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मल्लाहों_का_मंत्र_बनी_गांगोदेवी.m4a
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- 0:00–0:08जरा कलपना कीजीए, एक अछिषक्तिषाली मंत्र की, जो किसी बहुत ही प्राछीन वेद से नहीं लिकला है.
- 0:08–0:13मतलप ज़से जबने वाले किसी बहव्व्य मंद्र के पुजारी भी नहीं है,
- 0:13–0:17बलकी उफनती नदी में जाल प्यकने वाले बिल्कुल सादरन मच्वारे है.
- 0:17–0:21अच्छा और वो मन्त्र कोई रहेस से मैं देवी एशवद भी नहीं होगा है आ?
- 0:21–0:22दिलकुल नहीं
- 0:22–0:25वो बस एक आमसी गरेलुस्त्री का नाम है
- 0:25–0:31नहीं एक असी फ्त्री जिसने शायद अपने जीवन में तबही एस सुचा भी नहीं होगा
- 0:31–0:36कि सदीوں बाद लोग उसके नाम को सपलता और जीवन रक्षा की पुकार बनालेंगे
- 0:36–0:37औरे वा!
- 0:37–0:43ये तो सच्छ में एक अज़्ार एज़्ो हमारी लोक कताउं की पूरी समच को ही उलतकर रग दिता है
- 0:43–0:43हा!
- 0:43–0:45मतलब अमूमन होता क्या है?
- 0:45–0:47देक हे आम तोर पर,
- 0:47–0:49इतिहास और किमवन्दती हो में
- 0:49–0:52हमें महाईुद्ध, भव्या चमतकार
- 0:52–0:55या देवी देवताँ के जटिल अख्यान मिलते है
- 0:55–0:56सही बात है
- 0:56–0:59लेकिन जब कोई परमपरा एक सादारन से
- 0:59–1:01मान्विय अनुबव्व से जन में लेती है
- 1:01–1:05तो उसकी ज़ने कही अदेक गेरी और मार्मिक होती हैं
- 1:05–1:10और आजकी हमारी इस गेहन चर्चा का केंदर भी यही मार्मिकता है
- 1:10–1:15आज हम मितला की एक अट्तिंत अनुठी लोक कता के पन्नो में उतर रहें
- 1:15–1:17आँ बहुती दिलचास तबशे है
- 1:17–1:21और जो स्रोथ हम अच्तमाल कर हैं, वो है गजींदर ताकृवची दूरा रचिद
- 1:21–1:25इपत्रिका विदेह में प्रकाषित गंगो देविग भगत
- 1:25–1:28आ, ये एक बहुती महत्तो पुन स्रोथ है
- 1:28–1:32तो आज आमार उदेश्छ केवल एक कहानी सूनाना नहीं हैं
- 1:32–1:34बलकी उस पूरी प्रक्रिया को समजना है
- 1:34–1:36कि कैसे एक मच्वारे का
- 1:36–1:37अपनी पतनी के प्रती
- 1:37–1:38एक शान्त
- 1:38–1:40नितानत वेक्तिगद प्रेम
- 1:40–1:42एक पूरे समवोदाय किलिये
- 1:42–1:43पीर्दियों तक चलने वाली
- 1:43–1:45आस्ता का अप्तुट प्रतीग बन गया
- 1:45–1:46बलकोल
- 1:46–1:49अर इस कता की प्रिष्ट भूमी को गेराए से समजने किलिए
- 1:49–1:52हमें मित्हला के सावन महीने में जाना होगा
- 1:52–1:53आचा, सावन का महीना?
- 1:53–1:55हाँ, और यही पर स्रोथ
- 1:55–1:59हमें एक बहुत रोचक सावन क्यबनता की ओल लेजाता है
- 1:59–2:02उट्टर भारत की अदिकान शिस्सो में
- 2:02–2:05सावन का महीला, शिव की आरादना का समय होता है, हैं आ?
- 2:05–2:09आ, बलकुल, जा मान साहर या मषली पकरना पुरी तना से वरजित माना जाता है?
- 2:09–2:10एक दम सही.
- 2:10–2:13लेकिन मित्ला की सानस्क्रतिक बूनावद कुछ अलग है.
- 2:13–2:17वहां सावन में मचली पकरनाया खाना निशिद नहीं है
- 2:17–2:20उ, ये तो एक बहुती महत्वा पूँन अंतर है
- 2:20–2:20है ना?
- 2:20–2:22मतलब इसका सीदा आरती है हूँँँँँँँ
- 2:22–2:24की मला समवदाय के लिए
- 2:24–2:26जो पीडियो से नद्यो पर निरभर हैं
- 2:26–2:28ये कोई दार्मे कवकाश का समै नहीं ता?
- 2:28–2:29बलक्ल नहीं
- 2:29–2:33बलक्की बारिश के कारन अफन्ती नदियों और दारो में
- 2:33–2:38ये उनकी जीविका का सबसे सक्रिय और शायत सबसे चुनाती पून समे होता था
- 2:38–2:40एक दं सतीक विष्लेषन है आपका
- 2:40–2:45अर इसी च्चनाउती पूँन समवे हमारी एक कता अकार लेती है
- 2:45–2:48देके गांगु देवी एक सादारन मलाहिन है
- 2:48–2:55एक दिन उनका पती गांगो के पिता और भाई के साथ मचली पकरने के लें नदी की दार कियो निकलता है
- 2:55–2:57तो मथलब तीन लोग मचली पकरने जार है
- 2:57–3:02आँ और उस दिन उस पती के मन में कोई बहुत बडी महत्वा कांशा नहीं है
- 3:02–3:04उसकी योजना बहुत इस सरल और प्यारी है
- 3:04–3:05वो क्या?
- 3:05–3:07उसे नदी से अच्छी मचलिया पकरनी है
- 3:08–3:10उने स्थानिया हाट में बेचना है
- 3:10–3:12और उन चन्ट पैसो से
- 3:12–3:17सावन के मेले से अपनी बाँगो के लिए चुडी लथी करलानी है
- 3:17–3:21औरे, कितना सादारन और सच्चा प्रेम है
- 3:21–3:24इस सादारन सी योजना में जो मानवी ए भावना चिपी है,
- 3:24–3:26वो बहुत गेरी है
- 3:26–3:27आप, बिलकुल
- 3:27–3:29मतलव, उसे कोई महल नहीं बनवाना था,
- 3:29–3:31किसी राजा को प्रसनन नहीं करना था
- 3:31–3:34उसे बस सावन के मेले कि उस चोती सी खुषी को
- 3:34–3:36अपनी पतनी के हाथो तक पहुट अन था
- 3:36–3:37सही कहाँ
- 3:37–3:39लेकिन नदी की अपनी अलगी मरजी होती है
- 3:39–3:40आव उतो है
- 3:40–3:42तीनो लोग अपना जाल
- 3:42–3:46जिसे उस अंचल में सरया कहा जाता है, पानी में उतारते है.
- 3:46–3:49सुबहे से लेकर भेरु पातर तक, मतलव,
- 3:49–3:52दूपहर दھलने तक कथोर परश्रम होता है.
- 3:53–3:55और उस परश्रम का परनाम क्या निकलता है?
- 3:55–3:59स्रोथ्त के अनसार उनके जाल में कोई बडी या मुल्लिवान मचली नही आती
- 4:00–4:03जाल में केवल दोका, तराशंक और सतुवा ही फसते हैं
- 4:03–4:08आप यहां यह समझना बड़ जरूरी है कि यह दोका और तराशंक आखिर हैं क्या
- 4:08–4:08आप बता एगे
- 4:08–4:13दिके ये नद्यों की तलड़ी में पाए जाने वाले चोटे जली ए जीव या गोंगे है
- 4:13–4:16जिनका हाट में कोई खास मोल नहीं होता
- 4:16–4:18भिलकु मतलब नाके बराभर की मत
- 4:18–4:21टिक वैसी चलीए से खोल कर दिकते हैं
- 4:21–4:24तो आप दोगा दोगा तो जब बात उसकी पतनी के अपहार की हो?
- 4:24–4:28बलकुल और इस मनो वेग्यानिक स्थिती का विष्लेशन करनाम बहुत आवश्चक है
- 4:28–4:31चब एक अपनी पूरी शम्ता लगा देता है
- 4:31–4:33और फिर भी खाली हात रहात रहात है
- 4:33–4:39दिन बर की इस हताशा दूप और पसीने ने उस मच्वारे को किस हत्तक तोर दिया होगा
- 4:39–4:42खासकर तब जब बात उसकी पतनी के अपहार की हो?
- 4:42–4:47बिलकुल और इस मनो वैग्यानिक स्थिती का विष्लेशन करनाम बहुत आवष्षक है
- 4:47–4:50तब एक अईन्सान अपनी पूरी शम्ता लगा देता है
- 4:50–4:52और फिर भी खाली हाथ रहता है
- 4:52–4:54तो सब से पहले हताशा क्रोध में बडलती है
- 4:54–4:57आखसर लोग जलाहड में आजाते है
- 4:57–4:59वो अखसर अपने उपकरनों को कोसता है
- 4:59–5:01किस्मत को दोष देता है
- 5:01–5:03या हार मान कर लोट जाता है
- 5:03–5:07लेकिन यहां, उस मच्वारे की प्रतिक्रीया पूरी तरा से अलगती
- 5:07–5:08अच्छ, तो उसने गया किया?
- 5:08–5:11उसकी हताशाने क्रोद करूप नहीं लिया
- 5:11–5:14बलकी वो एक चरम समवेदन शीलता
- 5:14–5:15और समरपन में बड़ल गयी
- 5:15–5:20और मुझे लगता है कि यहीपर ये कता अपना सबसे शकती शाली मोड ले लिए हैं
- 5:20–5:21बलकोल
- 5:21–5:23गर लोटने से टीक पहले
- 5:23–5:25जब देरे की आखरी सीमा आगगेगी
- 5:25–5:28तो उस पतीने क अंतिम बहुग प्रयास करने कन लिन लिया
- 5:28–5:30जाल फेकतेवे उसने पतनी का नाम लिया
- 5:30–5:35अद श्रोथ मे उस पल के जो शब्द दरज है, वो बहुत ही गेरे है.
- 5:35–5:36वो शबद क्या थे?
- 5:36–5:43उसने कहा, ए अंतिम बेर ची गांगो, ए ही बेर जे माच नहीं आईल, ता हमराच शमा करब.
- 5:43–5:49अद्थात ये आख्री बार है गांगो इस भार अगर मचली नहीं आई तो मुजे खषमा करना
- 5:49–5:55बापरे इस एक वाखके में जो मनोविग्यान और आस्था का मिष्रन एं वो सच में अद्बोत है
- 5:55–5:55है ना?
- 5:55–5:59मदब आमुमन संकत में इनसान किसी सरवष्क्तिमान भगवान कावान करता है.
- 5:59–6:02लेकिन यहा पती अपनी पतनी से ख्षमा मांग रहा है.
- 6:02–6:07बिलकुल और येस बात कप रमान है कि उसकिलि वो प्रेम वो समर पन
- 6:07–6:09किसी भी देविय शक्ती से कम नही था.
- 6:09–6:10सही बारते!
- 6:10–6:12उस में गेरी विनम्रता है!
- 6:12–6:14वो प्रक्रिती से लड नही रहा है!
- 6:15–6:19वो बस अपनी लाचारी को अपने सबसे पवित्र रिष्टे के सामने रख रहा है!
- 6:19–6:22और प्रक्रिती ने उस विनम्रता का जो उत्तर दिया!
- 6:22–6:24वो किसी चमतकार से कम नही ता!
- 6:24–6:25या हुआ फिर?
- 6:25–6:28जाल पानी से बाहर खीचना मुष्किल होगया
- 6:28–6:30वो मचलियो से दना ब़र चुका था
- 6:30–6:32कि दिनबर की सारी विपलता
- 6:32–6:34एक पल मे दूल गय.
- 6:34–6:35और वाज
- 6:35–6:37और उन मचलियो को हाट मे भेच कर
- 6:37–6:40नकेवल सावन के मेले से लट्फी चुन्डी करी दिगाई
- 6:40–7:10बल की गांगो के लिएक नूवा, याने एक नहीं साडी भी आई लिएक नूवा यान एक नूवा यान एक नूवा यान एक नूवा यान वागा वागा वागा वागा वागा वागा वागा वागा वागा वागा वागा वागा वागा वागा वागा वागा वागा वागा वा
- 7:10–7:14तरीके से खिची चली आई, वच्वारे का फोकस यतना बड़गया हो,
- 7:14–7:18के उसने नदी के बहाव को, हवा को, या पानी की सतहे को,
- 7:18–7:20एक फलो स्थेट में पर लिया हो.
- 7:20–7:23वह, ये बहुत इदी तारके क्विष्लेशन है.
- 7:23–7:24है ना?
- 7:24–7:27मतलव अपनी पतनी के नाम ने शाए देक अंकर का का काम किया
- 7:27–7:29जिसने उसके बटकेवे ध्यान को समेट कर
- 7:29–7:32उसे उस जगे जाल भेंगने को प्रेविद किया
- 7:32–7:34जहां असल में मचलियो का जुंड था
- 7:34–7:36मैं पूरी तरह से सहमत हूँ
- 7:36–7:38मनोविग्यान में इसे हम
- 7:38–7:42खॉट बार गाँगो का नाम लिया और जाल फिर से मच्लियों से लबालब बवर गया
- 7:42–7:44मतलब ये अप कुई तुखा नही था
- 7:44–7:46बलकुल नहीं और इस बार तुलना करने के लिए
- 7:46–7:48एक सीडा पैमाना भी मोझुद था
- 7:48–7:51अगले दिन क्या हूँआ उबारा गांगो का नाम लिया
- 7:51–7:54और जाल फिर से मचलियो से लबालप ब़र गया
- 7:54–7:56मतलब ये अप कोई तुख्का नहीं था
- 7:56–7:59बलकुल नहीं और इस बार तुल्ना करने किलिए
- 7:59–8:01एक सीडा पैमाना भी मोझुद था
- 8:01–8:02यह आप कुई तुखा नहीं ता?
- 8:02–8:03बलकुल नहीं
- 8:03–8:05और इस भार तुलना करने किलिए
- 8:05–8:07एक सीडा पैमाना भी मोझुद ता
- 8:07–8:08उसी समय,
- 8:08–8:10उसी नदी की दार में
- 8:10–8:12गांगो के पिता
- 8:12–8:14और उसका बहाई भी मचली पकर रे थे
- 8:14–8:15आप, वो लोग भी तो साथी दे
- 8:15–8:16तो उनकी क्या स्तिती ती?
- 8:16–8:18उनके जाल मे पहले दिन की तराई
- 8:18–8:20केवल दोका कांक्डू आरे थे
- 8:20–8:22सफलता केवल और केवल गांगो के
- 8:22–8:24पती के हिस्से में आरे थी
- 8:24–8:26जब एकी परिस्तिती में
- 8:26–8:27तो गलक-गलक प्रिनाम आते हैं
- 8:27–8:28तो इन्सान कदमाक
- 8:28–8:30स्वाबिक्रूब से कारन कोजने लकता है
- 8:30–8:31एक दम सई
- 8:31–8:34और पिता और भाई ने जब इस भारी अंतर को देखा
- 8:34–8:36तो उनो ने भी सवाल किया
- 8:36–8:38आप लोग भाशा मे जेसे खोथ्या कर पुछना कैते हैं
- 8:38–8:42बिलकुल मतलब आश्षर ये और थोडे सवाल्या लहेजे में
- 8:42–8:47तब वो रहेस से सामने आया पतीने उने बताया कि जब वो गांगो का नाम लेकर जाल पफिकता है,
- 8:47–8:51तो मच्लियों कि आमबो ही, यहनी मच्लियों का एक बड़ा जूल्ड,
- 8:51–8:54सुयम उसके जाल कियों खिचा चला आता है.
- 8:54–8:57आप और अगर बिना नाम लिये जाल फेंके,
- 8:57–9:05अगर बिना नाम लिए जाल फेंके, तो परिणाम वही होते हैं जो पिता और भाई को मिल रहे थे.
- 9:05–9:11अब यहां से हम उस टन्त्र पर आते हैं, जहां से एक वेक्तिगत आदत एक पूरी सामचवदाएक आस्था बन जाती है.
- 9:11–9:19बिल्कुल, सुचनाय विषेशकर वो जो आजीवीका और अस्तित्तु से जुडी हो, लोग समाजो में बहत थेजी से फैलती है.
- 9:19–9:26ये सुचनाय बि बहत दिल्चस पै की, दिजिटल यूग से सदियों पहले, ये सुचनाय कैसे नद्यों के माद्यम से यात्रा करती थी.
- 9:26–9:28अज़ याँ बाद का तरीका बिलकुल अलक था
- 9:28–9:33मतलब, मित्फिला के मला जु अलग अलग कारियों अर्दारों पर काम कर रहुंगे
- 9:33–9:35जब वे शाम को अपनी नावो पर मिलते हुंगे
- 9:35–9:37हाँट मे बेट्ते हुंगे
- 9:37–9:38तो ये बाद कैसे फैली होगी
- 9:38–9:41उग मच्वारा दूस्रे से केता होगा
- 9:41–9:45तुम ने सुना गांगो का नाम लेने से जाल बारी हो जाता है
- 9:45–9:49बलकु और ये शुद्द रूप से आर्थिक आवश्ष्व्धा
- 9:49–9:51और अनुभव जन्य साख्षका मिलन है
- 9:51–9:53तुसरे मच्वारोने भी से आज्माया होगा
- 9:53–10:00अग़ जब इन्सान के पास खोने को कुछ नहो और एक नया परखवा तरीका सामने हो, तो वो से अपनालेता है.
- 10:00–10:01सईभात है.
- 10:01–10:09दिरे-दिरे उनो ने भी देखा होगा, कि इस नाम के सात जवग एक खास श्रद्धा और फोकस के साथ जाल प्हंकते है,
- 10:09–10:12तो उनकी सपलता की दर बडजाती है.
- 10:12–10:14तो जो सहे सम्वंद ता,
- 10:14–10:16यानी जो कोरिलेशन ता,
- 10:16–10:19उसने दिरे-दिरे कारन या कोजेशन का रूप ले लिया.
- 10:19–10:20एक दम सही.
- 10:20–10:23और फिर वो कारन एक पवित्र परमपरा बन गया.
- 10:23–10:25गांगो देविग भगत.
- 10:25–10:26और आज भी,
- 10:26–10:56वो के बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी ब
- 10:56–11:01अद्री बादी बादी बादी निर्मल बिना किसी लालज का प्रेम है
- 11:01–11:07उस्पुकार में जो हम्राक शमाकरम वेनम्रता है, वही शायद इस पुरी परमपरा की अस्ली आत्मा है
- 11:07–11:09सही कहा आपने
- 11:09–11:12अपने प्रती निर्मल बिना किसी लालज का प्रेम है
- 11:13–11:16उस पुकार में जो हम्राक शमाकरम वाली विनम्रता है
- 11:16–11:19वही शायद इस पुरी परमपरा की अस्ली आत्मा है
- 11:19–11:20सही कहा अपने
- 11:20–11:22उस में प्रक्रती पर विजेपाने का कोई आहिंकार नहीं है
- 11:22–11:27अगी ये कारने है कि गांगो देवी एक मिठक नहीं, बलके जीवन सत्ति के रूप में
- 11:27–11:30मल्ला समुदाए कि चेतना में स्थापित होगएँ.
- 11:30–11:35ये कहानी ये प्रमानेत करती है कि पवित्रता केवल मंदिरों के गर्ब गरहे में
- 11:35–11:41अग नहीं बलके एक जीवन सत्ति के रूप मल्ला समुदाय की चेतना में स्थापित हो गईईईईईई.
- 11:41–11:46ये कहानी ये प्रमानेत करती है कि पवित्रता केवल मंदिरों के गर्ब गरहे में नहीं होती,
- 11:46–11:49वो एक मच्वारे के पसीने से भीगे जाल
- 11:49–11:51और उसकी पतनी के खरीदी गगी
- 11:51–11:54लहेटी चूडियो में भी उतनी ही गहराए से बसती हैं
- 11:54–11:58मतलब आजकी इस चर्चा का सार यही है कि कैसे एक बहुत ही
- 11:58–12:00विक्तिगत और साद्धारन सी च्छाने
- 12:00–12:07बिना किसी शोर शराभे या जादूई किटी के एक पूरे समदाये किलिए आजीविका का अद्दियातमिक मन्द्र करतिया
- 12:07–12:08बिलकोल
- 12:08–12:12ये हमें याद दिलाते कि महांता कोई यह आजी चीज नहीं है जिसे बहर से लाया जाता है
- 12:12–12:18वो मारे सबसे सादहरन, लेकिन सबसे सच्छे मानवी अनुबवोगो के भीतरी कही चिपी होती है.
- 12:18–12:24आँ, जीवन के प्रती हमारी द्रुष्ती कैसी है, ये कता उस पर एक बहुत सुन्दर तिपनी करती है.
- 12:24–12:25सही बात है.
- 12:25–12:27जब न भब ने देनिक कारियों को
- 12:27–12:30चाई वो कितना भी चोटा या नीरस कियो नहों
- 12:30–12:32एक शुध भावना और प्रिम्स से जोड देतें
- 12:32–12:35तो वो कारिया एक अनुष्टान बन चाता है
- 12:35–12:36अं
- 12:36–12:37और इसी विचार के साथ
- 12:37–12:39हम आजकी एस गहन चर्चा को
- 12:39–13:09अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अ�
- 13:09–13:26अदर बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ा�
Plain text
जरा कलपना कीजीए, एक अछिषक्तिषाली मंत्र की, जो किसी बहुत ही प्राछीन वेद से नहीं लिकला है. मतलप ज़से जबने वाले किसी बहव्व्य मंद्र के पुजारी भी नहीं है, बलकी उफनती नदी में जाल प्यकने वाले बिल्कुल सादरन मच्वारे है. अच्छा और वो मन्त्र कोई रहेस से मैं देवी एशवद भी नहीं होगा है आ? दिलकुल नहीं वो बस एक आमसी गरेलुस्त्री का नाम है नहीं एक असी फ्त्री जिसने शायद अपने जीवन में तबही एस सुचा भी नहीं होगा कि सदीوں बाद लोग उसके नाम को सपलता और जीवन रक्षा की पुकार बनालेंगे औरे वा! ये तो सच्छ में एक अज़्ार एज़्ो हमारी लोक कताउं की पूरी समच को ही उलतकर रग दिता है हा! मतलब अमूमन होता क्या है? देक हे आम तोर पर, इतिहास और किमवन्दती हो में हमें महाईुद्ध, भव्या चमतकार या देवी देवताँ के जटिल अख्यान मिलते है सही बात है लेकिन जब कोई परमपरा एक सादारन से मान्विय अनुबव्व से जन में लेती है तो उसकी ज़ने कही अदेक गेरी और मार्मिक होती हैं और आजकी हमारी इस गेहन चर्चा का केंदर भी यही मार्मिकता है आज हम मितला की एक अट्तिंत अनुठी लोक कता के पन्नो में उतर रहें आँ बहुती दिलचास तबशे है और जो स्रोथ हम अच्तमाल कर हैं, वो है गजींदर ताकृवची दूरा रचिद इपत्रिका विदेह में प्रकाषित गंगो देविग भगत आ, ये एक बहुती महत्तो पुन स्रोथ है तो आज आमार उदेश्छ केवल एक कहानी सूनाना नहीं हैं बलकी उस पूरी प्रक्रिया को समजना है कि कैसे एक मच्वारे का अपनी पतनी के प्रती एक शान्त नितानत वेक्तिगद प्रेम एक पूरे समवोदाय किलिये पीर्दियों तक चलने वाली आस्ता का अप्तुट प्रतीग बन गया बलकोल अर इस कता की प्रिष्ट भूमी को गेराए से समजने किलिए हमें मित्हला के सावन महीने में जाना होगा आचा, सावन का महीना? हाँ, और यही पर स्रोथ हमें एक बहुत रोचक सावन क्यबनता की ओल लेजाता है उट्टर भारत की अदिकान शिस्सो में सावन का महीला, शिव की आरादना का समय होता है, हैं आ? आ, बलकुल, जा मान साहर या मषली पकरना पुरी तना से वरजित माना जाता है? एक दम सही. लेकिन मित्ला की सानस्क्रतिक बूनावद कुछ अलग है. वहां सावन में मचली पकरनाया खाना निशिद नहीं है उ, ये तो एक बहुती महत्वा पूँन अंतर है है ना? मतलब इसका सीदा आरती है हूँँँँँँँ की मला समवदाय के लिए जो पीडियो से नद्यो पर निरभर हैं ये कोई दार्मे कवकाश का समै नहीं ता? बलक्ल नहीं बलक्की बारिश के कारन अफन्ती नदियों और दारो में ये उनकी जीविका का सबसे सक्रिय और शायत सबसे चुनाती पून समे होता था एक दं सतीक विष्लेषन है आपका अर इसी च्चनाउती पूँन समवे हमारी एक कता अकार लेती है देके गांगु देवी एक सादारन मलाहिन है एक दिन उनका पती गांगो के पिता और भाई के साथ मचली पकरने के लें नदी की दार कियो निकलता है तो मथलब तीन लोग मचली पकरने जार है आँ और उस दिन उस पती के मन में कोई बहुत बडी महत्वा कांशा नहीं है उसकी योजना बहुत इस सरल और प्यारी है वो क्या? उसे नदी से अच्छी मचलिया पकरनी है उने स्थानिया हाट में बेचना है और उन चन्ट पैसो से सावन के मेले से अपनी बाँगो के लिए चुडी लथी करलानी है औरे, कितना सादारन और सच्चा प्रेम है इस सादारन सी योजना में जो मानवी ए भावना चिपी है, वो बहुत गेरी है आप, बिलकुल मतलव, उसे कोई महल नहीं बनवाना था, किसी राजा को प्रसनन नहीं करना था उसे बस सावन के मेले कि उस चोती सी खुषी को अपनी पतनी के हाथो तक पहुट अन था सही कहाँ लेकिन नदी की अपनी अलगी मरजी होती है आव उतो है तीनो लोग अपना जाल जिसे उस अंचल में सरया कहा जाता है, पानी में उतारते है. सुबहे से लेकर भेरु पातर तक, मतलव, दूपहर दھलने तक कथोर परश्रम होता है. और उस परश्रम का परनाम क्या निकलता है? स्रोथ्त के अनसार उनके जाल में कोई बडी या मुल्लिवान मचली नही आती जाल में केवल दोका, तराशंक और सतुवा ही फसते हैं आप यहां यह समझना बड़ जरूरी है कि यह दोका और तराशंक आखिर हैं क्या आप बता एगे दिके ये नद्यों की तलड़ी में पाए जाने वाले चोटे जली ए जीव या गोंगे है जिनका हाट में कोई खास मोल नहीं होता भिलकु मतलब नाके बराभर की मत टिक वैसी चलीए से खोल कर दिकते हैं तो आप दोगा दोगा तो जब बात उसकी पतनी के अपहार की हो? बलकुल और इस मनो वेग्यानिक स्थिती का विष्लेशन करनाम बहुत आवश्चक है चब एक अपनी पूरी शम्ता लगा देता है और फिर भी खाली हात रहात रहात है दिन बर की इस हताशा दूप और पसीने ने उस मच्वारे को किस हत्तक तोर दिया होगा खासकर तब जब बात उसकी पतनी के अपहार की हो? बिलकुल और इस मनो वैग्यानिक स्थिती का विष्लेशन करनाम बहुत आवष्षक है तब एक अईन्सान अपनी पूरी शम्ता लगा देता है और फिर भी खाली हाथ रहता है तो सब से पहले हताशा क्रोध में बडलती है आखसर लोग जलाहड में आजाते है वो अखसर अपने उपकरनों को कोसता है किस्मत को दोष देता है या हार मान कर लोट जाता है लेकिन यहां, उस मच्वारे की प्रतिक्रीया पूरी तरा से अलगती अच्छ, तो उसने गया किया? उसकी हताशाने क्रोद करूप नहीं लिया बलकी वो एक चरम समवेदन शीलता और समरपन में बड़ल गयी और मुझे लगता है कि यहीपर ये कता अपना सबसे शकती शाली मोड ले लिए हैं बलकोल गर लोटने से टीक पहले जब देरे की आखरी सीमा आगगेगी तो उस पतीने क अंतिम बहुग प्रयास करने कन लिन लिया जाल फेकतेवे उसने पतनी का नाम लिया अद श्रोथ मे उस पल के जो शब्द दरज है, वो बहुत ही गेरे है. वो शबद क्या थे? उसने कहा, ए अंतिम बेर ची गांगो, ए ही बेर जे माच नहीं आईल, ता हमराच शमा करब. अद्थात ये आख्री बार है गांगो इस भार अगर मचली नहीं आई तो मुजे खषमा करना बापरे इस एक वाखके में जो मनोविग्यान और आस्था का मिष्रन एं वो सच में अद्बोत है है ना? मदब आमुमन संकत में इनसान किसी सरवष्क्तिमान भगवान कावान करता है. लेकिन यहा पती अपनी पतनी से ख्षमा मांग रहा है. बिलकुल और येस बात कप रमान है कि उसकिलि वो प्रेम वो समर पन किसी भी देविय शक्ती से कम नही था. सही बारते! उस में गेरी विनम्रता है! वो प्रक्रिती से लड नही रहा है! वो बस अपनी लाचारी को अपने सबसे पवित्र रिष्टे के सामने रख रहा है! और प्रक्रिती ने उस विनम्रता का जो उत्तर दिया! वो किसी चमतकार से कम नही ता! या हुआ फिर? जाल पानी से बाहर खीचना मुष्किल होगया वो मचलियो से दना ब़र चुका था कि दिनबर की सारी विपलता एक पल मे दूल गय. और वाज और उन मचलियो को हाट मे भेच कर नकेवल सावन के मेले से लट्फी चुन्डी करी दिगाई बल की गांगो के लिएक नूवा, याने एक नहीं साडी भी आई लिएक नूवा यान एक नूवा यान एक नूवा यान एक नूवा यान वागा वागा वागा वागा वागा वागा वागा वागा वागा वागा वागा वागा वागा वागा वागा वागा वागा वागा वा तरीके से खिची चली आई, वच्वारे का फोकस यतना बड़गया हो, के उसने नदी के बहाव को, हवा को, या पानी की सतहे को, एक फलो स्थेट में पर लिया हो. वह, ये बहुत इदी तारके क्विष्लेशन है. है ना? मतलव अपनी पतनी के नाम ने शाए देक अंकर का का काम किया जिसने उसके बटकेवे ध्यान को समेट कर उसे उस जगे जाल भेंगने को प्रेविद किया जहां असल में मचलियो का जुंड था मैं पूरी तरह से सहमत हूँ मनोविग्यान में इसे हम खॉट बार गाँगो का नाम लिया और जाल फिर से मच्लियों से लबालब बवर गया मतलब ये अप कुई तुखा नही था बलकुल नहीं और इस बार तुलना करने के लिए एक सीडा पैमाना भी मोझुद था अगले दिन क्या हूँआ उबारा गांगो का नाम लिया और जाल फिर से मचलियो से लबालप ब़र गया मतलब ये अप कोई तुख्का नहीं था बलकुल नहीं और इस बार तुल्ना करने किलिए एक सीडा पैमाना भी मोझुद था यह आप कुई तुखा नहीं ता? बलकुल नहीं और इस भार तुलना करने किलिए एक सीडा पैमाना भी मोझुद ता उसी समय, उसी नदी की दार में गांगो के पिता और उसका बहाई भी मचली पकर रे थे आप, वो लोग भी तो साथी दे तो उनकी क्या स्तिती ती? उनके जाल मे पहले दिन की तराई केवल दोका कांक्डू आरे थे सफलता केवल और केवल गांगो के पती के हिस्से में आरे थी जब एकी परिस्तिती में तो गलक-गलक प्रिनाम आते हैं तो इन्सान कदमाक स्वाबिक्रूब से कारन कोजने लकता है एक दम सई और पिता और भाई ने जब इस भारी अंतर को देखा तो उनो ने भी सवाल किया आप लोग भाशा मे जेसे खोथ्या कर पुछना कैते हैं बिलकुल मतलब आश्षर ये और थोडे सवाल्या लहेजे में तब वो रहेस से सामने आया पतीने उने बताया कि जब वो गांगो का नाम लेकर जाल पफिकता है, तो मच्लियों कि आमबो ही, यहनी मच्लियों का एक बड़ा जूल्ड, सुयम उसके जाल कियों खिचा चला आता है. आप और अगर बिना नाम लिये जाल फेंके, अगर बिना नाम लिए जाल फेंके, तो परिणाम वही होते हैं जो पिता और भाई को मिल रहे थे. अब यहां से हम उस टन्त्र पर आते हैं, जहां से एक वेक्तिगत आदत एक पूरी सामचवदाएक आस्था बन जाती है. बिल्कुल, सुचनाय विषेशकर वो जो आजीवीका और अस्तित्तु से जुडी हो, लोग समाजो में बहत थेजी से फैलती है. ये सुचनाय बि बहत दिल्चस पै की, दिजिटल यूग से सदियों पहले, ये सुचनाय कैसे नद्यों के माद्यम से यात्रा करती थी. अज़ याँ बाद का तरीका बिलकुल अलक था मतलब, मित्फिला के मला जु अलग अलग कारियों अर्दारों पर काम कर रहुंगे जब वे शाम को अपनी नावो पर मिलते हुंगे हाँट मे बेट्ते हुंगे तो ये बाद कैसे फैली होगी उग मच्वारा दूस्रे से केता होगा तुम ने सुना गांगो का नाम लेने से जाल बारी हो जाता है बलकु और ये शुद्द रूप से आर्थिक आवश्ष्व्धा और अनुभव जन्य साख्षका मिलन है तुसरे मच्वारोने भी से आज्माया होगा अग़ जब इन्सान के पास खोने को कुछ नहो और एक नया परखवा तरीका सामने हो, तो वो से अपनालेता है. सईभात है. दिरे-दिरे उनो ने भी देखा होगा, कि इस नाम के सात जवग एक खास श्रद्धा और फोकस के साथ जाल प्हंकते है, तो उनकी सपलता की दर बडजाती है. तो जो सहे सम्वंद ता, यानी जो कोरिलेशन ता, उसने दिरे-दिरे कारन या कोजेशन का रूप ले लिया. एक दम सही. और फिर वो कारन एक पवित्र परमपरा बन गया. गांगो देविग भगत. और आज भी, वो के बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी बादी ब अद्री बादी बादी बादी निर्मल बिना किसी लालज का प्रेम है उस्पुकार में जो हम्राक शमाकरम वेनम्रता है, वही शायद इस पुरी परमपरा की अस्ली आत्मा है सही कहा आपने अपने प्रती निर्मल बिना किसी लालज का प्रेम है उस पुकार में जो हम्राक शमाकरम वाली विनम्रता है वही शायद इस पुरी परमपरा की अस्ली आत्मा है सही कहा अपने उस में प्रक्रती पर विजेपाने का कोई आहिंकार नहीं है अगी ये कारने है कि गांगो देवी एक मिठक नहीं, बलके जीवन सत्ति के रूप में मल्ला समुदाए कि चेतना में स्थापित होगएँ. ये कहानी ये प्रमानेत करती है कि पवित्रता केवल मंदिरों के गर्ब गरहे में अग नहीं बलके एक जीवन सत्ति के रूप मल्ला समुदाय की चेतना में स्थापित हो गईईईईईई. ये कहानी ये प्रमानेत करती है कि पवित्रता केवल मंदिरों के गर्ब गरहे में नहीं होती, वो एक मच्वारे के पसीने से भीगे जाल और उसकी पतनी के खरीदी गगी लहेटी चूडियो में भी उतनी ही गहराए से बसती हैं मतलब आजकी इस चर्चा का सार यही है कि कैसे एक बहुत ही विक्तिगत और साद्धारन सी च्छाने बिना किसी शोर शराभे या जादूई किटी के एक पूरे समदाये किलिए आजीविका का अद्दियातमिक मन्द्र करतिया बिलकोल ये हमें याद दिलाते कि महांता कोई यह आजी चीज नहीं है जिसे बहर से लाया जाता है वो मारे सबसे सादहरन, लेकिन सबसे सच्छे मानवी अनुबवोगो के भीतरी कही चिपी होती है. आँ, जीवन के प्रती हमारी द्रुष्ती कैसी है, ये कता उस पर एक बहुत सुन्दर तिपनी करती है. सही बात है. जब न भब ने देनिक कारियों को चाई वो कितना भी चोटा या नीरस कियो नहों एक शुध भावना और प्रिम्स से जोड देतें तो वो कारिया एक अनुष्टान बन चाता है अं और इसी विचार के साथ हम आजकी एस गहन चर्चा को अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अ� अदर बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ादा बज़ा�