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मछुआरे_की_माफ़ी_और_गंगोदेवी_का_चमत्कार.m4a

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Part 9 · VIDEHA MITHILA MAITHILI DISCUSSION CRITICISM SERIES PART 9
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  1. 0:00–0:14कल्पना कीजीए, आप पानी में कडे है, लगतार चोड़ा गड़े की हार तोड महनत हो चुकी है, और आपके परिवार का पेट इस बात पर निरभर करता है, कि अगले पल आपके जाल में क्या पहसता है.
  2. 0:14–0:16जो की बहुत अनिष्ट थ है?
  3. 0:16–0:21बिल्कुल, लेकिन जब आब जाल बहार निकालते है, तो बिल्कुल खाली होता है.
  4. 0:21–0:26मतलब उस चरम, निराशा और भेबसी के खषवन में इक अन्सान क्या करता है?
  5. 0:26–0:30किसी शक्तिषाली देस्ता को पुकारता है?
  6. 0:30–0:32या आस्मान की तरफ देख कर रोता है, है ना?
  7. 0:32–0:36अग, लेकिन आज हम एक आजी ही कहानी पर चर्चा कर रहे हैं
  8. 0:36–0:39जहां एक व्यक्तीने किसी भगवान को नहीं पुकारा
  9. 0:39–0:42बलकी अपनी पतनी से मापी मागी
  10. 0:42–0:45और इस एक चोटी सी गधना ने
  11. 0:45–0:47एक आजा अनुश्टान शुरू कर दिया
  12. 0:47–1:17तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो �
  13. 1:17–1:21अब आप दवाए ने अपने अस्थित्व के लिए एक मिथखक का निरमाड किया
  14. 1:21–1:25और आब ये विष्लेशन इसले भी बहत महत्वपून है
  15. 1:25–1:29कि अखसर हम इतिहास में या लोक कताव में
  16. 1:29–1:33केवल राजाँं, युद्धों या बड़े महाकावियों को ही तलाषते है
  17. 1:33–1:34जी, सही कहा?
  18. 1:34–1:39हम बूल जाते है कि समाज का सबसे निचला और महनत कष्तब का
  19. 1:39–1:41अपनी अनिष्च्टताओ से कैसे लड़ता है?
  20. 1:41–1:45मतलब उनके जीवन की कहानिया महलो में नहीं
  21. 1:45–1:46बलकी नदियों के किनारे
  22. 1:46–1:50और उनहीं खाली जालों के भी जन मेंती है.
  23. 1:50–1:54बिल्कुल और आज के हमारी चर्चा का केंदर भी कुछ आज है
  24. 1:54–2:01गजींदर ताकुर दूरा संकलित एक बेहत प्रभाव्शाली मैठली लोक कता गंगो देवीक भगत
  25. 2:01–2:05जो श्रोता इस विषे को करीप से फोलो करते है, वो जानते है
  26. 2:05–2:09कि ये सावन के महीने की प्रिष्ट बूमी पर आदारे था है
  27. 2:09–2:12एक सादारन मला जो दिन भर की महनत के बाद
  28. 2:12–2:14केवल गोंगे और सीप्या ही बटोर पाता है
  29. 2:14–2:17हा वो पुरी तरा तूट चूका होता है
  30. 2:17–2:17एक दम
  31. 2:17–2:19कि उकि उसने अपनी बपनी
  32. 2:19–2:22गंगो देवी के लिए सावन के मेले से
  33. 2:22–2:25चूडी लहेटी और नहीं साडी लाने का वादा किया था
  34. 2:25–2:29हताशा में वहा अंतिम बार जाल फएकता है
  35. 2:29–2:31और अपनी पतनी का नाम लेकर कहता है
  36. 2:31–2:34इ अंतिम भेरची गंगो शमा करब
  37. 2:34–2:39और इसके बाद जाल बारी मात्रा में मच्लियो से बबर जाता है,
  38. 2:39–2:44जो आगे चलकर मित्ला के पुरे मलाह समुदाय की एक स्तापित परमपरा बन जाती है.
  39. 2:44–2:50और यही से पूरी कहानी को देखने के दो बिलकुल अलग नजर ये सामने आते है ना.
  40. 2:50–2:53हमारी आज की चर्चा इसी मुख्य प्रष्न्पर किंद्रित है,
  41. 2:53–2:55कि इस लोग कता का अस्ली यर्द क्या है?
  42. 2:55–2:58जी, और देखे मेरा पक्ष इस मामले में बहुत स्पष्ट है.
  43. 2:58–3:01मैं ये मानती हूँ कि ये कता मुख्य रूब से,
  44. 3:01–3:04एक सादारन पती पतनी के सच्चे प्रेम,
  45. 3:20–3:24अच्छा, जब की मैं इसे इक �alag nazariye se dekta hoon.
  46. 3:24–3:29मेरा मानना है की ये कता एक समाच शास्तरी आवश्वकता को दर्षाती है.
  47. 3:29–3:35मैं ये तरक रहुंगा की ये एक हाँश्ये पर रहने वाले काम काजी मच्वारा समुदाए दुआरा
  48. 3:35–3:39अपनी आजीवीका की गोर अनिष्छित्ताउ का सामना करने किलिए
  49. 3:39–3:44रची गई एक सामाजिक और व्यावसाएक मित्ख निरमाड की प्रक्रिया है
  50. 3:44–3:47जिसे हम अख्विप्ट्ट्शनल मित्मेकिं कहते है
  51. 3:47–3:53तो आईए ये सीधे स्वोट सामगरी के उस हिस्च्से समझते हैं
  52. 3:53–3:55ज़हां ये सब शुब हूँता है
  53. 3:55–3:57समगरी इसे सबश्ष्ट रूप से
  54. 3:57–4:01प्रेम आश्रद्धा कता के रूप मिस्ठापिट करती है
  55. 4:01–4:04आप उस मलाह की उस दिन की स्थिती को दिखिये
  56. 4:04–4:06सावन का मेला चल रहा है
  57. 4:06–4:09रहा, जो उनके लिए काफी एहम समे होता है
  58. 4:09–4:13बलकुल! एक आम मच्वारे किलिए ये साल का वो समे होता है
  59. 4:13–4:15जब वो कुछ अत्रिक्त पैसे कमाए कर
  60. 4:15–4:18अपने परिवार को चोटी चोटी खुषिया दे सकता है
  61. 4:19–4:21उसने सुभही मन में ये संकल पिल्या था
  62. 4:21–4:25की आज की कमाए से वो अपनी पतनी गंगो किलिए
  63. 4:25–4:28चूडी लथ्फी और नूवा यानी साडी लाएगा
  64. 4:28–4:32लेकिन पूरे दिन पानी में संगरष करने के बाद उसे क्या मिलता है?
  65. 4:32–4:34दोका दरषंक
  66. 4:34–4:38हा खेवल दोका दरषंक और सत्वा
  67. 4:38–4:41शाम दल रही है उसका सबना तुट्रा है
  68. 4:41–4:45और उश्वन मे वो जो शब्द कैता है, वो बहुत गेरे हैं.
  69. 4:45–4:50दिखे वो श्वन निष्चित रूप से भावनात्मक रूप से बहुत भारी है, इस में कोई संदे हैं।
  70. 4:50–4:55और ये ये सुव भारी नहीं है, ये उस समाज की पूरी संदचना के खिलाफ जाता है.
  71. 4:55–4:59मतलव, एक परमपरागत पित्रु सत्तात्मक समाज में
  72. 4:59–5:01जहाई एक पूरुष गर का मुख्या होता है
  73. 5:01–5:07उसका अपनी पतनी के सामने अपनी विपलता को स्विकार करना एक बहुत बड़ी बात है
  74. 5:07–5:09वो किसी मन्त्र का जाएप नहीं करता
  75. 5:09–5:12उ किसी अद्रिश्य शक्ती से नहीं मागता.
  76. 5:12–5:17उ केवल कहता है, इ अन्तिम भेरची गंगो क्शमा करव.
  77. 5:17–5:19ये कोई आर्ठिक लालच नहीं है.
  78. 5:19–5:22वो ये में ही कहरा कि एं मुझे आमीर बनादो.
  79. 5:22–5:24वो बस अपनी पतनी से मापी मागरा है,
  80. 5:24–5:29योंकी वो उसे एक चोटा सा उबहार देने का अपना वादा पूरा नहीं कर पारा है.
  81. 5:30–5:34ये एक अईक अईक अईक साथ से निस सहाई अस्तिती है,
  82. 5:34–5:38जवाँ वो अपना सारा आगंकार चोडगर विषुध प्रेम का समरपन करता है.
  83. 5:38–5:43अर यही कारन है कि ये बहावना उस चमतकार का अस्ली स्रोथ है
  84. 5:43–5:48मैं समचता हूं कि आप यह आप यह जों सोचती हैं
  85. 5:48–5:51लिकिन मैं आपको एक अलग नजरीया देना जाहूंगा
  86. 5:51–5:54आप निस निस सहाई स्थिती का वरनन किया ना
  87. 5:54–5:56उसी बिन्दु से आपनी बाज शुरू करता हो।
  88. 5:57–5:58जब एक मच्वारे का परिवार
  89. 5:59–6:01पूरी तरह से इस बाद पन निरभर हो
  90. 6:01–6:03की पानी के भीतर मोझुद
  91. 6:03–6:05अद्द्रिष्ष दून्या में क्या चल रहा है
  92. 6:05–6:08तो उसका जीवन अथ दिदिक अनिष्चित हो जाता है
  93. 6:08–6:14बुतो है, लेकिन आप पानी में जाल फेखते है, जो आपके नियन्त्रन से पुरी तरा बहार है.
  94. 6:14–6:20मानविय मस्तिष्ख लगातार इस तरकी अनिष्चित्ता औराजक्ता को बरदाश नहीं कर सकता.
  95. 6:20–6:24मदलः पूरे दिन के हाथ तोर स्रम के बाद भी जब जाल खाली रहता है
  96. 6:24–6:27तो उस आता निराशा से बचने किलिए
  97. 6:27–6:29दिमाग को एक सहारे की
  98. 6:29–6:30एक नियम के आवश्षकता होती है
  99. 6:30–6:32तो आप ये कह रहे है
  100. 6:32–6:34कि ये प्यार नहीं
  101. 6:34–6:37बलकी दिमागी संटूलन बनाई रकने का एक तरीका था
  102. 6:37–6:41मैं ये कह रहूं के प्यार उस प्रक्रिया के लग स्वर्वाती बिन्दू था
  103. 6:41–6:45लेकिन जो बाद में हुआ वो पूरी तरह से एक समाच शास्तर्ये तन्त्र था
  104. 6:45–6:51मतलब, जब आपके पास खोने के लिए बहुत कुछ हो, और परिस्ठितियों पर आपका निंद्रन शून्नि हो,
  105. 6:51–6:56तो आपको एक आज्से मिखख की आवशकता होती है, जो आपको अगले दिन फिर से,
  106. 6:56–6:59उसी अंदेरे पानी में जाल फेकने की हिम्मत दे सके.
  107. 6:59–6:59आच्छा?
  108. 6:59–7:29आप गगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगग�
  109. 7:29–7:35अगर ये स्वर्फ अनिष्चित्ता से निपटने के लिए या दिमागी सुकून के लिए ग़ागा कोई नियम मात्र था.
  110. 7:35–7:39तो आमे उस विषिष्ट गधना पर द्यान देना जाहीए जो टीक अगले दिन गडी
  111. 7:39–7:40खाडी खान्सी गडना
  112. 7:40–7:43स्रोथ समगरी बहुत साथ तोर पर बताती है,
  113. 7:43–7:46के अगले दिन उस मलाहने प्रसे गंगो का नाम लिया,
  114. 7:47–7:49और उसे फिरसे मच्लियों का देर मिला.
  115. 7:49–7:53लेकिन उसी समः उसके पिता और भाई ने भी उसी नदी में जाल पेका.
  116. 7:54–7:55और उनके जाल में क्या या?
  117. 7:55–8:25अगर ये समवदाये दोब अरा खुट को सांट्वना देने किले गड़ा गया कोई तूल था या अनिष्चित्ता को कम करने का कोई मनोवे ग्यानेक शोट्कर्ट ता तो पिता और भाई क्यों विप्फलुए उनका जाल क्यों खाली रहा ये सपर्ष्च्रुब से साभित करता
  118. 8:25–8:28देखे मैं से एक अलग नजर्ये से देखता हूं
  119. 8:28–8:32आप जिस विपल्ता को प्रेम की कमी का प्रमार मान रही हैं
  120. 8:32–8:36मैं उसे इस मिठक नरमार की सब से महतपून समःष्चास्त्रिये कडी मानता हूं
  121. 8:36–8:38या? वो कैसे?
  122. 8:38–8:41मदब विपलता किसी मिठक को कैसे मस्वूट कर सकती है?
  123. 8:41–8:46किसी किसी बी अनुष्टान या मिठक को समाज में स्थापित होने किलिए,
  124. 8:46–8:50नियमो और एक स्पष्ट पाटरन की आवषकता हुती है.
  125. 8:50–8:54जरा सोची ए, अगर अगले दिन पिता और भाई को भी,
  126. 8:54–8:59बिना किसी बहावना के आचानक देर सारी मचलिया मिल जाती, तो क्या होता?
  127. 9:00–9:07लोग इसे केवल मुसम का बडलाव, पानी का भाव, या महस इक इत्तिपाक मान लिते, मित्ख वहीं दम तोड देता.
  128. 9:07–9:15पिता और भाई का विफल होना वास्तव में कता के बीतर उस मिधख को प्रमाडित करने का समाज शास्त्रिय तन्त रहें.
  129. 9:15–9:25इसी अन्तर को देक कर ही परिवार को और बाद में पुरे समुदाय को इस बात का सबूथ मिला कि हां इस विषिष्त तरीके में एक शकती है.
  130. 9:25–9:30अगर हर कोई सबलता पालेता, तो ये एक विषेश आनुष्धान कैसे बनता?
  131. 9:30–10:00आप ये बवड़ ता तेखी आप प्रज़ा तेखी ता तेखी ता तेखी ता तेखी ता तेखी ता तेखी ता तेखी ता तेखी ता तेखी ता तेखी ता तेखी ता तेखी ता तेखी ता तेखी ता तेखी ता तेखी ता तेखी ता तेखी ता तेखी ता तेखी ता तेखी
  132. 10:00–10:30अदियान बादा था विज़्ान के प्लेसीबो अप्ट की देखे देखे प्लेसीबो की गुली में अपना कोई रसाएने गुन नहीं हुता, लेकिन जब मरीज को उस पर पून विष्वास हुता है, तो उसका शरीर खुद बखुद खुद थीक होने लकता है. समुदाय ने ग
  133. 10:30–10:34उसे उस एक आदमी के विषुट्द प्रेम और उसके पुण विष्वास ने
  134. 10:34–10:38बाखी मच्वारों को एक आँसा मनो वेग्याने कवच देदिया
  135. 10:38–10:40जिसकी उने सक्थ जरूरत थी
  136. 10:40–10:43वे उस प्रेम की प्रमानिक्ता से प्रभाविथ हुए ते
  137. 10:43–10:49मतलब, श्रोद समगरी खुद कहती है, अज भी जब मलाज जाल फजकते हैं,
  138. 10:49–10:53तो वे एकता प्रेम कस्मिती के न जीवित राखेत अची,
  139. 10:53–10:56वे एक प्रेम कस्मिती को जीवित रकते हैं.
  140. 10:56–10:57आचा.
  141. 10:57–11:00वे किसी व्यावसाएक तूल का इस्तमाह नहीं कर रहें.
  142. 11:00–11:04वे उस विनम्रता और समरपन का उच्सव मना रहे हैं।
  143. 11:04–11:07अब जो लोग हमें सून रहे हैं, वि शायद सोचें,
  144. 11:07–11:09कि मैं बहुत जयादा वेवाहरे खोरहा हूं,
  145. 11:09–11:13या एक हुपसुरत प्रेम कहानी को स्रफ एक समाज शास्तरिय तूल बताकर,
  146. 11:13–11:15उसकी सुन्दरता कम कर रहा हूं
  147. 11:15–11:17लेकिन हमें याठार्त को देखना होगा
  148. 11:17–11:19याठार्त क्या है आप क्या नुसार
  149. 11:19–11:24याठार्त यह है कि गंगो देविग भगत एक अनुश्धान बन गया
  150. 11:24–11:28स्रोट सामगरी यह सपच्ट रूप से उलेक करती है
  151. 11:28–11:30आप ख़ी से दुसरी कहाडी तक फैल गया.
  152. 11:30–11:33आप कहती हैं कि वे प्रेम की स्मुती जीवित रकते हैं,
  153. 11:33–11:37मैं कहता हूँ कि सावन के महने में पूरी मितला के
  154. 11:37–11:41मलाह समुदाय को अपने कटेश्रम में एक आशा की किरन चाही एथी,
  155. 11:41–11:43जिसे उनो ने इस कहनी में कोज लिया.
  156. 11:43–11:48अप्रेम वाहन ज़रूर हूँ सकता है, जिस पर बैट कर ये विचार आगे बड़ा,
  157. 11:48–11:51लिकिन अस्ली गन्तववितो आजीविका की सुरक्षा ही ती,
  158. 11:51–11:55ये एक खाडी से तुस्री खाडी तक, केवल यसलिये नहीं फैला,
  159. 11:55–11:57क्योकी एक पति अपनी पतनी से प्यार करता था.
  160. 12:13–12:18अगर बाद पर सहमत हैं कि ये कता विक्तिगद से सामूहिक अनुबहव में बड़ल गगी.
  161. 12:18–12:23लेकिन मेरी नजर में इस कता की सबसे बढ़ी ताकत इसकी सरल्ता में है.
  162. 12:23–12:28जो फिर से इसे किसी भी चालाकी से गड़े गय सामाजिग उपकरन्चे अलग करती है.
  163. 12:28–12:29सरज्ता कैसे
  164. 12:29–12:31स्रोथ समगरी स्पष्टरूप से
  165. 12:31–12:33इसकी तुल्ला अन्ये लोग गाताँ से करती है
  166. 12:33–12:36और बताती है, कि यहां कोई राख्षिस नहीं है
  167. 12:36–12:39कोई महाखाव्ये यूध्ध नहीं है
  168. 12:39–12:41देव्ताउं का कोई जटिल शड्यंट्र नहीं है
  169. 12:41–12:44यहां केवल एक मच्वारा और उसकी पत्मी है.
  170. 12:44–12:47यहे सरलता ही इस बात का पुक्ता प्रमान है,
  171. 12:47–12:52की मानव भावनाय, विषेशकर, क्षमा, विनम्रता और श्रद्धा,
  172. 12:52–12:55किसी भी अलोकिक रष्टक शेप के बिना भी
  173. 12:55–12:59बिना भी अपने आपने असादारन परिणाम देने में सक्षम हैं.
  174. 12:59–13:03अगर ये केवल व्याव साएक सुरक्षा का मामला होता,
  175. 13:03–13:06तो वे शाएद जल के किसी बडेवता,
  176. 13:06–13:09जैसे वरून देव, या किसी नदी देवी की पूजा शुरूकर देते.
  177. 13:09–13:13लेकिन उनोंने एक सादारन मलाहिन की सम्रिती को चुना
  178. 13:13–13:15उई उई उई उई च़ वोग तर्ख है
  179. 13:15–13:20लिकिन क्या आपने विचार किया है, कि इस कता कि ये सरलता ही इसे इतना प्रभावी और आमर बनाती है.
  180. 13:20–13:24मतलब आप कह रही हैं कि उनोने किसी बड़ेवता को नहीं चुना,
  181. 13:24–13:27बलकि एक मल्लाहिन को चुना, और यही प्रेम की जीत है.
  182. 13:27–13:33मैं केता हो गी एक मलाहीन को चुन नहीं इस पूरी प्रक्रिया का सब से बड़ा समाज शास्ट्री मास्टर स्ट्रोक है.
  183. 13:33–13:37बहयानक राख्षसों या किसी महाकाविय युध्ध के इर्द-गिर्द गूमती है,
  184. 13:37–13:40तो आम आद्मी उसका सम्मान तो करता है,
  185. 13:40–13:43लेकिन वो उसे कुदको पुरी तरह जोड नहीं पाता
  186. 13:43–13:46वे कहन्या उनकी पहुच से बहुत दूर
  187. 13:46–13:48किसी अवर ही लोक की लकती हैं
  188. 13:48–13:50आव वो में समच सकती हूँ
  189. 13:50–13:52एक गरीब मच्वारे को हमेशा लकता है कि
  190. 13:52–13:55बड़े देवता शाएत के वल बड़े मन्दिरों
  191. 13:55–13:57अगर आंगन की अज़्ी है
  192. 13:57–13:59एक आम मलाहिन का अज़्ादारन बन जाना
  193. 13:59–14:01उसके नाम में जादूई शक्ती आजाना
  194. 14:01–14:03ये बात इस पूरे समचवगो एक बहुती गेरा
  195. 14:03–14:05वेवावारिक और मनोवेग्यानेग भरुसा दिलाती है
  196. 14:05–14:07अग, मैं देख पारीझों कि आप इसे
  197. 14:07–14:15ज़ादूई शक्तिया जाना ये बात पूरे समवदाये को एक बहुती गेरा वेवावारिक और मनोवैग्यानेक बहुत्या दिलाती है
  198. 14:15–14:20अग, मैं देख पारीों कि आप इसे उनके यतार्त से कैसे जोड रहे हैं?
  199. 14:20–14:29इक दम यह उने बताता है कि उनके इस हार्टोड, सादारान और हाश्ये पर पडे जीवन में भी खुछ बड़ा गड़ित हो सकता है.
  200. 14:29–14:33ये विचार की हमारे भीच काही कोई वेकती हमें बचाचता है
  201. 14:33–14:35किसी भी दूरस देवता की तुलना में
  202. 14:35–14:39आजीविका के संगर्ष में जाडा व्यवारेक संबल देता है
  203. 14:39–14:41इसले कोई राख्ष्स या युध्द नहोंग,
  204. 14:41–14:45इस कता की कमजोरी या केवल प्रेम का प्रतीक नहीं है
  205. 14:45–14:47बलकी यह वो मुखे कारन है
  206. 14:47–14:51जिसने इसे पीडियो तक एक कामकाजी समाज में जीवित रखा
  207. 14:51–14:53खेर, मैं आपकी इस बात को स्विक अर्ग करती हूं
  208. 14:53–14:56के गंगो देवी का उनके अपने भीट से हूना
  209. 14:56–14:59इस कता को बीहत प्रासंगिक बनाता है.
  210. 14:59–15:01लेकिन मैं फिर भी इस बाद पर जोर दूंगी,
  211. 15:01–15:05कि तक्नी क्या समाज्शास्च्र बहावनाउ के बना खाली है.
  212. 15:05–15:08वो जो शवन ता जब मलाहने कहा च्मा करब,
  213. 15:08–15:10वो कोई सामन निबात नहीं ती.
  214. 15:10–15:11रहा वो शवन खास था.
  215. 15:11–15:15वो कुई स्क्रिप्त नहीं पर लाहा था, वह दर्द वास्ट्विक था,
  216. 15:15–15:18और समाज चाहे कितनी भी कहन्या गर्डले,
  217. 15:18–15:20वह अंतत ता उसी कहन्य को अपनाता है,
  218. 15:20–15:23जिसकी मुल भावना में सच्चाई हूती है.
  219. 15:23–15:25या उस चमतकार का अस्ली स्रोथ है,
  220. 15:25–15:28जिसे बाद में समवदाई ने पहचाना और सहेजा
  221. 15:28–15:31मैं इस बाद को बिलकुल खारेज नहीं कर रहा हूं
  222. 15:31–15:34की वहां एक गेरा व्यक्तिगत प्रेम या दर्द था
  223. 15:34–15:36दोनो बातें सच हो सकती हैं
  224. 15:36–15:38लेकिन हमें ये समजना होगा
  225. 15:38–15:42कि गंगो देविग भगत एक शब्द्खोश का हिस्चा बन गया,
  226. 15:42–15:44एक इस्थापित परमपरा बन गया,
  227. 15:44–15:47जो आज भी उन नद्यो के किनारे गुजता है.
  228. 15:47–15:48जी.
  229. 15:48–15:52कोई भी वक्तिगद भावना तब तक एक सामोजिक सत्टि नहीं बनती,
  230. 15:52–15:55जब तक की पुरे समाज को उसके आविशकताना हो
  231. 15:55–15:59ये कता हमे ये सिखाती है, कि कैसे काम का जी वर्ग
  232. 15:59–16:01अपने श्रम को गरीमा प्रदान करता है
  233. 16:01–16:03उनके लिए वो जाल फेकना
  234. 16:03–16:06केवल मचली पकरने की एक यान्तरि क्रिया नही रहा जाती
  235. 16:06–16:13बलकी वह अनिश्चित्ता के एक विशाल समुद्र में आस्था का जाल फेखने जैसी बन जाती है.
  236. 16:13–16:19तो आपस प्रतीथ होता है कि हम इस गेहरी चर्चा के अंतिम पडाव पर पहुट्गगे है.
  237. 16:19–16:23जहां हमें अपने विचारो को समेटन चाही है. बलकुल.
  238. 16:23–16:26अगर में अपनी स्थिती को संशेप में प्रस्थ। करूँ,
  239. 16:26–16:29तो मेरा स्पष्ट मानना है कि गंगो देवी भगत,
  240. 16:29–16:32मानविय बावनाव की परम विजेए का प्रतीख है.
  241. 16:32–16:35ये कहानी हमें ये दिखाती है,
  242. 16:35–16:38कि कैसे एक सादारन पतिपतनी के भीच का निस्वार्त प्रेम,
  243. 16:53–16:56अगर मैं अपने द्रिष्टी कोन को समेटूं,
  244. 16:56–17:00अगर मैं अपने द्रिष्टी कोन को समेटूं, तो मैं कहुंगा,
  245. 17:00–17:03कि इस कहानी का वास्तविक और दीर्ग कालिक महत्व,
  246. 17:03–17:07इसके लोग परमपरा बनने की उस प्रक्रीया में नहित है.
  247. 17:07–17:11यह हमें बहुत्ही गेरा समाज शास्तरी असत्य दिखाती है,
  248. 17:11–17:16अगरा समाज्शास्त्री असत्ते दिखाती है, कैसे एक महनत कष समुदाय,
  249. 17:16–17:22अपनी आजीविका की कथोर वास्तविक्ताव, निराशाव और अनिश्वित्ताव की भीच आशाख हूँजने किलिया,
  250. 17:22–17:25अपनी सुयम की सान्सक्रतिक द्रोहर का निरमाड करता है.
  251. 17:25–17:55गगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगग�
  252. 17:55–17:56जी पुरी तरह से
  253. 17:56–18:00ये कता मितला की लोक परमपरा का एक आमुल यर रतन है
  254. 18:00–18:06जो ये साभिट करती है, कि सादारन लोगों के जीवन में भी असादारन कहानिया बसती हैं
  255. 18:06–18:09मैं पुरी तरह सेमत हों
  256. 18:09–18:14ये एकी कहानि के तो गलग-जलग, लेकिन भेहत जरूरी आयाम है
  257. 18:14–18:18और शायद इसकी आस्ली सुन्दरता इसी बात में है,
  258. 18:18–18:22कि जब हम इन दोनो द्रिष्टी कोनो को एक साथ रखकर देकते है,
  259. 18:22–18:26तो ये कता और भी अदिक सम्रद और गेहरी हो जाती है.
  260. 18:26–18:30बिलकुल, तो हम इस चर्चा को यही विराम देते हैं.
  261. 18:30–18:37हम यह निडन्या आप पर हमारे शोटाव पर चोडते हैं कि आप इस शोट समगरी में क्या देकते हैं.
  262. 18:37–18:41आपको बस गेहराई में उतरने और सही नजरये से देखने की ज़ोरत है.
  263. 18:41–18:46कि आफ सी लोक कताव में हमेशा कुछ नया कुजने को बाकी रहता है.
  264. 18:46–18:49और बज़ागा बाद़ा वो बज़ागा वो बज़ागा वो बज़ागा वो बज़ागा वो बज़ागा वो बज़ागा वो बज़ागा वो बज़ागा वो बज़ागा वो बज़ागा वो बज़ागा वो बज़ागा वो बज़ागा वो बज़ागा वो बज़ागा वो बज

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कल्पना कीजीए, आप पानी में कडे है, लगतार चोड़ा गड़े की हार तोड महनत हो चुकी है, और आपके परिवार का पेट इस बात पर निरभर करता है, कि अगले पल आपके जाल में क्या पहसता है. जो की बहुत अनिष्ट थ है? बिल्कुल, लेकिन जब आब जाल बहार निकालते है, तो बिल्कुल खाली होता है. मतलब उस चरम, निराशा और भेबसी के खषवन में इक अन्सान क्या करता है? किसी शक्तिषाली देस्ता को पुकारता है? या आस्मान की तरफ देख कर रोता है, है ना? अग, लेकिन आज हम एक आजी ही कहानी पर चर्चा कर रहे हैं जहां एक व्यक्तीने किसी भगवान को नहीं पुकारा बलकी अपनी पतनी से मापी मागी और इस एक चोटी सी गधना ने एक आजा अनुश्टान शुरू कर दिया तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो तो � अब आप दवाए ने अपने अस्थित्व के लिए एक मिथखक का निरमाड किया और आब ये विष्लेशन इसले भी बहत महत्वपून है कि अखसर हम इतिहास में या लोक कताव में केवल राजाँं, युद्धों या बड़े महाकावियों को ही तलाषते है जी, सही कहा? हम बूल जाते है कि समाज का सबसे निचला और महनत कष्तब का अपनी अनिष्च्टताओ से कैसे लड़ता है? मतलब उनके जीवन की कहानिया महलो में नहीं बलकी नदियों के किनारे और उनहीं खाली जालों के भी जन मेंती है. बिल्कुल और आज के हमारी चर्चा का केंदर भी कुछ आज है गजींदर ताकुर दूरा संकलित एक बेहत प्रभाव्शाली मैठली लोक कता गंगो देवीक भगत जो श्रोता इस विषे को करीप से फोलो करते है, वो जानते है कि ये सावन के महीने की प्रिष्ट बूमी पर आदारे था है एक सादारन मला जो दिन भर की महनत के बाद केवल गोंगे और सीप्या ही बटोर पाता है हा वो पुरी तरा तूट चूका होता है एक दम कि उकि उसने अपनी बपनी गंगो देवी के लिए सावन के मेले से चूडी लहेटी और नहीं साडी लाने का वादा किया था हताशा में वहा अंतिम बार जाल फएकता है और अपनी पतनी का नाम लेकर कहता है इ अंतिम भेरची गंगो शमा करब और इसके बाद जाल बारी मात्रा में मच्लियो से बबर जाता है, जो आगे चलकर मित्ला के पुरे मलाह समुदाय की एक स्तापित परमपरा बन जाती है. और यही से पूरी कहानी को देखने के दो बिलकुल अलग नजर ये सामने आते है ना. हमारी आज की चर्चा इसी मुख्य प्रष्न्पर किंद्रित है, कि इस लोग कता का अस्ली यर्द क्या है? जी, और देखे मेरा पक्ष इस मामले में बहुत स्पष्ट है. मैं ये मानती हूँ कि ये कता मुख्य रूब से, एक सादारन पती पतनी के सच्चे प्रेम, अच्छा, जब की मैं इसे इक �alag nazariye se dekta hoon. मेरा मानना है की ये कता एक समाच शास्तरी आवश्वकता को दर्षाती है. मैं ये तरक रहुंगा की ये एक हाँश्ये पर रहने वाले काम काजी मच्वारा समुदाए दुआरा अपनी आजीवीका की गोर अनिष्छित्ताउ का सामना करने किलिए रची गई एक सामाजिक और व्यावसाएक मित्ख निरमाड की प्रक्रिया है जिसे हम अख्विप्ट्ट्शनल मित्मेकिं कहते है तो आईए ये सीधे स्वोट सामगरी के उस हिस्च्से समझते हैं ज़हां ये सब शुब हूँता है समगरी इसे सबश्ष्ट रूप से प्रेम आश्रद्धा कता के रूप मिस्ठापिट करती है आप उस मलाह की उस दिन की स्थिती को दिखिये सावन का मेला चल रहा है रहा, जो उनके लिए काफी एहम समे होता है बलकुल! एक आम मच्वारे किलिए ये साल का वो समे होता है जब वो कुछ अत्रिक्त पैसे कमाए कर अपने परिवार को चोटी चोटी खुषिया दे सकता है उसने सुभही मन में ये संकल पिल्या था की आज की कमाए से वो अपनी पतनी गंगो किलिए चूडी लथ्फी और नूवा यानी साडी लाएगा लेकिन पूरे दिन पानी में संगरष करने के बाद उसे क्या मिलता है? दोका दरषंक हा खेवल दोका दरषंक और सत्वा शाम दल रही है उसका सबना तुट्रा है और उश्वन मे वो जो शब्द कैता है, वो बहुत गेरे हैं. दिखे वो श्वन निष्चित रूप से भावनात्मक रूप से बहुत भारी है, इस में कोई संदे हैं। और ये ये सुव भारी नहीं है, ये उस समाज की पूरी संदचना के खिलाफ जाता है. मतलव, एक परमपरागत पित्रु सत्तात्मक समाज में जहाई एक पूरुष गर का मुख्या होता है उसका अपनी पतनी के सामने अपनी विपलता को स्विकार करना एक बहुत बड़ी बात है वो किसी मन्त्र का जाएप नहीं करता उ किसी अद्रिश्य शक्ती से नहीं मागता. उ केवल कहता है, इ अन्तिम भेरची गंगो क्शमा करव. ये कोई आर्ठिक लालच नहीं है. वो ये में ही कहरा कि एं मुझे आमीर बनादो. वो बस अपनी पतनी से मापी मागरा है, योंकी वो उसे एक चोटा सा उबहार देने का अपना वादा पूरा नहीं कर पारा है. ये एक अईक अईक अईक साथ से निस सहाई अस्तिती है, जवाँ वो अपना सारा आगंकार चोडगर विषुध प्रेम का समरपन करता है. अर यही कारन है कि ये बहावना उस चमतकार का अस्ली स्रोथ है मैं समचता हूं कि आप यह आप यह जों सोचती हैं लिकिन मैं आपको एक अलग नजरीया देना जाहूंगा आप निस निस सहाई स्थिती का वरनन किया ना उसी बिन्दु से आपनी बाज शुरू करता हो। जब एक मच्वारे का परिवार पूरी तरह से इस बाद पन निरभर हो की पानी के भीतर मोझुद अद्द्रिष्ष दून्या में क्या चल रहा है तो उसका जीवन अथ दिदिक अनिष्चित हो जाता है बुतो है, लेकिन आप पानी में जाल फेखते है, जो आपके नियन्त्रन से पुरी तरा बहार है. मानविय मस्तिष्ख लगातार इस तरकी अनिष्चित्ता औराजक्ता को बरदाश नहीं कर सकता. मदलः पूरे दिन के हाथ तोर स्रम के बाद भी जब जाल खाली रहता है तो उस आता निराशा से बचने किलिए दिमाग को एक सहारे की एक नियम के आवश्षकता होती है तो आप ये कह रहे है कि ये प्यार नहीं बलकी दिमागी संटूलन बनाई रकने का एक तरीका था मैं ये कह रहूं के प्यार उस प्रक्रिया के लग स्वर्वाती बिन्दू था लेकिन जो बाद में हुआ वो पूरी तरह से एक समाच शास्तर्ये तन्त्र था मतलब, जब आपके पास खोने के लिए बहुत कुछ हो, और परिस्ठितियों पर आपका निंद्रन शून्नि हो, तो आपको एक आज्से मिखख की आवशकता होती है, जो आपको अगले दिन फिर से, उसी अंदेरे पानी में जाल फेकने की हिम्मत दे सके. आच्छा? आप गगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगग� अगर ये स्वर्फ अनिष्चित्ता से निपटने के लिए या दिमागी सुकून के लिए ग़ागा कोई नियम मात्र था. तो आमे उस विषिष्ट गधना पर द्यान देना जाहीए जो टीक अगले दिन गडी खाडी खान्सी गडना स्रोथ समगरी बहुत साथ तोर पर बताती है, के अगले दिन उस मलाहने प्रसे गंगो का नाम लिया, और उसे फिरसे मच्लियों का देर मिला. लेकिन उसी समः उसके पिता और भाई ने भी उसी नदी में जाल पेका. और उनके जाल में क्या या? अगर ये समवदाये दोब अरा खुट को सांट्वना देने किले गड़ा गया कोई तूल था या अनिष्चित्ता को कम करने का कोई मनोवे ग्यानेक शोट्कर्ट ता तो पिता और भाई क्यों विप्फलुए उनका जाल क्यों खाली रहा ये सपर्ष्च्रुब से साभित करता देखे मैं से एक अलग नजर्ये से देखता हूं आप जिस विपल्ता को प्रेम की कमी का प्रमार मान रही हैं मैं उसे इस मिठक नरमार की सब से महतपून समःष्चास्त्रिये कडी मानता हूं या? वो कैसे? मदब विपलता किसी मिठक को कैसे मस्वूट कर सकती है? किसी किसी बी अनुष्टान या मिठक को समाज में स्थापित होने किलिए, नियमो और एक स्पष्ट पाटरन की आवषकता हुती है. जरा सोची ए, अगर अगले दिन पिता और भाई को भी, बिना किसी बहावना के आचानक देर सारी मचलिया मिल जाती, तो क्या होता? लोग इसे केवल मुसम का बडलाव, पानी का भाव, या महस इक इत्तिपाक मान लिते, मित्ख वहीं दम तोड देता. पिता और भाई का विफल होना वास्तव में कता के बीतर उस मिधख को प्रमाडित करने का समाज शास्त्रिय तन्त रहें. इसी अन्तर को देक कर ही परिवार को और बाद में पुरे समुदाय को इस बात का सबूथ मिला कि हां इस विषिष्त तरीके में एक शकती है. अगर हर कोई सबलता पालेता, तो ये एक विषेश आनुष्धान कैसे बनता? आप ये बवड़ ता तेखी आप प्रज़ा तेखी ता तेखी ता तेखी ता तेखी ता तेखी ता तेखी ता तेखी ता तेखी ता तेखी ता तेखी ता तेखी ता तेखी ता तेखी ता तेखी ता तेखी ता तेखी ता तेखी ता तेखी ता तेखी ता तेखी ता तेखी अदियान बादा था विज़्ान के प्लेसीबो अप्ट की देखे देखे प्लेसीबो की गुली में अपना कोई रसाएने गुन नहीं हुता, लेकिन जब मरीज को उस पर पून विष्वास हुता है, तो उसका शरीर खुद बखुद खुद थीक होने लकता है. समुदाय ने ग उसे उस एक आदमी के विषुट्द प्रेम और उसके पुण विष्वास ने बाखी मच्वारों को एक आँसा मनो वेग्याने कवच देदिया जिसकी उने सक्थ जरूरत थी वे उस प्रेम की प्रमानिक्ता से प्रभाविथ हुए ते मतलब, श्रोद समगरी खुद कहती है, अज भी जब मलाज जाल फजकते हैं, तो वे एकता प्रेम कस्मिती के न जीवित राखेत अची, वे एक प्रेम कस्मिती को जीवित रकते हैं. आचा. वे किसी व्यावसाएक तूल का इस्तमाह नहीं कर रहें. वे उस विनम्रता और समरपन का उच्सव मना रहे हैं। अब जो लोग हमें सून रहे हैं, वि शायद सोचें, कि मैं बहुत जयादा वेवाहरे खोरहा हूं, या एक हुपसुरत प्रेम कहानी को स्रफ एक समाज शास्तरिय तूल बताकर, उसकी सुन्दरता कम कर रहा हूं लेकिन हमें याठार्त को देखना होगा याठार्त क्या है आप क्या नुसार याठार्त यह है कि गंगो देविग भगत एक अनुश्धान बन गया स्रोट सामगरी यह सपच्ट रूप से उलेक करती है आप ख़ी से दुसरी कहाडी तक फैल गया. आप कहती हैं कि वे प्रेम की स्मुती जीवित रकते हैं, मैं कहता हूँ कि सावन के महने में पूरी मितला के मलाह समुदाय को अपने कटेश्रम में एक आशा की किरन चाही एथी, जिसे उनो ने इस कहनी में कोज लिया. अप्रेम वाहन ज़रूर हूँ सकता है, जिस पर बैट कर ये विचार आगे बड़ा, लिकिन अस्ली गन्तववितो आजीविका की सुरक्षा ही ती, ये एक खाडी से तुस्री खाडी तक, केवल यसलिये नहीं फैला, क्योकी एक पति अपनी पतनी से प्यार करता था. अगर बाद पर सहमत हैं कि ये कता विक्तिगद से सामूहिक अनुबहव में बड़ल गगी. लेकिन मेरी नजर में इस कता की सबसे बढ़ी ताकत इसकी सरल्ता में है. जो फिर से इसे किसी भी चालाकी से गड़े गय सामाजिग उपकरन्चे अलग करती है. सरज्ता कैसे स्रोथ समगरी स्पष्टरूप से इसकी तुल्ला अन्ये लोग गाताँ से करती है और बताती है, कि यहां कोई राख्षिस नहीं है कोई महाखाव्ये यूध्ध नहीं है देव्ताउं का कोई जटिल शड्यंट्र नहीं है यहां केवल एक मच्वारा और उसकी पत्मी है. यहे सरलता ही इस बात का पुक्ता प्रमान है, की मानव भावनाय, विषेशकर, क्षमा, विनम्रता और श्रद्धा, किसी भी अलोकिक रष्टक शेप के बिना भी बिना भी अपने आपने असादारन परिणाम देने में सक्षम हैं. अगर ये केवल व्याव साएक सुरक्षा का मामला होता, तो वे शाएद जल के किसी बडेवता, जैसे वरून देव, या किसी नदी देवी की पूजा शुरूकर देते. लेकिन उनोंने एक सादारन मलाहिन की सम्रिती को चुना उई उई उई उई च़ वोग तर्ख है लिकिन क्या आपने विचार किया है, कि इस कता कि ये सरलता ही इसे इतना प्रभावी और आमर बनाती है. मतलब आप कह रही हैं कि उनोने किसी बड़ेवता को नहीं चुना, बलकि एक मल्लाहिन को चुना, और यही प्रेम की जीत है. मैं केता हो गी एक मलाहीन को चुन नहीं इस पूरी प्रक्रिया का सब से बड़ा समाज शास्ट्री मास्टर स्ट्रोक है. बहयानक राख्षसों या किसी महाकाविय युध्ध के इर्द-गिर्द गूमती है, तो आम आद्मी उसका सम्मान तो करता है, लेकिन वो उसे कुदको पुरी तरह जोड नहीं पाता वे कहन्या उनकी पहुच से बहुत दूर किसी अवर ही लोक की लकती हैं आव वो में समच सकती हूँ एक गरीब मच्वारे को हमेशा लकता है कि बड़े देवता शाएत के वल बड़े मन्दिरों अगर आंगन की अज़्ी है एक आम मलाहिन का अज़्ादारन बन जाना उसके नाम में जादूई शक्ती आजाना ये बात इस पूरे समचवगो एक बहुती गेरा वेवावारिक और मनोवेग्यानेग भरुसा दिलाती है अग, मैं देख पारीझों कि आप इसे ज़ादूई शक्तिया जाना ये बात पूरे समवदाये को एक बहुती गेरा वेवावारिक और मनोवैग्यानेक बहुत्या दिलाती है अग, मैं देख पारीों कि आप इसे उनके यतार्त से कैसे जोड रहे हैं? इक दम यह उने बताता है कि उनके इस हार्टोड, सादारान और हाश्ये पर पडे जीवन में भी खुछ बड़ा गड़ित हो सकता है. ये विचार की हमारे भीच काही कोई वेकती हमें बचाचता है किसी भी दूरस देवता की तुलना में आजीविका के संगर्ष में जाडा व्यवारेक संबल देता है इसले कोई राख्ष्स या युध्द नहोंग, इस कता की कमजोरी या केवल प्रेम का प्रतीक नहीं है बलकी यह वो मुखे कारन है जिसने इसे पीडियो तक एक कामकाजी समाज में जीवित रखा खेर, मैं आपकी इस बात को स्विक अर्ग करती हूं के गंगो देवी का उनके अपने भीट से हूना इस कता को बीहत प्रासंगिक बनाता है. लेकिन मैं फिर भी इस बाद पर जोर दूंगी, कि तक्नी क्या समाज्शास्च्र बहावनाउ के बना खाली है. वो जो शवन ता जब मलाहने कहा च्मा करब, वो कोई सामन निबात नहीं ती. रहा वो शवन खास था. वो कुई स्क्रिप्त नहीं पर लाहा था, वह दर्द वास्ट्विक था, और समाज चाहे कितनी भी कहन्या गर्डले, वह अंतत ता उसी कहन्य को अपनाता है, जिसकी मुल भावना में सच्चाई हूती है. या उस चमतकार का अस्ली स्रोथ है, जिसे बाद में समवदाई ने पहचाना और सहेजा मैं इस बाद को बिलकुल खारेज नहीं कर रहा हूं की वहां एक गेरा व्यक्तिगत प्रेम या दर्द था दोनो बातें सच हो सकती हैं लेकिन हमें ये समजना होगा कि गंगो देविग भगत एक शब्द्खोश का हिस्चा बन गया, एक इस्थापित परमपरा बन गया, जो आज भी उन नद्यो के किनारे गुजता है. जी. कोई भी वक्तिगद भावना तब तक एक सामोजिक सत्टि नहीं बनती, जब तक की पुरे समाज को उसके आविशकताना हो ये कता हमे ये सिखाती है, कि कैसे काम का जी वर्ग अपने श्रम को गरीमा प्रदान करता है उनके लिए वो जाल फेकना केवल मचली पकरने की एक यान्तरि क्रिया नही रहा जाती बलकी वह अनिश्चित्ता के एक विशाल समुद्र में आस्था का जाल फेखने जैसी बन जाती है. तो आपस प्रतीथ होता है कि हम इस गेहरी चर्चा के अंतिम पडाव पर पहुट्गगे है. जहां हमें अपने विचारो को समेटन चाही है. बलकुल. अगर में अपनी स्थिती को संशेप में प्रस्थ। करूँ, तो मेरा स्पष्ट मानना है कि गंगो देवी भगत, मानविय बावनाव की परम विजेए का प्रतीख है. ये कहानी हमें ये दिखाती है, कि कैसे एक सादारन पतिपतनी के भीच का निस्वार्त प्रेम, अगर मैं अपने द्रिष्टी कोन को समेटूं, अगर मैं अपने द्रिष्टी कोन को समेटूं, तो मैं कहुंगा, कि इस कहानी का वास्तविक और दीर्ग कालिक महत्व, इसके लोग परमपरा बनने की उस प्रक्रीया में नहित है. यह हमें बहुत्ही गेरा समाज शास्तरी असत्य दिखाती है, अगरा समाज्शास्त्री असत्ते दिखाती है, कैसे एक महनत कष समुदाय, अपनी आजीविका की कथोर वास्तविक्ताव, निराशाव और अनिश्वित्ताव की भीच आशाख हूँजने किलिया, अपनी सुयम की सान्सक्रतिक द्रोहर का निरमाड करता है. गगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगगग� जी पुरी तरह से ये कता मितला की लोक परमपरा का एक आमुल यर रतन है जो ये साभिट करती है, कि सादारन लोगों के जीवन में भी असादारन कहानिया बसती हैं मैं पुरी तरह सेमत हों ये एकी कहानि के तो गलग-जलग, लेकिन भेहत जरूरी आयाम है और शायद इसकी आस्ली सुन्दरता इसी बात में है, कि जब हम इन दोनो द्रिष्टी कोनो को एक साथ रखकर देकते है, तो ये कता और भी अदिक सम्रद और गेहरी हो जाती है. बिलकुल, तो हम इस चर्चा को यही विराम देते हैं. हम यह निडन्या आप पर हमारे शोटाव पर चोडते हैं कि आप इस शोट समगरी में क्या देकते हैं. आपको बस गेहराई में उतरने और सही नजरये से देखने की ज़ोरत है. कि आफ सी लोक कताव में हमेशा कुछ नया कुजने को बाकी रहता है. और बज़ागा बाद़ा वो बज़ागा वो बज़ागा वो बज़ागा वो बज़ागा वो बज़ागा वो बज़ागा वो बज़ागा वो बज़ागा वो बज़ागा वो बज़ागा वो बज़ागा वो बज़ागा वो बज़ागा वो बज़ागा वो बज़ागा वो बज

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