MACHINE ASR ACCESSIBILITY AID
वर्णमाला_शिक्षा__अंकिता (2).mp4
Timestamped machine output
- 0:00–0:07क्या बच्छों को अख्षर सिक्षाने का कोई अईसा तरीका हो सकता है, जो रटने के बजाए उने इक सान्स्क्रतिक सफर पर लेजाए?
- 0:07–0:13आजकी इस खाज चर्चमे हम गजेंदर ताकूंजी किताब वरन माला शिक्षा अं कितापर बाद करने वाले है.
- 0:13–0:19ये कोई आम किताब नहीं है, इस में बच्छों को रटा रटा कर कोग हो गो नहीं सिखाया जाता,
- 0:19–0:24बलकी अख्षर कहुट बकुट एक बहुत फुबसुरत कहानी का हिस्चा बन जाते हैं.
- 0:24–0:26चल ये सीधे कहानी में चलते हैं.
- 0:26–0:56तो बज़ानी बद्बाद्टी बाजी तो बज़ादा था वो प्रजादा था था वो बजादा था वो बजादा था था वो बजादा था था वो बजादा था वो बजादा था था वो बजादा था था वो बजादा था था वो बजादा था था था था था था था था था था थ
- 0:56–0:59यहां क्या कर रही हो? जल्दी से चलो?
- 0:59–1:00यह सब एक लाईन नहीं है?
- 1:00–1:02बलकी यह वो पुकार है,
- 1:02–1:05जो इस शाम की सेर को एक गती देती है.
- 1:05–1:07बस यही से याट्रा शुरू हो जाती है.
- 1:07–1:10और जैसे जैसे अंकिपा आगे बड़ती है,
- 1:10–1:14अप शोच्छीए आम तोर पर हम अख्शर कैसे सीकते है,
- 1:14–1:16एक सीधी लिस्ट की तरा है ना,
- 1:16–1:18लेकिन यह तरीका बिल्कुल अलग है,
- 1:18–1:20पूरी सीकने की प्रक्रिया को,
- 1:20–1:24मेठिली परीद्रिष्ष के बहुगोलिक नक्षे पर उतार दिया गया,
- 1:24–1:27मैत्हली परीद्रिष्च्छ के बहुगोलिक नक्षे पर उतार दिया गया है
- 1:27–1:31यानी यात्रा शुरू होती है, अंगेट्फी मोड यानी चौराहे से
- 1:31–1:35फिर खेप्तों से होकर गुजरती है, और आखर में गाँए के चोपाल
- 1:35–1:38जिसे चोपर कहते हैं, वहां तक वहचती है.
- 1:38–1:42राँ बाव पर नई अक्षर उस जगा के प्रक्रेते क महाल से जुडे होते हैं.
- 1:42–1:46और ये किताब एक बहुत ही शान्दार संटूलन बनाती है.
- 1:46–1:49एक तरफ जटिल आमुर्त पर्यावरनिये कला है,
- 1:49–1:52तो तुस्री तरफ चार पनल वाले क्रामेंचित्र.
- 1:52–1:56ये कोंबिनेशन यसा है, जो किसी भी बच्छे का द्यान पूरी तरह बाश्डले.
- 1:56–1:59जब अंकिता अपनी यात्रा के पहले पडाव पर होती है,
- 1:59–2:02तो इनहीं मन्मोहक द्रिष्षो के जर्ये अवर्ग,
- 2:02–2:06यानी स्वरों के पहले समूजे हमारा परिच्चेए कर आजाता है.
- 2:06–2:11रास्ते में चलते-चलते अंकिता जाडियो में लगी एक आग देखती है.
- 2:11–2:13यहां गवर करने वाली बात यहे है,
- 2:13–2:17के बच्छों को कितनी सम्रुद्द्ध और सतीक शब्दावली सिखाई जाडिये है.
- 2:17–2:20पिता बताते है कि ये अगन वान है,
- 2:20–2:24ज़ार्यों को खब गदम करने किलिये लगाई अग
- 2:24–2:27और जार्यां जली नहीं हैं उने अखखछ कहते हैं
- 2:27–2:30ये कोई दिक्षनरी से रखने वाले शब्द नहीं है
- 2:30–2:34बलकि अंग्ता के तीक सामने गध रही गधना का एक दम जीवन थिससा हैं
- 2:34–2:39च्टाब के हर अथ्ट्टाय के अंट्ट में एक प्रश्नोटर क्हन्ट है, जो बच्टो की याद्टाश्ट को परखता है.
- 2:40–2:47तो अभी हम ने दिखा, की जाडियो को जलाने के लिए लगाई आग के लिए, किस सतीक मेठली शब्ट का इस्टमाल किया जाडिया था.
- 2:47–2:49अग नहीं के लिए लगाई गई आग के लिए
- 2:49–2:52किस सतीक मेठिली शब्द का इस्तमाल की आग गया था
- 2:52–2:54ज़रा याद करने की कोशिष की जिए
- 2:54–2:56और सही जबाब है
- 2:56–2:57अगन्वान
- 2:57–2:59अब दिक हिस तरग का कतात्मक ज़ाव
- 2:59–3:01किसी नहीं शब्द को याद रखने में
- 3:01–3:03अगानी तोड़ा अगे बड़ते हैं
- 3:03–3:05चलते चलते अंकिता तख जाती है
- 3:05–3:08और वो एक पेड़ की चाँ में आराम करने लकते हैं
- 3:08–3:10बच्चो की आदत होती है ना
- 3:10–3:12एक जग़े तिककर नहीं बड़ते है
- 3:12–3:14तो अंकिता को भी तोड़ी भेच्झानी होने लकती है
- 3:14–3:44अगर बद्चों की आदद होती हैं अगर दिख़ार नहीं बद्चों की अगर दिख़ार नहीं तो अगर दिख़ार नहीं बद्चों की अगर दिख़ार नहीं तो अगर दिख़ार नहीं तो अगर दिख़ार नहीं तो अगर दिख़ार नहीं तो अगर दिख़ार नहीं तो ग
- 3:44–3:46उगुष्ट्सी से सावदान करते हैं
- 3:46–3:48ये एक विश्यला पोधा है
- 3:48–3:50जिसे चूने से तेजगुजली होने लकती है
- 3:50–3:52मतलब भाशा तो सिखाई ही जारी है
- 3:52–3:54साथी बच्ट्छों को पर्यावरन
- 3:54–3:57और सुरक्षा के विवाहारिक पाध पी मिल रहे हैं
- 3:57–4:00तो चली ए एक बार फिर से इस नहीं ग्यान को परखाजाए.
- 4:01–4:04अभी जिस खुजली पटा करने बादे की बाद हूँई
- 4:04–4:07जिस से पिताने अंकिता को दूर रहने को कहा था,
- 4:07–4:08उसका क्या नाम था?
- 4:08–4:11बलकुल सही उटर है उडकुस्सी.
- 4:11–4:14इस प्रश्नोटर तरीके से हम आसानी से समज सकते है,
- 4:14–4:18कि इस पुस्तक की शिक्षाप रनाली कितनी चतुराई से काम करती है.
- 4:18–4:21यसीकने की पूरी प्रक्रिया को चोटे-चोटे,
- 4:21–4:24आसानी से याद रक्नी योगे हिस्सो में बाडतेती है.
- 4:24–4:29चली आगे बड़ते हैं और देकते हैं कि ये सफर और कैसे दिलचस्प होता हैं
- 4:29–4:32अब आंकिता और उसकी पिता केतो तक पहोथ चुके हैं
- 4:32–4:37केतो में चारो तरव हर्याली हैं और इसी खुबसुरत द्रिष्य के साथ
- 4:37–4:42अहानी कर्वर्ग, यानी कर से शुरू हुने वाली वेंजनो के अद्धाये में प्रवेश कर जाती हैं.
- 4:43–4:47अब इस कर्वर्ग में जो नए शब्दाते है, वे एसे हवामे नहीं गड़े गये हैं.
- 4:47–4:51वेग्रामीड मेठिली क्रिषी जीवन से बहुत गेराई से जुडे है,
- 4:51–4:54जैसे कदेर्मान, जिस का मतलब है,
- 4:54–4:57केतो की रक्वाली के लिए बनाया गया उजा मचान,
- 4:57–5:01और कमर सारी, यानी गाओ का कार काना या लोहार की दुकान.
- 5:01–5:06ये शब्द उस संस्क्रिती की एक दम अस्ली और प्रमाड़ेक तस्सीर पेश करते हैं.
- 5:06–5:10यहां कथा से जुडा एक और प्रश्न सामने आता है.
- 5:10–5:13जब अंकिता ने केतो की तरफ देखा,
- 5:13–5:16तो कतेर मान, यानी मचानो पर बैट कर,
- 5:16–5:18केतो की रक्वाली कोन कर रहा था?
- 5:18–5:24इसका उत्तर है अगर्बा, अगर्बा का अर्थ है खेट की रक्फाली करने वाले.
- 5:24–5:27अगर्बा जैसे शब्द शिफ भाशा का ज्यान देटे,
- 5:27–5:33बलके वे ग्रामेंट संसक्रती और हमारी उन परमपरावो को सन्रक्षिट करने का भी एक अधबुद तरीका है,
- 5:33–5:35जो दिरे-दिरे विलुप्त हो रही हैं.
- 5:36–5:40आब इस यात्रा के अगले पडाव में, वे गाँँ के चोपाल के करी पहुज जाते हैं.
- 5:41–5:46अपना गर पास आरा है, ये जानकर अंकिता की उुजा मानो वापिस लोताती हैं,
- 5:46–5:48और वो खूशी से उचलने लकती हैं.
- 5:48–5:52इस उज्साब हरे महाल कि सात ही, कहानी बोहती सहथता से,
- 5:52–5:56चवर्ग, यानी चव यंजनो के कहड़ में प्रवेश करती है.
- 5:56–6:00इस कहड़ में हम दो बोहती दिल्चप शब्डो की तुलना देक सकते हैं.
- 6:00–6:08पहला शबद है चोपर, जिसका आर्थ है गाँउका चोपाल, जावे पहुट रहे है, और दूस्रा शबद है चिकन, पिता उसे चिकन भार्ट,
- 6:08–6:15यानी चिकने रास्ते पर तेजी से चलने को कहते है, और यही चिकना रास्ता उने सीदे गाउके दिर तक लेजाता है.
- 6:15–6:21अब चान्दनी रात का समय हो चला है, रास्टे मैं अंकिता को एक अईक अईक अईक्टा दिकता है,
- 6:21–6:24जिसकी सुगंद और सुन्दरता से वो खृषी से चीख हुटती है.
- 6:24–6:29क्या याद है? वो कुन्सा पेड था? जिसने चान्दनी में उसका मन मोलिया था?
- 6:29–6:34उत्तर है, चंपा का पेड या मेठली में कहें तो चंपा गाच.
- 6:34–6:38यहां सबसे दिलचस बात ये है की कहानी काम कैसे करती है.
- 6:38–6:43यह केवल एक द्रिष्च नहीं है, बलकी सुगन्द जैसी समवेदी अनबुतियो का उप्योख करके,
- 6:43–6:48यूवा पात्खो के दिमाग में एक नैं अक्षर को गेराए सिस्थापित कर देती है.
- 6:48–6:52बच्चन न केवल दिखता है, बलकी महसुस भी करता है.
- 6:52–6:56आखिर कार वे अपनी यात्रा के अंतिम पडावबपर पहुचते हैं
- 6:56–6:58और अपने महले में प्रवेश करते हैं.
- 6:58–7:02गाँ के इस हसे को मेठली में तोल कहा जाता है
- 7:02–7:08और तोल शब्द के साथी हम तर वरग के विंजनो की दून्या में कदम रग देते हैं
- 7:08–7:12मूलने में पहवचते ही अंकिता को किसी की आवाश सूनाए देती है
- 7:12–7:17इसके लिए जो शब्द अस्तमाल हूए वो है टाके मारब जिसका अर्थ है
- 7:17–7:19जोर से आवास देना या पुकारना
- 7:19–7:23तो सब से एहंबात ये है कि इस यात्रा का हरे खडम,
- 7:23–7:27हरे ध्च्छ यहां तक की मोहले में गूंजने वाली एक आवास भी
- 7:27–7:32बाशा को रटाने के बजाए उसे पर्यावरन के साथ महजूस कराने काम करती है.
- 7:32–7:37इस पूरी यात्रा में हमने देखा की कैसे एक पिता और पुत्री के साथ चलतेवे,
- 7:37–7:40नजाने कितने ही नहीं शब्द और अखषर सीखे गय.
- 7:40–7:43तो अद्मे एक सवाल जो हमें सोचने पर मजबोर करता है,
- 7:43–7:48किसी संसक्रिती को एक कहानी और उसके प्राक्रितिक परवेश के जीना,
- 7:48–7:51महस बलाक बोट पर लिखे अख्षरो को रतने की तुलना में,
- 7:51–7:54कही अदिक गेरा और स्थाई प्रभाव नहीं चोलता?
- 7:54–8:00इस तरासे अपनी स्वदेशी भाशा को बचाए रकना और सिखाना वास्तम में बहुत शक्तीशाली तरीका है.
- 8:00–8:02इस पर ज़ुर विचार कीजेगेगा.
- 8:02–8:05आजकी इस चच्च्चा में शामिल होने किले बहुत भहुत द्धिन्वार.
Plain text
क्या बच्छों को अख्षर सिक्षाने का कोई अईसा तरीका हो सकता है, जो रटने के बजाए उने इक सान्स्क्रतिक सफर पर लेजाए? आजकी इस खाज चर्चमे हम गजेंदर ताकूंजी किताब वरन माला शिक्षा अं कितापर बाद करने वाले है. ये कोई आम किताब नहीं है, इस में बच्छों को रटा रटा कर कोग हो गो नहीं सिखाया जाता, बलकी अख्षर कहुट बकुट एक बहुत फुबसुरत कहानी का हिस्चा बन जाते हैं. चल ये सीधे कहानी में चलते हैं. तो बज़ानी बद्बाद्टी बाजी तो बज़ादा था वो प्रजादा था था वो बजादा था वो बजादा था था वो बजादा था था वो बजादा था वो बजादा था था वो बजादा था था वो बजादा था था वो बजादा था था था था था था था था था था थ यहां क्या कर रही हो? जल्दी से चलो? यह सब एक लाईन नहीं है? बलकी यह वो पुकार है, जो इस शाम की सेर को एक गती देती है. बस यही से याट्रा शुरू हो जाती है. और जैसे जैसे अंकिपा आगे बड़ती है, अप शोच्छीए आम तोर पर हम अख्शर कैसे सीकते है, एक सीधी लिस्ट की तरा है ना, लेकिन यह तरीका बिल्कुल अलग है, पूरी सीकने की प्रक्रिया को, मेठिली परीद्रिष्ष के बहुगोलिक नक्षे पर उतार दिया गया, मैत्हली परीद्रिष्च्छ के बहुगोलिक नक्षे पर उतार दिया गया है यानी यात्रा शुरू होती है, अंगेट्फी मोड यानी चौराहे से फिर खेप्तों से होकर गुजरती है, और आखर में गाँए के चोपाल जिसे चोपर कहते हैं, वहां तक वहचती है. राँ बाव पर नई अक्षर उस जगा के प्रक्रेते क महाल से जुडे होते हैं. और ये किताब एक बहुत ही शान्दार संटूलन बनाती है. एक तरफ जटिल आमुर्त पर्यावरनिये कला है, तो तुस्री तरफ चार पनल वाले क्रामेंचित्र. ये कोंबिनेशन यसा है, जो किसी भी बच्छे का द्यान पूरी तरह बाश्डले. जब अंकिता अपनी यात्रा के पहले पडाव पर होती है, तो इनहीं मन्मोहक द्रिष्षो के जर्ये अवर्ग, यानी स्वरों के पहले समूजे हमारा परिच्चेए कर आजाता है. रास्ते में चलते-चलते अंकिता जाडियो में लगी एक आग देखती है. यहां गवर करने वाली बात यहे है, के बच्छों को कितनी सम्रुद्द्ध और सतीक शब्दावली सिखाई जाडिये है. पिता बताते है कि ये अगन वान है, ज़ार्यों को खब गदम करने किलिये लगाई अग और जार्यां जली नहीं हैं उने अखखछ कहते हैं ये कोई दिक्षनरी से रखने वाले शब्द नहीं है बलकि अंग्ता के तीक सामने गध रही गधना का एक दम जीवन थिससा हैं च्टाब के हर अथ्ट्टाय के अंट्ट में एक प्रश्नोटर क्हन्ट है, जो बच्टो की याद्टाश्ट को परखता है. तो अभी हम ने दिखा, की जाडियो को जलाने के लिए लगाई आग के लिए, किस सतीक मेठली शब्ट का इस्टमाल किया जाडिया था. अग नहीं के लिए लगाई गई आग के लिए किस सतीक मेठिली शब्द का इस्तमाल की आग गया था ज़रा याद करने की कोशिष की जिए और सही जबाब है अगन्वान अब दिक हिस तरग का कतात्मक ज़ाव किसी नहीं शब्द को याद रखने में अगानी तोड़ा अगे बड़ते हैं चलते चलते अंकिता तख जाती है और वो एक पेड़ की चाँ में आराम करने लकते हैं बच्चो की आदत होती है ना एक जग़े तिककर नहीं बड़ते है तो अंकिता को भी तोड़ी भेच्झानी होने लकती है अगर बद्चों की आदद होती हैं अगर दिख़ार नहीं बद्चों की अगर दिख़ार नहीं तो अगर दिख़ार नहीं बद्चों की अगर दिख़ार नहीं तो अगर दिख़ार नहीं तो अगर दिख़ार नहीं तो अगर दिख़ार नहीं तो अगर दिख़ार नहीं तो ग उगुष्ट्सी से सावदान करते हैं ये एक विश्यला पोधा है जिसे चूने से तेजगुजली होने लकती है मतलब भाशा तो सिखाई ही जारी है साथी बच्ट्छों को पर्यावरन और सुरक्षा के विवाहारिक पाध पी मिल रहे हैं तो चली ए एक बार फिर से इस नहीं ग्यान को परखाजाए. अभी जिस खुजली पटा करने बादे की बाद हूँई जिस से पिताने अंकिता को दूर रहने को कहा था, उसका क्या नाम था? बलकुल सही उटर है उडकुस्सी. इस प्रश्नोटर तरीके से हम आसानी से समज सकते है, कि इस पुस्तक की शिक्षाप रनाली कितनी चतुराई से काम करती है. यसीकने की पूरी प्रक्रिया को चोटे-चोटे, आसानी से याद रक्नी योगे हिस्सो में बाडतेती है. चली आगे बड़ते हैं और देकते हैं कि ये सफर और कैसे दिलचस्प होता हैं अब आंकिता और उसकी पिता केतो तक पहोथ चुके हैं केतो में चारो तरव हर्याली हैं और इसी खुबसुरत द्रिष्य के साथ अहानी कर्वर्ग, यानी कर से शुरू हुने वाली वेंजनो के अद्धाये में प्रवेश कर जाती हैं. अब इस कर्वर्ग में जो नए शब्दाते है, वे एसे हवामे नहीं गड़े गये हैं. वेग्रामीड मेठिली क्रिषी जीवन से बहुत गेराई से जुडे है, जैसे कदेर्मान, जिस का मतलब है, केतो की रक्वाली के लिए बनाया गया उजा मचान, और कमर सारी, यानी गाओ का कार काना या लोहार की दुकान. ये शब्द उस संस्क्रिती की एक दम अस्ली और प्रमाड़ेक तस्सीर पेश करते हैं. यहां कथा से जुडा एक और प्रश्न सामने आता है. जब अंकिता ने केतो की तरफ देखा, तो कतेर मान, यानी मचानो पर बैट कर, केतो की रक्वाली कोन कर रहा था? इसका उत्तर है अगर्बा, अगर्बा का अर्थ है खेट की रक्फाली करने वाले. अगर्बा जैसे शब्द शिफ भाशा का ज्यान देटे, बलके वे ग्रामेंट संसक्रती और हमारी उन परमपरावो को सन्रक्षिट करने का भी एक अधबुद तरीका है, जो दिरे-दिरे विलुप्त हो रही हैं. आब इस यात्रा के अगले पडाव में, वे गाँँ के चोपाल के करी पहुज जाते हैं. अपना गर पास आरा है, ये जानकर अंकिता की उुजा मानो वापिस लोताती हैं, और वो खूशी से उचलने लकती हैं. इस उज्साब हरे महाल कि सात ही, कहानी बोहती सहथता से, चवर्ग, यानी चव यंजनो के कहड़ में प्रवेश करती है. इस कहड़ में हम दो बोहती दिल्चप शब्डो की तुलना देक सकते हैं. पहला शबद है चोपर, जिसका आर्थ है गाँउका चोपाल, जावे पहुट रहे है, और दूस्रा शबद है चिकन, पिता उसे चिकन भार्ट, यानी चिकने रास्ते पर तेजी से चलने को कहते है, और यही चिकना रास्ता उने सीदे गाउके दिर तक लेजाता है. अब चान्दनी रात का समय हो चला है, रास्टे मैं अंकिता को एक अईक अईक अईक्टा दिकता है, जिसकी सुगंद और सुन्दरता से वो खृषी से चीख हुटती है. क्या याद है? वो कुन्सा पेड था? जिसने चान्दनी में उसका मन मोलिया था? उत्तर है, चंपा का पेड या मेठली में कहें तो चंपा गाच. यहां सबसे दिलचस बात ये है की कहानी काम कैसे करती है. यह केवल एक द्रिष्च नहीं है, बलकी सुगन्द जैसी समवेदी अनबुतियो का उप्योख करके, यूवा पात्खो के दिमाग में एक नैं अक्षर को गेराए सिस्थापित कर देती है. बच्चन न केवल दिखता है, बलकी महसुस भी करता है. आखिर कार वे अपनी यात्रा के अंतिम पडावबपर पहुचते हैं और अपने महले में प्रवेश करते हैं. गाँ के इस हसे को मेठली में तोल कहा जाता है और तोल शब्द के साथी हम तर वरग के विंजनो की दून्या में कदम रग देते हैं मूलने में पहवचते ही अंकिता को किसी की आवाश सूनाए देती है इसके लिए जो शब्द अस्तमाल हूए वो है टाके मारब जिसका अर्थ है जोर से आवास देना या पुकारना तो सब से एहंबात ये है कि इस यात्रा का हरे खडम, हरे ध्च्छ यहां तक की मोहले में गूंजने वाली एक आवास भी बाशा को रटाने के बजाए उसे पर्यावरन के साथ महजूस कराने काम करती है. इस पूरी यात्रा में हमने देखा की कैसे एक पिता और पुत्री के साथ चलतेवे, नजाने कितने ही नहीं शब्द और अखषर सीखे गय. तो अद्मे एक सवाल जो हमें सोचने पर मजबोर करता है, किसी संसक्रिती को एक कहानी और उसके प्राक्रितिक परवेश के जीना, महस बलाक बोट पर लिखे अख्षरो को रतने की तुलना में, कही अदिक गेरा और स्थाई प्रभाव नहीं चोलता? इस तरासे अपनी स्वदेशी भाशा को बचाए रकना और सिखाना वास्तम में बहुत शक्तीशाली तरीका है. इस पर ज़ुर विचार कीजेगेगा. आजकी इस चच्च्चा में शामिल होने किले बहुत भहुत द्धिन्वार.