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बगिया_का_पेड़__लोककथा.mp4

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Part 9 · VIDEHA MITHILA MAITHILI DISCUSSION CRITICISM SERIES PART 9
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  1. 0:00–0:06नमस्ते! आजके इस दिल्चस्प विष्लेशन में हम सीदे एक आसी जादूई दुन्या में गोता लगाने वाले है,
  2. 0:06–0:10जाहा एक बेहदी मश्हुर मैठिली लोग कता हमारा एंतदाजार कर रही है.
  3. 0:10–0:16गजजद्र ताकुरजी दूरा समपादित विदे हम पत्रिका से लीगए इस कहानी कानाम है बगियाख गाच
  4. 0:16–0:24सच मानिये एक चतूर बच्चे, एक जादूई पेड और एक खोफनाक डायन की एक कहानी आपको बिल्ल्कुल बान्द की रग देगी
  5. 0:24–0:26जल ये, शुरू करते हैं
  6. 0:26–0:30तो जर ज़ा शुची, या होगा अगर एक मासुम, लग़ खेलते बच्चे
  7. 0:30–0:35और उसके जादूई पेड़ पर किसी अजी चालाक आदमखोर डायन की नजर पड़जाए
  8. 0:35–0:37जिसके इरादे बेहत खदरनाख हो.
  9. 0:37–0:44यही से कहानी में वो जबरद़ सस्पैंष शुरू हूता है, जो हमें सोचने पर मजबूर कर देता है, कि अखिर आगे क्या होने वाला है.
  10. 0:44–0:48तो चली, कहानी का पहला हिसा दिकते हैं. एक अधबूद बगीया का पेड.
  11. 0:48–0:53उदिया का पीड, श्रवात होती है एक बहुत्ही सादारन, लेकिन प्यारे से परिवार से,
  12. 0:54–0:57एक गरीब विद्वा मा थी, और उसका एक लोटा बेटा,
  13. 0:58–1:01बेटा था तो चोटा, लेकिन बहुत्ही चुस्त और तेज दिमाग वाला,
  14. 1:01–1:05गरीबी के बावजुद दोनो के भीच प्यार अपार था
  15. 1:05–1:10एक दिन माने उसे खाने किलिए एक बहुत फीज्ट पारमपर एक मिठाई दी
  16. 1:10–1:12जिसे हम बगीया कैते हैं
  17. 1:12–1:15लेकिन उस बच्छे को वो मिठाई इतनी पसंदाई
  18. 1:15–1:19अपने उसे खाने के बजाए सीडा अपने बगीचे में बोने का फैसला कर लिया
  19. 1:19–1:20है ना मजदार?
  20. 1:21–1:25और अब यहां जाएदू देखे, बिना ये जाने की क्या चमतकार होने वाला है
  21. 1:25–1:27बच्छे ने वो बगीः बोदी
  22. 1:27–1:31और कुछी दिनो में, सच में, वहां एक अदबूत जादूई पेड हो गाया.
  23. 1:32–1:36एक आँसा बगीया का पेड, जो शायती किसीने कभी देखा या सूना हो.
  24. 1:36–1:39उस पेड पर देरों स्वादिष्ट बगीया फलने लगीं.
  25. 1:39–1:42बच्चा भी रोज खुशी खुशी पेडपर च़द था
  26. 1:42–1:45और मजे से आपनी मन पसन्बगीया तोड़क खाथा
  27. 1:45–1:47सब कुछ भिलकुल बड़या चल रहा था
  28. 1:47–1:49समें बडी शान्ती से भीत रहा था
  29. 1:49–1:53माबेटे दोनो बड़े प्यार से उस जादूई पेड की देख भास करते
  30. 1:53–1:58उसे पानी देते, आस्पास की सफाई करते, पेड भी खुब फलता पूलता गया.
  31. 1:58–2:00वो उनका एक छोटासा खुशाल सन्सार ता.
  32. 2:00–2:05और वो दोनो अपने उपर आने वाले किसी भी खत्रे से पूरी तरा अजान ते.
  33. 2:05–2:12अर यही से शुरूव हुत्ती है, हमारी कहानी की दूसरी कडी, डायन की खतरनाग चाल.
  34. 2:12–2:16हुँ आ यूं के एक दिन उस रास्ते से एक बुडिया गुजर रही थी.
  35. 2:16–2:20लेकिन जरा थेर्ये. वो कोई आम बुडिया नहीं ती.
  36. 2:20–2:23वो असल में एक आदम खोर डायन �the.
  37. 2:23–2:29उसे अईन्सानी मास काना बहुत पसन ता, जिसे वो अपनी भाशा में मस्वाई कहती ती.
  38. 2:30–2:34जैसे ही उसकी नजर पेड़ पबटे उस गोल मतोल सूस्त बच्छे पर पडी,
  39. 2:35–2:37उसकी आखो में लालच चमक उठा.
  40. 2:37–2:45उस्ने तुर्डंत अपने खुराफाती दिमाग में एक खोफनाक साजिश रच्डाली के कैसे इस बच्च्छे को अपने गर लेजागर पकाया जाए.
  41. 2:45–2:51अपनी चाला की दिखाते हुए उस्ने बढ़ी ही याच्ना बरी और मीठी अवाज मे बच्चे से कहा,
  42. 2:51–2:55बाग, एक बगिया मुजे नहीं दोगे, मुझे बहुत बुग लगी है.
  43. 2:55–2:59सुच्छिये, उसने अपनी दरावनी नियत को, कितनी सफाई से,
  44. 2:59–3:02एक बेबस और बूक्खी बुडया के आवरन में चिपालिया ता,
  45. 3:02–3:05ता कि वो एस मासुम का मनो विग्यानिक शिकार कर सके.
  46. 3:05–3:08बाग तीन बोरे में कैद लगका
  47. 3:08–3:12आप देखे, बच्चा तो बचारा सीडा सादा था
  48. 3:12–3:16उसने बिना किसी शक्के बग्या दायन के हाथ में देनी चाही
  49. 3:16–3:18लेकिन दायन ने तुरन बहाना बनाया
  50. 3:18–3:21की हाथ से लेने पर बग्या अख्यन
  51. 3:21–3:22यानी अशुथ द होडाएगी
  52. 3:22–3:28बच्चेने फिर उसके सिर्पर रखना चाहा, तो दायन बोली कि सिर्पर रखने से वो मतायन हो जाएगी.
  53. 3:28–3:34ये सबसल में उस बच्चे को पेड से नीचे बिलकुल अपने करीब लाने का एक भिच्चाया हूँए जाल था.
  54. 3:34–3:42माना की बच्च्चा बहुत फुष्यार था और उसे अपनी माग की दीवई वो चेतावनी भी याद थी की तगों से हमेशा सावदान रहन रहन चाहीए.
  55. 3:42–3:47उसे कहीन अखही शक भी हो रहा था कि ए बुडिया कुछ चलाकी कर रही है.
  56. 3:47–3:53लेकिन दायन की लगातार मीठी मीठी बातें, विश्वास दिलाने के जुटे वादे,
  57. 3:53–3:59और उसके लगातार बनाए जारहे बहानों अक्विर्कार बच्चे के सतरक मन को चक्मा देही दिया.
  58. 3:59–4:05दायन ने अपनी आखरी चाल चली और कहा की आचल मे लेने से बगीया चोचाईन हो जाएगी
  59. 4:05–4:08इसलिये उसे जुख कर सीदे उसके बो़े मे डाल देना जाएगे
  60. 4:08–4:12और जैसे ही वो बच्चा बो़े मे बगीया डालने के लिए नीचे की और जुका
  61. 4:12–4:16एक इज़्टके में, दायन दे फुर्ती से उसे उसी बोरे में दखेल दिया
  62. 4:16–4:18और बोरे का मुँ कसकर बान दिया
  63. 4:18–4:23बच्चे की सारी चतूराई उस एक पल की असाबदानी में दरी की दरी रेगेगी
  64. 4:23–4:27अब यहां कहानी सबसे बड़े और रोमानचक मोड पर है
  65. 4:27–4:33सवाल यह की यह चतूर बच्चा एक आदम खोर दायन से अकिर कैसे बच्चेगा?
  66. 4:33–4:39उस अंदेरे और गुटन बहरे बोरे में कैद क्या उसके पास आजाद होने का कोई रास्ता बचा है?
  67. 4:39–4:43यही आता है हमारा चोथा हैस्सा लगकी की चतुराई और समादान.
  68. 4:43–4:51तो होता कुच यूँ है, कि भारी भोरे को लेकर चलती हूँ डायन रास्ते में बुरी तरहा थग जाती है.
  69. 4:51–4:57आराम करने के लिए, वो एक पेड की चाँ में बटती है, और भोरे को अपने पासी रक लेती है.
  70. 4:57–5:01तकान इतनी जीड़ा दी की जल्डी उसे गेरी नींदा गगी
  71. 5:01–5:03और वो जोर जोर से क्धाटे लेने लगी
  72. 5:04–5:07बस यही वो सुनेहरा मोका था
  73. 5:07–5:09जिसका बच्चा एंतजार कर रहा था
  74. 5:09–5:12उस बच्चे ने अपनी हिम्मत बिलकुल नहीं हारी
  75. 5:12–5:15वो बो़े के अंदर नतो गब राया और नहीं रोया
  76. 5:15–5:18उसने बड़े ही शानती से मोखे का फ़दा उठाया
  77. 5:18–5:22और किसी तरह बो़े से बहर निकलने में कामयाब हो गया
  78. 5:22–5:25बहर आते ही उसने चारो तरफ देखा
  79. 5:25–5:27उसकी पेनी नजर आस पास पडी गीली मिट्टी
  80. 5:27–5:57कुछ भानी पट्धरों और नुकिले काटों पर गगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगग�
  81. 5:57–6:04अर ब कहानी का अखरी और सबसे मजदार हिस्चा दायन का ब्रहम और उसकी हार.
  82. 6:04–6:10जब दायन नीन से उठी, तो उसने बोरा उठाया. बोरा अभी भी बारी लग रहा था.
  83. 6:10–6:15दायन ने मन ही मन बहुत खुष होकर सोचा कि उसका शिकार अभी भी अंदर फसा हूँए है.
  84. 6:15–6:19वेरोदाबास बाकई बहुत लेजा पूरने है
  85. 6:19–6:23दायन सोच रही थी कि वो एक रिष्ट पुष्ट बच्छे को लेजा रही है
  86. 6:23–6:29जब की आस्लियत तो ये थी कि वो सर्फ गीली मिट्टी और भारी पट्टरो का बोज्द हो रही थी
  87. 6:29–6:34रास्ते में चलते हुए, बोरे के अंदर रख्खी गीली मिटी से पानी रिसने लगा,
  88. 6:34–6:36और दायन के सिरपे तपकने लगा.
  89. 6:36–6:41अब दायन को लगा, कि अंदर बेटा लगका दरके मारे पेशाप कर रहा है.
  90. 6:41–6:45उसने हस्ते हुए कहा, क्या तुम मेरे स्वर्पे पेशाप कर रहा हूं लगके?
  91. 6:45–6:49कोई बात नहीं, गर पर मैं तुमे पकाखर कहाूंगी.
  92. 6:49–6:54दायन की ये बेवकुफी कहानी में सच में एक गजब का हास्छी पैदा करती है.
  93. 6:54–6:59कुچh der baad boore mein rakhe wo kaate dayan ki peeth par chubne lage.
  94. 6:59–7:01Dayan ne isse bhi galathi samjha.
  95. 7:01–7:06Usse laga ki ladka andar chhat pata raha hai aur usse daant se kaat raha hai.
  96. 7:06–7:09Wo baad baadai bhawaa githu kaat re ho.
  97. 7:09–7:12Ko hi baat nahi, kithni der tak kaat hoge.
  98. 7:12–7:15Wo apne hi brahm mein itni andhi ho chuki thi,
  99. 7:15–7:18ki usse ek baar bhi boora kolkar dekhne ki zehmati hi nahi utha hi.
  100. 7:18–7:23Aur aakhir kaar dayan apni isi khayaali jeet ke nashe mein chur ho kar
  101. 7:23–7:27अब उड़ी बड़ी दावड़ की तईयारी करने को कहा,
  102. 7:27–7:29वो इस बाद से पुरी तरह बेखवर थी,
  103. 7:29–7:32कि उसकी सारी चाला की हार चूकी है,
  104. 7:32–7:35और बोरे के अंदर वो बच्चा नहीं,
  105. 7:35–7:39बलकी उसकी अपनी बेवखुफी का सबूत बनद है.
  106. 7:39–7:43वो बच्च्चा नहीं, बलकी उसकी अपनी बेवखूफी का सबूध बन्द है.
  107. 7:44–7:46तो इस पूरे विष्लेशन से हमें क्या समजाता है?
  108. 7:47–7:49ये सरफ एक जादूई लोग कता है नहीं है?
  109. 7:50–7:52बलकी इस बात का एक बहुती सती कुदारन है,
  110. 7:52–7:56कि दूश्मन चाहे कितना भी ताकत्वर, लालची या दोकेबास क्यों नहों?
  111. 7:57–8:02एक शान्त मन और तेज सुज्बुच से बडी से बडी मुसीबत को भी आसानी से माद दी जा सकती है.
  112. 8:03–8:05उस चतर बच्छे ने भिलकुल यही साभिद किया?
  113. 8:05–8:17जाने से पहले मेरा अप सब से एक विचारोथ तेजक सवाल है, जब भी जीवन में कोई भ्यानक या असमवज्वसी लगने वाली मुस्सीबत आप के सामने आए, तो क्या गब्राहत को खुद परहावी होने दिना जाहीए?
  114. 8:17–8:20या फिर उस बच्चे की तरह पूरी सुजबुच के साथ
  115. 8:20–8:22अपने आस्पास मोझुध सन्सादनो,
  116. 8:22–8:25अपने ही पट्टरों और कांटों को तलाशकर
  117. 8:25–8:27बाहर निकलनेका रास्टा डूनना चाहीए.
  118. 8:27–8:28जर अस सुच्येगा.
  119. 8:28–8:30और इसी सवाल के साथ
  120. 8:30–8:32आजकी ये चर्चा हम यही समाप्त करते हैं

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नमस्ते! आजके इस दिल्चस्प विष्लेशन में हम सीदे एक आसी जादूई दुन्या में गोता लगाने वाले है, जाहा एक बेहदी मश्हुर मैठिली लोग कता हमारा एंतदाजार कर रही है. गजजद्र ताकुरजी दूरा समपादित विदे हम पत्रिका से लीगए इस कहानी कानाम है बगियाख गाच सच मानिये एक चतूर बच्चे, एक जादूई पेड और एक खोफनाक डायन की एक कहानी आपको बिल्ल्कुल बान्द की रग देगी जल ये, शुरू करते हैं तो जर ज़ा शुची, या होगा अगर एक मासुम, लग़ खेलते बच्चे और उसके जादूई पेड़ पर किसी अजी चालाक आदमखोर डायन की नजर पड़जाए जिसके इरादे बेहत खदरनाख हो. यही से कहानी में वो जबरद़ सस्पैंष शुरू हूता है, जो हमें सोचने पर मजबूर कर देता है, कि अखिर आगे क्या होने वाला है. तो चली, कहानी का पहला हिसा दिकते हैं. एक अधबूद बगीया का पेड. उदिया का पीड, श्रवात होती है एक बहुत्ही सादारन, लेकिन प्यारे से परिवार से, एक गरीब विद्वा मा थी, और उसका एक लोटा बेटा, बेटा था तो चोटा, लेकिन बहुत्ही चुस्त और तेज दिमाग वाला, गरीबी के बावजुद दोनो के भीच प्यार अपार था एक दिन माने उसे खाने किलिए एक बहुत फीज्ट पारमपर एक मिठाई दी जिसे हम बगीया कैते हैं लेकिन उस बच्छे को वो मिठाई इतनी पसंदाई अपने उसे खाने के बजाए सीडा अपने बगीचे में बोने का फैसला कर लिया है ना मजदार? और अब यहां जाएदू देखे, बिना ये जाने की क्या चमतकार होने वाला है बच्छे ने वो बगीः बोदी और कुछी दिनो में, सच में, वहां एक अदबूत जादूई पेड हो गाया. एक आँसा बगीया का पेड, जो शायती किसीने कभी देखा या सूना हो. उस पेड पर देरों स्वादिष्ट बगीया फलने लगीं. बच्चा भी रोज खुशी खुशी पेडपर च़द था और मजे से आपनी मन पसन्बगीया तोड़क खाथा सब कुछ भिलकुल बड़या चल रहा था समें बडी शान्ती से भीत रहा था माबेटे दोनो बड़े प्यार से उस जादूई पेड की देख भास करते उसे पानी देते, आस्पास की सफाई करते, पेड भी खुब फलता पूलता गया. वो उनका एक छोटासा खुशाल सन्सार ता. और वो दोनो अपने उपर आने वाले किसी भी खत्रे से पूरी तरा अजान ते. अर यही से शुरूव हुत्ती है, हमारी कहानी की दूसरी कडी, डायन की खतरनाग चाल. हुँ आ यूं के एक दिन उस रास्ते से एक बुडिया गुजर रही थी. लेकिन जरा थेर्ये. वो कोई आम बुडिया नहीं ती. वो असल में एक आदम खोर डायन �the. उसे अईन्सानी मास काना बहुत पसन ता, जिसे वो अपनी भाशा में मस्वाई कहती ती. जैसे ही उसकी नजर पेड़ पबटे उस गोल मतोल सूस्त बच्छे पर पडी, उसकी आखो में लालच चमक उठा. उस्ने तुर्डंत अपने खुराफाती दिमाग में एक खोफनाक साजिश रच्डाली के कैसे इस बच्च्छे को अपने गर लेजागर पकाया जाए. अपनी चाला की दिखाते हुए उस्ने बढ़ी ही याच्ना बरी और मीठी अवाज मे बच्चे से कहा, बाग, एक बगिया मुजे नहीं दोगे, मुझे बहुत बुग लगी है. सुच्छिये, उसने अपनी दरावनी नियत को, कितनी सफाई से, एक बेबस और बूक्खी बुडया के आवरन में चिपालिया ता, ता कि वो एस मासुम का मनो विग्यानिक शिकार कर सके. बाग तीन बोरे में कैद लगका आप देखे, बच्चा तो बचारा सीडा सादा था उसने बिना किसी शक्के बग्या दायन के हाथ में देनी चाही लेकिन दायन ने तुरन बहाना बनाया की हाथ से लेने पर बग्या अख्यन यानी अशुथ द होडाएगी बच्चेने फिर उसके सिर्पर रखना चाहा, तो दायन बोली कि सिर्पर रखने से वो मतायन हो जाएगी. ये सबसल में उस बच्चे को पेड से नीचे बिलकुल अपने करीब लाने का एक भिच्चाया हूँए जाल था. माना की बच्च्चा बहुत फुष्यार था और उसे अपनी माग की दीवई वो चेतावनी भी याद थी की तगों से हमेशा सावदान रहन रहन चाहीए. उसे कहीन अखही शक भी हो रहा था कि ए बुडिया कुछ चलाकी कर रही है. लेकिन दायन की लगातार मीठी मीठी बातें, विश्वास दिलाने के जुटे वादे, और उसके लगातार बनाए जारहे बहानों अक्विर्कार बच्चे के सतरक मन को चक्मा देही दिया. दायन ने अपनी आखरी चाल चली और कहा की आचल मे लेने से बगीया चोचाईन हो जाएगी इसलिये उसे जुख कर सीदे उसके बो़े मे डाल देना जाएगे और जैसे ही वो बच्चा बो़े मे बगीया डालने के लिए नीचे की और जुका एक इज़्टके में, दायन दे फुर्ती से उसे उसी बोरे में दखेल दिया और बोरे का मुँ कसकर बान दिया बच्चे की सारी चतूराई उस एक पल की असाबदानी में दरी की दरी रेगेगी अब यहां कहानी सबसे बड़े और रोमानचक मोड पर है सवाल यह की यह चतूर बच्चा एक आदम खोर दायन से अकिर कैसे बच्चेगा? उस अंदेरे और गुटन बहरे बोरे में कैद क्या उसके पास आजाद होने का कोई रास्ता बचा है? यही आता है हमारा चोथा हैस्सा लगकी की चतुराई और समादान. तो होता कुच यूँ है, कि भारी भोरे को लेकर चलती हूँ डायन रास्ते में बुरी तरहा थग जाती है. आराम करने के लिए, वो एक पेड की चाँ में बटती है, और भोरे को अपने पासी रक लेती है. तकान इतनी जीड़ा दी की जल्डी उसे गेरी नींदा गगी और वो जोर जोर से क्धाटे लेने लगी बस यही वो सुनेहरा मोका था जिसका बच्चा एंतजार कर रहा था उस बच्चे ने अपनी हिम्मत बिलकुल नहीं हारी वो बो़े के अंदर नतो गब राया और नहीं रोया उसने बड़े ही शानती से मोखे का फ़दा उठाया और किसी तरह बो़े से बहर निकलने में कामयाब हो गया बहर आते ही उसने चारो तरफ देखा उसकी पेनी नजर आस पास पडी गीली मिट्टी कुछ भानी पट्धरों और नुकिले काटों पर गगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगग� अर ब कहानी का अखरी और सबसे मजदार हिस्चा दायन का ब्रहम और उसकी हार. जब दायन नीन से उठी, तो उसने बोरा उठाया. बोरा अभी भी बारी लग रहा था. दायन ने मन ही मन बहुत खुष होकर सोचा कि उसका शिकार अभी भी अंदर फसा हूँए है. वेरोदाबास बाकई बहुत लेजा पूरने है दायन सोच रही थी कि वो एक रिष्ट पुष्ट बच्छे को लेजा रही है जब की आस्लियत तो ये थी कि वो सर्फ गीली मिट्टी और भारी पट्टरो का बोज्द हो रही थी रास्ते में चलते हुए, बोरे के अंदर रख्खी गीली मिटी से पानी रिसने लगा, और दायन के सिरपे तपकने लगा. अब दायन को लगा, कि अंदर बेटा लगका दरके मारे पेशाप कर रहा है. उसने हस्ते हुए कहा, क्या तुम मेरे स्वर्पे पेशाप कर रहा हूं लगके? कोई बात नहीं, गर पर मैं तुमे पकाखर कहाूंगी. दायन की ये बेवकुफी कहानी में सच में एक गजब का हास्छी पैदा करती है. कुچh der baad boore mein rakhe wo kaate dayan ki peeth par chubne lage. Dayan ne isse bhi galathi samjha. Usse laga ki ladka andar chhat pata raha hai aur usse daant se kaat raha hai. Wo baad baadai bhawaa githu kaat re ho. Ko hi baat nahi, kithni der tak kaat hoge. Wo apne hi brahm mein itni andhi ho chuki thi, ki usse ek baar bhi boora kolkar dekhne ki zehmati hi nahi utha hi. Aur aakhir kaar dayan apni isi khayaali jeet ke nashe mein chur ho kar अब उड़ी बड़ी दावड़ की तईयारी करने को कहा, वो इस बाद से पुरी तरह बेखवर थी, कि उसकी सारी चाला की हार चूकी है, और बोरे के अंदर वो बच्चा नहीं, बलकी उसकी अपनी बेवखुफी का सबूत बनद है. वो बच्च्चा नहीं, बलकी उसकी अपनी बेवखूफी का सबूध बन्द है. तो इस पूरे विष्लेशन से हमें क्या समजाता है? ये सरफ एक जादूई लोग कता है नहीं है? बलकी इस बात का एक बहुती सती कुदारन है, कि दूश्मन चाहे कितना भी ताकत्वर, लालची या दोकेबास क्यों नहों? एक शान्त मन और तेज सुज्बुच से बडी से बडी मुसीबत को भी आसानी से माद दी जा सकती है. उस चतर बच्छे ने भिलकुल यही साभिद किया? जाने से पहले मेरा अप सब से एक विचारोथ तेजक सवाल है, जब भी जीवन में कोई भ्यानक या असमवज्वसी लगने वाली मुस्सीबत आप के सामने आए, तो क्या गब्राहत को खुद परहावी होने दिना जाहीए? या फिर उस बच्चे की तरह पूरी सुजबुच के साथ अपने आस्पास मोझुध सन्सादनो, अपने ही पट्टरों और कांटों को तलाशकर बाहर निकलनेका रास्टा डूनना चाहीए. जर अस सुच्येगा. और इसी सवाल के साथ आजकी ये चर्चा हम यही समाप्त करते हैं

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