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कागज़_का_झूठ_और_स्क्रीन_के_मगरमच्छ.m4a

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Part 9 · VIDEHA MITHILA MAITHILI DISCUSSION CRITICISM SERIES PART 9
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  1. 0:00–0:04मान लिजे के अचाना किसी दिन मतलब एक बहयाना कागलग जाए,
  2. 0:04–0:07या कोई बड़ा साईबर हमला हो जाए,
  3. 0:07–0:11और बंक कसरा देटा, समपती के कागस, जन्म का प्रमाण पत्र,
  4. 0:11–0:14सब कोछ एक पल में जलकर राक हो जाए,
  5. 0:14–0:17या फिर किसी सर्वर से हमिशाकिले डिलीट होँगाई
  6. 0:17–0:18बलकल, एक दम खाली
  7. 0:18–0:19हाँ
  8. 0:19–0:21तो अगर अम इसे कानोनी नजर्ये से देखें
  9. 0:21–0:25तो उस पल के बाट सरकारी वेवस्त है किले किसी अन्सान का तो कोई वजुदी नहीं रहतान
  10. 0:25–0:29रातो रात एक जीता जागत अनसान महेज एक एक आली पन्ना बन जाता है
  11. 0:29–0:33ये विचारी मतलब अपने आपने एक अजीबसी सेरन पड़ा करता है आपने?
  12. 0:33–0:36ये सच में बेहद खोफनाक विचार है
  13. 0:36–0:39हम मतलब एक आजी दुनिया में रहते हैं
  14. 0:39–0:47ज़ाही ज़ाही लिखती आप यह पर देटाबेस में लगा बस वही परम सत्ते हैं
  15. 0:47–0:50हमें लखता है कि यह जो कागस है यह भी रक्षा करेगा
  16. 0:50–0:54लेकिन रकीकत यह बिलको लूलत भी तो हो सकती है ना
  17. 0:54–0:55कैसे मतलब
  18. 0:55–0:59मतलब जो वेवस्ता अपका नाम कागस पर लिककर आपको एक पहचान देरी है
  19. 1:00–1:06वही वेवस्ता, उस नाम पे एक लाल लकीर कीचकर आपको इतिहाँस से पुरी तरा मिता भी सकती है
  20. 1:06–1:11सही कहाँ. और आजकी हमारी इस गेहन चर्चा का जिसे हम दीप डाईव कहते हैं
  21. 1:11–1:13उसका केंदर भी यही सबसे बडा सवाल है.
  22. 1:13–1:17हमाज इसी कागज विवस्ता और हमारी जो स्मुती है,
  23. 1:17–1:20उसके बीच चल रहे संगर्ष की पर्टों को उदेड मे वाले है.
  24. 1:20–1:22बहुत ये दिल्चास विशे है ये.
  25. 1:22–1:23बलकल.
  26. 1:23–1:25और हमारे पस जो स्रोथ है आज,
  27. 1:25–1:32वो है गजईंद रे ठाखुर दोरा रचित, मैठली उपन्न्यास, गोही सबख, भीच जल समादी का, बाल संस करन.
  28. 1:32–1:35इस चर्चा में हमारा उदेश्ख कोई कहानी सूनाना नहीं,
  29. 1:35–1:37बलकी उस पूरे तन्तर को दिकोड करना है,
  30. 1:37–1:40तो यह जीवन और म्रित्टुकी यह आस्ली परीबाशा है उसको लेकर है.
  31. 1:40–1:41अच्छ?
  32. 1:41–1:42आज्ट!
  33. 1:42–2:12तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो �
  34. 2:12–2:15या फिर जब दिमाग काम करना बन कर दे.
  35. 2:15–2:16जब याई बाते.
  36. 2:16–2:18लेकिन ये कहानी हमे बताती है कि
  37. 2:18–2:19असल मुत वो है ही नहीं.
  38. 2:19–2:20तो फिर असल मुत क्या?
  39. 2:20–2:22असल मुत तब होती है
  40. 2:22–2:24जब किसी दफ्तर में बहिता कोई बाबू
  41. 2:24–2:27अपने सरकारी रजस्चर से आपका नाम मिता देता है
  42. 2:28–2:31जब आपके होने का कोई दस्तबेजी सबूत ही नहीं बच्टाना
  43. 2:31–2:33तब आप सच्छ में मर जाते हैं
  44. 2:33–2:34बापरे!
  45. 2:34–2:36ये तो ये दो बहुती गेहरी बात है
  46. 2:36–2:39और इस विवस्ता की इसी क्रूर्ता को समजने के लिए
  47. 2:39–2:44हमें उस जगा चलना होगा, जहां इस गुरुर्ता का सबसे बड़ा प्रतिकार जन्वे लेता है.
  48. 2:44–2:47एक आसा गाँ है, जिसका नाम है, गड नारी केल.
  49. 2:47–2:49वं, गड नारी केल.
  50. 2:49–2:51हा, यह कोई आम गाँ नहीं है.
  51. 2:51–2:54और यहां के लोग भी कोई आम लोग नहीं है.
  52. 2:54–3:00यहां जो ग्यान और इतिहास है, वो किसी वातनु कुलित लाईब्रेरी की मोटी-मोटी किताबो में दरज नहीं होता.
  53. 3:00–3:08इसके बजाए यहांका सच, मिट्टी में, नदी के पानी में, और वहांकी अड़्टूं दवारा गाई जाने वाले लोग गीतो में सुरक्षित रहता है.
  54. 3:08–3:09बलकोल.
  55. 3:09–3:13अगर गागस को सुझना बलकि उसे सुझना चागस को सुझना
  56. 3:13–3:16इक दादी है, जिने सब लोग बाग गयकर बलाते हैं
  57. 3:16–3:19बागी एक सीक मुझे बडलप इतनी गेरी लगी
  58. 3:19–3:21कि वो सीदे दिमाग परसर करती है
  59. 3:21–3:25औरे हा, बागी यो सीक का जिकर करना तो यहां बहुत जरूरी है
  60. 3:25–3:30वो सिक हाती हैं के कागस, कागस अकसर जूट बोल सकता है
  61. 3:30–3:33इसलि उस पर आख मुंद कर बरोसा नहीं करना जाएए,
  62. 3:33–3:35बलकि उसे सुंगना जाएए.
  63. 3:35–3:37आख, कागस को सुंगना.
  64. 3:37–3:40बडल वो कहती है, कि अगर कागस से मिटीजी गंदाए,
  65. 3:40–3:42तो समजो कि उस में लिखा सच है,
  66. 3:42–3:44वो जमीन से ज़ोडाओा सच है.
  67. 3:44–3:45लेकिन?
  68. 3:45–3:48लेकिन अगर उसी कागस से पैसों की गनना है तो
  69. 3:48–3:50तो बहुत सावदान हो जान जान जान जाईए
  70. 3:50–3:54किुकी वो कागस किसी साजिश का हिस्सा हो सकता है
  71. 3:54–3:55एक दम सही
  72. 3:55–3:58और ये एक बहुती शक्तीशाली रूपक है
  73. 3:58–4:03ये हमें बताता है कि दस्तवेज हमेशा निरपेखष्या नूट्रल नहीं हूते हैं
  74. 4:03–4:10उनके पीछे अकसर सत्ता का लालज का और विवस्ता का अपना कोई अरादा चिपा होता है
  75. 4:10–4:12बलकोल
  76. 4:12–4:15गरनारी केल गाँउकी खास्यत ही यही है,
  77. 4:15–4:17कि ये गाँ उस जूट को पहचान लेता है,
  78. 4:17–4:20जो सच आदिकारेक रेकोट से,
  79. 4:20–4:22यानी कागजों से मिता दिया जाता है,
  80. 4:22–4:26उसे यहां कि लोक स्म्रिती अपने भीतर संजो कर रक्लेती है.
  81. 4:26–4:27और इसका सबसे बड़ा,
  82. 4:27–4:31और में कोंगा सब से जादुई उदारन है, गाँँका वो चनना गाची वाला इस्सा.
  83. 4:32–4:36यानी वो पुराना पेड, जहाँपर एक बहुती अलक तरह की गती विदी होती है.
  84. 4:36–4:38आप भूटो वाली गती विदी.
  85. 4:38–4:40आप यह यह पहले रोंक्ते कड़े कर देने वाल है.
  86. 4:40–4:45वोता किया कि रात के वकत उस पुराने पेड के निचे एक बुडवा बूथ है,
  87. 4:45–4:48उसके नित्रत में गाँके सारे बूथी खड़ा होतें,
  88. 4:48–4:50और और वो कबद्टी खिलतें.
  89. 4:50–4:51जी कबबदी?
  90. 4:51–4:54लिकिन यह कोई ताईमपास यह मनुरन्जन किलि खेला जाने वला खेल नहीं हैं
  91. 4:54–4:56इसका एक बहुती कडा नियम हैं
  92. 4:57–4:59नियम यह है कि जब भी कोई भूथ रेड करने जाता है
  93. 5:00–5:02तो उसे पाले की सीमा चूते वकत
  94. 5:02–5:04किसी आज़े विक्ती का नाम पुकारना होता है
  95. 5:04–5:08जिसे दून्या या ये वेवस्ता पूरी तरे से बूल चूकी है
  96. 5:08–5:11और अगर वो बूथ सही नाम पूकार लेता है
  97. 5:11–5:16तो उस चन्ना गाची पिरपर एक नहीं एक दम ताजी हरी पती उगाती है
  98. 5:16–5:19मतलव इसे नाम बचाओ कबद्दी कहागा या है
  99. 5:19–5:24इस जादूई यातार्थ्वाद के पीछेना एक बहुती टोस तन्त्र काम कर रहें.
  100. 5:24–5:28अगर हम गेराई में जाएं, तो विवस्था का काम क्या है?
  101. 5:28–5:31उन नामो को मिताना जो उसके लिए अस सूविदा जनक है.
  102. 5:31–5:32सईबात हैं
  103. 5:32–5:39लेकिन यह जो भूथ हैं यह अपनी कबद्टी के जर यह उन नामो का लगातार उच्चारन करते रहते हैं
  104. 5:39–5:43वे नामो को हवा में और लोगो की सम्रिती में जिंदा रहते हैं
  105. 5:43–5:49ये एक तरह से हाश्येप पर दखेल देगे लोगो का अपना एक वेकल पिक संग्रे है,
  106. 5:49–5:53जिसे कोई भी सरकारी मोहर या रबस टामप नहीं मिता सकती.
  107. 5:53–5:59औरे वाग, अगर आज की बजाज की बजाचा में समझने की कोशिष करेना,
  108. 5:59–6:03तो ये भूटों की कबद्टी दर सल आज के जमाने के क्लाउट बैकवप
  109. 6:03–6:06या पर ब्लोक्चेन तकनिक कितरही है
  110. 6:06–6:08और ये तुलना बहुत ही सतीक है
  111. 6:08–6:12और इसके पीचे के विग्यान को समजना भी बहुत रोचक हो जाता है आम
  112. 6:12–6:14आब ब्लोक्चेन काम कैसे करता है
  113. 6:14–6:18उस में कोई केंद्री अठारीटी या कोई एक दव्टर नहीं होता
  114. 6:18–6:21जो देटा को अपनी मरजी से बड़ल सके या मिता सके
  115. 6:21–6:25सारा देटा हजारो गल गल क्मपुटरो में
  116. 6:25–6:26एक साथ सेव होता है
  117. 6:26–6:27जिस लिए नोट़्स कैतें
  118. 6:27–6:28भिल्कुल नोट़्स
  119. 6:28–6:29एक दम सभी
  120. 6:29–6:33और गर नारी किल में, हर एक बूथ उस ब्लोक्चेन के एक नोद की तो काम कर रहे है?
  121. 6:33–6:34आप बलकल!
  122. 6:34–6:38जब सरकारी सिस्टम, जो कि मान लिजे एक संटरलाइस धार्ट्डाइव की तरहा है
  123. 6:38–6:40वो किसी मस्दूर का नाम दिलीट कर देता है
  124. 6:40–6:43तो गाँकी ये जो सामूहिक समरती है,
  125. 6:43–6:45वो न भूतो के नेट्वाग के जरी अस्नाम को एक
  126. 6:45–6:48लेजर में हमेशा के लेजर सेव कर लेती है.
  127. 6:48–6:51विवस्ता लाग चाहे वो इस नेट्वाग को रहाग करी नी सकती.
  128. 6:51–6:55और इसी विवस्ता की चालाकी को मात देने किलिए,
  129. 6:55–6:58उसी की बाशा सीखना कितना जरूरी है
  130. 6:58–7:01ये बाद हमे लट्धार ताकृर के किरदार से समझ में आती है
  131. 7:01–7:03लट्धार ताकृर
  132. 7:03–7:08अग, लट्धार ताकृर ने अपने बेटे कमलकान्त को कागस पनना इसलिय नी सिखाया था
  133. 7:08–7:10कि वो कोई बडा विद्वान बन जाए
  134. 7:10–7:13या बेटके दर्षन शास्ट्र पे चर्चा करें
  135. 7:13–7:14तो फिर क्यो से काया?
  136. 7:14–7:16उनो ने उसे पडना इसले से काया
  137. 7:16–7:18क्योंका मानन � thā
  138. 7:18–7:20कि जिसकी मेड नदी कालेती है
  139. 7:20–7:22उसका मुकद्मा कागस कालेता है
  140. 7:22–7:23अफ...
  141. 7:24–7:26ये तो ये बहुती चुबने वाली बात है
  142. 7:26–7:29उसका मुकत्मा कागज खालेता है
  143. 7:29–7:30सच्छ में
  144. 7:30–7:31और इसका सीदा सा आर्ट यही है
  145. 7:31–7:35कि विवास्था का सबसे बड़ा हत्यार उसकी भाशा है
  146. 7:35–7:37उसके कानूनी दावो पेच
  147. 7:37–7:40उसकी दारायं और वो बारी बھरकम आदिकारिक शब्द
  148. 7:40–7:42अगर कोई खरीब किसान है
  149. 7:42–7:45या मज्दूर है और वो जबाशा को नहीं समचता है
  150. 7:45–7:50तो वो ये जानी नि पाएगा कि कब एक मामूली से दिखने वाले कागजने
  151. 7:50–7:53उसकी पुष्तैनी जमीन या उसकी अदिकार को निगल लिया
  152. 7:53–7:57विवावस्ता से लडने के लिए उसकी लिपी को समजना
  153. 7:57–7:59इक अनिवारे हत्यार है
  154. 7:59–8:00दिकुल अनिवारे है
  155. 8:00–8:01और यही बाद
  156. 8:01–8:04हमें सीदा उस गटना की अर लेजाती है
  157. 8:04–8:05जगा ये वेवस था
  158. 8:05–8:07अपने सबसे खोफ नाक रूप में
  159. 8:07–8:08हम सब के सामने आती है
  160. 8:08–8:09हम साल
  161. 8:09–8:10उनिस्वटब्टर की बाट कर रहे हैं
  162. 8:10–8:11जी
  163. 8:11–8:13अँनिस्वट्टर का वोहाज्सा
  164. 8:13–8:16गगगन दीपर एक बहुत बड़े पूलका निरमान चल रहा है,
  165. 8:16–8:19और वहां एक यूवा और एक दम इमान्दार अंजीन्यर है,
  166. 8:19–8:22नन्दारूनी. वो अपनी आखों से देख रहा है,
  167. 8:22–8:25के उस पूरे प्रोज्यक्त में सुरक्षा मानको की दज्यागा लगा इजा रही हैं.
  168. 8:25–8:27अद्जीं अड़ाई जागीजागीएं
  169. 8:27–8:29मज्दूरों को बचाचाने के लिए
  170. 8:29–8:31ना तो सही उपकरन है
  171. 8:31–8:33ना हल्मेट्स है
  172. 8:33–8:35और जो रस्स्या है वो भी जरजर हो चुकी हैं
  173. 8:35–8:37भहुत यी लापर वाईछी ती
  174. 8:37–8:39और बारी बारिश के भीच
  175. 8:39–8:41अखिरकार वही होता है
  176. 8:41–8:44तो उग़ान बारेश अदाब मुसम के कारन,
  177. 8:44–8:47मज्दूर काम चोड़कर अपने अपने अपने गर चलेगाएग.
  178. 8:47–8:50और बस यहीशे कागज अपना काम शुरू करता है.
  179. 8:50–8:52उद्तन्तर कैसे सच को दफनाता है न,
  180. 8:52–8:55उसकी पुरी प्रक्रिया हमें यहान देखने को मिलती है.
  181. 8:55–9:00अगर लाल. और एक आदिकार एक रजिस्टर में दरज कर रहा है,
  182. 9:00–9:02के बारी बारेश और कहराब मोसम के कारन,
  183. 9:02–9:05मज्दौर काम चोड़कर अपने अपने गर चले गया है.
  184. 9:05–9:06औरे.
  185. 9:06–9:08वो लिकता है के कोई बडाहाथ सा हुए ही नी,
  186. 9:08–9:11जबके खोफनाक हकीकत ये ती,
  187. 9:11–9:15के सैक्डो मस्दूर उस उफन्ती हुई नदी में दूप कर मर चुके ते
  188. 9:15–9:18और आप दिखे सरकारी सुची में मरनेवालों का जो अंक्रा दिया गया
  189. 9:18–9:19वो सुझफ तीस था
  190. 9:20–9:21सुझफ तीस
  191. 9:21–9:24जब की आसल में, तीन सुझव मस्दूर उस नदी में सामा गय ते
  192. 9:24–9:25बिलकुल
  193. 9:25–9:27और इस में भी सबसे बड़ा दोका तो महिलाएं के साथ हुएँ
  194. 9:28–9:30उदारन के लिए सर्यु नाम की एक महिला मस्वूर थी
  195. 9:30–9:33उसका नाम उस तीस लोगो की सुची मे भी नहीं था
  196. 9:33–9:33और जानतें कियों?
  197. 9:34–9:34क्यों?
  198. 9:34–9:37क्योंकि वो अपने म्रिद्पती के नाम पर मज्दूरी कर रही थी.
  199. 9:37–9:41तो कागस की नजरो में सर्यों जैसी औरत का तो कोई वजुदी नी तना,
  200. 9:41–9:44वो जीती जाखती अंसान हो कर भी सिस्टम के लिए महाजे खाली स्थान ती.
  201. 9:44–9:47यही तो इस व्यवस्ताका काम करने का तरीका है
  202. 9:47–9:50अगर आपका नाम अदिकारिक रजिस्टर में नहीं है
  203. 9:50–9:53तो फिर आपकी म्रित्यो भी दर्ज नहीं हो सकती
  204. 9:53–9:56आप एक अग्यात आख्डा भी नहीं बन पाते है
  205. 9:56–9:59आप बस भस शुन्नेता में विलीन हो जाते है
  206. 9:59–10:05यहां मुझे थोडा सनचय है, मदलाब नन्दारूनी इस पूरे प्रोजेट का अंजीनेर था, रईट?
  207. 10:05–10:11वो एक पड़ालिखा अंसान था, उसे बहुत अच्छे से पता था, कि हमारी अदालतें कैसे काम करती हैं?
  208. 10:11–10:17अदालत को महर लगेवे कागस चाहीए हुते हैं, चश्मदीद गवाह चाहीए, और एक्दम पुखता सबुच चाहीए.
  209. 10:17–10:47तो आप यह ज़ाज़ी नहीं तो आप बज़ाज़ी नहीं तो आप बज़ाज़ी नहीं तो आप बज़ाज़ी नहीं तो आप बज़ाज़ी नहीं तो आप बज़ाज़ी नहीं तो आप बज़ाज़ी नहीं तो आप बज़ाज़ी नहीं तो आप बज़ाज़ी नहीं तो आ�
  210. 10:47–10:49वो जानता था की अदालत के बाबु
  211. 10:50–10:53इंजूतों और कडों को सबूद माने से साफ पिनकार कर देंगे
  212. 10:54–10:56असल में वो एक आल्तनेटिव आखाईव
  213. 10:57–10:59यानी एक वेकल्पिक दस्तावेस तगयार कर रहा था
  214. 10:59–11:29उस्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्
  215. 11:29–11:33अप शुची आप कुई भारी चीजी आप कुई अईन्सान गेरी नदी में गिरता है,
  216. 11:33–11:36तो पानी की सता से टक्राने पर एक चबाक की आवाज आती है,
  217. 11:36–11:40लेकिन कुछी पलो में पानी फिर से एक दम शान्त हो जाता है,
  218. 11:40–11:44उन्तीन सो मस्दूरो की मुद्ब उस चबाक की तरहाए तीन,
  219. 11:44–11:47जिसे वेवस्थाने वो जल्दी शान्त कर दिया.
  220. 11:47–11:48बलकुल सही कहा.
  221. 11:48–11:52और इस पूरी तस्वीर को अगर हम थोडे व्यापक रूप से देखेना,
  222. 11:52–11:55तो एक तरफ तो वकील, बतुकनात, हरीहरन,
  223. 11:55–11:59अदर पाल बता जैसे रसुक्दार और ब्रष्ट लोग ते
  224. 11:59–12:03उनके पास सत्ता थी, उनके पास पैसा था
  225. 12:03–12:06और वे कागस के दाओ पेच का इस्तमाल करके
  226. 12:06–12:09सच्को पूरी तरासे मिताने में लगे हुए ते
  227. 12:09–12:12लेकि दूस्री तरव, अकेला नंदारूनी था
  228. 12:12–12:16उस्टे अपनी डाईरी में उन तीन सो मस्टूरों का पूरा सच्छ लिखा,
  229. 12:16–12:18और फिर उसकी तीन प्रतीया बनाईं.
  230. 12:18–12:19जी.
  231. 12:19–12:23एक प्रती उस्टे अपने वकील देवकी नन्दन चोभे को देदी,
  232. 12:23–12:28तुस्री प्रती गडन नारी कल गाँ में आपनी दादी बागे पास सुरक्षिद भिज्वादी
  233. 12:28–12:35और तीस्री प्रती को उसने नदी के किनारे एक पुराने पीपल के पेड की ज़ड में गेरे गार दिया
  234. 12:35–12:38अदालत के माल काने में एक दिन अचानक से बारी बारिश का पानी गुज जाता है
  235. 12:38–12:39बिलकुल
  236. 12:39–12:41और वो पथावा जुता जिसे कच्च्रा समचकर बसे कोने में फेग दिया गया था
  237. 12:41–12:45जब वो पानी से भीखता है तो उस्मिसे एक बारी भून तपकती एं रवाज आती है
  238. 12:45–12:47जब अदलत के माल खाने में
  239. 12:47–12:49एक दिन अचानक से बारी बारीश का पानी गुज जाता है
  240. 12:49–12:50बिलकुल
  241. 12:50–12:51और वो पथावा जूता
  242. 12:51–12:54जिसे कच्रा समचकर बसे कोने में फेग दिया गया था
  243. 12:54–12:59तो उपनी से बीकता है, तो उसमे से एक बारी भून तपकती एक अवाज आती है, चबाक.
  244. 12:59–13:05ये पल यस पूरी कहानी के सबसे ब्रभावीशाली दिश्षो मे से एक है.
  245. 13:05–13:12यह में साव साव बताता है, टट्टे को अप कितने भी सालो तक फाईलों के देर की निचे दबागर रक्टे रहें, वो मरता नहीं हैं.
  246. 13:12–13:13खवी नी मरता.
  247. 13:13–13:18वो बहुती देरे के साथ, बस अपने सही वक्त के आने का अनतिटार करता है.
  248. 13:18–13:24अगदम सही और यही से ये कता एक बहुती आदूनिक और भयानक मोड ले लिती है.
  249. 13:24–13:30समय आगे बड़ता है, दून्या बड़जाती है, और इसी के सात। शोषको का रूभ भी पुरी तरे से बड़जाता है.
  250. 13:30–13:36चन्ना गाची का वो बुडवा भूथ, जो अप तक सिझ नदी के मगर मच्छों को जानता ता,
  251. 13:36–13:40वो देकता है कि दून्या में एक नहीं तरकी परच्छाई आगगगगगगगग.
  252. 13:40–13:42एक आईसी परच्छाई जिसके पैर नहीं है,
  253. 13:42–13:45जो राद के अंदेरे में एक सक्रीन की तरा चमकती है,
  254. 13:45–13:47और और बुज्जाती है.
  255. 13:47–13:49और यही वो सक्रीन का मगर मच है,
  256. 13:49–13:53मतलब अप्राद का तरीका अब सर्फ फाईलो में हेर फिर करने,
  257. 13:53–13:56या मस्दूरो को नदी में दुबाने तक सीमित नहीं रहा है
  258. 13:56–13:59अप शोशर पूरी तरा से दिजितल हो चुका है
  259. 13:59–14:03पहले वाला जो मगर्मच ता वो मस्दूरो का शरीर कहाता ता
  260. 14:03–14:05लेकिन ये जो नया दिजितल मगर्मच है
  261. 14:05–14:08ये अनसानो का बहविष्च उनका स्वाभिमान
  262. 14:23–14:27और अर इंस्टन्ट लों देने वाले एक मोबाईल आप के जाल में फस जाता है.
  263. 14:28–14:32इसके बाद उसके साथ जो होता है, उआज के समय का एक बहुत बडाच सच है.
  264. 14:33–14:35उसे दिजितल अरेस्ट का शिकार बनाय जाता है.
  265. 14:36–14:38तो फोन पर, शक्रीन के उस पार बेटे लोग,
  266. 14:38–14:41नक्ली पुलिस अदिकारी बनकर उसे द्धमकाते हैं
  267. 14:41–14:45और यहां ये समझना बहुत जरूरी है कि ये दिजिटल अरेस्ट अकिर काम कैसे करता है
  268. 14:45–14:45कैसे?
  269. 14:45–14:48देके ये कोई तकनी की हैक नहीं हैं
  270. 14:48–14:51ये सीधे तोर पर अन्सान के मनोविग्यान पर
  271. 14:51–14:52उसकी साइकोलोगी पर हमला है
  272. 14:53–14:54ये जो दोखेबाज होते है ना
  273. 14:55–14:57ये अनसान के भीतर बैटेग दर
  274. 14:57–15:00और उसकी सामाजेग शर्म को अपना सबसे बड़ा हत्यार बनाते हैं
  275. 15:01–15:02उज्वल इतना दर जाता है
  276. 15:02–15:07और समाज में बदनामी के खॉव्फ से इतना ज़ादा शरमिन्दा हुता है,
  277. 15:07–15:10कि वो अपने परवार या पुलिस किसी को भी कुछ नहीं बताता,
  278. 15:10–15:14वो चुप्चाःप अपनी सारी जमा पुंजी लुता देता है,
  279. 15:14–15:16और अंथ्था एक्दम गायब हो जाता है.
  280. 15:16–15:17बाप्रे.
  281. 15:32–15:35अमानवी ये है, जो मानव तसकरी से ज़़ा हूँ है,
  282. 15:36–15:38मदूबनी के रहने वाली बूली बाली लगकी है, फूल्मती.
  283. 15:39–15:43उसे शहर में बहुत अच्छी नोक्री का जासा देकर फसाया जाता है.
  284. 15:43–15:45उसे उसके गर से बहुत दूर लेजाया जाता है.
  285. 15:45–15:50अप्र उसकी पूरी पह्चान को ही व्यवस्तित तरीके से मिता दिया दादा है.
  286. 15:50–15:56अग उसे एक नया बेजान सा कोड नाम देदिया दिया दादा है, FM.
  287. 15:56–15:59मदलप कलपना करना भी सिहरन पेदा करता है,
  288. 15:59–16:02के एक जीती जाकती सास लेती लगकी,
  289. 16:02–16:09जिसके अपने सबने थे, वो सिझ दो अंग्रेजी अक्षरों के एक देटापोईंट में तबदील कर दीजाती है.
  290. 16:09–16:11ये पहचान के चेने जाने के एक जरम रूप है.
  291. 16:11–16:16और जो तीसरा उदारन है, वो हमें एक वेश्विक महामारी के कालक्षन में लेजाता है.
  292. 16:16–16:19अगर आगर समय के साँई जब पूरी दुन्या साँसो के लिए तरस रही है,
  293. 16:19–16:23लोग मर रहे हैं, लेकिन ब्रष्टाचार की जो मशीनरी है,
  294. 16:23–16:25वो इस आबदा मे भी निरबाद रूप से चल रही है.
  295. 16:25–16:28गोप कुमार नाम का एक अडिटर है,
  296. 16:28–16:31जेसे दवाऔ और अक्सिजन वित्रन की जाज का काम सवापा जाता है,
  297. 16:31–16:35जब उआडिट करता है तो उसे काखजो में भ्यानक गभडी दिकती है.
  298. 16:35–16:39एक ही अक्सिजन सिलिंटर को सरकारी लिकोट में 3 लोग गलक जगोपर डिलिवर हूँ दिखाया है.
  299. 16:39–16:43और यही पर आखर, कहानी वाखे यह दिल्चास्प होजाती है.
  300. 16:43–16:46आखर कार समय के सारे सिरे एक साथ जुड जाते है.
  301. 16:46–16:50बलकल, गोप कुमार जब इस अकसिजन गोताले की गेराई में जाता है.
  302. 16:50–16:52पाईलों को खंगालता है.
  303. 16:52–16:54तो उसे एक पुराना कोड मिलता है.
  304. 16:54–17:24अदर दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा द
  305. 17:24–17:26अगनीक को अबग्रेट कर लिया है.
  306. 17:26–17:29जो चंद्रपाल, बता, और रागजव सुमानी,
  307. 17:29–17:31जैसे लोग नाईंटिन सेविंट्टी एट में
  308. 17:31–17:34मस्दूरों की लाशों पर मुनाफा कमारहे थे,
  309. 17:34–17:36वही तन्त्र अब महामारी में
  310. 17:36–17:38अक्सुजन के सिलिंदरों का देटा
  311. 17:38–17:40बदिलकर मुनाफा कमारा है
  312. 17:40–17:42दर पेडा करनेवाल दंट्र
  313. 17:42–17:44हमेशा एक ही होता है
  314. 17:44–17:45बस समें के साथ
  315. 17:45–17:47वो नया चोला पहन लिता है
  316. 17:47–17:49लेकिन ये कहानी हमें सरफ
  317. 17:49–17:51निराशा के गरत में चोडती
  318. 17:51–17:54जाँ पीडियो तक शोषन की जड़े इतनी गेरी होती है
  319. 17:54–17:59वही पीडियों तक सत्या को वापस चीनने का संगरष भी जिन्दा रहता है
  320. 17:59–18:02जिसे हम दे रेक्लिमेशन अप ट्रुत कैसकते हैं
  321. 18:02–18:06और ये इस पूरी चरचा का सब से शशक्त हिस्था है
  322. 18:06–18:10बिलकल, सत्या को हमेशा के लिए तो दफनाया नहीं जासकता ना
  323. 18:10–18:13अर इस कता में विद्रों की जो शुरूवात है,
  324. 18:13–18:17वो किसी हिंसक, करानती या हत्यारों से नहीं होती है.
  325. 18:17–18:20ये विद्रों सर्फ अपना अस्ली नाम,
  326. 18:20–18:23बिना दरे उची अवाज में पुकारने से शुरूव होता है.
  327. 18:23–18:26और इसकी गुईंज, हम साथ समंदर पार,
  328. 18:26–18:29अमरिका की मशुर हारवोट यून्टिए में सुनते हैं.
  329. 18:29–18:32वहां व्यापार और मानव्ता विशाय पर
  330. 18:32–18:35एक बला और चम्चमाता होगा कारेक्रम चल रहा है.
  331. 18:35–18:39मंच पर अद्वर्ट ब्रुम नाम का एक बहुत बलाग विदेशी व्यापारी क्हला है.
  332. 18:39–18:43तो आपनी कमपनी के महान विजन और परोपकारी कामो का बखान कर रहा है
  333. 18:43–18:46वो आपनी प्रज्शन्टेशन में विकास के प्रतिक के रूप में
  334. 18:46–18:49उस पुराने गंगापौल की एक तस्वीर दिखाता है
  335. 18:49–18:53अर तभी दर्षको के बीज से एक यूवा लगकी कष्डी होती है
  336. 18:53–18:57ये एईरा है, जो उसी नन्द आरुनी की परपोती है
  337. 18:57–18:58जी
  338. 18:58–19:01वो सेदे मंच कि अर देकती है और ब्रुम से पुष्टी है
  339. 19:01–19:05उननिस्छट्टर के उस पुल हाथ से में जो तींसो मस्धृर मारे गय ते
  340. 19:05–19:07उनका क्या हूँआ? उनके नाम कहा है?
  341. 19:07–19:15उस एक सबाल से उस विशाल वातानुकुलित सबहागार में जु सननाटा चाता है ना वो बहुत कुछ कह देता है.
  342. 19:15–19:19एक असी जगा जो पूरी तरह से वेवस्तित है, पालइश है,
  343. 19:19–19:22ज़ाह सब कोछ एक दम कोरप्रप्रट बाशा में लपेटा हूँँआ है
  344. 19:22–19:27वहां दश्को पूलाना एक ख्रूर सच अपने नंगे रूप में ख़डा हो जाता है
  345. 19:27–19:31एरा का वो भेबाक सवाल इस बात का अकात्या प्रमान है
  346. 19:31–19:37कि गर नारी केल के चन्ना गाची कि वो लोग स्म्रती अब आमेरिका तक पहोट चुकी है.
  347. 19:37–19:39उसे मिताया नहीं जासका है.
  348. 19:39–19:40और थीक यही अदम में साहस,
  349. 19:40–19:44हमें मीरा और फूल्मती के किरदारो में भी देखने को मिलता है.
  350. 19:44–19:47मीरा, जो की कानुन की बहुत अची जानकार है
  351. 19:47–19:51और गोप कुमार के साथ उस दिजिटल गोताले की जान्च में मददद कर रही हैं
  352. 19:51–19:55चंद्रपाल बताका का गिरोज मीरा को रोकने किलिए अपनी सबसे पुरानी चाल चलता है
  353. 19:55–19:58बलाक मेल वे उसे दमकाते हैं
  354. 19:58–20:00कि अगर उसने अपनी जाज बन नहीं की,
  355. 20:00–20:01तो वे उसकी निजी जानकारी
  356. 20:01–20:04और तस्वीरे अपन तर जब निख कर देंगे.
  357. 20:04–20:08एक आम अनसान तो इस थिती में गब राकर पीछे इज़ सकता ताना,
  358. 20:08–20:12किकि बलाक मेल का सीथा वार अनसान के सम्मान पर हुता है.
  359. 20:12–20:17लेकिन मीरा जिसके पास गड नारी केल की अपनी दादी की दीवूई सीक है
  360. 20:17–20:18बाकी सीक
  361. 20:18–20:21बलकुल, वो हार नहीं मानती है
  362. 20:21–20:25वो पीछे हटने के बजाए परवार की वनशावली की पुरानी किताब कोलती है
  363. 20:25–20:28और उस में गर्व के सात अपना नाम दरज करती है
  364. 20:28–20:33वो ये साभित करती है के ब्लाक मेल अर्दर का अस्ली जवाब खमोषी नहीं
  365. 20:33–20:37बलकी अपनी पहचान को और भी मस्वुती के साथ स्थापित करना है
  366. 20:37–20:42और फिर इस पूरी चर्चा का सबसे शान्दार और रुंक्ते कडे कर देने वाला पालाता है
  367. 20:42–20:45शोद कर्मी सोम्या रामानातन की मददद से
  368. 20:45–20:49पूल्मती आखिरकार एक लाईप कम्रे के सामने आखर कडी होती है
  369. 20:49–20:53वई फूल्मती जिसे सिस्टम ने कुछलकर सरिफ अपना दिया दा.
  370. 20:53–20:57वो कमरे के लेंस में सीदा देकती है और दंके की चोथ पर केती है,
  371. 20:57–21:00मेरा नाम फूल्मती है. अपना दिया पूल्मती है.
  372. 21:00–21:04ये केवल एक वाक्या नहीं है. ये एक पूरी विवस्ता के खिलाफ,
  373. 21:04–21:08भी ब्ल्वती अपने भीटर के उस खोफ को तोड़कर,
  374. 21:08–21:11अपना पूरा नाम दून्या के समने बूलती हैंध,
  375. 21:11–21:15तो वो दर असल उस पूरी शोषक विवस्ता की बून्याद को हिला देती है.
  376. 21:15–21:18वो सिस्तम की उस्ताकत को चीन लेती है,
  377. 21:18–21:20दर के सायमे पनब ही नहीं सकती.
  378. 21:20–21:21भिलकुल सब है.
  379. 21:21–21:24जब फूल्मती अपने भीतर के उस खोफ को तोडगगर
  380. 21:24–21:27अपना पूरा नाम दून्या के समने बोलती हैंगंग,
  381. 21:27–21:32तो वो दरसल उस पूरी शोषक विवस्ता की बून्याद को हिलादेती है.
  382. 21:32–21:34वो सिस्तम की उस्ताकत को चीन लेती है,
  383. 21:34–21:38जो उसे महेज एक एक user ID में बडलना चाहती थी.
  384. 21:38–21:39क्या बात है?
  385. 21:39–21:43मडलब जब एक पूरा तन्त्र आपको सुर्फ एक आक्डा मान कर ट्रीट कर रहा हो,
  386. 21:43–21:47तब अपना अस्ली नाम जोर से बुलना ही सबसे बड़ी आजादी है.
  387. 21:47–21:49और ज़ेसे पूल्मति अपना नाम पुकारती है,
  388. 21:49–21:50कहानी क्यानुसार,
  389. 21:50–21:53चन्ना काची के उन भूतो की कबड्ट्टी में नहीं उर्जा दोर जाती है,
  390. 21:53–21:56बुद्बा भूथ और उसके सात्थी खुषी से जूम। उगते हैं,
  391. 21:56–21:58किंकि एक अर नाम मिटने से बच्चके आए.
  392. 22:17–22:21तो इस पुरी लंभी और गेरी चर्चा के निष्कर्ष पर गरमाए,
  393. 22:21–22:25तो आज के दोर में इसका क्या मेट्वे, आज हमें कैसी दुनिया में,
  394. 22:25–22:29जहां सुचनाो की बाड है, हर तरफ अप अबलोड है.
  395. 22:29–22:32अज के दोर में इसका क्या मेद्वे, अज हमें कैसी दुन्या में है,
  396. 22:32–22:36जहां सुचनाउ की बाड है, हरत्रफ अप अबलोड है.
  397. 22:36–22:40अज किसी भी वेवस्ता किलिए, काग्जों और दिजिटल सक्रींज के जर्ये,
  398. 22:40–22:43शच को तोडना मरोडना बहुत आसान होगा है.
  399. 22:43–22:47आज हमें गायआप करने किलिये उनी सु अप्तर की तरा नदी में दुबाने की जरुत नहीं है
  400. 22:47–22:50बस एक सरवर से हमारा देटा वडाना है
  401. 22:50–22:52या फिर हमारी यूजर अईटी ब्लोक करनी है
  402. 22:52–22:53ये एक हत्रा बहुत ती वास्तवेख है
  403. 22:53–22:58लेकिन इस खफनाक सचके समानानतर एक बहुत बडी उमीद भी है,
  404. 22:58–23:00जो इस कहानी का मुल सन्देश है.
  405. 23:00–23:02और वो उमीद है,
  406. 23:02–23:06कलेक्तेव मेमरी, यानी समुदायों की समूहिक याद्दाश्त.
  407. 23:06–23:09जब तक वो लोख सम्रिती जिन्दा है,
  408. 23:09–23:11जब तक एरा, मीरा, नन्दा,
  409. 23:11–23:17आरूनी और पूल्मती जैसे लोग बिना दरे सच भोलने का सहास रकते है
  410. 23:17–23:21तब तक कोई भी सिस्टम किसी नाम को पुरी तरह से नहीं मिता सकता
  411. 23:21–23:24सही का, चाई वो 1978्ट्टीन सेवंट्टी येट का नदी का मगर मच हो
  412. 23:24–23:27या आजके जमाने कवो चमकने वाला सक्रीन कमगर मच्छ
  413. 23:28–23:31वो किसी भी नाम को या वजुद को तब ही निगल सकता है
  414. 23:31–23:33जब हम खुद उसे बूलने की जाजद देएं
  415. 23:33–23:36और इसी लिए हमारी अपनी स्म्रिती ही
  416. 23:36–23:40हमारा सबसे बड़ा और सबसे असर्दार हत्यार है
  417. 23:40–23:40बिल्कुल
  418. 23:41–23:43तो इस गेहरी पड़ताल को समाप करने से पहले
  419. 23:43–23:45एक बहुती महतोपुन सवाल है
  420. 23:45–23:47जोम सभी को खुज से पूछना चाहीगे
  421. 23:47–23:49एक पल किलिए, जरा ये कलपना की चीजे
  422. 23:49–23:53अगर कल सुभे उड़ते ही दुनिया का सारा दिजितल देटा
  423. 23:53–23:55रहें के बाउजुद का क्या बच्छेगा?
  424. 23:55–23:59ये कैसा परद्रिष्च आप जो सुचना पर मजबोर कर देता है,
  425. 23:59–24:02कि रहां आप आप आप आखिर है क्या?
  426. 24:02–24:04तो हमारे वजुद का क्या बचेगा?
  427. 24:04–24:08ये एक आँसा परइद्रिश्ख है, जो सुचना पर मजबोर कर देता है,
  428. 24:08–24:10कि हमारी आस्ली पचान आखिर है क्या?
  429. 24:10–24:14व्हुं, क्या इस पूरी दुनिया में हमारे पास कोई अपना
  430. 24:14–24:16तोई अपना ग़ड नारी किल गाँ बचा है
  431. 24:17–24:19किया हमारे आस्पास आसे लोग मोजुद है
  432. 24:19–24:21तो किसी कागज, किसी जिजिटल महर
  433. 24:22–24:24या सक्रीन के महोताज नहीं हूंगे
  434. 24:24–24:26जो सर्फ हमारी कहानी
  435. 24:26–24:27हमारे संगष्
  436. 24:27–24:29और हमारे आस्ली नाम के साहरे
  437. 24:29–24:30हमें याद रख हैंगे
  438. 24:30–24:35या फिर क्या हम भी बस एक और स्क्रीन के मगर मच करने वाला बनकर,
  439. 24:35–24:38इतिहास के नदेरे में हमेशा के लिए गुमनाम हो जैंगे?
  440. 24:38–24:41ये एक आज्सा सवाल है जो सच्मे हमें जोचने पर मजबूर कर देता है.
  441. 24:41–24:45आजकी इस गहन चर्चा का हिस्चा बनने किले बहुत-बहुत द्ड़न्वाद
  442. 24:45–24:48हम जल्दी एक नहीं विशे और एक नहीं परताल के साथ फिर मिलेंगे

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मान लिजे के अचाना किसी दिन मतलब एक बहयाना कागलग जाए, या कोई बड़ा साईबर हमला हो जाए, और बंक कसरा देटा, समपती के कागस, जन्म का प्रमाण पत्र, सब कोछ एक पल में जलकर राक हो जाए, या फिर किसी सर्वर से हमिशाकिले डिलीट होँगाई बलकल, एक दम खाली हाँ तो अगर अम इसे कानोनी नजर्ये से देखें तो उस पल के बाट सरकारी वेवस्त है किले किसी अन्सान का तो कोई वजुदी नहीं रहतान रातो रात एक जीता जागत अनसान महेज एक एक आली पन्ना बन जाता है ये विचारी मतलब अपने आपने एक अजीबसी सेरन पड़ा करता है आपने? ये सच में बेहद खोफनाक विचार है हम मतलब एक आजी दुनिया में रहते हैं ज़ाही ज़ाही लिखती आप यह पर देटाबेस में लगा बस वही परम सत्ते हैं हमें लखता है कि यह जो कागस है यह भी रक्षा करेगा लेकिन रकीकत यह बिलको लूलत भी तो हो सकती है ना कैसे मतलब मतलब जो वेवस्ता अपका नाम कागस पर लिककर आपको एक पहचान देरी है वही वेवस्ता, उस नाम पे एक लाल लकीर कीचकर आपको इतिहाँस से पुरी तरा मिता भी सकती है सही कहाँ. और आजकी हमारी इस गेहन चर्चा का जिसे हम दीप डाईव कहते हैं उसका केंदर भी यही सबसे बडा सवाल है. हमाज इसी कागज विवस्ता और हमारी जो स्मुती है, उसके बीच चल रहे संगर्ष की पर्टों को उदेड मे वाले है. बहुत ये दिल्चास विशे है ये. बलकल. और हमारे पस जो स्रोथ है आज, वो है गजईंद रे ठाखुर दोरा रचित, मैठली उपन्न्यास, गोही सबख, भीच जल समादी का, बाल संस करन. इस चर्चा में हमारा उदेश्ख कोई कहानी सूनाना नहीं, बलकी उस पूरे तन्तर को दिकोड करना है, तो यह जीवन और म्रित्टुकी यह आस्ली परीबाशा है उसको लेकर है. अच्छ? आज्ट! तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो � या फिर जब दिमाग काम करना बन कर दे. जब याई बाते. लेकिन ये कहानी हमे बताती है कि असल मुत वो है ही नहीं. तो फिर असल मुत क्या? असल मुत तब होती है जब किसी दफ्तर में बहिता कोई बाबू अपने सरकारी रजस्चर से आपका नाम मिता देता है जब आपके होने का कोई दस्तबेजी सबूत ही नहीं बच्टाना तब आप सच्छ में मर जाते हैं बापरे! ये तो ये दो बहुती गेहरी बात है और इस विवस्ता की इसी क्रूर्ता को समजने के लिए हमें उस जगा चलना होगा, जहां इस गुरुर्ता का सबसे बड़ा प्रतिकार जन्वे लेता है. एक आसा गाँ है, जिसका नाम है, गड नारी केल. वं, गड नारी केल. हा, यह कोई आम गाँ नहीं है. और यहां के लोग भी कोई आम लोग नहीं है. यहां जो ग्यान और इतिहास है, वो किसी वातनु कुलित लाईब्रेरी की मोटी-मोटी किताबो में दरज नहीं होता. इसके बजाए यहांका सच, मिट्टी में, नदी के पानी में, और वहांकी अड़्टूं दवारा गाई जाने वाले लोग गीतो में सुरक्षित रहता है. बलकोल. अगर गागस को सुझना बलकि उसे सुझना चागस को सुझना इक दादी है, जिने सब लोग बाग गयकर बलाते हैं बागी एक सीक मुझे बडलप इतनी गेरी लगी कि वो सीदे दिमाग परसर करती है औरे हा, बागी यो सीक का जिकर करना तो यहां बहुत जरूरी है वो सिक हाती हैं के कागस, कागस अकसर जूट बोल सकता है इसलि उस पर आख मुंद कर बरोसा नहीं करना जाएए, बलकि उसे सुंगना जाएए. आख, कागस को सुंगना. बडल वो कहती है, कि अगर कागस से मिटीजी गंदाए, तो समजो कि उस में लिखा सच है, वो जमीन से ज़ोडाओा सच है. लेकिन? लेकिन अगर उसी कागस से पैसों की गनना है तो तो बहुत सावदान हो जान जान जान जाईए किुकी वो कागस किसी साजिश का हिस्सा हो सकता है एक दम सही और ये एक बहुती शक्तीशाली रूपक है ये हमें बताता है कि दस्तवेज हमेशा निरपेखष्या नूट्रल नहीं हूते हैं उनके पीछे अकसर सत्ता का लालज का और विवस्ता का अपना कोई अरादा चिपा होता है बलकोल गरनारी केल गाँउकी खास्यत ही यही है, कि ये गाँ उस जूट को पहचान लेता है, जो सच आदिकारेक रेकोट से, यानी कागजों से मिता दिया जाता है, उसे यहां कि लोक स्म्रिती अपने भीतर संजो कर रक्लेती है. और इसका सबसे बड़ा, और में कोंगा सब से जादुई उदारन है, गाँँका वो चनना गाची वाला इस्सा. यानी वो पुराना पेड, जहाँपर एक बहुती अलक तरह की गती विदी होती है. आप भूटो वाली गती विदी. आप यह यह पहले रोंक्ते कड़े कर देने वाल है. वोता किया कि रात के वकत उस पुराने पेड के निचे एक बुडवा बूथ है, उसके नित्रत में गाँके सारे बूथी खड़ा होतें, और और वो कबद्टी खिलतें. जी कबबदी? लिकिन यह कोई ताईमपास यह मनुरन्जन किलि खेला जाने वला खेल नहीं हैं इसका एक बहुती कडा नियम हैं नियम यह है कि जब भी कोई भूथ रेड करने जाता है तो उसे पाले की सीमा चूते वकत किसी आज़े विक्ती का नाम पुकारना होता है जिसे दून्या या ये वेवस्ता पूरी तरे से बूल चूकी है और अगर वो बूथ सही नाम पूकार लेता है तो उस चन्ना गाची पिरपर एक नहीं एक दम ताजी हरी पती उगाती है मतलव इसे नाम बचाओ कबद्दी कहागा या है इस जादूई यातार्थ्वाद के पीछेना एक बहुती टोस तन्त्र काम कर रहें. अगर हम गेराई में जाएं, तो विवस्था का काम क्या है? उन नामो को मिताना जो उसके लिए अस सूविदा जनक है. सईबात हैं लेकिन यह जो भूथ हैं यह अपनी कबद्टी के जर यह उन नामो का लगातार उच्चारन करते रहते हैं वे नामो को हवा में और लोगो की सम्रिती में जिंदा रहते हैं ये एक तरह से हाश्येप पर दखेल देगे लोगो का अपना एक वेकल पिक संग्रे है, जिसे कोई भी सरकारी मोहर या रबस टामप नहीं मिता सकती. औरे वाग, अगर आज की बजाज की बजाचा में समझने की कोशिष करेना, तो ये भूटों की कबद्टी दर सल आज के जमाने के क्लाउट बैकवप या पर ब्लोक्चेन तकनिक कितरही है और ये तुलना बहुत ही सतीक है और इसके पीचे के विग्यान को समजना भी बहुत रोचक हो जाता है आम आब ब्लोक्चेन काम कैसे करता है उस में कोई केंद्री अठारीटी या कोई एक दव्टर नहीं होता जो देटा को अपनी मरजी से बड़ल सके या मिता सके सारा देटा हजारो गल गल क्मपुटरो में एक साथ सेव होता है जिस लिए नोट़्स कैतें भिल्कुल नोट़्स एक दम सभी और गर नारी किल में, हर एक बूथ उस ब्लोक्चेन के एक नोद की तो काम कर रहे है? आप बलकल! जब सरकारी सिस्टम, जो कि मान लिजे एक संटरलाइस धार्ट्डाइव की तरहा है वो किसी मस्दूर का नाम दिलीट कर देता है तो गाँकी ये जो सामूहिक समरती है, वो न भूतो के नेट्वाग के जरी अस्नाम को एक लेजर में हमेशा के लेजर सेव कर लेती है. विवस्ता लाग चाहे वो इस नेट्वाग को रहाग करी नी सकती. और इसी विवस्ता की चालाकी को मात देने किलिए, उसी की बाशा सीखना कितना जरूरी है ये बाद हमे लट्धार ताकृर के किरदार से समझ में आती है लट्धार ताकृर अग, लट्धार ताकृर ने अपने बेटे कमलकान्त को कागस पनना इसलिय नी सिखाया था कि वो कोई बडा विद्वान बन जाए या बेटके दर्षन शास्ट्र पे चर्चा करें तो फिर क्यो से काया? उनो ने उसे पडना इसले से काया क्योंका मानन � thā कि जिसकी मेड नदी कालेती है उसका मुकद्मा कागस कालेता है अफ... ये तो ये बहुती चुबने वाली बात है उसका मुकत्मा कागज खालेता है सच्छ में और इसका सीदा सा आर्ट यही है कि विवास्था का सबसे बड़ा हत्यार उसकी भाशा है उसके कानूनी दावो पेच उसकी दारायं और वो बारी बھरकम आदिकारिक शब्द अगर कोई खरीब किसान है या मज्दूर है और वो जबाशा को नहीं समचता है तो वो ये जानी नि पाएगा कि कब एक मामूली से दिखने वाले कागजने उसकी पुष्तैनी जमीन या उसकी अदिकार को निगल लिया विवावस्ता से लडने के लिए उसकी लिपी को समजना इक अनिवारे हत्यार है दिकुल अनिवारे है और यही बाद हमें सीदा उस गटना की अर लेजाती है जगा ये वेवस था अपने सबसे खोफ नाक रूप में हम सब के सामने आती है हम साल उनिस्वटब्टर की बाट कर रहे हैं जी अँनिस्वट्टर का वोहाज्सा गगगन दीपर एक बहुत बड़े पूलका निरमान चल रहा है, और वहां एक यूवा और एक दम इमान्दार अंजीन्यर है, नन्दारूनी. वो अपनी आखों से देख रहा है, के उस पूरे प्रोज्यक्त में सुरक्षा मानको की दज्यागा लगा इजा रही हैं. अद्जीं अड़ाई जागीजागीएं मज्दूरों को बचाचाने के लिए ना तो सही उपकरन है ना हल्मेट्स है और जो रस्स्या है वो भी जरजर हो चुकी हैं भहुत यी लापर वाईछी ती और बारी बारिश के भीच अखिरकार वही होता है तो उग़ान बारेश अदाब मुसम के कारन, मज्दूर काम चोड़कर अपने अपने अपने गर चलेगाएग. और बस यहीशे कागज अपना काम शुरू करता है. उद्तन्तर कैसे सच को दफनाता है न, उसकी पुरी प्रक्रिया हमें यहान देखने को मिलती है. अगर लाल. और एक आदिकार एक रजिस्टर में दरज कर रहा है, के बारी बारेश और कहराब मोसम के कारन, मज्दौर काम चोड़कर अपने अपने गर चले गया है. औरे. वो लिकता है के कोई बडाहाथ सा हुए ही नी, जबके खोफनाक हकीकत ये ती, के सैक्डो मस्दूर उस उफन्ती हुई नदी में दूप कर मर चुके ते और आप दिखे सरकारी सुची में मरनेवालों का जो अंक्रा दिया गया वो सुझफ तीस था सुझफ तीस जब की आसल में, तीन सुझव मस्दूर उस नदी में सामा गय ते बिलकुल और इस में भी सबसे बड़ा दोका तो महिलाएं के साथ हुएँ उदारन के लिए सर्यु नाम की एक महिला मस्वूर थी उसका नाम उस तीस लोगो की सुची मे भी नहीं था और जानतें कियों? क्यों? क्योंकि वो अपने म्रिद्पती के नाम पर मज्दूरी कर रही थी. तो कागस की नजरो में सर्यों जैसी औरत का तो कोई वजुदी नी तना, वो जीती जाखती अंसान हो कर भी सिस्टम के लिए महाजे खाली स्थान ती. यही तो इस व्यवस्ताका काम करने का तरीका है अगर आपका नाम अदिकारिक रजिस्टर में नहीं है तो फिर आपकी म्रित्यो भी दर्ज नहीं हो सकती आप एक अग्यात आख्डा भी नहीं बन पाते है आप बस भस शुन्नेता में विलीन हो जाते है यहां मुझे थोडा सनचय है, मदलाब नन्दारूनी इस पूरे प्रोजेट का अंजीनेर था, रईट? वो एक पड़ालिखा अंसान था, उसे बहुत अच्छे से पता था, कि हमारी अदालतें कैसे काम करती हैं? अदालत को महर लगेवे कागस चाहीए हुते हैं, चश्मदीद गवाह चाहीए, और एक्दम पुखता सबुच चाहीए. तो आप यह ज़ाज़ी नहीं तो आप बज़ाज़ी नहीं तो आप बज़ाज़ी नहीं तो आप बज़ाज़ी नहीं तो आप बज़ाज़ी नहीं तो आप बज़ाज़ी नहीं तो आप बज़ाज़ी नहीं तो आप बज़ाज़ी नहीं तो आप बज़ाज़ी नहीं तो आ� वो जानता था की अदालत के बाबु इंजूतों और कडों को सबूद माने से साफ पिनकार कर देंगे असल में वो एक आल्तनेटिव आखाईव यानी एक वेकल्पिक दस्तावेस तगयार कर रहा था उस्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट् अप शुची आप कुई भारी चीजी आप कुई अईन्सान गेरी नदी में गिरता है, तो पानी की सता से टक्राने पर एक चबाक की आवाज आती है, लेकिन कुछी पलो में पानी फिर से एक दम शान्त हो जाता है, उन्तीन सो मस्दूरो की मुद्ब उस चबाक की तरहाए तीन, जिसे वेवस्थाने वो जल्दी शान्त कर दिया. बलकुल सही कहा. और इस पूरी तस्वीर को अगर हम थोडे व्यापक रूप से देखेना, तो एक तरफ तो वकील, बतुकनात, हरीहरन, अदर पाल बता जैसे रसुक्दार और ब्रष्ट लोग ते उनके पास सत्ता थी, उनके पास पैसा था और वे कागस के दाओ पेच का इस्तमाल करके सच्को पूरी तरासे मिताने में लगे हुए ते लेकि दूस्री तरव, अकेला नंदारूनी था उस्टे अपनी डाईरी में उन तीन सो मस्टूरों का पूरा सच्छ लिखा, और फिर उसकी तीन प्रतीया बनाईं. जी. एक प्रती उस्टे अपने वकील देवकी नन्दन चोभे को देदी, तुस्री प्रती गडन नारी कल गाँ में आपनी दादी बागे पास सुरक्षिद भिज्वादी और तीस्री प्रती को उसने नदी के किनारे एक पुराने पीपल के पेड की ज़ड में गेरे गार दिया अदालत के माल काने में एक दिन अचानक से बारी बारिश का पानी गुज जाता है बिलकुल और वो पथावा जुता जिसे कच्च्रा समचकर बसे कोने में फेग दिया गया था जब वो पानी से भीखता है तो उस्मिसे एक बारी भून तपकती एं रवाज आती है जब अदलत के माल खाने में एक दिन अचानक से बारी बारीश का पानी गुज जाता है बिलकुल और वो पथावा जूता जिसे कच्रा समचकर बसे कोने में फेग दिया गया था तो उपनी से बीकता है, तो उसमे से एक बारी भून तपकती एक अवाज आती है, चबाक. ये पल यस पूरी कहानी के सबसे ब्रभावीशाली दिश्षो मे से एक है. यह में साव साव बताता है, टट्टे को अप कितने भी सालो तक फाईलों के देर की निचे दबागर रक्टे रहें, वो मरता नहीं हैं. खवी नी मरता. वो बहुती देरे के साथ, बस अपने सही वक्त के आने का अनतिटार करता है. अगदम सही और यही से ये कता एक बहुती आदूनिक और भयानक मोड ले लिती है. समय आगे बड़ता है, दून्या बड़जाती है, और इसी के सात। शोषको का रूभ भी पुरी तरे से बड़जाता है. चन्ना गाची का वो बुडवा भूथ, जो अप तक सिझ नदी के मगर मच्छों को जानता ता, वो देकता है कि दून्या में एक नहीं तरकी परच्छाई आगगगगगगगग. एक आईसी परच्छाई जिसके पैर नहीं है, जो राद के अंदेरे में एक सक्रीन की तरा चमकती है, और और बुज्जाती है. और यही वो सक्रीन का मगर मच है, मतलब अप्राद का तरीका अब सर्फ फाईलो में हेर फिर करने, या मस्दूरो को नदी में दुबाने तक सीमित नहीं रहा है अप शोशर पूरी तरा से दिजितल हो चुका है पहले वाला जो मगर्मच ता वो मस्दूरो का शरीर कहाता ता लेकिन ये जो नया दिजितल मगर्मच है ये अनसानो का बहविष्च उनका स्वाभिमान और अर इंस्टन्ट लों देने वाले एक मोबाईल आप के जाल में फस जाता है. इसके बाद उसके साथ जो होता है, उआज के समय का एक बहुत बडाच सच है. उसे दिजितल अरेस्ट का शिकार बनाय जाता है. तो फोन पर, शक्रीन के उस पार बेटे लोग, नक्ली पुलिस अदिकारी बनकर उसे द्धमकाते हैं और यहां ये समझना बहुत जरूरी है कि ये दिजिटल अरेस्ट अकिर काम कैसे करता है कैसे? देके ये कोई तकनी की हैक नहीं हैं ये सीधे तोर पर अन्सान के मनोविग्यान पर उसकी साइकोलोगी पर हमला है ये जो दोखेबाज होते है ना ये अनसान के भीतर बैटेग दर और उसकी सामाजेग शर्म को अपना सबसे बड़ा हत्यार बनाते हैं उज्वल इतना दर जाता है और समाज में बदनामी के खॉव्फ से इतना ज़ादा शरमिन्दा हुता है, कि वो अपने परवार या पुलिस किसी को भी कुछ नहीं बताता, वो चुप्चाःप अपनी सारी जमा पुंजी लुता देता है, और अंथ्था एक्दम गायब हो जाता है. बाप्रे. अमानवी ये है, जो मानव तसकरी से ज़़ा हूँ है, मदूबनी के रहने वाली बूली बाली लगकी है, फूल्मती. उसे शहर में बहुत अच्छी नोक्री का जासा देकर फसाया जाता है. उसे उसके गर से बहुत दूर लेजाया जाता है. अप्र उसकी पूरी पह्चान को ही व्यवस्तित तरीके से मिता दिया दादा है. अग उसे एक नया बेजान सा कोड नाम देदिया दिया दादा है, FM. मदलप कलपना करना भी सिहरन पेदा करता है, के एक जीती जाकती सास लेती लगकी, जिसके अपने सबने थे, वो सिझ दो अंग्रेजी अक्षरों के एक देटापोईंट में तबदील कर दीजाती है. ये पहचान के चेने जाने के एक जरम रूप है. और जो तीसरा उदारन है, वो हमें एक वेश्विक महामारी के कालक्षन में लेजाता है. अगर आगर समय के साँई जब पूरी दुन्या साँसो के लिए तरस रही है, लोग मर रहे हैं, लेकिन ब्रष्टाचार की जो मशीनरी है, वो इस आबदा मे भी निरबाद रूप से चल रही है. गोप कुमार नाम का एक अडिटर है, जेसे दवाऔ और अक्सिजन वित्रन की जाज का काम सवापा जाता है, जब उआडिट करता है तो उसे काखजो में भ्यानक गभडी दिकती है. एक ही अक्सिजन सिलिंटर को सरकारी लिकोट में 3 लोग गलक जगोपर डिलिवर हूँ दिखाया है. और यही पर आखर, कहानी वाखे यह दिल्चास्प होजाती है. आखर कार समय के सारे सिरे एक साथ जुड जाते है. बलकल, गोप कुमार जब इस अकसिजन गोताले की गेराई में जाता है. पाईलों को खंगालता है. तो उसे एक पुराना कोड मिलता है. अदर दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा दिएगा द अगनीक को अबग्रेट कर लिया है. जो चंद्रपाल, बता, और रागजव सुमानी, जैसे लोग नाईंटिन सेविंट्टी एट में मस्दूरों की लाशों पर मुनाफा कमारहे थे, वही तन्त्र अब महामारी में अक्सुजन के सिलिंदरों का देटा बदिलकर मुनाफा कमारा है दर पेडा करनेवाल दंट्र हमेशा एक ही होता है बस समें के साथ वो नया चोला पहन लिता है लेकिन ये कहानी हमें सरफ निराशा के गरत में चोडती जाँ पीडियो तक शोषन की जड़े इतनी गेरी होती है वही पीडियों तक सत्या को वापस चीनने का संगरष भी जिन्दा रहता है जिसे हम दे रेक्लिमेशन अप ट्रुत कैसकते हैं और ये इस पूरी चरचा का सब से शशक्त हिस्था है बिलकल, सत्या को हमेशा के लिए तो दफनाया नहीं जासकता ना अर इस कता में विद्रों की जो शुरूवात है, वो किसी हिंसक, करानती या हत्यारों से नहीं होती है. ये विद्रों सर्फ अपना अस्ली नाम, बिना दरे उची अवाज में पुकारने से शुरूव होता है. और इसकी गुईंज, हम साथ समंदर पार, अमरिका की मशुर हारवोट यून्टिए में सुनते हैं. वहां व्यापार और मानव्ता विशाय पर एक बला और चम्चमाता होगा कारेक्रम चल रहा है. मंच पर अद्वर्ट ब्रुम नाम का एक बहुत बलाग विदेशी व्यापारी क्हला है. तो आपनी कमपनी के महान विजन और परोपकारी कामो का बखान कर रहा है वो आपनी प्रज्शन्टेशन में विकास के प्रतिक के रूप में उस पुराने गंगापौल की एक तस्वीर दिखाता है अर तभी दर्षको के बीज से एक यूवा लगकी कष्डी होती है ये एईरा है, जो उसी नन्द आरुनी की परपोती है जी वो सेदे मंच कि अर देकती है और ब्रुम से पुष्टी है उननिस्छट्टर के उस पुल हाथ से में जो तींसो मस्धृर मारे गय ते उनका क्या हूँआ? उनके नाम कहा है? उस एक सबाल से उस विशाल वातानुकुलित सबहागार में जु सननाटा चाता है ना वो बहुत कुछ कह देता है. एक असी जगा जो पूरी तरह से वेवस्तित है, पालइश है, ज़ाह सब कोछ एक दम कोरप्रप्रट बाशा में लपेटा हूँँआ है वहां दश्को पूलाना एक ख्रूर सच अपने नंगे रूप में ख़डा हो जाता है एरा का वो भेबाक सवाल इस बात का अकात्या प्रमान है कि गर नारी केल के चन्ना गाची कि वो लोग स्म्रती अब आमेरिका तक पहोट चुकी है. उसे मिताया नहीं जासका है. और थीक यही अदम में साहस, हमें मीरा और फूल्मती के किरदारो में भी देखने को मिलता है. मीरा, जो की कानुन की बहुत अची जानकार है और गोप कुमार के साथ उस दिजिटल गोताले की जान्च में मददद कर रही हैं चंद्रपाल बताका का गिरोज मीरा को रोकने किलिए अपनी सबसे पुरानी चाल चलता है बलाक मेल वे उसे दमकाते हैं कि अगर उसने अपनी जाज बन नहीं की, तो वे उसकी निजी जानकारी और तस्वीरे अपन तर जब निख कर देंगे. एक आम अनसान तो इस थिती में गब राकर पीछे इज़ सकता ताना, किकि बलाक मेल का सीथा वार अनसान के सम्मान पर हुता है. लेकिन मीरा जिसके पास गड नारी केल की अपनी दादी की दीवूई सीक है बाकी सीक बलकुल, वो हार नहीं मानती है वो पीछे हटने के बजाए परवार की वनशावली की पुरानी किताब कोलती है और उस में गर्व के सात अपना नाम दरज करती है वो ये साभित करती है के ब्लाक मेल अर्दर का अस्ली जवाब खमोषी नहीं बलकी अपनी पहचान को और भी मस्वुती के साथ स्थापित करना है और फिर इस पूरी चर्चा का सबसे शान्दार और रुंक्ते कडे कर देने वाला पालाता है शोद कर्मी सोम्या रामानातन की मददद से पूल्मती आखिरकार एक लाईप कम्रे के सामने आखर कडी होती है वई फूल्मती जिसे सिस्टम ने कुछलकर सरिफ अपना दिया दा. वो कमरे के लेंस में सीदा देकती है और दंके की चोथ पर केती है, मेरा नाम फूल्मती है. अपना दिया पूल्मती है. ये केवल एक वाक्या नहीं है. ये एक पूरी विवस्ता के खिलाफ, भी ब्ल्वती अपने भीटर के उस खोफ को तोड़कर, अपना पूरा नाम दून्या के समने बूलती हैंध, तो वो दर असल उस पूरी शोषक विवस्ता की बून्याद को हिला देती है. वो सिस्तम की उस्ताकत को चीन लेती है, दर के सायमे पनब ही नहीं सकती. भिलकुल सब है. जब फूल्मती अपने भीतर के उस खोफ को तोडगगर अपना पूरा नाम दून्या के समने बोलती हैंगंग, तो वो दरसल उस पूरी शोषक विवस्ता की बून्याद को हिलादेती है. वो सिस्तम की उस्ताकत को चीन लेती है, जो उसे महेज एक एक user ID में बडलना चाहती थी. क्या बात है? मडलब जब एक पूरा तन्त्र आपको सुर्फ एक आक्डा मान कर ट्रीट कर रहा हो, तब अपना अस्ली नाम जोर से बुलना ही सबसे बड़ी आजादी है. और ज़ेसे पूल्मति अपना नाम पुकारती है, कहानी क्यानुसार, चन्ना काची के उन भूतो की कबड्ट्टी में नहीं उर्जा दोर जाती है, बुद्बा भूथ और उसके सात्थी खुषी से जूम। उगते हैं, किंकि एक अर नाम मिटने से बच्चके आए. तो इस पुरी लंभी और गेरी चर्चा के निष्कर्ष पर गरमाए, तो आज के दोर में इसका क्या मेट्वे, आज हमें कैसी दुनिया में, जहां सुचनाो की बाड है, हर तरफ अप अबलोड है. अज के दोर में इसका क्या मेद्वे, अज हमें कैसी दुन्या में है, जहां सुचनाउ की बाड है, हरत्रफ अप अबलोड है. अज किसी भी वेवस्ता किलिए, काग्जों और दिजिटल सक्रींज के जर्ये, शच को तोडना मरोडना बहुत आसान होगा है. आज हमें गायआप करने किलिये उनी सु अप्तर की तरा नदी में दुबाने की जरुत नहीं है बस एक सरवर से हमारा देटा वडाना है या फिर हमारी यूजर अईटी ब्लोक करनी है ये एक हत्रा बहुत ती वास्तवेख है लेकिन इस खफनाक सचके समानानतर एक बहुत बडी उमीद भी है, जो इस कहानी का मुल सन्देश है. और वो उमीद है, कलेक्तेव मेमरी, यानी समुदायों की समूहिक याद्दाश्त. जब तक वो लोख सम्रिती जिन्दा है, जब तक एरा, मीरा, नन्दा, आरूनी और पूल्मती जैसे लोग बिना दरे सच भोलने का सहास रकते है तब तक कोई भी सिस्टम किसी नाम को पुरी तरह से नहीं मिता सकता सही का, चाई वो 1978्ट्टीन सेवंट्टी येट का नदी का मगर मच हो या आजके जमाने कवो चमकने वाला सक्रीन कमगर मच्छ वो किसी भी नाम को या वजुद को तब ही निगल सकता है जब हम खुद उसे बूलने की जाजद देएं और इसी लिए हमारी अपनी स्म्रिती ही हमारा सबसे बड़ा और सबसे असर्दार हत्यार है बिल्कुल तो इस गेहरी पड़ताल को समाप करने से पहले एक बहुती महतोपुन सवाल है जोम सभी को खुज से पूछना चाहीगे एक पल किलिए, जरा ये कलपना की चीजे अगर कल सुभे उड़ते ही दुनिया का सारा दिजितल देटा रहें के बाउजुद का क्या बच्छेगा? ये कैसा परद्रिष्च आप जो सुचना पर मजबोर कर देता है, कि रहां आप आप आप आखिर है क्या? तो हमारे वजुद का क्या बचेगा? ये एक आँसा परइद्रिश्ख है, जो सुचना पर मजबोर कर देता है, कि हमारी आस्ली पचान आखिर है क्या? व्हुं, क्या इस पूरी दुनिया में हमारे पास कोई अपना तोई अपना ग़ड नारी किल गाँ बचा है किया हमारे आस्पास आसे लोग मोजुद है तो किसी कागज, किसी जिजिटल महर या सक्रीन के महोताज नहीं हूंगे जो सर्फ हमारी कहानी हमारे संगष् और हमारे आस्ली नाम के साहरे हमें याद रख हैंगे या फिर क्या हम भी बस एक और स्क्रीन के मगर मच करने वाला बनकर, इतिहास के नदेरे में हमेशा के लिए गुमनाम हो जैंगे? ये एक आज्सा सवाल है जो सच्मे हमें जोचने पर मजबूर कर देता है. आजकी इस गहन चर्चा का हिस्चा बनने किले बहुत-बहुत द्ड़न्वाद हम जल्दी एक नहीं विशे और एक नहीं परताल के साथ फिर मिलेंगे

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