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जट-जटिन_और_बारिश_वाली_मेंढक_रस्म.m4a

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Part 9 · VIDEHA MITHILA MAITHILI DISCUSSION CRITICISM SERIES PART 9
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  1. 0:00–0:30विचार-विमर्चना, विचार-विमर्चना, विचार-विमर्चना, विचार-विमर्चना, विचार-विमर्चना, विचार-विमर्चना, विचार-विमर्चना, विचार-विमर्चना, विचार-विमर्चना, विचार-विमर्चना, विचार-विमर्चना, विचार-विमर्
  2. 0:30–1:00या दिदा चीदा सीदा सीदा पंगा लेना हुँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ
  3. 1:00–1:03इपत्रका के एक अच्पर बात कर रहे हैं
  4. 1:03–1:05जो की एक बहतेई श्रोथ है
  5. 1:05–1:06बलकल
  6. 1:06–1:11हमारा ये श्रोथ हमें मित्ला के बेहत दिल्चस्प लोक नातिय
  7. 1:11–1:14जट जटन की दून्या मिले जाता है
  8. 1:14–1:15जट जटन जी
  9. 1:15–1:18तो आजका हमारा मिशन ये समजना है
  10. 1:18–1:21कि कैसे एक सादारन्सा दिखने वाला ये नाटक
  11. 1:21–1:26एक ही साथ वैवाहिक जीवन का यतार्त चित्रन भी है
  12. 1:26–1:29महिलाओ का अपना एक सुरक्षित दाईरा भी है
  13. 1:29–1:32और बारिश बलाने का एक अनुखा अनुष्टान भी हो सकता है
  14. 1:32–1:34बहुत ही कमाल कविष्य है
  15. 1:34–1:39तो ज़िए इसे तोडा समचते हैं, मैं सच में इस बात को लेकर बहुत उट्सूक हूं
  16. 1:39–1:47तो इस नाटक की प्रिक्ष्वूमी को समचना बहुत जरूरी है, क्यूंकी मतलब यह रह में सीदे उस समच के विरोदा बहासों से जोरता है
  17. 1:47–1:49विरोदा बहास, कैसे?
  18. 1:49–1:52दिके है, हम पंद्रवी सदी की बात कर लें है,
  19. 1:52–1:54राजा शिव्सिंक का शासन काल ता.
  20. 1:54–1:56अच्छ, मतलब बग,
  21. 1:56–2:001412 से 1446 आँ़ीस यास पास.
  22. 2:00–2:01भिलकुल सही.
  23. 2:01–2:02और उनके दर्बार में,
  24. 2:02–2:04रानी लखिमा फी,
  25. 2:04–2:07महाकवी विद्यपती जैसे दिगज मोजुद ते.
  26. 2:07–2:09अग, विद्यापती का नाम तो सबने सुनाई है
  27. 2:09–2:11तो उसी दरबार में एक संगीत कार ते
  28. 2:11–2:12जाएत
  29. 2:12–2:14उने विद्यापती के पडों को
  30. 2:14–2:16राग रागनी में बानने का काम सोप आगया था
  31. 2:16–2:19और जाएत नहीं इस जडचतिन नाटक की रचना की
  32. 2:19–2:23और दिल्च्छ बात यहे कि उन्होंने खुद इस में पहले जड्की भूमे कभी निवाए ती
  33. 2:23–2:26औरे वा! मतलब शुर्वात एक पूरुषने की ती
  34. 2:26–2:31आप! लिकिन समें के साथ जो हुवा वो इसका सबसे बड़ा मनो विग्यानिक और सामाजिक पहलू है
  35. 2:31–2:34अगर यही से तो ये कहानी पूरी तरे पलड़ चाती है
  36. 2:34–2:39मतलब एक दरबारी पूरुष ने इस नाटक को लिखा, खुद अभी नैब ही किया
  37. 2:39–2:44लेकिन आजकी तारीक में इस नाटक पर पूरी तरा से महिलागों का एक अदिकार है
  38. 2:44–2:45एक दम सईभात है
  39. 2:45–2:47इसे खेलती केवल स्त्रीया है
  40. 2:47–2:51राद के अंदिरे में, जब समाज की पाबंदिया थोडी दिली पडजाती है,
  41. 2:51–2:54तब महिलाये ही पूरुष परिधान पहनकर जट बनती है.
  42. 2:54–2:56और चीट्दार साडी पहनकर जट पन?
  43. 2:56–3:00आँ, मदलब एक आँसा खेल जिसे पुरुशों ने शूग रहा,
  44. 3:00–3:05वो महिलाँ के लिए अपने ही समाज के नियमो से आजादी का एक सेव सपेस
  45. 3:05–3:09या सुरक्षिद दाईरा कैसे बन गया, मैं ये सोच रहे थी.
  46. 3:09–3:12ये रात और आत नहीं हूँ
  47. 3:12–3:16जब दर्बान की कला गाँँगे आंगनो तक पूशती हैं तो
  48. 3:16–3:17वो आम लोगों की
  49. 3:17–3:19खासकर महिलाँ की अबी वेक्ती का सादन बन जाती है
  50. 3:19–3:20वुँँँ
  51. 3:20–3:23किवक्यों के अई पास तो और कोई माद्धिम तानी
  52. 3:23–3:23बलकों
  53. 3:23–3:25उस्द्ट्ट्टीन उनके लिए वो मंज बन गया
  54. 3:25–3:28चुंकी इस में पूरुशों का प्रवेश पूरी तरा से वरजिद था
  55. 3:28–3:30अचा पूरुश्षे से देग बी नहीं सकते थे
  56. 3:30–3:35इस्ट्ट्टागो जो पूरुशों के बनाए दाचों पर खुलकर वेंगे कर सकती थी
  57. 3:35–3:42तो इसलिये वो पित्र सत्तात्मक समाच के बनाई दाचों पर खुलकर वेंगे कर सकती ती
  58. 3:43–3:47पूरुशका कप्ला पहनकर जत्का किरदार निभाना सिर्फिक अबिनै नहीं ता
  59. 3:47–3:48तो और क्या था?
  60. 3:48–3:53ये उस सत्ता को जो पूर्शों के पास ती उसे कुछ देर के लिए आपने रहात में लेने का एक मनोविग्यानिक तरीका ता
  61. 3:53–3:55मतलब एक तरे का पावापले
  62. 3:55–3:56जी हा, पावापले
  63. 3:57–4:02ये तो किसी भी दबे हुए वर्ग के लिए एक बहुती सचक्त माद्ध्यम है
  64. 4:02–4:10अब अगर हम इसकी कता वस्टूब आए तो नाटक की शुर्वाथ भी एक बहुती बुन्यादी तक्राव से होती है.
  65. 4:10–4:12आँ, जो पती पतनी का तक्राव होता है.
  66. 4:12–4:16बिल्कुल, नविवाहे जटिन की शादी के बाद की पहली वर्षा रितू है.
  67. 4:16–4:46अद्री तो बगर देखादा लगा लगा देखादा लगा देखादा लगा देखादा लगा देखादा लगा देखादा लगा देखादा लगा देखादा लगा देखादा लगा देखादा लगा देखादा लगा देखादा लगा देखादा लगा देखादा लगा देखा�
  68. 4:46–5:16अगर मैखे से कोई आँजा वेक्ती आए जो ससुराल वालों के रुतबे या पेक्षाँँ के अनूरुप नहूं, तो लगकी को मैगे जाने के अनूमने अगर नहुप नहुप नहुप नहुप नहुप नहुप नहुप नहुप नहुप नहुप नहुप नहुप नहुप न
  69. 5:16–5:18अदर सल उस कुटनीती को दरशाता है
  70. 5:18–5:21जब महलाई जानती लिए कि किस रिष्ते का इस दमाल करके
  71. 5:21–5:23वो अपने लिए थोडी रियायत पासकती है
  72. 5:23–5:26मतलप शोटे बहाँई को शाएध ससुराल वाले मनाना कर पाए
  73. 5:26–5:27असा कुच
  74. 5:27–5:29अगर कर के वो अपने लिए तोडी रियायत पासकती हैं
  75. 5:29–5:32मतलप चोटे भाई को शाएध ससुराल वाले मनाना कर पाएं
  76. 5:32–5:33अज़ा कुच
  77. 5:33–5:36चोटा भाई है, बच्चा है, तो शायध दीम छोडी दीले हो जाएं
  78. 5:36–5:39लेकिन जब वो रियायत नहीं मिलती
  79. 5:39–5:42यह दब जद्टन को नहर नहीं जाने दिया जाता
  80. 5:42–5:44तो उसका विरोद करने का तरीका देखिये
  81. 5:44–5:46वो हंगामा नी करती है
  82. 5:46–5:48आँ वो सीडा जगरा नी करती
  83. 5:48–5:50वो केती है के वो जुमर नहीं खेलेगी
  84. 5:50–5:52वो पसीने का बहाना बना लेती है
  85. 5:52–5:54मतलब यह तो बिलकोल वैसा है
  86. 5:54–5:59यह ज़े सब आज के समवे में कोई आजादी चिनने पर पैसेव अग्रैसेव ज़ैं
  87. 5:59–6:00इद्दम सदी कुदारन है ये
  88. 6:00–6:02एक तरे का माँन विरोद एना
  89. 6:02–6:05आप ये माँन विरोद उस समाज की मजबूरी भी था
  90. 6:05–6:07और महिलाँ की रन्नीती भी
  91. 6:07–6:12मदलः जब आप के पास निरने लिने का सीदा अदिकार नहीं होता,
  92. 6:12–6:14तो आप असहियोग का रास्ता पनातें.
  93. 6:14–6:15पस्सिव रेजिस्टन्स.
  94. 6:15–6:18भिल्कुल. जुमर खेलने से मना करना,
  95. 6:18–6:21दर सल उस उट्सव्या खुषी का बहिष्कार है,
  96. 6:21–6:24जिसकी उम्मीद एक नव विवाहित स्त्री से की जाती है
  97. 6:24–6:26की नैनेवेली दुलहन है
  98. 6:26–6:29तो खूश रहे, नाचे, गाए
  99. 6:29–6:31आप वो पसीने का बहाना बनाकर
  100. 6:31–6:34अपनी शारी रिक उपस्तिती तो देरे है
  101. 6:34–6:36लिकन अपनी भावनात्मक भागिदारी वापस ले लेती है
  102. 6:36–7:06अज़ी ये है अज़ी बड़ा अज़ी बड़ा अज़ी बड़ा अज़ी बड़ा अज़ी बड़ा अज़ी बड़ा अज़ी बड़ा अज़ी बड़ा अज़ी बड़ा अज़ी बड़ा अज़ी बड़ा अज़ी बड़ा अज़ी बड़ा अज़ी बड़ा अज़ी बड़ा �
  103. 7:06–7:10तो दान की शीश की नकल कर रही है, इसका क्या मतलब हूँँ?
  104. 7:10–7:14यही तो, यही तो इस लोक नाट्टे की सबसे बडी गेराई है.
  105. 7:15–7:18दान की शीश की टरा चलना कोई सामान ने अबिने नहीं है.
  106. 7:18–7:20तो इसके पीचे क्या सुच थी?
  107. 7:20–7:22दिके, एक क्रिषी प्रदान समाज में
  108. 7:22–7:26महिला के शरीर और जमीन की उर्वारता को एक समान माना जाताता
  109. 7:26–7:28फोर्तिलिती से जोडकर देखा जाताता
  110. 7:28–7:28बलकुल
  111. 7:28–7:31जटिन का दान की शीष की तरा जूकर चलना
  112. 7:31–7:32इस बात का प्रतीक है
  113. 7:32–7:36कि वो उस गर में सम्रुद्दी और अच्छी फसल लेक राएगी
  114. 7:36–7:37अच्छा
  115. 7:37–7:40ये एक समज़ोता है, वो अपना विरोद भी दरस करा रही है,
  116. 7:40–7:43लेकिन साथी समाज में अपनी उप्योगिता,
  117. 7:43–7:47यानी ग्रहस्ती को सम्रुद्द करने की अपनी भूमिका को भी सुएकार कर रही है.
  118. 7:47–7:50आपनी बगा रही है कि मैं जगर का हिस्सा हूँ,
  119. 7:50–7:54मैं सम्रुदी लाओंगी, लेकिन मेरी भी कुछ शर्ते हैं.
  120. 7:54–7:55बलकुल सई.
  121. 7:55–7:57चल ये ये प्रतिकात्मक विवात वो समपन हो गया.
  122. 7:58–8:02लेकिन इसके बाद जो ग्रस्ती की आस्लियत सामने आती है ना,
  123. 8:02–8:03वो सच्मे कमाल की है.
  124. 8:03–8:05हा, हनीमून पीरेट कहतम.
  125. 8:05–8:06एक्दम.
  126. 8:06–8:12अगली सुबह जदन सीदे तोर पर आंगन भोहारने से इंकार कर देती हैं
  127. 8:12–8:17और जद भी कहता है कि कोई भात ने गर की माभेने भोहार लिएंगी
  128. 8:17–8:20यहां तक तो रोमान्स कापी अच्छा चल रहा है
  129. 8:20–8:22लेकिन फिर दिमान डाती है
  130. 8:22–8:52आप तो तो जदन गेहनो की मुँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ�
  131. 8:52–8:56तो जब वो सुनार के गर जाने की बात कहती है,
  132. 8:56–8:58तो वो मजाक में ही सही,
  133. 8:58–9:01लेकिन पूरुष की आर्थिक शम्ता को चुनाती देरे हूती है.
  134. 9:01–9:03कि तुम जे पाल सकते हो या नहीं?
  135. 9:03–9:04जी इक्दम.
  136. 9:04–9:08और इस चुनाती पर जट का जो जवाब होता है,
  137. 9:08–9:12तो मुझे लखता है आजके स्टन्डब कोमडी को भी माद दे दे.
  138. 9:12–9:14आजके अटीश्यूकती पूँड तरक.
  139. 9:14–9:15बिल्ल्कुल जद अटीश्युकती पूँड तरक.
  140. 9:15–9:16जद अटीश्यूकती पूँँड तरक.
  141. 9:16–9:20अद्त अपनी गरीभी करोना रोतेवे कहता है कि उसकतो हाती तक भिग्गया है
  142. 9:20–9:23और अब बस हाती बानने की जनजीर बची है.
  143. 9:23–9:24जो की सपेट जूट है.
  144. 9:24–9:28अप मतलब ये तो एसा हो गया जैसे आज की जमाने में कोई कहे
  145. 9:28–9:32अरे मेरी तो मरसर्टी जब गई बस उसकी चाभी बची है.
  146. 9:32–9:38बलकल वैसा ही, ये हास्यर उस दोर की आर्थिक विसंगतींगों को चिपाने का एक तरीका है.
  147. 9:38–9:41मतलब अपनी नकामी को मजाग में उडाग देना.
  148. 9:41–9:47आपती अपनी पतनी की अपेक्षाँ को पुरा नकर पाने की शर्मिन्दगी को इस बड़े से मजाक की पीचे चिपारा है.
  149. 9:47–10:17अग, नहीं तब आप दश्छाना था आप दश्छाना आप दश्छाना आप दश्छाना आप दश्छाना आप दश्छाना आप दश्छाना आप दश्छाना आप दश्छाना आप दश्छाना आप दश्छाना आप दश्छाना आप दश्छाना आप दश्छाना आप दश्�
  150. 10:17–10:19बलकी महनत और पैसा कमाना दा.
  151. 10:19–10:22कतोर, शारी रिक्स्ट्रम और अर्थोपाजन.
  152. 10:22–10:25आर्थिक यतार्त, हमेशा वेक्तिगद भाँनाव पर हावी होजाता ता.
  153. 10:25–10:27ये सब किनारे हो जाते हैं?
  154. 10:27–10:30ये सब उस समें बेमानी हो जाते हैं
  155. 10:30–10:32जब वसल काटने का समें आता है
  156. 10:32–10:34ये दरशाता है की गरस्ती का आदार
  157. 10:34–10:36केवल प्रेम या नोग जोक नहीं ता
  158. 10:36–10:39बलकी, महनत और पैसा कमाना था
  159. 10:39–10:42कथोर, शारी रिक्स्च्रम और अर्थोपाजन
  160. 10:42–10:46आर्टिक यतार्त, हमेशा वेक्तिगद भाँनाव पर हावी होँजाता ता
  161. 10:46–10:52और जब आर्टिक यतार्त हावी होता है, तो रिष्ते में दरार आना तो तैई ही है
  162. 10:52–10:52एक दम
  163. 10:52–10:56जटिन परिशानो कर कैती है, के जबार गई तो लोटकर नहीं आँँगी
  164. 10:56–10:58अगर पतनी बच्चा पटा नहीं कर पारे है
  165. 10:58–11:00या अगर उद्रो ही है
  166. 11:00–11:05जटन को दर है कि अगर वो गएई तो ज़्ध दूसरी पतनी लियाएगा
  167. 11:06–11:10ये बहुविवा का दर उस समें की महिलाएगो किले कितना बड़ा मानसिक तनाव रहा होगा
  168. 11:10–11:11बहुद बड़ा
  169. 11:12–11:14बहुविवा केवल एक समाजिक प्रतान ही ती
  170. 11:14–11:18ये महिलावो के उपर लटकती एक तलवार थी
  171. 11:18–11:22बलकुल, अगर पतनी बच्चा पटा नहीं कर पारे है
  172. 11:22–11:25या अगर उछ तोडी विद्रो ही है
  173. 11:25–11:28तो समाज पुरष को दूसरी शादी करने की पूरी चूर देता ता
  174. 11:28–11:30जो की बहुती नाएन्साफी ती
  175. 11:30–11:33इसले जटिन का ये दर बहुत बास्तविक है
  176. 11:33–11:36और इसी आर्ठिक और मान्सिक दबाव के भीच
  177. 11:36–11:39नाटक का अगला अद्धय शुरू होता है
  178. 11:39–11:41जान जट को पैसे कमाने किलिए
  179. 11:41–11:43गर चोडकर मुरंग जाना परता है
  180. 11:43–11:45अग, मुरंग
  181. 11:45–11:47मतलम नेपाल की तराई के लाका
  182. 11:47–11:51मित्लाक शेत्र में जब भाएड या सुखे के कारन खेती चोपपट हो जाती ती
  183. 11:51–11:56तो पूर्षों को रोसगार किलिये निपाल के गने जंगलों और तराई वाले इलाके
  184. 11:56–11:59यानी मोरंग की तरव पलायन करना परता था
  185. 11:59–12:00अं! माइग्रेश्चन
  186. 12:00–12:01जी!
  187. 12:01–12:03अर ये पलायन परिवारों को तोड देता था
  188. 12:03–12:06जट का मोरंग जाना नाटक में विरे है
  189. 12:06–12:10और आलगाओ का एक बहुत ही पीड़ा दायक समें लिक राता है
  190. 12:10–12:12जहां स्त्री गर में अकेली है
  191. 12:12–12:17और उसे कईटरा की सामाजिक चुनोतियों का अकेले साम्ला करना है
  192. 12:17–12:20अगर था बदी की सुन्टरता और गुनो का बखान कर के सुनार को बापस बिज देती है
  193. 12:20–12:23यहा मुझे थोडा विरोदा भास लकता है
  194. 12:23–12:27मतलब जिस नाटक को महिलाएगों का सुरक्षिट दाईरा
  195. 12:27–12:30और पित्री सथता के खिलाएग एक मंच्छ भाँश बाप्टीग
  196. 12:30–12:32यह दो गेनो का लालज दिता है,
  197. 12:32–12:34लिक जत्टिन उस प्रलोब हन को तुक्रा दिती है.
  198. 12:34–12:36उल्टा आपने पती की सुद्दरता
  199. 12:36–12:38और गुनो का बहान कर के,
  200. 12:38–12:40सुनार को वापस बिष दिती है.
  201. 12:40–12:42यहां मुझे थोडा विरोदा भास लकता है.
  202. 12:42–12:44मतलब, जिस नाटक को
  203. 12:44–12:49अद्रवी सदी के समाज के भीतर रहे कर अपनी बात कैने का एक तरीका था
  204. 12:49–12:55जटिन का सुनार को खुक्राना सुभ पती के प्रत्ताट्ता के खुलाग एक मंज बताया गया
  205. 12:55–12:58वही नाटक अनततह एक आदर्ष निष्ठावान पतनी की च्ववी को ही क्यूं बडावा दे रहे
  206. 13:14–13:17अगर उदर सल अपने आत्मसम्मान की रक्षा है
  207. 13:17–13:20उज़ समाज में अगर उच्णार के साथ जाती
  208. 13:20–13:23तो उसे स्वतन्तर नहीं माना जाता
  209. 13:23–13:25बल कि उसका समाज एक भहिषकार हो जाता
  210. 13:25–13:27अट्कास्ट कर दिया जाता उसे
  211. 13:27–13:57तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो �
  212. 13:57–14:00तो उनके भीचे एक भ्यानक जग़़़ा हो जाड़ है.
  213. 14:00–14:01उचोकी वल जग़ा.
  214. 14:01–14:02भिलकोल.
  215. 14:02–14:04और जग़े की वज़ा क्या है?
  216. 14:04–14:06जद अनजाने में या गुस्से में
  217. 14:06–14:10जटिन को एक चोटी सी बास की तोकरी
  218. 14:10–14:12जिसे चोकी कहते है
  219. 14:12–14:13उसे चूदेता है.
  220. 14:13–14:43अगई बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी �
  221. 14:43–15:13अगर बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बा
  222. 15:13–15:15जब अपनो से सम्मान नहीं मिलताना
  223. 15:15–15:18तो चोटा सत्रिसकार भी एक विस्फोट का रूब लेलता है
  224. 15:18–15:21दबी भी बहावनाए बहाज आजाती है
  225. 15:21–15:24जटन का गर चोरना दर सल यह एह आजास दिलाने गले गगे
  226. 15:24–15:27उसके बना जद के जीवन और उस गर का कोई वजुद नहीं है
  227. 15:27–15:30और नाटक में ये वजुद मिट्तावा दिकता भी है
  228. 15:30–15:31ये लिक्ल दिकता है
  229. 15:31–15:32जब जटिन चली जाती है
  230. 15:32–15:37तो जट के गर का दिश्छे बहुती प्रतीक आत्मक हो जाता है
  231. 15:37–15:38गर में जाले लग जाते है
  232. 15:38–15:41और आंगन में दूब उगाती है
  233. 15:41–15:43यो जाले और दूप हैं ये उपेखषा वेवस्ता
  234. 15:43–15:46और शुन्निता के बहुती मस्बूत लोग प्रतीक है
  235. 15:46–15:47मतलप सब कुछ भी कर गया
  236. 15:47–15:49आप ये द्रिष्च दर्ष्गो को बताता है
  237. 15:49–15:51कि औरत केवल गर का खाम नहीं करती
  238. 15:51–15:56वो गर की आत्मा है, उसके बिना गर स्वेख खंड़र बन जाता है
  239. 15:56–15:58आप फिर जट को अकल आती है
  240. 15:58–16:02भिलकुल, जट को इस शुन्निता का अह्सास होता है
  241. 16:02–16:04उसका पूर्शार्त और एहंकार तूट ता है
  242. 16:04–16:07और वो जटिन को मनाने निकल परता है
  243. 16:07–16:09और मनाने के ज़ड जो करता है
  244. 16:09–16:11वो फिर से जंडरूल्स को पलड़ग देता है
  245. 16:11–16:13जी, भेश बडलने वाला हिस्चा
  246. 16:13–16:16आँ, वो जटिन के खोज में कभी गोपी
  247. 16:16–16:18तो कभी मनिहारन का भेश बडलता है
  248. 16:18–16:22एक पूरुष का अपनी रूट्टीवे पतनी को मनाने के लिए
  249. 16:22–16:26वो समच चुका है के पूरुशके हैंकार के सात वो जटिन को वापस नहीं लासकता
  250. 16:26–16:30उसे उसके स्तर उसकी समवेदना हो को समजना होगा
  251. 16:30–16:34जब वो अपना हैंकार त्याकता है, तब ही उनका पुनर मिलन संबभ हो पाता है
  252. 16:34–16:36उस्तर उसकी समवेदनावो को समजना होगा
  253. 16:37–16:39जब वो अपना हंकार त्याकता है
  254. 16:39–16:41तब ही उनका पुनर मिलन संबख हो पाता है
  255. 16:42–16:43इस तरह नहर की जिट से लेकर
  256. 16:44–16:47आर्थिक संगर्ष, विरहा, प्रलोबन, जग्डा
  257. 16:47–16:48और फिर से मिलन
  258. 16:48–16:50ये पुरा वेवाहेक चक्र पूरा हो जाते है
  259. 16:50–16:53ये पूरा नातक ये पूरा वेवाहेक चक्र को दर्षाता है
  260. 16:53–16:57ये तो किसी भी रिष्ते का एक पूरा जीवन चक्र है
  261. 16:57–16:59लेकिन यहा कहनी खत्म नहीं होती
  262. 16:59–17:01आप, अस्ली तूस तो अबाता है
  263. 17:01–17:06और सच कहुं तो जो स्रोथ सामगरी में आगे दिया गया है
  264. 17:06–17:08उसने तो मेरी दमाग के तारी हिला दिये
  265. 17:08–17:10वो मेडख वाला अनुश्ठान
  266. 17:10–17:10हाँ
  267. 17:10–17:14मददब एक पूरी वैवाहेक प्रेम और विरहके कता
  268. 17:14–17:16अचानक से एक अनुश्ठान में बड़ल जाती है
  269. 17:16–17:20वही अनुश्टान जिसका हम बिलकुल शुर्वात में जिकर किया था
  270. 17:20–17:20बिलकुल
  271. 17:20–17:22महलाए एक मेड़क पक्रती है,
  272. 17:22–17:25उसे तूटे गड़े मेरखकर कुटती है,
  273. 17:25–17:29और उसे गाँ की सबसे जग्डालु महला के दर्वाजे पर फेख आती है.
  274. 17:29–17:36अग, मेरा सवल यहे की एक प्रेम कता का अंथ, इस अजीबो गरीब जादू तोने जैसे क्रित्ते से क्यो हो रहा है?
  275. 17:37–17:42क्योंकि लोग परमपरावो में कला जीवन और प्रक्रती कभी अलगलग लगनी होते.
  276. 17:42–17:43सब जुडे होते.
  277. 17:43–17:44अच्छा कैसे?
  278. 17:44–17:47या अनुश्ठान अगर बारिष नहीं भी बार्बाद हो जाएगी
  279. 17:47–17:49अगर पसल बार्बाद हो यह तो
  280. 17:49–17:51विद्टिक जादू का एक बहत्री नुदारने
  281. 17:51–17:52सिमपतेटेक माजिक
  282. 17:52–17:53मतलब
  283. 17:53–17:55इसके पीछे का विग्यानिया तर्क
  284. 17:55–17:56जो समय के लोग मानते ते
  285. 17:56–17:57वो यह था
  286. 17:57–17:59के जैसी क्रिया होगी
  287. 17:59–18:01वैसी ही प्राक्रितिक प्रतिक रिया होगी
  288. 18:01–18:02मतलब अगर आप
  289. 18:02–18:07आददरती पर कुछ वैसा ही महोल बनाए, तो प्रक्रती भी वैसा ही बड़ताव करेगी.
  290. 18:07–18:12आदद बलक्ल अब दिके सावन भादो में आगर बारिष नहीं हो रही है, तो फसल बरभाद हो जाएगी.
  291. 18:12–18:14आद आगर फसल बरभाद हो गी तो?
  292. 18:14–18:16तो फिर से पुर्षों को मुरंजाना पडेगा
  293. 18:16–18:19औग! फिर से विरहे का चक्र शूग जाएगा
  294. 18:19–18:20यह खल!
  295. 18:20–18:22एसले बारिष बलाना उनकी सबसे बडी जरूड़त थी
  296. 18:22–18:25अब लोक विष्वास यह था के जब वो जग्डालू स्त्री
  297. 18:25–18:27सुबे अपने दर्वाजे पर मरेवरे मिनहक को देखेगी
  298. 18:27–18:30तो उसका पारा साथवे आस्मान पर पहुट जाएगा
  299. 18:30–18:34एक दम, वो जोर जोर से गालिया देगी, चीखेगी चिल लाएगी
  300. 18:34–18:37तो मानिता यह थी कि उस स्त्री का क्रोद
  301. 18:37–18:39औसकी आवार जितनी तेज होगी
  302. 18:39–18:42आस्मान में बादलो की गड़ग़ाहात और भारिष उतनी ही देज होगी.
  303. 18:42–18:44और वाए ये तो अदबुत है.
  304. 18:44–18:48मतलभ उनो ने एक महीला के विक्तिगत क्रोद
  305. 18:48–18:53और उसकी भावात्मक उर्जा को सीदे प्रक्रती की उर्जा
  306. 18:53–18:55बादलो और बारिष से जोड दिया.
  307. 18:55–18:59यही लोक कलाओ की वो बडी तस्वीर है, जिसे हम अकसर अंदेखा करनेते हैं
  308. 18:59–19:02अंबस उसे नाजकाना समच लेते हैं
  309. 19:02–19:05आप लेकिन जरजिटन किवल एक वैवाहिक नाटक नहीं ता
  310. 19:05–19:11ये क्रिषी किलिए बारिश बुलाने की एक सामूहिक और लोक परमपरागत क्रिया थी
  311. 19:11–19:13जिस में सब कुछ शामिल ता
  312. 19:13–19:18जी, इस में मनोरनजन भी था, समाज की सच्चायों पर टिपनी भी थी,
  313. 19:18–19:22और प्रक्रिती के साथ ताल्मेल बिठाने का, एक बहुती उननत नजर्या भी था.
  314. 19:22–19:27और स्रोथ में ना, एक और बहुती दिल्चस बात का जिक्र है.
  315. 19:27–19:28कोंसी?
  316. 19:28–19:34नाटक के बीच में अचानक से मुख्य कहानी रोकती जाती थी और कुछ स्वांग रचे जाते थे
  317. 19:34–19:36रहा है, स्वांग वाला हिस्चा
  318. 19:36–19:40जैसे अचानक किसी रोगी के एलाज का अबहिने शुरू हो जाना
  319. 19:40–19:44ये क्यू क्या जाता था? कहानी के बीच में इसका क्या काम?
  320. 19:44–19:49यह स्वांक दर सल कम्युनिटी खेरेपी यह सामोइक चिकिच्च्चा का काम करते थे
  321. 19:49–19:50कम्युनिटी खेरेपी
  322. 19:50–19:55प्या, सोच यह उस समय ना तो कोई अस्पताल थे, नहीं कोई मनोवे गयानिक होते थे
  323. 19:55–19:59किसी बिमारी के पहलने का दर, यह किसी अंदविष्वास का खोफ
  324. 19:59–20:29अगर बज़ाग बज़ाग बज़ाग बबज़ाग बबज़ाग बज़ाग बज़ाग बज़ाग बज़ाग बज़ाग बज़ाग बज़ाग बज़ाग बज़ाग बज़ाग बज़ाग बज़ाग बज़ाग बज़ाग बज़ाग बज़ाग बज़ाग बज़ाग बज़ा
  325. 20:29–20:37अपने दर को एक सुरक्ष्ट दाईरे में प्रोसेस करना ताकी असल जिंदगी में आप उसका सामना कर सके.
  326. 20:37–20:39एक दम सही कहा अपने.
  327. 20:39–20:45इस पूरी चर्चाने सच में पंद्रवी सदिक्यों महिलाओ के जीवन को देखने का नजर्या ही बडल दिया है.
  328. 20:45–20:47भी यही बडल दिया है. मेरा भी यही मानना है.
  329. 20:47–20:51बतलब उनो अपने अकेले पन, अपने आर्थिक असुरक्षा,
  330. 20:51–20:54सोतेन के दर, और यहां तक की सुके के दर को भी
  331. 20:54–20:57एक कला और अनुश्ठान में बडल दिया.
  332. 20:57–20:59जो की बहुत बढी बाद है. बिल्कुल.
  333. 20:59–21:06तो आजके स्विस्त्रित विष्लेशन को खटम करने से पहले स्रोथ सामगरी के आदार पर मैं एक विचार चोडना चाती हूँ।
  334. 21:06–21:07जी बताएए
  335. 21:07–21:37अब दर बद़ग बावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावा�
  336. 21:37–21:40यह उद्यास सर्फ राजाँ की तारीखे नहीं है
  337. 21:41–21:44ये उन गुमनाम महलाव की आवाज भी है,
  338. 21:44–21:47जो आज भी हमारे अंदर कही ना कही गूँज रही है
  339. 21:47–21:51या क्या वो सोचल मीट्या पर परफेख दिखने का तनाव होगा
  340. 21:51–21:53या वोर्क लाइप बलान्स की जद्डो जहेद होगी
  341. 21:53–21:54सोचने वाली बात है
  342. 21:54–21:55बिल्कुल
  343. 21:55–21:58इतिहाज सर्फ राजागो की तारीखे नहीं है
  344. 21:58–21:59वुँँ
  345. 21:59–22:02ये उन गुमनाम महिलाओ की आवास भी है
  346. 22:02–22:05जो आज भी हमारे अंदर कही ना कही गूँज रही है
  347. 22:05–22:05एक दम सही
  348. 22:05–22:10तो आजके जेहन चर्चा में हमाइ सजुदने के लिए बहुत बहुत द्श्वाद
  349. 22:10–22:15अगली बार एक ने विशय के साथ फिर उत्रेंगे कुछ आज़े ही अंच्वे पहलुओं की गेराई में

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विचार-विमर्चना, विचार-विमर्चना, विचार-विमर्चना, विचार-विमर्चना, विचार-विमर्चना, विचार-विमर्चना, विचार-विमर्चना, विचार-विमर्चना, विचार-विमर्चना, विचार-विमर्चना, विचार-विमर्चना, विचार-विमर् या दिदा चीदा सीदा सीदा पंगा लेना हुँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ इपत्रका के एक अच्पर बात कर रहे हैं जो की एक बहतेई श्रोथ है बलकल हमारा ये श्रोथ हमें मित्ला के बेहत दिल्चस्प लोक नातिय जट जटन की दून्या मिले जाता है जट जटन जी तो आजका हमारा मिशन ये समजना है कि कैसे एक सादारन्सा दिखने वाला ये नाटक एक ही साथ वैवाहिक जीवन का यतार्त चित्रन भी है महिलाओ का अपना एक सुरक्षित दाईरा भी है और बारिश बलाने का एक अनुखा अनुष्टान भी हो सकता है बहुत ही कमाल कविष्य है तो ज़िए इसे तोडा समचते हैं, मैं सच में इस बात को लेकर बहुत उट्सूक हूं तो इस नाटक की प्रिक्ष्वूमी को समचना बहुत जरूरी है, क्यूंकी मतलब यह रह में सीदे उस समच के विरोदा बहासों से जोरता है विरोदा बहास, कैसे? दिके है, हम पंद्रवी सदी की बात कर लें है, राजा शिव्सिंक का शासन काल ता. अच्छ, मतलब बग, 1412 से 1446 आँ़ीस यास पास. भिलकुल सही. और उनके दर्बार में, रानी लखिमा फी, महाकवी विद्यपती जैसे दिगज मोजुद ते. अग, विद्यापती का नाम तो सबने सुनाई है तो उसी दरबार में एक संगीत कार ते जाएत उने विद्यापती के पडों को राग रागनी में बानने का काम सोप आगया था और जाएत नहीं इस जडचतिन नाटक की रचना की और दिल्च्छ बात यहे कि उन्होंने खुद इस में पहले जड्की भूमे कभी निवाए ती औरे वा! मतलब शुर्वात एक पूरुषने की ती आप! लिकिन समें के साथ जो हुवा वो इसका सबसे बड़ा मनो विग्यानिक और सामाजिक पहलू है अगर यही से तो ये कहानी पूरी तरे पलड़ चाती है मतलब एक दरबारी पूरुष ने इस नाटक को लिखा, खुद अभी नैब ही किया लेकिन आजकी तारीक में इस नाटक पर पूरी तरा से महिलागों का एक अदिकार है एक दम सईभात है इसे खेलती केवल स्त्रीया है राद के अंदिरे में, जब समाज की पाबंदिया थोडी दिली पडजाती है, तब महिलाये ही पूरुष परिधान पहनकर जट बनती है. और चीट्दार साडी पहनकर जट पन? आँ, मदलब एक आँसा खेल जिसे पुरुशों ने शूग रहा, वो महिलाँ के लिए अपने ही समाज के नियमो से आजादी का एक सेव सपेस या सुरक्षिद दाईरा कैसे बन गया, मैं ये सोच रहे थी. ये रात और आत नहीं हूँ जब दर्बान की कला गाँँगे आंगनो तक पूशती हैं तो वो आम लोगों की खासकर महिलाँ की अबी वेक्ती का सादन बन जाती है वुँँँ किवक्यों के अई पास तो और कोई माद्धिम तानी बलकों उस्द्ट्ट्टीन उनके लिए वो मंज बन गया चुंकी इस में पूरुशों का प्रवेश पूरी तरा से वरजिद था अचा पूरुश्षे से देग बी नहीं सकते थे इस्ट्ट्टागो जो पूरुशों के बनाए दाचों पर खुलकर वेंगे कर सकती थी तो इसलिये वो पित्र सत्तात्मक समाच के बनाई दाचों पर खुलकर वेंगे कर सकती ती पूरुशका कप्ला पहनकर जत्का किरदार निभाना सिर्फिक अबिनै नहीं ता तो और क्या था? ये उस सत्ता को जो पूर्शों के पास ती उसे कुछ देर के लिए आपने रहात में लेने का एक मनोविग्यानिक तरीका ता मतलब एक तरे का पावापले जी हा, पावापले ये तो किसी भी दबे हुए वर्ग के लिए एक बहुती सचक्त माद्ध्यम है अब अगर हम इसकी कता वस्टूब आए तो नाटक की शुर्वाथ भी एक बहुती बुन्यादी तक्राव से होती है. आँ, जो पती पतनी का तक्राव होता है. बिल्कुल, नविवाहे जटिन की शादी के बाद की पहली वर्षा रितू है. अद्री तो बगर देखादा लगा लगा देखादा लगा देखादा लगा देखादा लगा देखादा लगा देखादा लगा देखादा लगा देखादा लगा देखादा लगा देखादा लगा देखादा लगा देखादा लगा देखादा लगा देखादा लगा देखा� अगर मैखे से कोई आँजा वेक्ती आए जो ससुराल वालों के रुतबे या पेक्षाँँ के अनूरुप नहूं, तो लगकी को मैगे जाने के अनूमने अगर नहुप नहुप नहुप नहुप नहुप नहुप नहुप नहुप नहुप नहुप नहुप नहुप नहुप न अदर सल उस कुटनीती को दरशाता है जब महलाई जानती लिए कि किस रिष्ते का इस दमाल करके वो अपने लिए थोडी रियायत पासकती है मतलप शोटे बहाँई को शाएध ससुराल वाले मनाना कर पाए असा कुच अगर कर के वो अपने लिए तोडी रियायत पासकती हैं मतलप चोटे भाई को शाएध ससुराल वाले मनाना कर पाएं अज़ा कुच चोटा भाई है, बच्चा है, तो शायध दीम छोडी दीले हो जाएं लेकिन जब वो रियायत नहीं मिलती यह दब जद्टन को नहर नहीं जाने दिया जाता तो उसका विरोद करने का तरीका देखिये वो हंगामा नी करती है आँ वो सीडा जगरा नी करती वो केती है के वो जुमर नहीं खेलेगी वो पसीने का बहाना बना लेती है मतलब यह तो बिलकोल वैसा है यह ज़े सब आज के समवे में कोई आजादी चिनने पर पैसेव अग्रैसेव ज़ैं इद्दम सदी कुदारन है ये एक तरे का माँन विरोद एना आप ये माँन विरोद उस समाज की मजबूरी भी था और महिलाँ की रन्नीती भी मदलः जब आप के पास निरने लिने का सीदा अदिकार नहीं होता, तो आप असहियोग का रास्ता पनातें. पस्सिव रेजिस्टन्स. भिल्कुल. जुमर खेलने से मना करना, दर सल उस उट्सव्या खुषी का बहिष्कार है, जिसकी उम्मीद एक नव विवाहित स्त्री से की जाती है की नैनेवेली दुलहन है तो खूश रहे, नाचे, गाए आप वो पसीने का बहाना बनाकर अपनी शारी रिक उपस्तिती तो देरे है लिकन अपनी भावनात्मक भागिदारी वापस ले लेती है अज़ी ये है अज़ी बड़ा अज़ी बड़ा अज़ी बड़ा अज़ी बड़ा अज़ी बड़ा अज़ी बड़ा अज़ी बड़ा अज़ी बड़ा अज़ी बड़ा अज़ी बड़ा अज़ी बड़ा अज़ी बड़ा अज़ी बड़ा अज़ी बड़ा अज़ी बड़ा � तो दान की शीश की नकल कर रही है, इसका क्या मतलब हूँँ? यही तो, यही तो इस लोक नाट्टे की सबसे बडी गेराई है. दान की शीश की टरा चलना कोई सामान ने अबिने नहीं है. तो इसके पीचे क्या सुच थी? दिके, एक क्रिषी प्रदान समाज में महिला के शरीर और जमीन की उर्वारता को एक समान माना जाताता फोर्तिलिती से जोडकर देखा जाताता बलकुल जटिन का दान की शीष की तरा जूकर चलना इस बात का प्रतीक है कि वो उस गर में सम्रुद्दी और अच्छी फसल लेक राएगी अच्छा ये एक समज़ोता है, वो अपना विरोद भी दरस करा रही है, लेकिन साथी समाज में अपनी उप्योगिता, यानी ग्रहस्ती को सम्रुद्द करने की अपनी भूमिका को भी सुएकार कर रही है. आपनी बगा रही है कि मैं जगर का हिस्सा हूँ, मैं सम्रुदी लाओंगी, लेकिन मेरी भी कुछ शर्ते हैं. बलकुल सई. चल ये ये प्रतिकात्मक विवात वो समपन हो गया. लेकिन इसके बाद जो ग्रस्ती की आस्लियत सामने आती है ना, वो सच्मे कमाल की है. हा, हनीमून पीरेट कहतम. एक्दम. अगली सुबह जदन सीदे तोर पर आंगन भोहारने से इंकार कर देती हैं और जद भी कहता है कि कोई भात ने गर की माभेने भोहार लिएंगी यहां तक तो रोमान्स कापी अच्छा चल रहा है लेकिन फिर दिमान डाती है आप तो तो जदन गेहनो की मुँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ� तो जब वो सुनार के गर जाने की बात कहती है, तो वो मजाक में ही सही, लेकिन पूरुष की आर्थिक शम्ता को चुनाती देरे हूती है. कि तुम जे पाल सकते हो या नहीं? जी इक्दम. और इस चुनाती पर जट का जो जवाब होता है, तो मुझे लखता है आजके स्टन्डब कोमडी को भी माद दे दे. आजके अटीश्यूकती पूँड तरक. बिल्ल्कुल जद अटीश्युकती पूँड तरक. जद अटीश्यूकती पूँँड तरक. अद्त अपनी गरीभी करोना रोतेवे कहता है कि उसकतो हाती तक भिग्गया है और अब बस हाती बानने की जनजीर बची है. जो की सपेट जूट है. अप मतलब ये तो एसा हो गया जैसे आज की जमाने में कोई कहे अरे मेरी तो मरसर्टी जब गई बस उसकी चाभी बची है. बलकल वैसा ही, ये हास्यर उस दोर की आर्थिक विसंगतींगों को चिपाने का एक तरीका है. मतलब अपनी नकामी को मजाग में उडाग देना. आपती अपनी पतनी की अपेक्षाँ को पुरा नकर पाने की शर्मिन्दगी को इस बड़े से मजाक की पीचे चिपारा है. अग, नहीं तब आप दश्छाना था आप दश्छाना आप दश्छाना आप दश्छाना आप दश्छाना आप दश्छाना आप दश्छाना आप दश्छाना आप दश्छाना आप दश्छाना आप दश्छाना आप दश्छाना आप दश्छाना आप दश्छाना आप दश्� बलकी महनत और पैसा कमाना दा. कतोर, शारी रिक्स्ट्रम और अर्थोपाजन. आर्थिक यतार्त, हमेशा वेक्तिगद भाँनाव पर हावी होजाता ता. ये सब किनारे हो जाते हैं? ये सब उस समें बेमानी हो जाते हैं जब वसल काटने का समें आता है ये दरशाता है की गरस्ती का आदार केवल प्रेम या नोग जोक नहीं ता बलकी, महनत और पैसा कमाना था कथोर, शारी रिक्स्च्रम और अर्थोपाजन आर्टिक यतार्त, हमेशा वेक्तिगद भाँनाव पर हावी होँजाता ता और जब आर्टिक यतार्त हावी होता है, तो रिष्ते में दरार आना तो तैई ही है एक दम जटिन परिशानो कर कैती है, के जबार गई तो लोटकर नहीं आँँगी अगर पतनी बच्चा पटा नहीं कर पारे है या अगर उद्रो ही है जटन को दर है कि अगर वो गएई तो ज़्ध दूसरी पतनी लियाएगा ये बहुविवा का दर उस समें की महिलाएगो किले कितना बड़ा मानसिक तनाव रहा होगा बहुद बड़ा बहुविवा केवल एक समाजिक प्रतान ही ती ये महिलावो के उपर लटकती एक तलवार थी बलकुल, अगर पतनी बच्चा पटा नहीं कर पारे है या अगर उछ तोडी विद्रो ही है तो समाज पुरष को दूसरी शादी करने की पूरी चूर देता ता जो की बहुती नाएन्साफी ती इसले जटिन का ये दर बहुत बास्तविक है और इसी आर्ठिक और मान्सिक दबाव के भीच नाटक का अगला अद्धय शुरू होता है जान जट को पैसे कमाने किलिए गर चोडकर मुरंग जाना परता है अग, मुरंग मतलम नेपाल की तराई के लाका मित्लाक शेत्र में जब भाएड या सुखे के कारन खेती चोपपट हो जाती ती तो पूर्षों को रोसगार किलिये निपाल के गने जंगलों और तराई वाले इलाके यानी मोरंग की तरव पलायन करना परता था अं! माइग्रेश्चन जी! अर ये पलायन परिवारों को तोड देता था जट का मोरंग जाना नाटक में विरे है और आलगाओ का एक बहुत ही पीड़ा दायक समें लिक राता है जहां स्त्री गर में अकेली है और उसे कईटरा की सामाजिक चुनोतियों का अकेले साम्ला करना है अगर था बदी की सुन्टरता और गुनो का बखान कर के सुनार को बापस बिज देती है यहा मुझे थोडा विरोदा भास लकता है मतलब जिस नाटक को महिलाएगों का सुरक्षिट दाईरा और पित्री सथता के खिलाएग एक मंच्छ भाँश बाप्टीग यह दो गेनो का लालज दिता है, लिक जत्टिन उस प्रलोब हन को तुक्रा दिती है. उल्टा आपने पती की सुद्दरता और गुनो का बहान कर के, सुनार को वापस बिष दिती है. यहां मुझे थोडा विरोदा भास लकता है. मतलब, जिस नाटक को अद्रवी सदी के समाज के भीतर रहे कर अपनी बात कैने का एक तरीका था जटिन का सुनार को खुक्राना सुभ पती के प्रत्ताट्ता के खुलाग एक मंज बताया गया वही नाटक अनततह एक आदर्ष निष्ठावान पतनी की च्ववी को ही क्यूं बडावा दे रहे अगर उदर सल अपने आत्मसम्मान की रक्षा है उज़ समाज में अगर उच्णार के साथ जाती तो उसे स्वतन्तर नहीं माना जाता बल कि उसका समाज एक भहिषकार हो जाता अट्कास्ट कर दिया जाता उसे तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो � तो उनके भीचे एक भ्यानक जग़़़ा हो जाड़ है. उचोकी वल जग़ा. भिलकोल. और जग़े की वज़ा क्या है? जद अनजाने में या गुस्से में जटिन को एक चोटी सी बास की तोकरी जिसे चोकी कहते है उसे चूदेता है. अगई बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी � अगर बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बा जब अपनो से सम्मान नहीं मिलताना तो चोटा सत्रिसकार भी एक विस्फोट का रूब लेलता है दबी भी बहावनाए बहाज आजाती है जटन का गर चोरना दर सल यह एह आजास दिलाने गले गगे उसके बना जद के जीवन और उस गर का कोई वजुद नहीं है और नाटक में ये वजुद मिट्तावा दिकता भी है ये लिक्ल दिकता है जब जटिन चली जाती है तो जट के गर का दिश्छे बहुती प्रतीक आत्मक हो जाता है गर में जाले लग जाते है और आंगन में दूब उगाती है यो जाले और दूप हैं ये उपेखषा वेवस्ता और शुन्निता के बहुती मस्बूत लोग प्रतीक है मतलप सब कुछ भी कर गया आप ये द्रिष्च दर्ष्गो को बताता है कि औरत केवल गर का खाम नहीं करती वो गर की आत्मा है, उसके बिना गर स्वेख खंड़र बन जाता है आप फिर जट को अकल आती है भिलकुल, जट को इस शुन्निता का अह्सास होता है उसका पूर्शार्त और एहंकार तूट ता है और वो जटिन को मनाने निकल परता है और मनाने के ज़ड जो करता है वो फिर से जंडरूल्स को पलड़ग देता है जी, भेश बडलने वाला हिस्चा आँ, वो जटिन के खोज में कभी गोपी तो कभी मनिहारन का भेश बडलता है एक पूरुष का अपनी रूट्टीवे पतनी को मनाने के लिए वो समच चुका है के पूरुशके हैंकार के सात वो जटिन को वापस नहीं लासकता उसे उसके स्तर उसकी समवेदना हो को समजना होगा जब वो अपना हैंकार त्याकता है, तब ही उनका पुनर मिलन संबभ हो पाता है उस्तर उसकी समवेदनावो को समजना होगा जब वो अपना हंकार त्याकता है तब ही उनका पुनर मिलन संबख हो पाता है इस तरह नहर की जिट से लेकर आर्थिक संगर्ष, विरहा, प्रलोबन, जग्डा और फिर से मिलन ये पुरा वेवाहेक चक्र पूरा हो जाते है ये पूरा नातक ये पूरा वेवाहेक चक्र को दर्षाता है ये तो किसी भी रिष्ते का एक पूरा जीवन चक्र है लेकिन यहा कहनी खत्म नहीं होती आप, अस्ली तूस तो अबाता है और सच कहुं तो जो स्रोथ सामगरी में आगे दिया गया है उसने तो मेरी दमाग के तारी हिला दिये वो मेडख वाला अनुश्ठान हाँ मददब एक पूरी वैवाहेक प्रेम और विरहके कता अचानक से एक अनुश्ठान में बड़ल जाती है वही अनुश्टान जिसका हम बिलकुल शुर्वात में जिकर किया था बिलकुल महलाए एक मेड़क पक्रती है, उसे तूटे गड़े मेरखकर कुटती है, और उसे गाँ की सबसे जग्डालु महला के दर्वाजे पर फेख आती है. अग, मेरा सवल यहे की एक प्रेम कता का अंथ, इस अजीबो गरीब जादू तोने जैसे क्रित्ते से क्यो हो रहा है? क्योंकि लोग परमपरावो में कला जीवन और प्रक्रती कभी अलगलग लगनी होते. सब जुडे होते. अच्छा कैसे? या अनुश्ठान अगर बारिष नहीं भी बार्बाद हो जाएगी अगर पसल बार्बाद हो यह तो विद्टिक जादू का एक बहत्री नुदारने सिमपतेटेक माजिक मतलब इसके पीछे का विग्यानिया तर्क जो समय के लोग मानते ते वो यह था के जैसी क्रिया होगी वैसी ही प्राक्रितिक प्रतिक रिया होगी मतलब अगर आप आददरती पर कुछ वैसा ही महोल बनाए, तो प्रक्रती भी वैसा ही बड़ताव करेगी. आदद बलक्ल अब दिके सावन भादो में आगर बारिष नहीं हो रही है, तो फसल बरभाद हो जाएगी. आद आगर फसल बरभाद हो गी तो? तो फिर से पुर्षों को मुरंजाना पडेगा औग! फिर से विरहे का चक्र शूग जाएगा यह खल! एसले बारिष बलाना उनकी सबसे बडी जरूड़त थी अब लोक विष्वास यह था के जब वो जग्डालू स्त्री सुबे अपने दर्वाजे पर मरेवरे मिनहक को देखेगी तो उसका पारा साथवे आस्मान पर पहुट जाएगा एक दम, वो जोर जोर से गालिया देगी, चीखेगी चिल लाएगी तो मानिता यह थी कि उस स्त्री का क्रोद औसकी आवार जितनी तेज होगी आस्मान में बादलो की गड़ग़ाहात और भारिष उतनी ही देज होगी. और वाए ये तो अदबुत है. मतलभ उनो ने एक महीला के विक्तिगत क्रोद और उसकी भावात्मक उर्जा को सीदे प्रक्रती की उर्जा बादलो और बारिष से जोड दिया. यही लोक कलाओ की वो बडी तस्वीर है, जिसे हम अकसर अंदेखा करनेते हैं अंबस उसे नाजकाना समच लेते हैं आप लेकिन जरजिटन किवल एक वैवाहिक नाटक नहीं ता ये क्रिषी किलिए बारिश बुलाने की एक सामूहिक और लोक परमपरागत क्रिया थी जिस में सब कुछ शामिल ता जी, इस में मनोरनजन भी था, समाज की सच्चायों पर टिपनी भी थी, और प्रक्रिती के साथ ताल्मेल बिठाने का, एक बहुती उननत नजर्या भी था. और स्रोथ में ना, एक और बहुती दिल्चस बात का जिक्र है. कोंसी? नाटक के बीच में अचानक से मुख्य कहानी रोकती जाती थी और कुछ स्वांग रचे जाते थे रहा है, स्वांग वाला हिस्चा जैसे अचानक किसी रोगी के एलाज का अबहिने शुरू हो जाना ये क्यू क्या जाता था? कहानी के बीच में इसका क्या काम? यह स्वांक दर सल कम्युनिटी खेरेपी यह सामोइक चिकिच्च्चा का काम करते थे कम्युनिटी खेरेपी प्या, सोच यह उस समय ना तो कोई अस्पताल थे, नहीं कोई मनोवे गयानिक होते थे किसी बिमारी के पहलने का दर, यह किसी अंदविष्वास का खोफ अगर बज़ाग बज़ाग बज़ाग बबज़ाग बबज़ाग बज़ाग बज़ाग बज़ाग बज़ाग बज़ाग बज़ाग बज़ाग बज़ाग बज़ाग बज़ाग बज़ाग बज़ाग बज़ाग बज़ाग बज़ाग बज़ाग बज़ाग बज़ाग बज़ा अपने दर को एक सुरक्ष्ट दाईरे में प्रोसेस करना ताकी असल जिंदगी में आप उसका सामना कर सके. एक दम सही कहा अपने. इस पूरी चर्चाने सच में पंद्रवी सदिक्यों महिलाओ के जीवन को देखने का नजर्या ही बडल दिया है. भी यही बडल दिया है. मेरा भी यही मानना है. बतलब उनो अपने अकेले पन, अपने आर्थिक असुरक्षा, सोतेन के दर, और यहां तक की सुके के दर को भी एक कला और अनुश्ठान में बडल दिया. जो की बहुत बढी बाद है. बिल्कुल. तो आजके स्विस्त्रित विष्लेशन को खटम करने से पहले स्रोथ सामगरी के आदार पर मैं एक विचार चोडना चाती हूँ। जी बताएए अब दर बद़ग बावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावावा� यह उद्यास सर्फ राजाँ की तारीखे नहीं है ये उन गुमनाम महलाव की आवाज भी है, जो आज भी हमारे अंदर कही ना कही गूँज रही है या क्या वो सोचल मीट्या पर परफेख दिखने का तनाव होगा या वोर्क लाइप बलान्स की जद्डो जहेद होगी सोचने वाली बात है बिल्कुल इतिहाज सर्फ राजागो की तारीखे नहीं है वुँँ ये उन गुमनाम महिलाओ की आवास भी है जो आज भी हमारे अंदर कही ना कही गूँज रही है एक दम सही तो आजके जेहन चर्चा में हमाइ सजुदने के लिए बहुत बहुत द्श्वाद अगली बार एक ने विशय के साथ फिर उत्रेंगे कुछ आज़े ही अंच्वे पहलुओं की गेराई में

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