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जट_जटिन_लोकनाट्य_या_बारिश_का_अनुष्ठान.m4a

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Part 9 · VIDEHA MITHILA MAITHILI DISCUSSION CRITICISM SERIES PART 9
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  1. 0:00–0:02वल्क्व तु दिबेट
  2. 0:02–0:06क्या हो यदि एक सादारन्सा दिखने वाला लोक आत्य,
  3. 0:06–0:11जिसे सदियों से अड़्टों के मनुरंजन का सादन माना जाता रहा है,
  4. 0:11–0:18वास्तव में प्रक्रूति को निंट्रित करने का एक आर्चीन और गुप्त उपकरन हो?
  5. 0:18–0:48अद्र बश्ड़ ताद्टिन ताद्टिन ताद्टिन ताद्टिन ताद्टिन ताद्टिन ताद्टिन ताद्टिन ताद्टिन ताद्टिन ताद्टिन ताद्टिन ताद्टिन ताद्टिन ताद्टिन ताद्टिन ताद्टिन ताद्टिन ताद्टिन ताद्टिन ताद्ट
  6. 0:48–0:52तो देखे शुरुवात हम इसके अटिहासिक संदरप से करते हैं
  7. 0:52–0:58क्योंकी बिना इतिहास को समझे हम इसके असली स्वरूप को नहीं पकरते है
  8. 0:58–1:01और मैं इस नजरये को चनोती देता हूँ
  9. 1:01–1:04कि विकि मिरा मानना है कि ये विकि पूरी दामपते कता
  10. 1:04–1:08बारिश को आमन्त्रत करने वाला एक जादूई क्रिषी अनुष्टान है
  11. 1:08–1:12तो देखे, शुरूवात हम इसके अटिहासिक संदर्प से करते हैं
  12. 1:12–1:15क्योंकी, बिना इतिहास को समझे,
  13. 1:15–1:18हम इसके असली स्वरूप को नहीं पकर ते
  14. 1:18–1:20चोदा सु बारा से
  15. 1:20–1:22जोग ता सो च्यालिस के भीच
  16. 1:22–1:23भिलकुल
  17. 1:23–1:25मित्ला में महाराजा शिव सिंग
  18. 1:25–1:27और रानी लखिमा रानी का काल
  19. 1:28–1:31ये वो समयता जब महान कवी विद्ध्या पती की रच्नाए
  20. 1:31–1:33अपने चरम पर थी
  21. 1:33–1:35उनके पदों को
  22. 1:35–1:37इक संगीत कार थे
  23. 1:37–1:38जैयाथ
  24. 1:38–1:40उनहोने राग रागनीो में पिरोया
  25. 1:40–1:44और स्वैम जट की बूमिका निबाते हुए स्नाटक की रच्ना की
  26. 1:44–1:47अगर आप इस नाटक के कथावस्तू को देखेना
  27. 1:47–1:50तो ये पुरी तरषे मान्वियस संबन्दो पर्टी की है
  28. 1:50–1:52दाम पत्ती जीवन की बाते
  29. 1:52–1:53जी
  30. 1:53–1:58नहीं ब्याही जटन की अपने नहर यानी माए के जाने की जद
  31. 1:58–2:02बाड के कारन रास्ते बन्द होने से उसकी हताशा
  32. 2:02–2:03और गेहनो की माग भी
  33. 2:03–2:07दिलकोल गेहनो की माग और पती पतनी के भीच की तनातनी
  34. 2:07–2:12सबसे खाजबात यहे है के इस नाटक में जट और जटन
  35. 2:12–2:14यहनी पूरुश और स्त्री
  36. 2:14–2:16दोनो की बूमिकाए किवल स्त्रीया ही निबाती है
  37. 2:16–2:20पूरुशो का वहाना सक्त मना हुता है
  38. 2:20–2:20सही बात है
  39. 2:20–2:22तक किस मोसम में खेला जाता है
  40. 2:22–2:24और इसका दरशक वर कुन है
  41. 2:24–2:27मوسम? मतलः सावन बादो की रातो में?
  42. 2:27–2:29आप, ये साल बर नहीं खेला जाता.
  43. 2:29–2:33ये केवल सावन और बादो की उन उमस भरी रातो में खेला जाता है,
  44. 2:33–2:38जब आस्मान में बादल नहीं होते और दान की फसल सुख रही होती है.
  45. 2:38–2:41आप इसे महिलागों का एक मनोवेग्यानिक मंच कैरे हैं,
  46. 2:41–2:45लेकिन मैं इसे जीवन रक्षा का एक आदिम प्रैयास मानता हूँ।
  47. 2:46–2:48जीवन रक्षा का प्रयास? एक लोक नाट्ट्य से?
  48. 2:49–2:51भिलकुल, जब एक ख्रिषक समाज देखता है,
  49. 2:51–2:53कि उसकी फस्ले बरभाद हो रही है
  50. 2:53–2:57तो वो हताशा में प्रक्रती को मनाने किली अनुश्धान करता है
  51. 2:57–2:59जजजटिन कोई आम नातक नहीं है
  52. 2:59–3:00इसके अंत में जो होता है
  53. 3:00–3:04वो किसी बी तरह से गरेलू कहानी का हिस्सा नहीं हो सकता
  54. 3:04–3:07अप उस मेंदख वाले प्रसंकी बात कर रहे हैं
  55. 3:07–3:11अद्द में ये महिलाए एक बाँग यानी मेंदख को पकड़ती है,
  56. 3:11–3:15उसे मिट्टी के बरतन जिसे चुक्ध कहते है,
  57. 3:15–3:17उस में रक्ख कर कुटती है,
  58. 3:17–3:21और गाँ की सबसे जग्डालु औरत के दर्वाजे पर फेखाटी है.
  59. 3:21–3:27उस उरत की गालियो से बारेश होने का विश्वास है ना वही इस पूरी प्रक्रिया की आत्मा है
  60. 3:27–3:30आप खेह रहे हैं कि यह सर्फ बारेश का तोटका है
  61. 3:30–3:32लेकिन रहा ज़ा रूकिये
  62. 3:32–3:35अगर यह सर्फ एक अनुष्टान ता
  63. 3:35–3:37तो जाइत को पंद्रावी शताबती में
  64. 3:37–3:43विद्यापती के इतने परिष्क्रित और सहिट्तिग गीतों को इस में पिरोने की क्या जरूरत थी?
  65. 3:43–3:45क्यों कि कला लोगों को जोडती है
  66. 3:45–3:51पर एक सादारन तोटके को इतनी बहव्वे सहिट्तिग प्रेम कता का आवरन क्यों पैनाया गया?
  67. 3:51–4:04नाटक के भीतर जो प्रसंग है, वो बहुत गेरे है, जैसे पुरैनी, यहनी कमल के पते पर चलकर जूमर खिलने का प्रस्ताउ, जो एक प्रतिकात्मक विवाख को दरषाता है, फिर जट्का कमाने के लिए मोरंग जाना.
  68. 4:04–4:06आ, निपाल का तराए शेट्र.
  69. 4:06–4:13जट्ट के पीचे से एक सुनार आता है, जट्टिन को गेहनों का प्रलोबन देता है,
  70. 4:13–4:19लेकिन जट्टिन उस प्रलोबन को थुक्रा देती है, अपने पती की सुंदरता का बखान करती है.
  71. 4:19–4:24यदी अन्तिम लक्ष अप एक मेड़क को मारना और गालिया सुन्ना ही ता,
  72. 4:24–4:28तो ये गेरे नेटिक परिक्षनों की क्या अवश्शक्ता थी
  73. 4:28–4:31मतलब ये तो बलकुल आजा ही है
  74. 4:31–4:35ज़से किसी चोटे से कानुनी दस्तावेज पर दस्तक्ट करने के ले
  75. 4:35–4:39कोई दस दिन कबहव्य विवाज समरो आए उजित कर दे
  76. 4:39–4:42अपका ये कानुनी दस्तावेज वाला उदारन सुनने में बच्छा लकता है
  77. 4:43–4:45लेकिन जमीनी हकिकत कुछ और है
  78. 4:46–4:48लोग परमपराये दरबारो में पैजा हो सकती हैं
  79. 4:48–4:52लेकिन वे सदियों तक केवल कला के दंपर जीवित नहीं रहतीं
  80. 4:52–4:53तो फिर कैसे जीवित रहती हैं?
  81. 4:53–4:59वे तब ही जिन्दा रहती हैं जब वे समाज की किसी बहुत गेरी बहुत्टिक आवशकता से जुडी हों.
  82. 4:59–5:03आप सूनार के प्रलोबन और जटके मुरंग जाने को एक नेटिक कहानी
  83. 5:03–5:06या उच्कोटी का सहते बतारही हैं.
  84. 5:06–5:11मैं से बिहार और मिठला के क्रिषक समाज के कथोड आर्टिक हकीकत के रूप में देकता हूँ
  85. 5:11–5:13आर्टिक हकीकत कैसे?
  86. 5:13–5:17ये तो स्पष्टो रूप से एक पतनी की वाफादारी की परिक्षा का प्रसंग है
  87. 5:17–5:20नहीं, इसे बड़े परद्रिष्च में दिख ही,
  88. 5:20–5:25जब भारिश नहीं होती सुखा परता है, तो खेद बंजर हो जाते हैं.
  89. 5:25–5:27आज़े में किसान क्या करेगा?
  90. 5:27–5:29उसे पलायन करना परता है.
  91. 5:29–5:35जट्का मूरंग जाना कोई सादारन यात्रा नहीं ये सुखे के कारन होने वाला मस्धूरो का पलायन है.
  92. 5:35–5:37अच्छा पलायन के अर्ठ्ट में?
  93. 5:37–5:40आँ और जब पूरुच कर चोडगर चला जाता है,
  94. 5:40–5:43तो पीछे चुटी स्वाज में बहुत असुरक्षित हो जाती है.
  95. 5:44–5:46सूनार का आना उसी शोशन का प्रतीक है,
  96. 5:46–5:50जटिन का प्रलोबन से बच्ना सर्फ पतिब्रता द्र्म नहीं है
  97. 5:50–5:53ये उस क्रिष्च समाज का वो समाजिक धाचा है
  98. 5:53–5:57जो अकाल के समः बिखरने से बचने की जधुजहित कर रहा है
  99. 5:57–6:01जो अखाल के समः बिखरने से बचने की जदू जहित कर रहा है
  100. 6:01–6:07तीक है मैं ये मान सकती हूँ की अखाल और पलायन की प्रष्ट भूमी इस में मोझुद है
  101. 6:07–6:11लोग साहित ये अपने समः के समाच को ही दरषाता है
  102. 6:11–6:15लेकिन जब हम नाटक के दूसरे हिससे में जाते ना
  103. 6:15–6:45तो बज़द बवाँगाने बद्टन तो बज़द बवाँगाने बद्टन तो बज़द बवाँगाने बद्टन तो बज़द बवाँगाने बद्टन तो बज़द बवाँगाने बद्टन तो बज़द बवाँगाने बद्टन तो बज़द बवाँगाने बद्टन तो ब�
  104. 6:45–6:48ज़िस्से दाल में बखार या तडगा लगा जाता है,
  105. 6:48–6:51जद्टिन इसे अपना भ्यानक अप्मान मानती है,
  106. 6:51–6:53और गुस्से में गर चोडगर चली जाती है.
  107. 6:54–6:58अप सवाल ये है, कि चोंकी से चूना इतना बडा अप्मान क्यो है?
  108. 6:58–7:09उंग वृग तीखरिख सब तात्मक समाज में रसोई कोस तरी का सबसे निच्ला, सबसे उभाओ और थका देने वाला कारेखषे तरमाना जाता है.
  109. 7:09–7:12जब जद अदनी पतनी को चोंकी से चूथा है,
  110. 7:12–7:15तो वो अनजाने में उसे येजदा ता रहा है,
  111. 7:15–7:18कि उसकी हैस्यद गर में स्विक रसुए की दासी की है.
  112. 7:18–7:20जटिन का इस बाद पर गर चोर देना,
  113. 7:20–7:24महिलाओं के आत्मसम्मान का एक बहुत बड़ा विद्रो है.
  114. 7:24–7:29दिके आप इसे आदूनिक मनोविग्यान और आजके नारीवाद के चश्मे से देख रही हैं.
  115. 7:29–7:32मैं ये नहीं केरा ग़ा थी च्छोंकी वाला प्रसंग महतुपून नहीं है.
  116. 7:32–7:37लेकिन आप आप इसके बाद क्या होता उसे पुरी तरा से चोड रही हैं.
  117. 7:37–7:38या चोड रही हूँ मैं?
  118. 7:38–7:41जटिन के गर से जाने के बाद गर की हालत क्या होती है?
  119. 7:41–7:43वैई तो मेरा आगला बिन्दू था
  120. 7:43–7:46गर की हालत का जो वरनन लोक नाटे मैं है
  121. 7:46–7:48वो अवसाद का बहतरी न उदारन है
  122. 7:48–7:50जटिन के बिना गर में जोल मक्डा
  123. 7:50–7:52यहनी जाले लग जाते है
  124. 8:07–8:37अगर बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बा
  125. 8:37–8:39अगर जटिन प्रक्रति है
  126. 8:39–8:41जटिन का रूटना प्रक्रति का रूटना है
  127. 8:41–8:43ये व्याख्या दिल्चस्प तो है
  128. 8:43–8:45लेकिन अगर जटिन प्रक्रति है
  129. 8:45–8:47तो जटिन प्रक्रति है
  130. 8:47–8:49तो जटिन प्रक्रति है
  131. 8:49–8:51तो जटिन प्रक्रति है
  132. 8:51–8:53तो जटिन प्रक्रति है
  133. 8:53–8:55याँ बशल के जगगे जंगली गास उगाती है
  134. 8:55–8:57और किसान का गर भुखमरी से उजरने लकता है
  135. 8:57–8:59जटिन का रूटना
  136. 8:59–9:01प्रक्रती का रूटना है
  137. 9:01–9:03ये व्याख्या दिल्चस्प तो है
  138. 9:03–9:06लेकिन अगर जटिन प्रक्रती है
  139. 9:06–9:09तो जट उसे मनाने किले जो रूप दहरता है
  140. 9:09–9:11उसका क्या अर्थ है?
  141. 9:11–9:13रूब दहरता है मतलप
  142. 9:13–9:15जटिन के जाने के बाद
  143. 9:15–9:17जट को अपनी गल्ती का एहसाज होता है
  144. 9:17–9:19वो कभी गोपी तो कभी मनिहारीन
  145. 9:19–9:21यानी चूडी बेचने वाली
  146. 9:21–9:23उसका रूब दहरकर
  147. 9:23–9:25गाउं गाउ उसे खूछता है
  148. 9:25–9:27उस्त्रीका रूब दहर रहा है।
  149. 9:27–9:29आप उस्वांग रचता है।
  150. 9:29–9:31एक पूरुश्वादी समाज में
  151. 9:31–9:33पती का अपनी पतनी को मनाने किले
  152. 9:33–9:35स्त्रीका वेश दारन करना
  153. 9:35–9:37अपना सारा पूरुशार्थ त्याग देना
  154. 9:37–9:39ये मान्सी ये प्रेम और आपनी के तुटने की
  155. 9:39–9:45ये मान्सी ये प्रेम और आहिंकार के तुटने की एक बहुत फीव्यक्तिगत और मार्मेक कहानी है.
  156. 9:46–9:48इसे आप मान्सून कैसे कैसकते है?
  157. 9:48–9:50ये बहुत आसानी से मान्सून का ही हिज्सा है.
  158. 9:50–9:54जब सुख्खा परता है न, तो पुरा कपुरा गाँं, पुरा समाज,
  159. 9:54–9:58प्रक्र्दिए को मनाने किले तरा तरा के स्वांग रच्ता है, अनुश्ठान करता है,
  160. 9:58–10:01जट का रग रग रव द़कर जटिन को कुजना,
  161. 10:01–10:07असल में हताश क्रिषक समाज दवारा बारिष को आमन्त्रित करने के अंगिनत प्रासो कप्रतिक है.
  162. 10:07–10:09आप रर चीस को खेती से जोड रहे हैं
  163. 10:09–10:11वुकि वो समाज उसी पर टिका है
  164. 10:11–10:14और जब अंद्द तब जटिन मान जाती हैं
  165. 10:14–10:15और लोड आती हैं
  166. 10:15–10:17तो वो केवल एक पतनी की गर वापसी नहीं
  167. 10:17–10:21वो सुखे के बाद पहली बारिष के लोड ने की उमीद है
  168. 10:21–10:25लेकिन मैं आपको याद दिलादू की इस नाटक का मनचन कैसे होता है
  169. 10:25–10:27इस में परुष होते ही नहीं है
  170. 10:27–10:30राद के अंदेरे में औरते गोल गेरा बनाकर कडी होती हैं
  171. 10:31–10:34जब कोई महिला गाम, यानी पसीने का बहाना बनाकर
  172. 10:34–10:37जट को अपने पास आने से रोकती है
  173. 10:37–10:42तो उआशल जिन्दगी में आपने उपर लगे पिट्र सत्तात्मक पहरो को तोड रही होती है.
  174. 10:42–10:44रही है.
  175. 10:44–10:51वो वो स्ताकत का अनुबव कर रही होती है जो से दिन के उजाले में अपने पती के सामने कभी नहीं मिलती, रूटने की ताकत.
  176. 10:51–10:57क्या और्थो की अपनी कोई भावनाए नहीं फी? क्या उनका जीवन सरफ बारिष और फफसल तक्सीमित था?
  177. 10:57–10:59ये नाटक उने एक सुरक्षत मंच देता है
  178. 10:59–11:03दिकिए महिलाएं को अपनी कुन्ठाये वैक्त करने का मंच मिलता है
  179. 11:03–11:05मैं इस बाथ से पुरी तरहे नकार नहीं कर रहा
  180. 11:05–11:10लेकिन आप ये कैसे कैसकती है कि यही इसका मुख्यो देशि है
  181. 11:10–11:13अप इसे एक आदूनिक नाटक की तरे देक्रही हैं
  182. 11:13–11:15जिसका लक्षे दर्षको को बहुनात्मक मुक्ती देना है
  183. 11:15–11:16आप, बलकुल
  184. 11:16–11:19लिकिन अगर सुझ्फ बहुनात्मक मुक्ती ही लक्षे होता
  185. 11:19–11:23तो नाटक जद और जटन के पुनर मिलन पर क्यों जाना जाना चाईईगे ता
  186. 11:23–11:24मैं वास्तव में यही मानती हूँ
  187. 11:24–11:28की नाटक का अस्ली बहावनात्मक चरम पुनर मिलन ही है
  188. 11:28–11:31तो फिर उस मेंडख वाले अनुष्ठान का क्या
  189. 11:31–11:33जट जटन के मिलने के बाद
  190. 11:33–11:36उस्त्रिया आदी राद को एक मेंड़्ख क्यो पक्डती है
  191. 11:36–11:40उस बिचारे जीव को चुक्कर में रक्कर मुसल से क्यो कृती है
  192. 11:40–11:46और सबसे बडी बात उसे ले जाकर गाँगे किसी अट्यंत क्रोदी अड़त के आँगन में क्यो प्छेकती है
  193. 11:46–11:51लोग परमपराव में अकसर नाटक के अंथ में चोटे मोटे तोटके जोडे जाते हैं
  194. 11:51–11:55मुझे लकता है कि ये एक बाद में जोडा गया हिस्चा है
  195. 11:55–12:00जब औरते खथा होती हैं तो चलते चलते वे बारिशका तोटका भी कर लेती हैं
  196. 12:00–12:02ये कोई चोटा मोट़ तोटका नहीं?
  197. 12:02–12:04मानव शास्तर में एक सिद्धान तेः
  198. 12:04–12:06जिसे सहान उबूतिक जादू
  199. 12:06–12:08या सिमफेत्तिक मैजिक कहते हैं
  200. 12:08–12:10इसका नियम है कि समान चीजे
  201. 12:10–12:12समान परणाम पेडा करती हैं
  202. 12:12–12:13अब इसे समज़ीए,
  203. 12:13–12:15मिंड़क पानी का जीव है,
  204. 12:15–12:16बारिश कप्रतिक है
  205. 12:16–12:17तीक है
  206. 12:17–12:21जब उसे कुटकर जग़ाडलू औरत के दर्वाजे पर फेका जाता है
  207. 12:21–12:25तो वो औरत नीन से जागकर आग बभुला हो जाती है
  208. 12:25–12:27और जोर जोर से गालिया बकना शूरू करती है
  209. 12:27–12:31आदी रात के सननाटे में वो शोर वो गालिया
  210. 12:31–12:33आँश्मान में बादलों की गड़गाड़ की नकल है
  211. 12:33–12:38औब, औरतों का रोना या चीखना बारश की बूंदों की नकल है
  212. 12:38–12:41वे दरती पर क्रित्रम रुब से तुफान पेडा कर रही है
  213. 12:41–12:43ताकि आश्मान में आस्ली तुफान आए
  214. 12:43–12:45ये कोई उपकता नहीं है
  215. 12:45–12:47ये स्पूरे आयोजन का क्लामेख्स है
  216. 12:47–12:50अपकी ये बाद की गालिया बादलों की गड़ग़ा हद्की नकल है
  217. 12:50–12:54ये सिमपत्टेक मैजेक का बहुत अदारन है मैं से स्विकार करती हों
  218. 12:54–12:59लेकिन मेरे सवाल यह कि अगर उने सर्फ तोटका ही करना है
  219. 12:59–13:01तो वे सीदे राद को जाकर मेंड़ग क्यो नहीं पेकाती
  220. 13:01–13:03इसके लिए तीन चार गड़ड़ड़ जजटन के
  221. 13:03–13:07दामपते कलग, प्रेम, विरह का नाटक रचने की क्या जरूरत है?
  222. 13:07–13:11क्योंकी समाज के नियमो को तोलना आसान नहीं होता
  223. 13:11–13:13आप ज़र खलपना की जे
  224. 13:13–13:18पित्र सत्तात्मक ग्रामीड समाज में, जहां और्तों का जोर से बोलना भी मना हो,
  225. 13:18–13:25वहां वे आदी राथ को गर से बाहर निकल कर किसी के आंगन में मरावा जान्वर फेंगने का जोकिम कैसे ले सकती हैं?
  226. 13:25–13:26आप ये तो है.
  227. 13:26–13:32अगर कोई एक अगेली औरत आँसा करे, तो अगले दिन पन्चायत बैट जाएगी और उसे सजा मिलेगी.
  228. 13:32–13:35ये तो सच है, ये एक बहुत बडा सामाजिक अतिक्रमन है.
  229. 13:35–13:41ये बलकल. और इसी अतिक्रमन को अजाम दिने किलिए वो तीन गंते का नाटक जरूरी है.
  230. 13:41–13:45उनाटक महेज मनोरनजन नहीं है, उन एक मनोवेगानिक इंदन है.
  231. 13:45–13:49गन्तो तक एक साथ हसने जजजन की नोग जोग पर चर्चा करने से,
  232. 13:50–13:54उन और्ठो के भीतर एक असीम समहिक उर्जा पैदा होती है.
  233. 13:54–13:56अग, खलेक्टिव एनर्जी.
  234. 13:56–14:00आप खला को पुरी तरहे से उप्योगिता वाद के साचे में डाल रही हैं
  235. 14:01–14:05मैं मानती हूँ कि सामोहे कुर्जा उस जोखिम भरे अनुश्ठान किले जरूरी है
  236. 14:06–14:10तो आप खला के पुरी तरहे से उप्योगिता वाद के साचे में डाल रही हैं
  237. 14:10–14:13खला यहां केवल आत्मा को सुकून देने के लिए लिए नहीं है,
  238. 14:13–14:16ये सीधे तोर पर अस्तित्व बचाने का हत्यार है.
  239. 14:16–14:21आप खला को पूरी तरहे से उप्योगिता वाद के साचे में धाल रही हैं.
  240. 14:21–14:26मैं मानती हूँ की सामोहे कुर्जा उस जोखिम भरे आनुश्धान किले जरूरी है
  241. 14:26–14:31लेकिन था हम उन समवादों की सुख्ष्मता को नदर अंदास कर दें?
  242. 14:31–14:39जटिन का ये कहना अगर इस भार गए तो लोटकर नहीं आँँगी ये समवाद बहुत ही वक्तिगत है.
  243. 14:39–14:43एक स्तरी जो अपनी सास के तानो से परिशान है,
  244. 14:43–14:46तो अब आपने पती के उपेख्षा से आहत है,
  245. 14:46–14:49उसके लिए ये सर्फ माँन्सोन का रूपक नहीं हो सकता,
  246. 14:49–14:53जब वो अभिनै करती है, तो वास्तव में रो रही होती है.
  247. 14:53–14:56उसकी आखों के आंसु, सुखे खेट के ले नहीं,
  248. 14:56–15:00अद्रीट बज़ाग ले नहीं बलकी उसकी अपनी बच्चर हो चुकी जिन्दिगी के लिए होते हैं.
  249. 15:01–15:02दिकिए.
  250. 15:03–15:05अचकता है इसकी शुर्वात अनुश्ठान के रूप में हो,
  251. 15:06–15:09लिकिन समय के सात विद्द्यापती और जाएएद के प्रभाव में
  252. 15:09–15:12इसने एक सुत्तन्त्र मनोवे ज्यनेक कता करूप ले लिया है
  253. 15:12–15:16और्टोने इस क्रिष्वि अनुष्टान को हाईजाख कर लिया है
  254. 15:16–15:18अपनी कहानी कहने के लिये
  255. 15:18–15:19हाईजाख कर लिया है
  256. 15:19–15:21ये एक बहुत वोथ वोजबुद शब्द है
  257. 15:21–15:24लेकिन मैं ये से इस्तरा नहीं देक्ता
  258. 15:24–15:27लोक कलाव में आप अप अप इन्सान और प्रक्रिती को
  259. 15:27–15:29अलग-अलग करके नहीं देक सकतें
  260. 15:29–15:32आप खेरें ये कि अर्थों कि अपनी भावनाय है बिलकुल है
  261. 15:32–15:34लेकिन एक ग्रामिन अरत की बावनाय है
  262. 15:34–15:37उसकी फसल से रव कैसे हो सकती हैं?
  263. 15:37–15:40उसका माएके जाने का रास्ता
  264. 15:40–15:42सावन की बाड से ही क्यो बन दोता है?
  265. 15:42–15:45कुकि वो समाज रितुओ के चक्रसे बनदा है.
  266. 15:45–15:47अगर खेट में फसल नहीं योगी,
  267. 15:47–15:49तो चुला नहीं जलेगा.
  268. 15:49–15:50पती मोरंग चला जाएगा,
  269. 15:50–15:53अर सास के ताने और भी तीक्योंगे,
  270. 15:53–15:55उसका व्यक्तिगद दुक और प्रक्रती का सुखा,
  271. 15:55–15:57दोनो एकी चीज है.
  272. 15:57–15:59मैं आपकी इस बाथ से सहमत नहीं हूं,
  273. 15:59–16:02कि उसका व्यक्तिगद दुक सरज फसल से ताए होता है.
  274. 16:02–16:04गरे लु हिंसा, उपेक्षा,
  275. 16:04–16:09अब आप नी प्जान कोने का दर ये चीजें बारिष होने या ना होने से स्वतन्द रहें
  276. 16:09–16:12और जजज्टिन का नाटक इनी बावनाव को मुखर करता है
  277. 16:12–16:15लेकिन अभी वेक्ती का माद्धियम तो प्रक्रती है ना
  278. 16:15–16:19मैंद्ख वाला अनुश्ठान उस समाज का प्रक्रती से सीथा सम्वाद है.
  279. 16:19–16:21अगर अपनोस अनुश्ठान को हदादें,
  280. 16:21–16:24तो जजट जटिन केवल एक सादारान प्रेम कतार अगेगा,
  281. 16:24–16:27जो शाहत सदियों तक जीवित नहीं रहे पाता.
  282. 16:27–16:36ये उस मेंदख की म्रित्यो और उस औरत की गालिया ही है, जो इसे एक अनुश्ठान की पवित्रता प्रदान करती है.
  283. 16:36–16:42हम अपनी चर्चा की अन्तिम पडाव पर है. हम ने इस विमर्ष के दोनो पक्षों को बहुत गेराइ से देखा है.
  284. 16:42–16:46अब भी द्रद्ता से अपने इस तरक पर कायम हूँ
  285. 16:46–16:50की ज़जदन की पीडियों तक जीवित रहने की मुख्यवजा
  286. 16:50–16:54इसका स्त्री विमर्ष है. अनुश्ठान अपनी जगा हो सकता है
  287. 16:54–16:57लेकिन स्त्रीओ की अखांशाए, उनका भःए
  288. 16:57–17:00वर दामपत्ति जीवन की जटल्ताउं का,
  289. 17:00–17:04अईसा समवेदन शील चित्रन इसे महेज एक बारिष्खा तोटका नहीं देता.
  290. 17:04–17:09ये महिलाउ दूरा बनाया गया उनका अपना एक सुरक्षित सन्सार है.
  291. 17:09–17:12और मैं अपने इस निषकर्ष पर अटल हू,
  292. 17:12–17:17कि ग्रामिन लोग परमपरावो में, कला को कभी भी जीवन रक्षा से अलग नहीं कि आजा सकता.
  293. 17:17–17:24जट जटन एक अद्वितिय अदारन है, जगा एक समाज अपनी सबसे बढ़ी भोतिक चिंता,
  294. 17:24–17:27यानी सुखे और अकाल, उसका सामना करने के लिए,
  295. 17:27–17:30कला और सामुहिक्ता का सहारा लेता है,
  296. 17:31–17:33इसके भीतर मोजुद प्रेम कता
  297. 17:33–17:34वो आवरन है,
  298. 17:34–17:36जो अंततध प्रक्रती को वश्मे करने के
  299. 17:36–17:38उस तान्तरे क प्रयास तक ले जाता है.
  300. 17:38–17:41सबच्त रूप से हम इस बात पर सहमत नहीं है,
  301. 17:41–17:44कि इं दोनो में से कुंसा पहलु दूस्रे पर हावी है
  302. 17:44–17:48और शायद यही इस लोक नाट्टे कि सब से बडी खुबसुर्ती है
  303. 17:48–17:55ये मानविय समवेदनावों की गेराई और प्राक्रतिक आवशकतावों कि कथोरता के भीज लगातार जूलता रहता है
  304. 17:55–18:00अम अपने श्रोताएँ को आमन्त्रित करते हैं कि वि स्वयम इस बात पर विचार करें,
  305. 18:00–18:02कि ख्या ये सर्ब भावनाउ का एक आईना है?
  306. 18:02–18:07या फिर प्रक्रति की ताकतो को मोडने वाला कोई प्राचीन रेस्स्यमे अनुष्ठान?
  307. 18:07–18:11इस विशे में और जानने के लिए आप स्रोथ समगरी पर सकते हैं
  308. 18:11–18:13आज की चर्चा में बस इतना ही
  309. 18:13–18:15जुरने के लिए द्श्निवाद

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वल्क्व तु दिबेट क्या हो यदि एक सादारन्सा दिखने वाला लोक आत्य, जिसे सदियों से अड़्टों के मनुरंजन का सादन माना जाता रहा है, वास्तव में प्रक्रूति को निंट्रित करने का एक आर्चीन और गुप्त उपकरन हो? अद्र बश्ड़ ताद्टिन ताद्टिन ताद्टिन ताद्टिन ताद्टिन ताद्टिन ताद्टिन ताद्टिन ताद्टिन ताद्टिन ताद्टिन ताद्टिन ताद्टिन ताद्टिन ताद्टिन ताद्टिन ताद्टिन ताद्टिन ताद्टिन ताद्टिन ताद्ट तो देखे शुरुवात हम इसके अटिहासिक संदरप से करते हैं क्योंकी बिना इतिहास को समझे हम इसके असली स्वरूप को नहीं पकरते है और मैं इस नजरये को चनोती देता हूँ कि विकि मिरा मानना है कि ये विकि पूरी दामपते कता बारिश को आमन्त्रत करने वाला एक जादूई क्रिषी अनुष्टान है तो देखे, शुरूवात हम इसके अटिहासिक संदर्प से करते हैं क्योंकी, बिना इतिहास को समझे, हम इसके असली स्वरूप को नहीं पकर ते चोदा सु बारा से जोग ता सो च्यालिस के भीच भिलकुल मित्ला में महाराजा शिव सिंग और रानी लखिमा रानी का काल ये वो समयता जब महान कवी विद्ध्या पती की रच्नाए अपने चरम पर थी उनके पदों को इक संगीत कार थे जैयाथ उनहोने राग रागनीो में पिरोया और स्वैम जट की बूमिका निबाते हुए स्नाटक की रच्ना की अगर आप इस नाटक के कथावस्तू को देखेना तो ये पुरी तरषे मान्वियस संबन्दो पर्टी की है दाम पत्ती जीवन की बाते जी नहीं ब्याही जटन की अपने नहर यानी माए के जाने की जद बाड के कारन रास्ते बन्द होने से उसकी हताशा और गेहनो की माग भी दिलकोल गेहनो की माग और पती पतनी के भीच की तनातनी सबसे खाजबात यहे है के इस नाटक में जट और जटन यहनी पूरुश और स्त्री दोनो की बूमिकाए किवल स्त्रीया ही निबाती है पूरुशो का वहाना सक्त मना हुता है सही बात है तक किस मोसम में खेला जाता है और इसका दरशक वर कुन है मوسम? मतलः सावन बादो की रातो में? आप, ये साल बर नहीं खेला जाता. ये केवल सावन और बादो की उन उमस भरी रातो में खेला जाता है, जब आस्मान में बादल नहीं होते और दान की फसल सुख रही होती है. आप इसे महिलागों का एक मनोवेग्यानिक मंच कैरे हैं, लेकिन मैं इसे जीवन रक्षा का एक आदिम प्रैयास मानता हूँ। जीवन रक्षा का प्रयास? एक लोक नाट्ट्य से? भिलकुल, जब एक ख्रिषक समाज देखता है, कि उसकी फस्ले बरभाद हो रही है तो वो हताशा में प्रक्रती को मनाने किली अनुश्धान करता है जजजटिन कोई आम नातक नहीं है इसके अंत में जो होता है वो किसी बी तरह से गरेलू कहानी का हिस्सा नहीं हो सकता अप उस मेंदख वाले प्रसंकी बात कर रहे हैं अद्द में ये महिलाए एक बाँग यानी मेंदख को पकड़ती है, उसे मिट्टी के बरतन जिसे चुक्ध कहते है, उस में रक्ख कर कुटती है, और गाँ की सबसे जग्डालु औरत के दर्वाजे पर फेखाटी है. उस उरत की गालियो से बारेश होने का विश्वास है ना वही इस पूरी प्रक्रिया की आत्मा है आप खेह रहे हैं कि यह सर्फ बारेश का तोटका है लेकिन रहा ज़ा रूकिये अगर यह सर्फ एक अनुष्टान ता तो जाइत को पंद्रावी शताबती में विद्यापती के इतने परिष्क्रित और सहिट्तिग गीतों को इस में पिरोने की क्या जरूरत थी? क्यों कि कला लोगों को जोडती है पर एक सादारन तोटके को इतनी बहव्वे सहिट्तिग प्रेम कता का आवरन क्यों पैनाया गया? नाटक के भीतर जो प्रसंग है, वो बहुत गेरे है, जैसे पुरैनी, यहनी कमल के पते पर चलकर जूमर खिलने का प्रस्ताउ, जो एक प्रतिकात्मक विवाख को दरषाता है, फिर जट्का कमाने के लिए मोरंग जाना. आ, निपाल का तराए शेट्र. जट्ट के पीचे से एक सुनार आता है, जट्टिन को गेहनों का प्रलोबन देता है, लेकिन जट्टिन उस प्रलोबन को थुक्रा देती है, अपने पती की सुंदरता का बखान करती है. यदी अन्तिम लक्ष अप एक मेड़क को मारना और गालिया सुन्ना ही ता, तो ये गेरे नेटिक परिक्षनों की क्या अवश्शक्ता थी मतलब ये तो बलकुल आजा ही है ज़से किसी चोटे से कानुनी दस्तावेज पर दस्तक्ट करने के ले कोई दस दिन कबहव्य विवाज समरो आए उजित कर दे अपका ये कानुनी दस्तावेज वाला उदारन सुनने में बच्छा लकता है लेकिन जमीनी हकिकत कुछ और है लोग परमपराये दरबारो में पैजा हो सकती हैं लेकिन वे सदियों तक केवल कला के दंपर जीवित नहीं रहतीं तो फिर कैसे जीवित रहती हैं? वे तब ही जिन्दा रहती हैं जब वे समाज की किसी बहुत गेरी बहुत्टिक आवशकता से जुडी हों. आप सूनार के प्रलोबन और जटके मुरंग जाने को एक नेटिक कहानी या उच्कोटी का सहते बतारही हैं. मैं से बिहार और मिठला के क्रिषक समाज के कथोड आर्टिक हकीकत के रूप में देकता हूँ आर्टिक हकीकत कैसे? ये तो स्पष्टो रूप से एक पतनी की वाफादारी की परिक्षा का प्रसंग है नहीं, इसे बड़े परद्रिष्च में दिख ही, जब भारिश नहीं होती सुखा परता है, तो खेद बंजर हो जाते हैं. आज़े में किसान क्या करेगा? उसे पलायन करना परता है. जट्का मूरंग जाना कोई सादारन यात्रा नहीं ये सुखे के कारन होने वाला मस्धूरो का पलायन है. अच्छा पलायन के अर्ठ्ट में? आँ और जब पूरुच कर चोडगर चला जाता है, तो पीछे चुटी स्वाज में बहुत असुरक्षित हो जाती है. सूनार का आना उसी शोशन का प्रतीक है, जटिन का प्रलोबन से बच्ना सर्फ पतिब्रता द्र्म नहीं है ये उस क्रिष्च समाज का वो समाजिक धाचा है जो अकाल के समः बिखरने से बचने की जधुजहित कर रहा है जो अखाल के समः बिखरने से बचने की जदू जहित कर रहा है तीक है मैं ये मान सकती हूँ की अखाल और पलायन की प्रष्ट भूमी इस में मोझुद है लोग साहित ये अपने समः के समाच को ही दरषाता है लेकिन जब हम नाटक के दूसरे हिससे में जाते ना तो बज़द बवाँगाने बद्टन तो बज़द बवाँगाने बद्टन तो बज़द बवाँगाने बद्टन तो बज़द बवाँगाने बद्टन तो बज़द बवाँगाने बद्टन तो बज़द बवाँगाने बद्टन तो बज़द बवाँगाने बद्टन तो ब� ज़िस्से दाल में बखार या तडगा लगा जाता है, जद्टिन इसे अपना भ्यानक अप्मान मानती है, और गुस्से में गर चोडगर चली जाती है. अप सवाल ये है, कि चोंकी से चूना इतना बडा अप्मान क्यो है? उंग वृग तीखरिख सब तात्मक समाज में रसोई कोस तरी का सबसे निच्ला, सबसे उभाओ और थका देने वाला कारेखषे तरमाना जाता है. जब जद अदनी पतनी को चोंकी से चूथा है, तो वो अनजाने में उसे येजदा ता रहा है, कि उसकी हैस्यद गर में स्विक रसुए की दासी की है. जटिन का इस बाद पर गर चोर देना, महिलाओं के आत्मसम्मान का एक बहुत बड़ा विद्रो है. दिके आप इसे आदूनिक मनोविग्यान और आजके नारीवाद के चश्मे से देख रही हैं. मैं ये नहीं केरा ग़ा थी च्छोंकी वाला प्रसंग महतुपून नहीं है. लेकिन आप आप इसके बाद क्या होता उसे पुरी तरा से चोड रही हैं. या चोड रही हूँ मैं? जटिन के गर से जाने के बाद गर की हालत क्या होती है? वैई तो मेरा आगला बिन्दू था गर की हालत का जो वरनन लोक नाटे मैं है वो अवसाद का बहतरी न उदारन है जटिन के बिना गर में जोल मक्डा यहनी जाले लग जाते है अगर बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बा अगर जटिन प्रक्रति है जटिन का रूटना प्रक्रति का रूटना है ये व्याख्या दिल्चस्प तो है लेकिन अगर जटिन प्रक्रति है तो जटिन प्रक्रति है तो जटिन प्रक्रति है तो जटिन प्रक्रति है तो जटिन प्रक्रति है याँ बशल के जगगे जंगली गास उगाती है और किसान का गर भुखमरी से उजरने लकता है जटिन का रूटना प्रक्रती का रूटना है ये व्याख्या दिल्चस्प तो है लेकिन अगर जटिन प्रक्रती है तो जट उसे मनाने किले जो रूप दहरता है उसका क्या अर्थ है? रूब दहरता है मतलप जटिन के जाने के बाद जट को अपनी गल्ती का एहसाज होता है वो कभी गोपी तो कभी मनिहारीन यानी चूडी बेचने वाली उसका रूब दहरकर गाउं गाउ उसे खूछता है उस्त्रीका रूब दहर रहा है। आप उस्वांग रचता है। एक पूरुश्वादी समाज में पती का अपनी पतनी को मनाने किले स्त्रीका वेश दारन करना अपना सारा पूरुशार्थ त्याग देना ये मान्सी ये प्रेम और आपनी के तुटने की ये मान्सी ये प्रेम और आहिंकार के तुटने की एक बहुत फीव्यक्तिगत और मार्मेक कहानी है. इसे आप मान्सून कैसे कैसकते है? ये बहुत आसानी से मान्सून का ही हिज्सा है. जब सुख्खा परता है न, तो पुरा कपुरा गाँं, पुरा समाज, प्रक्र्दिए को मनाने किले तरा तरा के स्वांग रच्ता है, अनुश्ठान करता है, जट का रग रग रव द़कर जटिन को कुजना, असल में हताश क्रिषक समाज दवारा बारिष को आमन्त्रित करने के अंगिनत प्रासो कप्रतिक है. आप रर चीस को खेती से जोड रहे हैं वुकि वो समाज उसी पर टिका है और जब अंद्द तब जटिन मान जाती हैं और लोड आती हैं तो वो केवल एक पतनी की गर वापसी नहीं वो सुखे के बाद पहली बारिष के लोड ने की उमीद है लेकिन मैं आपको याद दिलादू की इस नाटक का मनचन कैसे होता है इस में परुष होते ही नहीं है राद के अंदेरे में औरते गोल गेरा बनाकर कडी होती हैं जब कोई महिला गाम, यानी पसीने का बहाना बनाकर जट को अपने पास आने से रोकती है तो उआशल जिन्दगी में आपने उपर लगे पिट्र सत्तात्मक पहरो को तोड रही होती है. रही है. वो वो स्ताकत का अनुबव कर रही होती है जो से दिन के उजाले में अपने पती के सामने कभी नहीं मिलती, रूटने की ताकत. क्या और्थो की अपनी कोई भावनाए नहीं फी? क्या उनका जीवन सरफ बारिष और फफसल तक्सीमित था? ये नाटक उने एक सुरक्षत मंच देता है दिकिए महिलाएं को अपनी कुन्ठाये वैक्त करने का मंच मिलता है मैं इस बाथ से पुरी तरहे नकार नहीं कर रहा लेकिन आप ये कैसे कैसकती है कि यही इसका मुख्यो देशि है अप इसे एक आदूनिक नाटक की तरे देक्रही हैं जिसका लक्षे दर्षको को बहुनात्मक मुक्ती देना है आप, बलकुल लिकिन अगर सुझ्फ बहुनात्मक मुक्ती ही लक्षे होता तो नाटक जद और जटन के पुनर मिलन पर क्यों जाना जाना चाईईगे ता मैं वास्तव में यही मानती हूँ की नाटक का अस्ली बहावनात्मक चरम पुनर मिलन ही है तो फिर उस मेंडख वाले अनुष्ठान का क्या जट जटन के मिलने के बाद उस्त्रिया आदी राद को एक मेंड़्ख क्यो पक्डती है उस बिचारे जीव को चुक्कर में रक्कर मुसल से क्यो कृती है और सबसे बडी बात उसे ले जाकर गाँगे किसी अट्यंत क्रोदी अड़त के आँगन में क्यो प्छेकती है लोग परमपराव में अकसर नाटक के अंथ में चोटे मोटे तोटके जोडे जाते हैं मुझे लकता है कि ये एक बाद में जोडा गया हिस्चा है जब औरते खथा होती हैं तो चलते चलते वे बारिशका तोटका भी कर लेती हैं ये कोई चोटा मोट़ तोटका नहीं? मानव शास्तर में एक सिद्धान तेः जिसे सहान उबूतिक जादू या सिमफेत्तिक मैजिक कहते हैं इसका नियम है कि समान चीजे समान परणाम पेडा करती हैं अब इसे समज़ीए, मिंड़क पानी का जीव है, बारिश कप्रतिक है तीक है जब उसे कुटकर जग़ाडलू औरत के दर्वाजे पर फेका जाता है तो वो औरत नीन से जागकर आग बभुला हो जाती है और जोर जोर से गालिया बकना शूरू करती है आदी रात के सननाटे में वो शोर वो गालिया आँश्मान में बादलों की गड़गाड़ की नकल है औब, औरतों का रोना या चीखना बारश की बूंदों की नकल है वे दरती पर क्रित्रम रुब से तुफान पेडा कर रही है ताकि आश्मान में आस्ली तुफान आए ये कोई उपकता नहीं है ये स्पूरे आयोजन का क्लामेख्स है अपकी ये बाद की गालिया बादलों की गड़ग़ा हद्की नकल है ये सिमपत्टेक मैजेक का बहुत अदारन है मैं से स्विकार करती हों लेकिन मेरे सवाल यह कि अगर उने सर्फ तोटका ही करना है तो वे सीदे राद को जाकर मेंड़ग क्यो नहीं पेकाती इसके लिए तीन चार गड़ड़ड़ जजटन के दामपते कलग, प्रेम, विरह का नाटक रचने की क्या जरूरत है? क्योंकी समाज के नियमो को तोलना आसान नहीं होता आप ज़र खलपना की जे पित्र सत्तात्मक ग्रामीड समाज में, जहां और्तों का जोर से बोलना भी मना हो, वहां वे आदी राथ को गर से बाहर निकल कर किसी के आंगन में मरावा जान्वर फेंगने का जोकिम कैसे ले सकती हैं? आप ये तो है. अगर कोई एक अगेली औरत आँसा करे, तो अगले दिन पन्चायत बैट जाएगी और उसे सजा मिलेगी. ये तो सच है, ये एक बहुत बडा सामाजिक अतिक्रमन है. ये बलकल. और इसी अतिक्रमन को अजाम दिने किलिए वो तीन गंते का नाटक जरूरी है. उनाटक महेज मनोरनजन नहीं है, उन एक मनोवेगानिक इंदन है. गन्तो तक एक साथ हसने जजजन की नोग जोग पर चर्चा करने से, उन और्ठो के भीतर एक असीम समहिक उर्जा पैदा होती है. अग, खलेक्टिव एनर्जी. आप खला को पुरी तरहे से उप्योगिता वाद के साचे में डाल रही हैं मैं मानती हूँ कि सामोहे कुर्जा उस जोखिम भरे अनुश्ठान किले जरूरी है तो आप खला के पुरी तरहे से उप्योगिता वाद के साचे में डाल रही हैं खला यहां केवल आत्मा को सुकून देने के लिए लिए नहीं है, ये सीधे तोर पर अस्तित्व बचाने का हत्यार है. आप खला को पूरी तरहे से उप्योगिता वाद के साचे में धाल रही हैं. मैं मानती हूँ की सामोहे कुर्जा उस जोखिम भरे आनुश्धान किले जरूरी है लेकिन था हम उन समवादों की सुख्ष्मता को नदर अंदास कर दें? जटिन का ये कहना अगर इस भार गए तो लोटकर नहीं आँँगी ये समवाद बहुत ही वक्तिगत है. एक स्तरी जो अपनी सास के तानो से परिशान है, तो अब आपने पती के उपेख्षा से आहत है, उसके लिए ये सर्फ माँन्सोन का रूपक नहीं हो सकता, जब वो अभिनै करती है, तो वास्तव में रो रही होती है. उसकी आखों के आंसु, सुखे खेट के ले नहीं, अद्रीट बज़ाग ले नहीं बलकी उसकी अपनी बच्चर हो चुकी जिन्दिगी के लिए होते हैं. दिकिए. अचकता है इसकी शुर्वात अनुश्ठान के रूप में हो, लिकिन समय के सात विद्द्यापती और जाएएद के प्रभाव में इसने एक सुत्तन्त्र मनोवे ज्यनेक कता करूप ले लिया है और्टोने इस क्रिष्वि अनुष्टान को हाईजाख कर लिया है अपनी कहानी कहने के लिये हाईजाख कर लिया है ये एक बहुत वोथ वोजबुद शब्द है लेकिन मैं ये से इस्तरा नहीं देक्ता लोक कलाव में आप अप अप इन्सान और प्रक्रिती को अलग-अलग करके नहीं देक सकतें आप खेरें ये कि अर्थों कि अपनी भावनाय है बिलकुल है लेकिन एक ग्रामिन अरत की बावनाय है उसकी फसल से रव कैसे हो सकती हैं? उसका माएके जाने का रास्ता सावन की बाड से ही क्यो बन दोता है? कुकि वो समाज रितुओ के चक्रसे बनदा है. अगर खेट में फसल नहीं योगी, तो चुला नहीं जलेगा. पती मोरंग चला जाएगा, अर सास के ताने और भी तीक्योंगे, उसका व्यक्तिगद दुक और प्रक्रती का सुखा, दोनो एकी चीज है. मैं आपकी इस बाथ से सहमत नहीं हूं, कि उसका व्यक्तिगद दुक सरज फसल से ताए होता है. गरे लु हिंसा, उपेक्षा, अब आप नी प्जान कोने का दर ये चीजें बारिष होने या ना होने से स्वतन्द रहें और जजज्टिन का नाटक इनी बावनाव को मुखर करता है लेकिन अभी वेक्ती का माद्धियम तो प्रक्रती है ना मैंद्ख वाला अनुश्ठान उस समाज का प्रक्रती से सीथा सम्वाद है. अगर अपनोस अनुश्ठान को हदादें, तो जजट जटिन केवल एक सादारान प्रेम कतार अगेगा, जो शाहत सदियों तक जीवित नहीं रहे पाता. ये उस मेंदख की म्रित्यो और उस औरत की गालिया ही है, जो इसे एक अनुश्ठान की पवित्रता प्रदान करती है. हम अपनी चर्चा की अन्तिम पडाव पर है. हम ने इस विमर्ष के दोनो पक्षों को बहुत गेराइ से देखा है. अब भी द्रद्ता से अपने इस तरक पर कायम हूँ की ज़जदन की पीडियों तक जीवित रहने की मुख्यवजा इसका स्त्री विमर्ष है. अनुश्ठान अपनी जगा हो सकता है लेकिन स्त्रीओ की अखांशाए, उनका भःए वर दामपत्ति जीवन की जटल्ताउं का, अईसा समवेदन शील चित्रन इसे महेज एक बारिष्खा तोटका नहीं देता. ये महिलाउ दूरा बनाया गया उनका अपना एक सुरक्षित सन्सार है. और मैं अपने इस निषकर्ष पर अटल हू, कि ग्रामिन लोग परमपरावो में, कला को कभी भी जीवन रक्षा से अलग नहीं कि आजा सकता. जट जटन एक अद्वितिय अदारन है, जगा एक समाज अपनी सबसे बढ़ी भोतिक चिंता, यानी सुखे और अकाल, उसका सामना करने के लिए, कला और सामुहिक्ता का सहारा लेता है, इसके भीतर मोजुद प्रेम कता वो आवरन है, जो अंततध प्रक्रती को वश्मे करने के उस तान्तरे क प्रयास तक ले जाता है. सबच्त रूप से हम इस बात पर सहमत नहीं है, कि इं दोनो में से कुंसा पहलु दूस्रे पर हावी है और शायद यही इस लोक नाट्टे कि सब से बडी खुबसुर्ती है ये मानविय समवेदनावों की गेराई और प्राक्रतिक आवशकतावों कि कथोरता के भीज लगातार जूलता रहता है अम अपने श्रोताएँ को आमन्त्रित करते हैं कि वि स्वयम इस बात पर विचार करें, कि ख्या ये सर्ब भावनाउ का एक आईना है? या फिर प्रक्रति की ताकतो को मोडने वाला कोई प्राचीन रेस्स्यमे अनुष्ठान? इस विशे में और जानने के लिए आप स्रोथ समगरी पर सकते हैं आज की चर्चा में बस इतना ही जुरने के लिए द्श्निवाद

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