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महुआ_घटवारिन_के_आत्मसम्मान_की_अमर_गाथा.m4a

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Collection
Part 9 · VIDEHA MITHILA MAITHILI DISCUSSION CRITICISM SERIES PART 9
Status
asr-draft
Human verified
No
Editorial review
not-reviewed
ASR model
small
Detected language
hi (0.988179)
Duration
1:36
Source
Open preserved recording

Timestamped machine output

  1. 0:00–0:04ये है महुवा गट्वारन की आमर गाता परिक्ट्वरिट साराव्ष
  2. 0:04–0:09परमाण नदी के तट्पर रची गय ये एक भेहद दडडनाक अटिहासिक लोग कता है
  3. 0:10–0:16सूनिये ये एक बेबस लेकिन कमाल के आत्मसमानी लगकी के प्यार और साहस की कहानी है
  4. 0:16–0:22और यही बजा है कि ये आज भी मित्ला के सावन भादों की गीतो में पुरी तरह जिन्दा है
  5. 0:22–0:28पहला चलिये कहानी के प्रिष्ट भूमी और उस खफनाग दूखे को समचते है
  6. 0:28–0:33महूवा के पिता शराभी थे और यार उसकी स्वार्ती सोटेली माने चन्द पैसों के लिये
  7. 0:33–0:35अग व्यापारी के हाथो उसका सवदा कर दिया
  8. 0:35–0:37उसे सावन भादों की तूफानी रात में
  9. 0:37–0:39नाउपार कराने के बहाने बेज दिया गया
  10. 0:40–0:41अब आप आप ही ज़र ज़र सोचीए
  11. 0:41–0:44जब आपके अपने ही रक्षक अपके भक्षक बन जाएं
  12. 0:44–0:45तो आप क्या करेंगे?
  13. 0:45–0:48तुस्रा प्रब बवावा का वो अदम्या साहस
  14. 0:48–0:54नाव पर जब सिपाही आचानक पत्वार चीन लेता हैं तब जाके बवावा को इस दूखे का अजास अता है
  15. 0:54–1:02लेकिन वो जुक्ती नहीं, आपने सतीट्व और मोरंग मे रहने वाले प्रेमी की याद में वो उफनती नदी में कुछ जाती है.
  16. 1:02–1:08उसने अईन्सानो की क्रूर्ता के आगे जुक्ने से बहतर प्रक्रूती के क्रोथ को गले लगाना समजा अंत में.
  17. 1:08–1:11इस कहानी का दुखध लेकिन आमर अंध.
  18. 1:11–1:15महुवा को नदी में कुट्ता देक व्यापारी का वो चोटा सिपाही,
  19. 1:15–1:17चो असल में उस से गुप्त प्रेम करता था,
  20. 1:17–1:19उसे बचाने चलांग लगा देता है.
  21. 1:19–1:22तोनो उस उफन्ती दहरा में दूब जाते है.
  22. 1:22–1:28लेकिन महुवा मिठिला की स्ट्रियो के लिए, साहस और भलिदान का एक अमर प्रतीग बन जाती है.
  23. 1:28–1:36महुवा गध्वारिन की एक अहनी हमें सिखाती है, कि सच्चा आत्मस अमान और प्रेम किसी भी दोखे या कीमथ से कही उपर होता है.

Plain text

ये है महुवा गट्वारन की आमर गाता परिक्ट्वरिट साराव्ष परमाण नदी के तट्पर रची गय ये एक भेहद दडडनाक अटिहासिक लोग कता है सूनिये ये एक बेबस लेकिन कमाल के आत्मसमानी लगकी के प्यार और साहस की कहानी है और यही बजा है कि ये आज भी मित्ला के सावन भादों की गीतो में पुरी तरह जिन्दा है पहला चलिये कहानी के प्रिष्ट भूमी और उस खफनाग दूखे को समचते है महूवा के पिता शराभी थे और यार उसकी स्वार्ती सोटेली माने चन्द पैसों के लिये अग व्यापारी के हाथो उसका सवदा कर दिया उसे सावन भादों की तूफानी रात में नाउपार कराने के बहाने बेज दिया गया अब आप आप ही ज़र ज़र सोचीए जब आपके अपने ही रक्षक अपके भक्षक बन जाएं तो आप क्या करेंगे? तुस्रा प्रब बवावा का वो अदम्या साहस नाव पर जब सिपाही आचानक पत्वार चीन लेता हैं तब जाके बवावा को इस दूखे का अजास अता है लेकिन वो जुक्ती नहीं, आपने सतीट्व और मोरंग मे रहने वाले प्रेमी की याद में वो उफनती नदी में कुछ जाती है. उसने अईन्सानो की क्रूर्ता के आगे जुक्ने से बहतर प्रक्रूती के क्रोथ को गले लगाना समजा अंत में. इस कहानी का दुखध लेकिन आमर अंध. महुवा को नदी में कुट्ता देक व्यापारी का वो चोटा सिपाही, चो असल में उस से गुप्त प्रेम करता था, उसे बचाने चलांग लगा देता है. तोनो उस उफन्ती दहरा में दूब जाते है. लेकिन महुवा मिठिला की स्ट्रियो के लिए, साहस और भलिदान का एक अमर प्रतीग बन जाती है. महुवा गध्वारिन की एक अहनी हमें सिखाती है, कि सच्चा आत्मस अमान और प्रेम किसी भी दोखे या कीमथ से कही उपर होता है.

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