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मीरांसाहेब__डिलरीनगर_के_योद्धा.mp4
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- 0:00–0:13आए, सीदे शुडो करते हैं आजका ये विष्लेषन, आज हम एक आजी बहत खुबसुरत और थोडीसी नम कर देने वाली मैठिली गाता की बात करने वाले है, जो आपको कतावों और हकीकत के बीच लाकर कडी कर देगी.
- 0:13–0:15ये कहानी है दिल्री नगर की
- 0:15–0:19एक अँसा शहर जिसकी रक्षा सिफ एक नाम करता है
- 0:19–0:22एक अँसा नाम जो हवा के जूके कितरा बहता है
- 0:22–0:26और आज भी इस शहर की असीम शान्ती का प्रतीक है
- 0:26–0:30तु चलिये, इस कहानी में तोडा और गेहराए से उतरते है
- 0:30–0:34ये गाता है मीरा सावब की, कोई आम अनसान नहीं ते ये?
- 0:34–0:38सोची ए, एक आँसा बच्चा जो पैडा होने से पहले ही अनात हो गया था.
- 0:38–0:44लेकिन आज, आज उसी अजे आ आत्मा का साया दिल्रीना गर की सबसे बडी डाल है.
- 0:44–0:48इस पूरी गाता के एक सबसे कहास बात पता है क्या है?
- 0:48–0:51वो ये विचार है कि विर्ता यहां गरज्टी नहीं है.
- 0:51–0:55वो चुप्चाप अपना फर्ज निभाती है और चली जाती है.
- 0:55–1:00मतलब इस कहानी में आस्ली बहादुरी का कोई शोर, शराबा या बड़ा तमाशा नहीं हूँता.
- 1:00–1:01वो बस अपना काम करती है.
- 1:01–1:06एक दम्शानत, द्रूल और दिखावे से पुरी तरा आजाद.
- 1:06–1:09ये हमें याद दिलाता है, की आस्ली ताकत शब्दो में नहीं,
- 1:09–1:11खमोश करमो में होती है
- 1:11–1:23तो कहानी की शुर्वात होती है अटीट के उस सुनहेरे दोर से, दिल्रीनगर की सबसे आलीशान हवेली में सैएध परिवार रहा करता था.
- 1:23–1:29ये परिवार अपने असुलों, दर्म और जबर्दस्त युध्ड कला के लिये पूरे इलाके में मशुर था.
- 1:29–1:32इंकी हर सुबखर रूतीन बिलकल अलग होता था
- 1:32–1:36एक तरफ नमाज की गेरी सुकून भरी इबादत
- 1:36–1:39और दूसरे तरफ अखाडे में तक्राती तल्वारों की आवाज
- 1:39–1:42पिता की कडे अनुशासन में बेटे गुड सवारी
- 1:42–1:46तीरन्दाजी और तल्वार्भाजी का कथोर अब्यास करते थे
- 1:46–1:49दर्म और कर्म का ये एक दम परफेक्त संटुलन ता
- 1:50–1:53लिकिन इस तस्वीर का एक दुस्रा पहलू भी ता
- 1:53–1:56एक तरव बच्छो को इतना बडा योध्डा बनते देक
- 1:56–2:00अगे अगे बद्वार बाद नहीं तो बद्वार बाद नहीं तो दिबार पर तंगी उन चमक्ती तलवारों का एक बहाँती बारी सच ता.
- 2:00–2:05उस गर्व के तीक पीछे एक रिंगता हूँ खमोश दर भी चिपा दा.
- 2:05–2:09एक यसा दर जो शायत किसी भी योद्धा की मागे दिल में
- 2:09–2:12एक काले साये की तरहां हमेशा मोछुद रहता है.
- 2:12–2:15और वो दर कोई हवा-हवाई बात नहीं फी,
- 2:15–2:22तब आद बदाने जंग में जाएगे अर सबसे करवा सच ये तब वो अगगाद अगद कबी लोटकर वापस आएव ही अई नहीं?
- 2:22–2:25के जो हत्यार आज गर की शुभा बड़ारे हैं,
- 2:25–2:27कल को वो मैदाने जंग में ज़ोर जाएंगे.
- 2:27–2:32और सबसे करवा सच्ये था क्या पता वो हत्यार और उने लेजाने वाले हाद,
- 2:32–2:35कभी लोटकर वापस आए बही आ नहीं?
- 2:35–3:05तब आप द़ब बदागा दिए बदागा दिए बदागा दिए बदागा दिए बदागा दिए बदागा दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए �
- 3:05–3:07बवागे बहुत खौफनाक और क्रूर थी
- 3:07–3:11तल्वारों से तल्वारे तक्राई पूरी धरती खून से लाल होगग
- 3:11–3:14और जब मेटान की वूड़ूल उगगर दिल्रीनगर वापिस आई
- 3:14–3:17तो हवाँं के साथ एक आजी मनहुस खबर आई
- 3:17–3:47तल्वारों से तल्वारे तक्राई पूरी धर्ती खून से लाल होगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगग�
- 3:47–3:49भीडी हमेशा के लिए ख़दम होग़ेए.
- 3:49–3:52वो अख्चाडा ज़ागा कल तक सुबह की शुवाद
- 3:52–3:56हत्यारों की खनाक और कसरत की आवाजों से होती थी
- 3:56–3:58अब भिलकों सुन्न पडगगया था.
- 3:58–4:01दीवार पर जागा तल्वारे तंगी होती थी
- 4:01–4:06अप चाहल पहल वाली अचानक से एक गेरे सनाके में दूब कैई.
- 4:06–4:10तवीडो सीक्रित अगर दबाही के बाद कहानी पुरी तरहा से बड़जाती है.
- 4:10–4:13पूरा शहर मातम मना रहा था.
- 4:13–4:17लेकिन सबसे गेरा और अकेला शुक ता उस अकेली विद्वा का.
- 4:17–4:23बविज़्ाँ की अग्टीग राज ता जब बविष्च्छे के लिए आशा की इकलोटी किरन ता तो अब यहां एक बड़ा सवाल कडा हुता है।
- 4:23–4:28अपनो को कोने के बाद उस विशाल और खोकली होचुकी हवेली में अप वो बलकुल अखेली थी.
- 4:28–4:32लेकिन कहते है ना की अंदेरा चाहे कितना भी गना हो,
- 4:32–4:36रोषनी की एक चोटी सी किरन कही नकही चिपकर पल रही होती है.
- 4:36–4:42उस विद्वा के पास एक असा रास था, जो भविश्षे के लिए आशा की एक लोटी किरन था,
- 4:42–4:46तो अब यहां एक पहुत ही बड़ा सवाल कडा होता है.
- 4:46–4:50इसके बाद क्या? जब एक महान परिवार पूरी तरा से उज़डचुका हो,
- 4:50–4:58जब कोई वारे सी ना बचा हो, तो आजसे विनाश के बाद उस परवार की विरासत आखर कैसे बच्सकती है?
- 4:58–5:28तो बज़ागाई बाद्चा विरासत्ता नहीं तो बज़ागाई बाद्चा बाद्चा विरासत्ता नहीं तो बज़ागाई बाद्चा विरासत्ता नहीं तो बज़ागाई बाद्चा विरासत्ता नहीं तो बज़ाई बाद्चा विरासत्ता नहीं तो बज़ाई बाद्चा �
- 5:28–5:31उरे लोगो के दिलो में खौफ पैदा किया और अच्छो को हिम्मद दी,
- 5:31–5:34यहादग के मुध भी उसकी इस पहरे दारी को तोड नहीं पाई.
- 5:34–5:38और ये आमर विरासत कोई पुरानी बात नहीं है,
- 5:38–5:42ये आज भी इस शहर के रोज मर्रा के जीवन में रची बसी है.
- 5:42–5:47आज भी दिलीरी नगर की शान्ती उस रक्षक के अद्रिष्ष्चसाये में प्ल्फूल रही है.
- 5:47–5:51शाम दलते ही जब कोई बच्च्छा जिट करता है,
- 5:51–5:55तो माताय उसे शान्त करने के लिए, आज भी मीरा साहिप काही नाम लेती है.
- 5:55–5:59उनकी मोजुद्गी हवा के हर जोके में महसुस होती है
- 5:59–6:03तो इस पूरे विष्लेशन का सबसे एहम टेकवे ये है
- 6:03–6:05कुछ लोग इतिहास में रहते हैं
- 6:05–6:08और कुछ लोग हवा में रहे जाते हैं शान्ती बनकर
- 6:08–6:11ये पंकती हमें सोचने पर मजबोर कर दिती है
- 6:11–6:16एक मुक भलिदान का वो आमर प्रभाव, जो वक्त के साथ भी फीखा नहीं परता.
- 6:16–6:22आजी गाथाए हमें सिकहाती है, कि आस्ली नायक वो नहीं चो इतिहास के पन्नोपर शोर मचाते हैं,
- 6:22–6:25बलकी वो हैं जो खामोशी से हमारी रक्षा करते हैं.
- 6:25–6:30तो आगली बार जब आप एक शाथ शहर से गुजरें तो सोचेगा ज़ोर,
- 6:30–6:33क्या वहां के हवाँ में भी कोई एसी ही कहानी चुपी है?
- 6:33–6:37हमारे शाथ शाथ अपर बने रहने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया.
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आए, सीदे शुडो करते हैं आजका ये विष्लेषन, आज हम एक आजी बहत खुबसुरत और थोडीसी नम कर देने वाली मैठिली गाता की बात करने वाले है, जो आपको कतावों और हकीकत के बीच लाकर कडी कर देगी. ये कहानी है दिल्री नगर की एक अँसा शहर जिसकी रक्षा सिफ एक नाम करता है एक अँसा नाम जो हवा के जूके कितरा बहता है और आज भी इस शहर की असीम शान्ती का प्रतीक है तु चलिये, इस कहानी में तोडा और गेहराए से उतरते है ये गाता है मीरा सावब की, कोई आम अनसान नहीं ते ये? सोची ए, एक आँसा बच्चा जो पैडा होने से पहले ही अनात हो गया था. लेकिन आज, आज उसी अजे आ आत्मा का साया दिल्रीना गर की सबसे बडी डाल है. इस पूरी गाता के एक सबसे कहास बात पता है क्या है? वो ये विचार है कि विर्ता यहां गरज्टी नहीं है. वो चुप्चाप अपना फर्ज निभाती है और चली जाती है. मतलब इस कहानी में आस्ली बहादुरी का कोई शोर, शराबा या बड़ा तमाशा नहीं हूँता. वो बस अपना काम करती है. एक दम्शानत, द्रूल और दिखावे से पुरी तरा आजाद. ये हमें याद दिलाता है, की आस्ली ताकत शब्दो में नहीं, खमोश करमो में होती है तो कहानी की शुर्वात होती है अटीट के उस सुनहेरे दोर से, दिल्रीनगर की सबसे आलीशान हवेली में सैएध परिवार रहा करता था. ये परिवार अपने असुलों, दर्म और जबर्दस्त युध्ड कला के लिये पूरे इलाके में मशुर था. इंकी हर सुबखर रूतीन बिलकल अलग होता था एक तरफ नमाज की गेरी सुकून भरी इबादत और दूसरे तरफ अखाडे में तक्राती तल्वारों की आवाज पिता की कडे अनुशासन में बेटे गुड सवारी तीरन्दाजी और तल्वार्भाजी का कथोर अब्यास करते थे दर्म और कर्म का ये एक दम परफेक्त संटुलन ता लिकिन इस तस्वीर का एक दुस्रा पहलू भी ता एक तरव बच्छो को इतना बडा योध्डा बनते देक अगे अगे बद्वार बाद नहीं तो बद्वार बाद नहीं तो दिबार पर तंगी उन चमक्ती तलवारों का एक बहाँती बारी सच ता. उस गर्व के तीक पीछे एक रिंगता हूँ खमोश दर भी चिपा दा. एक यसा दर जो शायत किसी भी योद्धा की मागे दिल में एक काले साये की तरहां हमेशा मोछुद रहता है. और वो दर कोई हवा-हवाई बात नहीं फी, तब आद बदाने जंग में जाएगे अर सबसे करवा सच ये तब वो अगगाद अगद कबी लोटकर वापस आएव ही अई नहीं? के जो हत्यार आज गर की शुभा बड़ारे हैं, कल को वो मैदाने जंग में ज़ोर जाएंगे. और सबसे करवा सच्ये था क्या पता वो हत्यार और उने लेजाने वाले हाद, कभी लोटकर वापस आए बही आ नहीं? तब आप द़ब बदागा दिए बदागा दिए बदागा दिए बदागा दिए बदागा दिए बदागा दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए दिए � बवागे बहुत खौफनाक और क्रूर थी तल्वारों से तल्वारे तक्राई पूरी धरती खून से लाल होगग और जब मेटान की वूड़ूल उगगर दिल्रीनगर वापिस आई तो हवाँं के साथ एक आजी मनहुस खबर आई तल्वारों से तल्वारे तक्राई पूरी धर्ती खून से लाल होगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगग� भीडी हमेशा के लिए ख़दम होग़ेए. वो अख्चाडा ज़ागा कल तक सुबह की शुवाद हत्यारों की खनाक और कसरत की आवाजों से होती थी अब भिलकों सुन्न पडगगया था. दीवार पर जागा तल्वारे तंगी होती थी अप चाहल पहल वाली अचानक से एक गेरे सनाके में दूब कैई. तवीडो सीक्रित अगर दबाही के बाद कहानी पुरी तरहा से बड़जाती है. पूरा शहर मातम मना रहा था. लेकिन सबसे गेरा और अकेला शुक ता उस अकेली विद्वा का. बविज़्ाँ की अग्टीग राज ता जब बविष्च्छे के लिए आशा की इकलोटी किरन ता तो अब यहां एक बड़ा सवाल कडा हुता है। अपनो को कोने के बाद उस विशाल और खोकली होचुकी हवेली में अप वो बलकुल अखेली थी. लेकिन कहते है ना की अंदेरा चाहे कितना भी गना हो, रोषनी की एक चोटी सी किरन कही नकही चिपकर पल रही होती है. उस विद्वा के पास एक असा रास था, जो भविश्षे के लिए आशा की एक लोटी किरन था, तो अब यहां एक पहुत ही बड़ा सवाल कडा होता है. इसके बाद क्या? जब एक महान परिवार पूरी तरा से उज़डचुका हो, जब कोई वारे सी ना बचा हो, तो आजसे विनाश के बाद उस परवार की विरासत आखर कैसे बच्सकती है? तो बज़ागाई बाद्चा विरासत्ता नहीं तो बज़ागाई बाद्चा बाद्चा विरासत्ता नहीं तो बज़ागाई बाद्चा विरासत्ता नहीं तो बज़ागाई बाद्चा विरासत्ता नहीं तो बज़ाई बाद्चा विरासत्ता नहीं तो बज़ाई बाद्चा � उरे लोगो के दिलो में खौफ पैदा किया और अच्छो को हिम्मद दी, यहादग के मुध भी उसकी इस पहरे दारी को तोड नहीं पाई. और ये आमर विरासत कोई पुरानी बात नहीं है, ये आज भी इस शहर के रोज मर्रा के जीवन में रची बसी है. आज भी दिलीरी नगर की शान्ती उस रक्षक के अद्रिष्ष्चसाये में प्ल्फूल रही है. शाम दलते ही जब कोई बच्च्छा जिट करता है, तो माताय उसे शान्त करने के लिए, आज भी मीरा साहिप काही नाम लेती है. उनकी मोजुद्गी हवा के हर जोके में महसुस होती है तो इस पूरे विष्लेशन का सबसे एहम टेकवे ये है कुछ लोग इतिहास में रहते हैं और कुछ लोग हवा में रहे जाते हैं शान्ती बनकर ये पंकती हमें सोचने पर मजबोर कर दिती है एक मुक भलिदान का वो आमर प्रभाव, जो वक्त के साथ भी फीखा नहीं परता. आजी गाथाए हमें सिकहाती है, कि आस्ली नायक वो नहीं चो इतिहास के पन्नोपर शोर मचाते हैं, बलकी वो हैं जो खामोशी से हमारी रक्षा करते हैं. तो आगली बार जब आप एक शाथ शहर से गुजरें तो सोचेगा ज़ोर, क्या वहां के हवाँ में भी कोई एसी ही कहानी चुपी है? हमारे शाथ शाथ अपर बने रहने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया.