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चौहड़मल_रेशमा_कथा_में_यथार्थ_और_विद्रोह.m4a

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Part 9 · VIDEHA MITHILA MAITHILI DISCUSSION CRITICISM SERIES PART 9
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  1. 0:00–0:07इस समिक्षा में आपका स्वागत है, जाहां हम मुकामा गाड्ट की मारमिक लोक प्रेम कता चूहर्मल आरेश्मा पर बाद कर रहे हैं.
  2. 0:07–0:11कहानी का यतारत वाद तब पुरी तरह से तूट जाता है
  3. 0:11–0:15जब सात्वे अद्ध्याय में अचानक से जादूई तब सामने आजाते हैं
  4. 0:15–0:17आई एक दम सही कहा आपने
  5. 0:17–0:20मतलप शुरूवात में जु पसीना है
  6. 0:20–0:22जो कुष्टी क्या क्षाडे की दूल है
  7. 0:22–0:26और जातिगत आहिंकार है, वो सब बहुत अस्ली लकता है
  8. 0:26–0:28बहुत ही जमीनी संगर्ष है
  9. 0:28–0:32बिलकुल, पर कमजोरी यह है कि जब अद्ध्याय सात में
  10. 0:32–0:34रेश्मा की सक्फी राम सक्फी
  11. 0:34–0:38उसे महल से निकालने किलिए सच्मुच उसे गाएप कर देती है
  12. 0:38–0:41तो ये यादार्त वादी तो नको खतम कर देता है
  13. 0:41–0:43मलग दम हवा में अद्रुष्ष कर देती है नहां
  14. 0:43–0:43हा?
  15. 0:43–0:45और ये परते लगता है
  16. 0:45–0:45कि आर
  17. 0:45–0:48हम कोई फैंटिस योपन नयास पड रहे हैं क्या?
  18. 0:48–0:49सही खेरी आप
  19. 0:49–0:54पाटख के तोर पे लगता है कि अगर जादू से ही सब हुना ता तो इतना खून खराबा कि हूँँँँँँँँ
  20. 0:54–1:01वही तो जब संगश इतना गेहरा और सामाजिक हो, तो जादू से बचने पर पुरा दावियाल्का पडजाता है.
  21. 1:01–1:07चूहर मल ने इतनी यातना है क्यो सही अगर एक जादूई तरकीब से सब सूलट सकता था
  22. 1:07–1:09तो इसके लिए हम क्या कर सकते हैं?
  23. 1:09–1:12मडलब लोग कता में तो ये सब होता है
  24. 1:12–1:13हा अठ होता है
  25. 1:13–1:18तो मेरा सुजाव ये है कि इस जादूखो शाबदे करत में लेने के बजाए
  26. 1:18–1:20दमनकारी सन्रष्नाउके भीच महिलाउकी
  27. 1:21–1:23गेरी एक जुट्ता और चत्राई के रूप में
  28. 1:23–1:25फिर से तग्यार की आजाना चाहीए.
  29. 1:25–1:25अच्छ!
  30. 1:25–1:28मतलब, सच्का जादू नी बलकी एक तरकी दिमागी चाल.
  31. 1:29–1:30एक दम सही.
  32. 1:30–1:34जिसे कहानी की यतार्थवादी नीव भी बची रहें और तोन भी ना बिगडें.
  33. 1:34–1:37ये दिलचस्प है. इसके कुछ ठोस उदारन कैसे हो सकते है?
  34. 1:37–1:42उदारन के लिए आप दिखा सकते है के राम सकी सच्छ्मुच अद्रष्ष्षे करने के बजाए,
  35. 1:42–1:45महल के पहरे दारो का दान बदकाने के लिए,
  36. 1:45–1:48कोई बहुत ही चतृर मनोवे गयानेक योजना बनाती है.
  37. 1:48–1:51जैसे कोई अफवा फला दिनाया कुछ हैसा.
  38. 1:51–1:54हाँ, या फिर वे रात के गने को़े का फ़ाइदा उठाती हैं.
  39. 1:54–2:24तो उज़े प्रद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद ब
  40. 2:24–2:54तो आप आप आप बज़ाँ बवाग बाग बवाग बवाग बवाग बवाग बवाग बवाग बवाग बवाग बवाग बवाग बवाग बवाग बवाग बवाग बवाग बवाग बवाग बवाग बवाग बवाग बवाग बवाग बवाग बवाग बवाग बवाग बवा
  41. 2:54–2:58बिल्कुल ये कहानी को बहुत सचक्त बनाएगा
  42. 2:58–3:06तो अगर अगर आगे बड़ें तो रेश्मा का अद्मे माण रहना उसके चरित्र के विकास को एक दम अदूरा चोड़ देता है
  43. 3:06–3:09आए ये स्रच्ना की एक अगर बडी कम्जोरी है
  44. 3:09–3:12मदला मा कावे जैसे उस बड़े यूधद के बाद
  45. 3:12–3:14जब कलुवा रेश्मा का अपरहन कर लेता है
  46. 3:14–3:16उं।
  47. 3:16–3:19और चूहर मल की बड़ी दरदनाक मरित्ति हो जाती है
  48. 3:19–3:19हां
  49. 3:19–3:24तो कमजुरी ये है की कताकार बस ये कैकर आगे बड़ जाता है
  50. 3:24–3:27की कहानी रेश्मा के आगे के जीवन पर चुप्प्पी साद लेती है.
  51. 3:27–3:29ये बहुत इख ख़टकने वाली बात है.
  52. 3:29–3:33लेखखने शाएद इसे काव्यात्मक विचार की तरा लिखा है,
  53. 3:33–3:36की दुख इतना गेरा है कि शबद नहीं बचे.
  54. 3:36–3:39पर रेश्मा कोई साद्धरन्या निशक्रिय नाइका तो है नहीं
  55. 3:39–3:40एक दम नहीं
  56. 3:40–3:43वो बहत फी शक्करिय चरित्र है
  57. 3:43–3:46उसी ने तो खुड आगे बडगगर प्रेम का प्रस्ताव रख्खा था
  58. 3:46–3:46आप
  59. 3:46–3:48और समाजिक भेटियों को भी तोडा
  60. 3:48–3:49और याद है
  61. 3:49–3:53कैसे उसने अपने पिता को आत्म हद्या की दम्की देकर,
  62. 3:53–3:55पूरी हत्यार बन् सेना को रोग दिया था?
  63. 3:55–3:56बलकुल.
  64. 3:56–4:00तो आसे बेहद निदर चरित्र की आवाज और द्रिष्टिकों को,
  65. 4:00–4:02आचानाक पूरी तरा से हदा देना,
  66. 4:02–4:05ये सच में उसकी सुतन्त्र इच्चा के सात नियाई नहीं करता.
  67. 4:05–4:07एक दम नियाई नहीं करता.
  68. 4:07–4:10आजा लकता है, जैसे इतनी दम्दार नाई का,
  69. 4:10–4:13अंत में सरफ एक अपहरत वस्तू बनकर रहे गगे है.
  70. 4:13–4:17तो यहां सुदार का सुजाव क्या हूना चाही है?
  71. 4:17–4:21सुजाव यह है कि इस तरात्दी को बरकरार रकते हुए
  72. 4:21–4:25और रेश्मा की स्वतन्त्रता का सम्मान करते हुए
  73. 4:25–4:28अपहरन कि तुरंत बाद उसकी मनोवे ज्यानिक
  74. 4:28–4:31या शारीरे एक स्तिती की एक सन्षिप्त
  75. 4:31–4:33लेकिन मार में जलक प्रदान करें.
  76. 4:33–4:36मतलब उसे बस एक वाख्य में गायब नहीं होने देना है
  77. 4:36–4:38बलकि उसकी अस्तितिटी दिखानी है
  78. 4:38–4:43हा, इसके छो सुदारन के तोर पर आप एक चोटा द्रिष्ये जोड सकते है
  79. 4:43–4:47जहां अपहरन के बाद रेश्मा महल में लोताए गय है
  80. 4:47–4:50अच्छा वो शारिरेक रूप से कैद है?
  81. 4:50–4:54आग खैद है, लेकिन बहावनात्मक रूप से अभी भी अटूट है,
  82. 4:54–4:56वो टूट कर बिखर नहीं गई है.
  83. 4:56–4:59वु रो या गिडगिडा नहीं है?
  84. 4:59–5:02बिलकुल, वो शायद अपनी खिडकी से,
  85. 5:02–5:04उस महुए के पेड की और देख रही है
  86. 5:04–5:07जहाँ चूहर्ड मल के साथ उसकी यादे जूडी है
  87. 5:07–5:09ये बहुती विज्योल है
  88. 5:09–5:11और दूस्रा थो सुदारन ये हो सकता है
  89. 5:11–5:14कि आप इस चूप्ती को उसकी मजबूरी के बजाए
  90. 5:14–5:16उसका हत्यार बना दें
  91. 5:16–5:17औ, मैं समझ रहा हूं
  92. 5:17–5:19मतलव उ उगड ये संकल पलेती है
  93. 5:19–5:20हाँ
  94. 5:20–5:22ये दिखाते हुए कि उसने
  95. 5:22–5:24चूहर मल की म्रुट्तियो के बाद
  96. 5:24–5:28आजीवन अपने परिवार से बात नकरने का संकल पले लिया
  97. 5:28–5:30आपने पिता और भाई से वो कभी कुछ नहीं बोलेगी
  98. 5:30–5:31एक दम सही
  99. 5:31–5:35इसे यह चुप्पी लेक्हक की तरव से चूटा हुए लगेगा
  100. 5:35–5:39बलकी रेश्मा का एक जान्बुचकर उठाया गया विद्रो ही कदम लगेगी
  101. 5:39–5:44आप उसका यह आजीवन माँन उसके पिता आजभी सिंग की एहंकार पर
  102. 5:44–5:48उगर दिन पड़ने वाला एक मान तमाचा बन जाएगा
  103. 5:48–5:50ये बहुत ही स्पश्ट रूप से सामने रखा गया है
  104. 5:50–5:55हाला की मुझे आश्शर्या है कि अगर अम इसे मनद्दिर कीवदंती के दिश्टिकोंट से दिखें
  105. 5:55–5:57तो क्या हम ने इस पर विचार किया है
  106. 5:57–6:02की या चुप्पी उसे एक मिठख में बडलनेगा जान्बुच कर किया गया प्रयास तो नहीं हो सकता है?
  107. 6:02–6:04इं ये एक नजर्या हो सकता है?
  108. 6:04–6:09लेकिन क्या सर्फ चूहर मल के बदिदान पर द्यान किंद्रित करने के जोखिम से
  109. 6:09–6:14अम रेश्मा के विक्तिगत विद्रों को नदर अंदास दो नहीं ग़ाज तो बिलकुल कर रहे हैं
  110. 6:14–6:16अगर अगर अप निस की आवाज चीन लेंगे
  111. 6:16–6:19तो कहानी का आदा विद्रों तो वहीं कब खत्मो जाएगा
  112. 6:19–6:20सरी बाते
  113. 6:20–6:24अर खिन वंती यह और मंदिर की बात निकली है
  114. 6:39–6:43कहानी का अदिकानच हिस्सा केवल गेहरी धुशमनी से बधावा है
  115. 6:43–6:47मडलब कहानी का अंथ, बहुत इखषुरती से ये वरनन करता है
  116. 6:47–6:52कि कैसे आज मुकामा ताल के मंदिर में भूमिहार और दूसाद एक साथ पुजा करते हैं
  117. 6:52–6:58अग, उनका प्रेम जो पहले संगर्ष का कारन ता अब हजारो लोगों को जोडता है.
  118. 6:58–7:05लेकिन कमजुरी ये है कि बहुविष्य के इस मेल मिलाप का कोई भी संकेट उस खुनी संगर्ष के दोरान नहीं दिया गया है.
  119. 7:05–7:11बलकुल, हम बस ग्रना जातिगत एहंकार और हिंसक रक्पात देकते आरहें?
  120. 7:11–7:15आप, तो आचाना गंत में इस शान्ती पूर्ड मेले का वरनन,
  121. 7:15–7:18मुख्य कता से थोडा अलग खलक निषकर्ष जैसा लकता है.
  122. 7:18–7:48अज़ा अज़ा बज़ादा पर बज़ादा पर बज़ादा पर बज़ादा पर बज़ादा पर बज़ादा पर बज़ादा पर बज़ादा पर बज़ादा पर बज़ादा पर बज़ादा पर बज़ादा पर बज़ादा पर बज़ादा पर बज़ादा पर बज़ादा पर �
  123. 7:48–8:18तो बज़ाँँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ ब
  124. 8:18–8:20तो बताता है कि ये सर्फ एक तात्कालिक लडाई नहीं है?
  125. 8:20–8:21बिलकुल.
  126. 8:21–8:26और दूस्रा बहुत फी असर्दार, थोस उदारन यहे है,
  127. 8:26–8:31कहानी की शुरुवात ही, वर्तमान में मुकामा ताल के मेले के वरनन से हो.
  128. 8:31–8:36मतलब हम सीदा अतीत में ना जाकर आजके समय से कहनी शुरू करें
  129. 8:36–8:41हाँ, जहां कोई बुडह वियकती नहीं पीडी को ये कहनी सुना रहा हो
  130. 8:41–8:43ये तो पुरा दाचा ही बड़ल देगा
  131. 8:43–8:49मतलप पाथक पहले पन्ने पर ही मेले की भीडवाड के गीप और दोनो जात्यों को एक साथ देखेगा
  132. 8:49–8:57एक दम सही और इस तरहा से पाथक शुरू से ही उस प्राएश्चित वाले अन्तिम प्रभाव के लिए तगयार रहेगा
  133. 8:57–9:00वो बाज समज में आती है उसी बिन्दू को आगे बड़ाते हुए
  134. 9:00–9:05क्या यहा मोझुद साक्ष एक �alag nishkarsh ka samarthan कर सकते हैं?
  135. 9:05–9:07आपका क्या मतलब है?
  136. 9:07–9:13मेरा मतलब है क्या हम शुर्वात और अंपके बीच के समबंद को और दिक मजबुद बना सकते हैं?
  137. 9:13–9:20ताकि ये सर्फ एक दुखद गटना ना रहेकर समएदवारा समाजिग गावो को भरने की एक बहुत बडी और प्रासंगिख तिप्पनी बन सके.
  138. 9:20–9:24बिलकोल बना सकते है. जब हम फ्रेमिंग दिवाएस का अस्तमाल करते है,
  139. 9:24–9:28तो कहानी सर्व एक एतिहासिक विवरन नहीं रहीं
  140. 9:28–9:30आप उईक मानवी एक गाता बन जाती है
  141. 9:30–9:34और मजे की बात देखे ये फ्रेमिंग दिवाईस
  142. 9:34–9:37हमारे पहले वाले बिन्दु को भी पुरी तरह से सुझजा देता है
  143. 9:37–9:40अब राम सक्विवाले जादूके हिस्टे की बात कर रही हैं
  144. 9:40–9:46आँ वो बुडा कठावाचक हुद अपनी नहीं पीडी को समजाते हुए कैसकता है
  145. 9:46–9:48कि लोग कहते है कि जादू था
  146. 9:48–9:51लिकिन असल जादू तो उन और्टों की हिमत्ती
  147. 9:51–9:52क्या बात है
  148. 9:52–9:56ये तो सारी चीजो को एक ही दागे में बहुती सली के से पिरो देता है.
  149. 9:56–9:57बिलकुल!
  150. 9:57–10:01इस से कहनी के सब ही बिख्रे हुए हिस से आपस में जूर जाते हैं
  151. 10:01–10:04और यातार्ट वाद भी बचार रहेता है.
  152. 10:04–10:06ये सच में बहुती शान्दार सुजाव है.
  153. 10:06–10:10तो आजकी इस गेहन और रचनात्मक समएक्षा को यही समझटते हैं.
  154. 10:10–10:11आप बलकोल.
  155. 10:11–10:14हम ने मुख्य रुब से तीन महत्पूर छेत्रोपड द्यान केंद्रित किया,
  156. 10:14–10:19बहला जादूई तत्मों को चतूराई के रूपक में बबडल कर कहनी के यतार्थ वाद को बनाई रकना
  157. 10:19–10:24ताखी उसकी स्वतन्त्र इच्छा और निदर्ता का पूरा सम्मान हो सके
  158. 10:24–10:28ताकी उसकी स्वतन्त्र इच्छा और निदर्ता का पूरा सम्मान हो सके
  159. 10:29–10:35अग, अर अंत में वर्तमान समय के मेले और सामाजिक एक्ता की संदेश को
  160. 10:36–10:41कहानी में एक फ्रेमिंग दिवाइस के रूँपने पिरोना
  161. 10:41–10:44कहानी में एक फ्रेमिंग दिवायस के रूप में पिरोना
  162. 10:44–10:49जिस से कहानी का गेहरा, दाशनिक, अर्ठ, और जेदा उबहर कर सामने आए
  163. 10:49–10:55ये कुछ अचे तोस कदम हैं, जो इस शक्तीषाली कता को और भी अदिक प्रभावशाली बना देंगे
  164. 10:55–10:59बिल्कुल ये कहानी अपने आप में बज्बूथ है
  165. 10:59–11:02बस यन बडलावो से इसकी दार और तेज हुजाएगी
  166. 11:02–11:05हम चाहेंगे कि आप इन रचनात्मक सुज़ावो पर काम करे
  167. 11:05–11:08और अपनी सामगरी को फिर से हमारे पास भेजेगे
  168. 11:08–11:11रहीं आपके काम को दोबारा दिखने में बहुत खुषी होगी

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इस समिक्षा में आपका स्वागत है, जाहां हम मुकामा गाड्ट की मारमिक लोक प्रेम कता चूहर्मल आरेश्मा पर बाद कर रहे हैं. कहानी का यतारत वाद तब पुरी तरह से तूट जाता है जब सात्वे अद्ध्याय में अचानक से जादूई तब सामने आजाते हैं आई एक दम सही कहा आपने मतलप शुरूवात में जु पसीना है जो कुष्टी क्या क्षाडे की दूल है और जातिगत आहिंकार है, वो सब बहुत अस्ली लकता है बहुत ही जमीनी संगर्ष है बिलकुल, पर कमजोरी यह है कि जब अद्ध्याय सात में रेश्मा की सक्फी राम सक्फी उसे महल से निकालने किलिए सच्मुच उसे गाएप कर देती है तो ये यादार्त वादी तो नको खतम कर देता है मलग दम हवा में अद्रुष्ष कर देती है नहां हा? और ये परते लगता है कि आर हम कोई फैंटिस योपन नयास पड रहे हैं क्या? सही खेरी आप पाटख के तोर पे लगता है कि अगर जादू से ही सब हुना ता तो इतना खून खराबा कि हूँँँँँँँँ वही तो जब संगश इतना गेहरा और सामाजिक हो, तो जादू से बचने पर पुरा दावियाल्का पडजाता है. चूहर मल ने इतनी यातना है क्यो सही अगर एक जादूई तरकीब से सब सूलट सकता था तो इसके लिए हम क्या कर सकते हैं? मडलब लोग कता में तो ये सब होता है हा अठ होता है तो मेरा सुजाव ये है कि इस जादूखो शाबदे करत में लेने के बजाए दमनकारी सन्रष्नाउके भीच महिलाउकी गेरी एक जुट्ता और चत्राई के रूप में फिर से तग्यार की आजाना चाहीए. अच्छ! मतलब, सच्का जादू नी बलकी एक तरकी दिमागी चाल. एक दम सही. जिसे कहानी की यतार्थवादी नीव भी बची रहें और तोन भी ना बिगडें. ये दिलचस्प है. इसके कुछ ठोस उदारन कैसे हो सकते है? उदारन के लिए आप दिखा सकते है के राम सकी सच्छ्मुच अद्रष्ष्षे करने के बजाए, महल के पहरे दारो का दान बदकाने के लिए, कोई बहुत ही चतृर मनोवे गयानेक योजना बनाती है. जैसे कोई अफवा फला दिनाया कुछ हैसा. हाँ, या फिर वे रात के गने को़े का फ़ाइदा उठाती हैं. तो उज़े प्रद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद ब तो आप आप आप बज़ाँ बवाग बाग बवाग बवाग बवाग बवाग बवाग बवाग बवाग बवाग बवाग बवाग बवाग बवाग बवाग बवाग बवाग बवाग बवाग बवाग बवाग बवाग बवाग बवाग बवाग बवाग बवाग बवाग बवा बिल्कुल ये कहानी को बहुत सचक्त बनाएगा तो अगर अगर आगे बड़ें तो रेश्मा का अद्मे माण रहना उसके चरित्र के विकास को एक दम अदूरा चोड़ देता है आए ये स्रच्ना की एक अगर बडी कम्जोरी है मदला मा कावे जैसे उस बड़े यूधद के बाद जब कलुवा रेश्मा का अपरहन कर लेता है उं। और चूहर मल की बड़ी दरदनाक मरित्ति हो जाती है हां तो कमजुरी ये है की कताकार बस ये कैकर आगे बड़ जाता है की कहानी रेश्मा के आगे के जीवन पर चुप्प्पी साद लेती है. ये बहुत इख ख़टकने वाली बात है. लेखखने शाएद इसे काव्यात्मक विचार की तरा लिखा है, की दुख इतना गेरा है कि शबद नहीं बचे. पर रेश्मा कोई साद्धरन्या निशक्रिय नाइका तो है नहीं एक दम नहीं वो बहत फी शक्करिय चरित्र है उसी ने तो खुड आगे बडगगर प्रेम का प्रस्ताव रख्खा था आप और समाजिक भेटियों को भी तोडा और याद है कैसे उसने अपने पिता को आत्म हद्या की दम्की देकर, पूरी हत्यार बन् सेना को रोग दिया था? बलकुल. तो आसे बेहद निदर चरित्र की आवाज और द्रिष्टिकों को, आचानाक पूरी तरा से हदा देना, ये सच में उसकी सुतन्त्र इच्चा के सात नियाई नहीं करता. एक दम नियाई नहीं करता. आजा लकता है, जैसे इतनी दम्दार नाई का, अंत में सरफ एक अपहरत वस्तू बनकर रहे गगे है. तो यहां सुदार का सुजाव क्या हूना चाही है? सुजाव यह है कि इस तरात्दी को बरकरार रकते हुए और रेश्मा की स्वतन्त्रता का सम्मान करते हुए अपहरन कि तुरंत बाद उसकी मनोवे ज्यानिक या शारीरे एक स्तिती की एक सन्षिप्त लेकिन मार में जलक प्रदान करें. मतलब उसे बस एक वाख्य में गायब नहीं होने देना है बलकि उसकी अस्तितिटी दिखानी है हा, इसके छो सुदारन के तोर पर आप एक चोटा द्रिष्ये जोड सकते है जहां अपहरन के बाद रेश्मा महल में लोताए गय है अच्छा वो शारिरेक रूप से कैद है? आग खैद है, लेकिन बहावनात्मक रूप से अभी भी अटूट है, वो टूट कर बिखर नहीं गई है. वु रो या गिडगिडा नहीं है? बिलकुल, वो शायद अपनी खिडकी से, उस महुए के पेड की और देख रही है जहाँ चूहर्ड मल के साथ उसकी यादे जूडी है ये बहुती विज्योल है और दूस्रा थो सुदारन ये हो सकता है कि आप इस चूप्ती को उसकी मजबूरी के बजाए उसका हत्यार बना दें औ, मैं समझ रहा हूं मतलव उ उगड ये संकल पलेती है हाँ ये दिखाते हुए कि उसने चूहर मल की म्रुट्तियो के बाद आजीवन अपने परिवार से बात नकरने का संकल पले लिया आपने पिता और भाई से वो कभी कुछ नहीं बोलेगी एक दम सही इसे यह चुप्पी लेक्हक की तरव से चूटा हुए लगेगा बलकी रेश्मा का एक जान्बुचकर उठाया गया विद्रो ही कदम लगेगी आप उसका यह आजीवन माँन उसके पिता आजभी सिंग की एहंकार पर उगर दिन पड़ने वाला एक मान तमाचा बन जाएगा ये बहुत ही स्पश्ट रूप से सामने रखा गया है हाला की मुझे आश्शर्या है कि अगर अम इसे मनद्दिर कीवदंती के दिश्टिकोंट से दिखें तो क्या हम ने इस पर विचार किया है की या चुप्पी उसे एक मिठख में बडलनेगा जान्बुच कर किया गया प्रयास तो नहीं हो सकता है? इं ये एक नजर्या हो सकता है? लेकिन क्या सर्फ चूहर मल के बदिदान पर द्यान किंद्रित करने के जोखिम से अम रेश्मा के विक्तिगत विद्रों को नदर अंदास दो नहीं ग़ाज तो बिलकुल कर रहे हैं अगर अगर अप निस की आवाज चीन लेंगे तो कहानी का आदा विद्रों तो वहीं कब खत्मो जाएगा सरी बाते अर खिन वंती यह और मंदिर की बात निकली है कहानी का अदिकानच हिस्सा केवल गेहरी धुशमनी से बधावा है मडलब कहानी का अंथ, बहुत इखषुरती से ये वरनन करता है कि कैसे आज मुकामा ताल के मंदिर में भूमिहार और दूसाद एक साथ पुजा करते हैं अग, उनका प्रेम जो पहले संगर्ष का कारन ता अब हजारो लोगों को जोडता है. लेकिन कमजुरी ये है कि बहुविष्य के इस मेल मिलाप का कोई भी संकेट उस खुनी संगर्ष के दोरान नहीं दिया गया है. बलकुल, हम बस ग्रना जातिगत एहंकार और हिंसक रक्पात देकते आरहें? आप, तो आचाना गंत में इस शान्ती पूर्ड मेले का वरनन, मुख्य कता से थोडा अलग खलक निषकर्ष जैसा लकता है. अज़ा अज़ा बज़ादा पर बज़ादा पर बज़ादा पर बज़ादा पर बज़ादा पर बज़ादा पर बज़ादा पर बज़ादा पर बज़ादा पर बज़ादा पर बज़ादा पर बज़ादा पर बज़ादा पर बज़ादा पर बज़ादा पर बज़ादा पर � तो बज़ाँँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ बज़ाँ ब तो बताता है कि ये सर्फ एक तात्कालिक लडाई नहीं है? बिलकुल. और दूस्रा बहुत फी असर्दार, थोस उदारन यहे है, कहानी की शुरुवात ही, वर्तमान में मुकामा ताल के मेले के वरनन से हो. मतलब हम सीदा अतीत में ना जाकर आजके समय से कहनी शुरू करें हाँ, जहां कोई बुडह वियकती नहीं पीडी को ये कहनी सुना रहा हो ये तो पुरा दाचा ही बड़ल देगा मतलप पाथक पहले पन्ने पर ही मेले की भीडवाड के गीप और दोनो जात्यों को एक साथ देखेगा एक दम सही और इस तरहा से पाथक शुरू से ही उस प्राएश्चित वाले अन्तिम प्रभाव के लिए तगयार रहेगा वो बाज समज में आती है उसी बिन्दू को आगे बड़ाते हुए क्या यहा मोझुद साक्ष एक �alag nishkarsh ka samarthan कर सकते हैं? आपका क्या मतलब है? मेरा मतलब है क्या हम शुर्वात और अंपके बीच के समबंद को और दिक मजबुद बना सकते हैं? ताकि ये सर्फ एक दुखद गटना ना रहेकर समएदवारा समाजिग गावो को भरने की एक बहुत बडी और प्रासंगिख तिप्पनी बन सके. बिलकोल बना सकते है. जब हम फ्रेमिंग दिवाएस का अस्तमाल करते है, तो कहानी सर्व एक एतिहासिक विवरन नहीं रहीं आप उईक मानवी एक गाता बन जाती है और मजे की बात देखे ये फ्रेमिंग दिवाईस हमारे पहले वाले बिन्दु को भी पुरी तरह से सुझजा देता है अब राम सक्विवाले जादूके हिस्टे की बात कर रही हैं आँ वो बुडा कठावाचक हुद अपनी नहीं पीडी को समजाते हुए कैसकता है कि लोग कहते है कि जादू था लिकिन असल जादू तो उन और्टों की हिमत्ती क्या बात है ये तो सारी चीजो को एक ही दागे में बहुती सली के से पिरो देता है. बिलकुल! इस से कहनी के सब ही बिख्रे हुए हिस से आपस में जूर जाते हैं और यातार्ट वाद भी बचार रहेता है. ये सच में बहुती शान्दार सुजाव है. तो आजकी इस गेहन और रचनात्मक समएक्षा को यही समझटते हैं. आप बलकोल. हम ने मुख्य रुब से तीन महत्पूर छेत्रोपड द्यान केंद्रित किया, बहला जादूई तत्मों को चतूराई के रूपक में बबडल कर कहनी के यतार्थ वाद को बनाई रकना ताखी उसकी स्वतन्त्र इच्छा और निदर्ता का पूरा सम्मान हो सके ताकी उसकी स्वतन्त्र इच्छा और निदर्ता का पूरा सम्मान हो सके अग, अर अंत में वर्तमान समय के मेले और सामाजिक एक्ता की संदेश को कहानी में एक फ्रेमिंग दिवाइस के रूँपने पिरोना कहानी में एक फ्रेमिंग दिवायस के रूप में पिरोना जिस से कहानी का गेहरा, दाशनिक, अर्ठ, और जेदा उबहर कर सामने आए ये कुछ अचे तोस कदम हैं, जो इस शक्तीषाली कता को और भी अदिक प्रभावशाली बना देंगे बिल्कुल ये कहानी अपने आप में बज्बूथ है बस यन बडलावो से इसकी दार और तेज हुजाएगी हम चाहेंगे कि आप इन रचनात्मक सुज़ावो पर काम करे और अपनी सामगरी को फिर से हमारे पास भेजेगे रहीं आपके काम को दोबारा दिखने में बहुत खुषी होगी

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