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जट_जटिन_लोकनाट्य_और_वर्षा_के_अनुष्ठान.m4a

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Part 9 · VIDEHA MITHILA MAITHILI DISCUSSION CRITICISM SERIES PART 9
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  1. 0:00–0:09आज हम मितला के अटिहासिक जजटिन लोकनाट्टे की कता, राजा शिव्सिंग के दर्बार, और सावन भादो के वर्षा अनुष्ठानो वाले आलेएक पर चर्चा कर रहे हैं.
  2. 0:09–0:13बिल्कोल समगरी बहुत ही दिल्चस्प है.
  3. 0:13–0:21अग, अगर बना किसी देरी के अगर सीदे मुद्दे पर आए, तो प्रस्तुद समगरी में, कता का प्रभाः, दिष्चदर दिष्चतो सपष्ट है,
  4. 0:21–0:26लेकिन विबन उप कतावों की बीच का बहावनात्मक ज़ाव थोडा कमजोर प्रतीथ होता है.
  5. 0:26–0:31अगर अगर अप अप अप श्रोथ समगरी को द्यान से पड़ें
  6. 0:31–0:33तो एक सपश्ट कमजोरी नजर आती है
  7. 0:33–0:36अगर गटनाय बहुत थेजी से बहागती है
  8. 0:36–0:39भिल्कुल किसी चेकलिस्ट की तराव
  9. 0:39–0:42अगर शुरूवात में जटिन की नहर जाने की जिद है
  10. 0:42–0:44अगले ही पल जूमर का खेल शूरू हो जाता है
  11. 0:45–0:48और फिर आचानाग जद खेती किले मोरंग चला जाता है
  12. 0:48–0:51आचानाग जद के तुरन्त बाद सूनार का प्रलोबन आचाता है
  13. 0:51–0:57तुब बिना किसी यह तुब यह सपच्ट प्रिष्ट बूमी के दोनो के भीज तीखा जग्डा हो जाता है.
  14. 0:57–1:02मतलब एक दिष्चे से दुस्रे दिष्चे के भीच पात्र क्या सोच रहे है, यह गायब है.
  15. 1:02–1:10बिल्कुल उनके मान्सिक स्तिती क्या है, उनके फैस्लों के पीचे का बावनात्मक तनाव क्या है, ये सब नदारद है.
  16. 1:10–1:18आलेग हमे ये तो बतारा है कि क्या हुए, लेकिन क्यो हूए, वो हिस्सा पूरी करह से चोट गया है.
  17. 1:18–1:27दिखे जैसा की मैंने नोट से समजा है, यहां मूल तरक यह है कि यह एक लोक नाट्टिय है, है ना?
  18. 1:27–1:57अब भी बद्ख़ाँ बद्ख़ाँ बद्ख़ाँ बद्ख़ाँ बद्ख़ाँ बद्ख़ाँ बद्ख़ाँ बद्ख़ाँ बद्ख़ाँ बद्ख़ाँ बद्ख़ाँ बद्ख़ाँ बद्ख़ाँ बद्ख़ाँ बद्ख़ाँ बद्ख़ाँ बद्ख़ाँ बद्ख़ाँ
  19. 1:57–2:01अद्विनेता के चहरे के बाव, संगीत की ले,
  20. 2:01–2:04या या फेर दर्षकों की जो उर्जा होती है,
  21. 2:04–2:10वो उन भावनात्मक अद्विनेता को अद्विनेता के बाद अलग होती है.
  22. 2:10–2:14अचा रहा हा वो लाईईप पहाँम्मेंस की बाद अलग होती है.
  23. 2:14–2:44बद्याईवाद्याईवाद्याईवाद्याईवाद्याईवाद्याईवाद्याईवाद्याईवाद्याईवाद्याईवाद्याईवाद्याईवाद्याईवाद्याईवाद्याईवाद्याईवाद्याईवाद्याईवाद्याईवाद्याईवाद्याईवाद्याईवा�
  24. 2:44–2:50अगर अगर नहीं से सुदारने के कुछ टोस तरीको पर बात करें, तो लेखख क्या कर सकते हैं?
  25. 2:50–2:57इक बहुत अच्छा तरीका ये हूँ सकता है, के अद्द्याए चार और च्ये के दिश्छों को आपस में गुठ दिया जाए.
  26. 2:57–3:02अद्याए चार ज़ें आगना बाहरने से मना करती है
  27. 3:02–3:06आवगी, वो मना करती है और सुनार के हा जाने की दमकी देती है
  28. 3:06–3:09फिलहाल ये बस एक अलब गटना लकती है
  29. 3:09–3:12और फिर जब अद्याए च्याय में सुनार सच्मुचु से प्रलोबन देता है
  30. 3:12–3:14तो वो द्रिश आचानक से आदमगता है.
  31. 3:14–3:16बलकुल यही तो कमजोरी है.
  32. 3:16–3:19लेक्ह को इन दोनो पलों को जोडना जाहीए.
  33. 3:19–3:25जब अद्याए चार में वो द्हमकी देती है,
  34. 3:25–3:27तो पाटको को ये लगना चाहीए,
  35. 3:27–3:30की ये बस एक हास्यपोन रख है.
  36. 3:30–3:33मतलब अपने पती कद्यान कीचने कीए कूशिष
  37. 3:33–3:38आई एक दम क्योंकी जब अद्याय च्याय में अस्ली परिक्षा आती है
  38. 3:38–3:40जब सूनार सच्में गेहनो का लालगज देता है
  39. 3:40–3:41भिल्कुल
  40. 3:41–3:46तब वो जट्की सुन्दर्ता का बखान करके अपनी वफ़ादारी साबित करती हैं
  41. 3:46–3:51अगर लेखख अद्याए 4 में ये सपश्ट कर दे की उसकी दमकी कुखली ती
  42. 3:51–3:56तो अद्याय 6 में उसकी वफ़ादारी का प्रभाओ दस गुना बर जाएगा
  43. 3:56–4:02आद ब आद बद के आज शवरक्षा बहाव का आदार बनाई तु कहानी बहुत गेरी हो जाएगी
  44. 4:02–4:06अटलब नहर नहर लोटने की उसकी चेतावनी सर्व गुस्सा नहीं लगेगी
  45. 4:06–4:09अब यह यह सर्फ एक समवाद की तरा आता है और क्टम हो जाता है
  46. 4:09–4:12तो इसे कैसे बहतर किया जासकता है
  47. 4:12–4:17अगर लेक्हाक इस दर को उसके बात के आस रक्षा भाव का आदार बनाए
  48. 4:17–4:19तो कहानी बहुत गेरी हो जाएगी
  49. 4:19–4:23अटलब नहर नहां लोटने की उसकी चेतावनी सर्व गुच्सा नहीं लगेगी.
  50. 4:23–4:30बलकोल नहीं वो उस गेहरे दर का प्रकती करन लगेगी कि कही जद किसी और को नाले आए.
  51. 4:30–5:00और नहीं बाद्टागे नहीं तो बज़ादे प्रद्टागे नहीं तो बज़ादे बाद्टागे नहीं तो बज़ादे नहीं तो बज़ादे नहीं तो बज़ादे नहीं तो बज़ादे नहीं तो बज़ादे नहीं तो बज़ादे नहीं तो बज़ादे नहीं तो बज़ा�
  52. 5:00–5:02अगर नहीं बादख को यें ग़ेलूडन्दो की परवाए क्यों करनी चाहिये?
  53. 5:02–5:04एक दम सही यें नाटक महिलाएं के बीज सद्यो तक इतना लोग प्रियव क्यो रहा
  54. 5:04–5:06इसका व्यापक महत्व क्या है यें नदारत है
  55. 5:06–5:09अजके पाटक को इन गरेलु दन्वो की परवाए क्यों करनी चाही है
  56. 5:09–5:10एक दम सही
  57. 5:10–5:14ये नाटक महिलाओ के बीच सद्यो तक इतना लोग प्रिया क्यो रहा
  58. 5:14–5:17इसका व्यापक महत्व क्या है ये नदारत है
  59. 5:17–5:22लिकिन क्या हम इस पर कुछ जीआदा ही आदूनिक चश्मा नहीं च़ारा है?
  60. 5:22–5:24आप आप यह सा क्यो सुचते है?
  61. 5:24–5:29मडलब अगर यह सिर्फ मनूरंजन के लिए क्या जाने वाला एक सीथा सादा गाँँगा के खेल ता
  62. 5:29–5:35तो क्या हम मनोविग्यनिक प्रासंगिक्ता दूनकर यसे बेकार में जटिल तो नहीं बना रहें?
  63. 5:35–6:05वूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ�
  64. 6:05–6:08अपने अबी विक्ती के एक मंच्के लुप में प्रस्तुत करना जाहीए.
  65. 6:08–6:12अच्छा मतलब एक एसा अब्ट्लेट, जहाँ वे अपनी बात कैसकें?
  66. 6:12–6:15बिलकुल उस पित्र सत्तात्मक समाज में,
  67. 6:15–6:18जहां महिलाओ की आवास दबी हुई ती,
  68. 6:18–6:24ये नाटक उने अपनी कुन्ताए, इच्छाए, और शिकाएते विक्त करने का मुगा देता था.
  69. 6:24–6:26और वो भी एक सामाजिक रूप से सुएक्रित तरीके से.
  70. 6:26–6:30आप लेक्खक ने एतिहासिक विव्रन तो दे दिये,
  71. 6:30–6:36लेकिन वे इस मनोवैग्यानिक निकास वाले पहलु को उभारने से पूरी तर चूक गये हैं.
  72. 6:36–6:38आप मुझे ये बाज समझ में आरी है.
  73. 6:38–6:40जैसे अद्द्याय एक में ही देखिये.
  74. 6:41–6:43जहां पूरुशों की बूमिका का जिक्र है.
  75. 6:43–6:45आप, लेक्खक ने बताया है,
  76. 6:45–6:49कि इस नाटक में जटका चरित्र भी महिलाए दोरा ही निभाया जाता ता.
  77. 6:49–6:54और आलेक इसे सर्फ एक सादारन नियम या मजबूरी की पेश करता है.
  78. 6:54–6:55भिल्कुल.
  79. 6:55–6:59जब कि इसे लिखने का अदिक प्रभाउशाली तरीका ये हो सकता है,
  80. 6:59–7:03की इसे वेवाएक सत्ता को पलटटने के तरीके के रूप में दर्शाया जै
  81. 7:03–7:04एक दम सतीक
  82. 7:04–7:07मतलप कलपना की जे उस दोर की
  83. 7:07–7:09जब भूंगत और परदा प्रत्टा इतनी हावी थी
  84. 7:09–7:10हाँ
  85. 7:10–7:13महिलाों का गर से बाहर निकलना भी मुष्किल होटा होगा
  86. 7:13–7:18तब एक महिला का दूती पहेंकर, मुच्लगागागर एक पूरूश की तरा चलना
  87. 7:18–7:20और पूरूश के अदिकार वाले समवाद बोलना
  88. 7:20–7:24आआ, ये कितना बड़े विद्रोही कदम रहा होगा
  89. 7:24–7:26ये सरफ नकल उतारना नहीं है
  90. 7:26–7:30ये सत्ता का एक प्रतिकात्मक रस्तान्तरन है
  91. 7:30–7:35सही बात है, लेखख को उस रोमान्च और सुत्टन्तरता की बावना का वरनन करना चाहिये,
  92. 7:35–7:38जो उस महिला नर्तकी को महसुस होती होगी.
  93. 7:38–7:43भिल्कुल, और ये बात केवल पूरुश का रूब दरने तक सीमित नहीं है.
  94. 7:43–7:46आप अप अद्ध्याय साथ की बात कर रही है.
  95. 7:46–8:16आप जद उसे वापिसलाने किलिए मनिहारिन का रूब दरकर गाँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ
  96. 8:16–8:22अग, वास्तवेग जीवन में शायत पत्वियों का पतनियों को इस तरह मनाना बहुत दूरलब रहा हो.
  97. 8:22–8:26लेकिन नाटक के मंज पर वे इस फन्तसी को जी रही ती.
  98. 8:26–8:30बिलकुल, ये इच्छा पूर्ती का एक आदर्ष उदाहरन है.
  99. 8:30–8:39जब आलेक इन खटनाऊ को सर्फ नोगजोग कहता है, तो इसके बीतर चफे स्वायतता के गेरे संगर्ष को नजर अंदास कर देता है.
  100. 8:40–8:42नोगजोग शब्द बहुत हलका है.
  101. 8:43–8:46आँ, ये इसे एक सादारन चुटकौले में बडल देता है.
  102. 8:46–8:54मैं पूरी तरा सहमत हूं, जब जटिन कहती है कि वो गर का खाम नहीं करेगी, तो वो असल में अपने श्रम का मोल समजार है.
  103. 8:54–8:57बलकुल, वो एक तरा कि सुदे भाजी या हर्ताल है.
  104. 8:57–9:02अगर लेक्हक इस परीप्रेखष्व को जोडता है, तो पात्ख सर्फ एक लोक कता नहीं पड़ेगा,
  105. 9:02–9:06बलकी वो पंदर्वी सदी की महिलाँ के मन के भीतर जाग पाएगा.
  106. 9:06–9:11आप, ये आलेक्ख को एक गेहरी स्थ्रीवादी परद देगा.
  107. 9:11–9:17अर देखे महिलाएं के इस ख्रोद की अभी व्यक्ती केवल उनके वैवाहिक जीवन तक सीमित नहीं रहती.
  108. 9:17–9:19मतलब इसका सर बहर भी होता है.
  109. 9:19–9:24बिल्कुल यह उर्जा अंतत पूरे गाएं और प्रक्रिती को भी प्रभावित करती है.
  110. 9:24–9:29अग, जो हमे इस आलेक की सबसे बदी सन्रचनात्मक चुनाती की अर लेजाता है.
  111. 9:30–9:35समगरी के अंत में मेंडख वाले वर्षा अनुष्ठान का विवरन अत्यंत रोचक है,
  112. 9:35–9:39अद्याय नोड़े जो बंग या मेंदख को कुतने का अनुश्टान है
  113. 9:39–9:41और उसे जग्डालू इस्ट्री के दर्वाजे पर फेखनेगा
  114. 9:41–9:44आप वो मुख्खे कहानी से पूरी तरषे कटा हूँ आलकता है
  115. 9:44–9:48अद्यानक बिना किसी चितावनी के हम एक जादोई तोड़े तोटके पर कुछ जाते हैं
  116. 9:48–9:51और उसे जग्डालू इस्ट्री के दर्वाजे पर फेखनेगा?
  117. 9:51–9:54आआ, वो मुख्ये कहानी से पुरी तरसे कटा हूँ आलकता है.
  118. 9:54–10:00आँसा मैंसुस होता है, जैसे अद्ध्याय आप्टी पत्नी के मिलन के साथ कहानी कहतम हुजाती है.
  119. 10:00–10:05अर फिर अठानक बिना किसी चितावनी के, हम एक जादोई तोड़े तोटके पर कुछ जाते हैं?
  120. 10:05–10:09मतलब लेक्ख खचालक से एक �alag hi vishe par niband liqne lakta hai.
  121. 10:09–10:11यह बहुत ही अपपता मोड है.
  122. 10:11–10:14आलेक यह समजाने में विफल रहता है,
  123. 10:14–10:19के जट जटन की इस कहानी का बारिष बलाने वाले मिंद्ख से क्या लेना देना है?
  124. 10:20–10:24एसा इसलिये है किए प्रक्रती को कहानी के अलग इसे के रूप में रखा गया है.
  125. 10:24–10:54बिल्कुल, जबकी उसे श्रुवाद से ही कहानी के भीटर एक पात्र के रूप में पिरोया जाना जाना जाने जाने जाने जाने जाने जाने जाने जाने जाने जाने जाने जाने जाने जाने जाने जाने जाने जाने जाने जाने जाने जाने जाने जाने जाने जाने जाने जा
  126. 10:54–10:58आप जटिन मजबूर है और अगर इस लाचारी को स्पष्ट किया जाए.
  127. 10:59–11:05तो कहानी के अन्त में महिलाउ दवारेश को निंटरित करने का प्रयास इक स्ववाबिक प्रतिक्रिया लगेगी.
  128. 11:05–11:09वे उस प्रक्रती पर अपनी सत्ता बापस लेना चाती हैं
  129. 11:09–11:11जिसने पहले उनहे बेबस की आ था
  130. 11:11–11:12एक दम सही
  131. 11:12–11:17इसके गलावा अद्याय आप्छ में एक बहुत फुप्सुरत रूपक मोझूद है
  132. 11:17–11:19जिसे नजर अंदास कर दिया गया
  133. 11:19–11:21अच्छा कोंसा रूपक?
  134. 11:21–11:26जब जटिन गर चोडगर चली जाती है, तो जटके गर में जोल मक्रा लग जाते हैं.
  135. 11:26–11:26जब जटिन गर चोडगर चली जाती है, तो जटके गर में जोल मक्रा लग जाते हैं.
  136. 11:26–11:28जटके गर मक्री के जाले.
  137. 11:28–11:32आँ और आंगन में दो भ्यानी गाँ सुगाती है.
  138. 11:32–11:37वर्तमाना लेक इसे केवल गर की बदाली कितरा पेशकरता है
  139. 11:37–11:43लेकिन क्या ये बदाली असल में सुखे और बंजर पन का प्रतीक नहीं है
  140. 11:43–11:44बलकोल
  141. 11:44–11:47जसे बारिष के बना केट सुख जाते है
  142. 11:47–11:51वैसे ही पतनी के बना वो गर एक बंजर जमीन में बडल गया है
  143. 11:51–11:54यही पर वो प्रतिकात्मक समवन्त चिपा है
  144. 11:54–11:58गरेलू सुखा और प्राक्रतिक सुखा एक ही चीज है
  145. 11:58–12:02और जद्टिन वापस लोटती है, तो वेवाईक जीवन हरा बहरा हो जाता है
  146. 12:02–12:32आप दो बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर �
  147. 12:32–12:37आलेक में जग़डलू इस्ट्री की गालीों को सरफ एक अंदविश्वास कहागया है
  148. 12:37–12:44लेकिन असल में स्ट्री का क्रोद, उसका विरहव, और भारिश का आना एक साथ चलते हैं
  149. 12:44–12:48मतलब जग़डलू इस्ट्री का श्राप देना, और जेटिन का पती से रुठना
  150. 12:48–12:52तो अगर लेखा के न चोटे-चोटे विव्रनो को एक साथ गूथ दे,
  151. 12:52–12:55तो अद्याये नाग का अनुश्ठान अलक खलग नहीं लगेगा.
  152. 12:55–12:59अगर वह इस पूरी कता का एक स्वबहाविक चरमोट कष बन जाएगा.
  153. 12:59–13:02तो अगर लेखखें चोटे-चोटे-विव्रनो को एक साथ गूथ दे,
  154. 13:02–13:05तो अद्याये नाउका अनुष्टान अलक-तलग नहीं लगेगा.
  155. 13:05–13:10अग, वह इस पूरी कता का एक स्वबहाविक चरमोद कर्ष बन जाएगा.
  156. 13:10–13:13और पाटक को अह्ँसास होगा, कि यह सुफ दो लोगो का ज़़ा नहीं ता,
  157. 13:14–13:17बलकी मानविया बहावनाव और प्रक्रती के गेरे रिष्ते का दर्षन ता.
  158. 13:17–13:21बिल्कुल, यह सामगरी को एक बिल्कुल नहीं स्तर पर लेजाएगा.
  159. 13:21–13:30अंग, ये सब सुन्ने के बाद मुझे लकता है, कि स्रोथ सामगरी में अपार संबावना है, मूल शोद और अतियासिक तत्छ पहले से ही बहुत मस्वूत है.
  160. 13:30–13:38आँ, बस इसके कतात्मक प्रवाज और मनोवे ज्यानिक विष्लेषन को तोडा और कसने की जरूरत है.
  161. 13:38–13:38बिल्कुल
  162. 13:39–13:41तो आजकी इस विस्त्रिच चर्चा को समेटते हुए
  163. 13:41–13:45हम लिखख के लिए तीन मुख्ध्य रच्नात्मक सुजावों को दोरा सकते है
  164. 13:45–13:46आप बिल्कुल
  165. 13:46–13:47पहला सुजाव
  166. 13:47–13:50गतनावो को सिर्फ एक सुची की तरा रखने के बजाए
  167. 13:50–13:54दिश्छों के बीच भावनात्मक कारन और प्रभाव का पुल बनाएं
  168. 13:54–13:59ता जितें की शुरुाती धमकियों को उसकी बाद की निश्ठा से जोडना
  169. 13:59–14:02ताकी कहानी में मनोवेग्यानिक गेराई आसके
  170. 14:02–14:08अदुस्रा सुजाव, इस नाटक को केवल एक अटियासे कलाक्रिती मानने के बजाए,
  171. 14:08–14:13इसे महिलाँ की मनोवेग्यानिक अभीव्यकती और उनके सुरक्षिट स्थान के रुप में विष्लेषिट करें.
  172. 14:13–14:24बिल्कुल आलेख में ये दिखाना जरूरी है कि कैसे पूरुश वेजदारन करना असल में पित्र सत्ता के भीतर स्वायत्ता और इच्छा पूर्ती का एक संगर्ष्ता.
  173. 14:24–14:54अदनो का निवारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन व
  174. 14:54–15:20अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके �

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आज हम मितला के अटिहासिक जजटिन लोकनाट्टे की कता, राजा शिव्सिंग के दर्बार, और सावन भादो के वर्षा अनुष्ठानो वाले आलेएक पर चर्चा कर रहे हैं. बिल्कोल समगरी बहुत ही दिल्चस्प है. अग, अगर बना किसी देरी के अगर सीदे मुद्दे पर आए, तो प्रस्तुद समगरी में, कता का प्रभाः, दिष्चदर दिष्चतो सपष्ट है, लेकिन विबन उप कतावों की बीच का बहावनात्मक ज़ाव थोडा कमजोर प्रतीथ होता है. अगर अगर अप अप अप श्रोथ समगरी को द्यान से पड़ें तो एक सपश्ट कमजोरी नजर आती है अगर गटनाय बहुत थेजी से बहागती है भिल्कुल किसी चेकलिस्ट की तराव अगर शुरूवात में जटिन की नहर जाने की जिद है अगले ही पल जूमर का खेल शूरू हो जाता है और फिर आचानाग जद खेती किले मोरंग चला जाता है आचानाग जद के तुरन्त बाद सूनार का प्रलोबन आचाता है तुब बिना किसी यह तुब यह सपच्ट प्रिष्ट बूमी के दोनो के भीज तीखा जग्डा हो जाता है. मतलब एक दिष्चे से दुस्रे दिष्चे के भीच पात्र क्या सोच रहे है, यह गायब है. बिल्कुल उनके मान्सिक स्तिती क्या है, उनके फैस्लों के पीचे का बावनात्मक तनाव क्या है, ये सब नदारद है. आलेग हमे ये तो बतारा है कि क्या हुए, लेकिन क्यो हूए, वो हिस्सा पूरी करह से चोट गया है. दिखे जैसा की मैंने नोट से समजा है, यहां मूल तरक यह है कि यह एक लोक नाट्टिय है, है ना? अब भी बद्ख़ाँ बद्ख़ाँ बद्ख़ाँ बद्ख़ाँ बद्ख़ाँ बद्ख़ाँ बद्ख़ाँ बद्ख़ाँ बद्ख़ाँ बद्ख़ाँ बद्ख़ाँ बद्ख़ाँ बद्ख़ाँ बद्ख़ाँ बद्ख़ाँ बद्ख़ाँ बद्ख़ाँ बद्ख़ाँ अद्विनेता के चहरे के बाव, संगीत की ले, या या फेर दर्षकों की जो उर्जा होती है, वो उन भावनात्मक अद्विनेता को अद्विनेता के बाद अलग होती है. अचा रहा हा वो लाईईप पहाँम्मेंस की बाद अलग होती है. बद्याईवाद्याईवाद्याईवाद्याईवाद्याईवाद्याईवाद्याईवाद्याईवाद्याईवाद्याईवाद्याईवाद्याईवाद्याईवाद्याईवाद्याईवाद्याईवाद्याईवाद्याईवाद्याईवाद्याईवाद्याईवाद्याईवा� अगर अगर नहीं से सुदारने के कुछ टोस तरीको पर बात करें, तो लेखख क्या कर सकते हैं? इक बहुत अच्छा तरीका ये हूँ सकता है, के अद्द्याए चार और च्ये के दिश्छों को आपस में गुठ दिया जाए. अद्याए चार ज़ें आगना बाहरने से मना करती है आवगी, वो मना करती है और सुनार के हा जाने की दमकी देती है फिलहाल ये बस एक अलब गटना लकती है और फिर जब अद्याए च्याय में सुनार सच्मुचु से प्रलोबन देता है तो वो द्रिश आचानक से आदमगता है. बलकुल यही तो कमजोरी है. लेक्ह को इन दोनो पलों को जोडना जाहीए. जब अद्याए चार में वो द्हमकी देती है, तो पाटको को ये लगना चाहीए, की ये बस एक हास्यपोन रख है. मतलब अपने पती कद्यान कीचने कीए कूशिष आई एक दम क्योंकी जब अद्याय च्याय में अस्ली परिक्षा आती है जब सूनार सच्में गेहनो का लालगज देता है भिल्कुल तब वो जट्की सुन्दर्ता का बखान करके अपनी वफ़ादारी साबित करती हैं अगर लेखख अद्याए 4 में ये सपश्ट कर दे की उसकी दमकी कुखली ती तो अद्याय 6 में उसकी वफ़ादारी का प्रभाओ दस गुना बर जाएगा आद ब आद बद के आज शवरक्षा बहाव का आदार बनाई तु कहानी बहुत गेरी हो जाएगी अटलब नहर नहर लोटने की उसकी चेतावनी सर्व गुस्सा नहीं लगेगी अब यह यह सर्फ एक समवाद की तरा आता है और क्टम हो जाता है तो इसे कैसे बहतर किया जासकता है अगर लेक्हाक इस दर को उसके बात के आस रक्षा भाव का आदार बनाए तो कहानी बहुत गेरी हो जाएगी अटलब नहर नहां लोटने की उसकी चेतावनी सर्व गुच्सा नहीं लगेगी. बलकोल नहीं वो उस गेहरे दर का प्रकती करन लगेगी कि कही जद किसी और को नाले आए. और नहीं बाद्टागे नहीं तो बज़ादे प्रद्टागे नहीं तो बज़ादे बाद्टागे नहीं तो बज़ादे नहीं तो बज़ादे नहीं तो बज़ादे नहीं तो बज़ादे नहीं तो बज़ादे नहीं तो बज़ादे नहीं तो बज़ादे नहीं तो बज़ा� अगर नहीं बादख को यें ग़ेलूडन्दो की परवाए क्यों करनी चाहिये? एक दम सही यें नाटक महिलाएं के बीज सद्यो तक इतना लोग प्रियव क्यो रहा इसका व्यापक महत्व क्या है यें नदारत है अजके पाटक को इन गरेलु दन्वो की परवाए क्यों करनी चाही है एक दम सही ये नाटक महिलाओ के बीच सद्यो तक इतना लोग प्रिया क्यो रहा इसका व्यापक महत्व क्या है ये नदारत है लिकिन क्या हम इस पर कुछ जीआदा ही आदूनिक चश्मा नहीं च़ारा है? आप आप यह सा क्यो सुचते है? मडलब अगर यह सिर्फ मनूरंजन के लिए क्या जाने वाला एक सीथा सादा गाँँगा के खेल ता तो क्या हम मनोविग्यनिक प्रासंगिक्ता दूनकर यसे बेकार में जटिल तो नहीं बना रहें? वूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ� अपने अबी विक्ती के एक मंच्के लुप में प्रस्तुत करना जाहीए. अच्छा मतलब एक एसा अब्ट्लेट, जहाँ वे अपनी बात कैसकें? बिलकुल उस पित्र सत्तात्मक समाज में, जहां महिलाओ की आवास दबी हुई ती, ये नाटक उने अपनी कुन्ताए, इच्छाए, और शिकाएते विक्त करने का मुगा देता था. और वो भी एक सामाजिक रूप से सुएक्रित तरीके से. आप लेक्खक ने एतिहासिक विव्रन तो दे दिये, लेकिन वे इस मनोवैग्यानिक निकास वाले पहलु को उभारने से पूरी तर चूक गये हैं. आप मुझे ये बाज समझ में आरी है. जैसे अद्द्याय एक में ही देखिये. जहां पूरुशों की बूमिका का जिक्र है. आप, लेक्खक ने बताया है, कि इस नाटक में जटका चरित्र भी महिलाए दोरा ही निभाया जाता ता. और आलेक इसे सर्फ एक सादारन नियम या मजबूरी की पेश करता है. भिल्कुल. जब कि इसे लिखने का अदिक प्रभाउशाली तरीका ये हो सकता है, की इसे वेवाएक सत्ता को पलटटने के तरीके के रूप में दर्शाया जै एक दम सतीक मतलप कलपना की जे उस दोर की जब भूंगत और परदा प्रत्टा इतनी हावी थी हाँ महिलाों का गर से बाहर निकलना भी मुष्किल होटा होगा तब एक महिला का दूती पहेंकर, मुच्लगागागर एक पूरूश की तरा चलना और पूरूश के अदिकार वाले समवाद बोलना आआ, ये कितना बड़े विद्रोही कदम रहा होगा ये सरफ नकल उतारना नहीं है ये सत्ता का एक प्रतिकात्मक रस्तान्तरन है सही बात है, लेखख को उस रोमान्च और सुत्टन्तरता की बावना का वरनन करना चाहिये, जो उस महिला नर्तकी को महसुस होती होगी. भिल्कुल, और ये बात केवल पूरुश का रूब दरने तक सीमित नहीं है. आप अप अद्ध्याय साथ की बात कर रही है. आप जद उसे वापिसलाने किलिए मनिहारिन का रूब दरकर गाँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ अग, वास्तवेग जीवन में शायत पत्वियों का पतनियों को इस तरह मनाना बहुत दूरलब रहा हो. लेकिन नाटक के मंज पर वे इस फन्तसी को जी रही ती. बिलकुल, ये इच्छा पूर्ती का एक आदर्ष उदाहरन है. जब आलेक इन खटनाऊ को सर्फ नोगजोग कहता है, तो इसके बीतर चफे स्वायतता के गेरे संगर्ष को नजर अंदास कर देता है. नोगजोग शब्द बहुत हलका है. आँ, ये इसे एक सादारन चुटकौले में बडल देता है. मैं पूरी तरा सहमत हूं, जब जटिन कहती है कि वो गर का खाम नहीं करेगी, तो वो असल में अपने श्रम का मोल समजार है. बलकुल, वो एक तरा कि सुदे भाजी या हर्ताल है. अगर लेक्हक इस परीप्रेखष्व को जोडता है, तो पात्ख सर्फ एक लोक कता नहीं पड़ेगा, बलकी वो पंदर्वी सदी की महिलाँ के मन के भीतर जाग पाएगा. आप, ये आलेक्ख को एक गेहरी स्थ्रीवादी परद देगा. अर देखे महिलाएं के इस ख्रोद की अभी व्यक्ती केवल उनके वैवाहिक जीवन तक सीमित नहीं रहती. मतलब इसका सर बहर भी होता है. बिल्कुल यह उर्जा अंतत पूरे गाएं और प्रक्रिती को भी प्रभावित करती है. अग, जो हमे इस आलेक की सबसे बदी सन्रचनात्मक चुनाती की अर लेजाता है. समगरी के अंत में मेंडख वाले वर्षा अनुष्ठान का विवरन अत्यंत रोचक है, अद्याय नोड़े जो बंग या मेंदख को कुतने का अनुश्टान है और उसे जग्डालू इस्ट्री के दर्वाजे पर फेखनेगा आप वो मुख्खे कहानी से पूरी तरषे कटा हूँ आलकता है अद्यानक बिना किसी चितावनी के हम एक जादोई तोड़े तोटके पर कुछ जाते हैं और उसे जग्डालू इस्ट्री के दर्वाजे पर फेखनेगा? आआ, वो मुख्ये कहानी से पुरी तरसे कटा हूँ आलकता है. आँसा मैंसुस होता है, जैसे अद्ध्याय आप्टी पत्नी के मिलन के साथ कहानी कहतम हुजाती है. अर फिर अठानक बिना किसी चितावनी के, हम एक जादोई तोड़े तोटके पर कुछ जाते हैं? मतलब लेक्ख खचालक से एक �alag hi vishe par niband liqne lakta hai. यह बहुत ही अपपता मोड है. आलेक यह समजाने में विफल रहता है, के जट जटन की इस कहानी का बारिष बलाने वाले मिंद्ख से क्या लेना देना है? एसा इसलिये है किए प्रक्रती को कहानी के अलग इसे के रूप में रखा गया है. बिल्कुल, जबकी उसे श्रुवाद से ही कहानी के भीटर एक पात्र के रूप में पिरोया जाना जाना जाने जाने जाने जाने जाने जाने जाने जाने जाने जाने जाने जाने जाने जाने जाने जाने जाने जाने जाने जाने जाने जाने जाने जाने जाने जाने जाने जा आप जटिन मजबूर है और अगर इस लाचारी को स्पष्ट किया जाए. तो कहानी के अन्त में महिलाउ दवारेश को निंटरित करने का प्रयास इक स्ववाबिक प्रतिक्रिया लगेगी. वे उस प्रक्रती पर अपनी सत्ता बापस लेना चाती हैं जिसने पहले उनहे बेबस की आ था एक दम सही इसके गलावा अद्याय आप्छ में एक बहुत फुप्सुरत रूपक मोझूद है जिसे नजर अंदास कर दिया गया अच्छा कोंसा रूपक? जब जटिन गर चोडगर चली जाती है, तो जटके गर में जोल मक्रा लग जाते हैं. जब जटिन गर चोडगर चली जाती है, तो जटके गर में जोल मक्रा लग जाते हैं. जटके गर मक्री के जाले. आँ और आंगन में दो भ्यानी गाँ सुगाती है. वर्तमाना लेक इसे केवल गर की बदाली कितरा पेशकरता है लेकिन क्या ये बदाली असल में सुखे और बंजर पन का प्रतीक नहीं है बलकोल जसे बारिष के बना केट सुख जाते है वैसे ही पतनी के बना वो गर एक बंजर जमीन में बडल गया है यही पर वो प्रतिकात्मक समवन्त चिपा है गरेलू सुखा और प्राक्रतिक सुखा एक ही चीज है और जद्टिन वापस लोटती है, तो वेवाईक जीवन हरा बहरा हो जाता है आप दो बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर बगर � आलेक में जग़डलू इस्ट्री की गालीों को सरफ एक अंदविश्वास कहागया है लेकिन असल में स्ट्री का क्रोद, उसका विरहव, और भारिश का आना एक साथ चलते हैं मतलब जग़डलू इस्ट्री का श्राप देना, और जेटिन का पती से रुठना तो अगर लेखा के न चोटे-चोटे विव्रनो को एक साथ गूथ दे, तो अद्याये नाग का अनुश्ठान अलक खलग नहीं लगेगा. अगर वह इस पूरी कता का एक स्वबहाविक चरमोट कष बन जाएगा. तो अगर लेखखें चोटे-चोटे-विव्रनो को एक साथ गूथ दे, तो अद्याये नाउका अनुष्टान अलक-तलग नहीं लगेगा. अग, वह इस पूरी कता का एक स्वबहाविक चरमोद कर्ष बन जाएगा. और पाटक को अह्ँसास होगा, कि यह सुफ दो लोगो का ज़़ा नहीं ता, बलकी मानविया बहावनाव और प्रक्रती के गेरे रिष्ते का दर्षन ता. बिल्कुल, यह सामगरी को एक बिल्कुल नहीं स्तर पर लेजाएगा. अंग, ये सब सुन्ने के बाद मुझे लकता है, कि स्रोथ सामगरी में अपार संबावना है, मूल शोद और अतियासिक तत्छ पहले से ही बहुत मस्वूत है. आँ, बस इसके कतात्मक प्रवाज और मनोवे ज्यानिक विष्लेषन को तोडा और कसने की जरूरत है. बिल्कुल तो आजकी इस विस्त्रिच चर्चा को समेटते हुए हम लिखख के लिए तीन मुख्ध्य रच्नात्मक सुजावों को दोरा सकते है आप बिल्कुल पहला सुजाव गतनावो को सिर्फ एक सुची की तरा रखने के बजाए दिश्छों के बीच भावनात्मक कारन और प्रभाव का पुल बनाएं ता जितें की शुरुाती धमकियों को उसकी बाद की निश्ठा से जोडना ताकी कहानी में मनोवेग्यानिक गेराई आसके अदुस्रा सुजाव, इस नाटक को केवल एक अटियासे कलाक्रिती मानने के बजाए, इसे महिलाँ की मनोवेग्यानिक अभीव्यकती और उनके सुरक्षिट स्थान के रुप में विष्लेषिट करें. बिल्कुल आलेख में ये दिखाना जरूरी है कि कैसे पूरुश वेजदारन करना असल में पित्र सत्ता के भीतर स्वायत्ता और इच्छा पूर्ती का एक संगर्ष्ता. अदनो का निवारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन वारन व अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके अपके �

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