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जलसमाधि__एक_विश्लेषण.mp4
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- 0:00–0:04आए आज्सीदे एक बहुत लिईच्छःस्प और मार्मिक दुन्या में कडम रकते है
- 0:05–0:10हम बात कर रहे है मश्हुर मेथिली उपन्यास गोही सबख्ख भीच जल समादिकी
- 0:10–0:14ये महज एक कहानी बहर नहीं है, बलकी एक अईसा गेहरा आख्यान है
- 0:14–0:21ज़ाँ मैजिकल रीलिजम यानी जादूई याठाधवाद समाजिक नयाय की एक भेहद कदवी सच्चाई से टक्राता है.
- 0:21–0:24ये पुरी चर्चा इसी एक बड़े सवाल पर टिकती है,
- 0:24–0:29कि जब एक पूरी की पूरी विवस्ता, कुछ अन्सानो को काखजो से मितादेना चाहती है,
- 0:29–0:32तो नकी यादो को आखिर कों जिन्दा रकता है?
- 0:32–0:34इस कहानी की शुर्वाद होती है,
- 0:34–0:39गर्ड नारी केल नाम की एक बेहद रहस्तिमएं और जीवन्त गाँन से.
- 0:39–0:43अब ये कोई ये ये सा वेसा गाँ नहीं है, जो सरफ एट पट़र से बना हो.
- 0:43–0:48ये गाँ बना है मिट्टी से, और यहां सद्यों से चली आरहीं मोखिक परम परावों से.
- 0:48–0:52यहां ग्यान को किताबो के पन्नो में कैद नहीं किया जाता,
- 0:52–0:55बलकी वो यहा बहने वाली कमला बला नदी की लेजरो में
- 0:55–0:58और लोगो की कहानियो में हमेशा जिन्दार है.
- 0:58–1:01इस गाउ की पूरी की पूरी फिलोस्ट्टी
- 1:01–1:04एक बहुत ही पूरानी स्थानिया कहावत में चिपी है.
- 1:04–1:09कहावत है, गोहे देह कहाए तची, नाम नही.
- 1:09–1:13मतलप मगर मच शरीर को तो खाजटे है, पर नाम को नहीं.
- 1:13–1:15कितनी गेरी बात है ना?
- 1:15–1:18ये बताता है कि अचान का शरीर भले ही ख़तम हो जाए,
- 1:18–1:21लेकिन उसका नाम और उसका वजुद तब तक नमर रहेता है,
- 1:21–1:23जब तक समाज उसे याद रखता है.
- 1:23–1:28और सच कहें तो यही वो नीव है जिस पर आगे का पुरा संगर्ष्टिका है
- 1:28–1:32तो कहानी का पहला हिस्चा है यादों का गाउं
- 1:32–1:36गर नारी किल के बिलकुल बीचो भीच एक बहुत ही पुराना पेड है
- 1:36–1:39जिसे चन्ना गाज केते हैं दिन के वकत अगर देखें
- 1:39–1:43तो ये जगा एक दम सामान ने लकती है, गाँके बच्चे यहां खेलते कुतते हैं.
- 1:43–1:47लेकिन, जैसे ही सुरज धलता है और राथ होती है,
- 1:47–1:50ये पेर एक बलकुल ही आलक दून्या का केंदर बन जाता है.
- 1:50–1:54और यहां से शुरूब हुता है हमारा दूस्रा हिस्सा,
- 1:54–1:57बुलाए गई नामो को बचाते बूथ
- 1:57–2:04स्थानिये लोग कताई बताती हैं कि राद के अंदेरे में इस चन्ना गाच के नीचे बूथ ख़त्ता होते हैं
- 2:04–2:07पत्ठेर ये ये बूथ जिन्दा लोगों को दराने नहीं आते
- 2:07–2:14बल की ये एक बड़ाही रहस्समए खेल खेल ते हैं जिसे नाम बचाने वाली कबद्दी कहाजाता है.
- 2:14–2:21इस खेल का मकसद है उन गरीब हाश्ये पर पडे मस्दूरों के नामो को पुकारना और उने बचाना जिने समाज ने भुला दिया है.
- 2:21–2:24जिन नामो को कागस से मिता दिया जाता है,
- 2:24–2:28उने ये भूथ अपने इस जादूई केल में हमेशा के ले महफूज कर लेते हैं.
- 2:28–2:31अब हम आते है तीस्रे हिस्से पर,
- 2:31–2:34कागसी जूथ बनाम मिट्टी का सच.
- 2:34–2:40जादू और रहस्ये की इस दून्या से निकल कर अब जरा असल दून्या की खोफनाक अकीकत की तरफ रुक करते हैं.
- 2:40–2:44होता यहे कि गंगा नदी पर एक बहुत बड़े पूल का निरमान चल रहा है.
- 2:44–2:47अचाना की भव्यंकर तूफान आता है,
- 2:47–2:51लेकिन उपर से आदेश मिलता है कि मस्टूरो को हर हाल में काम जारी रकना होगा.
- 2:52–2:57नतीजा पूल का एक हिसद है जाता है और कैई भेबस मस्टूर पानी मिसमा जाते है.
- 2:57–3:00ये अपने आप में बच्ट बडी त्रासदी है.
- 3:00–3:03बर इसे भी बड़ी तरासदी तब शुए होती है,
- 3:03–3:06जब अदिकारी तुरन्तिस पूरी गटनापर पड़दा डालने
- 3:06–3:09और इक सुन्योज़िद सरकारी लीपा पोटी में लग जाते हैं.
- 3:09–3:13इसी साइट पर नन्द आरूनी नाम का एक जूवा एंजन्यर काम कर रहा है.
- 3:13–3:17उसे जब स्वकारी कहतो का सच पता चलता है तो वो हेरान रहे जाता है.
- 3:17–3:22लाल महर वाले वो अदिकारिक पनने मनगडन् सुरक्षा लेकोड़ से बहरे पडे हैं.
- 3:22–3:27अद्ब खागजो के जर ये सच्छ को पुरी तराषे दफन कर दिया गया है.
- 3:28–3:32लेकि नन्द अपनी दादी की दीई हुई एक बहुत ही गेरी सीक सिबंदा है.
- 3:33–3:36उसकी दादी जिने वो बा खेटा था उनो ने सिखाया था,
- 3:37–3:40जो इ नामक वस्तू अच्छीत नाम कहु,
- 3:40–3:46जो इ नामक वस्तु अच्छीतन नाम कहु जो तारीकक वस्तु अच्छीता हम नहीं मानब.
- 3:46–3:49यानी अगर ये नाम की बात है, तो नाम बताओ.
- 3:49–3:53अगर ये सर्फ तारीहो का हिसाब है, तो मैं येसे नहीं मानुगा.
- 3:53–3:57उनो ने हमेशा बेईमानी के पैसो की गंद से दूर,
- 3:57–4:00इमान्दार मिट्टी की महक पर ब्रोसा करना सिखाया था
- 4:00–4:06बस इसी सीक्ख की बजे से नंद इस सरकारी दोके को मानने से साफ पिनकार कर देता है
- 4:06–4:08हमारा अगला हिस्चा है
- 4:08–4:11तीस नाम तीन सो माउतें
- 4:11–4:13तीन सो जी हा
- 4:13–4:15तीन सो माउतें
- 4:15–4:24ये आख्रा सच्छ में रोंटे कड़े कर देता है, ज़हा एक तरव सरकारी रेकोड बेहत बेशर्मी से सुफ तीस लोगों की मोड को मानकर फाइल बंद कर देता है,
- 4:24–4:29वही आस्लियत ये है कि मरने वालो की संख्या तीन सोके करीब ती.
- 4:29–4:35वेवस्त्ताने अपनी सहुल्यत के लिए बाकी दोसो सथटर लोगो के वजजुद को ही स्रे सिनकार दिया.
- 4:35–4:41रिष्वत और तमां धमकियों को दरकिनार करते हुए, नन्देग बहुत फीभाद्दरी बहराग कदम उठाता है,
- 4:41–4:44वो अपना खुत का एक वेकल्पेक रिकोड तयार करता है,
- 4:44–4:47जिसे नाम दिया गया चबाक का हिसाब या श्पलाष लेजर.
- 4:47–4:50जहां सरकारी खाता सरा सर जुट का पूलिंदा है,
- 4:50–4:56वही नंद का ये लेजर बिस्चेसर और सर्यु जैसे उन सभी बुला दिये गय मस्टूरो का सच्चा दस्तावेज है,
- 4:56–5:00जने सर्कार निक कागजों से हमेशा के ले मिता देने की कोषिषकी ती.
- 5:00–5:02नंद ये बात बहुत अच्छे से जानता ता,
- 5:02–5:05की आदिकारे कागस जूट बोल सकते हैं.
- 5:05–5:09इसलिये उसने गधनास ठल पर चूटे हुए सामाने खटा करना शूरू किया.
- 5:10–5:14किसीका पथा हुआ गम्चा, एक चान्दी की चूडी या फिर एक जूटा.
- 5:14–5:16ये महस भेजान चीजे नहीं थी,
- 5:16–5:21ये उस बात का अकाट्टे प्रमान ती कि ये मस्दूर उस्पूल पर मोझुद थे
- 5:21–5:24उनो ने वहां पसीना भाहाया और वही उनकी जान भी गई.
- 5:24–5:30और अब पाच्वा हिस्चा अदालत की लडाए, सच को साभित करने की ये लडाए
- 5:30–5:34नदी के किनारों से निकल कर कोट्रूम तक पहुचती है,
- 5:34–5:39लेके न दालतों के जर ये नियाए पाने का ये रास्ता बहुत लंबार पीडा डायक है.
- 5:39–5:44नन्द वकील देव की नन्दन चोभे के साथ मिलकर के स्वाएल तो कर देता है,
- 5:44–5:47पर बदले में मिलती है सर्फ अंत रहीं तारीके,
- 5:47–5:51गाया बोते दस्तावेज और नाकर शाही की बारी थ्खागवद,
- 5:51–5:55नयाई की गती यहां आकर मानो एक दम रेंग ने प्छाए.
- 5:55–6:00अदालत के अंदर विचार द्हराओं की एक जबर दस्त जंग देखने को मिलती है.
- 6:00–6:04एक तरफ है क्रप्रेत वकील बटुकनात, जो बड़ी ही चालाकी से तर्क देता है,
- 6:04–6:08कि जूताया चूडी जैसी चीजे महेंस जस्बाती एहम्यत रकती हैं.
- 6:08–6:11इनकी कोई कानुनी हैस्यत नहीं है.
- 6:11–6:13और दूसरी तरफ है नंद, जो आडा हूए है,
- 6:13–6:17कि जब कागजों से किसी इनसान कर नामी ही गाएप कर दिया गया हो,
- 6:17–6:20तो यह बहुतिक चीजे ही उस इनसान के वुजुत का,
- 6:20–6:22आखरी और सबसे पुखता सबूथ हैं.
- 6:22–6:26कानूनी डाओ पेंच देक कर और इस दरसे के कही अडालत से भी
- 6:26–6:28उसके सच्छे दस्तवेज गायब नहोजाए,
- 6:28–6:31नन्देख बहुत फीप्रतीकात्मक कदम उठाटा है.
- 6:31–6:37वो चुप्चाः अपने बनाए गय उस आस्सली लेजर की कोप्या नदी के किनारे मिट्टी में दबादेटा है.
- 6:37–6:39ये इस बात का एक बहुत बडादा प्रतीक है,
- 6:39–6:44कि उसका बहरोसा इस खोखली कानूनी विवस्ता से कही जआदा इस दर्ती और प्रक्रिती पर है.
- 6:45–6:50यह पूरी गटना इस आख्यान के सबसे बड़े और मूल संदेश को सामने लाती है.
- 6:50–6:54म्रित्यो औही दिन नहीं होए तची जखन देहे रुकेत अची.
- 6:54–6:58म्रित्यो उही दिन होईत अची जखन नाम हटेद अची
- 6:58–7:01यानी सच्छी मुद उस दिन नहीं होती
- 7:01–7:03जब शरीर की सांसे रुक जाती है
- 7:03–7:05आस्ली मुद उस दिन होती है
- 7:05–7:09जब किसी अनसान का नाम स्म्रित्यो से जानबुचकर मिता दिया जाता है
- 7:09–7:18इस पूरी चर्चा से गुजरने के बाद ये कहानी हमें जवाब देही के एक बहुत ही गेरे और जगजोर देने वाले सवाल के साथ चोर जाती है.
- 7:18–7:21ज़रा विचार करें. जब बडी बडी आदिकारिक संस्ताएं,
- 7:21–7:41अदियादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादा
Plain text
आए आज्सीदे एक बहुत लिईच्छःस्प और मार्मिक दुन्या में कडम रकते है हम बात कर रहे है मश्हुर मेथिली उपन्यास गोही सबख्ख भीच जल समादिकी ये महज एक कहानी बहर नहीं है, बलकी एक अईसा गेहरा आख्यान है ज़ाँ मैजिकल रीलिजम यानी जादूई याठाधवाद समाजिक नयाय की एक भेहद कदवी सच्चाई से टक्राता है. ये पुरी चर्चा इसी एक बड़े सवाल पर टिकती है, कि जब एक पूरी की पूरी विवस्ता, कुछ अन्सानो को काखजो से मितादेना चाहती है, तो नकी यादो को आखिर कों जिन्दा रकता है? इस कहानी की शुर्वाद होती है, गर्ड नारी केल नाम की एक बेहद रहस्तिमएं और जीवन्त गाँन से. अब ये कोई ये ये सा वेसा गाँ नहीं है, जो सरफ एट पट़र से बना हो. ये गाँ बना है मिट्टी से, और यहां सद्यों से चली आरहीं मोखिक परम परावों से. यहां ग्यान को किताबो के पन्नो में कैद नहीं किया जाता, बलकी वो यहा बहने वाली कमला बला नदी की लेजरो में और लोगो की कहानियो में हमेशा जिन्दार है. इस गाउ की पूरी की पूरी फिलोस्ट्टी एक बहुत ही पूरानी स्थानिया कहावत में चिपी है. कहावत है, गोहे देह कहाए तची, नाम नही. मतलप मगर मच शरीर को तो खाजटे है, पर नाम को नहीं. कितनी गेरी बात है ना? ये बताता है कि अचान का शरीर भले ही ख़तम हो जाए, लेकिन उसका नाम और उसका वजुद तब तक नमर रहेता है, जब तक समाज उसे याद रखता है. और सच कहें तो यही वो नीव है जिस पर आगे का पुरा संगर्ष्टिका है तो कहानी का पहला हिस्चा है यादों का गाउं गर नारी किल के बिलकुल बीचो भीच एक बहुत ही पुराना पेड है जिसे चन्ना गाज केते हैं दिन के वकत अगर देखें तो ये जगा एक दम सामान ने लकती है, गाँके बच्चे यहां खेलते कुतते हैं. लेकिन, जैसे ही सुरज धलता है और राथ होती है, ये पेर एक बलकुल ही आलक दून्या का केंदर बन जाता है. और यहां से शुरूब हुता है हमारा दूस्रा हिस्सा, बुलाए गई नामो को बचाते बूथ स्थानिये लोग कताई बताती हैं कि राद के अंदेरे में इस चन्ना गाच के नीचे बूथ ख़त्ता होते हैं पत्ठेर ये ये बूथ जिन्दा लोगों को दराने नहीं आते बल की ये एक बड़ाही रहस्समए खेल खेल ते हैं जिसे नाम बचाने वाली कबद्दी कहाजाता है. इस खेल का मकसद है उन गरीब हाश्ये पर पडे मस्दूरों के नामो को पुकारना और उने बचाना जिने समाज ने भुला दिया है. जिन नामो को कागस से मिता दिया जाता है, उने ये भूथ अपने इस जादूई केल में हमेशा के ले महफूज कर लेते हैं. अब हम आते है तीस्रे हिस्से पर, कागसी जूथ बनाम मिट्टी का सच. जादू और रहस्ये की इस दून्या से निकल कर अब जरा असल दून्या की खोफनाक अकीकत की तरफ रुक करते हैं. होता यहे कि गंगा नदी पर एक बहुत बड़े पूल का निरमान चल रहा है. अचाना की भव्यंकर तूफान आता है, लेकिन उपर से आदेश मिलता है कि मस्टूरो को हर हाल में काम जारी रकना होगा. नतीजा पूल का एक हिसद है जाता है और कैई भेबस मस्टूर पानी मिसमा जाते है. ये अपने आप में बच्ट बडी त्रासदी है. बर इसे भी बड़ी तरासदी तब शुए होती है, जब अदिकारी तुरन्तिस पूरी गटनापर पड़दा डालने और इक सुन्योज़िद सरकारी लीपा पोटी में लग जाते हैं. इसी साइट पर नन्द आरूनी नाम का एक जूवा एंजन्यर काम कर रहा है. उसे जब स्वकारी कहतो का सच पता चलता है तो वो हेरान रहे जाता है. लाल महर वाले वो अदिकारिक पनने मनगडन् सुरक्षा लेकोड़ से बहरे पडे हैं. अद्ब खागजो के जर ये सच्छ को पुरी तराषे दफन कर दिया गया है. लेकि नन्द अपनी दादी की दीई हुई एक बहुत ही गेरी सीक सिबंदा है. उसकी दादी जिने वो बा खेटा था उनो ने सिखाया था, जो इ नामक वस्तू अच्छीत नाम कहु, जो इ नामक वस्तु अच्छीतन नाम कहु जो तारीकक वस्तु अच्छीता हम नहीं मानब. यानी अगर ये नाम की बात है, तो नाम बताओ. अगर ये सर्फ तारीहो का हिसाब है, तो मैं येसे नहीं मानुगा. उनो ने हमेशा बेईमानी के पैसो की गंद से दूर, इमान्दार मिट्टी की महक पर ब्रोसा करना सिखाया था बस इसी सीक्ख की बजे से नंद इस सरकारी दोके को मानने से साफ पिनकार कर देता है हमारा अगला हिस्चा है तीस नाम तीन सो माउतें तीन सो जी हा तीन सो माउतें ये आख्रा सच्छ में रोंटे कड़े कर देता है, ज़हा एक तरव सरकारी रेकोड बेहत बेशर्मी से सुफ तीस लोगों की मोड को मानकर फाइल बंद कर देता है, वही आस्लियत ये है कि मरने वालो की संख्या तीन सोके करीब ती. वेवस्त्ताने अपनी सहुल्यत के लिए बाकी दोसो सथटर लोगो के वजजुद को ही स्रे सिनकार दिया. रिष्वत और तमां धमकियों को दरकिनार करते हुए, नन्देग बहुत फीभाद्दरी बहराग कदम उठाता है, वो अपना खुत का एक वेकल्पेक रिकोड तयार करता है, जिसे नाम दिया गया चबाक का हिसाब या श्पलाष लेजर. जहां सरकारी खाता सरा सर जुट का पूलिंदा है, वही नंद का ये लेजर बिस्चेसर और सर्यु जैसे उन सभी बुला दिये गय मस्टूरो का सच्चा दस्तावेज है, जने सर्कार निक कागजों से हमेशा के ले मिता देने की कोषिषकी ती. नंद ये बात बहुत अच्छे से जानता ता, की आदिकारे कागस जूट बोल सकते हैं. इसलिये उसने गधनास ठल पर चूटे हुए सामाने खटा करना शूरू किया. किसीका पथा हुआ गम्चा, एक चान्दी की चूडी या फिर एक जूटा. ये महस भेजान चीजे नहीं थी, ये उस बात का अकाट्टे प्रमान ती कि ये मस्दूर उस्पूल पर मोझुद थे उनो ने वहां पसीना भाहाया और वही उनकी जान भी गई. और अब पाच्वा हिस्चा अदालत की लडाए, सच को साभित करने की ये लडाए नदी के किनारों से निकल कर कोट्रूम तक पहुचती है, लेके न दालतों के जर ये नियाए पाने का ये रास्ता बहुत लंबार पीडा डायक है. नन्द वकील देव की नन्दन चोभे के साथ मिलकर के स्वाएल तो कर देता है, पर बदले में मिलती है सर्फ अंत रहीं तारीके, गाया बोते दस्तावेज और नाकर शाही की बारी थ्खागवद, नयाई की गती यहां आकर मानो एक दम रेंग ने प्छाए. अदालत के अंदर विचार द्हराओं की एक जबर दस्त जंग देखने को मिलती है. एक तरफ है क्रप्रेत वकील बटुकनात, जो बड़ी ही चालाकी से तर्क देता है, कि जूताया चूडी जैसी चीजे महेंस जस्बाती एहम्यत रकती हैं. इनकी कोई कानुनी हैस्यत नहीं है. और दूसरी तरफ है नंद, जो आडा हूए है, कि जब कागजों से किसी इनसान कर नामी ही गाएप कर दिया गया हो, तो यह बहुतिक चीजे ही उस इनसान के वुजुत का, आखरी और सबसे पुखता सबूथ हैं. कानूनी डाओ पेंच देक कर और इस दरसे के कही अडालत से भी उसके सच्छे दस्तवेज गायब नहोजाए, नन्देख बहुत फीप्रतीकात्मक कदम उठाटा है. वो चुप्चाः अपने बनाए गय उस आस्सली लेजर की कोप्या नदी के किनारे मिट्टी में दबादेटा है. ये इस बात का एक बहुत बडादा प्रतीक है, कि उसका बहरोसा इस खोखली कानूनी विवस्ता से कही जआदा इस दर्ती और प्रक्रिती पर है. यह पूरी गटना इस आख्यान के सबसे बड़े और मूल संदेश को सामने लाती है. म्रित्यो औही दिन नहीं होए तची जखन देहे रुकेत अची. म्रित्यो उही दिन होईत अची जखन नाम हटेद अची यानी सच्छी मुद उस दिन नहीं होती जब शरीर की सांसे रुक जाती है आस्ली मुद उस दिन होती है जब किसी अनसान का नाम स्म्रित्यो से जानबुचकर मिता दिया जाता है इस पूरी चर्चा से गुजरने के बाद ये कहानी हमें जवाब देही के एक बहुत ही गेरे और जगजोर देने वाले सवाल के साथ चोर जाती है. ज़रा विचार करें. जब बडी बडी आदिकारिक संस्ताएं, अदियादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादादा