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३००_मजदूरों_की_मौत_और_सरकारी_झूठ.m4a
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- 0:00–0:09तब आदिबेट में आपका स्वागत है, खलपना कीजी ए, एक पूल गिरता है, मलबे के नीचे कोई तीन सो मस्व्दूर दबकर मर जाते है.
- 0:09–0:11एक बहुत फीज बहयाना कहाथ सा?
- 0:11–0:13बिल्कुल. बहयाना कहाथ सा.
- 0:13–0:17लिकिन मजी की बात देखिये जब आप सरकारी रजिस्टर खोलतेना
- 0:17–0:19तो वहां सर्फ तीस नाम लिखे होतें
- 0:19–0:22मबलाब बाकी के दोसो सतर लोग कहां गय
- 0:22–0:24वो कागस पर कभी ते ही नहीं
- 0:24–0:26गायआप कर दिएगे
- 0:26–0:27बलकल
- 0:27–0:33तो आज हम गजेंदर ताकृर के बहुती चर्चट उपन्न्यास गोही सबख भीच जल समादी
- 0:33–0:35इसके बाल संसकरन पर चर्चा कर रहे हैं
- 0:35–0:38गर नारी केल गाँएं की प्रिष्ट बूमी पर लिखिए ये कहानी
- 0:38–0:41एक बहुति गेरा सवाल उठाती है
- 0:41–0:42सही कहा
- 0:42–0:48सवाल ये है कि जब सथ्टा सच्चाई को लोगों के अस्थित्ट्टो को ही अपने रिकोट से मिताने की कोशिष करती है
- 0:48–0:50तो सथ्टिको बचाता कोन है
- 0:50–0:53दिके मैं इस बात का पक्ष्दर हूँ, कि सत्तिक अन्तिम रक्षा
- 0:53–0:58अग, हमारी लोग स्म्रिती, प्रक्रती और मोखिक परम्प्राद वारा ही होती हैं
- 0:58–1:02कुकि मड़ब कागज और सिस्टम ये तो हमेशा ताकतवर के हाथो बिख सकते है ना
- 1:02–1:07वं, मैं इस बात को दिके बलकल अलग नजर्ये से देकती हूं
- 1:07–1:11मेरा मानना है के जो सामूहिक स्म्रिती है
- 1:11–1:16वो हमे ये ज़रोर याद दिलाती है के हमारे सात अन्याय हूँआ है
- 1:16–1:18पर क्या वो न्याय दिलासकती है?
- 1:18–1:20मुझे नहीं लकता
- 1:20–1:23सत्ता के क्रूर शवट्यंत्रों को रहाने के लिए
- 1:23–1:27आपको अंता था उसी के हत्यारों का अईस्तमाल करना परता है
- 1:27–1:28मदलों उसी सिस्तम का
- 1:28–1:34आा, मतलप उस संस्तागद दस्तादेजी करन, पक्के सबुद और लीगल फाँल्स,
- 1:34–1:40यादो से आप आप रो सकते हैं, पर दोश्यों को सजा सब सबुद इलाते हैं.
- 1:40–1:43आच्छा, तो चलिये इसी बाथ से चर्षा की शुर्वात करते हैं.
- 1:43–1:48अपन्यास में आप देकती हैं के से सिस्तम कागज का इस्तमाल कर के लोगों की हत्या करता है.
- 1:49–1:52तब आँ, सर्यू जैसी महिला मस्दूर का उदारान ही ले ले लिजि.
- 1:52–1:55वह जो अपने पती के नाम पर काम कर रही थी.
- 1:55–1:59बलकुल वो अपने म्रित्पती के नाम पर काम कर रही थी
- 1:59–2:04और जब पुल गिरा उसकी मुद फुई, तो सिस्टम के पास उसका कुई नाम ही नहीं था
- 2:04–2:07वो रजिस्टर से पूरी तरा गायप कर दी गए
- 2:07–2:09कागज ने उसकी पहचान ही मिता दी
- 2:09–2:12लिकिन आप दिक्ये गडनारिकिल के लोग इसे कैसे देक्ते है?
- 2:12–2:14वहां किताबे नहीं पडी जाती.
- 2:14–2:15वहां जीवन जी आजाता है.
- 2:15–2:18आपने वो चन्ना गाची वाला द्रिषे तो पड़ाई होगा?
- 2:18–2:21आप आप जावो आत्माई कबद्टी खेलती है.
- 2:21–2:31आप हमारे श्वता शवट शवट शोच रहुगे कि भाई न्याय और सिस्टम की इस इतनी गंभीर और आदूनिक चर्चामे हम भूतों और कबद्टी की बात क्यों कर रहे हैं?
- 2:31–2:32रिलकुल सबाल तो उट्ता है
- 2:32–2:35लेकिन यहा भूथ कोई आंद विष्वास नहीं है
- 2:35–2:39ये उन गुम आम लोगों की सामूनिक स्म्रिती का एक रूपक है.
- 2:39–2:41जब सिस्टम आम बूल जातायना,
- 2:41–2:43तब चन्ना गाची पर वो आत्माए,
- 2:43–2:45आम बचाओ कबदी खेलती हैं,
- 2:45–2:47ताकी बुला दिये गे आम,
- 2:47–2:49हवामे मिटी में जिंदा रहें.
- 2:49–2:53लद्तर ताकृर ने अपने बिटे को एक बहुत बडी शीक दी थी
- 2:53–2:55की कागज हमेशा जुड बोल सकता है
- 2:55–2:58हा, कागज हमेशा जुड बोल सकता है
- 2:58–3:01इसलिये मिट्टी और पैसे की गंद को पहचानना सीको
- 3:01–3:05ये ज़़ बात का सबूथ है के सत्ते का आस्ली गर नवो मान्विय चेतना है
- 3:05–3:09किसी सरकारी अदिकारी के हात में रक्खार रजस्टर नहीं?
- 3:09–3:14आपकी बात में एक बहुत गेहरी मतलब एक कावे आत्मक अपील है
- 3:14–3:19और मैं समशती हूं के गर नारी केल के लोगों के लिए वो मिट्ती क्या माइने रकती है
- 3:19–3:22लोक स्मिती या ये भूथ प्रेत की जन्ष्रूतिया
- 3:22–3:26एक तराका रिजिस्टन्स है, एक प्रती रोद है
- 3:26–3:28लेकिन सरा प्रक्टिकलो कर सूथची है ना
- 3:28–3:30प्रक्टिकल कै से
- 3:30–3:35मतलब, क्या इन बहावनावो से सत्ता के मगर मच्षो को दराया जा सकता है?
- 3:35–3:36बिलकुल नहीं.
- 3:36–3:40अगर आपको सत्ता से लडना है, तो आपको एक समआनानतर,
- 3:40–3:43लेकिन जाडा सच्चा लिकोड़ क़ा करना होगा.
- 3:43–3:46बब़ई मतलब आप फीर से उसी ब्रष्ट कागस पर बरोसा करने की बात करने है?
- 3:46–3:49नहीं नहीं, मैं सही कागस की बात करने हूं
- 3:49–3:51आप नन्दी अरुनी का किर्दार देखिये
- 3:51–3:54वो उस पूल परियोजना के यंजीनेर तेराइट
- 3:54–3:57जब पल गिरा तो वो केवल यादों के सारे बेटकर नहीं रोए.
- 3:57–4:00उनो उस दर्द को एक दाईरी में दरज किया.
- 4:00–4:01चबाक का हिसाब.
- 4:01–4:03जी चबाक का हिसाब.
- 4:03–4:07उनो उने सत्ते को एक असा दस्तावेज बनाया जिसे कोई मिताना सके.
- 4:07–4:14उन्व ले उस दाईरी की उन्व तीन अलग गलक प्रत्या बनाई और उने सुरक्षिद जगवव पर चिपा दिया.
- 4:14–4:17और इसका असर कहान दिखा? दश्षको बाद.
- 4:17–4:47आब आप द़ब बवाँद बवाँद बवाँद बवाँद बवाँद बवाँद बवाँद बवाँद बवाँद बवाँद बवाँद बवाँद बवाँद बवाँद बवाँद बवाँद बवाँद बवाँद बवाँद बवाँद बवाँद बवाँद बवाँद ब
- 4:47–5:17साखशे की प्रक्रती, मतलब नेच्र अप अवड़िएज़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़�
- 5:17–5:22नन्दि आरूनी अदालत के माल खाने मेरे रखे बिसेसर के उस जूते को देकते हैं.
- 5:22–5:28उस जूता पानी मे भीग गया था. उस जूते से पानी तपकने की चपाक की आवाज आती है.
- 5:28–5:32अब यह चपाक कोई बहुते गटन बर नहीं है.
- 5:32–5:37ये प्रक्रती का उस म्रत व्यक्ती की आत्मा का विद्रो है
- 5:37–5:41वो आवाज उस कागजी सिस्तम को चिडहा रही है
- 5:41–5:46स्म्रती उस अद्रष्ष तिजूरी की तरह है जिसकी चाभी सत्ता के पास नहीं होती
- 5:46–5:51जब की कागज, कागज तो एक आँसा ताला है, जिसे कोई भी ब्रष्ट अफसर तोर सकता है.
- 5:52–5:55वो जूता, वो कडा, महस वस्तूए नहीं है.
- 5:55–6:01वे उन लोगो के अस्तित्वो के चीखते हुए गवा है, जिने कागज ने मार डाला था.
- 6:01–6:06अग, मुझे खेद है पर मैं इस बात को इस तरहे से नहीं देख बारे ही हूं.
- 6:06–6:12आप माल खाने की बात कर रहे हैं तु चलिए माल खाने से निकल कर अदालत के अंदर चलते हैं.
- 6:12–6:13चलिए.
- 6:13–6:16जब नन्दी अरुनी उन वस्तूं को लेकर गए,
- 6:16–6:25तो विदेशी कमपनी के वकील बदूकनात, हर्यरनन ने तोहाती तन्धेपन से बिना किसी पष्थावे के नहीं उने खारइच कर दिया.
- 6:25–6:30उसने क्या कहा? ये सब भावना की वस्तू हो सकती हैं. वैदानेक साक्षे नहीं.
- 6:30–6:32उस्टम इक भावनाहीन मशीन है.
- 6:32–6:35अगर नन्दी आरूनी ने वो डारी नहीं बनाई होती,
- 6:35–6:39तो भिस्शर का वो जुता माल खाले की दुईटी तुवावनाई प्रजाँजाग.
- 6:39–6:43उसे शर्क ताना उसे शिस्तम को मैनिपिलेट कर रा था अपने फाइदे के लिए?
- 6:43–6:46वो कुतर्क हो सकता है, बिलकुल हो सकता है,
- 6:46–6:49लेकिन सच यही है कि नियाई प्रनाली उसी कुतर्क,
- 6:49–6:52उसी लोगिक पर काम करती है,
- 6:52–6:54शिस्तम एक बहावनाहीन मशीन है.
- 6:54–7:01अगर नन्दि आरुनी ने वो डाईरी नहीं बनाई होती, तो बिसे सर का वो जूता माल खाले की दूल में सथ जाता.
- 7:01–7:06उस चपाक की आवाज से आप किसी समवेदन शील अन्सान को रुलातो सकते हैं,
- 7:06–7:10लेकिन आप उस आवाज से सिस्टम को सजा नहीं दे सकते.
- 7:10–7:15इसे यह बाद में आप देखिए, उसी आदालत में जब सत्टिवरत महता,
- 7:15–7:21जैसे इमान्दार वकी लातें, तो उने भी सरकारी अभी लेकों और रिकोट्स को लिए कोजना पड़ता है.
- 7:21–7:26तो तो बग़ा था बग़ा था था आतमाए कितनी भी आवाजे क्यो ना करें
- 7:26–7:28आप आप राद्यो को जेल नहीं भेसकते।
- 7:28–7:34तीख है चल ये मान लेते हैं की पुराने सिस्तम में फाईले और रिकोट जरूरी थे
- 7:34–7:38लेकिन आप देक्ये सथ्ता हमेशा केवल कागस तक सीमित नहीं रहती
- 7:38–7:40जैसे-जैसे तकनीक बडलती है
- 7:40–7:42लोगों को मिताने का तरीका भी बडलका है
- 7:43–7:46जो काम पहले सरकारी फाइलो में रहीर फेर करके होता था
- 7:46–7:48वही आप दिजितल दूनिया में हो रहा है
- 7:48–7:51उपन्यास का एक बहुती शान्दार रूपक है,
- 7:51–7:54श्क्रीन के गोही, मतलब, दिजिटल मगर मच.
- 7:54–7:59रहा, ये हिस्सा मुझे भी बहुत प्रसंगेक लगा.
- 7:59–8:02ये कहानी को आजके समय से सीथा जोर देता है.
- 8:02–8:06विल्कुल, पहले तो कबतरा सरफ कागस तक सीमित था,
- 8:06–8:09जिसे आप पार सकते थे जला सकते थे
- 8:09–8:12लेकिन आभ ये खत्रा अद्रिष्षे है
- 8:12–8:15जर आप यस मगर मच्छ वाले रूपक को समचते हैं
- 8:15–8:19जैसे एक मगर मच्छ शानत पानी के नीचे चिपकर
- 8:19–8:21अपने शिकार का इंतदार करता है
- 8:21–8:24और प्यर अचाने को से गेहरे पानी में खीच लेता है,
- 8:24–8:26वैसे ही ये दिजिटल फ्रोट श्टर्स,
- 8:26–8:29श्क्रीन के पिछे से चिप कर वार करते हैं.
- 8:29–8:31वो अद्रिश्षे रहेते हैं.
- 8:31–8:33गाँ कही एक लगका उज्वल,
- 8:33–8:35अनलाईं गेमिंग और
- 8:35–9:05तो अगर नाँगा बाद़ा बाद़ा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा �
- 9:05–9:09इस में कोई सन्देह नहीं है कि तकनी का एक बहुती दरावना और स्याह पहलू है
- 9:09–9:12जो शोशन के नेई तरीके इजाद कर रहा है
- 9:12–9:14और इन स्क्रीम के गोही से मुकाबला कैसे होता है
- 9:14–9:16क्या कोई दिजितल फायल कामाती है?
- 9:16–9:19नहीं, यहा मानविय चेतना
- 9:19–9:22तो उज्वल की उदास और भद्की हूँई आत्मा से मिलते है,
- 9:22–9:25तो उज्वल की उदास और भद्की हूँई आत्मा से मिलते है,
- 9:25–9:29तो उज्वल की उदास और भद्की हूँई आत्मा से मिलते है,
- 9:29–9:31तो उज्वल की बास्वर नहीं बताते,
- 9:31–9:33वही द्हाल बनती है. अच्छा?
- 9:33–9:39राई. जब चन्ना गाची के भूछ उज्वल की उदास और भद्की हुई आत्मा से मिलते है,
- 9:39–9:41तो वो उसे कोई पास्वर नहीं बताते.
- 9:41–9:44वो उसे अपना नाम याद रखने को कैते है.
- 9:44–9:49ये इस बात कप्रतिक है कि जब दिजटल दूनिया आपको एक कोड बनाकर मार देना चाहती है,
- 9:49–9:55तब आपकी मानविय पहचान, आपकी लोग स्म्रती ही आपको वापस अन्सान बनाती है.
- 9:55–10:01दिखी ये एक बहुती इमोशनल बात है, पर जर जमीनी हकिकत देखी है.
- 10:01–10:04वूट उज्वल को नाम याध दिलाते हैं
- 10:04–10:07तेके लेकिन वो से नवरने से बचाप आते हैं
- 10:07–10:09उज्वल आत्मठ्या कर लेता है
- 10:09–10:11फूल मती को किडनाप कर लिया जाता है
- 10:11–10:15पूरानी कहानियो और यादोने उने नहीं बचाया
- 10:15–10:18मेरे सवाल यह कि इस सक्रीन के गोही को
- 10:18–10:22अद्तता हराया कैसे गया? क्या केसी लोग कता से?
- 10:22–10:24मान्विय साहस से हराया गया
- 10:24–10:27अद्विय साहस से, लेकिन उस साहस ने
- 10:27–10:31हत्यार के रूप में तकनीक अडेता का ही अप देटा की आ.
- 10:31–10:34अप देखिये, जब गोप कुमार, जो एक अडेटर है,
- 10:34–10:36इस पूरे मामले में उतरता है,
- 10:36–10:40तो वो चन्नागाची के पास जाकर भूतो से बात नहीं करता.
- 10:40–10:42वो फाईलों की जाज करता है.
- 10:42–10:44वो एन आर सवंटी सेवन,
- 10:44–10:47जैसे पूराने कोड को दीकोड करता है.
- 10:47–10:49वो देटा के जर यह यह स्थापित करता है,
- 10:49–10:52कि जो लोग आज दिजिटल फ्रोट चलारे हैं,
- 10:52–10:55जो मेटिकल सप्लाई में दोखा द़ी कर रहे हैं,
- 10:55–10:59ये वही लोग हैं, जो दश्कों पहले उस पुल गोताले से जुडे थे.
- 10:59–11:02देटा ने उस पातन को पक्डा, जिसे अनसान बूल गय थे.
- 11:02–11:09ब्रेरना मिट्टी से मिल सकती है, पर लडाई तो सिस्तम के तूल से ही लडी गगाईना, आप फुल्मती के बचाव अब्यान का ही मेकनिзम देख है.
- 11:09–11:13जब शोद कर्मी सोम्या रामा आपन को ये पता चलता है के फुल्मती को कहाँ बंदध बनाया गया है,
- 11:13–11:43अप प्ल्मती के बचाव अभ्यान का ही मेकनिजम देखेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेईगेईईई
- 11:43–11:50सोम्म्या ने तक्निक के उस अकेले पन को, उस जुट को काटने किलिए पार दर्षी तक्निक का इस्तमाल किया.
- 11:50–11:54लाईव ब्रोट्कास ने उस बंद कम्रे को पूरी दुन्या के सामने क्छोल दिए अ.
- 11:54–11:58तक्निक के काले जुट को दिजिटल एविडिन्स नहीं रहाया.
- 11:58–12:01प्वल्मती को सुम्या के समाथपोन के कम्रेने बचाया
- 12:01–12:05तीक है, मैं मानता हो की सुम्या ने कम्रे का अच्तमाल किया
- 12:05–12:08लेकिन आप उस द्रिष्ष्ट्ग की आस्ली आत्मा को मिस कर रही है
- 12:08–12:09वो कैसे?
- 12:09–12:12ज़र आद कीजे ज़व तरवाजा खुलता है,
- 12:12–12:14कम्रा चालो है, दूनिया देख रही है.
- 12:14–12:16लेकिन फूल्मती,
- 12:16–12:18कम्रे के सामने ये नहीं कहती,
- 12:18–12:20के मेरा देटा सुरक्षित करो,
- 12:20–12:21या मेरा कोड अप्म नहीं है.
- 12:21–12:24वो अपनी पूरी ताकथ से कहती है.
- 12:24–12:26हमर नाम पूल्मती आची
- 12:26–12:28मतलब मेरा नाम पूल्मती है
- 12:28–12:30वो अपनी अस्मिता
- 12:30–12:31अपनी पहचान
- 12:31–12:33अपनी मोखिक सत्यता को
- 12:33–12:35उस दिजिटल दुनिया के चहरे पर देमारती है
- 12:35–12:38अगर उसके भीतर अपना नाम याद रक्ने की
- 12:38–12:40वो सांसक्रितिक स्प्रिती नहीं होती
- 12:40–13:10तो तो बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद
- 13:10–13:13और यही से हम अपने सबसे अन्तिम और
- 13:13–13:16मुझे लकता है सबसे महत्तुपून सवाल की और मुडते हैं
- 13:16–13:18आखिर न्याय का अन्तिम पत क्या है
- 13:18–13:21सत्या की अन्तिम विजे का आदार क्या है
- 13:21–13:24क्या न्याय के लग याद रखने से मिल जाता है
- 13:24–13:27या उसके लिए एक सक्रिया संस्तागत लडाई अनिवाले है
- 13:27–13:30ये स्पूरी चर्चा का, केंद्र बिन्दू है
- 13:31–13:32आप क्या मानते है?
- 13:32–13:37देखे, मेरा द्रद विष्वास है कि अस्ली न्याय की श्रवात कोट्रूम है नहीं
- 13:37–13:43बलकी तब होती है, जब गर नारी के बच्चे खेल खेल में उन तीन सो म्रित मस्टूरो के नाम याद कर लेते हैं.
- 13:45–13:50जब सरकारी सुची तीस पर आके रुग ग़ी तब उन बच्चों की स्म्रिती में,
- 13:50–13:52वो गिन्ती तीन सो तक पहुज ग़ी ती.
- 13:52–13:55अर उपन्यास का अंत कितना शक्तिषाली है,
- 13:55–13:58पीपल के पत्तों की नसें एक नक्षा बनाती है,
- 13:58–14:00गर नारी केल की जमीन से लेकर,
- 14:00–14:03दिल्ली और विदेशी विष्वा विद्ड्यालेंगो तक का नक्षा.
- 14:03–14:06ये कोई सादारन रूपक नहीं है,
- 14:06–14:10ये सिद करता है कि लोग आत्मा जो प्रक्रती में बस्ती है,
- 14:10–14:13वही वैश्विक न्याय का शुर्वाती और सबसे मस्वुद बिंदू है.
- 14:14–14:16जब तक वो बच्चे उन आमों को जिन्दा रख्खेंगे,
- 14:16–14:21दून्या का कोईबी रागवन सोमानी या चंद्रपाल बत्ता उस सत्तिको दफन नहीं कर सकता.
- 14:22–14:24न्याय सर्फ अप्रादियों को जेल में डालना नहीं है.
- 14:25–14:27न्याय ब्रमाण में सत्तिकी पुनर स्थापना है.
- 14:27–14:31अदियाए का वो अन्तिम पत, वो आग, कानूनी और संस्त्ठागती होता,
- 14:32–14:36अदियाए का अदियाए का वो अपन, अदियाए का वो अपन,
- 14:37–14:41अदियाए का वो अपन, अदियाए का वो अपन, अदियाए का वो अपन,
- 14:42–14:45अदियाय का वो अपन, अदियाय का वो अपन,
- 14:45–14:50अगर बदा बदा बदा गिरो हो मीरा की निजी तस्वीरें और जानकारी चूराकर उसे दमकाता है कि वो जाँच में मदद नकरें।
- 14:50–14:57उसे हवाचाही होती है, न्याए का वो अन्तिम पत, वो आग, कानूनी और संस्तागत ही होता है.
- 14:57–15:03मीरा का उदारन देखिये, जो उसी गर नारीकेल वंष की एक सदस से है.
- 15:03–15:05आज, जिसे ब्लाक मेल की आग गया था?
- 15:05–15:11बिल्कुल, चंद्रपाल बता का गिरो हो मीरा की निजी तस्वीरे और जानकारी चूराकर,
- 15:11–15:13उसे द्हमकाता है कि वो जाँच में मदडद नकरे.
- 15:13–15:16अब इस पोईंट पर मीरा क्या कर सकती ती?
- 15:16–15:20वो गर बेट कर पुरानी कहानियो से हिम्मत मांग सकती ती?
- 15:20–15:22लिकिन वो स्व्फ प्रार्ठना नहीं करती,
- 15:22–15:24वो दर को पीचे चोरती है,
- 15:24–15:26पूलेस और अदालत तक जाती है,
- 15:26–15:29और मैजिस्ट्रेट के सामने अपनी कानुनी गवाही,
- 15:29–15:31अपना लीगल स्थेट्में दर्ज कराती है.
- 15:31–15:34उसे वहाई बहुती कमाल की बात कही ती.
- 15:34–15:36दर का मालिक एक ही है.
- 15:36–15:39इस दायलोड का मतलप समच्ञीए.
- 15:39–15:43वु समच गई ती की चाहे वु दश्खो पुराना पूल का गोताला हो
- 15:43–15:45या आज का सक्रीन का गोही,
- 15:45–15:48ये सब एक ही संगत्हित अप्राद,
- 15:48–15:50एक ही नेकससस का हिस्सा है.
- 15:50–15:53और चुंकी ये अप्राद इतना अगनाइज्ट है,
- 15:53–15:56उस जाल को तोडने किलिए उसे कानुन और विवस्थागे,
- 15:56–16:00बीतर से ही उसी के नियमो से चुनाती देनी पडी.
- 16:00–16:02लेकिन मीरा को उस चाहस मिला कहाँ से?
- 16:02–16:05क्या उस चाहस उसे किसी सरकारी मैनुल से मिला?
- 16:05–16:10अगर गोप कुमार ने उस अदिट फाल के नमबरस के सात माता है
- 16:10–16:16अगर दाईरी के दाईरी के तीन हिसे करके उने जुबाया नहीं होता
- 16:16–16:21अगर गोप कुमार ने उस अदिट फाल के नमबरस के सात माता होता
- 16:21–16:51अदर वाज़े प्रज़ादा जब बाज़ादा जब बाज़ादा जब बाज़ादा जब बाज़ादा जब बाज़ादा जब बाज़ादा जब बाज़ादा जब बाज़ादा जब बाज़ादा जब बाज़ादा जब बाज़ादा जब बाज़ादा जब बाज़ादा ज�
- 16:51–16:56संस्तागत्रुब से अन्पेपर अप्रादियों को कद्गरे में ख़ागता है.
- 16:56–16:59स्म्रिती उस इमारत की नीव ज़ोर हो सकती है.
- 16:59–17:05लेकि न्याए का वो दाचा हमेशा साख्शों और कानुनी ल़ाई की इटो से ही ख़ाई होता है.
- 17:05–17:35वूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ�
- 17:35–17:37अगा गाची ने उन नामों को कभी मरने नहीं दिया,
- 17:37–17:40जेने सथ्ता ने अपने कागस से बेशर्मी से मिता दिया दिया था.
- 17:40–17:44सथ्तिय अन्तता हकिसी फाईल या किसी फुल्डर का मुताज नहीं होता,
- 17:44–17:48वो मान्वी अस्म्रिती और प्रक्रती की गोद में हमेशा सुरक्षित रहता है
- 17:48–17:51जब कागस भिक्कर गल जाता है तब भी माल खाने में रहा हो जुता
- 17:51–17:55अपनी चपाक की अवाच से सिस्टम को उसकी अगाद याद दिलाता रहता है
- 17:55–18:03अगर मैं आपने पक्ष को समेटू तो मैं कहुंगी की ये उपन्यास हमें बहुती कडवी सच्चाई सिक आता है.
- 18:03–18:08सच्ट्यो को बचाने के लिए स्व्फ भावनाए ये अस्म्रितिया पर्याप्त नहीं है.
- 18:08–18:12यादे हमें ये ज़ूर बताती है कि हमने क्या कोया है.
- 18:12–18:14वो हमें लड़ने का खारन देती हैं,
- 18:14–18:17लेके न्याय की वो लड़ाय तब तक अदूरी हैं,
- 18:17–18:20जब तक की नंदी, आरुनी, गोप कुमार,
- 18:20–18:22और मीरा ज़े से साहसी लोग,
- 18:22–18:24उन यादों को अकार्ट्टे प्रमानो,
- 18:24–18:28दाईरियो और संस्त्थागत दस्थावेजो में न बबढल दें
- 18:28–18:30अगर आप सिस्टम से लडना चाते हैं
- 18:30–18:32तो आपको सिस्टम की बाशा आनी चाहीए
- 18:32–18:35स्म्रिती हमें अन्सान बनाती है
- 18:35–18:37लेकिन सबुद हमें न्याए दिलाते हैं
- 18:37–18:38बलकुल
- 18:38–18:43ये सच्छ्मुच एक आईसा विषे हैं जिस पर कोई एक द्र्स्टिकोन कभी पूर्ड नहीं हो सकता.
- 18:43–18:50लोग स्म्रिती और संस्तागत साख्ष दोनो ही सत्तिक अच्ठापना के लिए शाएद एक दुस्रे के पूरक हैं.
- 18:50–18:55गोही सबबक भीच जल समादी हमें कुई आसान जवाब नहीं देती
- 18:55–18:58बलकी यह आमें इसी जटलता में चोर देती है
- 18:58–19:02हमें सोचने पर मजबोर करती है की हमारे नामों का
- 19:02–19:05हमारे अस्तित्वका आस्ली रक्षक कुन है
- 19:05–19:08बलकुल. और मुझे लकता है कि श्रोताओं को
- 19:08–19:11तुम इस उपन्याश की गेरायो में उतरना चाहीए.
- 19:12–19:14इसके पन्नो में और भी बहुत सी परते है,
- 19:14–19:19जसे की अनाम ग्रेहे प्रसंग या न्याए दर्षन की अंतह कता,
- 19:19–19:23जिने खॉड एकस्प्लोर करना अग अग अदबुत अनुबभ होगा.
- 19:23–19:27अमने आज जो चर्चा की वो तो केवल एक हिस्सा है
- 19:27–19:29सत्ते की खोज कोई मन्जिल नहीं है
- 19:29–19:33जा पहुचकर आप रोग जाएं यह एक सत्तत यात्रा है
- 19:33–19:34सही कहा आप आप ने
- 19:34–19:37और इसी के साथ हम लोटते हैं उसी बात पर
- 19:37–19:38जहां से हमने शुर्वात की ती
- 19:38–19:42लद्तर ताकूर की वो बात हमें हमेशा याद रखनी होगी
- 19:42–19:44जब भी आपके सामने रखा हूँा कागज
- 19:44–19:47आपको किसी सच्चाई पर यकीन करने को कहे
- 19:47–19:49जब भी कोई सिस्टम आपको बताए
- 19:49–19:52कि सच वही है जो फाँल में दरज है
- 19:52–19:53तो एक पल के ले रुकिएगा
- 19:53–19:57उसकागस को उठाकर उसकी गंद सूंगने की कोशिष की जेगा
- 19:57–20:02ये तै आपको करना है, की आप उस सत्तावादी पैसे की गंद पर विष्वास करेंगे
- 20:02–20:07या फिर उस बारेश मे भीगी हुई मिट्टी की गंद पर, जो कभी जूट नहीं बोलती
- 20:07–20:09ददबेट में हमारे साथ ज़ुडने के लिए द्ड़िवाद
Plain text
तब आदिबेट में आपका स्वागत है, खलपना कीजी ए, एक पूल गिरता है, मलबे के नीचे कोई तीन सो मस्व्दूर दबकर मर जाते है. एक बहुत फीज बहयाना कहाथ सा? बिल्कुल. बहयाना कहाथ सा. लिकिन मजी की बात देखिये जब आप सरकारी रजिस्टर खोलतेना तो वहां सर्फ तीस नाम लिखे होतें मबलाब बाकी के दोसो सतर लोग कहां गय वो कागस पर कभी ते ही नहीं गायआप कर दिएगे बलकल तो आज हम गजेंदर ताकृर के बहुती चर्चट उपन्न्यास गोही सबख भीच जल समादी इसके बाल संसकरन पर चर्चा कर रहे हैं गर नारी केल गाँएं की प्रिष्ट बूमी पर लिखिए ये कहानी एक बहुति गेरा सवाल उठाती है सही कहा सवाल ये है कि जब सथ्टा सच्चाई को लोगों के अस्थित्ट्टो को ही अपने रिकोट से मिताने की कोशिष करती है तो सथ्टिको बचाता कोन है दिके मैं इस बात का पक्ष्दर हूँ, कि सत्तिक अन्तिम रक्षा अग, हमारी लोग स्म्रिती, प्रक्रती और मोखिक परम्प्राद वारा ही होती हैं कुकि मड़ब कागज और सिस्टम ये तो हमेशा ताकतवर के हाथो बिख सकते है ना वं, मैं इस बात को दिके बलकल अलग नजर्ये से देकती हूं मेरा मानना है के जो सामूहिक स्म्रिती है वो हमे ये ज़रोर याद दिलाती है के हमारे सात अन्याय हूँआ है पर क्या वो न्याय दिलासकती है? मुझे नहीं लकता सत्ता के क्रूर शवट्यंत्रों को रहाने के लिए आपको अंता था उसी के हत्यारों का अईस्तमाल करना परता है मदलों उसी सिस्तम का आा, मतलप उस संस्तागद दस्तादेजी करन, पक्के सबुद और लीगल फाँल्स, यादो से आप आप रो सकते हैं, पर दोश्यों को सजा सब सबुद इलाते हैं. आच्छा, तो चलिये इसी बाथ से चर्षा की शुर्वात करते हैं. अपन्यास में आप देकती हैं के से सिस्तम कागज का इस्तमाल कर के लोगों की हत्या करता है. तब आँ, सर्यू जैसी महिला मस्दूर का उदारान ही ले ले लिजि. वह जो अपने पती के नाम पर काम कर रही थी. बलकुल वो अपने म्रित्पती के नाम पर काम कर रही थी और जब पुल गिरा उसकी मुद फुई, तो सिस्टम के पास उसका कुई नाम ही नहीं था वो रजिस्टर से पूरी तरा गायप कर दी गए कागज ने उसकी पहचान ही मिता दी लिकिन आप दिक्ये गडनारिकिल के लोग इसे कैसे देक्ते है? वहां किताबे नहीं पडी जाती. वहां जीवन जी आजाता है. आपने वो चन्ना गाची वाला द्रिषे तो पड़ाई होगा? आप आप जावो आत्माई कबद्टी खेलती है. आप हमारे श्वता शवट शवट शोच रहुगे कि भाई न्याय और सिस्टम की इस इतनी गंभीर और आदूनिक चर्चामे हम भूतों और कबद्टी की बात क्यों कर रहे हैं? रिलकुल सबाल तो उट्ता है लेकिन यहा भूथ कोई आंद विष्वास नहीं है ये उन गुम आम लोगों की सामूनिक स्म्रिती का एक रूपक है. जब सिस्टम आम बूल जातायना, तब चन्ना गाची पर वो आत्माए, आम बचाओ कबदी खेलती हैं, ताकी बुला दिये गे आम, हवामे मिटी में जिंदा रहें. लद्तर ताकृर ने अपने बिटे को एक बहुत बडी शीक दी थी की कागज हमेशा जुड बोल सकता है हा, कागज हमेशा जुड बोल सकता है इसलिये मिट्टी और पैसे की गंद को पहचानना सीको ये ज़़ बात का सबूथ है के सत्ते का आस्ली गर नवो मान्विय चेतना है किसी सरकारी अदिकारी के हात में रक्खार रजस्टर नहीं? आपकी बात में एक बहुत गेहरी मतलब एक कावे आत्मक अपील है और मैं समशती हूं के गर नारी केल के लोगों के लिए वो मिट्ती क्या माइने रकती है लोक स्मिती या ये भूथ प्रेत की जन्ष्रूतिया एक तराका रिजिस्टन्स है, एक प्रती रोद है लेकिन सरा प्रक्टिकलो कर सूथची है ना प्रक्टिकल कै से मतलब, क्या इन बहावनावो से सत्ता के मगर मच्षो को दराया जा सकता है? बिलकुल नहीं. अगर आपको सत्ता से लडना है, तो आपको एक समआनानतर, लेकिन जाडा सच्चा लिकोड़ क़ा करना होगा. बब़ई मतलब आप फीर से उसी ब्रष्ट कागस पर बरोसा करने की बात करने है? नहीं नहीं, मैं सही कागस की बात करने हूं आप नन्दी अरुनी का किर्दार देखिये वो उस पूल परियोजना के यंजीनेर तेराइट जब पल गिरा तो वो केवल यादों के सारे बेटकर नहीं रोए. उनो उस दर्द को एक दाईरी में दरज किया. चबाक का हिसाब. जी चबाक का हिसाब. उनो उने सत्ते को एक असा दस्तावेज बनाया जिसे कोई मिताना सके. उन्व ले उस दाईरी की उन्व तीन अलग गलक प्रत्या बनाई और उने सुरक्षिद जगवव पर चिपा दिया. और इसका असर कहान दिखा? दश्षको बाद. आब आप द़ब बवाँद बवाँद बवाँद बवाँद बवाँद बवाँद बवाँद बवाँद बवाँद बवाँद बवाँद बवाँद बवाँद बवाँद बवाँद बवाँद बवाँद बवाँद बवाँद बवाँद बवाँद बवाँद बवाँद ब साखशे की प्रक्रती, मतलब नेच्र अप अवड़िएज़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़़� नन्दि आरूनी अदालत के माल खाने मेरे रखे बिसेसर के उस जूते को देकते हैं. उस जूता पानी मे भीग गया था. उस जूते से पानी तपकने की चपाक की आवाज आती है. अब यह चपाक कोई बहुते गटन बर नहीं है. ये प्रक्रती का उस म्रत व्यक्ती की आत्मा का विद्रो है वो आवाज उस कागजी सिस्तम को चिडहा रही है स्म्रती उस अद्रष्ष तिजूरी की तरह है जिसकी चाभी सत्ता के पास नहीं होती जब की कागज, कागज तो एक आँसा ताला है, जिसे कोई भी ब्रष्ट अफसर तोर सकता है. वो जूता, वो कडा, महस वस्तूए नहीं है. वे उन लोगो के अस्तित्वो के चीखते हुए गवा है, जिने कागज ने मार डाला था. अग, मुझे खेद है पर मैं इस बात को इस तरहे से नहीं देख बारे ही हूं. आप माल खाने की बात कर रहे हैं तु चलिए माल खाने से निकल कर अदालत के अंदर चलते हैं. चलिए. जब नन्दी अरुनी उन वस्तूं को लेकर गए, तो विदेशी कमपनी के वकील बदूकनात, हर्यरनन ने तोहाती तन्धेपन से बिना किसी पष्थावे के नहीं उने खारइच कर दिया. उसने क्या कहा? ये सब भावना की वस्तू हो सकती हैं. वैदानेक साक्षे नहीं. उस्टम इक भावनाहीन मशीन है. अगर नन्दी आरूनी ने वो डारी नहीं बनाई होती, तो भिस्शर का वो जुता माल खाले की दुईटी तुवावनाई प्रजाँजाग. उसे शर्क ताना उसे शिस्तम को मैनिपिलेट कर रा था अपने फाइदे के लिए? वो कुतर्क हो सकता है, बिलकुल हो सकता है, लेकिन सच यही है कि नियाई प्रनाली उसी कुतर्क, उसी लोगिक पर काम करती है, शिस्तम एक बहावनाहीन मशीन है. अगर नन्दि आरुनी ने वो डाईरी नहीं बनाई होती, तो बिसे सर का वो जूता माल खाले की दूल में सथ जाता. उस चपाक की आवाज से आप किसी समवेदन शील अन्सान को रुलातो सकते हैं, लेकिन आप उस आवाज से सिस्टम को सजा नहीं दे सकते. इसे यह बाद में आप देखिए, उसी आदालत में जब सत्टिवरत महता, जैसे इमान्दार वकी लातें, तो उने भी सरकारी अभी लेकों और रिकोट्स को लिए कोजना पड़ता है. तो तो बग़ा था बग़ा था था आतमाए कितनी भी आवाजे क्यो ना करें आप आप राद्यो को जेल नहीं भेसकते। तीख है चल ये मान लेते हैं की पुराने सिस्तम में फाईले और रिकोट जरूरी थे लेकिन आप देक्ये सथ्ता हमेशा केवल कागस तक सीमित नहीं रहती जैसे-जैसे तकनीक बडलती है लोगों को मिताने का तरीका भी बडलका है जो काम पहले सरकारी फाइलो में रहीर फेर करके होता था वही आप दिजितल दूनिया में हो रहा है उपन्यास का एक बहुती शान्दार रूपक है, श्क्रीन के गोही, मतलब, दिजिटल मगर मच. रहा, ये हिस्सा मुझे भी बहुत प्रसंगेक लगा. ये कहानी को आजके समय से सीथा जोर देता है. विल्कुल, पहले तो कबतरा सरफ कागस तक सीमित था, जिसे आप पार सकते थे जला सकते थे लेकिन आभ ये खत्रा अद्रिष्षे है जर आप यस मगर मच्छ वाले रूपक को समचते हैं जैसे एक मगर मच्छ शानत पानी के नीचे चिपकर अपने शिकार का इंतदार करता है और प्यर अचाने को से गेहरे पानी में खीच लेता है, वैसे ही ये दिजिटल फ्रोट श्टर्स, श्क्रीन के पिछे से चिप कर वार करते हैं. वो अद्रिश्षे रहेते हैं. गाँ कही एक लगका उज्वल, अनलाईं गेमिंग और तो अगर नाँगा बाद़ा बाद़ा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा लगा � इस में कोई सन्देह नहीं है कि तकनी का एक बहुती दरावना और स्याह पहलू है जो शोशन के नेई तरीके इजाद कर रहा है और इन स्क्रीम के गोही से मुकाबला कैसे होता है क्या कोई दिजितल फायल कामाती है? नहीं, यहा मानविय चेतना तो उज्वल की उदास और भद्की हूँई आत्मा से मिलते है, तो उज्वल की उदास और भद्की हूँई आत्मा से मिलते है, तो उज्वल की उदास और भद्की हूँई आत्मा से मिलते है, तो उज्वल की बास्वर नहीं बताते, वही द्हाल बनती है. अच्छा? राई. जब चन्ना गाची के भूछ उज्वल की उदास और भद्की हुई आत्मा से मिलते है, तो वो उसे कोई पास्वर नहीं बताते. वो उसे अपना नाम याद रखने को कैते है. ये इस बात कप्रतिक है कि जब दिजटल दूनिया आपको एक कोड बनाकर मार देना चाहती है, तब आपकी मानविय पहचान, आपकी लोग स्म्रती ही आपको वापस अन्सान बनाती है. दिखी ये एक बहुती इमोशनल बात है, पर जर जमीनी हकिकत देखी है. वूट उज्वल को नाम याध दिलाते हैं तेके लेकिन वो से नवरने से बचाप आते हैं उज्वल आत्मठ्या कर लेता है फूल मती को किडनाप कर लिया जाता है पूरानी कहानियो और यादोने उने नहीं बचाया मेरे सवाल यह कि इस सक्रीन के गोही को अद्तता हराया कैसे गया? क्या केसी लोग कता से? मान्विय साहस से हराया गया अद्विय साहस से, लेकिन उस साहस ने हत्यार के रूप में तकनीक अडेता का ही अप देटा की आ. अप देखिये, जब गोप कुमार, जो एक अडेटर है, इस पूरे मामले में उतरता है, तो वो चन्नागाची के पास जाकर भूतो से बात नहीं करता. वो फाईलों की जाज करता है. वो एन आर सवंटी सेवन, जैसे पूराने कोड को दीकोड करता है. वो देटा के जर यह यह स्थापित करता है, कि जो लोग आज दिजिटल फ्रोट चलारे हैं, जो मेटिकल सप्लाई में दोखा द़ी कर रहे हैं, ये वही लोग हैं, जो दश्कों पहले उस पुल गोताले से जुडे थे. देटा ने उस पातन को पक्डा, जिसे अनसान बूल गय थे. ब्रेरना मिट्टी से मिल सकती है, पर लडाई तो सिस्तम के तूल से ही लडी गगाईना, आप फुल्मती के बचाव अब्यान का ही मेकनिзम देख है. जब शोद कर्मी सोम्या रामा आपन को ये पता चलता है के फुल्मती को कहाँ बंदध बनाया गया है, अप प्ल्मती के बचाव अभ्यान का ही मेकनिजम देखेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेगेईगेईईई सोम्म्या ने तक्निक के उस अकेले पन को, उस जुट को काटने किलिए पार दर्षी तक्निक का इस्तमाल किया. लाईव ब्रोट्कास ने उस बंद कम्रे को पूरी दुन्या के सामने क्छोल दिए अ. तक्निक के काले जुट को दिजिटल एविडिन्स नहीं रहाया. प्वल्मती को सुम्या के समाथपोन के कम्रेने बचाया तीक है, मैं मानता हो की सुम्या ने कम्रे का अच्तमाल किया लेकिन आप उस द्रिष्ष्ट्ग की आस्ली आत्मा को मिस कर रही है वो कैसे? ज़र आद कीजे ज़व तरवाजा खुलता है, कम्रा चालो है, दूनिया देख रही है. लेकिन फूल्मती, कम्रे के सामने ये नहीं कहती, के मेरा देटा सुरक्षित करो, या मेरा कोड अप्म नहीं है. वो अपनी पूरी ताकथ से कहती है. हमर नाम पूल्मती आची मतलब मेरा नाम पूल्मती है वो अपनी अस्मिता अपनी पहचान अपनी मोखिक सत्यता को उस दिजिटल दुनिया के चहरे पर देमारती है अगर उसके भीतर अपना नाम याद रक्ने की वो सांसक्रितिक स्प्रिती नहीं होती तो तो बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद और यही से हम अपने सबसे अन्तिम और मुझे लकता है सबसे महत्तुपून सवाल की और मुडते हैं आखिर न्याय का अन्तिम पत क्या है सत्या की अन्तिम विजे का आदार क्या है क्या न्याय के लग याद रखने से मिल जाता है या उसके लिए एक सक्रिया संस्तागत लडाई अनिवाले है ये स्पूरी चर्चा का, केंद्र बिन्दू है आप क्या मानते है? देखे, मेरा द्रद विष्वास है कि अस्ली न्याय की श्रवात कोट्रूम है नहीं बलकी तब होती है, जब गर नारी के बच्चे खेल खेल में उन तीन सो म्रित मस्टूरो के नाम याद कर लेते हैं. जब सरकारी सुची तीस पर आके रुग ग़ी तब उन बच्चों की स्म्रिती में, वो गिन्ती तीन सो तक पहुज ग़ी ती. अर उपन्यास का अंत कितना शक्तिषाली है, पीपल के पत्तों की नसें एक नक्षा बनाती है, गर नारी केल की जमीन से लेकर, दिल्ली और विदेशी विष्वा विद्ड्यालेंगो तक का नक्षा. ये कोई सादारन रूपक नहीं है, ये सिद करता है कि लोग आत्मा जो प्रक्रती में बस्ती है, वही वैश्विक न्याय का शुर्वाती और सबसे मस्वुद बिंदू है. जब तक वो बच्चे उन आमों को जिन्दा रख्खेंगे, दून्या का कोईबी रागवन सोमानी या चंद्रपाल बत्ता उस सत्तिको दफन नहीं कर सकता. न्याय सर्फ अप्रादियों को जेल में डालना नहीं है. न्याय ब्रमाण में सत्तिकी पुनर स्थापना है. अदियाए का वो अन्तिम पत, वो आग, कानूनी और संस्त्ठागती होता, अदियाए का अदियाए का वो अपन, अदियाए का वो अपन, अदियाए का वो अपन, अदियाए का वो अपन, अदियाए का वो अपन, अदियाय का वो अपन, अदियाय का वो अपन, अगर बदा बदा बदा गिरो हो मीरा की निजी तस्वीरें और जानकारी चूराकर उसे दमकाता है कि वो जाँच में मदद नकरें। उसे हवाचाही होती है, न्याए का वो अन्तिम पत, वो आग, कानूनी और संस्तागत ही होता है. मीरा का उदारन देखिये, जो उसी गर नारीकेल वंष की एक सदस से है. आज, जिसे ब्लाक मेल की आग गया था? बिल्कुल, चंद्रपाल बता का गिरो हो मीरा की निजी तस्वीरे और जानकारी चूराकर, उसे द्हमकाता है कि वो जाँच में मदडद नकरे. अब इस पोईंट पर मीरा क्या कर सकती ती? वो गर बेट कर पुरानी कहानियो से हिम्मत मांग सकती ती? लिकिन वो स्व्फ प्रार्ठना नहीं करती, वो दर को पीचे चोरती है, पूलेस और अदालत तक जाती है, और मैजिस्ट्रेट के सामने अपनी कानुनी गवाही, अपना लीगल स्थेट्में दर्ज कराती है. उसे वहाई बहुती कमाल की बात कही ती. दर का मालिक एक ही है. इस दायलोड का मतलप समच्ञीए. वु समच गई ती की चाहे वु दश्खो पुराना पूल का गोताला हो या आज का सक्रीन का गोही, ये सब एक ही संगत्हित अप्राद, एक ही नेकससस का हिस्सा है. और चुंकी ये अप्राद इतना अगनाइज्ट है, उस जाल को तोडने किलिए उसे कानुन और विवस्थागे, बीतर से ही उसी के नियमो से चुनाती देनी पडी. लेकिन मीरा को उस चाहस मिला कहाँ से? क्या उस चाहस उसे किसी सरकारी मैनुल से मिला? अगर गोप कुमार ने उस अदिट फाल के नमबरस के सात माता है अगर दाईरी के दाईरी के तीन हिसे करके उने जुबाया नहीं होता अगर गोप कुमार ने उस अदिट फाल के नमबरस के सात माता होता अदर वाज़े प्रज़ादा जब बाज़ादा जब बाज़ादा जब बाज़ादा जब बाज़ादा जब बाज़ादा जब बाज़ादा जब बाज़ादा जब बाज़ादा जब बाज़ादा जब बाज़ादा जब बाज़ादा जब बाज़ादा जब बाज़ादा ज� संस्तागत्रुब से अन्पेपर अप्रादियों को कद्गरे में ख़ागता है. स्म्रिती उस इमारत की नीव ज़ोर हो सकती है. लेकि न्याए का वो दाचा हमेशा साख्शों और कानुनी ल़ाई की इटो से ही ख़ाई होता है. वूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ� अगा गाची ने उन नामों को कभी मरने नहीं दिया, जेने सथ्ता ने अपने कागस से बेशर्मी से मिता दिया दिया था. सथ्तिय अन्तता हकिसी फाईल या किसी फुल्डर का मुताज नहीं होता, वो मान्वी अस्म्रिती और प्रक्रती की गोद में हमेशा सुरक्षित रहता है जब कागस भिक्कर गल जाता है तब भी माल खाने में रहा हो जुता अपनी चपाक की अवाच से सिस्टम को उसकी अगाद याद दिलाता रहता है अगर मैं आपने पक्ष को समेटू तो मैं कहुंगी की ये उपन्यास हमें बहुती कडवी सच्चाई सिक आता है. सच्ट्यो को बचाने के लिए स्व्फ भावनाए ये अस्म्रितिया पर्याप्त नहीं है. यादे हमें ये ज़ूर बताती है कि हमने क्या कोया है. वो हमें लड़ने का खारन देती हैं, लेके न्याय की वो लड़ाय तब तक अदूरी हैं, जब तक की नंदी, आरुनी, गोप कुमार, और मीरा ज़े से साहसी लोग, उन यादों को अकार्ट्टे प्रमानो, दाईरियो और संस्त्थागत दस्थावेजो में न बबढल दें अगर आप सिस्टम से लडना चाते हैं तो आपको सिस्टम की बाशा आनी चाहीए स्म्रिती हमें अन्सान बनाती है लेकिन सबुद हमें न्याए दिलाते हैं बलकुल ये सच्छ्मुच एक आईसा विषे हैं जिस पर कोई एक द्र्स्टिकोन कभी पूर्ड नहीं हो सकता. लोग स्म्रिती और संस्तागत साख्ष दोनो ही सत्तिक अच्ठापना के लिए शाएद एक दुस्रे के पूरक हैं. गोही सबबक भीच जल समादी हमें कुई आसान जवाब नहीं देती बलकी यह आमें इसी जटलता में चोर देती है हमें सोचने पर मजबोर करती है की हमारे नामों का हमारे अस्तित्वका आस्ली रक्षक कुन है बलकुल. और मुझे लकता है कि श्रोताओं को तुम इस उपन्याश की गेरायो में उतरना चाहीए. इसके पन्नो में और भी बहुत सी परते है, जसे की अनाम ग्रेहे प्रसंग या न्याए दर्षन की अंतह कता, जिने खॉड एकस्प्लोर करना अग अग अदबुत अनुबभ होगा. अमने आज जो चर्चा की वो तो केवल एक हिस्सा है सत्ते की खोज कोई मन्जिल नहीं है जा पहुचकर आप रोग जाएं यह एक सत्तत यात्रा है सही कहा आप आप ने और इसी के साथ हम लोटते हैं उसी बात पर जहां से हमने शुर्वात की ती लद्तर ताकूर की वो बात हमें हमेशा याद रखनी होगी जब भी आपके सामने रखा हूँा कागज आपको किसी सच्चाई पर यकीन करने को कहे जब भी कोई सिस्टम आपको बताए कि सच वही है जो फाँल में दरज है तो एक पल के ले रुकिएगा उसकागस को उठाकर उसकी गंद सूंगने की कोशिष की जेगा ये तै आपको करना है, की आप उस सत्तावादी पैसे की गंद पर विष्वास करेंगे या फिर उस बारेश मे भीगी हुई मिट्टी की गंद पर, जो कभी जूट नहीं बोलती ददबेट में हमारे साथ ज़ुडने के लिए द्ड़िवाद