MACHINE ASR ACCESSIBILITY AID
महुआ_की_छलांग_स्वाभिमान_या_प्रेम.m4a
Timestamped machine output
- 0:00–0:30विचार-विमर्शक बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा ब
- 0:30–1:00अपका बवाश्टी लगाई बवाश्टी लगाई बवाश्टी लगाई बवाश्टी लगाई बवाश्टी लगाई बवाश्टी लगाई बवाश्टी लगाई बवाश्टी लगाई बवाश्टी लगाई बवाश्टी लगाई ववाश्टी लगाई वाश्टी लगाई व�
- 1:00–1:05अपना बादबादी का वो हीन्सक रूप है, जो एक बहुत बड़े मानविये संगर्ष का मच बन जाती है.
- 1:06–1:10बलकुल, और आज की हमारी चर्चा इसी महुवा की कहानी पर केंद्रत है.
- 1:10–1:12बड़ बड़ मानविय संगर्ष का मंच बन जाती है.
- 1:12–1:13बलकल.
- 1:13–1:17और आजकी हमारी चर्चा इसी महूवा की कहानी पर केंद्रत है.
- 1:17–1:20एक गरीब लगकी, जिसे उसके शराभी पिता
- 1:20–1:23और लालची सोतिली माने खिर भेच दिया.
- 1:23–1:27अर महुवा का उस नाव से नदी में कुदना इस पूरी कहनी का केंधर है
- 1:28–1:31यही से हमारा आजका मुख्य सवाल अबहरता है
- 1:31–1:34क्या महुवा का नदी में कुदकर जान देना
- 1:35–1:39मुख्य रुब से अपने सतीत्वा और स्वाबिमान को बचाने किलि उठाया गया
- 1:39–1:42इक निदर बैचारिक विद्रो था
- 1:42–1:44मिरा सपष्ट मानना है कि ये कता
- 1:44–1:46पित्र सतत्मक लालच
- 1:46–1:47और और इक स्तरी को
- 1:47–1:50वस्तु समजने की मान्सिक्ता के किलाच
- 1:50–1:52एक चरम विद्रो हो का प्रतीक है
- 1:52–1:54उसने बिकने से साफ इनकार कर दिया
- 1:54–1:57दिक्ये मैं इसे बिल्कुल रड़नजर्ये से देक्तिए हूँ
- 1:57–1:59स्वाबिमान अपनी जगा है मैं मानतिए हूँ
- 1:59–2:01लेकिन इस कहानी की जो दधकन है
- 2:01–2:05इसका मोल प्रेरक्तत्व विश्ष्च्द दरूप से प्रेम है
- 2:05–2:06आच्चा
- 2:06–2:10यह एक अपोर्ण प्रेम की बहुत फीं मार्मेक त्राजदी है
- 2:10–2:15महुवा का हर कदम, यहां तक की उसका मुध्मे चलांग लगाना भी
- 2:15–2:20अपने प्रेमी तक पहुचने की एक हताश और प्रेम से प्रेरित कोशिष थी
- 2:20–2:23तो चलिए इस पर गेराए से बात करते हैं
- 2:23–2:27हमें सब से बहले महुवा की उस प्रष्टबूमी को समजना होगा
- 2:27–2:29जो से उस नावत टक लेजाती है
- 2:29–2:31गजेंद्र ताकृर के संकलन में
- 2:31–2:35महुवा को परीजे का सुंदर कहा गया है
- 2:35–2:37आ, वो बहुत सुदर थी
- 2:37–2:40लेकिन कहानी उसकी शारिरिक सुदरता के बारे में नहीं है
- 2:53–2:55अगशा को भी वो चुप्चा बरदाश्ट करती है
- 2:55–2:57आप शाएद इसे उसकी कमजोरी माने
- 2:57–3:00लेकिन लेकिन ये कमजोरी बिलकुल नहीं ती
- 3:00–3:03उस बहाला गरीभी और पित्र सट्टात्मक धाचे में
- 3:03–3:06जहाए एक लगकी की कोई हैसियत नहीं होती
- 3:06–3:08उसकी चुप्प्पी एक रननीती ती
- 3:08–3:09रननीती
- 3:09–3:12औरे नहीं मुझे लगता है आप उस चुप्पी को कुछ जादा ही
- 3:12–3:14मतलब एक बोद्धिक रंग दे रहे हैं
- 3:14–3:15ती
- 3:15–3:18कि वो कोई वेचार एक युध्ध लड़र रही ती
- 3:18–3:21वो चुप्पी किओकी उसके पास एक सपना था
- 3:36–3:38जूला मुखी कीतरा थी
- 3:38–3:40बहर से बिलकुल टन्टी शान्त
- 3:40–3:42लेकिन अंदर एक आगस उ लग रही थी
- 3:43–3:47उसे लग रहा था की गर की तक्लीफें तो उसकी अपनी है
- 3:47–3:50लेकिन जब सवदागर ने उसकी अस्मिता पर हाथ डलने की कोशिष की
- 3:51–3:52जब उसे अहसास वा
- 3:52–3:55कि उसकी हैस्यत सर्फ एक बिकाओ माल की है,
- 3:55–3:57तो वो ज्वाला मुखी फत्पडा,
- 3:57–3:59वो आत्मर अख्शा मे फत्पडी.
- 3:59–4:03वुश्वाला मुखी वाले रूपक से भिलकुल सहमत नहीं हूँ.
- 4:03–4:04क्यो नहीं?
- 4:04–4:06क्यो कि ज्वाला मुखी दिशाहीं होता है.
- 4:06–4:14वो बस अंदा दूंद पटता है, लेकिन महुवा का देरे अ और उसकी सहन शीलता पूरी तराह से एक दिशा में केंद्रे थी.
- 4:14–4:18अगर आप पाट में उसकी सकी पूर्मती के साथ उसके समवाद को देखें.
- 4:18–4:21रहा, पूर्मती उसे सांथवना देती है.
- 4:21–4:26बिल्कुल, फूल्मती उसे दारनस बंदाते हुए क्या कहती है, वो मेत्ली में कहती है,
- 4:26–4:32जरेने रहु प्रेमक आवग, यानी उस प्रेम की आग को जलाए रख हो,
- 4:32–4:36उसके लिए जो मूरंग में उंखलियो पर दिन गिन रहा है.
- 4:36–5:06वूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ�
- 5:06–5:08समजोता करना भी सिक हता है.
- 5:08–5:11अगर वो केवले खथाश प्रेमी का हूती,
- 5:11–5:14तो शायएद वो सवदागर के सामने गिडगडाती.
- 5:14–5:16वो गिडगडाई नहीं. ये सच है.
- 5:16–5:18वही तो. वो अपनी जान की भीख मांगती,
- 5:18–5:20ता कि वो किसी तरे जिन्दा रहेकर,
- 5:20–5:22अपने प्रेमी से मिल सके
- 5:22–5:23लेकिन नावपर क्या होता है
- 5:24–5:26उस दोके के श़को याद की जे
- 5:26–5:28हर कारे का गुप्त सन्देश आता है
- 5:29–5:31सिपाही करुब दर कर आय लोग
- 5:31–5:33अस्लीएत सामने लाते है
- 5:33–5:36अफ, वोख श़न वाकेंग तागनी कषत से क्रूर मोड है
- 5:36–5:39बिलकुल क्रूर है, सिपाही के वो शब द्याद है,
- 5:39–5:41उसने मेठली में बहुती तन्धेपन से कहा था,
- 5:41–5:44सबदा पाई चुका देल गेल अची.
- 5:44–5:46यानी तुमारा पूरा मोल चुकाया गया है,
- 5:46–5:48तुम कोई मुझ्थ की चीज नहीं हो.
- 5:48–5:51अग, वो उसे उसकी की मद बतारा है दा.
- 5:51–5:55ये वो पल ता जब महुवा के सामने उसकी असलीएत एक वस्तू की रुप में रख्खी रख्खी गय.
- 5:55–5:57के तमारा सवदा हो चुका है.
- 5:57–5:59और पाथ में उसकी प्रतिक्रिया देखे.
- 5:59–6:02या वो रोती है? या वो चाती बीटती है?
- 6:02–6:03नहीं नहीं
- 6:03–6:04नहीं
- 6:04–6:06पाट कता है कि ये सत्ते जानकर
- 6:06–6:08महुवा के भीटर कोई पीडा नहीं
- 6:08–6:09बलकी एक द्रद्ता जागी
- 6:09–6:11वो बाहर से शान्त हो गगी
- 6:11–6:13और भीटर से उसने एक निणने ले लिया
- 6:13–6:18सवदागर और सिपाहीों ले उसकी इस शान्ती को उसका आत्म समर पनमान लिया
- 6:18–6:20जो की उनकी बहुड बवूल थी
- 6:20–6:24बलकल, यही उनो ले उस जोला मुखी को कमतर आखने की बूल की
- 6:24–6:29ये जो भीतर का निने था ये पुरी तरह से अपनी गरिमा को बचाने का फैसला था
- 6:29–6:33लेकिन आप उस निरने के बाद की कारवाई को नदर नदास कर रहे हैं
- 6:33–6:35मैं क्या नदर नदास कर रहू?
- 6:35–6:39अगर ये केवल समान बचाने और वस्तू नब नदने की बाथ हूती
- 6:39–6:43अगर ये केवल एक सचेट वैचारिक फैसला हूता
- 6:43–6:47तो वो नाव से पानी में बस कुद कर जल समादी ले सकती ती.
- 6:47–6:50बहुत सी कहानियो में स्वाभिमान बचाने के लिए
- 6:50–6:52लोग बस दूब जाते हैं.
- 6:52–6:53हादूब जाते है.
- 6:53–6:58लेकिन श्रोट सामंगरी सपष्ट करती है कि वो पानी में कुदने के बाद क्या करती है.
- 6:58–7:01वो उल्तादार में मोरंग्दिस निकल जाए चाहिक
- 7:01–7:04वो उफन्ती नदी की विप्रीत दारा में
- 7:04–7:08उस तरव तेरने की कोषिष करती है जाहा मोरंग है
- 7:08–7:12जाहा उसका प्रेमी सात पार की नाव लेकर लिए नतदार कर राए
- 7:12–7:14अग, उडिदारा में तेरना ही तो विद्रो है?
- 7:14–7:15कैसे?
- 7:15–7:17वो उस बहाव के सात नहीं बहना चाहती,
- 7:17–7:20जो समाज ने उसके लिए तेख रग गर दिया था.
- 7:20–7:23सोदागर उसे जिस दिशा में लेजा रहा था,
- 7:23–7:25वो उस दिशा के विप्रित जाती है.
- 7:25–7:26उसके लिए तेख ऱगा था
- 7:26–7:29सवादागरो से जिस दिशा में लेजा रहा था
- 7:29–7:59वुँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ�
- 7:59–8:04प्राक्रतिक शक्तिया उसके शारिरिक बल्से कही अदिक बडी थी.
- 8:05–8:08इस्लिये मैंए से एक वैचारिक जीत के रूप में नहीं देख बाती.
- 8:09–8:11ये प्रक्रति और नियती के सामने एक अन्सान की हार है.
- 8:11–8:16ये एक आईसी लगकी की तरासदी है, जो बस अपने प्यार तक पहुचना चाती ती,
- 8:16–8:19लेकिन दून्या के लालच्छ ने उसे नदी में दुभो दिया.
- 8:19–8:21पर क्या वो वाक्के यी हार गगगग?
- 8:21–8:25मुझे लगता है है हम जीट और हार को बहुत-बहुत संकी नजर्ये से देख रहे हैं.
- 8:25–8:29जब महु आपनी माख के विश्वास गाथ पर विलाप करती है वो कैती है,
- 8:29–8:31नों चता के किये नहीं मार लहु,
- 8:31–8:33पोस लहु एही दिन कातिर.
- 8:33–8:35हाँ, वो बहुत मार मिक पंकती है.
- 8:35–8:39मतलब बच्पन मेही नमक चताकर क्यो नहीं मार दाला?
- 8:39–8:43क्या इसी दिन किलिए पाला ता कि मुझे भेज सको?
- 8:43–8:46ये सवाल सर्फ एक दूखी प्रेमिका का नहीं है?
- 8:46–8:50ये उस पूरी सामाजिक वेवस्ताप पर एक करारा तमाचा है,
- 8:50–8:55जो भेटीों को बोज और मुनाफे की वस्तू समष्ती है
- 8:55–8:57वो उस मात्रित्वः पर सवाल उतारे है
- 8:57–9:00जो पित्र सत्ता के सामने बिक गया
- 9:00–9:02और रही भात तेरने की
- 9:02–9:05तो जब सोदागर ने अपनी बाहो में जकरना चाह
- 9:05–9:08सोदागर उक्रा कोरा में बैसाभे चाहलक
- 9:08–9:10तब महुवा चट पटाती है
- 9:10–9:12आ, वो उसे चूना चाटा ता
- 9:12–9:14और पाथ में सपष्छ लिखा है
- 9:14–9:16आपन सतित्वक रक्षा में
- 9:16–9:20उसने खुद को उस गंदे सपर्ष्छ से बचाने किलिए चलांग लगाई
- 9:20–9:23मिर्ट्यो को चुन्ना लेकिन अपनी गरीमा को नब एचना
- 9:23–9:25यही तो उसकी सबसे बड़ी जीद है?
- 9:25–9:28दिके मैं इस बाथ से बेल्को लिनकार ने कर रही,
- 9:28–9:30कि सवदागर का सपरश उसके लिए असहन्या था.
- 9:30–9:34लेकिन आ बार बार उसे एक वैचार एक युद्दा बनारे हैं.
- 9:34–9:36वो एक इनसान ती.
- 9:36–9:38कोई आमुरत आदरश नहीं.
- 9:38–9:46और इस कहानी का सब से दिल्चष्प और और रहस्वैई हिस्सा महुवा का कुदना नहीं है, वो है उस चोटे सिपाही का कुदना.
- 9:46–9:52अच्छा अज वो सवादागर का सिपाही जो अचानक महुवा के पीछे नदी में कुध परता है.
- 9:52–9:59तीक वही, अगर ये कहानी स्र्फ महुवा के स्वाभिमान और पित्रसता के खिलाफ उसके विद्रोग की होती,
- 9:59–10:03तो सिपाही का काम? वो तोसी पित्रसता और वेवस्ता का हिस्सा थाना?
- 10:03–10:05तकनी की रूब से हाँ?
- 10:05–10:07लेकिन वो पानी में क्यों कुदा?
- 10:07–10:11श्रोद कहता है कि वो महुवा से गुप्त रूप से प्रेम करने लगा था.
- 10:11–10:16गजिंद्र ताकृर का संकलन यहां एक बहुत्ही गेरी और मार्मिक पिप्पनी करता है.
- 10:16–10:20वो लिकते है एक्ता प्रेम जे कह्यो पुर्न नहीं भेल,
- 10:20–10:23आ एक ता नवः प्रेम जे जन्म दे कथम भागल
- 10:23–10:27यानी एक प्रेम जो महुवा और मोरंग वाले प्रेमी का था
- 10:27–10:29जो कभी पूरा नहीं हुवा
- 10:29–10:32और एक नया प्रेम जो सिपाही का महुवा के प्रती ता
- 10:32–10:34जो जन्म लेते ही खट्म होगया
- 10:34–10:37ये वाके इस पूरी लोग कता की आत्मा है
- 10:37–10:38मैं समज रों आप खय रही है
- 10:38–10:40लेखग खुद इसे प्रेम की पूर्नता
- 10:40–10:43और अपुर्नता के चश्मे से देख रहा है
- 10:43–10:46यसिद करता है कि आमरता केवल उसके सम्मान में नहीं
- 10:46–10:49बलकी उस अदूरे प्रेम की गुँज में है
- 10:49–10:54लेकिन उस सिपाही के ह्रिदेः परिवर्तन का तन्त्र मैकेनिзम क्या ता?
- 10:54–10:56वो आचाना क्यों कुर पडा?
- 10:56–10:58वो सिपाही उसी नावपर ता?
- 10:58–11:00वो उस क्रूर वेवस्ता का मूह्रा ता?
- 11:00–11:02जिसने महुवा को खरीदा ता?
- 11:02–11:02रहां
- 11:02–11:06लेकिन जब वो देकता है कि एक निहत्ती असाहाई लगकी
- 11:06–11:09जिसके पास दून्या की कोई ताकत नहीं है
- 11:09–11:11वो अपने आत्म सम्मान के लिए
- 11:11–11:13प्रक्रती के सब से खोफनाक रूप
- 11:13–11:15उफन्ती नदी इसे तक्रा जाती है
- 11:15–11:18तो महूवा की उस आदम में विचारिक ताकत ने
- 11:18–11:21उस सिपाही के अंदर के अंसान को जगजोर दिया
- 11:21–11:23इस ये
- 11:23–11:26सिपाही का प्रेम कोई सादारन रोमान्तिक अकरशन नहीं ता
- 11:26–11:30ये महुवा के उस तेज उस स्वाबिमान के पती समर पर ता
- 11:30–11:34ब्रश्ट्वेवस्ता के सिपाही के अंदर भी अंसानियत जगादी
- 11:34–11:37ये प्रेम से जआदा गरीमा के प्रभाव की कहानी है
- 11:37–11:40ये बहुती काव्यात्मक तर के आपका
- 11:40–11:43की उसके स्वाभी मान ने सिपाही को बड़ल दिया
- 11:43–11:46लिकन अप ये प्हुल रहे हैं कि लोग कताए
- 11:46–11:50अप ये पूल रहें कि लोग कताए समाज में कैसे जी वित्रेती हैं?
- 11:51–11:54समाज अकसर जटिल मानवि एप्रास दियों को
- 11:54–11:57सरल आदर्षात्मक प्रतीको में बडलना पसन्द करता है.
- 11:58–11:58कैसे?
- 11:58–12:02समाज को एक असी लगकी की कहानी पचानी ती
- 12:02–12:04जिसे उसके ही परिवार ने बेच दिया,
- 12:04–12:07और जो एक अजे आजे प्रेमी से मिलने के लिए बाग रही थी,
- 12:07–12:11जिसे समाज ने शायध शायध मानेटा नहीं दी थी.
- 12:11–12:13तो समाज ने क्या किया?
- 12:13–12:17समाज ने उसे सतित्व और बलीदान का अवरन पहना दिया.
- 12:17–12:23समाज ने उसे आवरन नहीं पहनाया, उसने अपनी म्रित्तू से वहस्तान अरजित किया है.
- 12:23–12:26पाट के अंट में सपश्ट रूप से बताया गया है,
- 12:26–12:31कि महुवा की गाता मित्ला में स्त्री, सतित्व, सहस, अब बलिदानक प्रतिक बन गये है.
- 12:31–12:37अप खुद देखेगे कि समाज आज भी सावन मादों की अपनती नदी को देखकर क्या लोग गीद गाता है?
- 12:38–12:42वे गाते है सावन भादोख बभरल दार कम वयसक महुवा नहीं जाूए.
- 12:43–12:46समाज उसे इक आमर आदरष के रुप मे देखता है.
- 12:46–12:49वो एक चितावनी के रूप में गाता है, क्यों?
- 12:49–12:50क्यों की?
- 12:50–12:54क्यों की उसने अपने आत्म सम्मान और चरित्र से रत्ती बहर भी समजोता नहीं किया.
- 12:54–12:58उसने दिखा दिया कि एक स्त्री की देपर उसका अपना दिकार है,
- 12:58–13:00किसी सुदागर की पुजी का नहीं.
- 13:00–13:04देखे समाज भले ही अपनी भेट्यों को दराने या सिक्ठाने किलिए,
- 13:04–13:07कम वयस्क महुआ नहीं जाूग जाँगाता हो,
- 13:07–13:11लेकिन इस कहानी का लोख स्वरुब कुछ औरी गवाही देता है.
- 13:11–13:13आच्छा क्या गवाही देता है?
- 13:13–13:17जब हम इस लोग कता की चक्रिय प्रक्रती को देकते है,
- 13:17–13:20जब हम इस लोग कता की चक्रिय प्रक्रती को देकते है,
- 13:20–13:24जब हम इस लोग कता की चक्रिय प्रक्रती को देकते है,
- 13:24–13:28जब हम इस लोग कता की चक्रिय प्रक्रती को देकते है,
- 13:28–13:30तो ये आपको क्या लकता है?
- 13:30–13:35यह किसी महान वैचारे क्योद्दा की विजेग आत्टा जैसी नहीं लकती?
- 13:35–13:37ये एक बूथ की कहानी लकती है?
- 13:37–13:42एक अपोण बभतकती हुई आत्मा की कहानी?
- 13:42–13:45बभतकती आत्मा, आप मवा को सरफ बूथ मान रही है?
- 13:45–13:50मिरा मतलब है कि अगर ये केवल एक सचेट आत्मसम्मान की विजै होती,
- 13:50–13:54तो बार्तिय दर्शन के अनुसार उस आत्मा को मोक्ष मिल गया होता.
- 13:54–13:57उसने अपना काम किया और वो मुक्त होगे,
- 13:57–14:01लेकिन वो आज भी सावन भादो की रातो में उस नदी में जीवित है.
- 14:01–14:06उसे लोग परी के रूप में देकते हैं
- 14:06–14:09जो आज भी उस पानी में मुझुद है
- 14:09–14:13क्यों? क्यों कि मनुश्षे की प्रेम के प्रती जो अटूट आस्था है
- 14:13–14:15वो कभी मरती नहीं है
- 14:15–14:20जो आस्था उसे विप्री द्फारा में अपनी जान की परवाग की ए बिना
- 14:20–14:25वो आश्या की शाएद किसी दिन वो उस किनारे पहुट जाएगी जाएँ उसका प्रेमी है.
- 14:25–14:31यही उस कता का वो दुखध दत्ट्ट्व है, जो आज भी लोगों की आखो में आशुल याता है.
- 14:31–14:38यही उस कता का वो दुखखद दध्टव है, जो आज भी लोगों की आखो में आज्सूल याता है.
- 14:38–14:44ये एक रहारी हुई लडाए ती, लेकिन ये विष्छुद रूप से प्रेम के लिए लडी गगी ती.
- 14:44–14:51बवाद को कैसे नजर अंदास कर सकते हैं कि कहानी का मुक्छ्विलन प्रेम में आईई कोई बादा नहीं ती, बलकि वो लालच था जिस ने एक अज़न का वस्तुकरन किया, उसे कोमवोडीटिट़वाई किया.
- 14:51–14:57अपने बाद को कैसे नजर अंदास कर सकते हैं कि कहानी का मुख्यविलन प्रेम में आई कोई बादा नहीं ती
- 14:57–15:02बलकि वो लालज था जिसने एक अईक अजस्तो करन किया उसे कोमवोडिफाई किया
- 15:02–15:04अग, लालच तो ताई ही
- 15:04–15:08सोतेली माउ से नबेजती, अगर सवदागर उसे नख़रीतता,
- 15:08–15:10तो क्या महुवा उस नदी में कुछती?
- 15:10–15:13नहीं, वो चुप्चाःप अपने गर में पागुन का प्रच्टी रहती.
- 15:14–15:17इसलिए, जो चीज उसे उस चरम बिन्दू तक दखेलती है,
- 15:17–15:21उपने प्रेम की तदब नहीं बलकी गरीमा का हनन है
- 15:21–15:26जब महुवाने चलांग लगाए तो तो असने सप अपनी जान नहीं दी
- 15:26–15:29उसने उस पूरी वेवस्ता की हार सूनिष्छित कर दी
- 15:29–15:31जो सोचती ती की पैसे से सब कुछ खरीदा जासकता है
- 15:31–15:36सवदागर आपना पैसा गवा बआथा, और और उसे वो लडकी भी नहीं मिली जेसे उसने खरीदा था,
- 15:36–15:39ये महुवा का उस सवदे को सिरे से कहारिज करना था.
- 15:40–15:44सवदागर हार गया ये सच है, लेकिन महुवा भी तो हार गय,
- 15:44–16:14आप इसे सवदे को खारिज करना कै रहे हैं, मैं इसे उस ख्रूर दूनिया से बागने का एक मात्र रास्ता कोँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ�
- 16:14–16:19वो बवागे का फैस्टला कुद किया उस्टे वो नहीं चुना जो उसकिले तैकर दिया गया था
- 16:20–16:25चहे वो मुथ हो या उल्टी दारा में तैरने की असमभफ कोशिश
- 16:26–16:29महूवाने सावित किया कि उसकी इच्छा शक्ती को खरीदा नहीं जासकता
- 16:29–16:32अव उल्टी दारा मे तेरने की असमभव कोशिश,
- 16:32–16:37महुवाने साविद किया कि उसकी इच्छा शकती को खरीदा नहीं जासकता.
- 16:37–16:41मुझे लगता है कि यही पर हमारे नजर ये आखर एक बिन्दूपट तक्राते हैं.
- 16:41–16:45आप उसकी इच्छा शक्ती को गरीमा और सम्मान की जीत मानते हैं
- 16:45–16:52और मैं उसी इच्छा शक्ती को प्रेम की अंदी, हताश और और बहुती खुपसुरत तागत मानती हूं
- 16:52–16:54आप दोनो पहलु बहुत मस्वूत है
- 16:54–16:58गजेंदर ठाकों की इस मुल सामगरी की खुबसुरती यही है,
- 16:59–17:01कि यह आमे एक सा दोनो चीजे दिखाती है.
- 17:01–17:04इस में समाज का वो उनाणा सच भी है,
- 17:04–17:07जा गरीबी और लालच इनसान को अंदा कर देते हैं,
- 17:08–17:10और मानव हिदै का वो कोमल,
- 17:10–17:11जिद्दी कोना भी है,
- 17:11–17:15जो मुड के सामने भी अपने प्रेम को नहीं चोड़ता.
- 17:15–17:18सच में, ये कहानी हमें अनसान की सहन शीलता
- 17:18–17:21और उसके भीतर की उस अदम में आग के बारे में
- 17:21–17:23बहुत कुछ सोचने पर मजवोर करती है.
- 17:23–17:26महुवा की कहानी एक दरपन की तरह है.
- 17:26–17:29अगर आप उस्मेक विद्रोही नाईका देखना चाते हैं
- 17:29–17:33जिसने जुकने से प्यार कर दिया, तो वो आपको दिखेगी
- 17:33–17:34बिलकोल
- 17:34–17:37और आप उस्मेक एसी प्रेमी का देखना चाते हैं
- 17:37–17:41जिसने प्यार किलिए दूनिया और प्रकरती दोनो से लगाई मोल लेली
- 17:41–17:43तो वो भी वहां मोजुद है.
- 17:43–17:45और जो श्रोटा हमारे साथ जुडे हूए है,
- 17:45–17:47मैं उने आमन्त्रत करूंगी,
- 17:47–17:50कि वे स्वयम गजेंद्र ताकृग्र दबारा संकलत,
- 17:50–17:54महुवा गध्वारिन की इस मूल समगरी को पडें.
- 17:54–17:56इस में जो मेठिली भाशा की मिठास है,
- 17:56–17:58अपको अंदर तक्जग जोड़ देगी.
- 17:58–17:59बलकल सही कहा.
- 17:59–18:01आप खुद पड़े और तैकरे,
- 18:01–18:04कि जब महुवाने पानी में चलांग लगाई,
- 18:04–18:07तु क्या वो अपने आत्म सम्मान की रक्षा कर रही थी?
- 18:07–18:10तु क्या वो अपने आत्म सम्मान की रक्षा कर रही थी?
- 18:10–18:15या वो उस उल्ती दारा मे अपने अदूरे प्रेम की तलाश कर रही थी?
- 18:15–18:16बिल्कुल!
- 18:16–18:20क्योकी अंत में महान लोक कताय हमें कोई बना बनाया उत्र नी देती
- 18:20–18:50अगर बादना बादना बादना बादना बादना बादना बादना बादना बादना बादना बादना बादना बादना बादना बादना बादना बादना बादना बादना बादना बादना बादना बादना बादना बादना बादना बादना बादना बादना बादना बादना �
- 18:50–18:54तब आदिबेट में हमारे साज ज़ूरने के लिए आपका बहुत-बहुत दनेवाद
- 18:54–18:57हम फिर मेंगे एक नहीं चर्चा और एक नहीं द्रिष्टिकोन के साथ
Plain text
विचार-विमर्शक बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा बादा ब अपका बवाश्टी लगाई बवाश्टी लगाई बवाश्टी लगाई बवाश्टी लगाई बवाश्टी लगाई बवाश्टी लगाई बवाश्टी लगाई बवाश्टी लगाई बवाश्टी लगाई बवाश्टी लगाई ववाश्टी लगाई वाश्टी लगाई व� अपना बादबादी का वो हीन्सक रूप है, जो एक बहुत बड़े मानविये संगर्ष का मच बन जाती है. बलकुल, और आज की हमारी चर्चा इसी महुवा की कहानी पर केंद्रत है. बड़ बड़ मानविय संगर्ष का मंच बन जाती है. बलकल. और आजकी हमारी चर्चा इसी महूवा की कहानी पर केंद्रत है. एक गरीब लगकी, जिसे उसके शराभी पिता और लालची सोतिली माने खिर भेच दिया. अर महुवा का उस नाव से नदी में कुदना इस पूरी कहनी का केंधर है यही से हमारा आजका मुख्य सवाल अबहरता है क्या महुवा का नदी में कुदकर जान देना मुख्य रुब से अपने सतीत्वा और स्वाबिमान को बचाने किलि उठाया गया इक निदर बैचारिक विद्रो था मिरा सपष्ट मानना है कि ये कता पित्र सतत्मक लालच और और इक स्तरी को वस्तु समजने की मान्सिक्ता के किलाच एक चरम विद्रो हो का प्रतीक है उसने बिकने से साफ इनकार कर दिया दिक्ये मैं इसे बिल्कुल रड़नजर्ये से देक्तिए हूँ स्वाबिमान अपनी जगा है मैं मानतिए हूँ लेकिन इस कहानी की जो दधकन है इसका मोल प्रेरक्तत्व विश्ष्च्द दरूप से प्रेम है आच्चा यह एक अपोर्ण प्रेम की बहुत फीं मार्मेक त्राजदी है महुवा का हर कदम, यहां तक की उसका मुध्मे चलांग लगाना भी अपने प्रेमी तक पहुचने की एक हताश और प्रेम से प्रेरित कोशिष थी तो चलिए इस पर गेराए से बात करते हैं हमें सब से बहले महुवा की उस प्रष्टबूमी को समजना होगा जो से उस नावत टक लेजाती है गजेंद्र ताकृर के संकलन में महुवा को परीजे का सुंदर कहा गया है आ, वो बहुत सुदर थी लेकिन कहानी उसकी शारिरिक सुदरता के बारे में नहीं है अगशा को भी वो चुप्चा बरदाश्ट करती है आप शाएद इसे उसकी कमजोरी माने लेकिन लेकिन ये कमजोरी बिलकुल नहीं ती उस बहाला गरीभी और पित्र सट्टात्मक धाचे में जहाए एक लगकी की कोई हैसियत नहीं होती उसकी चुप्प्पी एक रननीती ती रननीती औरे नहीं मुझे लगता है आप उस चुप्पी को कुछ जादा ही मतलब एक बोद्धिक रंग दे रहे हैं ती कि वो कोई वेचार एक युध्ध लड़र रही ती वो चुप्पी किओकी उसके पास एक सपना था जूला मुखी कीतरा थी बहर से बिलकुल टन्टी शान्त लेकिन अंदर एक आगस उ लग रही थी उसे लग रहा था की गर की तक्लीफें तो उसकी अपनी है लेकिन जब सवदागर ने उसकी अस्मिता पर हाथ डलने की कोशिष की जब उसे अहसास वा कि उसकी हैस्यत सर्फ एक बिकाओ माल की है, तो वो ज्वाला मुखी फत्पडा, वो आत्मर अख्शा मे फत्पडी. वुश्वाला मुखी वाले रूपक से भिलकुल सहमत नहीं हूँ. क्यो नहीं? क्यो कि ज्वाला मुखी दिशाहीं होता है. वो बस अंदा दूंद पटता है, लेकिन महुवा का देरे अ और उसकी सहन शीलता पूरी तराह से एक दिशा में केंद्रे थी. अगर आप पाट में उसकी सकी पूर्मती के साथ उसके समवाद को देखें. रहा, पूर्मती उसे सांथवना देती है. बिल्कुल, फूल्मती उसे दारनस बंदाते हुए क्या कहती है, वो मेत्ली में कहती है, जरेने रहु प्रेमक आवग, यानी उस प्रेम की आग को जलाए रख हो, उसके लिए जो मूरंग में उंखलियो पर दिन गिन रहा है. वूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ� समजोता करना भी सिक हता है. अगर वो केवले खथाश प्रेमी का हूती, तो शायएद वो सवदागर के सामने गिडगडाती. वो गिडगडाई नहीं. ये सच है. वही तो. वो अपनी जान की भीख मांगती, ता कि वो किसी तरे जिन्दा रहेकर, अपने प्रेमी से मिल सके लेकिन नावपर क्या होता है उस दोके के श़को याद की जे हर कारे का गुप्त सन्देश आता है सिपाही करुब दर कर आय लोग अस्लीएत सामने लाते है अफ, वोख श़न वाकेंग तागनी कषत से क्रूर मोड है बिलकुल क्रूर है, सिपाही के वो शब द्याद है, उसने मेठली में बहुती तन्धेपन से कहा था, सबदा पाई चुका देल गेल अची. यानी तुमारा पूरा मोल चुकाया गया है, तुम कोई मुझ्थ की चीज नहीं हो. अग, वो उसे उसकी की मद बतारा है दा. ये वो पल ता जब महुवा के सामने उसकी असलीएत एक वस्तू की रुप में रख्खी रख्खी गय. के तमारा सवदा हो चुका है. और पाथ में उसकी प्रतिक्रिया देखे. या वो रोती है? या वो चाती बीटती है? नहीं नहीं नहीं पाट कता है कि ये सत्ते जानकर महुवा के भीटर कोई पीडा नहीं बलकी एक द्रद्ता जागी वो बाहर से शान्त हो गगी और भीटर से उसने एक निणने ले लिया सवदागर और सिपाहीों ले उसकी इस शान्ती को उसका आत्म समर पनमान लिया जो की उनकी बहुड बवूल थी बलकल, यही उनो ले उस जोला मुखी को कमतर आखने की बूल की ये जो भीतर का निने था ये पुरी तरह से अपनी गरिमा को बचाने का फैसला था लेकिन आप उस निरने के बाद की कारवाई को नदर नदास कर रहे हैं मैं क्या नदर नदास कर रहू? अगर ये केवल समान बचाने और वस्तू नब नदने की बाथ हूती अगर ये केवल एक सचेट वैचारिक फैसला हूता तो वो नाव से पानी में बस कुद कर जल समादी ले सकती ती. बहुत सी कहानियो में स्वाभिमान बचाने के लिए लोग बस दूब जाते हैं. हादूब जाते है. लेकिन श्रोट सामंगरी सपष्ट करती है कि वो पानी में कुदने के बाद क्या करती है. वो उल्तादार में मोरंग्दिस निकल जाए चाहिक वो उफन्ती नदी की विप्रीत दारा में उस तरव तेरने की कोषिष करती है जाहा मोरंग है जाहा उसका प्रेमी सात पार की नाव लेकर लिए नतदार कर राए अग, उडिदारा में तेरना ही तो विद्रो है? कैसे? वो उस बहाव के सात नहीं बहना चाहती, जो समाज ने उसके लिए तेख रग गर दिया था. सोदागर उसे जिस दिशा में लेजा रहा था, वो उस दिशा के विप्रित जाती है. उसके लिए तेख ऱगा था सवादागरो से जिस दिशा में लेजा रहा था वुँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ� प्राक्रतिक शक्तिया उसके शारिरिक बल्से कही अदिक बडी थी. इस्लिये मैंए से एक वैचारिक जीत के रूप में नहीं देख बाती. ये प्रक्रति और नियती के सामने एक अन्सान की हार है. ये एक आईसी लगकी की तरासदी है, जो बस अपने प्यार तक पहुचना चाती ती, लेकिन दून्या के लालच्छ ने उसे नदी में दुभो दिया. पर क्या वो वाक्के यी हार गगगग? मुझे लगता है है हम जीट और हार को बहुत-बहुत संकी नजर्ये से देख रहे हैं. जब महु आपनी माख के विश्वास गाथ पर विलाप करती है वो कैती है, नों चता के किये नहीं मार लहु, पोस लहु एही दिन कातिर. हाँ, वो बहुत मार मिक पंकती है. मतलब बच्पन मेही नमक चताकर क्यो नहीं मार दाला? क्या इसी दिन किलिए पाला ता कि मुझे भेज सको? ये सवाल सर्फ एक दूखी प्रेमिका का नहीं है? ये उस पूरी सामाजिक वेवस्ताप पर एक करारा तमाचा है, जो भेटीों को बोज और मुनाफे की वस्तू समष्ती है वो उस मात्रित्वः पर सवाल उतारे है जो पित्र सत्ता के सामने बिक गया और रही भात तेरने की तो जब सोदागर ने अपनी बाहो में जकरना चाह सोदागर उक्रा कोरा में बैसाभे चाहलक तब महुवा चट पटाती है आ, वो उसे चूना चाटा ता और पाथ में सपष्छ लिखा है आपन सतित्वक रक्षा में उसने खुद को उस गंदे सपर्ष्छ से बचाने किलिए चलांग लगाई मिर्ट्यो को चुन्ना लेकिन अपनी गरीमा को नब एचना यही तो उसकी सबसे बड़ी जीद है? दिके मैं इस बाथ से बेल्को लिनकार ने कर रही, कि सवदागर का सपरश उसके लिए असहन्या था. लेकिन आ बार बार उसे एक वैचार एक युद्दा बनारे हैं. वो एक इनसान ती. कोई आमुरत आदरश नहीं. और इस कहानी का सब से दिल्चष्प और और रहस्वैई हिस्सा महुवा का कुदना नहीं है, वो है उस चोटे सिपाही का कुदना. अच्छा अज वो सवादागर का सिपाही जो अचानक महुवा के पीछे नदी में कुध परता है. तीक वही, अगर ये कहानी स्र्फ महुवा के स्वाभिमान और पित्रसता के खिलाफ उसके विद्रोग की होती, तो सिपाही का काम? वो तोसी पित्रसता और वेवस्ता का हिस्सा थाना? तकनी की रूब से हाँ? लेकिन वो पानी में क्यों कुदा? श्रोद कहता है कि वो महुवा से गुप्त रूप से प्रेम करने लगा था. गजिंद्र ताकृर का संकलन यहां एक बहुत्ही गेरी और मार्मिक पिप्पनी करता है. वो लिकते है एक्ता प्रेम जे कह्यो पुर्न नहीं भेल, आ एक ता नवः प्रेम जे जन्म दे कथम भागल यानी एक प्रेम जो महुवा और मोरंग वाले प्रेमी का था जो कभी पूरा नहीं हुवा और एक नया प्रेम जो सिपाही का महुवा के प्रती ता जो जन्म लेते ही खट्म होगया ये वाके इस पूरी लोग कता की आत्मा है मैं समज रों आप खय रही है लेखग खुद इसे प्रेम की पूर्नता और अपुर्नता के चश्मे से देख रहा है यसिद करता है कि आमरता केवल उसके सम्मान में नहीं बलकी उस अदूरे प्रेम की गुँज में है लेकिन उस सिपाही के ह्रिदेः परिवर्तन का तन्त्र मैकेनिзम क्या ता? वो आचाना क्यों कुर पडा? वो सिपाही उसी नावपर ता? वो उस क्रूर वेवस्ता का मूह्रा ता? जिसने महुवा को खरीदा ता? रहां लेकिन जब वो देकता है कि एक निहत्ती असाहाई लगकी जिसके पास दून्या की कोई ताकत नहीं है वो अपने आत्म सम्मान के लिए प्रक्रती के सब से खोफनाक रूप उफन्ती नदी इसे तक्रा जाती है तो महूवा की उस आदम में विचारिक ताकत ने उस सिपाही के अंदर के अंसान को जगजोर दिया इस ये सिपाही का प्रेम कोई सादारन रोमान्तिक अकरशन नहीं ता ये महुवा के उस तेज उस स्वाबिमान के पती समर पर ता ब्रश्ट्वेवस्ता के सिपाही के अंदर भी अंसानियत जगादी ये प्रेम से जआदा गरीमा के प्रभाव की कहानी है ये बहुती काव्यात्मक तर के आपका की उसके स्वाभी मान ने सिपाही को बड़ल दिया लिकन अप ये प्हुल रहे हैं कि लोग कताए अप ये पूल रहें कि लोग कताए समाज में कैसे जी वित्रेती हैं? समाज अकसर जटिल मानवि एप्रास दियों को सरल आदर्षात्मक प्रतीको में बडलना पसन्द करता है. कैसे? समाज को एक असी लगकी की कहानी पचानी ती जिसे उसके ही परिवार ने बेच दिया, और जो एक अजे आजे प्रेमी से मिलने के लिए बाग रही थी, जिसे समाज ने शायध शायध मानेटा नहीं दी थी. तो समाज ने क्या किया? समाज ने उसे सतित्व और बलीदान का अवरन पहना दिया. समाज ने उसे आवरन नहीं पहनाया, उसने अपनी म्रित्तू से वहस्तान अरजित किया है. पाट के अंट में सपश्ट रूप से बताया गया है, कि महुवा की गाता मित्ला में स्त्री, सतित्व, सहस, अब बलिदानक प्रतिक बन गये है. अप खुद देखेगे कि समाज आज भी सावन मादों की अपनती नदी को देखकर क्या लोग गीद गाता है? वे गाते है सावन भादोख बभरल दार कम वयसक महुवा नहीं जाूए. समाज उसे इक आमर आदरष के रुप मे देखता है. वो एक चितावनी के रूप में गाता है, क्यों? क्यों की? क्यों की उसने अपने आत्म सम्मान और चरित्र से रत्ती बहर भी समजोता नहीं किया. उसने दिखा दिया कि एक स्त्री की देपर उसका अपना दिकार है, किसी सुदागर की पुजी का नहीं. देखे समाज भले ही अपनी भेट्यों को दराने या सिक्ठाने किलिए, कम वयस्क महुआ नहीं जाूग जाँगाता हो, लेकिन इस कहानी का लोख स्वरुब कुछ औरी गवाही देता है. आच्छा क्या गवाही देता है? जब हम इस लोग कता की चक्रिय प्रक्रती को देकते है, जब हम इस लोग कता की चक्रिय प्रक्रती को देकते है, जब हम इस लोग कता की चक्रिय प्रक्रती को देकते है, जब हम इस लोग कता की चक्रिय प्रक्रती को देकते है, तो ये आपको क्या लकता है? यह किसी महान वैचारे क्योद्दा की विजेग आत्टा जैसी नहीं लकती? ये एक बूथ की कहानी लकती है? एक अपोण बभतकती हुई आत्मा की कहानी? बभतकती आत्मा, आप मवा को सरफ बूथ मान रही है? मिरा मतलब है कि अगर ये केवल एक सचेट आत्मसम्मान की विजै होती, तो बार्तिय दर्शन के अनुसार उस आत्मा को मोक्ष मिल गया होता. उसने अपना काम किया और वो मुक्त होगे, लेकिन वो आज भी सावन भादो की रातो में उस नदी में जीवित है. उसे लोग परी के रूप में देकते हैं जो आज भी उस पानी में मुझुद है क्यों? क्यों कि मनुश्षे की प्रेम के प्रती जो अटूट आस्था है वो कभी मरती नहीं है जो आस्था उसे विप्री द्फारा में अपनी जान की परवाग की ए बिना वो आश्या की शाएद किसी दिन वो उस किनारे पहुट जाएगी जाएँ उसका प्रेमी है. यही उस कता का वो दुखध दत्ट्ट्व है, जो आज भी लोगों की आखो में आशुल याता है. यही उस कता का वो दुखखद दध्टव है, जो आज भी लोगों की आखो में आज्सूल याता है. ये एक रहारी हुई लडाए ती, लेकिन ये विष्छुद रूप से प्रेम के लिए लडी गगी ती. बवाद को कैसे नजर अंदास कर सकते हैं कि कहानी का मुक्छ्विलन प्रेम में आईई कोई बादा नहीं ती, बलकि वो लालच था जिस ने एक अज़न का वस्तुकरन किया, उसे कोमवोडीटिट़वाई किया. अपने बाद को कैसे नजर अंदास कर सकते हैं कि कहानी का मुख्यविलन प्रेम में आई कोई बादा नहीं ती बलकि वो लालज था जिसने एक अईक अजस्तो करन किया उसे कोमवोडिफाई किया अग, लालच तो ताई ही सोतेली माउ से नबेजती, अगर सवदागर उसे नख़रीतता, तो क्या महुवा उस नदी में कुछती? नहीं, वो चुप्चाःप अपने गर में पागुन का प्रच्टी रहती. इसलिए, जो चीज उसे उस चरम बिन्दू तक दखेलती है, उपने प्रेम की तदब नहीं बलकी गरीमा का हनन है जब महुवाने चलांग लगाए तो तो असने सप अपनी जान नहीं दी उसने उस पूरी वेवस्ता की हार सूनिष्छित कर दी जो सोचती ती की पैसे से सब कुछ खरीदा जासकता है सवदागर आपना पैसा गवा बआथा, और और उसे वो लडकी भी नहीं मिली जेसे उसने खरीदा था, ये महुवा का उस सवदे को सिरे से कहारिज करना था. सवदागर हार गया ये सच है, लेकिन महुवा भी तो हार गय, आप इसे सवदे को खारिज करना कै रहे हैं, मैं इसे उस ख्रूर दूनिया से बागने का एक मात्र रास्ता कोँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ� वो बवागे का फैस्टला कुद किया उस्टे वो नहीं चुना जो उसकिले तैकर दिया गया था चहे वो मुथ हो या उल्टी दारा में तैरने की असमभफ कोशिश महूवाने सावित किया कि उसकी इच्छा शक्ती को खरीदा नहीं जासकता अव उल्टी दारा मे तेरने की असमभव कोशिश, महुवाने साविद किया कि उसकी इच्छा शकती को खरीदा नहीं जासकता. मुझे लगता है कि यही पर हमारे नजर ये आखर एक बिन्दूपट तक्राते हैं. आप उसकी इच्छा शक्ती को गरीमा और सम्मान की जीत मानते हैं और मैं उसी इच्छा शक्ती को प्रेम की अंदी, हताश और और बहुती खुपसुरत तागत मानती हूं आप दोनो पहलु बहुत मस्वूत है गजेंदर ठाकों की इस मुल सामगरी की खुबसुरती यही है, कि यह आमे एक सा दोनो चीजे दिखाती है. इस में समाज का वो उनाणा सच भी है, जा गरीबी और लालच इनसान को अंदा कर देते हैं, और मानव हिदै का वो कोमल, जिद्दी कोना भी है, जो मुड के सामने भी अपने प्रेम को नहीं चोड़ता. सच में, ये कहानी हमें अनसान की सहन शीलता और उसके भीतर की उस अदम में आग के बारे में बहुत कुछ सोचने पर मजवोर करती है. महुवा की कहानी एक दरपन की तरह है. अगर आप उस्मेक विद्रोही नाईका देखना चाते हैं जिसने जुकने से प्यार कर दिया, तो वो आपको दिखेगी बिलकोल और आप उस्मेक एसी प्रेमी का देखना चाते हैं जिसने प्यार किलिए दूनिया और प्रकरती दोनो से लगाई मोल लेली तो वो भी वहां मोजुद है. और जो श्रोटा हमारे साथ जुडे हूए है, मैं उने आमन्त्रत करूंगी, कि वे स्वयम गजेंद्र ताकृग्र दबारा संकलत, महुवा गध्वारिन की इस मूल समगरी को पडें. इस में जो मेठिली भाशा की मिठास है, अपको अंदर तक्जग जोड़ देगी. बलकल सही कहा. आप खुद पड़े और तैकरे, कि जब महुवाने पानी में चलांग लगाई, तु क्या वो अपने आत्म सम्मान की रक्षा कर रही थी? तु क्या वो अपने आत्म सम्मान की रक्षा कर रही थी? या वो उस उल्ती दारा मे अपने अदूरे प्रेम की तलाश कर रही थी? बिल्कुल! क्योकी अंत में महान लोक कताय हमें कोई बना बनाया उत्र नी देती अगर बादना बादना बादना बादना बादना बादना बादना बादना बादना बादना बादना बादना बादना बादना बादना बादना बादना बादना बादना बादना बादना बादना बादना बादना बादना बादना बादना बादना बादना बादना बादना � तब आदिबेट में हमारे साज ज़ूरने के लिए आपका बहुत-बहुत दनेवाद हम फिर मेंगे एक नहीं चर्चा और एक नहीं द्रिष्टिकोन के साथ