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भाण_नाटकों_के_मैथिली_अनुवाद_की_समीक्षा.m4a
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- 0:00–0:04आज्छ की इस गें समीख्षा में हम चार प्राषीं संसक्रित भाँन नाटकों
- 0:04–0:10जैसे की पद्मप्राब्रतकम और उभया बिसारिका के उत्क्रिष्ट मैठिली अनुवाद का विसलेशन कर रहे हैं
- 0:10–0:14आज्छ और मैं कहुंगी की इस सामगरी में काफी गेराई है
- 0:14–0:17जिस पर हम बात कर सकते हैं
- 0:17–0:17बिलकोल
- 0:17–0:21तो चली एस सीदे आजके पहले और सबसे महतपृर बिन्दूपर आते हैं
- 0:21–0:26एक आलाप शली में अद्रुष्छे पात्रो के समवादों को सपष्ट्रूप से प्रस्तूत करना
- 0:26–0:28पाटको किलिए एक सहज प्रवाग कनिर्मान करता है
- 0:29–0:31और इमान्दारी से कहुँ
- 0:31–0:33तो जब हम एस अनुवाद को परते है
- 0:33–0:36तो सबसे बडी कमजूरी यही नजर आती है
- 0:37–0:40मतलब, भाड विदा की जो पूरी के पूरी दूरी है
- 0:40–0:42वो है आकाश भाशित
- 0:42–0:44अदल बहवा में बात करना है ना?
- 0:44–0:45इक दम सही
- 0:45–0:49मच पर मुख्ध्पात्र जिसे हम विट कहते है
- 0:49–0:50वो बलकल अकेला है
- 0:50–0:53लेकिन वो लगातार एसे बडटाव करता है
- 0:53–0:55जैसे उसके सामने कोई कहडा है
- 0:55–0:56से इबात है
- 0:56–0:59वो कालपनिक पात्रों की बातें सुनता है
- 0:59–1:01अर महें जोर से दोगर आता है.
- 1:01–1:05समस्या ये है कि इस वर्तमान अनुवाद में
- 1:05–1:10जब विट कहता है कि कहत चते यानी क्या कहरे हैं?
- 1:10–1:14तो उसके बाद आने वाला अद्दिश्ठ्पात्र का समवाद
- 1:14–1:16और विट की अपनी स्वाभाविक प्रतिक्रिया
- 1:16–1:19दोनो एक ही प्रवाह में इस तरा गूल मिल गए है,
- 1:19–1:22कि उने अलक कर पाना बहुत मुष्किल हो गया है.
- 1:22–1:26दिके, इसका सीथा असर पाटख के दिमाग पर पर पर पर पर पर पर.
- 1:26–1:29अगर मैंसे पदने के मनोविग्यान के नजरीये से दिक हूँ,
- 1:29–1:36तो एक आदूनिक पाधख, जो शायत इस प्राची नाट्टे विदा की तकनीकी बारी कियों से पुरी तरा परच्च्ट नहीं है,
- 1:36–1:38उसके लिये ये बेहत थकाओ हो जाता है.
- 1:38–1:42जब आप कोई किताप परते हैं, तो आपका दिमाग अवचेतन रुप से,
- 1:42–1:44अगर पात्र को एक अग़़ावास दे देता है
- 1:44–1:46बिलकोल हम सब एसवी करते हैं
- 1:46–1:49लेकन यहाँ पन्नोपर कोई दिष्ष संकेत या
- 1:49–1:51मतलब विज्यल मारकर नहीं हैं
- 1:51–1:55पात्ख को बार बा रुककर पिछली लाईन पर वापस जाकर यह जाचना परता है
- 1:55–2:00की, रूको, क्या ये बात विट खुछ शुच रहा है, या वो सामने वले की बात दोडारा है?
- 2:00–2:02रहा, यह यह दिखडद है.
- 2:02–2:05यह एक तरह की संग्या नात्मक तखान प्यदा करता है,
- 2:05–2:09जिस से पडने की लै, पुरी तरह से तुछ जाती है.
- 2:09–2:13बिल्कुल, और हमे यह भी समजना होगा कि यह आसा क्यों हो रहा है
- 2:14–2:16जब यही नाटक मंच पर खेला जाता है
- 2:17–2:19तो अभी नेता के पास बहुत सारे अजार होते हैं
- 2:20–2:23जब से, हाँ भाव और आवास बडलना
- 2:23–2:26आप, उचाना कपनी आवास बडल लेता है
- 2:26–2:30उसकी तोन बड़ल जाती है, वो मचछ पर अपनी जगाग़ बड़ल लेता है,
- 2:30–2:33दर्षक तुरन समज जाता है कि अप कोई और बूल रहा है.
- 2:33–2:35तो इसका कोई थो सुदारन देक्तें?
- 2:35–2:39मान लीजी ए, अनवाद में पंक्ती है जहां विट कहता है
- 2:39–2:43की कहत चती आहंग, अगर बाद्दा पर विद कहता है
- 2:43–2:46तो विद कहता है, तो विद कहता है
- 2:46–2:50तो विद कहता है, अगर बाद्दा पर विद कहता है
- 2:50–2:55अब आप बात्रों की आवाज को विट की अपनी आवाज से स्पष्ट्रूप से अलग किया जाए.
- 2:55–2:57तो इसका कोई तो सुदारन देखते हैं?
- 2:57–3:01मान लीजी ए अनुवाद में पंकती है जहां विट केता है
- 3:01–3:05की कहत चत्फी आहंक वेंगेक अर्ठम भुज्गेलूं
- 3:05–3:10अब अगर इसे हम सीदे एक ही फाँट में एक ही पारग्राव के अंदर लिग दें,
- 3:10–3:12तो ये सपाट लगेगा.
- 3:12–3:17इसे सुदहरने किलिए हम इस कल्पिट समवाद वाले हिससे को तिर्चे अखषरो में,
- 3:17–3:19मतलब इतालिक्स में कर सकते है.
- 3:19–3:21आँ, ये एक बहुत अच्छा दरीका है.
- 3:21–3:25या फिर जैसे ही कालपनिक पात्र का समवाच शुरू हो,
- 3:25–3:30हम उसे एक अलग अंदेंटेशन देकर थोड़ा दाई और खिस्का सकते हैं.
- 3:30–4:00आप इसके लिए विशिट कोष्टकों का भी अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अ
- 4:00–4:03अगर हम इस तरह के आदूनिक फरमटिंटूल्स,
- 4:03–4:05जैसे इटालेक्स, कोश्टक्,
- 4:05–4:08या अगर इंदेंटेशन का बहुत अदेकूप्यों करते हैं,
- 4:08–4:13तो क्या इस से प्राचीन शास्त्रिये गरन्त का मुल सो रुप थोडा क्रित्रिम नहीं लगेगा?
- 4:13–4:16आ, ये एक बहुती जायस चन्ता है.
- 4:16–4:20मतलब हम एक जो हजार साल पुराने संसक्रित नाटक का अनुवाद पड रहें,
- 4:20–4:25अगर पन्ना बिलकुल किसी आदूनिक तकनी की मैनूल या कोडिंकी किताप जैसा दिखने लगा,
- 4:25–4:29तो क्या वो उस शास्त्रियता के अह्सास को खब निक देगा?
- 4:29–4:32क्या हम इसे सवबहाविक रकतेवे विए विस पष्ट कर सकते हैं?
- 4:32–4:38दिके, कोई भी नहीं चाहता कि प्राचीन साहित्ते का पन्ना किसी आदूनेक ख़रप्रेट रिपोट जैसा लगे.
- 4:38–5:08अगर बवाज़ा दब पाटक लगाना लगाना लगाना लगाना लगाना लगाना लगाना लगाना लगाना लगाना लगाना लगाना लगाना लगाना लगाना लगाना लगाना लगाना लगाना लगाना लगाना लगाना लगाना लगाना लगाना लगाना लगाना लगाना ल
- 5:08–5:11बहुत इह लगा सु संगत इटालिक फांट काफी होगा
- 5:12–5:15अच्छा मतला बहुत जाडा शोर शराबा नहीं करना है प्रिष्ट पर
- 5:15–5:18एक दम सही, यह पाटको क्रित्रम नहीं बनाएगा
- 5:19–5:21बलकी यह प्राचीन, शुती परमपरा
- 5:21–5:23और आदूनिक पटंशेली के भीच
- 5:23–5:26एक बहुत ही सुन्दर पूल का निर्मान करेगा
- 5:26–5:28और गर पाटक उलजेगा नहीं
- 5:28–5:31तभी वो उस रस और हासे का अनन्द लेपाएगा
- 5:31–5:33जो एं नाटकों की जान है
- 5:33–5:33बलकुल
- 5:33–5:38जो हमें सीथा हमारी चर्चा के अगले महत्वपून पहलु की वोर लेजाता है
- 5:38–5:43प्राचीन संस्क्रत व्यंगे और श्विंगार रस्को आदूनिक मेठ्छली में दालते समए,
- 5:43–5:50बहाशाई संतुलन बनाई रक्ना रच्ना की प्रासांगिकता और प्राच्से को अदिक प्रबाव्शाली बनाता है.
- 5:50–5:54अद्यादिद सामगरी में हम देखते है,
- 5:54–5:56की बोद्द भिख्षु संखले गया,
- 5:56–6:01वयाकरन दध्कलश जैसे जो पाकहन्टी और दिखावर्टी पात्र है,
- 6:01–6:08उनपर मूल संसक्रित में बेहत, टिखा और शान्दार व्यंगे किया गया है.
- 6:08–6:11अद्यादिद सामगरी में है,
- 6:11–6:14आप वे बाट्र काफी प्यास्या अस्पड हैं
- 6:14–6:19लेकिन कमजोरी ये रही है कि अनुवादक ने संसक्रित के उन बारी रूप को
- 6:19–6:23और प्राचीन तक्नी की शब्दावली का बिलकुल अख्षर शह
- 6:23–6:26यानी शब्द शह अनुवाद कर दिया है
- 6:26–6:33अगर कोई चुटकूला सुनाया जाए, और सुन्नेवाले को उसका मतलप समजने के लिए एक सेकंट के लिए बिरुखना पडे, तो उचुटकूला मरजाता है.
- 6:33–6:35एक तम सही कहा अपने.
- 6:35–6:38दिके, हास्ये का पूरा विग्यान ही उसकी ताइमिंग पर निरभर करता है
- 6:39–6:41अगर कोई चॉट्कूला सूनाया जाए
- 6:41–6:43और सुन्ने वाले को उसका मतलप समजने के लिए
- 6:43–6:45एक सेकंट के लिए बी रुकना पडे
- 6:45–6:46तो वो चॉट्कूला मर जाता है
- 6:46–6:48एक तम सही कहा आपने
- 6:48–6:54जब इन नाटको में दद्कलच जैसे पात्रा आते हैं, जो व्याकरन के बहुत बड़े विद्वान होनेका दिखावा करते हैं,
- 6:54–7:24तो वो आपनी बातो में व्याकरन के बारी बरकंट शब्द श्बद अपनी बातोंगे वियाकरन के बारी बरकंट शब्द अपनी बातोंगे बातोंगे बातोंगे वियाकरन के बारी बरकंट शब्द अपनी बातोंगे बातोंगे बातोंगे बातोंगे बातोंगे बातोंगे �
- 7:24–7:27अदर्ट्टीः के सम्थूल्या सम्कालीन सान्सक्रितिक मुहावरो के सात
- 7:27–7:30रखा सा अनुकुलित की आजाना जाहीए।
- 7:30–7:33आप लक्ष ये होना जाहीए की लेखख का विंग्यात्मक उदेशित तुर्ण् स्पष्ट होँजाए
- 7:33–8:03अद्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द
- 8:03–8:08अप बजाए इसके के हम प्राचीन संसक्रत के बारी संदर्मों कुड़ोते रहें
- 8:08–8:12तुब आप बजाए इसके के हम प्राछीन संसक्रत के बारी संदर्मों कुडोते रहें,
- 8:12–8:15इस व्यंगे को इस तराए से प्रस्थूट किया जाँ सकता है,
- 8:15–8:19कि वो आजकी अकादमिक बहेसों की तरा खोखला और हास्यास पडलगे.
- 8:19–8:21ये बहुति सटी कुदारन है.
- 8:21–8:25अब बजाए इसके के हम प्राचीन संसक्रत के बारी संदर्मों कुड़ोते रहें,
- 8:25–8:28इस व्यंग को इस तरा से प्रस्थ॥ किया जा सकता है,
- 8:28–8:32कि वो आजकी अकाद्द्मिक बहसों कितरा कोखला और हस्यास्पड लगे.
- 8:32–8:34ये बहती सटी कुदारन है.
- 8:34–8:38अवन मेठली मोहवरों का इसतमाल कर सकते हैं, जो आजकल के उन्लोगों के प्रवोग होते हैं,
- 8:38–8:41जो हर बात में बेवज़ा का गयान बगारते हैं.
- 8:41–8:43इस से व्याक्ड़ग सीथा पाटख के दिल पर लगेगा.
- 8:43–8:48अगर आप दद्कलश को आजके किसी आजके यह व्यक्ती की तरा दिखाएंगे,
- 8:48–8:53जो चाई की दुकान पर बैटकर भी बहारी अकाडमिक शब्द बुलता है,
- 8:53–8:54तो लोग तुरन्त फसेंगे.
- 8:54–8:56आप, क्यों कि वो से रिलेट कर पाएंगे.
- 8:56–9:03बिल्कुल व्यंगे का उदेश्य उस पाक्हुद को बेनाकाब करना है, नकी पाथक को व्याक्रन सिखाना.
- 9:04–9:07लेकिन क्या ये एक तरा की बेईमानी नहीं होगी?
- 9:07–9:08क्या मतलब?
- 9:08–9:14मिरा मतलब है, ये बिल्कल वैसा है जेसे किसी पुराने जोग को नहीं दरषको के सामने सूनाना.
- 9:14–9:20शब्द भले ही तोडे बड़ल जाए, लिकिन पंच्लाएन की तामिंग और उसका असर एकदम सतीक होना चाहीए.
- 9:20–9:25अदूनिक मोहवरे डलेंगे तो क्या हम मुल लिखखक के सात अन्याय नहीं कर रहें?
- 9:25–9:30आप ये अनुवादकों के बीज चलने वाली सबसे पुरानी बहस है,
- 9:30–9:35कि वफादारी किससे निभानी है, शब्वोंसे या प्रभाव से.
- 9:35–9:40अगर आप शब्दों के प्रती वफादार रहते हैं और हास्से मर जाता हैं
- 9:40–9:45तो मेरी नजर में आपने मूल लिखखके साथ सबसे बड़ा अन्याए किया है
- 9:45–9:48किुकि उसका मुख्य उदेशि तो आपको हसाना था
- 9:48–9:50ये तो सोचने वाली बात है
- 9:50–9:51तो आपको हसाना था?
- 9:51–9:53ये तो सुचने वाली बात है.
- 9:53–9:56अनुकुलन का मतलब ये नहीं है कि हम उस में
- 9:56–9:59आजके समार्ट्फों या अंट्टनेट का जिक्र कर दें.
- 9:59–10:02हम रहेंगे उसी प्राचीन परीवेश मेही.
- 10:02–10:05लेकिन हम उन मुहावरो को चूनेंगे
- 10:05–10:09जो आजके मठली समाज मे भी उसी तरह काम करते हैं
- 10:09–10:12जैसे वो प्राचीन शबद उस समय करते थे
- 10:12–10:14अच्छा मतलब हमें भाव को पख़ना है
- 10:14–10:18आप और जब हम भारी तकनी की शबडों को हटाग़र
- 10:18–10:20� thode adhik suabhavik mohaavre laathe हैं
- 10:20–10:22तो न केवल हास यह देखतर होता है
- 10:22–10:25बलकी कहानी की गती भी जेज होडाती है
- 10:25–10:28किकि जब पाटख को सुचना नहीं परता
- 10:28–10:30तो वो तेजी से आगे बरता है
- 10:30–10:31ये बहुती दिल्चस मोड है
- 10:31–10:34किकि पाटख का अटकनाया तेजी से आगे बरना
- 10:34–10:37सिव शब्दों के चैन पर निरभर नहीं करता
- 10:37–10:40बल की दिश्यों की बनाववट पर भी निरभर करता है
- 10:40–10:40बल कोल
- 10:40–10:42और यही हमारी समीख्षा का
- 10:42–10:44तीस्रा सब से एहम बिन्दू है
- 10:44–10:47लंभे वरनात्मक अंचों के बीच में
- 10:47–10:50नायक की शाररेग गती विधियो का समवेश करने से
- 10:50–10:52कहानी की गती शीलता जीवंट बनी रहती है.
- 10:52–10:59इमान्दारी से कहुँ, तो इस अनुवाद में गती शीलता की समस्या बहुत गेरी है.
- 10:59–11:01हा, मैंने भी एं मैंसुस किया.
- 11:01–11:05इस सामगरी में आपको वसन्त रितु, वर्षा रितु,
- 11:05–11:10और वेशापुरी के बेहत लंभे, काव्यमे
- 11:10–11:12और बहुत ही सुन्दर द्रिष्छ मिलेंगे
- 11:12–11:14बाशा बहुत अच्छी है
- 11:14–11:15कोई शक नहीं इस में
- 11:15–11:18लेकिन सब से बडी कमजोरी ये है
- 11:18–11:20की ये ब्लोक इतने विस्त्रत है
- 11:20–11:23कि वे कता की आगे बडने की गती
- 11:23–11:27यानी पावव़ड मुमेंटम को पूरी तरहा से रोग देते हैं
- 11:27–11:32विट की जो शारिरे की यात्रा है, वो कही जारा है, किसी से मिलने जारा है
- 11:32–11:34वो एक जगर टेर सी जाती हैं
- 11:34–11:36और पाटख बस परता रह जाता है
- 11:36–11:39रहां, पाटख के वल एक स्तिर सुची पडने लकता है
- 11:39–11:44कि आस्मान कैसा दिक्रहा है, हवा कैसी चल रही है, कुनसा प्वूल खिल रहा है?
- 11:44–11:48ये वास्तो में पडने की प्रक्रिया का एक बहुत बडा दोश है,
- 11:48–11:50जिसे हम पोस्ट मूवी सिंड्रोम कैसकतें.
- 11:50–11:51पोस्ट मूवी सिंड्रोम.
- 11:51–11:54अग, कल्पना की जी आप एक फिल्म देख रहे है,
- 11:54–11:56जा नायक सड़क पर चल रहा है,
- 11:56–11:58और आचानक फिल्म रुग जाती है,
- 11:58–11:59पोज उ जाती है.
- 11:59–11:59आच्चा?
- 11:59–12:00रहु.
- 12:00–12:04और आप को सिर्फ पीचे के बैक्ग्राउन की एक सुन्दर पेंटिंग दिखाए जाने लकती है.
- 12:04–12:10कुछ पलों के लिए अच्छा लकता है, लेकिन फिर आब बोर होने लकते हैं क्योगी कहानी आगे नहीं बड़रे है.
- 12:10–12:12एक दम सतीग बात कही आपने.
- 12:12–12:17भान नापकों का पूरा खाका ही एक गतिमान चरित्र के इर्द-गिर्द बूनागया है.
- 12:17–12:21विट लगातार चल रहा है, लोगों से तक्रार रहा है,
- 12:21–12:25लेकिं जब पन्नो के पन्ने सर्फ प्रकरती के वरनन में
- 12:25–12:28खलच होडाते है, तो पाथक का दिमाक कहानी से कटने लकता है.
- 12:28–12:31बलकोल, वो पन्ने पलटकर ये दूनने लकता है,
- 12:31–12:33कि अप आगे क्या हूँँ?
- 12:33–12:38अग, उग़े दिखाओ बताओ मत्वाले सद्धान्त काही एक विस्त्रित रूप है अगना?
- 12:38–12:43एक दम सही, मिरा थो सुजाव यह है कि इन विस्त्रित वरननो को,
- 12:43–12:46केवल स्तिर सुच्यों के रूप में चोडने के बजाए,
- 12:46–12:49इनहे विट्ट की समवेदी प्रतिक्रियाँ,
- 12:49–13:19मिरे मतलब है, संसरी रीकश्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्�
- 13:19–13:24कि बारिश का वरन करते हुए ये दिखाएए कि विट कैसे बारिश कि अचाना काई बोच्ठारो से अपने मेंगे रेश्मी कपडो को बचानी की कोशिष कर रहा है.
- 13:24–13:27औरे वाए ये द्रिषि कितना जीवन्त लकता है.
- 13:27–13:28है ना?
- 13:28–13:30यह द्रिश्ख कितना जीवन्त लकता है
- 13:30–13:32है ना? यह दिखाए गे
- 13:32–13:34कि वो कैसे कीचर से पने कदम बचाते होए
- 13:34–13:36चलांग लगा रहा है
- 13:36–13:38और उसी समें, हवागे जोके से
- 13:38–13:40उसके पास कुटच यह लगा
- 13:40–13:42यह वो भी वो भी वो भी वो भी वो
- 13:42–13:45अपने मेंगे रेश्मी कपड़ों को बचाचानी की कोशिष कर रहा है
- 13:45–13:48औरे वाए ये द्रिषि कितना जीवंट लकता है
- 13:48–13:54है ना? ये दिखा ये कि वो कैसे कीचर से अपने कदम बचाथे होई चलांग लगा रहा है
- 13:54–14:00अर उसी समे हवा के जोके से उसके पास कुटच या कदमब के पूल की गन अकती है
- 14:00–14:03जिसे वो गेहरी सास लेकर महेंसुस करता है
- 14:03–14:06और हवा इतनी तेज है कि उसके कदम लगख़़ा रहें
- 14:06–14:11बिलकुल अब देकिए ये कितना अलग प्रभाव पैदा करता है
- 14:11–14:14अब मोसम सर्फ एक बैग्ग्राउन नहीं है?
- 14:14–14:19आप बारेश विट की यात्रा में एक बादा बन गय है, एक अनुबहव बन गय है.
- 14:19–14:26आसा करने से पर्यावरन सीधे तोर पर विट के शरीर और उसकी समवेदनों के साथ जब जाता है.
- 14:26–14:27एक दम.
- 14:27–14:29बद़ख को असल अगेगा, ज़से वहवी उसी बर साथ में,
- 14:29–14:33कुसुम्पूर की उसी सड़क पर विट के साथ साथ चल रहा है,
- 14:33–14:36और कीचर से बच्च्र रहा है, या वरननो को एक उदेशे देता है.
- 14:36–14:40और प्राचीन भार्टि कावे शास्ट्र भी तो यही कहता है,
- 14:40–14:43रस्की निष्पत्ती केवल उद्दिपन से नहीं होती,
- 14:43–14:45बलकी अनुबहाव से होती है.
- 14:45–14:48यानी पात्र की शारिरेक प्रतिक्रियाव से
- 14:48–14:49सही बात है.
- 14:49–14:54जब हम परीवेश को पात्र की बहुतिक प्रतिक्रिया से जोडते है,
- 14:54–14:59तो वो स्थिर वरनन अच्चानक से प्वो दीमेंचनल अनुबहव में बडल जाता है.
- 14:59–15:01पाटख की अन्द्रिया जाग्रित हो जाती है.
- 15:01–15:09यही वो गती शीलता है जो एस अनुवाद को एक सादारन किताब से उठाग़ एक जीवंद अनुबहव बनादेगी.
- 15:09–15:16तो कुल मिलाकर इस समीक्षामे हमने अनुवादित रच्ना को अदिक प्रभाव शाली बनाने के लिए,
- 15:16–15:18तीन मुख्फिक शित्रों की परताल की.
- 15:18–15:22सब से पहले, आखाश भाशित समवादों को सपष करने के लिए,
- 15:22–15:24विज्यल माकर्स का अप्योख करना.
- 15:24–15:32तुस्रा व्यज्यात्मक समवादो में मेठली के समकालीन मुहावरो का तदका लगाना ताकी हास्से तुरन्त समजाए.
- 15:32–15:41आप अन्त में कता की गती शीलता बनाई रक्ने के लिए लंभे वरनो को विट्के व्यक्तिगत समभे दी अनुबवो के साथ गुत्ना.
- 15:41–15:46बिल्कुल ये वो बारीक लेकिन भेहद शक्तिषाली बडलाव है,
- 15:46–15:50जो एक अच्छे अनुवाद को एक महान पाट्ध में बडल देते है.
- 15:50–15:55मुझे पुरी उमीद है कि इन सुजावों से अनुवाद की वो आत्मा है,
- 15:55–15:57वो और भी अदिक मुखर हो कर सामने आएगी.
- 15:57–16:02श्रोताओ आप इं तोस सुजावों के सात अपनी सामगरी को परष्क्रित करें
- 16:02–16:08और हमे दुबारा अवश्ष बहिजें. हम आपके काम का फिर से विष्लिषन करने किले भेहद उच्सुक हैं
- 16:08–16:11किकि अनुवाद केवल शब्दों का प�ल नहीं है
- 16:11–16:16यह दो गलग गल युगों के अनसानी अनुबहवों को जोडने का एक जीवित तार है
- 16:16–16:22और हमें यकीन है के आपका अगला ड्राफ्ट उस तार को और भी मस्वुती से जोड़ेगा
- 16:22–16:26बलकल. तो अगली चर्चा तक कि लिए आल्विदा
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आज्छ की इस गें समीख्षा में हम चार प्राषीं संसक्रित भाँन नाटकों जैसे की पद्मप्राब्रतकम और उभया बिसारिका के उत्क्रिष्ट मैठिली अनुवाद का विसलेशन कर रहे हैं आज्छ और मैं कहुंगी की इस सामगरी में काफी गेराई है जिस पर हम बात कर सकते हैं बिलकोल तो चली एस सीदे आजके पहले और सबसे महतपृर बिन्दूपर आते हैं एक आलाप शली में अद्रुष्छे पात्रो के समवादों को सपष्ट्रूप से प्रस्तूत करना पाटको किलिए एक सहज प्रवाग कनिर्मान करता है और इमान्दारी से कहुँ तो जब हम एस अनुवाद को परते है तो सबसे बडी कमजूरी यही नजर आती है मतलब, भाड विदा की जो पूरी के पूरी दूरी है वो है आकाश भाशित अदल बहवा में बात करना है ना? इक दम सही मच पर मुख्ध्पात्र जिसे हम विट कहते है वो बलकल अकेला है लेकिन वो लगातार एसे बडटाव करता है जैसे उसके सामने कोई कहडा है से इबात है वो कालपनिक पात्रों की बातें सुनता है अर महें जोर से दोगर आता है. समस्या ये है कि इस वर्तमान अनुवाद में जब विट कहता है कि कहत चते यानी क्या कहरे हैं? तो उसके बाद आने वाला अद्दिश्ठ्पात्र का समवाद और विट की अपनी स्वाभाविक प्रतिक्रिया दोनो एक ही प्रवाह में इस तरा गूल मिल गए है, कि उने अलक कर पाना बहुत मुष्किल हो गया है. दिके, इसका सीथा असर पाटख के दिमाग पर पर पर पर पर पर पर. अगर मैंसे पदने के मनोविग्यान के नजरीये से दिक हूँ, तो एक आदूनिक पाधख, जो शायत इस प्राची नाट्टे विदा की तकनीकी बारी कियों से पुरी तरा परच्च्ट नहीं है, उसके लिये ये बेहत थकाओ हो जाता है. जब आप कोई किताप परते हैं, तो आपका दिमाग अवचेतन रुप से, अगर पात्र को एक अग़़ावास दे देता है बिलकोल हम सब एसवी करते हैं लेकन यहाँ पन्नोपर कोई दिष्ष संकेत या मतलब विज्यल मारकर नहीं हैं पात्ख को बार बा रुककर पिछली लाईन पर वापस जाकर यह जाचना परता है की, रूको, क्या ये बात विट खुछ शुच रहा है, या वो सामने वले की बात दोडारा है? रहा, यह यह दिखडद है. यह एक तरह की संग्या नात्मक तखान प्यदा करता है, जिस से पडने की लै, पुरी तरह से तुछ जाती है. बिल्कुल, और हमे यह भी समजना होगा कि यह आसा क्यों हो रहा है जब यही नाटक मंच पर खेला जाता है तो अभी नेता के पास बहुत सारे अजार होते हैं जब से, हाँ भाव और आवास बडलना आप, उचाना कपनी आवास बडल लेता है उसकी तोन बड़ल जाती है, वो मचछ पर अपनी जगाग़ बड़ल लेता है, दर्षक तुरन समज जाता है कि अप कोई और बूल रहा है. तो इसका कोई थो सुदारन देक्तें? मान लीजी ए, अनवाद में पंक्ती है जहां विट कहता है की कहत चती आहंग, अगर बाद्दा पर विद कहता है तो विद कहता है, तो विद कहता है तो विद कहता है, अगर बाद्दा पर विद कहता है अब आप बात्रों की आवाज को विट की अपनी आवाज से स्पष्ट्रूप से अलग किया जाए. तो इसका कोई तो सुदारन देखते हैं? मान लीजी ए अनुवाद में पंकती है जहां विट केता है की कहत चत्फी आहंक वेंगेक अर्ठम भुज्गेलूं अब अगर इसे हम सीदे एक ही फाँट में एक ही पारग्राव के अंदर लिग दें, तो ये सपाट लगेगा. इसे सुदहरने किलिए हम इस कल्पिट समवाद वाले हिससे को तिर्चे अखषरो में, मतलब इतालिक्स में कर सकते है. आँ, ये एक बहुत अच्छा दरीका है. या फिर जैसे ही कालपनिक पात्र का समवाच शुरू हो, हम उसे एक अलग अंदेंटेशन देकर थोड़ा दाई और खिस्का सकते हैं. आप इसके लिए विशिट कोष्टकों का भी अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अप अ अगर हम इस तरह के आदूनिक फरमटिंटूल्स, जैसे इटालेक्स, कोश्टक्, या अगर इंदेंटेशन का बहुत अदेकूप्यों करते हैं, तो क्या इस से प्राचीन शास्त्रिये गरन्त का मुल सो रुप थोडा क्रित्रिम नहीं लगेगा? आ, ये एक बहुती जायस चन्ता है. मतलब हम एक जो हजार साल पुराने संसक्रित नाटक का अनुवाद पड रहें, अगर पन्ना बिलकुल किसी आदूनिक तकनी की मैनूल या कोडिंकी किताप जैसा दिखने लगा, तो क्या वो उस शास्त्रियता के अह्सास को खब निक देगा? क्या हम इसे सवबहाविक रकतेवे विए विस पष्ट कर सकते हैं? दिके, कोई भी नहीं चाहता कि प्राचीन साहित्ते का पन्ना किसी आदूनेक ख़रप्रेट रिपोट जैसा लगे. अगर बवाज़ा दब पाटक लगाना लगाना लगाना लगाना लगाना लगाना लगाना लगाना लगाना लगाना लगाना लगाना लगाना लगाना लगाना लगाना लगाना लगाना लगाना लगाना लगाना लगाना लगाना लगाना लगाना लगाना लगाना लगाना ल बहुत इह लगा सु संगत इटालिक फांट काफी होगा अच्छा मतला बहुत जाडा शोर शराबा नहीं करना है प्रिष्ट पर एक दम सही, यह पाटको क्रित्रम नहीं बनाएगा बलकी यह प्राचीन, शुती परमपरा और आदूनिक पटंशेली के भीच एक बहुत ही सुन्दर पूल का निर्मान करेगा और गर पाटक उलजेगा नहीं तभी वो उस रस और हासे का अनन्द लेपाएगा जो एं नाटकों की जान है बलकुल जो हमें सीथा हमारी चर्चा के अगले महत्वपून पहलु की वोर लेजाता है प्राचीन संस्क्रत व्यंगे और श्विंगार रस्को आदूनिक मेठ्छली में दालते समए, बहाशाई संतुलन बनाई रक्ना रच्ना की प्रासांगिकता और प्राच्से को अदिक प्रबाव्शाली बनाता है. अद्यादिद सामगरी में हम देखते है, की बोद्द भिख्षु संखले गया, वयाकरन दध्कलश जैसे जो पाकहन्टी और दिखावर्टी पात्र है, उनपर मूल संसक्रित में बेहत, टिखा और शान्दार व्यंगे किया गया है. अद्यादिद सामगरी में है, आप वे बाट्र काफी प्यास्या अस्पड हैं लेकिन कमजोरी ये रही है कि अनुवादक ने संसक्रित के उन बारी रूप को और प्राचीन तक्नी की शब्दावली का बिलकुल अख्षर शह यानी शब्द शह अनुवाद कर दिया है अगर कोई चुटकूला सुनाया जाए, और सुन्नेवाले को उसका मतलप समजने के लिए एक सेकंट के लिए बिरुखना पडे, तो उचुटकूला मरजाता है. एक तम सही कहा अपने. दिके, हास्ये का पूरा विग्यान ही उसकी ताइमिंग पर निरभर करता है अगर कोई चॉट्कूला सूनाया जाए और सुन्ने वाले को उसका मतलप समजने के लिए एक सेकंट के लिए बी रुकना पडे तो वो चॉट्कूला मर जाता है एक तम सही कहा आपने जब इन नाटको में दद्कलच जैसे पात्रा आते हैं, जो व्याकरन के बहुत बड़े विद्वान होनेका दिखावा करते हैं, तो वो आपनी बातो में व्याकरन के बारी बरकंट शब्द श्बद अपनी बातोंगे वियाकरन के बारी बरकंट शब्द अपनी बातोंगे बातोंगे बातोंगे वियाकरन के बारी बरकंट शब्द अपनी बातोंगे बातोंगे बातोंगे बातोंगे बातोंगे बातोंगे � अदर्ट्टीः के सम्थूल्या सम्कालीन सान्सक्रितिक मुहावरो के सात रखा सा अनुकुलित की आजाना जाहीए। आप लक्ष ये होना जाहीए की लेखख का विंग्यात्मक उदेशित तुर्ण् स्पष्ट होँजाए अद्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द अप बजाए इसके के हम प्राचीन संसक्रत के बारी संदर्मों कुड़ोते रहें तुब आप बजाए इसके के हम प्राछीन संसक्रत के बारी संदर्मों कुडोते रहें, इस व्यंगे को इस तराए से प्रस्थूट किया जाँ सकता है, कि वो आजकी अकादमिक बहेसों की तरा खोखला और हास्यास पडलगे. ये बहुति सटी कुदारन है. अब बजाए इसके के हम प्राचीन संसक्रत के बारी संदर्मों कुड़ोते रहें, इस व्यंग को इस तरा से प्रस्थ॥ किया जा सकता है, कि वो आजकी अकाद्द्मिक बहसों कितरा कोखला और हस्यास्पड लगे. ये बहती सटी कुदारन है. अवन मेठली मोहवरों का इसतमाल कर सकते हैं, जो आजकल के उन्लोगों के प्रवोग होते हैं, जो हर बात में बेवज़ा का गयान बगारते हैं. इस से व्याक्ड़ग सीथा पाटख के दिल पर लगेगा. अगर आप दद्कलश को आजके किसी आजके यह व्यक्ती की तरा दिखाएंगे, जो चाई की दुकान पर बैटकर भी बहारी अकाडमिक शब्द बुलता है, तो लोग तुरन्त फसेंगे. आप, क्यों कि वो से रिलेट कर पाएंगे. बिल्कुल व्यंगे का उदेश्य उस पाक्हुद को बेनाकाब करना है, नकी पाथक को व्याक्रन सिखाना. लेकिन क्या ये एक तरा की बेईमानी नहीं होगी? क्या मतलब? मिरा मतलब है, ये बिल्कल वैसा है जेसे किसी पुराने जोग को नहीं दरषको के सामने सूनाना. शब्द भले ही तोडे बड़ल जाए, लिकिन पंच्लाएन की तामिंग और उसका असर एकदम सतीक होना चाहीए. अदूनिक मोहवरे डलेंगे तो क्या हम मुल लिखखक के सात अन्याय नहीं कर रहें? आप ये अनुवादकों के बीज चलने वाली सबसे पुरानी बहस है, कि वफादारी किससे निभानी है, शब्वोंसे या प्रभाव से. अगर आप शब्दों के प्रती वफादार रहते हैं और हास्से मर जाता हैं तो मेरी नजर में आपने मूल लिखखके साथ सबसे बड़ा अन्याए किया है किुकि उसका मुख्य उदेशि तो आपको हसाना था ये तो सोचने वाली बात है तो आपको हसाना था? ये तो सुचने वाली बात है. अनुकुलन का मतलब ये नहीं है कि हम उस में आजके समार्ट्फों या अंट्टनेट का जिक्र कर दें. हम रहेंगे उसी प्राचीन परीवेश मेही. लेकिन हम उन मुहावरो को चूनेंगे जो आजके मठली समाज मे भी उसी तरह काम करते हैं जैसे वो प्राचीन शबद उस समय करते थे अच्छा मतलब हमें भाव को पख़ना है आप और जब हम भारी तकनी की शबडों को हटाग़र � thode adhik suabhavik mohaavre laathe हैं तो न केवल हास यह देखतर होता है बलकी कहानी की गती भी जेज होडाती है किकि जब पाटख को सुचना नहीं परता तो वो तेजी से आगे बरता है ये बहुती दिल्चस मोड है किकि पाटख का अटकनाया तेजी से आगे बरना सिव शब्दों के चैन पर निरभर नहीं करता बल की दिश्यों की बनाववट पर भी निरभर करता है बल कोल और यही हमारी समीख्षा का तीस्रा सब से एहम बिन्दू है लंभे वरनात्मक अंचों के बीच में नायक की शाररेग गती विधियो का समवेश करने से कहानी की गती शीलता जीवंट बनी रहती है. इमान्दारी से कहुँ, तो इस अनुवाद में गती शीलता की समस्या बहुत गेरी है. हा, मैंने भी एं मैंसुस किया. इस सामगरी में आपको वसन्त रितु, वर्षा रितु, और वेशापुरी के बेहत लंभे, काव्यमे और बहुत ही सुन्दर द्रिष्छ मिलेंगे बाशा बहुत अच्छी है कोई शक नहीं इस में लेकिन सब से बडी कमजोरी ये है की ये ब्लोक इतने विस्त्रत है कि वे कता की आगे बडने की गती यानी पावव़ड मुमेंटम को पूरी तरहा से रोग देते हैं विट की जो शारिरे की यात्रा है, वो कही जारा है, किसी से मिलने जारा है वो एक जगर टेर सी जाती हैं और पाटख बस परता रह जाता है रहां, पाटख के वल एक स्तिर सुची पडने लकता है कि आस्मान कैसा दिक्रहा है, हवा कैसी चल रही है, कुनसा प्वूल खिल रहा है? ये वास्तो में पडने की प्रक्रिया का एक बहुत बडा दोश है, जिसे हम पोस्ट मूवी सिंड्रोम कैसकतें. पोस्ट मूवी सिंड्रोम. अग, कल्पना की जी आप एक फिल्म देख रहे है, जा नायक सड़क पर चल रहा है, और आचानक फिल्म रुग जाती है, पोज उ जाती है. आच्चा? रहु. और आप को सिर्फ पीचे के बैक्ग्राउन की एक सुन्दर पेंटिंग दिखाए जाने लकती है. कुछ पलों के लिए अच्छा लकता है, लेकिन फिर आब बोर होने लकते हैं क्योगी कहानी आगे नहीं बड़रे है. एक दम सतीग बात कही आपने. भान नापकों का पूरा खाका ही एक गतिमान चरित्र के इर्द-गिर्द बूनागया है. विट लगातार चल रहा है, लोगों से तक्रार रहा है, लेकिं जब पन्नो के पन्ने सर्फ प्रकरती के वरनन में खलच होडाते है, तो पाथक का दिमाक कहानी से कटने लकता है. बलकोल, वो पन्ने पलटकर ये दूनने लकता है, कि अप आगे क्या हूँँ? अग, उग़े दिखाओ बताओ मत्वाले सद्धान्त काही एक विस्त्रित रूप है अगना? एक दम सही, मिरा थो सुजाव यह है कि इन विस्त्रित वरननो को, केवल स्तिर सुच्यों के रूप में चोडने के बजाए, इनहे विट्ट की समवेदी प्रतिक्रियाँ, मिरे मतलब है, संसरी रीकश्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्� कि बारिश का वरन करते हुए ये दिखाएए कि विट कैसे बारिश कि अचाना काई बोच्ठारो से अपने मेंगे रेश्मी कपडो को बचानी की कोशिष कर रहा है. औरे वाए ये द्रिषि कितना जीवन्त लकता है. है ना? यह द्रिश्ख कितना जीवन्त लकता है है ना? यह दिखाए गे कि वो कैसे कीचर से पने कदम बचाते होए चलांग लगा रहा है और उसी समें, हवागे जोके से उसके पास कुटच यह लगा यह वो भी वो भी वो भी वो भी वो अपने मेंगे रेश्मी कपड़ों को बचाचानी की कोशिष कर रहा है औरे वाए ये द्रिषि कितना जीवंट लकता है है ना? ये दिखा ये कि वो कैसे कीचर से अपने कदम बचाथे होई चलांग लगा रहा है अर उसी समे हवा के जोके से उसके पास कुटच या कदमब के पूल की गन अकती है जिसे वो गेहरी सास लेकर महेंसुस करता है और हवा इतनी तेज है कि उसके कदम लगख़़ा रहें बिलकुल अब देकिए ये कितना अलग प्रभाव पैदा करता है अब मोसम सर्फ एक बैग्ग्राउन नहीं है? आप बारेश विट की यात्रा में एक बादा बन गय है, एक अनुबहव बन गय है. आसा करने से पर्यावरन सीधे तोर पर विट के शरीर और उसकी समवेदनों के साथ जब जाता है. एक दम. बद़ख को असल अगेगा, ज़से वहवी उसी बर साथ में, कुसुम्पूर की उसी सड़क पर विट के साथ साथ चल रहा है, और कीचर से बच्च्र रहा है, या वरननो को एक उदेशे देता है. और प्राचीन भार्टि कावे शास्ट्र भी तो यही कहता है, रस्की निष्पत्ती केवल उद्दिपन से नहीं होती, बलकी अनुबहाव से होती है. यानी पात्र की शारिरेक प्रतिक्रियाव से सही बात है. जब हम परीवेश को पात्र की बहुतिक प्रतिक्रिया से जोडते है, तो वो स्थिर वरनन अच्चानक से प्वो दीमेंचनल अनुबहव में बडल जाता है. पाटख की अन्द्रिया जाग्रित हो जाती है. यही वो गती शीलता है जो एस अनुवाद को एक सादारन किताब से उठाग़ एक जीवंद अनुबहव बनादेगी. तो कुल मिलाकर इस समीक्षामे हमने अनुवादित रच्ना को अदिक प्रभाव शाली बनाने के लिए, तीन मुख्फिक शित्रों की परताल की. सब से पहले, आखाश भाशित समवादों को सपष करने के लिए, विज्यल माकर्स का अप्योख करना. तुस्रा व्यज्यात्मक समवादो में मेठली के समकालीन मुहावरो का तदका लगाना ताकी हास्से तुरन्त समजाए. आप अन्त में कता की गती शीलता बनाई रक्ने के लिए लंभे वरनो को विट्के व्यक्तिगत समभे दी अनुबवो के साथ गुत्ना. बिल्कुल ये वो बारीक लेकिन भेहद शक्तिषाली बडलाव है, जो एक अच्छे अनुवाद को एक महान पाट्ध में बडल देते है. मुझे पुरी उमीद है कि इन सुजावों से अनुवाद की वो आत्मा है, वो और भी अदिक मुखर हो कर सामने आएगी. श्रोताओ आप इं तोस सुजावों के सात अपनी सामगरी को परष्क्रित करें और हमे दुबारा अवश्ष बहिजें. हम आपके काम का फिर से विष्लिषन करने किले भेहद उच्सुक हैं किकि अनुवाद केवल शब्दों का प�ल नहीं है यह दो गलग गल युगों के अनसानी अनुबहवों को जोडने का एक जीवित तार है और हमें यकीन है के आपका अगला ड्राफ्ट उस तार को और भी मस्वुती से जोड़ेगा बलकल. तो अगली चर्चा तक कि लिए आल्विदा