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चौहड़मल_रेशमा_और_समाज_का_सामूहिक_अपराधबोध.m4a
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- 0:00–0:15अगर मैं आप से कहुँ के आमर प्रेम का जश्न मनाने किलिए बनाया गया एक बहव्व्य मन्द्ध्र, आसल में अग पुरे समाज के सामूही कप्राद बोद, यानी उनके गिल्ट का समारक है, तो आप ख्या कहेंगे.
- 0:15–0:20विमर्ष और विवद द्रिष्टिकोन के हमारे मनज देबेट मे आपका स्वादध है.
- 0:20–0:25आज हम जिस स्रोथ सामगरी पर बात कर रहे है,
- 0:25–0:30उसे सुनकर शाइत बहुत से लोगों के दिमाग मित तुरनत रोमयो और जूल्येट की चवी बन जाए.
- 0:30–0:36अगर देखे ये कहानी उसे कही ज़ादा गेरी जटिल और हमारी अपनी जमीन से जुडी है.
- 0:37–0:43बिलकुल. और ये हमारी अपनी मदलब भिहार के मुकामा गाड की अटिहासिक लोक कता है,
- 0:44–0:47चोहर्ट मन आरेश्मा, जिसे गजजिंदर ताकुर ने संकलित किया है.
- 0:47–0:51अज ख़ादा बवाग़ा बवाग़ा दीवारों को भी दहा देती है।
- 0:52–0:56अर मैं यहा इसके विप्रीट ये तरक प्रस्तुट कर रहा हूँ,
- 0:57–1:00कि इस कहानी को आमर प्रेम की जीड कहना,
- 1:00–1:03लोकिक शक्ति और विक्तिगत इच्छा शक्ति का उट्सव है,
- 1:03–1:08जो अन्ततद समाज की सब से मस्वुत दिवारों को भी दहा देती है.
- 1:08–1:13और मैं यहां इसके विप्रीत ये तरक प्रस्थ॥ कर रहा हूँ,
- 1:13–1:16कि इस कहानी को आमर प्रेम की जीथ कहना,
- 1:16–1:21मतलब उस व्यवस्तागत उत्पीडन और भ्यानक हिन्सागो कमतर आकना है
- 1:21–1:23जो इस कता के पन्ने पन्ने पर भिख्री है
- 1:23–1:28मैंसे कठोर जातिया और वरगिय पदानुक्रम की क्रूर वास्त विक्ता मानता हूँ
- 1:28–1:33तो चलिये बिना देर की ये सीथा अपनी अपनी स्थितिया स्पष्ट करते हैं
- 1:33–1:40मैं रेश्मा और चोऍ मलके उस असादार विक्तिगत साहस से शरवाथ करना चाूंगी
- 1:40–1:43देके रेश्मा कोई बेबस लगकी नहीं ती
- 1:43–1:46उसके पास दन, डलत, दास-दासया सब कुई था
- 1:46–2:16अग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उ�
- 2:16–2:19इच्छा शक्तिके एक महान विज़े है.
- 2:20–2:24मुझे लकता है कि हम यहां यठार्त को तोडा नदाज गर रहे हैं.
- 2:25–2:27ज़रा चोफडमल के शुबडो पर गोर कीजे.
- 2:28–2:30वो रेशमा से कहता है ये बात बाते नहीं थिक.
- 2:31–2:33मतलब ये रास्ता ये रास्ता नहीं है.
- 2:33–2:35अज़े खदरे का अंदाजा था?
- 2:35–2:37शर्फ खदरे का नहीं
- 2:37–2:39इस से पहले कि हम आगे बड़े
- 2:39–2:41हमें ये सवजना होगा कि उस दोर में
- 2:41–2:43चोहर मल के भोवी हार
- 2:43–2:45यान दूसाध समुडाये का होने का
- 2:45–2:47मतलब क्या था
- 2:47–2:49ये बात महेंज आमीर और गरीप की नहीं ती
- 2:49–2:54बोविहार वो वंचित वर्ग था, जो पूरी तरहा से जमीन से ज़ा था.
- 2:54–2:57यो दिन राद दूसरो के खेटो में ख़ता था.
- 2:57–3:02उनका पूरा जीवन मतलब उनका पेट उनही जमीन दारो की देया पनिरभर था,
- 3:02–3:04जिनकी सत्ता को वे चिनोती दे रहे थे.
- 3:04–3:07चोफर्मल इस समाजिक यदार्त को जानता था
- 3:07–3:12लेकिन एक मिनेट ख्या ये तत्फ्यो उनके साहस को और भी बडा नहीं बनादेता
- 3:12–3:16ये जानते वे भी की विवस्ता कितनी ताकत्वर है
- 3:16–3:18उनो ने कदम पीचे ने खीचे
- 3:18–3:21दिकिन साहस अपनी जगे है
- 3:21–3:22लेकिन
- 3:22–3:24अपने सहेली राम सकी की युखती
- 3:24–3:26और जादू की मददथ से
- 3:26–3:28वो पहरा तोड़कर बाहर निकलती है
- 3:28–3:30उसने अपने किस्मत कुद लिक्की
- 3:30–3:31जादू
- 3:31–3:33मुडे यही आपती है
- 3:33–3:36राम सकी का जादू कोई वेवस्थागत बडलाव नहीं था
- 3:36–3:37मतलग
- 3:37–3:41तोड़कर बाहर निकलति है, उसने अपने किस्मत कुध लिक्कि.
- 3:41–3:43जादू, मुडे यही आपति है.
- 3:43–3:46राम सकी का जादू कोई वेवस्थागत बदलाव नहीं ता.
- 3:46–3:47मतला?
- 3:47–3:50मतला वो केवल एक राथ की, चंद पलों की महलत थी.
- 3:50–3:55कहानी में जादू या चमतकार का सहरा लेना ही इस बात को सावित करता है,
- 3:55–4:00कि यतार्थ की दूनिया में उस समाज में उनके लिए कोई जगा बची ही नहीं फीग.
- 4:00–4:04अस्लियत तो तब सामने आती है, जब आजैसिंग को सब पता चलता है.
- 4:04–4:10वु क्या करता है? वु सीदे हद्यारों रामजीत और मन्नेखांको किराई पर लेता है
- 4:10–4:16और फिर पूरे दूद बन्सी तोल यानी चोबडमल की बस्ती पर हद्यारों से लैस होकर हमला कर दिया जाता है
- 4:16–4:21ये है संस्ताखत ताकत ये दरषाता है कि सत्ता कैसे काम करती है
- 4:21–4:26दूद बन्सी तोल पर हुए उस हमले वाले दूश्वे को ही लेते हैं
- 4:26–4:31जब आजेसिं की फोज बस्ती पर हमला करने आती है, तब क्या होता है?
- 4:31–4:33रेश्मा बखती नहीं है?
- 4:33–4:39वो खुथ सामने आखर पूरी तोल पर हो रहे है उस हिंसक हमले को रोक देती है.
- 4:39–4:44उसका यहे कहना कि निर्दोषका रक्त बहने से पहले मेरा भहेगा
- 4:44–4:47ये केवल एक बावुक समवाद नहीं है
- 4:47–4:51मैं कहरी हूं कि उसने उस दन अपने पिता और भाई के एहंकार को
- 4:51–4:56पुरी समाजिक सत्ता को अपने सामने जुकने पर मजबोर कर दिया
- 4:56–4:58अज़ा अज़ा बदनामी से बचने के लिए उस पल रुग गया?
- 4:58–5:02लेकिन क्या उस समाज ने उस पता ने उनके प्रेम को सुभिकार किया?
- 5:02–5:04उस समें तो नहीं?
- 5:04–5:07बिल्गल नहीं उनो अग़े सर्फ अपनी रननीती बडली
- 5:07–5:10विता या बहाई अपनी बेटी की जिद के सामने,
- 5:10–5:13उस चनिक बदनामी से बचने के लिए उस पल रुग गया.
- 5:14–5:18लेकिन क्या उस समाज ने, उस सत्ता ने उनके प्रेम को सुविकार किया?
- 5:18–5:20वुश्सम है तो नहीं?
- 5:20–5:21बिल्कुल नहीं.
- 5:21–5:23उन्होंने सर्व अपनी रन्नीती बडली
- 5:23–5:27जैसे ही वे दोनो समाज के नियमो को अप्चारी क्रुब से तोरने जाते है
- 5:27–5:30मेरे मतलव है जब वे काली मन्दिर में विवाग करने जाते है
- 5:30–5:36तो वेवस्ता की आस्ली खूंखार ताकत उन्पर पूरी क्रूर्ता के साथ तूट परती है.
- 5:36–5:39जब आप खते हैं कि उन्होने नियम तोडे,
- 5:39–5:42तो हमें ये भी देखना होगा कि वे नियम कैसे तूटे.
- 5:42–5:45आप आप उस द्रष्षे पर चलते हैं,
- 5:45–5:50जो इस पूरी गाता का सबसे शक्तिषाली सबसे गेरा प्रतीख है.
- 5:50–5:52आप रक्त संदूर की बात कर रहे है?
- 5:52–5:54आप, रक्त का संदूर.
- 5:54–5:57काली मंदिर में जब उनके पास संदूर नहीं होता,
- 5:57–6:02तो चोडमल अपनी देहिसे रक्त निकाल कर रेश्मा की मांग बहरता है.
- 6:02–6:08समाज ने उने संदूर के दिब्भी नहीं दी, तो चोडेमल ने अपने जीवन रस को ही संदूर बना दिया.
- 6:08–6:15मैं यह तरक रही हूं कि यह स्थापिद दार्मिक करमकान्डो कि खिलाद एक वैचारिक और अद्धियात्मिक विद्रो हो था.
- 6:15–6:22यह साभित करता है कि उनका प्रेम दुन्यावी बन्धनो और उसके बनाय न्यमों से कही उपर उच्छुका था.
- 6:22–6:27ज़रा रूकिये, क्या हम एस खुनी सिंदूर को कुथ जाड़ही रूमानी नहीं बनारे?
- 6:27–6:29रूमानी ये तो पूनसमर पने.
- 6:29–6:41नहीं, साहिते और समाज्शास्त्र के नजर्ये से देखें, तो रक्त को सिंदूर बनाना कोई आद्धियात्मिक उचाई नहीं है. ये एक बहुत ही ब्यावा पूर्वबहास है, एक दाक फूर्शाटूइं.
- 6:41–6:43ब्यावा कैसे?
- 6:43–7:00ये बहावा इसलिये है क्योंकी ये इस बात का क्रूर प्रतिक है कि इस तराके पदानुक्रम वाले समाज में दो अलग अलग जातियों विषेशकर एक उच्वर गे कन्या और एक वनचित वर के पुरुष का मिलन केवल तभी समव है जब उसकी कीमत कुन से चुकाए जाए.
- 7:00–7:04अगर बवाउईता का रक्त संदूर अबी सुखा भी नहीं ता कि उसका सुहाग।
- 7:04–7:09ये प्रेम की अमरता का दिश्ष कम और इक हिन्सक अंद की प्रस्टावना जादा है
- 7:09–7:11या एक बहयाना क्त्राज़ी है
- 7:11–7:13मैं ये नी केरी कि ये त्राज़ी नहीं है
- 7:13–7:14भिल्कुल है
- 7:14–7:16अप अखाड़े वाले यूध्द की बात कर रही हैं।
- 7:16–7:19अदर सन्दूर अभी सुखा भी नहीं ता कि उसका सुहाग।।
- 7:19–7:22उज़ड़ग आप ये प्रेम की आमरता का दिश्ष खम
- 7:22–7:25और एक हिंसक अंद की प्रस्तावना ज्यादा है
- 7:25–7:27या एक ब्याना ट्राजटी है
- 7:27–7:29मैं ये नी कैरी की ये ट्रास्दी नहीं है
- 7:29–7:30बिलकुल है
- 7:30–7:36लेकिन देखे त्रास्ती के भीतर भी तो एक नायकत्व होता है, एक हीरोइзम होता है,
- 7:36–7:40और चोहर्मल का अंत उस नायकत्व का चरम है.
- 7:40–7:42आप अखाडे वाले युध्ध की बात कर रही है?
- 7:42–7:47आप, उआख्राहा का शेर था, गाँँके अखाडे का सबसे बडा पहल्वान.
- 7:47–7:50जब आजर सिंकी फोज मंदर तक पहुट जाती है,
- 7:50–7:53तो चोफर मल पीट दिखाकर भाखता नहीं?
- 7:53–7:56उसब से बहले रेश्मा की सुरक्षा सूनिष्छित करता है.
- 7:56–7:59उसे महुए के एक पेड पर सूरक्षित बधाता है.
- 7:59–8:03अर फिर वो अकेला केवल अपनी दाल और तलवार के साथ
- 8:03–8:06हत्यारों से लेस पूरी फोच का सामना करता है
- 8:06–8:09गाता बताती है कि वो इतनी बहादुरी से लडा
- 8:09–8:11के हम लावरों के पैर उख़ने लगे थे
- 8:11–8:13बहादुरी से लड़ना एक बात है
- 8:13–8:15लेके न नतीजा क्या हूँ?
- 8:29–8:59तो तो बगा नदाज़ा तो बगादा परवाज़ा तो तो बगादा तो बगादा तो बगादा तो बगादा तो बगादा तो बगादा तो बगादा तो बगादा तो बगादा तो बगादा तो बगादा तो बगादा तो बगादा तो बगादा तो बगादा तो बगादा �
- 8:59–9:01रिश्मा रिश्मा
- 9:01–9:07मैं बाँ दीवों की योड्दा का एक प्रेमी का अपने प्रेम के लिया गया सरवोच बलीदान है
- 9:07–9:08बलीदान?
- 9:08–9:15दिखे, हमें चोहर मल की मिद्ठ्वों को बलीदान का नाम देकर उस शोषक विवस्ता को बरी नहीं करना चाहीए
- 9:15–9:17वो व्यवस्ता का शिकार हूँआ ता
- 9:17–9:18व्यवस्ता का शिकार हूँआ ता
- 9:18–9:19व्यवस्ता का शिकार हूँआ ता
- 9:19–9:20व्यवस्ता का शिकार हूँआ ता
- 9:20–9:21व्यवस्ता का शिकार हूँआ ता
- 9:21–9:22व्यवस्ता का शिकार हूँआ ता
- 9:22–9:23व्यवस्ता का शिकार हूँआ ता
- 9:23–9:35अगराना क्या दिखाता है? ये दिखाता है कि एक उच्छ वर्ग के लिए निमन वर्ग के वेक्ति का जीवन महेंज एक सवदा था, एक चोटी सी कीमद थी जिसे चुकाकर वे अपनी तथाखधित इजध बजाजते थे थे.
- 9:35–9:37रवदमल की हत्या पर खट्म नहीं होती
- 9:37–9:41मेरे लिए इस कहानी का सबसे ब्यानक और परेशान करने वाला हिस्चा
- 9:41–9:43चफ़डमल की मुरुट्यो भी नहीं है
- 9:43–9:45अच्छा तो फिर क्या है
- 9:45–9:48सबसे ब्यानक हिस्चा है रेश्मा का अन्त
- 9:48–9:51जब कलूवा सबाही उसे लेजाता है
- 10:05–10:35अग, तो तो बज़ादी बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद ब
- 10:35–10:39जब कोई महीला उन स्थापित नेमो के किलाफ इतना बड़ा विद्रोह करती है
- 10:39–10:41तो उसे सर्याम सजाजा क्यो नहीं दीजाती?
- 10:41–10:43आँ... क्यो नहीं दीजाती?
- 10:43–10:46क्यो की अगर अजे सिंग अपनी बहन को सर्याम सजाजा देता
- 10:46–10:50तो शावद वो समाज की दुसरी अड़ो के लिक मिसाल बन जाती
- 10:50–10:51एक शहीद बन जाती
- 10:51–10:52इसके बजाए
- 10:52–10:54वेवस्ता उसे इतिहाज से
- 10:54–10:57लोग कप्रे से ही पुरी तरा इरेस कर देती है
- 10:57–10:58अफ ये
- 10:58–11:01ये वाकखे ये बहुत बारी विचार है
- 11:01–11:06अप ख़ब कर देना एक सोची समजी रणनी ती है?
- 11:06–11:09बलकल, ये एक मनूविग्यानेक हत्यार है,
- 11:09–11:13ये चुप्प्पी समाज की बाखी और्थो की दिमाग में खफ पैडा करती है,
- 11:13–11:17कि अगर तुम ने बगावद की, तुमझारा नाम लेवागी कोई नहीं बचेगा,
- 11:17–11:20तुम्हारा स्तित्वही यस्तरा मिता दिया जाएगा जैसे तुम कभी थी ही नहीं
- 11:21–11:23ये चुप्पी समाज कि उस्ताकत का सबूथ है
- 11:23–11:26तुव विद्रोही महिलाव को बिना दकार लिये निगल जाती है
- 11:26–11:29मैं आप की यस व्याख्या की गेराई को समझ रही हूं
- 11:29–11:37ये सच्छ मे रोंक्ते कडे कर देने वाला सच्छ है, कि इसी की कहानी को मिता देना भी सट्टा का एक हत्यार है.
- 11:37–11:43लेकिन फिर भी क्या व्यवस्ता सच्छ मे उने पुरी तरा मिता पाए? ये मेरा सब से बडा सवाल है.
- 11:43–11:51अगर सत्ता इतनी ही ताकत्वर थी, तो आज मुकामा ताल मे रेश्मा और चोरहर मलका वो साजा मन्दिर क्यों कडा है.
- 11:51–11:53हम इस तत्ठे को कैसे जुटला सकते है.
- 11:53–11:57मन्दर का होना इस बात का सबूत नहीं है कि समाज बडल गया है.
- 11:57–12:04आज उसी प्रेम ने मुर्त्तिऊ के बाद हैं रहाजारों लोगों को एक ही मेले में जोर दिया हैं.
- 12:04–12:10लेकिन वहाँ उसी दूदबन्सी तोल के लोग और वही भूमिहार एक साथ जुटते हैं,
- 12:10–12:15एक ही मेले में शामिल होते हैं और एक ही मंदर के अगे शीष नवाते हैं.
- 12:15–12:45अगर बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद �
- 12:45–12:49जिस समाज ने एक निर्दोश वक्तिकी हद्या करने के लिए तल्वारे निकालनी
- 12:49–12:53और एक विद्रोही महिला को खामोशी के उस भयानक अंदेरे में दھकेल दिया
- 12:54–12:57मिरिट्य। के बाद उनका महीमा मन्दन करना क्या है
- 12:57–12:59ये कोई हिर्देपरिवर्तन नहीं है
- 12:59–13:05ये समाज के अप्राद वोद, यान उनके गिल्ट को दखने का एक बहुत ही चालाक तरीका है.
- 13:05–13:10गिल्ट को दखने का तरीका? आप इतने बड़े लोक विष्वास को स्वर्फ पाकहन्द कैरें?
- 13:10–13:12ये पाकहन्डी तो है?
- 13:12–13:16जब समाज किषी को अईन्सान के रूप में जीने का अदिकार नहीं देपाता,
- 13:16–13:19जब विवस्ता अपने ही हातो खुन से रंग लेती है,
- 13:19–13:22तो वो उस अप्राथ से नजरे मिलाने से दरती है.
- 13:22–13:24आजे में समाज क्या करता है?
- 13:24–13:25क्या करता है?
- 13:25–13:27वो उस्वक्ती को देवता बना देता है.
- 13:27–13:29ये एक संस्तागत प्रैश्चित है.
- 13:29–13:31बभग्वान बना देने का मतलब है,
- 13:31–13:35कि अब आप को उनके साथ किये एक अन्न्याय पर मापी नहीं भागनी पड़ेगी.
- 13:35–13:37वे दोनो जीते जी अन्सान बनकर,
- 13:37–13:40एक सादरन पतिपत्नी बनकर प्रेम करना चाहते थे
- 13:40–13:44लेकिन समाज ने उने मारकर पत्तर के मुर्ती बना दिया
- 13:44–13:47मोकामा का ये मेला प्रेम की जीद का समारक नहीं है
- 13:47–13:51बलकि ये हमारे समाज की सबसे बडी असपलता का समारक है
- 13:51–13:54ज़हन नयाय और समानता किवल मरिट्व के बाद ही मिल सकती है
- 13:54–13:55या...
- 13:56–13:57ये...
- 13:57–14:00ये नजार्या दिमाग को जगजोड देता है
- 14:00–14:01ये विचार की...
- 14:02–14:04किसी को बभागान बना देना
- 14:04–14:06दरसल अपनी गल्ती न माननेगा
- 14:06–14:08या मापी मागने से बचने का एक तरीका है
- 14:08–14:13मैं मानती हों की मிत्तियों के बात का कोई भी सम्मान
- 14:13–14:17जीते जी हुए उस भ्यानक अन्याय के बरपाइ नहीं कर सकता.
- 14:17–14:21लेकिन फिर भी हमें सिक्के का दुस्रा पहलु भी देखना होगा.
- 14:21–14:25क्या हम उस मंदर को महेज एक अप्राद बोद का प्रतीक मान के
- 14:25–14:28उन अदारो लोगों की आस्था को खारिज कर सकते है?
- 14:28–14:30मैं लोगों की आस्था पर सवाल नहीं उठारा हूँ।
- 14:30–14:33मेरा सवाल उस विमर्ष पर है,
- 14:33–14:35जो हम इस कहानी के इडदगिड रचते है।
- 14:35–14:37लेकिन जो लोग आज वहां जारे है,
- 14:37–14:41वे वहां किसी की हत्या का जश्मनाने नहीं जाते
- 14:41–14:48वे वहां उस अदम्या प्रेम, उस त्याग और उस अज़ सादारन साहस को नमन करने जाते है
- 14:48–14:51वे रेश्मा और चोहर्मल को अपना आदर्ष मानते है
- 14:51–14:55लोग कताए केवल अछीत का दस्तावेज नहीं होती
- 14:55–14:59विब हविश्चे के लिए एक नैटिक दिशा भी तैक रगती हैं
- 14:59–15:02रेश्मा और चोहर्मल ने भले ही अपने प्राण गवाएं
- 15:02–15:05लेकिन उनोने आने बाली पीड्यां के लिए
- 15:05–15:08उस जातिवादी दिवार में वो दरार हमेश्चा के लिए चोड़ दी
- 15:08–15:13आजके यूँआ जब उस कहानी को सुनते हैं तु वे एक प्रेर्ना लेते हैं
- 15:13–15:14दरार ज़र पडी हैं
- 15:14–15:18और मैं लोग कत्ठाऊ के इस महत्पो को खारिज भी नहीं कर रहूं
- 15:18–15:21लेकिन मेरा जोर इस बात पर है, कि हमें इस कहानी को
- 15:21–15:25केवल एक रोमानी चष्मे से देखने से बचना चाहीगे.
- 15:25–15:26अच्छा.
- 15:26–15:30जब हम इसे महेंज एक आमर प्रेम कठा कहेखर खुश हो जाते हैं,
- 15:30–15:33तो हम अज्जाने में उस भयानक हिंसा को सामान ने बना देते हैं,
- 15:34–15:36जो सथ्थावर जाती के गद्जोड से पयदा होती है.
- 15:36–15:40अब आप इस चिन्ता से पूरी तरा सहमत हूँ,
- 15:40–15:44ये बहुत ज़ूरी है की रूमानी कहानियो की आड मे,
- 15:44–15:48अम समाजिक हिंसा को समान निन ना बनाए,
- 15:48–15:52सद्ता के प्रज्वाँट बाद्बाद, अप प्रज्वाँट बाद,
- 15:52–16:22अद्याई नहीं तो बज़ाई नहीं तो बज़ाई नहीं तो बज़ाई नहीं तो बज़ाई नहीं तो बज़ाई नहीं तो बज़ाई नहीं तो बज़ाई नहीं तो बज़ाई नहीं तो बज़ाई नहीं तो बज़ाई नहीं तो बज़ाई नहीं तो बज़ाई नहीं तो ब
- 16:22–16:24बिज़ोर दास्तान है.
- 16:24–16:27बिलकुल इस बात पर कोई दोर आय नहीं हो सकती.
- 16:27–16:29उन दोनोने अपने अपने तरीके से
- 16:29–16:32एक आसी खुर, आमानवी ये और ताकतवर विवस्ता को
- 16:32–16:35सीदे चुनाती दी जिसे तकराने की हमत
- 16:35–16:38उस दोर में किसी और में नहीं ती.
- 16:38–17:08चोब बविजार उबवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवाग
- 17:08–17:38अगर उदम बावना वेशाज़ा पर बवेद बवेद बवेद बवेद बवेद बवेद बवेद बवेद बवेद बवेद बवेद बवेद बवेद बवेद बवेद बवेद बवेद बवेद बवेद बवेद बवेद बवेद बवेद बवेद बवेद बवेद बवेद ब�
- 17:38–17:40अदर बारो को लांग जाती है.
- 17:40–17:42मुकामा कब उ मेला और उ मंदर
- 17:42–17:44मेरे लिये उस सामाजिक परवडदन का
- 17:44–17:48और प्रेम की अंतिम विजै का एक वास्तविक प्रतीक है.
- 17:48–17:50और मेरी नजर में,
- 17:50–17:52ये कहानी कठोर सामाजिक पदानुक्रमो
- 17:52–17:55अर सत्ता के दुरुप्योग के खिलाग एक गंबिर चेतावनी है
- 17:55–18:01ये हमें दिखाती है, कि कैसे यदार्ध्वादी क्रूर्टा किसी भी रोमानी कल्पना को नष्ट कर देती है
- 18:01–18:05वो मेला, वो मंदिर, उस हिंसक अतीट पर डाला गया एक रोमानी परदा है
- 18:05–18:08तो समाज को यह बहुलने की सहुलिएत देता है,
- 18:08–18:11कि हमने जीते जी उन दो अन सानो के सात क्या किया था?
- 18:11–18:15हम इस भहेस का कोई एक विजेता गोषित नहीं करेंगे.
- 18:15–18:18इस निषकरष को हम अपने श्रोतावो पर चोरते हैं.
- 18:18–18:26इस श्रोथ सामगरी में इतिहास, समाज्शास्त्र, मनोविग्यान अर प्रेम की इतनी गेरी परते चिपी है,
- 18:26–18:31कि हर कोई इसे अपने नजजरीये से देख सकता है और कुछ नया सीख सकता है.
- 18:31–18:37लिकिन जाने से पहले श्रोथ सामगरी के अंप में दीगे एक बहुत फुबसुरत,
- 18:37–18:40लिकिन रहे स्यमए भात का जिक्र करना जाँगी.
- 18:40–18:46मुकामा के बुजुर कहते हैं कि आज भी जब शाम को गंगा की तरव से हवाच चलती है,
- 18:46–18:52तु ताल का वो महुवे का पेड, जिस पे चोफर्ड मलने रेश्मा को बट़ठाया था, वो अपने आब डोलने पटाया.
- 18:53–18:56आप, जैसे कोई आज भी वो उस पेड की डालियों पर चबा बटाया हो,
- 18:56–18:59और कोई नीचे जमीन पर अपनी तल्वार लिए उसका पहरा दे रहो.
- 19:16–19:22इसका उत्तर, शायद हमे कुध अपने भीतर और अपने समाज के आईने में कुजना होगा.
- 19:22–19:25दर दिबेट में हमारे साज जुडने के लिए द्श्वाद,
- 19:25–19:30अगली बार फिर मिलेंगे एक ने विचार एक ने विमर्ष के साथ.
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अगर मैं आप से कहुँ के आमर प्रेम का जश्न मनाने किलिए बनाया गया एक बहव्व्य मन्द्ध्र, आसल में अग पुरे समाज के सामूही कप्राद बोद, यानी उनके गिल्ट का समारक है, तो आप ख्या कहेंगे. विमर्ष और विवद द्रिष्टिकोन के हमारे मनज देबेट मे आपका स्वादध है. आज हम जिस स्रोथ सामगरी पर बात कर रहे है, उसे सुनकर शाइत बहुत से लोगों के दिमाग मित तुरनत रोमयो और जूल्येट की चवी बन जाए. अगर देखे ये कहानी उसे कही ज़ादा गेरी जटिल और हमारी अपनी जमीन से जुडी है. बिलकुल. और ये हमारी अपनी मदलब भिहार के मुकामा गाड की अटिहासिक लोक कता है, चोहर्ट मन आरेश्मा, जिसे गजजिंदर ताकुर ने संकलित किया है. अज ख़ादा बवाग़ा बवाग़ा दीवारों को भी दहा देती है। अर मैं यहा इसके विप्रीट ये तरक प्रस्तुट कर रहा हूँ, कि इस कहानी को आमर प्रेम की जीड कहना, लोकिक शक्ति और विक्तिगत इच्छा शक्ति का उट्सव है, जो अन्ततद समाज की सब से मस्वुत दिवारों को भी दहा देती है. और मैं यहां इसके विप्रीत ये तरक प्रस्थ॥ कर रहा हूँ, कि इस कहानी को आमर प्रेम की जीथ कहना, मतलब उस व्यवस्तागत उत्पीडन और भ्यानक हिन्सागो कमतर आकना है जो इस कता के पन्ने पन्ने पर भिख्री है मैंसे कठोर जातिया और वरगिय पदानुक्रम की क्रूर वास्त विक्ता मानता हूँ तो चलिये बिना देर की ये सीथा अपनी अपनी स्थितिया स्पष्ट करते हैं मैं रेश्मा और चोऍ मलके उस असादार विक्तिगत साहस से शरवाथ करना चाूंगी देके रेश्मा कोई बेबस लगकी नहीं ती उसके पास दन, डलत, दास-दासया सब कुई था अग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उग, उ� इच्छा शक्तिके एक महान विज़े है. मुझे लकता है कि हम यहां यठार्त को तोडा नदाज गर रहे हैं. ज़रा चोफडमल के शुबडो पर गोर कीजे. वो रेशमा से कहता है ये बात बाते नहीं थिक. मतलब ये रास्ता ये रास्ता नहीं है. अज़े खदरे का अंदाजा था? शर्फ खदरे का नहीं इस से पहले कि हम आगे बड़े हमें ये सवजना होगा कि उस दोर में चोहर मल के भोवी हार यान दूसाध समुडाये का होने का मतलब क्या था ये बात महेंज आमीर और गरीप की नहीं ती बोविहार वो वंचित वर्ग था, जो पूरी तरहा से जमीन से ज़ा था. यो दिन राद दूसरो के खेटो में ख़ता था. उनका पूरा जीवन मतलब उनका पेट उनही जमीन दारो की देया पनिरभर था, जिनकी सत्ता को वे चिनोती दे रहे थे. चोफर्मल इस समाजिक यदार्त को जानता था लेकिन एक मिनेट ख्या ये तत्फ्यो उनके साहस को और भी बडा नहीं बनादेता ये जानते वे भी की विवस्ता कितनी ताकत्वर है उनो ने कदम पीचे ने खीचे दिकिन साहस अपनी जगे है लेकिन अपने सहेली राम सकी की युखती और जादू की मददथ से वो पहरा तोड़कर बाहर निकलती है उसने अपने किस्मत कुद लिक्की जादू मुडे यही आपती है राम सकी का जादू कोई वेवस्थागत बडलाव नहीं था मतलग तोड़कर बाहर निकलति है, उसने अपने किस्मत कुध लिक्कि. जादू, मुडे यही आपति है. राम सकी का जादू कोई वेवस्थागत बदलाव नहीं ता. मतला? मतला वो केवल एक राथ की, चंद पलों की महलत थी. कहानी में जादू या चमतकार का सहरा लेना ही इस बात को सावित करता है, कि यतार्थ की दूनिया में उस समाज में उनके लिए कोई जगा बची ही नहीं फीग. अस्लियत तो तब सामने आती है, जब आजैसिंग को सब पता चलता है. वु क्या करता है? वु सीदे हद्यारों रामजीत और मन्नेखांको किराई पर लेता है और फिर पूरे दूद बन्सी तोल यानी चोबडमल की बस्ती पर हद्यारों से लैस होकर हमला कर दिया जाता है ये है संस्ताखत ताकत ये दरषाता है कि सत्ता कैसे काम करती है दूद बन्सी तोल पर हुए उस हमले वाले दूश्वे को ही लेते हैं जब आजेसिं की फोज बस्ती पर हमला करने आती है, तब क्या होता है? रेश्मा बखती नहीं है? वो खुथ सामने आखर पूरी तोल पर हो रहे है उस हिंसक हमले को रोक देती है. उसका यहे कहना कि निर्दोषका रक्त बहने से पहले मेरा भहेगा ये केवल एक बावुक समवाद नहीं है मैं कहरी हूं कि उसने उस दन अपने पिता और भाई के एहंकार को पुरी समाजिक सत्ता को अपने सामने जुकने पर मजबोर कर दिया अज़ा अज़ा बदनामी से बचने के लिए उस पल रुग गया? लेकिन क्या उस समाज ने उस पता ने उनके प्रेम को सुभिकार किया? उस समें तो नहीं? बिल्गल नहीं उनो अग़े सर्फ अपनी रननीती बडली विता या बहाई अपनी बेटी की जिद के सामने, उस चनिक बदनामी से बचने के लिए उस पल रुग गया. लेकिन क्या उस समाज ने, उस सत्ता ने उनके प्रेम को सुविकार किया? वुश्सम है तो नहीं? बिल्कुल नहीं. उन्होंने सर्व अपनी रन्नीती बडली जैसे ही वे दोनो समाज के नियमो को अप्चारी क्रुब से तोरने जाते है मेरे मतलव है जब वे काली मन्दिर में विवाग करने जाते है तो वेवस्ता की आस्ली खूंखार ताकत उन्पर पूरी क्रूर्ता के साथ तूट परती है. जब आप खते हैं कि उन्होने नियम तोडे, तो हमें ये भी देखना होगा कि वे नियम कैसे तूटे. आप आप उस द्रष्षे पर चलते हैं, जो इस पूरी गाता का सबसे शक्तिषाली सबसे गेरा प्रतीख है. आप रक्त संदूर की बात कर रहे है? आप, रक्त का संदूर. काली मंदिर में जब उनके पास संदूर नहीं होता, तो चोडमल अपनी देहिसे रक्त निकाल कर रेश्मा की मांग बहरता है. समाज ने उने संदूर के दिब्भी नहीं दी, तो चोडेमल ने अपने जीवन रस को ही संदूर बना दिया. मैं यह तरक रही हूं कि यह स्थापिद दार्मिक करमकान्डो कि खिलाद एक वैचारिक और अद्धियात्मिक विद्रो हो था. यह साभित करता है कि उनका प्रेम दुन्यावी बन्धनो और उसके बनाय न्यमों से कही उपर उच्छुका था. ज़रा रूकिये, क्या हम एस खुनी सिंदूर को कुथ जाड़ही रूमानी नहीं बनारे? रूमानी ये तो पूनसमर पने. नहीं, साहिते और समाज्शास्त्र के नजर्ये से देखें, तो रक्त को सिंदूर बनाना कोई आद्धियात्मिक उचाई नहीं है. ये एक बहुत ही ब्यावा पूर्वबहास है, एक दाक फूर्शाटूइं. ब्यावा कैसे? ये बहावा इसलिये है क्योंकी ये इस बात का क्रूर प्रतिक है कि इस तराके पदानुक्रम वाले समाज में दो अलग अलग जातियों विषेशकर एक उच्वर गे कन्या और एक वनचित वर के पुरुष का मिलन केवल तभी समव है जब उसकी कीमत कुन से चुकाए जाए. अगर बवाउईता का रक्त संदूर अबी सुखा भी नहीं ता कि उसका सुहाग। ये प्रेम की अमरता का दिश्ष कम और इक हिन्सक अंद की प्रस्टावना जादा है या एक बहयाना क्त्राज़ी है मैं ये नी केरी कि ये त्राज़ी नहीं है भिल्कुल है अप अखाड़े वाले यूध्द की बात कर रही हैं। अदर सन्दूर अभी सुखा भी नहीं ता कि उसका सुहाग।। उज़ड़ग आप ये प्रेम की आमरता का दिश्ष खम और एक हिंसक अंद की प्रस्तावना ज्यादा है या एक ब्याना ट्राजटी है मैं ये नी कैरी की ये ट्रास्दी नहीं है बिलकुल है लेकिन देखे त्रास्ती के भीतर भी तो एक नायकत्व होता है, एक हीरोइзम होता है, और चोहर्मल का अंत उस नायकत्व का चरम है. आप अखाडे वाले युध्ध की बात कर रही है? आप, उआख्राहा का शेर था, गाँँके अखाडे का सबसे बडा पहल्वान. जब आजर सिंकी फोज मंदर तक पहुट जाती है, तो चोफर मल पीट दिखाकर भाखता नहीं? उसब से बहले रेश्मा की सुरक्षा सूनिष्छित करता है. उसे महुए के एक पेड पर सूरक्षित बधाता है. अर फिर वो अकेला केवल अपनी दाल और तलवार के साथ हत्यारों से लेस पूरी फोच का सामना करता है गाता बताती है कि वो इतनी बहादुरी से लडा के हम लावरों के पैर उख़ने लगे थे बहादुरी से लड़ना एक बात है लेके न नतीजा क्या हूँ? तो तो बगा नदाज़ा तो बगादा परवाज़ा तो तो बगादा तो बगादा तो बगादा तो बगादा तो बगादा तो बगादा तो बगादा तो बगादा तो बगादा तो बगादा तो बगादा तो बगादा तो बगादा तो बगादा तो बगादा तो बगादा � रिश्मा रिश्मा मैं बाँ दीवों की योड्दा का एक प्रेमी का अपने प्रेम के लिया गया सरवोच बलीदान है बलीदान? दिखे, हमें चोहर मल की मिद्ठ्वों को बलीदान का नाम देकर उस शोषक विवस्ता को बरी नहीं करना चाहीए वो व्यवस्ता का शिकार हूँआ ता व्यवस्ता का शिकार हूँआ ता व्यवस्ता का शिकार हूँआ ता व्यवस्ता का शिकार हूँआ ता व्यवस्ता का शिकार हूँआ ता व्यवस्ता का शिकार हूँआ ता व्यवस्ता का शिकार हूँआ ता अगराना क्या दिखाता है? ये दिखाता है कि एक उच्छ वर्ग के लिए निमन वर्ग के वेक्ति का जीवन महेंज एक सवदा था, एक चोटी सी कीमद थी जिसे चुकाकर वे अपनी तथाखधित इजध बजाजते थे थे. रवदमल की हत्या पर खट्म नहीं होती मेरे लिए इस कहानी का सबसे ब्यानक और परेशान करने वाला हिस्चा चफ़डमल की मुरुट्यो भी नहीं है अच्छा तो फिर क्या है सबसे ब्यानक हिस्चा है रेश्मा का अन्त जब कलूवा सबाही उसे लेजाता है अग, तो तो बज़ादी बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद ब जब कोई महीला उन स्थापित नेमो के किलाफ इतना बड़ा विद्रोह करती है तो उसे सर्याम सजाजा क्यो नहीं दीजाती? आँ... क्यो नहीं दीजाती? क्यो की अगर अजे सिंग अपनी बहन को सर्याम सजाजा देता तो शावद वो समाज की दुसरी अड़ो के लिक मिसाल बन जाती एक शहीद बन जाती इसके बजाए वेवस्ता उसे इतिहाज से लोग कप्रे से ही पुरी तरा इरेस कर देती है अफ ये ये वाकखे ये बहुत बारी विचार है अप ख़ब कर देना एक सोची समजी रणनी ती है? बलकल, ये एक मनूविग्यानेक हत्यार है, ये चुप्प्पी समाज की बाखी और्थो की दिमाग में खफ पैडा करती है, कि अगर तुम ने बगावद की, तुमझारा नाम लेवागी कोई नहीं बचेगा, तुम्हारा स्तित्वही यस्तरा मिता दिया जाएगा जैसे तुम कभी थी ही नहीं ये चुप्पी समाज कि उस्ताकत का सबूथ है तुव विद्रोही महिलाव को बिना दकार लिये निगल जाती है मैं आप की यस व्याख्या की गेराई को समझ रही हूं ये सच्छ मे रोंक्ते कडे कर देने वाला सच्छ है, कि इसी की कहानी को मिता देना भी सट्टा का एक हत्यार है. लेकिन फिर भी क्या व्यवस्ता सच्छ मे उने पुरी तरा मिता पाए? ये मेरा सब से बडा सवाल है. अगर सत्ता इतनी ही ताकत्वर थी, तो आज मुकामा ताल मे रेश्मा और चोरहर मलका वो साजा मन्दिर क्यों कडा है. हम इस तत्ठे को कैसे जुटला सकते है. मन्दर का होना इस बात का सबूत नहीं है कि समाज बडल गया है. आज उसी प्रेम ने मुर्त्तिऊ के बाद हैं रहाजारों लोगों को एक ही मेले में जोर दिया हैं. लेकिन वहाँ उसी दूदबन्सी तोल के लोग और वही भूमिहार एक साथ जुटते हैं, एक ही मेले में शामिल होते हैं और एक ही मंदर के अगे शीष नवाते हैं. अगर बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद बवाद � जिस समाज ने एक निर्दोश वक्तिकी हद्या करने के लिए तल्वारे निकालनी और एक विद्रोही महिला को खामोशी के उस भयानक अंदेरे में दھकेल दिया मिरिट्य। के बाद उनका महीमा मन्दन करना क्या है ये कोई हिर्देपरिवर्तन नहीं है ये समाज के अप्राद वोद, यान उनके गिल्ट को दखने का एक बहुत ही चालाक तरीका है. गिल्ट को दखने का तरीका? आप इतने बड़े लोक विष्वास को स्वर्फ पाकहन्द कैरें? ये पाकहन्डी तो है? जब समाज किषी को अईन्सान के रूप में जीने का अदिकार नहीं देपाता, जब विवस्ता अपने ही हातो खुन से रंग लेती है, तो वो उस अप्राथ से नजरे मिलाने से दरती है. आजे में समाज क्या करता है? क्या करता है? वो उस्वक्ती को देवता बना देता है. ये एक संस्तागत प्रैश्चित है. बभग्वान बना देने का मतलब है, कि अब आप को उनके साथ किये एक अन्न्याय पर मापी नहीं भागनी पड़ेगी. वे दोनो जीते जी अन्सान बनकर, एक सादरन पतिपत्नी बनकर प्रेम करना चाहते थे लेकिन समाज ने उने मारकर पत्तर के मुर्ती बना दिया मोकामा का ये मेला प्रेम की जीद का समारक नहीं है बलकि ये हमारे समाज की सबसे बडी असपलता का समारक है ज़हन नयाय और समानता किवल मरिट्व के बाद ही मिल सकती है या... ये... ये नजार्या दिमाग को जगजोड देता है ये विचार की... किसी को बभागान बना देना दरसल अपनी गल्ती न माननेगा या मापी मागने से बचने का एक तरीका है मैं मानती हों की मிत्तियों के बात का कोई भी सम्मान जीते जी हुए उस भ्यानक अन्याय के बरपाइ नहीं कर सकता. लेकिन फिर भी हमें सिक्के का दुस्रा पहलु भी देखना होगा. क्या हम उस मंदर को महेज एक अप्राद बोद का प्रतीक मान के उन अदारो लोगों की आस्था को खारिज कर सकते है? मैं लोगों की आस्था पर सवाल नहीं उठारा हूँ। मेरा सवाल उस विमर्ष पर है, जो हम इस कहानी के इडदगिड रचते है। लेकिन जो लोग आज वहां जारे है, वे वहां किसी की हत्या का जश्मनाने नहीं जाते वे वहां उस अदम्या प्रेम, उस त्याग और उस अज़ सादारन साहस को नमन करने जाते है वे रेश्मा और चोहर्मल को अपना आदर्ष मानते है लोग कताए केवल अछीत का दस्तावेज नहीं होती विब हविश्चे के लिए एक नैटिक दिशा भी तैक रगती हैं रेश्मा और चोहर्मल ने भले ही अपने प्राण गवाएं लेकिन उनोने आने बाली पीड्यां के लिए उस जातिवादी दिवार में वो दरार हमेश्चा के लिए चोड़ दी आजके यूँआ जब उस कहानी को सुनते हैं तु वे एक प्रेर्ना लेते हैं दरार ज़र पडी हैं और मैं लोग कत्ठाऊ के इस महत्पो को खारिज भी नहीं कर रहूं लेकिन मेरा जोर इस बात पर है, कि हमें इस कहानी को केवल एक रोमानी चष्मे से देखने से बचना चाहीगे. अच्छा. जब हम इसे महेंज एक आमर प्रेम कठा कहेखर खुश हो जाते हैं, तो हम अज्जाने में उस भयानक हिंसा को सामान ने बना देते हैं, जो सथ्थावर जाती के गद्जोड से पयदा होती है. अब आप इस चिन्ता से पूरी तरा सहमत हूँ, ये बहुत ज़ूरी है की रूमानी कहानियो की आड मे, अम समाजिक हिंसा को समान निन ना बनाए, सद्ता के प्रज्वाँट बाद्बाद, अप प्रज्वाँट बाद, अद्याई नहीं तो बज़ाई नहीं तो बज़ाई नहीं तो बज़ाई नहीं तो बज़ाई नहीं तो बज़ाई नहीं तो बज़ाई नहीं तो बज़ाई नहीं तो बज़ाई नहीं तो बज़ाई नहीं तो बज़ाई नहीं तो बज़ाई नहीं तो बज़ाई नहीं तो ब बिज़ोर दास्तान है. बिलकुल इस बात पर कोई दोर आय नहीं हो सकती. उन दोनोने अपने अपने तरीके से एक आसी खुर, आमानवी ये और ताकतवर विवस्ता को सीदे चुनाती दी जिसे तकराने की हमत उस दोर में किसी और में नहीं ती. चोब बविजार उबवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवागवाग अगर उदम बावना वेशाज़ा पर बवेद बवेद बवेद बवेद बवेद बवेद बवेद बवेद बवेद बवेद बवेद बवेद बवेद बवेद बवेद बवेद बवेद बवेद बवेद बवेद बवेद बवेद बवेद बवेद बवेद बवेद बवेद ब� अदर बारो को लांग जाती है. मुकामा कब उ मेला और उ मंदर मेरे लिये उस सामाजिक परवडदन का और प्रेम की अंतिम विजै का एक वास्तविक प्रतीक है. और मेरी नजर में, ये कहानी कठोर सामाजिक पदानुक्रमो अर सत्ता के दुरुप्योग के खिलाग एक गंबिर चेतावनी है ये हमें दिखाती है, कि कैसे यदार्ध्वादी क्रूर्टा किसी भी रोमानी कल्पना को नष्ट कर देती है वो मेला, वो मंदिर, उस हिंसक अतीट पर डाला गया एक रोमानी परदा है तो समाज को यह बहुलने की सहुलिएत देता है, कि हमने जीते जी उन दो अन सानो के सात क्या किया था? हम इस भहेस का कोई एक विजेता गोषित नहीं करेंगे. इस निषकरष को हम अपने श्रोतावो पर चोरते हैं. इस श्रोथ सामगरी में इतिहास, समाज्शास्त्र, मनोविग्यान अर प्रेम की इतनी गेरी परते चिपी है, कि हर कोई इसे अपने नजजरीये से देख सकता है और कुछ नया सीख सकता है. लिकिन जाने से पहले श्रोथ सामगरी के अंप में दीगे एक बहुत फुबसुरत, लिकिन रहे स्यमए भात का जिक्र करना जाँगी. मुकामा के बुजुर कहते हैं कि आज भी जब शाम को गंगा की तरव से हवाच चलती है, तु ताल का वो महुवे का पेड, जिस पे चोफर्ड मलने रेश्मा को बट़ठाया था, वो अपने आब डोलने पटाया. आप, जैसे कोई आज भी वो उस पेड की डालियों पर चबा बटाया हो, और कोई नीचे जमीन पर अपनी तल्वार लिए उसका पहरा दे रहो. इसका उत्तर, शायद हमे कुध अपने भीतर और अपने समाज के आईने में कुजना होगा. दर दिबेट में हमारे साज जुडने के लिए द्श्वाद, अगली बार फिर मिलेंगे एक ने विचार एक ने विमर्ष के साथ.