MACHINE ASR ACCESSIBILITY AID
गांगोदेवीक_भगत_की_लोककथा.mp4
Timestamped machine output
- 0:00–0:04नमस्ते, आज्छ के इस अच्प्लेनर में हम एक बेहत खुप्सुरत कहानी पर बाथ करने रहे हैं.
- 0:05–0:09आज हम मित्ला की एक आजी लोग कता में गोता लगाने वाले हैं, जो सच में दिल चूलेती है.
- 0:10–0:12कोई राजा रानी या बड़े युद्द की बात नहीं है?
- 0:12–0:15बलके एक बहुत इं आम सी मानविय इच्चा की कहानी है.
- 0:15–0:18हमारी श्वोट सामगरी पर आदारित इस पर ताल में
- 0:18–0:20हम गांगो देवीग भगत की बाद करेंगे.
- 0:20–0:23बस एक सादारन मच्वारे का अपनी पतनी के प्रती प्यार
- 0:23–0:27जो आगे चलकर एक पूरी की पूरी संसक्रतिक परमपरा बन गया.
- 0:27–0:30चलिए इस दिल्चस सफर की श्वाद करते हैं.
- 0:30–0:33तो महाल कुच आज्सा है, सावन का महीना चल रहा है,
- 0:33–0:36जिसे मित्ला मैस तानिये लोग प्यार से सावन कहते हैं.
- 0:36–0:41मलाह یानी मच्झवारा समवदाय के लिए ये वकत काफी एहें और स्वबभविख होता है.
- 0:41–0:45अब इस कहानी के हीरो का बसे एक चोटा सा बड़ाही प्यारा सा सपना है.
- 0:45–0:48उआपनी पतनी गांगो से बहुध प्यार करता है.
- 0:48–0:52और सावन के मेले से उसके लिए चूडी लथ्ही करीदन चाड़ा है.
- 0:52–0:54बस कोई बड़ बड़ी क्वाएश नहीं है.
- 0:54–0:58इसके लिए उसे बस गाट पर मचलिया बेज कर कुछ पैसे जुताने है.
- 0:58–1:01ताकि वो अपनी पतनी को ये चोटा सा तोफा दे सके.
- 1:01–1:05पर कहते ना, सोचना जितना असान होता है, करना उतना ही मुषकिल.
- 1:05–1:08दिन काफी लंबा और थھका देने वाला सावित होता है.
- 1:08–1:15वो मच्वारा अपने पिता और भाई के साथ मिलकर नदी में बार बार अपना सरया यानी जाल फेखता है.
- 1:15–1:19पसीना बहार हैं पूरी महनत जोंग दिये लेकिन, किस्मत मानो रूट कै हो.
- 1:19–1:22जाल में कोई बढी मचली फसी ही नहीं रहीं.
- 1:22–1:24बार-बार वही ने राशा.
- 1:24–1:26ये समजजा जा सकता है कि उस अनसान पर क्या भीत रही होगी,
- 1:26–1:29तो उग़े थी उम्मीद लेकर इतनी महनत कर रहा था.
- 1:29–1:33अगर इस पूरी जद्डो जहत को हम समःे के ग्राथ पर देखें,
- 1:33–1:36तो सुबह शुर्वात तो गजजब के कुन्ट्टिंस के साथ हूँई थी,
- 1:36–1:39की आज तो मेले के लिए मचलिया पकडी लेंगे.
- 1:39–1:45बर जेसे जेसे दुपैर हुई जाल में सरव चोटे चोटे गोंगे जिने डोका केते हैं
- 1:45–1:47और कांक्डु यानी केक्रे हात हैं
- 1:47–1:50बढ़ी मचली का तो जैसे अकाली पड़गया हो
- 1:50–1:54अप शाम दھल रही है और उस मच्वारे का सबर भी तुटने लगा है
- 1:54–1:58दिन बर की कमर तोड महनत के बाद भी हाद क्षाली
- 1:58–2:03गांगो के लिए चूडी लेटी लेटी लेजाने का वो रोमान्टिक प्लैन अप सच्छ में खद्रे में लग राग है.
- 2:03–2:07और तीक यही पर कहानी एक बेहद एमोषनल मोड लेती है.
- 2:07–2:12बिल्कुल हार मान चुके उस पती ने आपनी आखरी उमीद को दावपर लगा दिया.
- 2:12–2:16वो पुरी तरा से हताश होकर जाल फेखता है और भरेवे गले से कहता है
- 2:16–2:19इ अंतिम भेर ची गांगो.
- 2:19–2:22एही भेर जे माच नाया आएल ता हमरा ख्षमा करब.
- 2:22–2:25जिस का मतलब है, गांगो ये आखरी बार है.
- 2:25–2:28अगर इस बार भी मचली नहीं आई, तो मुझे माझकर देना.
- 2:28–2:31सच कहाजाए तो ये कोई आम पुकार नहीं थी.
- 2:31–2:34ये एक पती की बेबसी, उसका गेरा प्यार
- 2:34–2:37अपनी पतनी के नाम पर उसका अटूट विष्वास था
- 2:38–2:40और फिर जो होता है
- 2:40–2:43वो सच में किसी चमत कार से कम नहीं
- 2:43–2:45जैसे ही गांगो का नाम लेकर
- 2:45–2:47जाल पानी में जाता है
- 2:47–2:49एक अविष्वसनिय गटना गटनी है
- 2:50–2:53जाल मचलियों से इतना भारी हो जाता है
- 2:53–2:55कि उसे बाहर खीचना तक मुष्किल होगया.
- 2:56–3:00मतलब जिस अनसान को दिन बहर एक दंकी मचली नहीं मिली,
- 3:00–3:02अचानक से उसके पास मचलीों का खजाना आ आ गया,
- 3:02–3:04और इस कमाल की कामयाभी के बाद,
- 3:04–3:09उस्टिन उस पती का प्यार और विश्वास दोनो की बडी जीत हूए
- 3:09–3:13अब अक सर लोग कताव में चमत कार बजे एक बाद होगे खतम होगाते है ना?
- 3:13–3:18पर यहां कहानी एक बड़ाही दिल्चस्प लगबग एक साँईंटिफिक टेस्ट वाला मोड लेती है
- 3:18–3:48बज़ब एक बाद होके खटम जाते हैं तागा आप यह यह आप यह भड़ा ही दिलचस्प लगबग एक साँँटिफिक तेस्ट वाला मोड लेती हैं अगले ही दिन इस चमत कार को परखा जाता हैं गवगो का पती वापस उसी नदी पर जाता है यह देखने के ले कि कल जो व
- 3:48–3:53उसका जाल फिर से मचलियों से लबालप बर गया, ये कोई सवयोग बलकुल नहीं ता.
- 3:53–3:56लेकिन कहानी का अस्ली कोंट्रास तो अब सामने आता है.
- 3:56–4:01उसके पिता और भाई, जो बिना गोंगो का नाम लिये मचलि पकर रहे थे, उनके हाद क्या लगा?
- 4:01–4:04उआप भाई नाद क्या लगा? वही चोटे-चोटे डोका और केक्रे.
- 4:04–4:06जगा वही नदी वही समःए भी वही.
- 4:06–4:09लेकिन काम्या भी स्रिव गोंगो के पती को मिली.
- 4:09–4:14ये तुल्ना इस बात का पक्का सबूथ ती कि असल ताकत उस जाल मे नही,
- 4:14–4:44तो बवाँई नाँगे बारे में पूछाँ तो सच्च्साम नहीं आँई आँई आँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ
- 4:44–4:46और बात यही तक नहीं रूकी?
- 4:46–4:49एक पती पतनी के भीज का ये खुपसुरत सराज
- 4:49–4:52देखते ही देखते पूरे मित्फिला के मला समवदाय में पहल गया
- 4:52–4:57जो बात एक अपने प्यार जताने के अंतरंग तरीके से शुएग हूई फीटी
- 4:57–5:00वो बड़ी ही टेजी से पुरे समाच का समहिक विष्वाज बन गगी.
- 5:00–5:02हर गाथ, हर नदी पर,
- 5:02–5:05काम करने वाले मच्वारों ने ये मान लिया,
- 5:05–5:08कि अगर जाल फ़कने से पहले पूरे दिल और श्रद्धा से,
- 5:08–5:09गांगो का नाम ले लिया जाए,
- 5:09–5:12तो खाली हाद तो कभी नहीं लोटना पडेगा.
- 5:12–5:15और इसी तरह जनम हुए एक पूरी परमपराका,
- 5:15–5:18जिसे आज गांगो देवी भगत कहाजाता है.
- 5:18–5:20ये सरव कोई शबद नहीं है,
- 5:20–5:23बलकी एक अईक अईक अईक अनुष्टान बन गया,
- 5:23–5:26जो आज भी मित्फिला की नदियों के किनारे जिन्दा है
- 5:26–5:27ये कितनी अधबूद बात है
- 5:27–5:30की एक सादारन्ची मच्वारन का विश्वास
- 5:30–5:32और उसके पती का बेंईंताप्यार
- 5:32–5:34एक आज यासा सांस्क्रतिक प्रतिक बन गया
- 5:34–5:36जिसने पीडियों का सपर तैकर लिया
- 5:36–5:40आज भी जाल फिंकते वकत मच्वारे सरफ अपना काम नहीं करते,
- 5:40–5:43बलकी उस आमर प्रेम और शद्धा को भी जीविट रकते हैं.
- 5:43–5:47इस पूरी कहानी का दाशनिक पहलू बहुती गेरा और खुबसुरत है.
- 5:47–5:49इस में ना तो कोई खुंका राक्षस है,
- 5:49–5:54ना कुई बड़े ब़े पारानेक महायुद और नहीं देव्ताओ की कुई उलजीई साजच़िशें कुईज़ भी नहीं.
- 5:54–5:59ये पहुत्ही सादी पूरी तरह से जमीन से जुडी हूँई अंई कहानी है,
- 5:59–6:02इक आम पती का प्यार और इक पतनी का विष्वास.
- 6:02–6:05यही तो इस चमतकार की असली नीव ती.
- 6:05–6:08हमें अकसर लगता है की चमतकार किसी जादूई दुन्या से आते है.
- 6:08–6:12लेकिन यहां तो चमतकार एक सच्चे विनंब्र दिल से पैडा हूँ आता.
- 6:12–6:16तो इस एकस्पलेनर को खतम करने से पहले एक सबाल सोचने लाएक है.
- 6:16–6:20क्या सच्छी भखती या चमत्कार को साभट करने किलिये
- 6:20–6:24हमेशा किसी बड़बड़ भव्यपारानेक धाच्छे के जबत होती है
- 6:24–6:28या फिर सरफ एक साफ, सच्छे और प्यार भरे दिल से भी काम बन सकता है
- 6:28–6:32गांगो देवीग भगत की ये लोग कता हमें यही सिखाती है
- 6:32–6:37कि सच्छा प्यार और स्द्धा, चाहे कितनी भी आमसी लगने वाली जगाए पर क्यो नहों,
- 6:38–6:42आफ़े अच्छा दारन नतीजे लासकती है, जो सद्धियों तक प्रेर्ना बने रहें.
- 6:43–6:46इसी खुबसुरत विचार कि साथ, आजकी इस कताखी पर्ताल को यही रोकते है.
Plain text
नमस्ते, आज्छ के इस अच्प्लेनर में हम एक बेहत खुप्सुरत कहानी पर बाथ करने रहे हैं. आज हम मित्ला की एक आजी लोग कता में गोता लगाने वाले हैं, जो सच में दिल चूलेती है. कोई राजा रानी या बड़े युद्द की बात नहीं है? बलके एक बहुत इं आम सी मानविय इच्चा की कहानी है. हमारी श्वोट सामगरी पर आदारित इस पर ताल में हम गांगो देवीग भगत की बाद करेंगे. बस एक सादारन मच्वारे का अपनी पतनी के प्रती प्यार जो आगे चलकर एक पूरी की पूरी संसक्रतिक परमपरा बन गया. चलिए इस दिल्चस सफर की श्वाद करते हैं. तो महाल कुच आज्सा है, सावन का महीना चल रहा है, जिसे मित्ला मैस तानिये लोग प्यार से सावन कहते हैं. मलाह یानी मच्झवारा समवदाय के लिए ये वकत काफी एहें और स्वबभविख होता है. अब इस कहानी के हीरो का बसे एक चोटा सा बड़ाही प्यारा सा सपना है. उआपनी पतनी गांगो से बहुध प्यार करता है. और सावन के मेले से उसके लिए चूडी लथ्ही करीदन चाड़ा है. बस कोई बड़ बड़ी क्वाएश नहीं है. इसके लिए उसे बस गाट पर मचलिया बेज कर कुछ पैसे जुताने है. ताकि वो अपनी पतनी को ये चोटा सा तोफा दे सके. पर कहते ना, सोचना जितना असान होता है, करना उतना ही मुषकिल. दिन काफी लंबा और थھका देने वाला सावित होता है. वो मच्वारा अपने पिता और भाई के साथ मिलकर नदी में बार बार अपना सरया यानी जाल फेखता है. पसीना बहार हैं पूरी महनत जोंग दिये लेकिन, किस्मत मानो रूट कै हो. जाल में कोई बढी मचली फसी ही नहीं रहीं. बार-बार वही ने राशा. ये समजजा जा सकता है कि उस अनसान पर क्या भीत रही होगी, तो उग़े थी उम्मीद लेकर इतनी महनत कर रहा था. अगर इस पूरी जद्डो जहत को हम समःे के ग्राथ पर देखें, तो सुबह शुर्वात तो गजजब के कुन्ट्टिंस के साथ हूँई थी, की आज तो मेले के लिए मचलिया पकडी लेंगे. बर जेसे जेसे दुपैर हुई जाल में सरव चोटे चोटे गोंगे जिने डोका केते हैं और कांक्डु यानी केक्रे हात हैं बढ़ी मचली का तो जैसे अकाली पड़गया हो अप शाम दھल रही है और उस मच्वारे का सबर भी तुटने लगा है दिन बर की कमर तोड महनत के बाद भी हाद क्षाली गांगो के लिए चूडी लेटी लेटी लेजाने का वो रोमान्टिक प्लैन अप सच्छ में खद्रे में लग राग है. और तीक यही पर कहानी एक बेहद एमोषनल मोड लेती है. बिल्कुल हार मान चुके उस पती ने आपनी आखरी उमीद को दावपर लगा दिया. वो पुरी तरा से हताश होकर जाल फेखता है और भरेवे गले से कहता है इ अंतिम भेर ची गांगो. एही भेर जे माच नाया आएल ता हमरा ख्षमा करब. जिस का मतलब है, गांगो ये आखरी बार है. अगर इस बार भी मचली नहीं आई, तो मुझे माझकर देना. सच कहाजाए तो ये कोई आम पुकार नहीं थी. ये एक पती की बेबसी, उसका गेरा प्यार अपनी पतनी के नाम पर उसका अटूट विष्वास था और फिर जो होता है वो सच में किसी चमत कार से कम नहीं जैसे ही गांगो का नाम लेकर जाल पानी में जाता है एक अविष्वसनिय गटना गटनी है जाल मचलियों से इतना भारी हो जाता है कि उसे बाहर खीचना तक मुष्किल होगया. मतलब जिस अनसान को दिन बहर एक दंकी मचली नहीं मिली, अचानक से उसके पास मचलीों का खजाना आ आ गया, और इस कमाल की कामयाभी के बाद, उस्टिन उस पती का प्यार और विश्वास दोनो की बडी जीत हूए अब अक सर लोग कताव में चमत कार बजे एक बाद होगे खतम होगाते है ना? पर यहां कहानी एक बड़ाही दिल्चस्प लगबग एक साँईंटिफिक टेस्ट वाला मोड लेती है बज़ब एक बाद होके खटम जाते हैं तागा आप यह यह आप यह भड़ा ही दिलचस्प लगबग एक साँँटिफिक तेस्ट वाला मोड लेती हैं अगले ही दिन इस चमत कार को परखा जाता हैं गवगो का पती वापस उसी नदी पर जाता है यह देखने के ले कि कल जो व उसका जाल फिर से मचलियों से लबालप बर गया, ये कोई सवयोग बलकुल नहीं ता. लेकिन कहानी का अस्ली कोंट्रास तो अब सामने आता है. उसके पिता और भाई, जो बिना गोंगो का नाम लिये मचलि पकर रहे थे, उनके हाद क्या लगा? उआप भाई नाद क्या लगा? वही चोटे-चोटे डोका और केक्रे. जगा वही नदी वही समःए भी वही. लेकिन काम्या भी स्रिव गोंगो के पती को मिली. ये तुल्ना इस बात का पक्का सबूथ ती कि असल ताकत उस जाल मे नही, तो बवाँई नाँगे बारे में पूछाँ तो सच्च्साम नहीं आँई आँई आँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ और बात यही तक नहीं रूकी? एक पती पतनी के भीज का ये खुपसुरत सराज देखते ही देखते पूरे मित्फिला के मला समवदाय में पहल गया जो बात एक अपने प्यार जताने के अंतरंग तरीके से शुएग हूई फीटी वो बड़ी ही टेजी से पुरे समाच का समहिक विष्वाज बन गगी. हर गाथ, हर नदी पर, काम करने वाले मच्वारों ने ये मान लिया, कि अगर जाल फ़कने से पहले पूरे दिल और श्रद्धा से, गांगो का नाम ले लिया जाए, तो खाली हाद तो कभी नहीं लोटना पडेगा. और इसी तरह जनम हुए एक पूरी परमपराका, जिसे आज गांगो देवी भगत कहाजाता है. ये सरव कोई शबद नहीं है, बलकी एक अईक अईक अईक अनुष्टान बन गया, जो आज भी मित्फिला की नदियों के किनारे जिन्दा है ये कितनी अधबूद बात है की एक सादारन्ची मच्वारन का विश्वास और उसके पती का बेंईंताप्यार एक आज यासा सांस्क्रतिक प्रतिक बन गया जिसने पीडियों का सपर तैकर लिया आज भी जाल फिंकते वकत मच्वारे सरफ अपना काम नहीं करते, बलकी उस आमर प्रेम और शद्धा को भी जीविट रकते हैं. इस पूरी कहानी का दाशनिक पहलू बहुती गेरा और खुबसुरत है. इस में ना तो कोई खुंका राक्षस है, ना कुई बड़े ब़े पारानेक महायुद और नहीं देव्ताओ की कुई उलजीई साजच़िशें कुईज़ भी नहीं. ये पहुत्ही सादी पूरी तरह से जमीन से जुडी हूँई अंई कहानी है, इक आम पती का प्यार और इक पतनी का विष्वास. यही तो इस चमतकार की असली नीव ती. हमें अकसर लगता है की चमतकार किसी जादूई दुन्या से आते है. लेकिन यहां तो चमतकार एक सच्चे विनंब्र दिल से पैडा हूँ आता. तो इस एकस्पलेनर को खतम करने से पहले एक सबाल सोचने लाएक है. क्या सच्छी भखती या चमत्कार को साभट करने किलिये हमेशा किसी बड़बड़ भव्यपारानेक धाच्छे के जबत होती है या फिर सरफ एक साफ, सच्छे और प्यार भरे दिल से भी काम बन सकता है गांगो देवीग भगत की ये लोग कता हमें यही सिखाती है कि सच्छा प्यार और स्द्धा, चाहे कितनी भी आमसी लगने वाली जगाए पर क्यो नहों, आफ़े अच्छा दारन नतीजे लासकती है, जो सद्धियों तक प्रेर्ना बने रहें. इसी खुबसुरत विचार कि साथ, आजकी इस कताखी पर्ताल को यही रोकते है.