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जट-जटिन__मिथिला_का_लोकनाट्य.mp4

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Part 9 · VIDEHA MITHILA MAITHILI DISCUSSION CRITICISM SERIES PART 9
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  1. 0:00–0:11आए बिना किसी देरी के शुरू करते है, इस खास विष्लेषन में हम मित्हिला के उस सद्दियो पुराने और बेहत दिल्चास्प लोक नाट्या जत्जतन की बात करने वाले है.
  2. 0:11–0:15यह सरफ एक नाटक नहीं है, बलकी प्रेम, पती पतनी की नोग जोग
  3. 0:15–0:20और बारिश बुलाने वाले अनुते क्रिषी अनुष्टानो की एक पूरी कहानी है.
  4. 0:20–0:24और सबसे कमाल की बात यह एक, इसकी जडें
  5. 0:24–0:27पंद्रवी सदी महराज शिवसिंके दर्बार तक जाती है.
  6. 0:27–0:33अब जर खलपना की जे, मिठिला में सावन भादो के महीने की एक अंदेरी मानसूनी राथ है,
  7. 0:33–0:38गाँ की स्टिर्या एक साथ एकथथा होकर एक अदबूत समहेग नाटिक प्रस्त॥ कर रही है,
  8. 0:38–0:42आपको बतादें कि इसकी रच्ना महान संगीत का जयाट निकी थी,
  9. 0:42–1:12अग्ड एक एक लोग नात्यव की उद्पत्ती ज़े देखते हैं इस परमपरा की शुर्वात असल में कैसे हूँई आप यहाँ जो बात यसे बाखी सब चीजो से बिल्कुल अलग बनाती है वो यह एक एस में जट और जटिन दोनो ही मुख्ध्ये किर्दार पूरी तरा से मह
  10. 1:12–1:42अगर तो बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ा�
  11. 1:42–1:51ये हिस्सा वाखई बहुत ही प्रासंगिख है, एक नहीं दूलहन और पती के भीच की जो आम खीच्तान होती है, उसे यहां बहुबी दिखाया गया है.
  12. 1:51–1:56एक तरव जटिन है, जो बस किसी तरह है अपने माएके यानी नहर जान चाहती है,
  13. 1:56–1:58ताकि उसे वो बहावनात मक्सुकून मिले
  14. 1:59–2:00और दूस्री तरव जट है
  15. 2:00–2:02जो बिल्कुल प्रक्तिकल बात कर रहा है
  16. 2:02–2:04वो साफ मना कर दिता है
  17. 2:04–2:06कुकि दान की फसल तधयार है
  18. 2:06–2:09और अभी खेद का काम चोडकर जाना मुमकिन ही नहीं है
  19. 2:09–2:10फिर यही तनाव
  20. 2:10–2:15रोज मर्रा के गरेलू कामों में मजदार नोग जोग के रूप में बहार आता है.
  21. 2:15–2:18जदन जिद पकर लेती है कि उसे गेहने चाहीए,
  22. 2:18–2:20वरना वो सीभे सुनार के गर चली जाएगी.
  23. 2:20–2:22इस पर जट का जवाब सूनिये,
  24. 2:22–2:30उ मजाक में केता है कि वेतना कंगाल हो चुका है कि उसे अपना हाती दब बेचना पड़गा और अब बस उसे बानने वाली जनजीर ही बची है.
  25. 2:30–2:32है ना एक दम गरेलू और मजदार ताना?
  26. 2:32–2:36अंक तीन, जुदाई, प्रलोबन, और निष्था.
  27. 2:36–2:39यहां से कहानी एक गंभीर मोड लेती है.
  28. 2:39–2:42आर्थिक मजबूरिया अन्सान से क्या कुछ नहीं कर वात्ती,
  29. 2:42–2:46पैसे कमाने के लिए जट गर चोडकर मोरंग चला जाता है.
  30. 2:46–2:50अब पीछे चुट गए जटिन और इसी अकेले पन के दोरान,
  31. 2:50–2:52अगरी प्रलोबन की अंट्री होती है,
  32. 2:52–2:56वही सुनार उसे गेहनो का लालच देकर बद्काने की पूरी कोषिष करता है.
  33. 2:56–3:00लेकिन जटिन का जवा बिलकुल साफ और कडवख होता है.
  34. 3:00–3:02वो सारे लालच � thukra deti hai,
  35. 3:02–3:05और कहती है, मेरी निष्था अटूट है,
  36. 3:05–3:09मेरा प्यार स्र्फ जटकी सुन्दर्ता के लिए है
  37. 3:09–3:10ये स्रफ एक धालोग नहीं है
  38. 3:11–3:13बलकी उस वफ़ादारी और मस्भूथी का प्रतीक है
  39. 3:13–3:18जिसकी उमीद, गेरे विरह और अकेलेपन के समय में भी की जाती है
  40. 3:18–3:22अंक्चार, कला, तबाही और पुनर्मिलिन
  41. 3:22–3:28अर यही से आता है कहानी में सब से बड़ा टूएस्ट जद वापे साता है, सब कुछ टीक लग रहा होता है.
  42. 3:28–3:32लेकिन तब ही पहुत ही मामूली सी बहेस अचानत भड़गुटती है.
  43. 3:32–3:36गुस्स्से में आगे जट गलती से जटिन को ज़हरू से चूदिता है.
  44. 3:36–3:39इसे एक बहुत ही बड़ा अप्मान माना जाता है.
  45. 3:39–3:42बस यही से सब कुछ भिखर जाता है.
  46. 3:42–3:47ये वो पाल है जाहन नाटक में एक दम विष्च्छुद्द् मानवी अबहावनाई चलक परती है.
  47. 3:47–3:50जटिन गुस्से में आग भबुला हो कर कसम खाती है.
  48. 3:50–4:20अदियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादिया�
  49. 4:20–4:24अगर खार उनका पुनर मिलन हो ही जादा है.
  50. 4:24–4:27सद्यों से महिलाई इस नाटक से इतना गेरा जुडाव
  51. 4:27–4:31इसईले महसुज करतियाई है, कुकि वो इस रूठने मनाने
  52. 4:31–4:33और फिर से एक होजाने वाली कहानी में
  53. 4:33–4:36अपनी खुद की जिन्दगी की परच्छाई देकती थी.
  54. 4:36–4:39अंक पाज मेंदख की बारिष का अनुश्च्च्चान
  55. 4:40–4:44और आब इस पूरी प्रस्तुती का सबसे हैरान करने वाला हिस्चा
  56. 4:45–4:47ये सर्फ एक नाटक भर नहीं है
  57. 4:47–4:50राद बर चलने वाली ये पूरी प्फोमेंस
  58. 4:50–4:53दर आसल मून्सून की बारिष बलाने के एक भेहाद अजीब
  59. 5:06–5:10इसके पीचे का लोक विष्वास सच्वे चोकाने वाला है,
  60. 5:10–5:14माना जाता है कि अगली सुभे हो क्रोदी महिला अपने
  61. 5:14–5:17दर्वाजे पर उस कुछले हुए मेंदख को देकर जितनी
  62. 5:17–5:20ज़ादा गालिया देगी आस्मान से उतनी ही जादा
  63. 5:20–5:26अद़्ाएगाई बारिश अगी. मतलब महिलाएगों के गुस्से को सीदे प्रक्रती और बादलों की ताकतों से जोड दिया गया.
  64. 5:26–5:33तो अन्त में ये सुचने वाली बात है कि कैसे एक प्राचीन परम पराने गरेलु कुन्ताओ को,
  65. 5:33–5:37अप्सी जग़ों को एक आजे शक्तिशाली अनुश्धान में बडल दिया,
  66. 5:37–5:41जो पुरे समवदाय को जोडता है, और जीवन देने वाली बारिष्लाता है.
  67. 5:41–5:46ये सर्फिक लोग कता नहीं है, ये जीवन महिलाओ के अप्सी जोडाओ,
  68. 5:46–5:52तो तो बज़ाव और प्रक्रति को एक साथ पिरोने का एक शान्दार और भेहद समजदारी भरा दर्षन है.

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आए बिना किसी देरी के शुरू करते है, इस खास विष्लेषन में हम मित्हिला के उस सद्दियो पुराने और बेहत दिल्चास्प लोक नाट्या जत्जतन की बात करने वाले है. यह सरफ एक नाटक नहीं है, बलकी प्रेम, पती पतनी की नोग जोग और बारिश बुलाने वाले अनुते क्रिषी अनुष्टानो की एक पूरी कहानी है. और सबसे कमाल की बात यह एक, इसकी जडें पंद्रवी सदी महराज शिवसिंके दर्बार तक जाती है. अब जर खलपना की जे, मिठिला में सावन भादो के महीने की एक अंदेरी मानसूनी राथ है, गाँ की स्टिर्या एक साथ एकथथा होकर एक अदबूत समहेग नाटिक प्रस्त॥ कर रही है, आपको बतादें कि इसकी रच्ना महान संगीत का जयाट निकी थी, अग्ड एक एक लोग नात्यव की उद्पत्ती ज़े देखते हैं इस परमपरा की शुर्वात असल में कैसे हूँई आप यहाँ जो बात यसे बाखी सब चीजो से बिल्कुल अलग बनाती है वो यह एक एस में जट और जटिन दोनो ही मुख्ध्ये किर्दार पूरी तरा से मह अगर तो बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ाए बज़ा� ये हिस्सा वाखई बहुत ही प्रासंगिख है, एक नहीं दूलहन और पती के भीच की जो आम खीच्तान होती है, उसे यहां बहुबी दिखाया गया है. एक तरव जटिन है, जो बस किसी तरह है अपने माएके यानी नहर जान चाहती है, ताकि उसे वो बहावनात मक्सुकून मिले और दूस्री तरव जट है जो बिल्कुल प्रक्तिकल बात कर रहा है वो साफ मना कर दिता है कुकि दान की फसल तधयार है और अभी खेद का काम चोडकर जाना मुमकिन ही नहीं है फिर यही तनाव रोज मर्रा के गरेलू कामों में मजदार नोग जोग के रूप में बहार आता है. जदन जिद पकर लेती है कि उसे गेहने चाहीए, वरना वो सीभे सुनार के गर चली जाएगी. इस पर जट का जवाब सूनिये, उ मजाक में केता है कि वेतना कंगाल हो चुका है कि उसे अपना हाती दब बेचना पड़गा और अब बस उसे बानने वाली जनजीर ही बची है. है ना एक दम गरेलू और मजदार ताना? अंक तीन, जुदाई, प्रलोबन, और निष्था. यहां से कहानी एक गंभीर मोड लेती है. आर्थिक मजबूरिया अन्सान से क्या कुछ नहीं कर वात्ती, पैसे कमाने के लिए जट गर चोडकर मोरंग चला जाता है. अब पीछे चुट गए जटिन और इसी अकेले पन के दोरान, अगरी प्रलोबन की अंट्री होती है, वही सुनार उसे गेहनो का लालच देकर बद्काने की पूरी कोषिष करता है. लेकिन जटिन का जवा बिलकुल साफ और कडवख होता है. वो सारे लालच � thukra deti hai, और कहती है, मेरी निष्था अटूट है, मेरा प्यार स्र्फ जटकी सुन्दर्ता के लिए है ये स्रफ एक धालोग नहीं है बलकी उस वफ़ादारी और मस्भूथी का प्रतीक है जिसकी उमीद, गेरे विरह और अकेलेपन के समय में भी की जाती है अंक्चार, कला, तबाही और पुनर्मिलिन अर यही से आता है कहानी में सब से बड़ा टूएस्ट जद वापे साता है, सब कुछ टीक लग रहा होता है. लेकिन तब ही पहुत ही मामूली सी बहेस अचानत भड़गुटती है. गुस्स्से में आगे जट गलती से जटिन को ज़हरू से चूदिता है. इसे एक बहुत ही बड़ा अप्मान माना जाता है. बस यही से सब कुछ भिखर जाता है. ये वो पाल है जाहन नाटक में एक दम विष्च्छुद्द् मानवी अबहावनाई चलक परती है. जटिन गुस्से में आग भबुला हो कर कसम खाती है. अदियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादियादिया� अगर खार उनका पुनर मिलन हो ही जादा है. सद्यों से महिलाई इस नाटक से इतना गेरा जुडाव इसईले महसुज करतियाई है, कुकि वो इस रूठने मनाने और फिर से एक होजाने वाली कहानी में अपनी खुद की जिन्दगी की परच्छाई देकती थी. अंक पाज मेंदख की बारिष का अनुश्च्च्चान और आब इस पूरी प्रस्तुती का सबसे हैरान करने वाला हिस्चा ये सर्फ एक नाटक भर नहीं है राद बर चलने वाली ये पूरी प्फोमेंस दर आसल मून्सून की बारिष बलाने के एक भेहाद अजीब इसके पीचे का लोक विष्वास सच्वे चोकाने वाला है, माना जाता है कि अगली सुभे हो क्रोदी महिला अपने दर्वाजे पर उस कुछले हुए मेंदख को देकर जितनी ज़ादा गालिया देगी आस्मान से उतनी ही जादा अद़्ाएगाई बारिश अगी. मतलब महिलाएगों के गुस्से को सीदे प्रक्रती और बादलों की ताकतों से जोड दिया गया. तो अन्त में ये सुचने वाली बात है कि कैसे एक प्राचीन परम पराने गरेलु कुन्ताओ को, अप्सी जग़ों को एक आजे शक्तिशाली अनुश्धान में बडल दिया, जो पुरे समवदाय को जोडता है, और जीवन देने वाली बारिष्लाता है. ये सर्फिक लोग कता नहीं है, ये जीवन महिलाओ के अप्सी जोडाओ, तो तो बज़ाव और प्रक्रति को एक साथ पिरोने का एक शान्दार और भेहद समजदारी भरा दर्षन है.

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