धाएक चिश्वर्वाती रचाईता चला,
- 2:18–2:21ओलोकनी मुल नियम सब के बहुत हत गलत भुजलने,
- 2:21–2:24ओलोकनी लबूस्वर के दिरग मान लिलने,
- 2:24–2:27पाती में एक समान मात्रा क्रमक अंदेखी कै दिलने,
- 2:27–2:30अशास्तरिया वा लोग गीतक नियम के,
- 2:30–2:32गजल के निमक संगे मिला दिलनी
- 2:32–2:36माने लैं मिला बे लेल निमक खोब चुट लिल गेल
- 2:36–2:40इविकास क्रम हम्रा लोकनिक आगा पुरा चित्र इसपष्ट कर देता ची
- 2:40–2:43उनने सु पाथ सव, उनने सु तीस दरी स्थापना काल चल
- 2:43–2:50फिर 1971-1971 सुदार काल आयल जते नियम सबखके कनी मनी तीक कयल गेल.
- 2:50–2:561971-2008 दरीतनियम अविद्रोज के बीच बकाईदा संगष भेल
- 2:56–3:01आ अंद्ता 2008-2022 दरीक समे आदूनिक महारत के युग बनी गेल अची.
- 3:01–3:05इदेखा बड दिल्चास पची जे कोना इखला परिपक्ववेल
- 3:05–3:07आप देसर खन्दिस बड़ेची
- 3:07–3:11जटे हम सब प्रारमभिक अनवेशक लोकनी के देखभ
- 3:11–3:13जे ना नीव राकल गेल असुदार बेल
- 3:13–3:17पन जीवन जाक इप प्रारमभिक कारजक एक ता जलक देखू
- 3:17–3:23अग लिख है चत्छी जे उ सम्वद्र पर्यंत दध हरी सास लेद अ सब के चुछ़प चाएप सहत.
- 3:23–3:28यद्ध्ध्धी एकर भकती असमर पन भड़ सुन्दर अची मुदा सम्पादक कन अनुसार
- 3:28–3:30इई शुर्वाती गजल सब हमे सं
- 3:30–3:32लगबबख सतर सच्सी प्रतिषट मे
- 3:32–3:33वरनव्रत
- 3:33–3:35वा मात्रा कर्थ रूटी चले
- 3:35–3:36बहुनीक चल
- 3:36–3:38मुदा व्याक्रन कम को जल
- 3:38–3:41मदा इशंग्या चार बडा महत्वो पूरनच
- 3:41–3:42मात्रट चार
- 3:42–3:43हाँ
- 3:43–3:45इक्दम टीक सुनलु आहा सब.
- 3:45–3:48मैतली बाशा में सही धाचागत नीम लाबे लेल,
- 3:48–3:49कवीवर सीता रामजा,
- 3:49–3:51अकाशी कान्त मिश्रु मदूप क,
- 3:51–3:55मातर चारेता कठोरता सरजित गजल कावःषक्ता पडले.
- 3:55–3:56आई ही चारेता बाजल,
- 3:56–4:01मैत्टिली गजला की तिहास में व्याकरनिक शुद्धाता का पकी नीव्राखी दिलक.
- 4:01–4:06चारिम खंड, बदलेट विषे वस्तु अद्धाचाक लिल संगर्ष.
- 4:06–4:09भीसम सताब दिक अंतिम भाग बडा उतल पुतल वाला चल,
- 4:09–4:13एक दिस मुक्त चंदक विद्रोही लोकनी जे पूरस्कारक खोज मे चला
- 4:13–4:19आद्दूसर दिस गजल्क आस्ली शिल्प के बचे बाक प्रयास कर आहल कत्होर व्याक्रन विद लोकनी
- 4:19–4:22दूनू युख के बीच का अंतर एक दम सपष्ट आची
- 4:22–4:29एक दिस जीवन योग, जही में निम शितिल चल, अ भकती पर जोर चल, अ दूसर दिस आई काल एक अंचिनार योग,
- 4:29–4:34जते कतोर व्याक्रन, सपष्ट बहर, अ आदूनिक समाजिक विषे वस्तृ प्रमुक अची,
- 4:34–4:38अमुर्त भक्तीसा यतार्त दरेक यी एक ता पहग जलांग ची.
- 4:38–4:41विशे वस्तू कीना बडली रहल चल,
- 4:41–4:45एकर बहतरीन उदारन अची जग्दीस चंद्र ताकृ अनिल कर यी शान्दार शीर.
- 4:45–4:49उलिक ही चतीन जे तूतल आर भूकल रहभाक नाम गजल अचे,
- 4:49–4:53आजे गर में बेसका गुगल पर दून्या ताक्रहल आजे उगजल आजे
- 4:53–4:57इदेखवेद आजे कोना कतोर मात्राक पालन कर अग्काल हूँ
- 4:57–5:02विशे वस्तू गगन सुत्रे कर आदूनेक दिनचर्या अईधारत दिस बदली रहल चल
- 5:02–5:06अब अबेछ्छी अंतिम क्हन्द पर आदूनिक महारत,
- 5:06–5:09जते कत्होर निमक संग जमीनी यतारत छे.
- 5:09–5:14इो वर्त्मान युगछे, जते कवी लोकनी कत्होर अरभी बहर
- 5:14–5:17आश़्रल मात्रिक बहर पर पुन्रूपे महारत
- 5:17–5:19हासिल के लिनेशचत.
- 5:19–5:29आई काल एक आदूनिक लेक्हक लोकनी केना कदोर सन्रच्ना का उप्योग कैका निशपक्ष रूप से कदोर यत्हार्थ पच्चाट्चा करे चत्ही से बर नीक सबुजल जा सके तची.
- 5:29–5:34अम प्रकाश जा, राजी व्रन्जन मिश, आश्शान्ती लक्ष्मी चोदरी सन्रज्नाकार,
- 5:34–5:38जटल बहर का उप्योग कै क, सामाजिक परिवर्तन, गरीभी,
- 5:38–5:42आग्रामीन जीवन का पतन सन गेहन विषे सपर लिही रहल चती.
- 5:42–5:45अम प्रकाश शाजी की इपानती दिखू,
- 5:45–5:50जन गनक सेवक भेल देशक भार चे जरी रहल पेटक आगी बड़हत्यार चे.
- 5:50–5:54हम सब एते कोनो विषिष्ट राजनी तेग द्रुष्टिकोनक समर्ठन नहीं कर हैल ची,
- 5:55–5:58मुदा स्रोट समगरी इस पश्ट रूप सदेखा रहल ची,
- 5:58–6:03जज़ल कीना एक ता समाजिक आलोचनाक सशक्त माद्यमक रूप में विखसिद बहले ची,
- 6:03–6:08जाही में समाजक विस्संगतीक पर बिना कोनु लाग लपेटक प्रहार केल गेल गेल आची.
- 6:08–6:14इक रासंगे राजीव रंजन मिष्रजीक इपान्ती जिन्गी खेल तमाशाता आसक्संण निराशाता
- 6:14–6:17इबर सादारन मदद अत्यंद गंभीर पान्ती इची
- 6:17–6:22इए अस्पष्ट करे तची जई आई कालिक अत्यंद अनुशासित मैत्ली गजल में
- 6:22–6:27जीवनक अस्तित्ववाडी विषे सबखक कतिग गेरा प्रभाव अविस्तार समाही तची.
- 6:27–6:31तव अन्त में ये एक तप पैंक विचारीने प्रश्ना उठहे तच्छ
- 6:31–6:35जगोनो का विर॥के अपन नियम भुजबामे और उक्रापूर्ण करभामे
- 6:35–7:01अगिला एक सो वर्ष्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्
Plain text
नमस्कार, स्रोथ सामगरीक आई नाव आरोचक विष्लेषन में, हमाहा सब के स्वागत करेची. आई हम सब जे विषेपर चर्चा करब, सिसमान नहीं, बलकी मैठली गजलक एक सोसे अदिक वर्षक एकता अदबुत यात्रा थेक. इक ता आहन सपर अच्छी जे अपन त्रूटी पून श्रूवाथ से लोक आई कालिक अट्यान्त सतीक अ अदूनिक महारत दरी पूँचल अच्छी. तो चलू इजान्बा के ले हम्रा संगे बनी रहू. इगव शुरुकर बाँ से पहले चलू आम सब आपन मित्हिलाग उही सम्व्रिद्द साहित्यक संस्क्रूती में चलत्छी कल्प्ना करू, 1905 इस्वी कास्पास के समघे, जखन पन्दित जीवनजा संसंस था, पक कवी लोक नी मेठिली सहित्ते में गजल्क नी उराकी रहल चला. इए उदोर चल जखन किछ नाव ग़बा कुछ साह चरम पर चल. मुदा इजान बहुत जरूरी आफी जी इब भाशाई अग काव्य परमपडा कोनो एक ता राजनीतिक सीमाद्ठरी बान्दल नही आफी. इएक ता अख्व्यन्त जीवन्त अज्वापार संस्क्रतिक परी गतना थेख. एक दधडगन भारत अन नेपाल दूनो देशक समुदायके एक दूसरा सब पडी सुगन्ता सजोडे तची, जना दूता शरी रक एक तप रान होए. आएक हमरी चर्चा मुख्ये रुप सब पाच बहाग में बातल अची. पहल, मैत्ली गजलक परीच्य, दोसर, बहर आम मात्राक नियम, तेसर, प्रारमभेक अनवेशक अक्काज, चोतेम, बदलेद विष्य वस्तू, आप पाचम, आदूनिक महारतक युग. तच्छलू, पहल खंद से शुडूकरेएज्च्य, मैत्टिली गजलक परीच्टाए आएकर एक सताव्दी से अदिक कविकास आब आबाए चे दोसर कहन्द पर बहर आम मात्राकनीम आखेर इगजल चैक की दिख हो गजल कुनो आम कविदा नहीं चीक जे जेहना मुनभेल, जेना विचारायाल, लिख्देल हो। इद्यन्त तक्नी की आखध्होर गनीतिय लैधाल सब भन्धल रहीत अची वरनव्रित वब बहर गजलक उगध्होर डाचाची जही में प्रतेख पातिक मात्रा एक्दम समान सतीक अनिष्चित क्रम में होई वाख चाही इब लगु अदीर गस्वरक गनीत खेख ज़ सरल शब्द में कही तेक तनीक गजल लिखभ कुनु कथिन गनेतिया पहली के सुडजेबासनाची. आब आहा सब के इजान का आश्चर हैत चे समपादक लोकनी एक ता बड़ रोचक बातक रहिस च्यत गातन केलनी चद ये विद्धाएक चिश्वर्वाती रचाईता चला, ओलोकनी मुल नियम सब के बहुत हत गलत भुजलने, ओलोकनी लबूस्वर के दिरग मान लिलने, पाती में एक समान मात्रा क्रमक अंदेखी कै दिलने, अशास्तरिया वा लोग गीतक नियम के, गजल के निमक संगे मिला दिलनी माने लैं मिला बे लेल निमक खोब चुट लिल गेल इविकास क्रम हम्रा लोकनिक आगा पुरा चित्र इसपष्ट कर देता ची उनने सु पाथ सव, उनने सु तीस दरी स्थापना काल चल फिर 1971-1971 सुदार काल आयल जते नियम सबखके कनी मनी तीक कयल गेल. 1971-2008 दरीतनियम अविद्रोज के बीच बकाईदा संगष भेल आ अंद्ता 2008-2022 दरीक समे आदूनिक महारत के युग बनी गेल अची. इदेखा बड दिल्चास पची जे कोना इखला परिपक्ववेल आप देसर खन्दिस बड़ेची जटे हम सब प्रारमभिक अनवेशक लोकनी के देखभ जे ना नीव राकल गेल असुदार बेल पन जीवन जाक इप प्रारमभिक कारजक एक ता जलक देखू अग लिख है चत्छी जे उ सम्वद्र पर्यंत दध हरी सास लेद अ सब के चुछ़प चाएप सहत. यद्ध्ध्धी एकर भकती असमर पन भड़ सुन्दर अची मुदा सम्पादक कन अनुसार इई शुर्वाती गजल सब हमे सं लगबबख सतर सच्सी प्रतिषट मे वरनव्रत वा मात्रा कर्थ रूटी चले बहुनीक चल मुदा व्याक्रन कम को जल मदा इशंग्या चार बडा महत्वो पूरनच मात्रट चार हाँ इक्दम टीक सुनलु आहा सब. मैतली बाशा में सही धाचागत नीम लाबे लेल, कवीवर सीता रामजा, अकाशी कान्त मिश्रु मदूप क, मातर चारेता कठोरता सरजित गजल कावःषक्ता पडले. आई ही चारेता बाजल, मैत्टिली गजला की तिहास में व्याकरनिक शुद्धाता का पकी नीव्राखी दिलक. चारिम खंड, बदलेट विषे वस्तु अद्धाचाक लिल संगर्ष. भीसम सताब दिक अंतिम भाग बडा उतल पुतल वाला चल, एक दिस मुक्त चंदक विद्रोही लोकनी जे पूरस्कारक खोज मे चला आद्दूसर दिस गजल्क आस्ली शिल्प के बचे बाक प्रयास कर आहल कत्होर व्याक्रन विद लोकनी दूनू युख के बीच का अंतर एक दम सपष्ट आची एक दिस जीवन योग, जही में निम शितिल चल, अ भकती पर जोर चल, अ दूसर दिस आई काल एक अंचिनार योग, जते कतोर व्याक्रन, सपष्ट बहर, अ आदूनिक समाजिक विषे वस्तृ प्रमुक अची, अमुर्त भक्तीसा यतार्त दरेक यी एक ता पहग जलांग ची. विशे वस्तू कीना बडली रहल चल, एकर बहतरीन उदारन अची जग्दीस चंद्र ताकृ अनिल कर यी शान्दार शीर. उलिक ही चतीन जे तूतल आर भूकल रहभाक नाम गजल अचे, आजे गर में बेसका गुगल पर दून्या ताक्रहल आजे उगजल आजे इदेखवेद आजे कोना कतोर मात्राक पालन कर अग्काल हूँ विशे वस्तू गगन सुत्रे कर आदूनेक दिनचर्या अईधारत दिस बदली रहल चल अब अबेछ्छी अंतिम क्हन्द पर आदूनिक महारत, जते कत्होर निमक संग जमीनी यतारत छे. इो वर्त्मान युगछे, जते कवी लोकनी कत्होर अरभी बहर आश़्रल मात्रिक बहर पर पुन्रूपे महारत हासिल के लिनेशचत. आई काल एक आदूनिक लेक्हक लोकनी केना कदोर सन्रच्ना का उप्योग कैका निशपक्ष रूप से कदोर यत्हार्थ पच्चाट्चा करे चत्ही से बर नीक सबुजल जा सके तची. अम प्रकाश जा, राजी व्रन्जन मिश, आश्शान्ती लक्ष्मी चोदरी सन्रज्नाकार, जटल बहर का उप्योग कै क, सामाजिक परिवर्तन, गरीभी, आग्रामीन जीवन का पतन सन गेहन विषे सपर लिही रहल चती. अम प्रकाश शाजी की इपानती दिखू, जन गनक सेवक भेल देशक भार चे जरी रहल पेटक आगी बड़हत्यार चे. हम सब एते कोनो विषिष्ट राजनी तेग द्रुष्टिकोनक समर्ठन नहीं कर हैल ची, मुदा स्रोट समगरी इस पश्ट रूप सदेखा रहल ची, जज़ल कीना एक ता समाजिक आलोचनाक सशक्त माद्यमक रूप में विखसिद बहले ची, जाही में समाजक विस्संगतीक पर बिना कोनु लाग लपेटक प्रहार केल गेल गेल आची. इक रासंगे राजीव रंजन मिष्रजीक इपान्ती जिन्गी खेल तमाशाता आसक्संण निराशाता इबर सादारन मदद अत्यंद गंभीर पान्ती इची इए अस्पष्ट करे तची जई आई कालिक अत्यंद अनुशासित मैत्ली गजल में जीवनक अस्तित्ववाडी विषे सबखक कतिग गेरा प्रभाव अविस्तार समाही तची. तव अन्त में ये एक तप पैंक विचारीने प्रश्ना उठहे तच्छ जगोनो का विर॥के अपन नियम भुजबामे और उक्रापूर्ण करभामे अगिला एक सो वर्ष्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्