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जट-जटिनक_दाम्पत्य_आ_वर्षाक_तान्त्रिक_रहस्य.m4a

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Part 9 · VIDEHA MITHILA MAITHILI DISCUSSION CRITICISM SERIES PART 9
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  1. 0:00–0:12विमर्शक इस मंच्पर आहक स्वागत आजी, मतलब कल्पना करू, सावन भादोक के इक डान्दर्या राती आची, चारोदिस निस्टब्दता जी मुदा गाँँके किछ इस्ट्ट्री गन जागल चादिं.
  2. 0:12–0:19अँ सब मने एक ता मरल बेंग के लोकर गाँक सबसा जग़ा ही इस्त्रिक दरवज़ा पर फेखी रहा जातीन.
  3. 0:19–0:20एक दम.
  4. 0:20–0:24जायसाम भोर में उस्त्रि उठीक गाडी दे,
  5. 0:24–0:28ता आई हम सब मित्लाक प्रसिद लोक नाट जजजटिन को उही रहस्से के खंगाराँ,
  6. 0:28–0:31जे एक दिस्त द विशुद वनोरन्जक आब हाँनात्मक लागे ता ची
  7. 0:31–0:35मुदा दूसर दिस एहन, गूड, आज्जादुई अनुश्धाना संजोडा लाची
  8. 0:35–0:38जेक्रा भुजनाई आएदरी अक्ता चनाउती आची
  9. 0:38–0:43सक्ते कहलो, ता गजेंदर ताकुर दोरा संपादित स्रोट समग्रिक आदार पर,
  10. 0:43–0:46आई हम सब एही बात पर विमर्ष करहल ची,
  11. 0:46–0:49जे की इ लोकनात मुख्य रुप सा दामपत जीवन,
  12. 0:49–0:54इस्त्री विमर्श आप पारिवारेक मनोविग्यानक एक ता यधार्त वादी प्रस्तुती आची वा
  13. 0:54–0:58वा इमूलता प्रक्रती के निंट्रित करबाक एक तान्त्रिक प्रयास ची
  14. 0:58–1:00हा इहे मूल प्रष्न ची
  15. 1:00–1:03हमर इद्रिध मान्नेता आची
  16. 1:03–1:07जजद जटीन पूरनता एक ता मनोविग्यानिक दर्पन अची
  17. 1:07–1:13जते स्त्री आपन दामपत जीवनक अदिकार आब हावनाके अभिव्यक्त कराई तची
  18. 1:13–1:16और हमर इमान आची जे इपारिवारि कता
  19. 1:16–1:19इब हावना इमनोविग्यान
  20. 1:19–1:23भी बवाँ बाँ तान्त्री कुबाया ची कोनो आदूनिक स्त्रीविमर्ष नहीं
  21. 1:24–1:27हमर भूजी रहल ची जे आहा आहें की एक सोचाईत ची
  22. 1:28–1:31मुदा हमरा एक द्बिन्नद्रिष्टिकोन देवाख्या
  23. 1:31–1:33बुजिरहल ची जे आहा आहन की एक सोचाईता ची
  24. 1:33–1:35मुदा हमरा एक द्बहिन द्रिष्टिकों देवा कनुमती दीः
  25. 1:35–1:37जकन हम एही नाटक कठावस्तू के गेराई से देखगच्छी
  26. 1:37–1:39ता इस पस्ट होईता ची
  27. 1:39–1:41एकर केंदर में पूरनता स्ट्री मनोविग्यान
  28. 1:41–1:43अदूनिक स्त्री विमर्ष नहीं
  29. 1:43–1:45हमर भूजी रहल ची
  30. 1:45–1:47जे आहा आहें की एक सोचाई तची
  31. 1:47–1:49मुदा हमरा एक तब भिन्न द्रिष्टिकों
  32. 1:49–1:51देवा कनुमती दिया
  33. 1:51–1:53जकन हम एही नाटक कथावस्तूके
  34. 1:53–1:55गेराई से देखेच ची
  35. 1:55–1:57ता इस पष्ट होगी तची
  36. 1:57–2:01पूर्नतस्त्री मनोविज्यान आदाम्तक्त जीवनक संगर्ष ची.
  37. 2:02–2:06मुदाओ सावन भाद्वक मास में होई तची, तोक्रहा अनुश्ठान से अलक्कोना का सकेची.
  38. 2:07–2:12दिखु, नवव विवाहीता जटिनक आपन नेहर आथात माएक गर जाएबाक हतके,
  39. 2:12–2:16अगे लेल जटिन दवारा देल गेल तरक सबख्के देखू,
  40. 2:16–2:20उ कहे च्थिन जे यदी पैग भाई हम्रा लेल नहीं आभी सकच्थिन,
  41. 2:20–2:24तक उनो नवा थाकृर ब्राम्हन वा च्छोटका बाए के पत्हे बाख चाही.
  42. 2:24–2:27रही, यवरनन ता अच्छी सामगरी मे.
  43. 2:27–2:29आई आई आई ता अज़्ाई के पथेबाग चाही
  44. 2:29–2:31आई वरनन्ता अच्छी सामगरी में
  45. 2:31–2:34इक्धम आई ते आई आई के मिख्ला के सामाजिक तानाबानाग
  46. 2:34–2:36बहुत सुख्ष्मि चित्रन बहितत
  47. 2:36–2:40भिदागरिक नियम जते स्त्री के लोग जाएत अख्के नहीं
  48. 2:40–2:43आईस, इस सब वही समाज का मनोविग्यानिक यतार थाचल,
  49. 2:43–2:46एकर अत्रिक्त जखन जत मोरं कमायल जाएच्छतिन,
  50. 2:46–2:49तजटिन लग एक ता सूनार अबे तची.
  51. 2:49–2:51आ, उ गहनाक प्रलोबन दे थची.
  52. 2:51–2:55आ, मुदजटिन उहे प्रलोबन के अस्विकार कर देच्छतिन,
  53. 2:55–2:57अर अपन पतिक सुन्दर्ताक वरनन करे च्थिन
  54. 2:57–3:00इविशुद रूप से इस्ट्री निष्था
  55. 3:00–3:01चारित्रिक द्रद्ता
  56. 3:01–3:05अब विवाहक बात कबहावात्मक द्वन्द कप्रामानिक प्रस्थूती आची
  57. 3:05–3:07जै इं मनोविग्यान नहीं आच्ट, तकी आच्ट
  58. 3:07–3:11आहा समाजी कत्हा आब भावना के केंदर मेराखे रहाल ची
  59. 3:11–3:15मुदाई भिस्री रहाल ची जी इनाटक कोनो सामान ने समे मेंने
  60. 3:15–3:18बलकी सावन भादवक राथ्ती में होई तची
  61. 3:18–3:22विद्द्यापती की समेसा माने जे पंद्रमावा सताबदी के दरबार चल
  62. 3:22–3:24आँ, महराज शिव्सिंक का दर्बार
  63. 3:24–3:27इक दम, तही काल साई कता जिवेंत आची
  64. 3:27–3:30अटक्हन सा लोका आईदरी मिखला में
  65. 3:30–3:33इसमः वर्शा अख्क्रिषी के लेल
  66. 3:33–3:35जिवन मरनक समे मानल जाई तची
  67. 3:35–3:37जगन जटिन नेरजाए का हद करे चे थी
  68. 3:37–3:41तजजटक उत्तर की होईता ची उबावुग भकिनारो के ची
  69. 3:41–3:45उख़े चा छी जे दहान का फसल तधयार आची
  70. 3:45–3:49आआ उष्पस्ट खे चा छी जे दहान का फसल तधयार आची
  71. 3:49–3:53तक्रा काटी का जाओ एता एक ख्रिषी कारे कप रात्मिक्ता
  72. 3:53–3:57दाम्पत्ते भावनासा स्पष्ट रूपसा उपर राखल गे लची.
  73. 3:57–4:02आ, आहा सूनारक प्रलोबन अस्विकार करभाकचिग गब कहला हू,
  74. 4:02–4:06उक्राहाम चरित कद्रदता से भीषी अनुश्टानिक पवित्रता क्रूप में देखे ची.
  75. 4:06–4:10पवित्रता, मतलब आहा उक्रा से हो अनुश्ठान सा जोडी रहल ची.
  76. 4:10–4:11निस्छित रूप सो.
  77. 4:11–4:17लोक परमपरा में जी अनुश्ठान वर्शावा प्रक्रूति के मनेवाख लिल के लिल ची,
  78. 4:17–4:20बुजलो ना, औही में बहाग लिवा वाली स्त्री,
  79. 4:20–4:24या पात्रक पवित्रता अनिवार्य मानल जाईत छे,
  80. 4:24–4:28जए अनुश्धान पूँन रूपेन पवित्र न नहीं होएत,
  81. 4:28–4:29तप्रक्रती नहीं मानत,
  82. 4:29–4:35तेम सुनारक प्रसंग केवल जदीनक पवित्रता प्रमानित करवाक लिल अची,
  83. 4:35–4:41जाही से इसिद बहुसके जे यो वर्शा आवानक अनुश्टानक लिल योग्गे पात्र चति.
  84. 4:42–4:45इस सत्या छी जे क्रिषी उई समाज का आद्धार चल,
  85. 4:45–4:48मुदा हमरा इई नहीं विसरबाक चाही,
  86. 4:48–4:53जि लोक नात्या अखला हमेशा रूपक का माने मेटाफर का प्रियोक करेता ची
  87. 4:53–4:55आज सुखाडग बात करे ची
  88. 4:55–4:59मुदज़ा इक केवल भोटिक अवष्षकता वक्रिषिक अनुश्थान चल
  89. 4:59–5:03ता नातक में इत दे गंभीर भावनात्मक रूपक का प्रियोक की खेल गेल
  90. 5:03–5:04जेना की
  91. 5:04–5:05जेना
  92. 5:05–5:10जगन च्हूंकी सच्वाईबा कारन सब मानित भैजटिन रूस का गर चोडी देचचती
  93. 5:10–5:14आजजट उक्रा खोजबाक लेल गोपी अ मनिहारिन नक्रुब दारन कर इच्चती
  94. 5:14–5:17इत विषुद प्रेम कनवेशन अची
  95. 5:17–5:21हमर स्रोट समगरी में एक तब बहुत सुन्दर चित्रन ची
  96. 5:21–5:24जटीनक बिना जटक गर में जोल मक्डा बहुरी जाईत ची
  97. 5:24–5:27आँ आँँन मे दूभी जन्मव शुरुब हो जाए तची
  98. 5:27–5:28आँ एक दम
  99. 5:28–5:34तब हम्रा विचारा सब येबल एक ता भोति कवस्ता वा गंदा गरक वरनन न न न आची
  100. 5:34–5:37एक उतक्रिष्ट मनो विग्यानि कुप मा आची
  101. 5:37–5:39अगर जीवनाक संटूलन भिगरी जाईते थाची
  102. 5:39–5:41अगर जीवनाक संटूलन बिगरी जाईतची
  103. 5:41–5:43इत एक ता गंवेर इस्ट्री विमर्ष्ष अची
  104. 5:43–5:45जते समाज इस विकार करे रहल अची
  105. 5:45–5:47जे गरग पुरनता इस्ट्री से आची
  106. 5:47–5:49आगा गप विचार निया आची
  107. 5:49–5:51मुदा हमरा एक ता देखा जनमव
  108. 5:51–6:06अगर जीवनाक संटूलन बिगरी जाईते ची इत एक ता गमभीर इस्ट्री विमर्ष्ष रची जते समाज इस्विकार करे रहाल अची जगरक पूरनता इस्ट्री से आची.
  109. 6:06–6:11आहा गब विचार निया आची, मुदा हमरा एक ता दोसर द्रिष्टिकों राखे दिया.
  110. 6:11–6:15आहा जोल मक्रा अदूपके क्या बावनात्मक शुन्यताक प्रतिक मानी रहल ची
  111. 6:15–6:18जक्चन की हम एक रा सीदा सुखाडा क्या थार्त माने चीः
  112. 6:19–6:22सीदा सुखाड मुदा उत गरक भीट्रक वरना ची
  113. 6:22–6:25हा, मुदा लोक माने ता में
  114. 6:25–6:30इस्त्री के प्रक्रतिक स्वरूपा विशेष्का उर्वर्ताक प्रतिक मानल गेल आची
  115. 6:30–6:36जखन जट्ट्टिन जए ते प्रक्रतिक प्रतिरूप जद्टी, रूटिक का चली जए चद्टी,
  116. 6:36–6:41तब द़द्ध, जे एक तख रूशकग प्रत्निध्व करे चती जीवन में शुन्यता आभी जाईताची
  117. 6:41–6:45मुदा यी शुन्यता बहावनात्मक सा भेसी बहुतिक आची
  118. 6:45–6:49मने आख कह बची जे जोल मक्रा दरिद्द्द्द्दाख प्रतिक आची
  119. 6:49–6:56इक्द, खेद सुखी जाएतची, गर में दरद्रता भी जाएतची, आनंग्ट सुन्सान बजाएतची.
  120. 6:56–7:04जटक, गोपी वो मनिहारिन के रुब दोगे हुंका खोजब, वास्तो में वर्षाके मनेबाक लेल कयल गे लेक्ता तान्त्रिक प्रयास अचे.
  121. 7:04–7:14आजक मनुवे ग्यानिक व्याख्या सुन्मे मदूर लगे तची, मुदा उई समे के क्रिषक समाजक तद्कालीन अवष्षकता भावना से भेसी भोद्टिक अन्नच्छल.
  122. 7:14–7:20एक ता भोखल समाजके लेल जोल मक्डा समवाद हीं तक नहीं बलकी भुख्मरीक संके तची.
  123. 7:20–7:50वाँद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्
  124. 7:50–7:52तई कोनो सादारन गवप नहीं आची
  125. 7:52–7:54वो गणनाक माग करे चछतिन
  126. 7:54–7:56आपन असन्तोष वेक्त करे चछतिन
  127. 7:56–7:59एक ता एहन पित्र सतात्मक समाज में
  128. 7:59–8:02जते इस्त्री के आपन गवप रखबाक अवसर कम भीटे चल
  129. 8:02–8:04ए नाटक इस्त्री गन के आपन
  130. 8:04–8:07अपन असन्तोश व्यक्त करबाक मन्च देछ्चल यह मनेई ची
  131. 8:07–8:12ता इज़जदिन क नोग जोग इस्त्री सशक्ती करना केक्ता प्रारमबिक रूप आजी
  132. 8:12–8:17जते उआपन पतिक आर्थिक इस्तिती पर सीदा प्रष्नुता सकेट ची
  133. 8:17–8:19आवकर आलोचना का सकेट ची
  134. 8:19–8:22ये के वल वर्शाक लिल कैलगल अनुष्टान नहीं बहुशके दची
  135. 8:22–8:25ये यस्त्री सोटन्त्रताक एक ता सांस्क्रितिक प्रकति करन आची
  136. 8:25–8:28हम आई हि दिसा सा आहा साहम आची
  137. 8:28–8:31जे यी नाटक सरवता यस्त्री गना का पन अनुष्टान आची
  138. 8:31–8:39अईक्रा सहुनका समोहिक मनुरनजन अविवेक्ती बेटाई चल, मुदा हम अईक्रा इस्त्री ससक्ति करन कावाक लिल तैयार नहाची.
  139. 8:39–8:44की एक माई? अपतिक आलोचना कार अर्चतिन इत ससक्ति करन भेलना?
  140. 8:44–8:46हमाई दोसर तरीका सां देखे चे.
  141. 8:46–8:52आहा दियान दियो जगन जदिन नेहर जाएक हाद कराई चथिन
  142. 8:52–8:57आजज चाहे चथिन जे उन नहीं जाय ता जद् हुनका की कहे चथिन
  143. 8:57–9:00उ सोतिन लाबाग बहे दिखावे चथिन
  144. 9:00–9:04आजज तुरन्त दराजाए चथिन
  145. 9:04–9:11इप्रस्श्ण्ग अस्पश्ट्रूप सदेक्वेत आची जे इस समाज पित्र सत्तात्मक वास्त्विक्ता सम्भार नही आची.
  146. 9:11–9:17जट्टिन कव्यंग, उहातिया सिक्डी कब, इस सब वास्तो में मनोरन्जक उप्द्रिष्या आची.
  147. 9:17–9:23जखन राती राती बर स्ट्री गन वर्षाक लेल जागल रही च्छतिन
  148. 9:23–9:27तद समः भितवाक लेल उनका एहन हास्यव्यंगयक आवष्टा हो इतिचल.
  149. 9:27–9:32मुदा की हम अग्रा केवल समः भितवाक सादन कही सके ची?
  150. 9:32–9:36देखो, कोनो पित्र सत्तात्मक समाज में विद्रोज नहीं बधगग,
  151. 9:36–9:39ताही लेल एहन चोट-चोट सुरक्षित मन्च दिल जाएत छी,
  152. 9:39–9:42जते इस्त्री आपन भाडास निकाली सकए.
  153. 9:42–9:51इस्ब सम्वाद इस्ट्री के औही पिट्र सत्तात्मक धाचाख भिटर सान्त्वना देबाक इक ता फंशनल तरीका चल कोनु क्रान्तिकारी सचक्ति करन नहीं
  154. 9:51–9:55जद-चट इन पिट्र सत्ताक विरोध नहीं करे तची
  155. 9:55–9:59तोक्रा सुरक्ष्ट्राखाईत प्रक्रती के मने बाग काज कराईताची
  156. 9:59–10:03एक रहाब जे यी सब के वल समे भितावाक लेल चला
  157. 10:03–10:08हम्रा लागेत आची जे औही काव्यात्मक आब हाबनात्मक गेराएके नजर अंदाज कराब आची
  158. 10:08–10:11जे नाटक प्रस्तूत कराईत आची
  159. 10:11–10:14जटिनक दरायत पित्र सत्ता क्यतार्त भहसा कै तची
  160. 10:14–10:18मुदा नाटकक मुल स्वर उई भहसा भेसी प्रेम को जी
  161. 10:18–10:20प्रेम अग, उके ना?
  162. 10:20–10:24जे ना, पुरेनिक पात अरथात कमल के पता पर चडी जूमर केलाएप
  163. 10:24–10:26वप प्रतिकात्मक विवाह करब
  164. 10:26–10:29इसब द्रिश अतीब रोमानी अग काव्यात्मक अची
  165. 10:29–10:32और जगम नाटक अक नाटकी अचरमोद कर्ष पर आभी
  166. 10:32–10:36तो उकी आची उआची जट अजटीनक पुनर मिलन
  167. 10:36–10:38आआ, उदोनो अंतता मिली जाए चाछतीन
  168. 10:38–10:41एक दम, जचाचन जटीनक ख्रोद शान्त होगी तची
  169. 10:41–10:43प्रेम फेर विज़ेई होई तची
  170. 10:43–10:45उ आपन गर आभी जाएच्छे थिन
  171. 10:45–10:47इदेखावे तची
  172. 10:47–10:48जे दामपत्या जीबन में
  173. 10:48–10:50लाग मन्मुटाब,
  174. 10:50–10:50गरीभी,
  175. 10:50–10:52सोतिनक भाई,
  176. 10:52–10:53वाविरह हुए,
  177. 10:53–10:54अंतता,
  178. 10:54–10:56प्रेम अ समजदारिक जीथ होई तची
  179. 10:56–10:59इएक तपुड पारिवारिक चक्र के सबल समापन आची
  180. 10:59–11:00इद्रेखावे दची
  181. 11:00–11:05जे समाज अंत तब परिवारक के एक जुट्रखबाक संदेस दर है लची
  182. 11:05–11:07मुदा आहा इविचार करूए
  183. 11:07–11:10जे यदी नाटक पुनर मिलन पर समाप्त बहुजाए तची
  184. 11:10–11:16जदे प्रेम विज़यी भागेल, तव उकर भाद कव वीबध्स अनुश्धान कियकल जाईता ची.
  185. 11:16–11:22हमर तरक को सबसं सबल साखश य अन्तिम द्रिष्या ची, जगर आहा नजर अंदास कर हल ची.
  186. 11:22–11:25आहा उही बैंक अनुश्धानक गप कर हल ची.
  187. 11:25–11:29जट आजातीनक प्रेमक पुरर मिलनक तुरन्त बाद उही राती में
  188. 11:29–11:34इस्त्रीगन बैंग के एक ता श्रद्दा दूनी में दोग कुतेद शती
  189. 11:34–11:39एकर बाद उमरल बैंग के कोनी औजग़ागी इस्त्रीक दरबाजा पर फेखिया वेच छती
  190. 11:39–11:45जए इ नाटक दामपत प्रेम अचल तई हि हिन्सा अगारी गलोजकर की काज
  191. 11:45–11:47तव आहा कनुसार एक रपाचु की विग्यान अचल?
  192. 11:47–11:51एक रपाचु एक तब होत गमभीर तान्तरिक विग्यान काज कर रहल अची
  193. 11:51–11:55जक्रा हम सब सहान वूटिक जादू वास सिमपेत्तिक माजिक कही सकती ची.
  194. 11:55–11:57तान्तरिक माननेता कनुसार,
  195. 11:57–12:01प्रक्रितिके संतुलित करबाक लेल विप्रीद सक्तिक प्रियोक केल जाए चे.
  196. 12:01–12:05जखन उ जग्राही स्ट्री भूर में बंके देखी क्रोदिद भाँगारी देद,
  197. 12:05–12:11तो खर ख्रोद अगारी सा वातवरन मेक्ता मनोवेग्यानी गर्मी वा ताप उत्पन होएत.
  198. 12:11–12:14ओ, तो उगारी ख्तापस वर्षाक आहावान होएत छी.
  199. 12:14–12:15एक दम.
  200. 12:15–12:23उख्रा तद्धा कर्बाकलिल वर्षा करत्ध, जदेक भेसी उ गारी परध, तदेक भेसी वर्षा होएद.
  201. 12:24–12:30इते स्त्रीक ख्रोध आप्रक्रतिक वर्षा कि भीज शीडा तान्त्रिक संबंच थापित काल गेल जे.
  202. 12:30–12:34वर्शा कि बीज शीदा तान्त्रिक समबन स्तापित काईल गेल जे.
  203. 12:34–12:40समपुन प्रेम कता, विर्ड, अपुनर मिलन, एह जादूई अनुष्टानक भूमिका मात्रा ची.
  204. 12:40–12:41बूमिका मात्रा?
  205. 12:41–12:42राग.
  206. 12:42–12:46उस्त्रीगन के उही भावनात्मक स्तितिदरी लावबाक सादन चल,
  207. 13:00–13:04जे अन्तिम अनुश्धान वर्शाँ से जुडल आची
  208. 13:04–13:07आ आगाक इ तान्तरिक ताः वर्शाँक सिद्धान
  209. 13:07–13:09बहुत तार्किक लागत आचे
  210. 13:09–13:12मुदा हम एक्रा भूमिका मात्र कही का
  211. 13:12–13:14खन्दित नहीं कर सके ची
  212. 13:14–13:17बेंग के अनुश्धानक अपन तान्तरिक महत्व आची
  213. 13:30–13:34इसादारन अची कि एक तट इम आनब भावना,
  214. 13:34–13:38पारिवानिक स्मेह, नोक जोग, पतिपतनिक भीचक,
  215. 13:38–13:42प्रेम अप प्राक्रतिक आवष्षकता दून्नुके
  216. 13:42–13:45एक संगे गुथ दईतची.
  217. 13:45–13:48यदी ओलोक केवल अनुश्ठान करबाक लेल चाहित,
  218. 13:48–13:51तो उगर उखर एक उद्क्रिष्ट मानविय खखाक संजोडल गेल,
  219. 13:51–13:54जाही सं समाज आपन सुख दुक के से हो उहीम देखी सकै.
  220. 13:54–13:58आहां की बाज सत्ते आचे, जे उषब सीथा अनुष्टान कर सके चल,
  221. 13:58–14:01अद्क्रिष्ट मानविय कखाक संजोडल गेल,
  222. 14:01–14:03जाही सन समाज आपन सुख दुक्के से हो,
  223. 14:03–14:05उही में देखी सकई.
  224. 14:05–14:06आहाँ की बाज सत्ते आचे,
  225. 14:06–14:09जे उसब सीथा अनुष्ठान कर सके चल,
  226. 14:09–14:10आई एहो सत्ते आची,
  227. 14:10–14:13जे लोक नाट्ते समाजक दरपन होई तची.
  228. 14:13–14:20अम आईबाज से सहमच फीज, जे एकला मानव भावना आप्राक्रतिक आवष्षकताक एक ता अदुप्रत संगम आचे.
  229. 14:20–14:25एक ता क्रिषिक समाज में जते वर्षा जीवनलेल अनिवारे आचे,
  230. 14:25–14:28उते लोग आपन मान्सिक तनाव के कम कर बाकलेल
  231. 14:28–14:30आहन अनुश्ठान के जन्मदैत अची
  232. 14:30–14:34जाही में उनकर आपन जीवनक प्रती भिम्ब से हो हो आए
  233. 14:34–14:38जे ना, जे उ गरीबी और साथिनक दर के प्रसंग अचे
  234. 14:38–14:41आप, जे जे तिनक नोग जोग
  235. 14:41–14:43वास्तम में उही समाजक यतार्त है,
  236. 14:43–14:46उ गरीभी, उ हाती भिका जाएब,
  237. 14:46–14:48उ सोतिन निक दर,
  238. 14:48–14:51इसम उही समाजक दिन प्रतिदिनक संगर्ष अचे.
  239. 14:51–14:53मुदा हमर कहब इय आचे,
  240. 14:53–14:55जे एही सब संगर्ष कष्समाजान
  241. 14:55–14:58उलोकनी प्रक्रती के मनेवा में देखे चला.
  242. 14:58–15:01माने वर्शा भेजाएत ता सब दीख भेजाएत?
  243. 15:01–15:04एक दम जवर्शा भेजाएत ता खेत में अन होएत,
  244. 15:04–15:09गरी भी दूर होएत, आप फिर सोतिन वा विरह का वषकतन नहीं रहत.
  245. 15:09–15:11ते इक ता जत्दिग यतार्थ वादिय चे,
  246. 15:11–15:14उकर अंतिम लक्ष उत्बे अनुष्टानी कचे,
  247. 15:14–15:17उही जग्राही इस्ट्री गारे से
  248. 15:17–15:19प्रक्रती के त्धा कै वश्षा लाबव.
  249. 15:19–15:23इघ्टा बहुत नीक बिन्दू पर लवाई तची,
  250. 15:23–15:25जते इए अस्पष्ट होई तची,
  251. 15:25–15:29जे लोग परमपरा में कोनो एक ता सपष्ट भिवाजन रेखा नहीं खिचाल जासके ता ची.
  252. 15:30–15:31हम अपन श्रोटागन के,
  253. 15:31–15:34इबिचार कर्वाक लेल आमन्द्रित करे चीो,
  254. 15:34–15:36जे की कलाक प्रात्मिक उद्टेश,
  255. 15:36–15:38मानव जीवनक, बिषेश कद डामपते,
  256. 15:38–15:41आईस्त्री मनोविग्यानक प्रत्विंद प्रस्थुट कराब आची
  257. 15:41–15:45वा प्रक्रितिक सक्ति सब के निंटित करवा के एक ता सामहिक प्रायास आची
  258. 15:45–15:50जत जतीनक यी नातक एक ता एहन सांस्क्रितिक रहासे आची
  259. 15:50–15:53जत आई दून्नू सत्ते एक संक्तारा आची
  260. 15:53–15:59इमनो विग्यानाग गेराई से हो आची, आग गर शिक अस्तित वक संगर्ष से हो.
  261. 15:59–16:06निश्चही, एही विमर्ष में कोनो एक ता पक्ष्ष के विजेता गोषित किनाई, नतो उच्छे तची, अन नही समबभ.
  262. 16:06–16:10जद जटें जद्वा सामाजिक तत्वे अनुष्टानिक सो हो,
  263. 16:10–16:14हम्रा सब अक स्रोथ सामागरी में आनेक रास सांस्क्रतिक रहास से आची,
  264. 16:14–16:17जक्रा आहो गेराई सबुजल जासके ताची.
  265. 16:17–16:22राख, जक्रा हम सब लोक साहिते के केवल लेक्ता नजर्या से देखाएची,
  266. 16:22–16:26बवड़़ाग बाद्बागादी में सहेज कर रखने चाती.
  267. 16:27–16:31इक्दम सत्ते, इज्होल मक्डा, दूभी, भिदागरीख हद,
  268. 16:32–16:35रोमानी पुलर मिलन, अब बेंग को तान्तरिक अनुष्ठान,
  269. 16:36–16:39इस सम्मिल कव, मित्लाग उही मातिक सुगन्द के जीवन्त करे ताची,
  270. 16:39–16:42रोमानी पुलर मिलन अ बेंक उ तान्त्रिक अनुश्ठान
  271. 16:42–16:46इस सम्मिल का मित्लाक उही माटिक सुगन्द के जीवन्त करे ताची
  272. 16:46–16:51जदे प्रेम अवर्षा दून्नु जीवन के समान रुब से आवश्षक आची
  273. 16:51–16:54इविमर्ष आहा सब पर चोडेच्छी विचार करे तरहू

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विमर्शक इस मंच्पर आहक स्वागत आजी, मतलब कल्पना करू, सावन भादोक के इक डान्दर्या राती आची, चारोदिस निस्टब्दता जी मुदा गाँँके किछ इस्ट्ट्री गन जागल चादिं. अँ सब मने एक ता मरल बेंग के लोकर गाँक सबसा जग़ा ही इस्त्रिक दरवज़ा पर फेखी रहा जातीन. एक दम. जायसाम भोर में उस्त्रि उठीक गाडी दे, ता आई हम सब मित्लाक प्रसिद लोक नाट जजजटिन को उही रहस्से के खंगाराँ, जे एक दिस्त द विशुद वनोरन्जक आब हाँनात्मक लागे ता ची मुदा दूसर दिस एहन, गूड, आज्जादुई अनुश्धाना संजोडा लाची जेक्रा भुजनाई आएदरी अक्ता चनाउती आची सक्ते कहलो, ता गजेंदर ताकुर दोरा संपादित स्रोट समग्रिक आदार पर, आई हम सब एही बात पर विमर्ष करहल ची, जे की इ लोकनात मुख्य रुप सा दामपत जीवन, इस्त्री विमर्श आप पारिवारेक मनोविग्यानक एक ता यधार्त वादी प्रस्तुती आची वा वा इमूलता प्रक्रती के निंट्रित करबाक एक तान्त्रिक प्रयास ची हा इहे मूल प्रष्न ची हमर इद्रिध मान्नेता आची जजद जटीन पूरनता एक ता मनोविग्यानिक दर्पन अची जते स्त्री आपन दामपत जीवनक अदिकार आब हावनाके अभिव्यक्त कराई तची और हमर इमान आची जे इपारिवारि कता इब हावना इमनोविग्यान भी बवाँ बाँ तान्त्री कुबाया ची कोनो आदूनिक स्त्रीविमर्ष नहीं हमर भूजी रहल ची जे आहा आहें की एक सोचाईत ची मुदा हमरा एक द्बिन्नद्रिष्टिकोन देवाख्या बुजिरहल ची जे आहा आहन की एक सोचाईता ची मुदा हमरा एक द्बहिन द्रिष्टिकों देवा कनुमती दीः जकन हम एही नाटक कठावस्तू के गेराई से देखगच्छी ता इस पस्ट होईता ची एकर केंदर में पूरनता स्ट्री मनोविग्यान अदूनिक स्त्री विमर्ष नहीं हमर भूजी रहल ची जे आहा आहें की एक सोचाई तची मुदा हमरा एक तब भिन्न द्रिष्टिकों देवा कनुमती दिया जकन हम एही नाटक कथावस्तूके गेराई से देखेच ची ता इस पष्ट होगी तची पूर्नतस्त्री मनोविज्यान आदाम्तक्त जीवनक संगर्ष ची. मुदाओ सावन भाद्वक मास में होई तची, तोक्रहा अनुश्ठान से अलक्कोना का सकेची. दिखु, नवव विवाहीता जटिनक आपन नेहर आथात माएक गर जाएबाक हतके, अगे लेल जटिन दवारा देल गेल तरक सबख्के देखू, उ कहे च्थिन जे यदी पैग भाई हम्रा लेल नहीं आभी सकच्थिन, तक उनो नवा थाकृर ब्राम्हन वा च्छोटका बाए के पत्हे बाख चाही. रही, यवरनन ता अच्छी सामगरी मे. आई आई आई ता अज़्ाई के पथेबाग चाही आई वरनन्ता अच्छी सामगरी में इक्धम आई ते आई आई के मिख्ला के सामाजिक तानाबानाग बहुत सुख्ष्मि चित्रन बहितत भिदागरिक नियम जते स्त्री के लोग जाएत अख्के नहीं आईस, इस सब वही समाज का मनोविग्यानिक यतार थाचल, एकर अत्रिक्त जखन जत मोरं कमायल जाएच्छतिन, तजटिन लग एक ता सूनार अबे तची. आ, उ गहनाक प्रलोबन दे थची. आ, मुदजटिन उहे प्रलोबन के अस्विकार कर देच्छतिन, अर अपन पतिक सुन्दर्ताक वरनन करे च्थिन इविशुद रूप से इस्ट्री निष्था चारित्रिक द्रद्ता अब विवाहक बात कबहावात्मक द्वन्द कप्रामानिक प्रस्थूती आची जै इं मनोविग्यान नहीं आच्ट, तकी आच्ट आहा समाजी कत्हा आब भावना के केंदर मेराखे रहाल ची मुदाई भिस्री रहाल ची जी इनाटक कोनो सामान ने समे मेंने बलकी सावन भादवक राथ्ती में होई तची विद्द्यापती की समेसा माने जे पंद्रमावा सताबदी के दरबार चल आँ, महराज शिव्सिंक का दर्बार इक दम, तही काल साई कता जिवेंत आची अटक्हन सा लोका आईदरी मिखला में इसमः वर्शा अख्क्रिषी के लेल जिवन मरनक समे मानल जाई तची जगन जटिन नेरजाए का हद करे चे थी तजजटक उत्तर की होईता ची उबावुग भकिनारो के ची उख़े चा छी जे दहान का फसल तधयार आची आआ उष्पस्ट खे चा छी जे दहान का फसल तधयार आची तक्रा काटी का जाओ एता एक ख्रिषी कारे कप रात्मिक्ता दाम्पत्ते भावनासा स्पष्ट रूपसा उपर राखल गे लची. आ, आहा सूनारक प्रलोबन अस्विकार करभाकचिग गब कहला हू, उक्राहाम चरित कद्रदता से भीषी अनुश्टानिक पवित्रता क्रूप में देखे ची. पवित्रता, मतलब आहा उक्रा से हो अनुश्ठान सा जोडी रहल ची. निस्छित रूप सो. लोक परमपरा में जी अनुश्ठान वर्शावा प्रक्रूति के मनेवाख लिल के लिल ची, बुजलो ना, औही में बहाग लिवा वाली स्त्री, या पात्रक पवित्रता अनिवार्य मानल जाईत छे, जए अनुश्धान पूँन रूपेन पवित्र न नहीं होएत, तप्रक्रती नहीं मानत, तेम सुनारक प्रसंग केवल जदीनक पवित्रता प्रमानित करवाक लिल अची, जाही से इसिद बहुसके जे यो वर्शा आवानक अनुश्टानक लिल योग्गे पात्र चति. इस सत्या छी जे क्रिषी उई समाज का आद्धार चल, मुदा हमरा इई नहीं विसरबाक चाही, जि लोक नात्या अखला हमेशा रूपक का माने मेटाफर का प्रियोक करेता ची आज सुखाडग बात करे ची मुदज़ा इक केवल भोटिक अवष्षकता वक्रिषिक अनुश्थान चल ता नातक में इत दे गंभीर भावनात्मक रूपक का प्रियोक की खेल गेल जेना की जेना जगन च्हूंकी सच्वाईबा कारन सब मानित भैजटिन रूस का गर चोडी देचचती आजजट उक्रा खोजबाक लेल गोपी अ मनिहारिन नक्रुब दारन कर इच्चती इत विषुद प्रेम कनवेशन अची हमर स्रोट समगरी में एक तब बहुत सुन्दर चित्रन ची जटीनक बिना जटक गर में जोल मक्डा बहुरी जाईत ची आँ आँँन मे दूभी जन्मव शुरुब हो जाए तची आँ एक दम तब हम्रा विचारा सब येबल एक ता भोति कवस्ता वा गंदा गरक वरनन न न न आची एक उतक्रिष्ट मनो विग्यानि कुप मा आची अगर जीवनाक संटूलन भिगरी जाईते थाची अगर जीवनाक संटूलन बिगरी जाईतची इत एक ता गंवेर इस्ट्री विमर्ष्ष अची जते समाज इस विकार करे रहल अची जे गरग पुरनता इस्ट्री से आची आगा गप विचार निया आची मुदा हमरा एक ता देखा जनमव अगर जीवनाक संटूलन बिगरी जाईते ची इत एक ता गमभीर इस्ट्री विमर्ष्ष रची जते समाज इस्विकार करे रहाल अची जगरक पूरनता इस्ट्री से आची. आहा गब विचार निया आची, मुदा हमरा एक ता दोसर द्रिष्टिकों राखे दिया. आहा जोल मक्रा अदूपके क्या बावनात्मक शुन्यताक प्रतिक मानी रहल ची जक्चन की हम एक रा सीदा सुखाडा क्या थार्त माने चीः सीदा सुखाड मुदा उत गरक भीट्रक वरना ची हा, मुदा लोक माने ता में इस्त्री के प्रक्रतिक स्वरूपा विशेष्का उर्वर्ताक प्रतिक मानल गेल आची जखन जट्ट्टिन जए ते प्रक्रतिक प्रतिरूप जद्टी, रूटिक का चली जए चद्टी, तब द़द्ध, जे एक तख रूशकग प्रत्निध्व करे चती जीवन में शुन्यता आभी जाईताची मुदा यी शुन्यता बहावनात्मक सा भेसी बहुतिक आची मने आख कह बची जे जोल मक्रा दरिद्द्द्द्दाख प्रतिक आची इक्द, खेद सुखी जाएतची, गर में दरद्रता भी जाएतची, आनंग्ट सुन्सान बजाएतची. जटक, गोपी वो मनिहारिन के रुब दोगे हुंका खोजब, वास्तो में वर्षाके मनेबाक लेल कयल गे लेक्ता तान्त्रिक प्रयास अचे. आजक मनुवे ग्यानिक व्याख्या सुन्मे मदूर लगे तची, मुदा उई समे के क्रिषक समाजक तद्कालीन अवष्षकता भावना से भेसी भोद्टिक अन्नच्छल. एक ता भोखल समाजके लेल जोल मक्डा समवाद हीं तक नहीं बलकी भुख्मरीक संके तची. वाँद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद्याद् तई कोनो सादारन गवप नहीं आची वो गणनाक माग करे चछतिन आपन असन्तोष वेक्त करे चछतिन एक ता एहन पित्र सतात्मक समाज में जते इस्त्री के आपन गवप रखबाक अवसर कम भीटे चल ए नाटक इस्त्री गन के आपन अपन असन्तोश व्यक्त करबाक मन्च देछ्चल यह मनेई ची ता इज़जदिन क नोग जोग इस्त्री सशक्ती करना केक्ता प्रारमबिक रूप आजी जते उआपन पतिक आर्थिक इस्तिती पर सीदा प्रष्नुता सकेट ची आवकर आलोचना का सकेट ची ये के वल वर्शाक लिल कैलगल अनुष्टान नहीं बहुशके दची ये यस्त्री सोटन्त्रताक एक ता सांस्क्रितिक प्रकति करन आची हम आई हि दिसा सा आहा साहम आची जे यी नाटक सरवता यस्त्री गना का पन अनुष्टान आची अईक्रा सहुनका समोहिक मनुरनजन अविवेक्ती बेटाई चल, मुदा हम अईक्रा इस्त्री ससक्ति करन कावाक लिल तैयार नहाची. की एक माई? अपतिक आलोचना कार अर्चतिन इत ससक्ति करन भेलना? हमाई दोसर तरीका सां देखे चे. आहा दियान दियो जगन जदिन नेहर जाएक हाद कराई चथिन आजज चाहे चथिन जे उन नहीं जाय ता जद् हुनका की कहे चथिन उ सोतिन लाबाग बहे दिखावे चथिन आजज तुरन्त दराजाए चथिन इप्रस्श्ण्ग अस्पश्ट्रूप सदेक्वेत आची जे इस समाज पित्र सत्तात्मक वास्त्विक्ता सम्भार नही आची. जट्टिन कव्यंग, उहातिया सिक्डी कब, इस सब वास्तो में मनोरन्जक उप्द्रिष्या आची. जखन राती राती बर स्ट्री गन वर्षाक लेल जागल रही च्छतिन तद समः भितवाक लेल उनका एहन हास्यव्यंगयक आवष्टा हो इतिचल. मुदा की हम अग्रा केवल समः भितवाक सादन कही सके ची? देखो, कोनो पित्र सत्तात्मक समाज में विद्रोज नहीं बधगग, ताही लेल एहन चोट-चोट सुरक्षित मन्च दिल जाएत छी, जते इस्त्री आपन भाडास निकाली सकए. इस्ब सम्वाद इस्ट्री के औही पिट्र सत्तात्मक धाचाख भिटर सान्त्वना देबाक इक ता फंशनल तरीका चल कोनु क्रान्तिकारी सचक्ति करन नहीं जद-चट इन पिट्र सत्ताक विरोध नहीं करे तची तोक्रा सुरक्ष्ट्राखाईत प्रक्रती के मने बाग काज कराईताची एक रहाब जे यी सब के वल समे भितावाक लेल चला हम्रा लागेत आची जे औही काव्यात्मक आब हाबनात्मक गेराएके नजर अंदाज कराब आची जे नाटक प्रस्तूत कराईत आची जटिनक दरायत पित्र सत्ता क्यतार्त भहसा कै तची मुदा नाटकक मुल स्वर उई भहसा भेसी प्रेम को जी प्रेम अग, उके ना? जे ना, पुरेनिक पात अरथात कमल के पता पर चडी जूमर केलाएप वप प्रतिकात्मक विवाह करब इसब द्रिश अतीब रोमानी अग काव्यात्मक अची और जगम नाटक अक नाटकी अचरमोद कर्ष पर आभी तो उकी आची उआची जट अजटीनक पुनर मिलन आआ, उदोनो अंतता मिली जाए चाछतीन एक दम, जचाचन जटीनक ख्रोद शान्त होगी तची प्रेम फेर विज़ेई होई तची उ आपन गर आभी जाएच्छे थिन इदेखावे तची जे दामपत्या जीबन में लाग मन्मुटाब, गरीभी, सोतिनक भाई, वाविरह हुए, अंतता, प्रेम अ समजदारिक जीथ होई तची इएक तपुड पारिवारिक चक्र के सबल समापन आची इद्रेखावे दची जे समाज अंत तब परिवारक के एक जुट्रखबाक संदेस दर है लची मुदा आहा इविचार करूए जे यदी नाटक पुनर मिलन पर समाप्त बहुजाए तची जदे प्रेम विज़यी भागेल, तव उकर भाद कव वीबध्स अनुश्धान कियकल जाईता ची. हमर तरक को सबसं सबल साखश य अन्तिम द्रिष्या ची, जगर आहा नजर अंदास कर हल ची. आहा उही बैंक अनुश्धानक गप कर हल ची. जट आजातीनक प्रेमक पुरर मिलनक तुरन्त बाद उही राती में इस्त्रीगन बैंग के एक ता श्रद्दा दूनी में दोग कुतेद शती एकर बाद उमरल बैंग के कोनी औजग़ागी इस्त्रीक दरबाजा पर फेखिया वेच छती जए इ नाटक दामपत प्रेम अचल तई हि हिन्सा अगारी गलोजकर की काज तव आहा कनुसार एक रपाचु की विग्यान अचल? एक रपाचु एक तब होत गमभीर तान्तरिक विग्यान काज कर रहल अची जक्रा हम सब सहान वूटिक जादू वास सिमपेत्तिक माजिक कही सकती ची. तान्तरिक माननेता कनुसार, प्रक्रितिके संतुलित करबाक लेल विप्रीद सक्तिक प्रियोक केल जाए चे. जखन उ जग्राही स्ट्री भूर में बंके देखी क्रोदिद भाँगारी देद, तो खर ख्रोद अगारी सा वातवरन मेक्ता मनोवेग्यानी गर्मी वा ताप उत्पन होएत. ओ, तो उगारी ख्तापस वर्षाक आहावान होएत छी. एक दम. उख्रा तद्धा कर्बाकलिल वर्षा करत्ध, जदेक भेसी उ गारी परध, तदेक भेसी वर्षा होएद. इते स्त्रीक ख्रोध आप्रक्रतिक वर्षा कि भीज शीडा तान्त्रिक संबंच थापित काल गेल जे. वर्शा कि बीज शीदा तान्त्रिक समबन स्तापित काईल गेल जे. समपुन प्रेम कता, विर्ड, अपुनर मिलन, एह जादूई अनुष्टानक भूमिका मात्रा ची. बूमिका मात्रा? राग. उस्त्रीगन के उही भावनात्मक स्तितिदरी लावबाक सादन चल, जे अन्तिम अनुश्धान वर्शाँ से जुडल आची आ आगाक इ तान्तरिक ताः वर्शाँक सिद्धान बहुत तार्किक लागत आचे मुदा हम एक्रा भूमिका मात्र कही का खन्दित नहीं कर सके ची बेंग के अनुश्धानक अपन तान्तरिक महत्व आची इसादारन अची कि एक तट इम आनब भावना, पारिवानिक स्मेह, नोक जोग, पतिपतनिक भीचक, प्रेम अप प्राक्रतिक आवष्षकता दून्नुके एक संगे गुथ दईतची. यदी ओलोक केवल अनुश्ठान करबाक लेल चाहित, तो उगर उखर एक उद्क्रिष्ट मानविय खखाक संजोडल गेल, जाही सं समाज आपन सुख दुक के से हो उहीम देखी सकै. आहां की बाज सत्ते आचे, जे उषब सीथा अनुष्टान कर सके चल, अद्क्रिष्ट मानविय कखाक संजोडल गेल, जाही सन समाज आपन सुख दुक्के से हो, उही में देखी सकई. आहाँ की बाज सत्ते आचे, जे उसब सीथा अनुष्ठान कर सके चल, आई एहो सत्ते आची, जे लोक नाट्ते समाजक दरपन होई तची. अम आईबाज से सहमच फीज, जे एकला मानव भावना आप्राक्रतिक आवष्षकताक एक ता अदुप्रत संगम आचे. एक ता क्रिषिक समाज में जते वर्षा जीवनलेल अनिवारे आचे, उते लोग आपन मान्सिक तनाव के कम कर बाकलेल आहन अनुश्ठान के जन्मदैत अची जाही में उनकर आपन जीवनक प्रती भिम्ब से हो हो आए जे ना, जे उ गरीबी और साथिनक दर के प्रसंग अचे आप, जे जे तिनक नोग जोग वास्तम में उही समाजक यतार्त है, उ गरीभी, उ हाती भिका जाएब, उ सोतिन निक दर, इसम उही समाजक दिन प्रतिदिनक संगर्ष अचे. मुदा हमर कहब इय आचे, जे एही सब संगर्ष कष्समाजान उलोकनी प्रक्रती के मनेवा में देखे चला. माने वर्शा भेजाएत ता सब दीख भेजाएत? एक दम जवर्शा भेजाएत ता खेत में अन होएत, गरी भी दूर होएत, आप फिर सोतिन वा विरह का वषकतन नहीं रहत. ते इक ता जत्दिग यतार्थ वादिय चे, उकर अंतिम लक्ष उत्बे अनुष्टानी कचे, उही जग्राही इस्ट्री गारे से प्रक्रती के त्धा कै वश्षा लाबव. इघ्टा बहुत नीक बिन्दू पर लवाई तची, जते इए अस्पष्ट होई तची, जे लोग परमपरा में कोनो एक ता सपष्ट भिवाजन रेखा नहीं खिचाल जासके ता ची. हम अपन श्रोटागन के, इबिचार कर्वाक लेल आमन्द्रित करे चीो, जे की कलाक प्रात्मिक उद्टेश, मानव जीवनक, बिषेश कद डामपते, आईस्त्री मनोविग्यानक प्रत्विंद प्रस्थुट कराब आची वा प्रक्रितिक सक्ति सब के निंटित करवा के एक ता सामहिक प्रायास आची जत जतीनक यी नातक एक ता एहन सांस्क्रितिक रहासे आची जत आई दून्नू सत्ते एक संक्तारा आची इमनो विग्यानाग गेराई से हो आची, आग गर शिक अस्तित वक संगर्ष से हो. निश्चही, एही विमर्ष में कोनो एक ता पक्ष्ष के विजेता गोषित किनाई, नतो उच्छे तची, अन नही समबभ. जद जटें जद्वा सामाजिक तत्वे अनुष्टानिक सो हो, हम्रा सब अक स्रोथ सामागरी में आनेक रास सांस्क्रतिक रहास से आची, जक्रा आहो गेराई सबुजल जासके ताची. राख, जक्रा हम सब लोक साहिते के केवल लेक्ता नजर्या से देखाएची, बवड़़ाग बाद्बागादी में सहेज कर रखने चाती. इक्दम सत्ते, इज्होल मक्डा, दूभी, भिदागरीख हद, रोमानी पुलर मिलन, अब बेंग को तान्तरिक अनुष्ठान, इस सम्मिल कव, मित्लाग उही मातिक सुगन्द के जीवन्त करे ताची, रोमानी पुलर मिलन अ बेंक उ तान्त्रिक अनुश्ठान इस सम्मिल का मित्लाक उही माटिक सुगन्द के जीवन्त करे ताची जदे प्रेम अवर्षा दून्नु जीवन के समान रुब से आवश्षक आची इविमर्ष आहा सब पर चोडेच्छी विचार करे तरहू

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