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मैथिली_गजलक_एक_सदीक_छन्द_इतिहास.m4a
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- 0:00–0:11गजिंद्र ताकृर आ आशीष अंचनार दवारा समपादित विदेसे जुडल मैत्हिली गजल के अटिहासिक सफर पर इहमर एक तवरित समिक्षा अच्छे.
- 0:12–0:18इखोनो साद्दारन कविता संग्रहनही बलकी इह मैत्हिली गजल के एक सदीक,
- 0:18–0:28मने 1952 ू, मात्रात्मक संगर्ष, पतन, आ फेर सो पुनर्जाग्रनक एक ता गजब के एतिहासिग गाता अची.
- 0:28–0:41पहिले जा शुर्वाती दोर के बात करी, तप पन्दित जीवन जा आ यधुनात जा यधुवर सन कवि सबक गजल में चन तचल ले मुदद व्यात्करन्के गल्ती चले.
- 0:41–0:47बूजुजे यह उही सुन्दर गर जका चल जे बिना कोनो पक्कण नक्षाक बनल है.
- 0:47–0:51देखबामेते एक्दमनीक मुदा नेव में मात्राक पागल पन्चले.
- 0:51–0:57तुसर सीता रामजा आम दूप जीसन कवी एगलती सब सुदारलने ही,
- 0:57–1:06मुदा सत्रक दशक से 2008 के भीच योगानन्द हीरा आव विजेनाद जाके चोडी गजल के निमक भारी अवेल नाभेल.
- 1:06–1:14आहा सोचु कि यी कवी सब साहित ते अकादमी पुरसकार पावोक जल्द बाजी में नियम जानी भुजी का तोडल नहीं
- 1:14–1:19जिना कोनो गायक ताल भिसरी का मात्रा बेसुर्वर गप गाभी रहल होए
- 1:19–1:25खेर, 2008 के बाद अंचिनहार युग मे फिर सान्यम कडाई से पालन शुरूब हैल.
- 1:26–1:28अन्त मे एई रितिहास परक बड कतेन अची,
- 1:29–1:33कि एक ता पुरान समपादक सब अपन हिसाब से गजल के वरतनी बदली देलन ही,
- 1:33–1:37जाहीसा उकर मुल लैए पूरन रूपे नष्ट बहगेल
- 1:37–1:39इगते क अच्रज के गबची
- 1:39–1:42जगगर काज रच्ना के सुरक्षित राखभ होएच
- 1:42–1:47उत्बे सुदार कचकर में औस अब गजल के अस्ली आत्मा के मारी दिलन ही
- 1:47–1:51कुल मिलाकर एपोठी मात्र किछ गजल का संग्रहा नहीं
- 1:51–1:57बलकी मेठिली गजल किछण आलै के एक सदीक प्रमानिक अटिहासिक दस्तावेज अची.
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गजिंद्र ताकृर आ आशीष अंचनार दवारा समपादित विदेसे जुडल मैत्हिली गजल के अटिहासिक सफर पर इहमर एक तवरित समिक्षा अच्छे. इखोनो साद्दारन कविता संग्रहनही बलकी इह मैत्हिली गजल के एक सदीक, मने 1952 ू, मात्रात्मक संगर्ष, पतन, आ फेर सो पुनर्जाग्रनक एक ता गजब के एतिहासिग गाता अची. पहिले जा शुर्वाती दोर के बात करी, तप पन्दित जीवन जा आ यधुनात जा यधुवर सन कवि सबक गजल में चन तचल ले मुदद व्यात्करन्के गल्ती चले. बूजुजे यह उही सुन्दर गर जका चल जे बिना कोनो पक्कण नक्षाक बनल है. देखबामेते एक्दमनीक मुदा नेव में मात्राक पागल पन्चले. तुसर सीता रामजा आम दूप जीसन कवी एगलती सब सुदारलने ही, मुदा सत्रक दशक से 2008 के भीच योगानन्द हीरा आव विजेनाद जाके चोडी गजल के निमक भारी अवेल नाभेल. आहा सोचु कि यी कवी सब साहित ते अकादमी पुरसकार पावोक जल्द बाजी में नियम जानी भुजी का तोडल नहीं जिना कोनो गायक ताल भिसरी का मात्रा बेसुर्वर गप गाभी रहल होए खेर, 2008 के बाद अंचिनहार युग मे फिर सान्यम कडाई से पालन शुरूब हैल. अन्त मे एई रितिहास परक बड कतेन अची, कि एक ता पुरान समपादक सब अपन हिसाब से गजल के वरतनी बदली देलन ही, जाहीसा उकर मुल लैए पूरन रूपे नष्ट बहगेल इगते क अच्रज के गबची जगगर काज रच्ना के सुरक्षित राखभ होएच उत्बे सुदार कचकर में औस अब गजल के अस्ली आत्मा के मारी दिलन ही कुल मिलाकर एपोठी मात्र किछ गजल का संग्रहा नहीं बलकी मेठिली गजल किछण आलै के एक सदीक प्रमानिक अटिहासिक दस्तावेज अची.