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गरीबन_धोबी_कैसे_बने_गरीबन_बाबा.m4a
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- 0:00–0:04जर खल्पना कीजे के, कि हम कोई खेल खेल रहे हैं
- 0:04–0:06हा, कोई भी आम खेल ज़से बच्वन में खेलते थे
- 0:06–0:12बलकोल, और खेलते हुए अचानक से पेर किसी पट्धर से या किसी चीज से तक्रा जाता है
- 0:12–0:15जो कि वहती नोमल बात है, आम अखसर द्यान में नि देते हैं
- 0:15–0:21आप भी बाद बाद बाद वर्ट शरीर को कुडे की तरफ फेख दिया जाए, और फिर फिर यही बहयानक अन्याए आपको एक भगवान में बड़ल दे.
- 0:21–0:23ये सुन्ने में किसी फिल्म की कहानी लगता है.
- 0:23–0:24बिल्क्कुल लगता है.
- 0:24–0:28अगर बापरे यही ख़त नहीं होती
- 0:28–0:34उसके बाद मुध के बाद मुरत शरीर को कुडे की तरफ फेख दिया जाए
- 0:34–0:39और फिर यही बहयानक अन्याए आप को एक भगवान में बड़ल दे
- 0:39–0:42यह सुन्ने में गिसी फिल्म की कहानी लकता है
- 0:42–0:44ये सुन्ने में किसी फिल्म की कहानी लकता है?
- 0:44–0:45बिल्कोल लकता है.
- 0:45–0:48लिकिन आजकी हमारी इस गेहरी चर्चा में
- 0:48–0:50हम इसी विष्याय पर बाथ करने वाले है.
- 0:50–0:53हम एक आजकी कहानी का विष्लेषन करेंगे
- 0:53–0:56जहां सजा इतनी असंगत है,
- 0:56–0:57कि वो नियाय के,
- 0:57–0:59नियाए के हर नियम को ही तोड़ देती है
- 0:59–1:01और सच कहों तु ये एक आँईशा विष्या है
- 1:01–1:03जो हमें ये सुचने पर मजबोर करता है
- 1:03–1:05कि समाज में नियम बनते कैसे हैं
- 1:05–1:08हैं और उने लागु करने के पीछे
- 1:08–1:10असल ताकत किसकी होती है
- 1:10–1:10बलकों सगीगा
- 1:10–1:18तो आज हमारे पस जो स्रोथ समगरी है, वो है गजेंद्र ताकृगी दवारा रचित गरीबन भाबा की कता.
- 1:18–1:23और इसे विदे प्रथम मेठली पाखषिक एपत्रिका में प्रकाषित क्या गया ता.
- 1:23–1:27इस चर्चा का हमारा मुख्य उदेशे सर्फ एक कहनी सूनाना नहीं है.
- 1:40–1:43इस अखाडे का येद्रिष्ची अपने बहुत कुछ कहता है
- 1:43–1:44उ कैसे?
- 1:44–1:46देके लोग कताउन के अद्रा गाउन
- 1:46–1:47अद्रा गाउन
- 1:47–1:50यहाँन के अखाडे में तीन पक्के डोसत है
- 1:50–1:53जु नियमत रूप से कुष्टी का भ्यास करते है
- 1:53–1:55पहले है बरहम ताकृर
- 1:55–1:57तो मब तीन अलग अलक जातिया है?
- 1:57–2:00बलकल, अलग अलग जातियो से आने के बावजुद
- 2:00–2:04उस अखाडे के मिट्टी में कोई भेद्बाव नहीं है
- 2:04–2:05सब बराबर है
- 2:05–2:08एस अखाडे का ये द्रिष्ची अपने बहुत कुछ कहता है
- 2:08–2:09उ कैसे?
- 2:09–2:11तो अगर अखसर एक चितावनी होती है.
- 2:11–2:13अखसर एक चितावनी होती है.
- 2:13–2:15अखसर एक चितावनी होती है.
- 2:15–2:17अखसर एक चितावनी होती है.
- 2:17–2:19अखसर एक चितावनी होती है.
- 2:19–2:22अखसर एक दरषाता है कि सता के निचे सब कुछ शान्त है.
- 2:22–2:52यह ज़ेगे तुफान से पहले की शान्ती बिलकुल यह एक अँईसा सेट्टब हैं जिसे कहानी आगे चलकर पुरी तर से तोडने वाली हैं समाचका यह जो आदरष रूप हैं यह अकसर किसी बहारी यह देविया जद्ष्टक्षेप से बिख़री जाता हैं औह लो शाया दि
- 2:52–3:01जिसे स्रोथ सामगरी में पीडी कहागे आप पीडी और स्रोथ सामगरी एक दंस पश्ट करती है के इस में गरीबन कोई,
- 3:01–3:05मडलप कोई एहंकार या बूरा एरादा नहीं ता. बलकल नहीं उप तो बस एक हाथसा था.
- 3:05–3:08अब भस खेल के दोरान हुझा एक शारे रेख हाथ सा
- 3:08–3:10चली एसे तोडा और समचते हैं
- 3:10–3:12कि आप माफी भी ना माँग पाए
- 3:12–3:16यहां सामने वाला कोई आम अनसान नहीं है
- 3:16–3:17नहीं, उएक देवी है?
- 3:17–3:21बलकुल, एक देवी हैं जिनकी सहन, शीलता, शून नहीं है
- 3:21–3:23बिजली के नंगे तार कितरा
- 3:23–3:26बिजली को उस बाथ से कोई फर्क निपपरता कि आपने उसे जानबुच कच हूँए है
- 3:26–3:27यह गलती से
- 3:27–3:30वो बस अपना काम करती है, शोग देती है.
- 3:30–3:34लेकिन यहां एक अनसान को इस अनजाने सपरष की,
- 3:34–3:36बहुत भारी कीमद चुकानी परती है.
- 3:36–3:40यहां जो सबसे दिल्चस बात है, वो यह कि प्राचीन समाजो में,
- 3:40–3:42पवित्रता की अवदारना कैसे काम करती ती.
- 3:42–3:43अच्छ?
- 3:43–3:47देखे आज के समें में हमारी न्याएप्रानाली नीएत को बहुत महत्वे देती
- 3:47–3:48अग, मडलब अग, न्टेंश्झन क्या था
- 3:48–3:53विल्कुल, अगर एरादा किसी को चोट पहचाने का नहीं तो कानु नरम रुख अपनाता है
- 3:53–3:57लेकिन लोग परमप्राव में देविय नियम नियत के अदार पर काम नहीं करते?
- 3:57–3:59तो वो किस अदार पर काम करते है?
- 3:59–4:05नियम के अदार पर, पवित्रस्थान का सपर्ष हो गया, तो इस का मतलब है कि सीमा तुट गय.
- 4:05–4:09मतलब, लाईन क्रोस वोग़ी चाहे अनजाने मेही क्यो नहुए हो.
- 4:09–4:13आँ, इसे सीदे तोर पर विवस्ता को चुनाती माना जाता ता.
- 4:13–4:16लेकिन मुझे यहां एक बात कखतकती है.
- 4:16–4:16बता यह?
- 4:16–4:20मैं सोच रही ती कि या यह सच में देविये नियम ते?
- 4:20–4:25या या थिर ये समाजके ताकत्वर तबके दवारा बनाये गय नीम ते?
- 4:25–4:27ये बहुत यहम सवाल है.
- 4:27–4:29जिने बभाग्वान का नाम देदिया गया?
- 4:29–4:32ताकी कोई इन पर सवाली नहुता सके?
- 4:32–4:36मतलप, एक गरीब दोभी का पैर पवित्र स्थान पर लगना,
- 4:36–4:40अगर नियम तोडने कि सजा सीदे देवी या देवता से मिलती है,
- 4:41–4:44तो कोई भी उस सजा की वेद्था पर सवाल नहीं उठाता है।
- 4:44–4:44शुक्रिया
- 4:44–4:47अगर हम इसे मानव विच्यान के नजर यह से देखें
- 4:47–4:50तो कैई बार द्रम और देविये प्रकोप का दर
- 4:50–4:55समाज में एक विशेश प्रकार का अनुशासन बनाय रखने का उपकरन होते हैं
- 4:55–4:57मतलब एक तूल की तराज तमाल होते हैं
- 4:57–4:58बलकुल
- 4:58–5:02अगर नियम तोडने कि सजा सीदे देवी या देवता से मिलती है
- 5:02–5:06तो कोई भी उस सजा की वेध्था पर सवाल नहीं उठाता
- 5:06–5:09आँ वाग भाँन से कोन बहिज करेजा
- 5:09–5:10सही गा
- 5:10–5:13गरीबर की एग गतना उसी कठोर विवस्ता का प्रतीख है
- 5:13–5:20जहां हाशे पर रहने वेक्ती से हुई एक बहुती चोती सी चुग भी पूरे सिस्टम किले क्ठरा मालनी जाती है।
- 5:20–5:26और इस कतित कठरे का जो परिणाम सामने आता है ना वो किसी बूरे सपने जैसा है।
- 5:26–5:27बहुत बहानक।
- 5:27–5:35देवी कमला मया इतनी क्रुदित हो जाती है कि वो सीदे अंद्र के दरबार से एक बागिन को दंड़ देने किले बुला लेती हैं
- 5:35–5:37बापरे सीदे अंद्र के दरबार से
- 5:37–5:41रहां, सिर वेक अनसान जिसने गलती से पैर च्वा था
- 5:41–5:44उसे मारने के लिए एक अलोक्क बागिन बेजी जाती है
- 5:44–5:47ये तो बहुत यी असंगत सजा है
- 5:47–5:47बलक्ल
- 5:47–5:49और अखाडे का वो मैदान
- 5:49–5:53जहां गरीबन एक ताकतवर पहल्वान के रूप में जाना जाता था
- 5:53–5:56अव वो एक भ्यानक युद्ध्छेट्र बन जाता है
- 5:56–5:59इक तरव अईन्सान की अपनी कमाई होई शाररिक ताकत है
- 5:59–6:02अग, और तुस्सरी तरव है देविय क्रोद
- 6:02–6:04ये लडाए तो शुरू से ही एक तरफा है
- 6:04–6:05बलको लेग तरफा
- 6:05–6:09देखे लोग कत्हाए इस तराखे प्रतीकों का अस्तमाल यह दिखाने के लिए करती है
- 6:09–6:14के अन्सान का बहुतिग बल, प्रक्रती या अलोकिक सत्ता के सामने कितना बाँना है.
- 6:14–6:19एक पहल्वान अपनी कला से किसी तुसरे अन्सान को तो रासकता.
- 6:19–6:20आप उत उसकर रोस का काम तो.
- 6:20–6:24अगर कहानी यही खटमो जाती तो यह सर्फ दरावनी चेतावनी बन कर रह जाती
- 6:24–6:25एक मोरल स्टोरी की तरावन?
- 6:25–6:28अगर, असल में कहानी का सब से विछलित करने वाली
- 6:28–6:31अगर अगर कहानी यही खटमो जाती
- 6:31–6:34तो यह सर्फ दरावनी चेतावनी बन कर रह जाती
- 6:34–6:40अगर अगर कहानी यही खटमोजाती तो यह सरफ दरावनी चेतावनी बनकर रह जाती
- 6:40–6:42एक मोरल स्वारी की तरावना
- 6:42–6:46अगर असल में कहानी का सब से विचलित करने वाला हिस्सा
- 6:46–6:48मुद्के बाज शूरो होता है
- 6:48–6:49अच्छ
- 6:49–6:52गरीबन की लाश को बिना किसी अन्तम संसकार के
- 7:04–7:07यह दूसरी गटना है लाश को नदी में फेग देना
- 7:07–7:10यह पुरी तरह से समाज के नेटिक पतन को दरषाती है
- 7:10–7:12मतलप समाज ने पनी इनसानिया ठीख हो दी
- 7:12–7:15भिलकुल यह दिखाती है कि समाज किसी व्यक्ती को
- 7:15–7:17कासकर जो हाँशिये से आता हो
- 7:17–7:19मतलव समाज ने पनी इंसानिया थी कोडी?
- 7:19–7:23भिलकुल! यह दिखाती है कि समाज किसी विक्ती को,
- 7:23–7:25कहासकर जो हाशिये से आता हो,
- 7:25–7:29कितनी आसानी से उसके बून्यादी मानवी अदिकारों से बेदखल कर सकता है.
- 7:29–7:33अर और ये बेदख हैली सिव नदी में फेखने तक सीमत नहीं रहती
- 7:33–7:37नदी में बहतेवे वो लाज एक दोभी गाट पर पहुचती है
- 7:37–7:38अच्छा दूसरे गाट पर?
- 7:38–7:42अच्छा वाहा गाट पर एक दूस्रा दोभी कपडे दोरा है
- 7:42–7:45उसके सामने पानी में के मरिट्षरीर बहता हो आता है
- 7:45–7:49यहापर बाथ सच्छ में बहत्टी जास पोजाती है
- 7:49–7:49कैसे?
- 7:49–7:51मुझे यहां थोडी उलजन होती है के
- 7:51–7:55वो वियक्ती ये जानने की कोशिष भी नहीं करता कि लाश किस की है
- 7:55–7:56उंग, कोई जग्या साने?
- 7:56–7:59पिलकुल नहीं, उसे बस इस बाथ से चिड होती है,
- 7:59–8:02के ये म्रिच छरीर उसके काम में बादा डाल रहें.
- 8:02–8:03औरे बाप्रे.
- 8:03–8:05आप, वो अपनी सूविदा के लिए,
- 8:05–8:09उस लाश को दन्दे से दھकेल कर तुस्री तरव बहा देता है.
- 8:09–8:11ये तो चरम समवेदन हींता है.
- 8:11–8:16वही तो एक दोबी जो गरीबन के ही समवदाय का हिस्चा है
- 8:16–8:17अवो भी एसा कर रहा है
- 8:17–8:19कोई दुष्मनी नहीं है यहां
- 8:19–8:21बस एक गेहरी समवेदन हींता
- 8:21–8:24दिके इस गटना के पीचे का मुनोविग्यान बहुत गेरा है
- 8:24–8:24आचा वो कैसे?
- 8:24–8:26जब कोई अन सान मर जाता है ना
- 8:41–8:43ये सोचने वाथ है?
- 8:43–8:47ये द्रिष्छ हमें बताता है कि गरीभी और अस्तित्त की जद्डो जहद में
- 8:47–8:49अपनी समवेदनाए को देता है
- 8:49–8:53या कुई कि पेट पालना सबसे बड़ी प्राथ मिक्ता बन जाती है
- 8:53–8:54सही का
- 8:54–8:57एक गरीब यी तुसरे गरीब के प्रतिस जबसे जाडा निरमों जाता है
- 8:58–8:59कुकी विवस्तान नोने इसी तरा से टाला है
- 9:00–9:02ये बहुत ही दरावना सच है
- 9:02–9:02सच में
- 9:03–9:06एक तरव भगाट पर ये चरम अनादर चल रहा है
- 9:07–9:08और टीक उसी समये
- 9:08–9:19इक दुस्रा द्रश्छे भी उबहरता है, गरीबन के गर पर, उसकी पतनी जो इस पूरे अन्याय से तोट चुकी है, वो भग्वान के सामने न्याय के लिए गुहार लगार लगार रही है.
- 9:19–9:21ये तो स्वाबहविख है, वो और कर भी क्या सकती है.
- 9:21–9:51बिल्कुल! लेकिन उसका दूख इतना गेरा है, उसका आर्तनाद इतना सच्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्�
- 9:51–9:53जेसे कुई ज्वालमुखी पष्पडा हो.
- 9:53–9:54भिलकुल.
- 9:54–9:58पतनी की वो चरम, निराशा और समाज की वो समवेदन, हीन्ता
- 9:58–10:01ये दोनो आपस में तक्रागर एक एसा विस्फोट करते है
- 10:01–10:05जिसे नजर अंदास करनाप किसी किलिये मुमकिन नहीं होगा.
- 10:05–10:35अद्वाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्ब
- 10:35–10:37ये तो बहुती शक्तिषाली द्रिष्ट है
- 10:37–10:42आप आप ये देखाई तो ये न्याय मागने का बहुती अक्रामक तरीका है
- 10:42–10:46अगर हम एसे बड़े परी द्रिष्ट से जोडे
- 10:46–10:47आप भताएए
- 10:47–10:50तो दून्या बहर के आदीवासी और लोग परमपराँँ में
- 10:50–10:54अत्मा का शरीर में आना या पूजेशन का विषे बहुत आम हैं?
- 10:54–10:56अआ, हम ने सी कई कहनिया सूनी है.
- 10:56–10:59अगर अमेसे समाज शास्तर के नजर ये से देखेना,
- 10:59–11:04तो ये उन लोगों को आवास देने का एक बहुती कारगर मनूवे गानिक तन्त्र है,
- 11:04–11:06जिने समाज ने कुछल दिया हो.
- 11:06–11:08इक साएकोलोगिकल मेकनिसम.
- 11:08–11:12भलकोल, जो लोग सीदे तोर पर समाज के तेकेडारों
- 11:12–11:15या ताकत्वर लोगों से सवाल नहीं कर सकते,
- 11:15–11:18उनकी पीडा आत्माओ और देव्ताओ के माद्धिम से सामने आती है.
- 11:18–11:22या वाज बवान की अबाज याज बिना किसी विक्तिगत खटरे के,
- 11:22–11:25हाँश्ये का विक्तिए अपनी बात मनवाज सकता है.
- 11:25–11:29या ये ये एक बहुती शान्दार नजर्या है ये से देखने का.
- 11:29–11:33और इस कहानी में आत्मा सर्फ अपना दुक्ही नहीं सूनाती,
- 11:33–12:03अगर तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो त
- 12:03–12:06तो दोवीों की बद्टी मे रक्टे सारे कपडे जल जाएंगे
- 12:06–12:09दबटी, जाए जाए कपडे दोते है
- 12:09–12:13आखा, बद्टी हों जाए जाए जाए जाए दोवी कपडों को उबालते और साव करते है
- 12:13–12:15उनका पूरा काम वही से चलता है
- 12:15–12:18अगो, इस चितावनी की सतिक्तापर गूर कीजे
- 12:18–12:21ये कोई सामान ने श्राप नहीं
- 12:21–12:23कि तुम सब भीमार पडजाओगे
- 12:23–12:25या गाँ में आकाल आगाल आजाएगा
- 12:25–12:27नहीं, ये बहुत यी स्पैसिटिक है
- 12:27–12:29आप, ये सीधे तोर पर उस समवुदाए की
- 12:29–12:33तो इसका असल में क्या मतलब है, अगर इसे आज की संदरप में देखें,
- 12:33–12:37तो ये किसी लेपर्ष्ट़्ाए किया कलेक्टिप फाईन की तरह लकता है.
- 12:37–12:38बहुत सही तुलना है.
- 12:38–12:40कलیک्तिव फाइन की तरह लकता है.
- 12:41–12:42बहुत सही तुलना है.
- 12:42–12:42है ना?
- 12:42–12:44आत्मा साथ तोर पर कहरे है के
- 12:44–12:47जब तक तुम सभ मिलकर अपने गल्ती नहीं सुदहरते
- 12:47–12:51जब तक मेरे प्रती हुए अन्न्याय का प्राएश्चित नहीं होता.
- 12:51–12:52तब तक काम रुका रहेगा?
- 12:52–12:57बिल्कुल, तब तक तवारी अर्थ्वे अवस्थाथथब रहेगी, तवारी रोजी रोटी नहीं चलेगी.
- 12:57–13:03उस अकेले दोभी ने अपनी सुविदा के लिये लाश को दھकेला था, लेकिन अब...
- 13:03–13:06वप्राद स्रफ उस एक वेक्ती का नहीं जाता जिसने वो क्रित्ते किया है
- 13:06–13:08वो सामूहे कप्राद बन जाता है
- 13:08–13:11बिल्ल्कुल, वो पुरे समुदाय का सामूहे कप्राद बन जाता है
- 13:11–13:14इश्वराप ने उस द्होभी समुदाय को यह अजास दिलाया
- 13:14–13:17अगर तो बज़ाए तुरन्त फरकत लाडेती है।
- 13:17–13:19दर कासर तो हुताई है।
- 13:19–13:24अगर तो जब दोबी बिना किसी देरी के नदी में कुड परते है।
- 13:24–13:26वे लाज को खुज ते है।
- 13:26–13:28उसे पानी से बाहर निकालते है।
- 13:28–13:30और पूरे सम्मान के साथ
- 13:30–13:32दर कासर तो हुता है?
- 13:32–13:37आा, सबही दोभी बिना किसी देरी के नदी में कुद पडते हैं.
- 13:37–13:41वे लाश को खुजते है, उसे पानी से बाहर निकालते है,
- 13:41–13:45और पुरे सम्मान के सात, सारे रीती रिवाजो का पालन करते हुए,
- 13:45–13:47गरीबन का अंतिम संचकार करते है.
- 13:47–14:17बबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबब�
- 14:17–14:19अगर बडी से बडी पीडा शान्त हो जाती है
- 14:19–14:25अगर यही से कहानी अपने सबसे दिलचस्प और अन्तिम पडाव पर पहुचती है.
- 14:25–14:28नियाए मिलने और सम्मान भहाल होने के बाद,
- 14:28–14:31बाद सरव आत्मा की शानती तक सीमित नहीं रहती.
- 14:31–14:32तो आगे क्या होता?
- 14:32–14:33वही गरीबन,
- 14:33–14:36जिसकी लाश को उसी के लोगोने अप्मानित किया ता
- 14:36–14:39वो उस दोभी भटी का रक्षक बन जाता है
- 14:39–14:40आख रेवा
- 14:40–14:42आप वो कपडो की सुरक्षा करने वाला
- 14:42–14:46गरीबन भाभा या एक स्थानिय देवता बन जाता है
- 14:46–14:50जिस समवुदाय ने उसे नदी में दھकेल दिया था
- 14:50–14:53वो अब उसी समवदाय का स्थाई सन्रक्षक है
- 14:53–14:55ये रूपान्तरन मुझे
- 14:55–14:58मडल बहुती अजीब लेकिन खुबसूरत लकता है
- 14:58–14:59सच में
- 14:59–15:02ये खषमा और रूपान्तरन का एक बहुती गेरा संदेश है
- 15:02–15:02बिलकल
- 15:02–15:06यह में बताता है कि अन्याया और अनादर के बावजुद
- 15:06–15:08जब समहुहिक प्राएश्छित किया जाता है
- 15:08–15:10तो रिष्ते फिर से जुड सकते हैं
- 15:10–15:13जो व्यक्ती समाच के हातो सब से जबते जाडा पीडित हूँँ
- 15:13–15:15वही व्यक्ती न्याया मिलने के बाद
- 15:15–15:17उस्माज का सबसे बड़ा रक्षक बन सकता है.
- 15:17–15:18सही कहा.
- 15:18–15:22अगर आजकी इस पूरी चर्चा पर हम एक नजर डालें,
- 15:22–15:24तो हमने शुर्वात कीती एक अखाडे से.
- 15:24–15:26जाँ साभ बरावर थे?
- 15:26–15:27हाँ.
- 15:27–15:30और जाँ एक अनजानी शारीरिक भूल ने
- 15:30–15:32देविये क्रोद को जन्द दिया
- 15:32–15:36फिर हम ने देखा कि कैसे समाज के उप्योगिता वादी स्वार्थ ने
- 15:36–15:39एक म्रिट्ष शरीर का अपमान किया
- 15:39–15:39ये बिल्कुल
- 15:39–15:41इसके जवाब में एक श्राप मिला
- 15:41–15:44जिसने समवुदाय की आर्थिक नीवी हिलादी
- 15:44–15:46उनका पूर आज्सिस्टन तब करनेगी जितावन
- 15:46–15:50और अंतता इसी सामूहिक अप्राद भोद और प्राएश्चित के कारन
- 15:50–15:55इक सादारन दोभी गरी बन भाभा के रुप में आमर हो गया
- 15:55–16:00ये पूरी यात्रा हमें दिखाती है कि न्याय केवल सजजा देना नहीं है
- 16:00–16:03अगर अँदा नहीं अगर गरीबन बावा अपने साच्टूलन वापिस लाना है
- 16:03–16:04भुछ खुब का अपने
- 16:04–16:07ये गाता आजके समय में भी उतनी प्रसंगे कै
- 16:07–16:08वो कैसे
- 16:08–16:08दिके
- 16:08–16:10हमारे आस्पास के समाज में
- 16:10–16:13जब भी किसी पुराने अन्याय को सामोईक रुब से सुदहारा जाता है
- 16:13–16:16जब हम अपनी अटिहास्सिक गल्तियों को मानते है
- 16:16–16:19तो वो पुरानी पीडा एक सकारात्मक शक्ती में बडल सकती है.
- 16:19–16:22ये तो सच्मे एक विचार करने योगे बात है.
- 16:22–16:25और ये ये नहत्त्तोपून सवाल कडा करता है.
- 16:25–16:26कैसा सवाल?
- 16:26–16:28अगर आम थोडा और गेराई में जाकर सोचें.
- 16:28–16:31अगर गरीबन भावा अपने साथ हुए गोर अन्न्याय
- 16:31–16:34और बाद में समवदाय दवारा कियेगे प्रायष्चित के कारन
- 16:34–16:36एक रक्षक देवता बनें
- 16:36–16:37मिरा मतलबे बनें
- 16:37–16:41तो क्या इसका अथ यह के हमारे देश में
- 16:41–16:44पूजे जाने वाले कईस थानिया देवता और किमबदन्तिया
- 16:45–16:48दरसल समाज के शुद्दिकरन की ही कहन्या है
- 16:48–16:51औह, ये तो सच्मे सुचने पे मजबोर करता है
- 16:52–16:56क्या हम तेवताओ की पूजा सर्फ उनके दुरा की एगे चमतकारों किले करते है?
- 16:56–17:01या इसलिये किकि हमारा समाज अवचेतन रूप से अपने दुरा कीईगे
- 17:01–17:07किसी बहुत पुराने अटिहासिक अन्याय कि समहिक अप्राद बोद को शांट करना चाता है
- 17:07–17:10बापरे ये नजर्या तो एक दम नया है
- 17:10–17:11क्या ये वाखी पूजा है?
- 17:11–17:14या फिर सद्यों से मांगी जारी कोई मापी
- 17:14–17:17ये एक अईसा विचार है जिस पर हम सब को रुख कर सुचना चाईए
- 17:17–17:21वाखेई, ये सवाल तो हमारे देखने का नजर्या ही बडल देता है
- 17:21–17:27अगली बार जब भी किसी स्थाने देवता के मन्देर या चोपाल के पास से गुजरेगा,
- 17:27–17:32तो खुट से जरुर पूछेगा, कि या ये स्व्व आस्था कप्रतीक है,
- 17:32–17:35या किसी पूरानी भूल को सुदारने की एक सामहि कोशिष.
- 17:35–17:38बलकुल यही तो यह तियास कासली मतलब है
- 17:38–17:39रहा
- 17:39–17:41तो इसी विचार के साथ
- 17:41–17:44आजकी इस गेhri चर्चा को हम यही विराम देते है
- 17:44–17:48कुछ कहानियो में सच में हमें अंदर तक बडलने की ताकत होती है
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जर खल्पना कीजे के, कि हम कोई खेल खेल रहे हैं हा, कोई भी आम खेल ज़से बच्वन में खेलते थे बलकोल, और खेलते हुए अचानक से पेर किसी पट्धर से या किसी चीज से तक्रा जाता है जो कि वहती नोमल बात है, आम अखसर द्यान में नि देते हैं आप भी बाद बाद बाद वर्ट शरीर को कुडे की तरफ फेख दिया जाए, और फिर फिर यही बहयानक अन्याए आपको एक भगवान में बड़ल दे. ये सुन्ने में किसी फिल्म की कहानी लगता है. बिल्क्कुल लगता है. अगर बापरे यही ख़त नहीं होती उसके बाद मुध के बाद मुरत शरीर को कुडे की तरफ फेख दिया जाए और फिर यही बहयानक अन्याए आप को एक भगवान में बड़ल दे यह सुन्ने में गिसी फिल्म की कहानी लकता है ये सुन्ने में किसी फिल्म की कहानी लकता है? बिल्कोल लकता है. लिकिन आजकी हमारी इस गेहरी चर्चा में हम इसी विष्याय पर बाथ करने वाले है. हम एक आजकी कहानी का विष्लेषन करेंगे जहां सजा इतनी असंगत है, कि वो नियाय के, नियाए के हर नियम को ही तोड़ देती है और सच कहों तु ये एक आँईशा विष्या है जो हमें ये सुचने पर मजबोर करता है कि समाज में नियम बनते कैसे हैं हैं और उने लागु करने के पीछे असल ताकत किसकी होती है बलकों सगीगा तो आज हमारे पस जो स्रोथ समगरी है, वो है गजेंद्र ताकृगी दवारा रचित गरीबन भाबा की कता. और इसे विदे प्रथम मेठली पाखषिक एपत्रिका में प्रकाषित क्या गया ता. इस चर्चा का हमारा मुख्य उदेशे सर्फ एक कहनी सूनाना नहीं है. इस अखाडे का येद्रिष्ची अपने बहुत कुछ कहता है उ कैसे? देके लोग कताउन के अद्रा गाउन अद्रा गाउन यहाँन के अखाडे में तीन पक्के डोसत है जु नियमत रूप से कुष्टी का भ्यास करते है पहले है बरहम ताकृर तो मब तीन अलग अलक जातिया है? बलकल, अलग अलग जातियो से आने के बावजुद उस अखाडे के मिट्टी में कोई भेद्बाव नहीं है सब बराबर है एस अखाडे का ये द्रिष्ची अपने बहुत कुछ कहता है उ कैसे? तो अगर अखसर एक चितावनी होती है. अखसर एक चितावनी होती है. अखसर एक चितावनी होती है. अखसर एक चितावनी होती है. अखसर एक चितावनी होती है. अखसर एक दरषाता है कि सता के निचे सब कुछ शान्त है. यह ज़ेगे तुफान से पहले की शान्ती बिलकुल यह एक अँईसा सेट्टब हैं जिसे कहानी आगे चलकर पुरी तर से तोडने वाली हैं समाचका यह जो आदरष रूप हैं यह अकसर किसी बहारी यह देविया जद्ष्टक्षेप से बिख़री जाता हैं औह लो शाया दि जिसे स्रोथ सामगरी में पीडी कहागे आप पीडी और स्रोथ सामगरी एक दंस पश्ट करती है के इस में गरीबन कोई, मडलप कोई एहंकार या बूरा एरादा नहीं ता. बलकल नहीं उप तो बस एक हाथसा था. अब भस खेल के दोरान हुझा एक शारे रेख हाथ सा चली एसे तोडा और समचते हैं कि आप माफी भी ना माँग पाए यहां सामने वाला कोई आम अनसान नहीं है नहीं, उएक देवी है? बलकुल, एक देवी हैं जिनकी सहन, शीलता, शून नहीं है बिजली के नंगे तार कितरा बिजली को उस बाथ से कोई फर्क निपपरता कि आपने उसे जानबुच कच हूँए है यह गलती से वो बस अपना काम करती है, शोग देती है. लेकिन यहां एक अनसान को इस अनजाने सपरष की, बहुत भारी कीमद चुकानी परती है. यहां जो सबसे दिल्चस बात है, वो यह कि प्राचीन समाजो में, पवित्रता की अवदारना कैसे काम करती ती. अच्छ? देखे आज के समें में हमारी न्याएप्रानाली नीएत को बहुत महत्वे देती अग, मडलब अग, न्टेंश्झन क्या था विल्कुल, अगर एरादा किसी को चोट पहचाने का नहीं तो कानु नरम रुख अपनाता है लेकिन लोग परमप्राव में देविय नियम नियत के अदार पर काम नहीं करते? तो वो किस अदार पर काम करते है? नियम के अदार पर, पवित्रस्थान का सपर्ष हो गया, तो इस का मतलब है कि सीमा तुट गय. मतलब, लाईन क्रोस वोग़ी चाहे अनजाने मेही क्यो नहुए हो. आँ, इसे सीदे तोर पर विवस्ता को चुनाती माना जाता ता. लेकिन मुझे यहां एक बात कखतकती है. बता यह? मैं सोच रही ती कि या यह सच में देविये नियम ते? या या थिर ये समाजके ताकत्वर तबके दवारा बनाये गय नीम ते? ये बहुत यहम सवाल है. जिने बभाग्वान का नाम देदिया गया? ताकी कोई इन पर सवाली नहुता सके? मतलप, एक गरीब दोभी का पैर पवित्र स्थान पर लगना, अगर नियम तोडने कि सजा सीदे देवी या देवता से मिलती है, तो कोई भी उस सजा की वेद्था पर सवाल नहीं उठाता है। शुक्रिया अगर हम इसे मानव विच्यान के नजर यह से देखें तो कैई बार द्रम और देविये प्रकोप का दर समाज में एक विशेश प्रकार का अनुशासन बनाय रखने का उपकरन होते हैं मतलब एक तूल की तराज तमाल होते हैं बलकुल अगर नियम तोडने कि सजा सीदे देवी या देवता से मिलती है तो कोई भी उस सजा की वेध्था पर सवाल नहीं उठाता आँ वाग भाँन से कोन बहिज करेजा सही गा गरीबर की एग गतना उसी कठोर विवस्ता का प्रतीख है जहां हाशे पर रहने वेक्ती से हुई एक बहुती चोती सी चुग भी पूरे सिस्टम किले क्ठरा मालनी जाती है। और इस कतित कठरे का जो परिणाम सामने आता है ना वो किसी बूरे सपने जैसा है। बहुत बहानक। देवी कमला मया इतनी क्रुदित हो जाती है कि वो सीदे अंद्र के दरबार से एक बागिन को दंड़ देने किले बुला लेती हैं बापरे सीदे अंद्र के दरबार से रहां, सिर वेक अनसान जिसने गलती से पैर च्वा था उसे मारने के लिए एक अलोक्क बागिन बेजी जाती है ये तो बहुत यी असंगत सजा है बलक्ल और अखाडे का वो मैदान जहां गरीबन एक ताकतवर पहल्वान के रूप में जाना जाता था अव वो एक भ्यानक युद्ध्छेट्र बन जाता है इक तरव अईन्सान की अपनी कमाई होई शाररिक ताकत है अग, और तुस्सरी तरव है देविय क्रोद ये लडाए तो शुरू से ही एक तरफा है बलको लेग तरफा देखे लोग कत्हाए इस तराखे प्रतीकों का अस्तमाल यह दिखाने के लिए करती है के अन्सान का बहुतिग बल, प्रक्रती या अलोकिक सत्ता के सामने कितना बाँना है. एक पहल्वान अपनी कला से किसी तुसरे अन्सान को तो रासकता. आप उत उसकर रोस का काम तो. अगर कहानी यही खटमो जाती तो यह सर्फ दरावनी चेतावनी बन कर रह जाती एक मोरल स्टोरी की तरावन? अगर, असल में कहानी का सब से विछलित करने वाली अगर अगर कहानी यही खटमो जाती तो यह सर्फ दरावनी चेतावनी बन कर रह जाती अगर अगर कहानी यही खटमोजाती तो यह सरफ दरावनी चेतावनी बनकर रह जाती एक मोरल स्वारी की तरावना अगर असल में कहानी का सब से विचलित करने वाला हिस्सा मुद्के बाज शूरो होता है अच्छ गरीबन की लाश को बिना किसी अन्तम संसकार के यह दूसरी गटना है लाश को नदी में फेग देना यह पुरी तरह से समाज के नेटिक पतन को दरषाती है मतलप समाज ने पनी इनसानिया ठीख हो दी भिलकुल यह दिखाती है कि समाज किसी व्यक्ती को कासकर जो हाँशिये से आता हो मतलव समाज ने पनी इंसानिया थी कोडी? भिलकुल! यह दिखाती है कि समाज किसी विक्ती को, कहासकर जो हाशिये से आता हो, कितनी आसानी से उसके बून्यादी मानवी अदिकारों से बेदखल कर सकता है. अर और ये बेदख हैली सिव नदी में फेखने तक सीमत नहीं रहती नदी में बहतेवे वो लाज एक दोभी गाट पर पहुचती है अच्छा दूसरे गाट पर? अच्छा वाहा गाट पर एक दूस्रा दोभी कपडे दोरा है उसके सामने पानी में के मरिट्षरीर बहता हो आता है यहापर बाथ सच्छ में बहत्टी जास पोजाती है कैसे? मुझे यहां थोडी उलजन होती है के वो वियक्ती ये जानने की कोशिष भी नहीं करता कि लाश किस की है उंग, कोई जग्या साने? पिलकुल नहीं, उसे बस इस बाथ से चिड होती है, के ये म्रिच छरीर उसके काम में बादा डाल रहें. औरे बाप्रे. आप, वो अपनी सूविदा के लिए, उस लाश को दन्दे से दھकेल कर तुस्री तरव बहा देता है. ये तो चरम समवेदन हींता है. वही तो एक दोबी जो गरीबन के ही समवदाय का हिस्चा है अवो भी एसा कर रहा है कोई दुष्मनी नहीं है यहां बस एक गेहरी समवेदन हींता दिके इस गटना के पीचे का मुनोविग्यान बहुत गेरा है आचा वो कैसे? जब कोई अन सान मर जाता है ना ये सोचने वाथ है? ये द्रिष्छ हमें बताता है कि गरीभी और अस्तित्त की जद्डो जहद में अपनी समवेदनाए को देता है या कुई कि पेट पालना सबसे बड़ी प्राथ मिक्ता बन जाती है सही का एक गरीब यी तुसरे गरीब के प्रतिस जबसे जाडा निरमों जाता है कुकी विवस्तान नोने इसी तरा से टाला है ये बहुत ही दरावना सच है सच में एक तरव भगाट पर ये चरम अनादर चल रहा है और टीक उसी समये इक दुस्रा द्रश्छे भी उबहरता है, गरीबन के गर पर, उसकी पतनी जो इस पूरे अन्याय से तोट चुकी है, वो भग्वान के सामने न्याय के लिए गुहार लगार लगार रही है. ये तो स्वाबहविख है, वो और कर भी क्या सकती है. बिल्कुल! लेकिन उसका दूख इतना गेरा है, उसका आर्तनाद इतना सच्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्च्� जेसे कुई ज्वालमुखी पष्पडा हो. भिलकुल. पतनी की वो चरम, निराशा और समाज की वो समवेदन, हीन्ता ये दोनो आपस में तक्रागर एक एसा विस्फोट करते है जिसे नजर अंदास करनाप किसी किलिये मुमकिन नहीं होगा. अद्वाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्बाद्ब ये तो बहुती शक्तिषाली द्रिष्ट है आप आप ये देखाई तो ये न्याय मागने का बहुती अक्रामक तरीका है अगर हम एसे बड़े परी द्रिष्ट से जोडे आप भताएए तो दून्या बहर के आदीवासी और लोग परमपराँँ में अत्मा का शरीर में आना या पूजेशन का विषे बहुत आम हैं? अआ, हम ने सी कई कहनिया सूनी है. अगर अमेसे समाज शास्तर के नजर ये से देखेना, तो ये उन लोगों को आवास देने का एक बहुती कारगर मनूवे गानिक तन्त्र है, जिने समाज ने कुछल दिया हो. इक साएकोलोगिकल मेकनिसम. भलकोल, जो लोग सीदे तोर पर समाज के तेकेडारों या ताकत्वर लोगों से सवाल नहीं कर सकते, उनकी पीडा आत्माओ और देव्ताओ के माद्धिम से सामने आती है. या वाज बवान की अबाज याज बिना किसी विक्तिगत खटरे के, हाँश्ये का विक्तिए अपनी बात मनवाज सकता है. या ये ये एक बहुती शान्दार नजर्या है ये से देखने का. और इस कहानी में आत्मा सर्फ अपना दुक्ही नहीं सूनाती, अगर तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो त तो दोवीों की बद्टी मे रक्टे सारे कपडे जल जाएंगे दबटी, जाए जाए कपडे दोते है आखा, बद्टी हों जाए जाए जाए जाए दोवी कपडों को उबालते और साव करते है उनका पूरा काम वही से चलता है अगो, इस चितावनी की सतिक्तापर गूर कीजे ये कोई सामान ने श्राप नहीं कि तुम सब भीमार पडजाओगे या गाँ में आकाल आगाल आजाएगा नहीं, ये बहुत यी स्पैसिटिक है आप, ये सीधे तोर पर उस समवुदाए की तो इसका असल में क्या मतलब है, अगर इसे आज की संदरप में देखें, तो ये किसी लेपर्ष्ट़्ाए किया कलेक्टिप फाईन की तरह लकता है. बहुत सही तुलना है. कलیک्तिव फाइन की तरह लकता है. बहुत सही तुलना है. है ना? आत्मा साथ तोर पर कहरे है के जब तक तुम सभ मिलकर अपने गल्ती नहीं सुदहरते जब तक मेरे प्रती हुए अन्न्याय का प्राएश्चित नहीं होता. तब तक काम रुका रहेगा? बिल्कुल, तब तक तवारी अर्थ्वे अवस्थाथथब रहेगी, तवारी रोजी रोटी नहीं चलेगी. उस अकेले दोभी ने अपनी सुविदा के लिये लाश को दھकेला था, लेकिन अब... वप्राद स्रफ उस एक वेक्ती का नहीं जाता जिसने वो क्रित्ते किया है वो सामूहे कप्राद बन जाता है बिल्ल्कुल, वो पुरे समुदाय का सामूहे कप्राद बन जाता है इश्वराप ने उस द्होभी समुदाय को यह अजास दिलाया अगर तो बज़ाए तुरन्त फरकत लाडेती है। दर कासर तो हुताई है। अगर तो जब दोबी बिना किसी देरी के नदी में कुड परते है। वे लाज को खुज ते है। उसे पानी से बाहर निकालते है। और पूरे सम्मान के साथ दर कासर तो हुता है? आा, सबही दोभी बिना किसी देरी के नदी में कुद पडते हैं. वे लाश को खुजते है, उसे पानी से बाहर निकालते है, और पुरे सम्मान के सात, सारे रीती रिवाजो का पालन करते हुए, गरीबन का अंतिम संचकार करते है. बबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबब� अगर बडी से बडी पीडा शान्त हो जाती है अगर यही से कहानी अपने सबसे दिलचस्प और अन्तिम पडाव पर पहुचती है. नियाए मिलने और सम्मान भहाल होने के बाद, बाद सरव आत्मा की शानती तक सीमित नहीं रहती. तो आगे क्या होता? वही गरीबन, जिसकी लाश को उसी के लोगोने अप्मानित किया ता वो उस दोभी भटी का रक्षक बन जाता है आख रेवा आप वो कपडो की सुरक्षा करने वाला गरीबन भाभा या एक स्थानिय देवता बन जाता है जिस समवुदाय ने उसे नदी में दھकेल दिया था वो अब उसी समवदाय का स्थाई सन्रक्षक है ये रूपान्तरन मुझे मडल बहुती अजीब लेकिन खुबसूरत लकता है सच में ये खषमा और रूपान्तरन का एक बहुती गेरा संदेश है बिलकल यह में बताता है कि अन्याया और अनादर के बावजुद जब समहुहिक प्राएश्छित किया जाता है तो रिष्ते फिर से जुड सकते हैं जो व्यक्ती समाच के हातो सब से जबते जाडा पीडित हूँँ वही व्यक्ती न्याया मिलने के बाद उस्माज का सबसे बड़ा रक्षक बन सकता है. सही कहा. अगर आजकी इस पूरी चर्चा पर हम एक नजर डालें, तो हमने शुर्वात कीती एक अखाडे से. जाँ साभ बरावर थे? हाँ. और जाँ एक अनजानी शारीरिक भूल ने देविये क्रोद को जन्द दिया फिर हम ने देखा कि कैसे समाज के उप्योगिता वादी स्वार्थ ने एक म्रिट्ष शरीर का अपमान किया ये बिल्कुल इसके जवाब में एक श्राप मिला जिसने समवुदाय की आर्थिक नीवी हिलादी उनका पूर आज्सिस्टन तब करनेगी जितावन और अंतता इसी सामूहिक अप्राद भोद और प्राएश्चित के कारन इक सादारन दोभी गरी बन भाभा के रुप में आमर हो गया ये पूरी यात्रा हमें दिखाती है कि न्याय केवल सजजा देना नहीं है अगर अँदा नहीं अगर गरीबन बावा अपने साच्टूलन वापिस लाना है भुछ खुब का अपने ये गाता आजके समय में भी उतनी प्रसंगे कै वो कैसे दिके हमारे आस्पास के समाज में जब भी किसी पुराने अन्याय को सामोईक रुब से सुदहारा जाता है जब हम अपनी अटिहास्सिक गल्तियों को मानते है तो वो पुरानी पीडा एक सकारात्मक शक्ती में बडल सकती है. ये तो सच्मे एक विचार करने योगे बात है. और ये ये नहत्त्तोपून सवाल कडा करता है. कैसा सवाल? अगर आम थोडा और गेराई में जाकर सोचें. अगर गरीबन भावा अपने साथ हुए गोर अन्न्याय और बाद में समवदाय दवारा कियेगे प्रायष्चित के कारन एक रक्षक देवता बनें मिरा मतलबे बनें तो क्या इसका अथ यह के हमारे देश में पूजे जाने वाले कईस थानिया देवता और किमबदन्तिया दरसल समाज के शुद्दिकरन की ही कहन्या है औह, ये तो सच्मे सुचने पे मजबोर करता है क्या हम तेवताओ की पूजा सर्फ उनके दुरा की एगे चमतकारों किले करते है? या इसलिये किकि हमारा समाज अवचेतन रूप से अपने दुरा कीईगे किसी बहुत पुराने अटिहासिक अन्याय कि समहिक अप्राद बोद को शांट करना चाता है बापरे ये नजर्या तो एक दम नया है क्या ये वाखी पूजा है? या फिर सद्यों से मांगी जारी कोई मापी ये एक अईसा विचार है जिस पर हम सब को रुख कर सुचना चाईए वाखेई, ये सवाल तो हमारे देखने का नजर्या ही बडल देता है अगली बार जब भी किसी स्थाने देवता के मन्देर या चोपाल के पास से गुजरेगा, तो खुट से जरुर पूछेगा, कि या ये स्व्व आस्था कप्रतीक है, या किसी पूरानी भूल को सुदारने की एक सामहि कोशिष. बलकुल यही तो यह तियास कासली मतलब है रहा तो इसी विचार के साथ आजकी इस गेhri चर्चा को हम यही विराम देते है कुछ कहानियो में सच में हमें अंदर तक बडलने की ताकत होती है