MACHINE ASR ACCESSIBILITY AID

पहलवान_गरीबन_और_सामूहिक_श्राप_की_कथा.m4a

Not an editorially verified transcript. This text was generated automatically from the preserved recording and may contain recognition, language-detection, spelling, segmentation or name errors. Consult the source recording for authoritative content.
Collection
Part 9 · VIDEHA MITHILA MAITHILI DISCUSSION CRITICISM SERIES PART 9
Status
asr-draft
Human verified
No
Editorial review
not-reviewed
ASR model
small
Detected language
hi (0.993402)
Duration
10:09
Source
Open preserved recording

Timestamped machine output

  1. 0:00–0:05आज्छ के समीख्शा में हम गरीबन बाबा की कत्षा का विष्लेषन कर रहे हैं
  2. 0:05–0:10जो एक सादारन पहल्वान के अनजाने में देवी के पवित्रस्थान का अप्मान करने,
  3. 0:10–0:18उसके दुखखद अंथ और अंथ तहा एक रक्षक लोग देवता के रुप में स्थापित होने की एक शक्तीशाली कहानी है.
  4. 0:18–0:22मैं देख सकती हूँ की आप यहां क्या कहना चाहरहे हैं.
  5. 0:22–0:25आई ये देखें की हमें से कैसे और मजबूथ कर सकते हैं,
  6. 0:25–0:55खाजानी का आदार बज़ूद है, बहुट आपने खाजानी के बहुट आपने खाजानी के बहुट आपने खाजानी के बहुट आपने खाजानी के बहुट आपने खाजानी के बहुट आपने खाजानी के बहुट आपने खाजानी के बहुट आपने खाजानी के बहुट आ�
  7. 0:55–1:00अगर बाद शुच रही थी क्या एक पारमपर एक लोग कता में नायक के आन्तरिक संगर्ष को बहुत अदेग गेराए देने से, कहानी की जो मुल गती है,
  8. 1:01–1:04मतलब जो फास्ट पेस्ट नीचर है, वो दीमी तो नहीं हो जाएगी.
  9. 1:04–1:08तो बवाँ बाद गती की नहीं बल की जोडाओ की है
  10. 1:08–1:12कहानी में गरीबन एक बहुत यी सीथा साथा और निरदोष पहल्वान है
  11. 1:12–1:15हाँ उसने जान बुचकर कोई गलती नहीं की
  12. 1:15–1:17अदिखार है वो दीमी तो नहीं जाएगी
  13. 1:17–1:20दिखे गती दीमी होने का दर्क तो रहता है
  14. 1:20–1:23लेकिन यहां बात गती की नहीं बलकी जोडाउ की है
  15. 1:23–1:28कहानी में गरीबन एक बहुती सीथा सादा और निरदोष पहल्वान है
  16. 1:28–1:31आँ उसने जान बुचकर कोई गलती नहीं की
  17. 1:31–2:01बिल्कुल. लेकिन म्रित्यो के टीक बाध बबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबब
  18. 2:01–2:06तो फिर इसे तीक कैसे करें बिना कहानी को बारी या उबाव बनाए?
  19. 2:06–2:11इसका सबसे अच्छा सुजाव ये है कि प्रतिषोदी आत्मा बनने से पहले
  20. 2:11–2:13या बागिन के साथ युद्र के दोरान
  21. 2:13–2:15गरीबन के मानसिक द्वंद्व
  22. 2:15–2:20या अन्याय के प्रती उसकी प्रारंभिक निराशा को, कठा में थोडीसी जगा देनी चाही है.
  23. 2:20–2:22जिस से उसका क्रोद जायस लगे, है ना?
  24. 2:22–2:27एक दम सही, इस से उसका क्रोद न्याय संगत और स्वाभाविक लगेगा.
  25. 2:27–2:29हम इसके ले कुछ थोस उदारन भी देख सकते हैं.
  26. 2:29–2:35ज़ेसे क्या? क्योंकी बागं से लड़ते समः, कोई बेटकर लंभी चोडी फिलोसटी तो नहीं सोचेगा?
  27. 2:35–2:38बलकल नहीं सोचेगा. इसे बहुत सुख्ष्म रखना होगा.
  28. 2:38–2:43पहला उदारन यह उसकता है, की बागं से असमान युध्ध के दोरान,
  29. 2:43–2:45वरनन में बस एक पंकती जोडी जासकती है.
  30. 2:45–2:46या ज़र प्पंकती?
  31. 2:46–2:50ताई जागरीबन लड़ते लड़े बस एक पल के लिए सुचता है,
  32. 2:50–2:54कि क्या अनजाने में हुई एक चोतिसी बूल की इतनी बडी सचाजा मिलनी चाए?
  33. 2:54–2:55औरे वा!
  34. 2:55–2:58मदल वो तखान अं निराशा का एक शन है
  35. 2:58–3:00आँ ये एक चोता सा भीज है
  36. 3:00–3:03जो उसके अंदर पनप्रहे अन्याय के अहसाज को दिखाता है
  37. 3:03–3:06ये बहुत यी अरगानिक लग रहा है
  38. 3:06–3:10और म्रित्तियो के बाद वाले हिसे में हम क्या कर सकते है
  39. 3:10–3:13वहाँ भी हमें थचोटा सा बड़ाव कर सकते हैं
  40. 3:13–3:17मरिट्टिव के तुरन्त बाद और भुक्ता में प्रवेश करने से पहले
  41. 3:17–3:21उसकी आत्मा की बेचैनी का एक चोटा सा द्दिश्छ जोडा जा सकता है
  42. 3:21–3:24जहां वो अपने शरीर को देख्रा आए
  43. 3:24–3:31यह दम सही पक्डा अपने, ज़हाँ वो नदी में अपने शव के अप्मान को देकगर पहली बार क्रोद महसुज करता है.
  44. 3:31–3:33ये सच में बहुत पावर्फुल होगा.
  45. 3:33–3:38मतलब वो माँन आगहात में अपने ही शरीर का तिरसकार होते वे देख रहा है.
  46. 3:38–3:44अग, और यही वो पल होगा, जगा पाटख कहेगा, कि अग, अब इसका गुच्सा जायस है.
  47. 3:44–3:49बलकुल, अब इसी गुच्से और श्राप से जुडता हूँआ एक और बहुत आहम बिन्दू है,
  48. 3:49–3:55जब गरीबन की आत्मा को नियाए चाही एथा, तो उसने दूभी समुदाय को चूना.
  49. 3:55–3:57पर यहां मुझे कुछ अजीब लगा.
  50. 3:57–3:58यह?
  51. 3:58–4:02यह वैसा ही है, जैसे किसी आडालत में जज्के फैसला सूनाते ही,
  52. 4:02–4:08मुज्रिम बिना किसी बहेज्के बिना कोई सवाल उठाए तुरंत अपनी पुरी गल्ती मान ले.
  53. 4:08–4:11मैं समज रहा हूँ आप किस तरफ इशारा कर रहीं.
  54. 4:11–4:16प्रे दूभी समवुदाए का बिना किसी हिचके चाहत के तुरंत पश्षाताप कर लेना.
  55. 4:16–4:20कता के चरम बिन्दु के नाटकी ये तनाव को कापी कमजोर कर देता है
  56. 4:20–4:24मतलव, वो जो एक खलामेखस का बिल्डव होता है, वो फुस हो जाता है
  57. 4:24–4:30आँ, जैसे ही गरीबन की आत्मा श्राप देती है, कि बद्टी में कपड़े जल जाएंगे,
  58. 4:30–4:35समदाय तुरन्द्दर्कर, या विवेख के कारन नदी में सशव कुजने कुध परता है
  59. 4:35–4:37कोई सनशे नहीं, कोई सवाल नहीं
  60. 4:37–4:38कुई नहीं
  61. 4:38–4:43यहां कोई आन्तरिक संगर्ष, अविष्वास, या तनाव का निरमार है ही नहीं
  62. 4:43–4:47इसे समदान बहुत आसान और जल्दबाजी में किया गया लकता है.
  63. 4:47–4:49इंसान के प्ट्रत तो आजी नहीं होती.
  64. 4:50–4:52इंसान तो सब से बहले इंकार करता है,
  65. 4:52–4:54दिनायल में जाता है.
  66. 4:54–4:54इक दम सही.
  67. 4:55–4:56इसले मेरा सुजाव यह है,
  68. 4:57–4:59कि सामूइक पश्टाब से टीक पहले,
  69. 4:59–5:01अविश्वास, संशै,
  70. 5:01–5:03या श्राब के आंशिक प्रभाव का
  71. 5:03–5:05तो आप इस अविश्वास को कता में कैसे पिरो सकते हैं
  72. 5:05–5:07कुछ थो सुदारन दीजे
  73. 5:07–5:09देकिए, कहानी में ये दिखाया जासकता है,
  74. 5:09–5:11कि शुर्वात में समुदाय के कुछ भूजुर्ग
  75. 5:11–5:13बबगता की बातो को किसी का ब्रम मानकर कारिज कर देते हैं
  76. 5:13–5:15अदिश्वास को कता में कैसे पिरो सकते हैं?
  77. 5:15–5:17कुछ थो सुदारन दीजे.
  78. 5:17–5:20दिक हीगे, कहानी में ये दिखाया जा सकता है,
  79. 5:20–5:23कि शुर्वात में समवूदाय के कुछ भुजुर्ग,
  80. 5:23–5:26बबगता की बातो को किसी का ब्रम मानकर कारिच कर देते हैं.
  81. 5:26–5:30मतलब वो अपने एहंकार में उसे गंविरता से लेते ही नहीं है.
  82. 5:30–5:34हाँ वे कह सकते हैं की औरे एक ये तो कोई बधकी हूए आत्मा है.
  83. 5:35–5:36हमारा काम छोडी रुग जाएगा.
  84. 5:36–5:39इस से कहानी में एक गर्षन पैना होगा.
  85. 5:39–5:40एक फ्रिक्षन आएगा.
  86. 5:40–5:41बलकल.
  87. 5:41–5:47और इसके बाद वास्तों में किसी एक बद्टी में कुछ कीमती कपड़ रहस्स्यमए तरीके से जलने लकते हैं
  88. 5:47–5:50औह औह मतलब पहला सबूथ उने मिलता है
  89. 5:50–5:54आँ इस छोटी सी गटना को देखकर पूरे समुदाय में देशत फैलती है
  90. 5:54–5:57जब वे अपनी आखों के सामने नुक्सान देकते हैं?
  91. 5:57–6:00एक दम सही. और तब वे अपनी गलती मानते हुए
  92. 6:00–6:02सामोहीक रूप से नदी कि और बागते हैं.
  93. 6:02–6:05ये बहुत जाडा द्रामातेक और रील होगा.
  94. 6:05–6:07ये तो बहुत ही शान्दार विज्वल है.
  95. 6:07–6:16अब जब समवदाय पश्षाताब करी रहा है, तो हमे इस बात पर भी गोर करना चाहिये, कि आखिर पूरे समवदाय को सजजा क्यो मिली?
  96. 6:16–6:18ये अस कहानी का सब से गळा सवाल है.
  97. 6:18–6:21आखिर कि गल्ती तो सरफ एक दोबी की ती ना?
  98. 6:21–6:23अगया दोबी की ती ना?
  99. 6:23–6:26अगया अगया दोबी की वेक्तिगत बूल के कारन,
  100. 6:26–6:30पूरे समुडाय को श्राब देने का दार्षनिक और वैचारिक आदार,
  101. 6:30–6:33कहानी में और अदहेख स्पष्ट्टा की मांग करता है.
  102. 6:33–6:34विक्तिगत भूल के कारन,
  103. 6:34–6:40वेक्तिगत भूल के कारन पूरे समवदाये को श्राप देने का दार्षनिक और वैचारिक आदार,
  104. 6:40–6:43कहानी में और अधिक सपष्टता की माग करता है.
  105. 6:43–6:46कुकि एक आदूनक पाटक के तोर पर मुझे ये तोडा खडक सकता है.
  106. 6:46–6:47बिलक्ल कथकेगा.
  107. 6:47–6:53कहानी में, एक दोबी अपने स्वार्त्ट, और असुविदा के कारन्शव को दुस्री तरव बहादेता है.
  108. 6:53–6:58लेकिन गरीबन की आत्मा इसके लिए पुरे दोबी समवुदाय को श्वाप देती है.
  109. 6:58–7:00बाकी लोगुने क्या बेगारा था बही?
  110. 7:00–7:03वही तो, कता ये सपष्ट रूप से च्थापित नहीं करती,
  111. 7:03–7:06कि एक विक्तिके क्रित्या का बार,
  112. 7:06–7:08पूरे समाज को क्यों क्याना चाहीं?
  113. 7:08–7:13तो ये बस एक अंदे गुस्से या बदले की भावना जैसी लकती है.
  114. 7:13–7:16हा, ये कोई गेरा नेतिक संदेश नहीं देती.
  115. 7:16–7:23इसले मेरा सुजाव यहे है कि उस अकेले धूभी के क्रिट्ट को समाज की व्यापक उदासीन्ता के प्रतिक के रुप में स्थापित करें.
  116. 7:23–7:28समाज की व्यापक उदासीन्ता. मतलब कलेक्ते व्यापती.
  117. 7:28–7:36इक दम सही. कहानी में यह सबष्ट किया जाना जाना जाही है के सामूहिक स्राप दर सल मरत्टिओ और मरत्टुकों के पती समाज के गरते सम्मान पर एक प्रहार है.
  118. 7:36–7:41ये विचार तो बहुत गेरा है. पर यह से कहानी में लाएंगे कै से.
  119. 7:41–7:43अवे लेक्चर भाजी तो करनी नहीं?
  120. 7:43–7:45नहीं, लेक्चर बिलकुल नहीं
  121. 7:45–7:48इसे बहुत ही स्वबाविक तरीके से किया जा सकता है
  122. 7:48–7:50इसका एक ठो सुदारन ये हो सकता है
  123. 7:50–7:53कि कता कार या गरीबन की आत्मा
  124. 7:53–7:54बबक्ता के माध्धिम से
  125. 7:54–7:56एक समवाद जोर दे
  126. 7:56–8:26यह सब आपना ज़ाई की बाज़ा नहीं तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़
  127. 8:26–8:27किसीने उसे रोका नहीं?
  128. 8:27–8:29मून ही सहमती है.
  129. 8:29–8:29बिलकोल.
  130. 8:29–8:31किसीने नहीं तोका की ये क्या कर रहो?
  131. 8:32–8:36ये सामूहिक चुप्पी ही उनकी सामूहिक सजाका असली कारन बनी.
  132. 8:36–8:42ये आंगल इस कहानी को एक सादारन लोक कता से उठाकर एक उचे डारचनिक स्थर पर लेजाता है.
  133. 8:56–9:02अज आज हम देखा की कैसे गरीबन बाबा की कता को और अधिक प्रभावशाली बनाया जा सकता है
  134. 9:02–9:05आज बस कुछ दानचागत बडलावो की जोरूट है
  135. 9:05–9:10बलकुल तो अगर मैं सागे मुख्य सुजावों को संख्षेप में रख हो
  136. 9:10–9:17पहला निर्दोश व्यक्ती से क्रोदी आत्मा बनने के बीज के बहावनात्मक सबफर को सपष्ट करे.
  137. 9:17–9:20ताकी पाथक उसके गुस्से से खुद को जोड सके.
  138. 9:20–9:24तुस्रा चरम बिन्दो के तनाव को बड़ाने के लिए,
  139. 9:24–9:29मुदायके तुरन्त पश्चाताब करने से फहले तोडा सन्शय या प्रतिरोध जोडें
  140. 9:29–9:32जिस से कलायमाक्स में वो जरूरी गर्षन पैडा हो
  141. 9:32–9:39और तीस्रा एक वक्ती की गल्ती के लिए पूरे समुदायको मिलने वाली सजागे पीच्छे के दार्ष्निक तर्क
  142. 9:39–9:43यानी उस समहेख उदासींता और चुप्पी को गेरा करें
  143. 9:43–9:44एकदम सतीक
  144. 9:44–9:48हम आपकी इस कहानी के द्राफ्ट में इन बडलावों को देखने के लिए बेहद उद्सुक हैं
  145. 9:48–9:51बहुत इबहत्रीं कान है ये
  146. 9:51–9:55क्रिप्ला, इन सुजामों को लागु करने के बाद, अपनी सामगरी हमे फिर से बहीजें,
  147. 9:55–9:59ताकि हम एक बार फिर से, इस पर और गेह्राइ से चर्चा कर सकें.
  148. 9:59–10:02मुझे भी उस ने द्राफ्ट का बेसवरी से नतजार रहेगा.
  149. 10:02–10:09तो आजके इस विश्लेशन में बस इतना ही, लिकते रहीए, और अपनी कहानियो को और भी दहरदार बनाते रहीए.

Plain text

आज्छ के समीख्शा में हम गरीबन बाबा की कत्षा का विष्लेषन कर रहे हैं जो एक सादारन पहल्वान के अनजाने में देवी के पवित्रस्थान का अप्मान करने, उसके दुखखद अंथ और अंथ तहा एक रक्षक लोग देवता के रुप में स्थापित होने की एक शक्तीशाली कहानी है. मैं देख सकती हूँ की आप यहां क्या कहना चाहरहे हैं. आई ये देखें की हमें से कैसे और मजबूथ कर सकते हैं, खाजानी का आदार बज़ूद है, बहुट आपने खाजानी के बहुट आपने खाजानी के बहुट आपने खाजानी के बहुट आपने खाजानी के बहुट आपने खाजानी के बहुट आपने खाजानी के बहुट आपने खाजानी के बहुट आपने खाजानी के बहुट आ� अगर बाद शुच रही थी क्या एक पारमपर एक लोग कता में नायक के आन्तरिक संगर्ष को बहुत अदेग गेराए देने से, कहानी की जो मुल गती है, मतलब जो फास्ट पेस्ट नीचर है, वो दीमी तो नहीं हो जाएगी. तो बवाँ बाद गती की नहीं बल की जोडाओ की है कहानी में गरीबन एक बहुत यी सीथा साथा और निरदोष पहल्वान है हाँ उसने जान बुचकर कोई गलती नहीं की अदिखार है वो दीमी तो नहीं जाएगी दिखे गती दीमी होने का दर्क तो रहता है लेकिन यहां बात गती की नहीं बलकी जोडाउ की है कहानी में गरीबन एक बहुती सीथा सादा और निरदोष पहल्वान है आँ उसने जान बुचकर कोई गलती नहीं की बिल्कुल. लेकिन म्रित्यो के टीक बाध बबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबब तो फिर इसे तीक कैसे करें बिना कहानी को बारी या उबाव बनाए? इसका सबसे अच्छा सुजाव ये है कि प्रतिषोदी आत्मा बनने से पहले या बागिन के साथ युद्र के दोरान गरीबन के मानसिक द्वंद्व या अन्याय के प्रती उसकी प्रारंभिक निराशा को, कठा में थोडीसी जगा देनी चाही है. जिस से उसका क्रोद जायस लगे, है ना? एक दम सही, इस से उसका क्रोद न्याय संगत और स्वाभाविक लगेगा. हम इसके ले कुछ थोस उदारन भी देख सकते हैं. ज़ेसे क्या? क्योंकी बागं से लड़ते समः, कोई बेटकर लंभी चोडी फिलोसटी तो नहीं सोचेगा? बलकल नहीं सोचेगा. इसे बहुत सुख्ष्म रखना होगा. पहला उदारन यह उसकता है, की बागं से असमान युध्ध के दोरान, वरनन में बस एक पंकती जोडी जासकती है. या ज़र प्पंकती? ताई जागरीबन लड़ते लड़े बस एक पल के लिए सुचता है, कि क्या अनजाने में हुई एक चोतिसी बूल की इतनी बडी सचाजा मिलनी चाए? औरे वा! मदल वो तखान अं निराशा का एक शन है आँ ये एक चोता सा भीज है जो उसके अंदर पनप्रहे अन्याय के अहसाज को दिखाता है ये बहुत यी अरगानिक लग रहा है और म्रित्तियो के बाद वाले हिसे में हम क्या कर सकते है वहाँ भी हमें थचोटा सा बड़ाव कर सकते हैं मरिट्टिव के तुरन्त बाद और भुक्ता में प्रवेश करने से पहले उसकी आत्मा की बेचैनी का एक चोटा सा द्दिश्छ जोडा जा सकता है जहां वो अपने शरीर को देख्रा आए यह दम सही पक्डा अपने, ज़हाँ वो नदी में अपने शव के अप्मान को देकगर पहली बार क्रोद महसुज करता है. ये सच में बहुत पावर्फुल होगा. मतलब वो माँन आगहात में अपने ही शरीर का तिरसकार होते वे देख रहा है. अग, और यही वो पल होगा, जगा पाटख कहेगा, कि अग, अब इसका गुच्सा जायस है. बलकुल, अब इसी गुच्से और श्राप से जुडता हूँआ एक और बहुत आहम बिन्दू है, जब गरीबन की आत्मा को नियाए चाही एथा, तो उसने दूभी समुदाय को चूना. पर यहां मुझे कुछ अजीब लगा. यह? यह वैसा ही है, जैसे किसी आडालत में जज्के फैसला सूनाते ही, मुज्रिम बिना किसी बहेज्के बिना कोई सवाल उठाए तुरंत अपनी पुरी गल्ती मान ले. मैं समज रहा हूँ आप किस तरफ इशारा कर रहीं. प्रे दूभी समवुदाए का बिना किसी हिचके चाहत के तुरंत पश्षाताप कर लेना. कता के चरम बिन्दु के नाटकी ये तनाव को कापी कमजोर कर देता है मतलव, वो जो एक खलामेखस का बिल्डव होता है, वो फुस हो जाता है आँ, जैसे ही गरीबन की आत्मा श्राप देती है, कि बद्टी में कपड़े जल जाएंगे, समदाय तुरन्द्दर्कर, या विवेख के कारन नदी में सशव कुजने कुध परता है कोई सनशे नहीं, कोई सवाल नहीं कुई नहीं यहां कोई आन्तरिक संगर्ष, अविष्वास, या तनाव का निरमार है ही नहीं इसे समदान बहुत आसान और जल्दबाजी में किया गया लकता है. इंसान के प्ट्रत तो आजी नहीं होती. इंसान तो सब से बहले इंकार करता है, दिनायल में जाता है. इक दम सही. इसले मेरा सुजाव यह है, कि सामूइक पश्टाब से टीक पहले, अविश्वास, संशै, या श्राब के आंशिक प्रभाव का तो आप इस अविश्वास को कता में कैसे पिरो सकते हैं कुछ थो सुदारन दीजे देकिए, कहानी में ये दिखाया जासकता है, कि शुर्वात में समुदाय के कुछ भूजुर्ग बबगता की बातो को किसी का ब्रम मानकर कारिज कर देते हैं अदिश्वास को कता में कैसे पिरो सकते हैं? कुछ थो सुदारन दीजे. दिक हीगे, कहानी में ये दिखाया जा सकता है, कि शुर्वात में समवूदाय के कुछ भुजुर्ग, बबगता की बातो को किसी का ब्रम मानकर कारिच कर देते हैं. मतलब वो अपने एहंकार में उसे गंविरता से लेते ही नहीं है. हाँ वे कह सकते हैं की औरे एक ये तो कोई बधकी हूए आत्मा है. हमारा काम छोडी रुग जाएगा. इस से कहानी में एक गर्षन पैना होगा. एक फ्रिक्षन आएगा. बलकल. और इसके बाद वास्तों में किसी एक बद्टी में कुछ कीमती कपड़ रहस्स्यमए तरीके से जलने लकते हैं औह औह मतलब पहला सबूथ उने मिलता है आँ इस छोटी सी गटना को देखकर पूरे समुदाय में देशत फैलती है जब वे अपनी आखों के सामने नुक्सान देकते हैं? एक दम सही. और तब वे अपनी गलती मानते हुए सामोहीक रूप से नदी कि और बागते हैं. ये बहुत जाडा द्रामातेक और रील होगा. ये तो बहुत ही शान्दार विज्वल है. अब जब समवदाय पश्षाताब करी रहा है, तो हमे इस बात पर भी गोर करना चाहिये, कि आखिर पूरे समवदाय को सजजा क्यो मिली? ये अस कहानी का सब से गळा सवाल है. आखिर कि गल्ती तो सरफ एक दोबी की ती ना? अगया दोबी की ती ना? अगया अगया दोबी की वेक्तिगत बूल के कारन, पूरे समुडाय को श्राब देने का दार्षनिक और वैचारिक आदार, कहानी में और अदहेख स्पष्ट्टा की मांग करता है. विक्तिगत भूल के कारन, वेक्तिगत भूल के कारन पूरे समवदाये को श्राप देने का दार्षनिक और वैचारिक आदार, कहानी में और अधिक सपष्टता की माग करता है. कुकि एक आदूनक पाटक के तोर पर मुझे ये तोडा खडक सकता है. बिलक्ल कथकेगा. कहानी में, एक दोबी अपने स्वार्त्ट, और असुविदा के कारन्शव को दुस्री तरव बहादेता है. लेकिन गरीबन की आत्मा इसके लिए पुरे दोबी समवुदाय को श्वाप देती है. बाकी लोगुने क्या बेगारा था बही? वही तो, कता ये सपष्ट रूप से च्थापित नहीं करती, कि एक विक्तिके क्रित्या का बार, पूरे समाज को क्यों क्याना चाहीं? तो ये बस एक अंदे गुस्से या बदले की भावना जैसी लकती है. हा, ये कोई गेरा नेतिक संदेश नहीं देती. इसले मेरा सुजाव यहे है कि उस अकेले धूभी के क्रिट्ट को समाज की व्यापक उदासीन्ता के प्रतिक के रुप में स्थापित करें. समाज की व्यापक उदासीन्ता. मतलब कलेक्ते व्यापती. इक दम सही. कहानी में यह सबष्ट किया जाना जाना जाही है के सामूहिक स्राप दर सल मरत्टिओ और मरत्टुकों के पती समाज के गरते सम्मान पर एक प्रहार है. ये विचार तो बहुत गेरा है. पर यह से कहानी में लाएंगे कै से. अवे लेक्चर भाजी तो करनी नहीं? नहीं, लेक्चर बिलकुल नहीं इसे बहुत ही स्वबाविक तरीके से किया जा सकता है इसका एक ठो सुदारन ये हो सकता है कि कता कार या गरीबन की आत्मा बबक्ता के माध्धिम से एक समवाद जोर दे यह सब आपना ज़ाई की बाज़ा नहीं तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ाई तो बज़ किसीने उसे रोका नहीं? मून ही सहमती है. बिलकोल. किसीने नहीं तोका की ये क्या कर रहो? ये सामूहिक चुप्पी ही उनकी सामूहिक सजाका असली कारन बनी. ये आंगल इस कहानी को एक सादारन लोक कता से उठाकर एक उचे डारचनिक स्थर पर लेजाता है. अज आज हम देखा की कैसे गरीबन बाबा की कता को और अधिक प्रभावशाली बनाया जा सकता है आज बस कुछ दानचागत बडलावो की जोरूट है बलकुल तो अगर मैं सागे मुख्य सुजावों को संख्षेप में रख हो पहला निर्दोश व्यक्ती से क्रोदी आत्मा बनने के बीज के बहावनात्मक सबफर को सपष्ट करे. ताकी पाथक उसके गुस्से से खुद को जोड सके. तुस्रा चरम बिन्दो के तनाव को बड़ाने के लिए, मुदायके तुरन्त पश्चाताब करने से फहले तोडा सन्शय या प्रतिरोध जोडें जिस से कलायमाक्स में वो जरूरी गर्षन पैडा हो और तीस्रा एक वक्ती की गल्ती के लिए पूरे समुदायको मिलने वाली सजागे पीच्छे के दार्ष्निक तर्क यानी उस समहेख उदासींता और चुप्पी को गेरा करें एकदम सतीक हम आपकी इस कहानी के द्राफ्ट में इन बडलावों को देखने के लिए बेहद उद्सुक हैं बहुत इबहत्रीं कान है ये क्रिप्ला, इन सुजामों को लागु करने के बाद, अपनी सामगरी हमे फिर से बहीजें, ताकि हम एक बार फिर से, इस पर और गेह्राइ से चर्चा कर सकें. मुझे भी उस ने द्राफ्ट का बेसवरी से नतजार रहेगा. तो आजके इस विश्लेशन में बस इतना ही, लिकते रहीए, और अपनी कहानियो को और भी दहरदार बनाते रहीए.

← Transcript index