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गांगोदेवीक_भगत_और_मल्लाहों_की_लोक_आस्था.m4a

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Part 9 · VIDEHA MITHILA MAITHILI DISCUSSION CRITICISM SERIES PART 9
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  1. 0:00–0:06अज हम गजेंद्र ताकूर की कता गांगो देविक भगत पर चर्चा कर रहे हैं,
  2. 0:06–0:10जो एक मलाहा के प्रेम और चमतकार से जुडी एक स्थानिय परमपरा की कहानी हैं.
  3. 0:10–0:16और सीदे फीटबैक पर आएं, तो इस कहानी में प्रेम के अलोकिक शकती में बडलने का विषेत हो है,
  4. 0:16–0:20पर नायक का अंतरिक द्वंद मुझे पुरी तरा से चिपा हूँ आ लगा.
  5. 0:20–0:25बिल्कुल, और इसी लिये लोग कता के केंद्र में जो मानवी अ प्रेम है,
  6. 0:25–0:55तो तो तो तो बज़ागा बदागा बदागा बदागा बदागा बदागा बदागा बदागा बदागा बदागा बदागा बदागा बदागा बदागा बदागा बदागा बदागा बदागा बदागा बदागा बदागा बदागा बदागा बदागा बदागा बदागा �
  7. 0:55–0:58वो नदी में अपना जाल बार बार पखता है.
  8. 0:58–1:00जिसे कहानी में सरीया कहा गया है.
  9. 1:00–1:01आप सरीया.
  10. 1:01–1:03तो वो जाल पखता है,
  11. 1:03–1:07लेकिन उसके हाथ सर्फ दोका और सीपूव.
  12. 1:07–1:09यानी गोंगे और सीप ही लगते है.
  13. 1:09–1:13इस पूरी प्रक्रिया मैं मलाह के उस खाली पन
  14. 1:13–1:16अदर का चित्रन बेहद सता ही रहे गया है
  15. 1:16–1:20नहीं, मतलब विवष्ता जो उसे अंदर से खारही है,
  16. 1:20–1:22वो उबरकर नहीं आती.
  17. 1:22–1:26बिल्कुल, चमतकार गधित होने से टीक पहले के खषनो में,
  18. 1:26–1:30उस पती की मान्सिक स्तिती को अदेक गेराई से उकेरा जाना जाहीं.
  19. 1:30–1:34ताकि ये गधना केवल एक अचानाक हूँः चमतकार नलगकर
  20. 1:34–1:38असी मानविये प्रेम की पराकाष्टा का एक स्वाभाविक परनाम लगे.
  21. 1:38–1:40लेकिन यहाए एक चुनोती है.
  22. 1:40–1:45हम नायक के मनो विग्यान की इतनी गेरी कुदाई कैसे करेए
  23. 1:45–2:15वो बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बग
  24. 2:15–2:18भी ब्हावनात्मक गेराई लाना पूरी तरह से समबव है
  25. 2:19–2:22और इसका उपाए लंभे विव्रनात्मक पाराग्राफो में नहीं
  26. 2:22–2:26बलकी सकीख और चुनिन्दा बिम्वों के उप्योग में चिपा है
  27. 2:26–2:28अच्छा तो आप दिश्षों की बात कर रही हैं
  28. 2:28–2:36आप जब हम केवल ये लिखते हैं कि वह निराश था तो ये पाटख को उस निराशा को महसुस करने का कोई रास्ता नहीं देटा
  29. 2:36–2:40इसके बजाए कहानी में उस शवड का वरनन किया जा सकता है
  30. 2:40–2:46जहाववः शान्त अंदेरी नदी के पानी में अपनी पतनी की उमीद भरी आखों की कलपना करता है
  31. 2:46–2:49औरे वाए ये बहुज शकती शाली है
  32. 2:49–2:54या फिर उसकी खाली हाथेलियों की तुलना नदी की निश्थोर शुन्निता से की जासकती है
  33. 2:54–2:59ये इस समस्या को सुल्जाने के कई समबावित तरीको मैं से केवल एक विचार है.
  34. 2:59–3:02लेक्हक को बस कुछ आईसे वाग के पिरोने है,
  35. 3:02–3:05जो पाट्हक को उस हताशा की गेराई में दھखेल दे.
  36. 3:05–3:08तीक उसक शन से पहले जब चमतकार होता है.
  37. 3:08–3:13वह दिख पार रहा हूं कि ये तरीका कैसे काम करेगा?
  38. 3:13–3:18हम एक आमुरत भावना को एक द्रष्ष अनबहुती के साथ जोड रहे हैं
  39. 3:18–3:19एक दम सही!
  40. 3:19–3:24मतलब सूरज दल रहा है, जाल खाली है, और सावन का मेला करीब है
  41. 3:24–3:28ये किवल मचली ना मिलने का आर्थिक संकत नहीं है
  42. 3:28–3:30ये एक प्रेमी की विपलता है.
  43. 3:30–3:31बिलकोल.
  44. 3:31–3:32यही तो मुख्यबात है.
  45. 3:32–3:35क्या हम यहा उस शारीरिक � thakaan को भी
  46. 3:35–3:38उसकी मानसिक पीडा के साथ जोर सकते है?
  47. 3:38–3:40उम जैसे जाल खीच्ते खीच्ते
  48. 3:40–3:42उसकी उंग्लियो में जो खरोचे आईईईईईई
  49. 3:42–3:44वे उस दर्ट से कम है.
  50. 3:58–4:02अद़्ाउब बाद्खार का अस्टी नियन्त्रन से बाहर है।
  51. 4:02–4:04तब ही तो चमत्वार की जुरूत मैहसुस होगी।
  52. 4:04–4:07बिल्कुल जब वो हताश होकर कहता है,
  53. 4:07–4:11के य अन्तिम बेर, ची, गांगो, ख्षमा करव,
  54. 4:11–4:17कहता है कि इ अंतिम भेर, ची, गांगो, खषमा करब,
  55. 4:17–4:19तो इसके पीचे एक बहुत बडी मनोवेग्यानिक,
  56. 4:19–4:21हार चिपी होनी जाहीए.
  57. 4:21–4:25अगर लेखख इस समवाद से टीक पहले नायक को नदी के,
  58. 4:25–4:29विषाल, काले होते विस्तार, अपनी चोटी सी नाव के
  59. 4:29–4:33बाथक को ये महसुस होना चाहीए कि नदी ने आज तैकर लिया है
  60. 4:33–4:36कि वो उस मलाह के प्रेम की परिक्षा लेगी
  61. 4:36–4:39सच्मुच यह द्रिष्य को पुरी तरहा बदल दिता है
  62. 4:39–4:43पाथक को यह अहसाज होना चाहीए कि नायक का अस्तित वही
  63. 4:43–4:48तच्छ्मुच यह द्रिष्य को पुरी तरा बडल दिता है, पाटक को यह अहसास हूना चाहीए,
  64. 4:48–4:52कि नायक का अस्तित वही उस अन्तिम जाल के साथ जुडा हूए है.
  65. 4:52–4:53बिलकुल.
  66. 4:53–4:56आचा जब हम द्रिष्यो और अनुब वुत्यो की बात कर ही रहे है,
  67. 4:56–5:00तो मुझे ये सामगरी के एक और पहलु ने पहडूल जा दिया है.
  68. 5:00–5:01वो क्या?
  69. 5:01–5:05कहानी का जो परीवेश है, वो पुरी ट्रान से ग्रामीन अड्ठेट है.
  70. 5:05–5:09मिट्टी के गर, सावन का मेला, डोका सिपूवा.
  71. 5:09–5:11लिकिन स्रोट सामगरी में जो चित्र दिये गे है,
  72. 5:11–5:13वे अथ्ते दिक आदूनिक और आमुर्थ है.
  73. 5:13–5:15राद, मैंने वी द्यान दिया.
  74. 5:15–5:18मतलब पुर्न त्रिकोडों से बनी मानव अक्रितिया,
  75. 5:18–5:21बहुभुज और जामितिये मच्लिया.
  76. 5:21–5:26मुछ श्रूवात में लगा की शाएद लेखक ने जान भूजकर ये विरोदा बास रखच रखचा है.
  77. 5:26–5:31ये दिखाने के लिए कि लोक कता आदूनिक समय में भी प्रासंगेक है.
  78. 5:31–6:01अदर बादख बादख बादख बादख बादख बादख बादख बादख बादख बादख बादख बादख बादख बादख बादख बादख बादख बादख बादख बादख बादख बादख बादख बादख बादख बादख बादख बादख बादख बादख बादख �
  79. 6:01–6:04इक तरव दिहाती शबद हैं और दुसरी तरव जामिती
  80. 6:04–6:08आप जब वो थेट ग्रामीः शबडों को पडटा है
  81. 6:08–6:11तो उसके दिमाग में एक यतार्थवादी चित्र बनता है
  82. 6:11–6:15लेकें उसकी आखे प्रष्ट पर जो आमुर्थ कला देख रही होती है
  83. 6:15–6:19वो उस मान्सिक चित्र से सीदे तोर पटक राती हैं
  84. 6:19–6:22और इस से पाटक की तलींता तूर जाती हैं
  85. 6:22–6:24तो क्या उने चित्र हटा देने चाहीं?
  86. 6:24–6:28नहीं, चित्रों को बड़लने के बजाए मेरा सुजाव ये है
  87. 6:28–6:31कि लेखग को अपनी कहानी के विवरनात्मक हिस्सो में
  88. 6:31–6:36आँईईग़ाँ बाशा को ही चित्रों के साचे में दालने की कोशिष नहीं कर रहे हैं?
  89. 6:36–6:38आपका मतलब है कि ये थोपा हूँआ लगेगा?
  90. 6:38–6:44आपका मतलब ये कुछ वैसा ही है जैसे आप किसी बहुत्ही पारंपरिक देहाती गीत को
  91. 6:44–6:46अपका मतलब है कि ये थोपा हुवा लगेगा
  92. 6:46–6:48अपका मतलब है कि ये कुछ वैसा ही है
  93. 6:48–6:51जैसे आप किसी बहुत ही पारंपरिक देहाती गीट को
  94. 6:51–6:54किसी एलेक्ट्रूनिक सिंठेसाइजर पे बजाने कि कोषिष करेएगे
  95. 6:54–6:56अगर एक मलहा की कहानी में
  96. 6:56–7:01यह कुछ वैसा ही है जैसे आप किसी बहुत ही पारमपरिक देहाती गीत को
  97. 7:01–7:04किसी एलेक्ट्रूनेक सिंठेसाइजर पे बजाने की कोशिष करें
  98. 7:04–7:10अगर एक मलाहा की कहानी में त्रिकोन यह बहुबुच जैसे शब्डो का इस्तिमाल किया जाए
  99. 7:10–7:14तो क्या वो बहुत जादा क्रूत्रिम या शेहरी नी हो जायगा?
  100. 7:14–7:16देकिए ये जोखिम तब उत्पन होता है,
  101. 7:16–7:21जब आप यं जामितिया शब्दों को गडनतिया शब्दावली की तरह थोबते है.
  102. 7:21–7:25हमें इने एक विग्यान की किताप की तरा प्रेुग नहीं करना है.
  103. 7:25–7:26तो फिर कैसे?
  104. 7:26–7:29उनहें द्रिश्चे रूपोको की तरहाप पिरोना है
  105. 7:30–7:32तो सुदार के तोर पर
  106. 7:32–7:35जाल फेखने की उस सादारन क्रिया को हम
  107. 7:35–7:38एक द्रिश्चे रूपक दे सकते है
  108. 7:38–7:39लेकख लिक सकते है
  109. 7:39–7:43की जब उसने अपना जाल हवा में उचाला
  110. 7:43–7:47तो शान्त नदी की चाती पर अंगिनत रिकोन बनने लगे.
  111. 7:47–7:50और वाज, यह तो बहत काव्यात्मक है?
  112. 7:50–7:57या फिर गांगो और उसके पती के प्रेम को एक अटूट व्रित के रूप में वरनित किया जासकता है.
  113. 7:57–8:04मच्लियों के जुंद के पानी में तेर्मे को आख्रतियों के एक जीवन्त खेल के रुप में दर्षाया जा सकता है.
  114. 8:04–8:14जो आप दे बाशा इप बिम्बों अर आमुर्द कला के बीच एक बाशाई पुल बनाया जा सकता है.
  115. 8:14–8:19लेखख अपनी शेली के अनुसार इन शब्डो को डाल सकते है
  116. 8:19–8:20अच्छा
  117. 8:20–8:24तो ये अवचेतन स्थर्टर पाटख को तगयार करने की प्रक्रिया है
  118. 8:24–8:28मतलब जब पाटख पाट्ख में व्रित या लेहरों के त्रिकोंग जैसे शब्ध पडगेगा
  119. 8:28–8:32अर फिर पन्ने के किनारे बने उन उमुर्थ त्रिकोनो को देखेगा
  120. 8:32–8:37तो उसे लगेगा कि ये चित्रकारी इसी कहानी के आत्मा से निकली है.
  121. 8:37–8:37बलकुल
  122. 8:37–8:39ये बहुत ही सूश्मत तरीका है.
  123. 8:39–8:44लेकिन इस प्रक्रिया में मस्तिष्क वास्तव में कैसे काम करता है.
  124. 8:44–8:48यह पाटख को उस द्रिष्च जटके से कैसे बचाटा है?
  125. 8:48–8:54असल में मानव मस्तिश क हमेशा निरन्तर ता और पातन की तलाश में रहता है.
  126. 8:54–8:59जब हम कोई कहनी पडते है, तो हम केवर शब्दों को ग्रहन नहीं कर रहे होते.
  127. 8:59–9:03अदर बाद़ख बाद़ख बाद़ार बाद़ार बाद़ार
  128. 9:03–9:07बाद़ख बाद़ार बाद़ार बाद़ार बाद़ार
  129. 9:07–9:11बाद़ार बाद़ार बाद़ार बाद़ार
  130. 9:11–9:15बाद़ार बाद़ार बाद़ार बाद़ार बाद़ार
  131. 9:15–9:19बाद़ार बाद़ार बाद़ार बाद़ार
  132. 9:19–9:22बलकी वे गेरी सार्वबहूमिक जामिती का हिस्चा है
  133. 9:22–9:25जब पाथ हो चित्र एक ही बाशा बोलने लकते है
  134. 9:25–9:28तो पाथख का अनुबहाव क्हन्टित नहीं होता
  135. 9:28–9:31बलकी वो कहानी में पूरी तरज समाहित हो जाता है
  136. 9:31–9:34ये वाकखई कहानी के सुन्दर ये शास्तर को
  137. 9:34–9:38बलकी वो कहानी में पुरी तरज समाहित हो जाता है
  138. 9:38–9:43ये वाकगी कहानी के सुन्दर्ये शास्तर को एक अलगी स्तर पर लेजाएगा
  139. 9:43–9:48ये एक सादारन कषेत्री एक कता को एक वैश्विक कलात्मक अनुबहव में बड़ल सकता है
  140. 9:48–9:49बलकोल
  141. 9:49–9:55अब जब हम कता के व्यापक अर्ठों की बात करी रहे हैं, तो मुझे कहानी के अंतिम हिस्से की अराना है.
  142. 9:55–9:57अग, निशकर्ष्वाला बहाग.
  143. 9:57–9:59अद्र बवाद्बाग
  144. 9:59–10:01अद्र बवाद्बाग
  145. 10:01–10:03अद्बाद्बाद
  146. 10:03–10:05अद्बाद बादबाद
  147. 10:05–10:07अद्बाद बाद बाद बाद बाद बाद
  148. 10:07–10:09अद्बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद
  149. 10:09–10:14अगर बाद्धख इसे एक जहन्ज समाजिक परवर्टन मानने के बजाए महज एक स्थानिय अंदविश्वास नहीं लेगा
  150. 10:14–10:20एक विक्तिगध प्रेम कत्धा के समपून समुडाए की आस्थाः में बडलने की प्रक्रिया को
  151. 10:20–10:22तब इस कता का अन्तिम प्रभाव सशक्त होगा
  152. 10:22–10:24मदल अप इसे बड़े परी प्रेखष में देखना होगा
  153. 10:24–10:25हाँ
  154. 10:25–10:27कहानी में यस पश्ट रूब से अप ले सक्ता है
  155. 10:27–10:30क्या पाथक इसे एक गें सामाजिक परिवर्टन मानने के बजाए
  156. 10:30–10:36विक व्यक्तिगत प्रेम कत्ठा के समपुरन समुदाए की आस्था में बडलने की प्रक्रिया को
  157. 10:36–10:40व्यापक सामाजेक और पारिस्तितिक संदर्बों से जोडना होगा
  158. 10:40–10:43तब ही इस कत्ठा का अन्तिम प्रभाव सशक्ट होगा
  159. 10:43–10:47अग, मदला, इसे बड़े परी प्रेखष में देखना होगा.
  160. 10:47–10:51अग, कहानी में यस शपष्ट रूब से एक कमजोरी है,
  161. 10:51–10:54के ये निशकर्ष बहुत ही अचानक सामने आता है.
  162. 10:54–10:56ये बिलकुल भी शपष्ट नहीं होता,
  163. 10:56–11:07अज़ और प्रक्रती की अनिष्चित्ता पर निरभ़ रहने वाले एक वाशीए के समुदाये ने एक सादारन महला के प्रेम को अपनी सामूहिकता कप्रती कैसे मान लिया?
  164. 11:07–11:13रहा यहा कहानी का वो सो वोट यहनी ब्रहदर्त कमजोर पर जाता है.
  165. 11:13–11:17बिल्कुल, समापन को अदिक वजन्दार बनाने किलिए,
  166. 11:17–11:20मलाह समुदाय के प्रक्रिती के साथ रिष्ते,
  167. 11:20–11:25और उनके रोज मरहा के संगर्ष पर एक संख्षिप्त तिप्पनी जोडी जानी जाहीए.
  168. 11:25–11:29ताकि ये सपष्ट हो, कि ये केवल एक अंद विष्वास नहीं है.
  169. 11:29–11:35बलकी एक समवदाए दवारा प्रेम और उमीद को संस्तागत रूप देने का तरीका है
  170. 11:35–12:05अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अ�
  171. 12:05–12:12देखे ये कोई व्याख्यान नहीं है, बलकी ये उस व्यक्तिगत रोमानियत को आमर बनाने का तरीका है.
  172. 12:12–12:14अच्छा वो कैसे?
  173. 12:14–12:19चमतकार तब तक सरफ एक चमतकार है जब तक वो एक व्यक्ती तक्सीमित है.
  174. 12:19–12:25लेकिन जब हम दिखाते हैं कि क्यो एक पूरा समुदाय उस चमतकार को अपना लेता है,
  175. 12:25–12:29तो हम उस प्रेम को एक विशाल एतियासे कैनवास दे रहे हैं.
  176. 12:29–12:30आप ये बात तो है.
  177. 12:31–12:34मलाहो का जीवन अत्यदेक अनिष्चित होता है.
  178. 12:34–12:40उनके पास कोई तैस्वरक्षा नहीं होती, वे एक अप्रत्याशित नदी के बरोसे जीते है,
  179. 12:40–12:46जम दुन्या इतनी अनिष्चित होती है, तो मनुश्व आस्था के लंगर तलाषता है.
  180. 12:46–12:49बलकुल, उने कुछ तो यह जाहीए, जिस पर वो विश्वास कर सकें.
  181. 12:49–12:55अदारन के तोर पर निशकरष में ये विचार जोडा जा सकता है,
  182. 12:55–13:00की मलाहो के लिए नदी हमेशा एक रहेस स्या और अनिष्चित्ता होती है,
  183. 13:00–13:06लेकिन गांगो का नाम उस अनिष्चित्ता के भीच एक मानविय स्तिरता कप्रतीक बन गया.
  184. 13:06–13:08अग, और सामुहिक सहस कप्रतिक भी
  185. 13:08–13:13बलकुल, ये इस अव्दारना को मस्वूथ करने का केवल एक तरीका है
  186. 13:13–13:18ये सपष्ट करता है कि गांगो का नाम अप सरफ एक व्यक्ती का नाम नहीं
  187. 13:18–13:23बलकी एक पूरे समुदाय के लचीले पन और आशा कप्रमाड है
  188. 13:23–13:25ये द्रिष्टिकोर बहुती गेरा है
  189. 13:25–13:27यानी ये सर्फ मच्री पकडने की एक तकनीक
  190. 13:27–13:29या तोटके के बारे में नहीं?
  191. 13:29–13:30एक दम नहीं
  192. 13:30–13:33ये क्रूर और अप्रत्याशिद दुन्या में
  193. 13:33–13:35मान्विय प्रेम के एक प्रतिक के रूप में
  194. 13:35–13:36तिके रहने के बारे में है
  195. 13:36–13:42अंके सकते हैं कि जब जाल फेखने से पहले गांगो बुधुदाते हैं, तो वि सरफ मचली नहीं मांगरे होते हैं.
  196. 13:42–14:12आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आ� आ� आप आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� �
  197. 14:12–14:42बबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबब�
  198. 14:42–14:46ताकि ये जादूई गटना असीम प्रेम का ही एक तारकिक विस्तार लगे.
  199. 14:46–14:57अदुस्रा कहानी की ग्रामीण भाशा और आमुर्द जायमेटीय चित्रों के भीच रूपकों का सुख्ष्म उप्योग करके एक मस्बूत द्रुष्ष्पाट्ः सामन्जः सिस्थापित करना है.
  200. 14:57–15:09अद़्ाउ अर अंद्ट में मला समवदाई के प्रक्रती से जुडाव और अनेश्चित्ताए को दर्षाते हुए इस परमपरागे व्यापक सामाजिक महत्व को सपष्ट करना है.
  201. 15:09–15:14बलक्ल, जिस से यह मात्र अंद्विश्वास न लगकर आशा का प्रतीक लगे.
  202. 15:14–15:21इंटोस और रचनात्मक सुदारों को लागू करके इस लोग कता के प्रभाव को अट्यंत शशक्ट बनाया जासकता है.
  203. 15:21–15:26हम लेखक को आमन्त्रित करते हैं कि वे इन बडलावो को अपनी रचना में शामिल करने के बाद,
  204. 15:26–15:30अपनी सामगरी को आगे की चर्चा के लिए हमें ज़ोर पुनहा बहेजें

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अज हम गजेंद्र ताकूर की कता गांगो देविक भगत पर चर्चा कर रहे हैं, जो एक मलाहा के प्रेम और चमतकार से जुडी एक स्थानिय परमपरा की कहानी हैं. और सीदे फीटबैक पर आएं, तो इस कहानी में प्रेम के अलोकिक शकती में बडलने का विषेत हो है, पर नायक का अंतरिक द्वंद मुझे पुरी तरा से चिपा हूँ आ लगा. बिल्कुल, और इसी लिये लोग कता के केंद्र में जो मानवी अ प्रेम है, तो तो तो तो बज़ागा बदागा बदागा बदागा बदागा बदागा बदागा बदागा बदागा बदागा बदागा बदागा बदागा बदागा बदागा बदागा बदागा बदागा बदागा बदागा बदागा बदागा बदागा बदागा बदागा बदागा � वो नदी में अपना जाल बार बार पखता है. जिसे कहानी में सरीया कहा गया है. आप सरीया. तो वो जाल पखता है, लेकिन उसके हाथ सर्फ दोका और सीपूव. यानी गोंगे और सीप ही लगते है. इस पूरी प्रक्रिया मैं मलाह के उस खाली पन अदर का चित्रन बेहद सता ही रहे गया है नहीं, मतलब विवष्ता जो उसे अंदर से खारही है, वो उबरकर नहीं आती. बिल्कुल, चमतकार गधित होने से टीक पहले के खषनो में, उस पती की मान्सिक स्तिती को अदेक गेराई से उकेरा जाना जाहीं. ताकि ये गधना केवल एक अचानाक हूँः चमतकार नलगकर असी मानविये प्रेम की पराकाष्टा का एक स्वाभाविक परनाम लगे. लेकिन यहाए एक चुनोती है. हम नायक के मनो विग्यान की इतनी गेरी कुदाई कैसे करेए वो बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बगादा बग भी ब्हावनात्मक गेराई लाना पूरी तरह से समबव है और इसका उपाए लंभे विव्रनात्मक पाराग्राफो में नहीं बलकी सकीख और चुनिन्दा बिम्वों के उप्योग में चिपा है अच्छा तो आप दिश्षों की बात कर रही हैं आप जब हम केवल ये लिखते हैं कि वह निराश था तो ये पाटख को उस निराशा को महसुस करने का कोई रास्ता नहीं देटा इसके बजाए कहानी में उस शवड का वरनन किया जा सकता है जहाववः शान्त अंदेरी नदी के पानी में अपनी पतनी की उमीद भरी आखों की कलपना करता है औरे वाए ये बहुज शकती शाली है या फिर उसकी खाली हाथेलियों की तुलना नदी की निश्थोर शुन्निता से की जासकती है ये इस समस्या को सुल्जाने के कई समबावित तरीको मैं से केवल एक विचार है. लेक्हक को बस कुछ आईसे वाग के पिरोने है, जो पाट्हक को उस हताशा की गेराई में दھखेल दे. तीक उसक शन से पहले जब चमतकार होता है. वह दिख पार रहा हूं कि ये तरीका कैसे काम करेगा? हम एक आमुरत भावना को एक द्रष्ष अनबहुती के साथ जोड रहे हैं एक दम सही! मतलब सूरज दल रहा है, जाल खाली है, और सावन का मेला करीब है ये किवल मचली ना मिलने का आर्थिक संकत नहीं है ये एक प्रेमी की विपलता है. बिलकोल. यही तो मुख्यबात है. क्या हम यहा उस शारीरिक � thakaan को भी उसकी मानसिक पीडा के साथ जोर सकते है? उम जैसे जाल खीच्ते खीच्ते उसकी उंग्लियो में जो खरोचे आईईईईईई वे उस दर्ट से कम है. अद़्ाउब बाद्खार का अस्टी नियन्त्रन से बाहर है। तब ही तो चमत्वार की जुरूत मैहसुस होगी। बिल्कुल जब वो हताश होकर कहता है, के य अन्तिम बेर, ची, गांगो, ख्षमा करव, कहता है कि इ अंतिम भेर, ची, गांगो, खषमा करब, तो इसके पीचे एक बहुत बडी मनोवेग्यानिक, हार चिपी होनी जाहीए. अगर लेखख इस समवाद से टीक पहले नायक को नदी के, विषाल, काले होते विस्तार, अपनी चोटी सी नाव के बाथक को ये महसुस होना चाहीए कि नदी ने आज तैकर लिया है कि वो उस मलाह के प्रेम की परिक्षा लेगी सच्मुच यह द्रिष्य को पुरी तरहा बदल दिता है पाथक को यह अहसाज होना चाहीए कि नायक का अस्तित वही तच्छ्मुच यह द्रिष्य को पुरी तरा बडल दिता है, पाटक को यह अहसास हूना चाहीए, कि नायक का अस्तित वही उस अन्तिम जाल के साथ जुडा हूए है. बिलकुल. आचा जब हम द्रिष्यो और अनुब वुत्यो की बात कर ही रहे है, तो मुझे ये सामगरी के एक और पहलु ने पहडूल जा दिया है. वो क्या? कहानी का जो परीवेश है, वो पुरी ट्रान से ग्रामीन अड्ठेट है. मिट्टी के गर, सावन का मेला, डोका सिपूवा. लिकिन स्रोट सामगरी में जो चित्र दिये गे है, वे अथ्ते दिक आदूनिक और आमुर्थ है. राद, मैंने वी द्यान दिया. मतलब पुर्न त्रिकोडों से बनी मानव अक्रितिया, बहुभुज और जामितिये मच्लिया. मुछ श्रूवात में लगा की शाएद लेखक ने जान भूजकर ये विरोदा बास रखच रखचा है. ये दिखाने के लिए कि लोक कता आदूनिक समय में भी प्रासंगेक है. अदर बादख बादख बादख बादख बादख बादख बादख बादख बादख बादख बादख बादख बादख बादख बादख बादख बादख बादख बादख बादख बादख बादख बादख बादख बादख बादख बादख बादख बादख बादख बादख � इक तरव दिहाती शबद हैं और दुसरी तरव जामिती आप जब वो थेट ग्रामीः शबडों को पडटा है तो उसके दिमाग में एक यतार्थवादी चित्र बनता है लेकें उसकी आखे प्रष्ट पर जो आमुर्थ कला देख रही होती है वो उस मान्सिक चित्र से सीदे तोर पटक राती हैं और इस से पाटक की तलींता तूर जाती हैं तो क्या उने चित्र हटा देने चाहीं? नहीं, चित्रों को बड़लने के बजाए मेरा सुजाव ये है कि लेखग को अपनी कहानी के विवरनात्मक हिस्सो में आँईईग़ाँ बाशा को ही चित्रों के साचे में दालने की कोशिष नहीं कर रहे हैं? आपका मतलब है कि ये थोपा हूँआ लगेगा? आपका मतलब ये कुछ वैसा ही है जैसे आप किसी बहुत्ही पारंपरिक देहाती गीत को अपका मतलब है कि ये थोपा हुवा लगेगा अपका मतलब है कि ये कुछ वैसा ही है जैसे आप किसी बहुत ही पारंपरिक देहाती गीट को किसी एलेक्ट्रूनिक सिंठेसाइजर पे बजाने कि कोषिष करेएगे अगर एक मलहा की कहानी में यह कुछ वैसा ही है जैसे आप किसी बहुत ही पारमपरिक देहाती गीत को किसी एलेक्ट्रूनेक सिंठेसाइजर पे बजाने की कोशिष करें अगर एक मलाहा की कहानी में त्रिकोन यह बहुबुच जैसे शब्डो का इस्तिमाल किया जाए तो क्या वो बहुत जादा क्रूत्रिम या शेहरी नी हो जायगा? देकिए ये जोखिम तब उत्पन होता है, जब आप यं जामितिया शब्दों को गडनतिया शब्दावली की तरह थोबते है. हमें इने एक विग्यान की किताप की तरा प्रेुग नहीं करना है. तो फिर कैसे? उनहें द्रिश्चे रूपोको की तरहाप पिरोना है तो सुदार के तोर पर जाल फेखने की उस सादारन क्रिया को हम एक द्रिश्चे रूपक दे सकते है लेकख लिक सकते है की जब उसने अपना जाल हवा में उचाला तो शान्त नदी की चाती पर अंगिनत रिकोन बनने लगे. और वाज, यह तो बहत काव्यात्मक है? या फिर गांगो और उसके पती के प्रेम को एक अटूट व्रित के रूप में वरनित किया जासकता है. मच्लियों के जुंद के पानी में तेर्मे को आख्रतियों के एक जीवन्त खेल के रुप में दर्षाया जा सकता है. जो आप दे बाशा इप बिम्बों अर आमुर्द कला के बीच एक बाशाई पुल बनाया जा सकता है. लेखख अपनी शेली के अनुसार इन शब्डो को डाल सकते है अच्छा तो ये अवचेतन स्थर्टर पाटख को तगयार करने की प्रक्रिया है मतलब जब पाटख पाट्ख में व्रित या लेहरों के त्रिकोंग जैसे शब्ध पडगेगा अर फिर पन्ने के किनारे बने उन उमुर्थ त्रिकोनो को देखेगा तो उसे लगेगा कि ये चित्रकारी इसी कहानी के आत्मा से निकली है. बलकुल ये बहुत ही सूश्मत तरीका है. लेकिन इस प्रक्रिया में मस्तिष्क वास्तव में कैसे काम करता है. यह पाटख को उस द्रिष्च जटके से कैसे बचाटा है? असल में मानव मस्तिश क हमेशा निरन्तर ता और पातन की तलाश में रहता है. जब हम कोई कहनी पडते है, तो हम केवर शब्दों को ग्रहन नहीं कर रहे होते. अदर बाद़ख बाद़ख बाद़ार बाद़ार बाद़ार बाद़ख बाद़ार बाद़ार बाद़ार बाद़ार बाद़ार बाद़ार बाद़ार बाद़ार बाद़ार बाद़ार बाद़ार बाद़ार बाद़ार बाद़ार बाद़ार बाद़ार बाद़ार बलकी वे गेरी सार्वबहूमिक जामिती का हिस्चा है जब पाथ हो चित्र एक ही बाशा बोलने लकते है तो पाथख का अनुबहाव क्हन्टित नहीं होता बलकी वो कहानी में पूरी तरज समाहित हो जाता है ये वाकखई कहानी के सुन्दर ये शास्तर को बलकी वो कहानी में पुरी तरज समाहित हो जाता है ये वाकगी कहानी के सुन्दर्ये शास्तर को एक अलगी स्तर पर लेजाएगा ये एक सादारन कषेत्री एक कता को एक वैश्विक कलात्मक अनुबहव में बड़ल सकता है बलकोल अब जब हम कता के व्यापक अर्ठों की बात करी रहे हैं, तो मुझे कहानी के अंतिम हिस्से की अराना है. अग, निशकर्ष्वाला बहाग. अद्र बवाद्बाग अद्र बवाद्बाग अद्बाद्बाद अद्बाद बादबाद अद्बाद बाद बाद बाद बाद बाद अद्बाद बाद बाद बाद बाद बाद बाद अगर बाद्धख इसे एक जहन्ज समाजिक परवर्टन मानने के बजाए महज एक स्थानिय अंदविश्वास नहीं लेगा एक विक्तिगध प्रेम कत्धा के समपून समुडाए की आस्थाः में बडलने की प्रक्रिया को तब इस कता का अन्तिम प्रभाव सशक्त होगा मदल अप इसे बड़े परी प्रेखष में देखना होगा हाँ कहानी में यस पश्ट रूब से अप ले सक्ता है क्या पाथक इसे एक गें सामाजिक परिवर्टन मानने के बजाए विक व्यक्तिगत प्रेम कत्ठा के समपुरन समुदाए की आस्था में बडलने की प्रक्रिया को व्यापक सामाजेक और पारिस्तितिक संदर्बों से जोडना होगा तब ही इस कत्ठा का अन्तिम प्रभाव सशक्ट होगा अग, मदला, इसे बड़े परी प्रेखष में देखना होगा. अग, कहानी में यस शपष्ट रूब से एक कमजोरी है, के ये निशकर्ष बहुत ही अचानक सामने आता है. ये बिलकुल भी शपष्ट नहीं होता, अज़ और प्रक्रती की अनिष्चित्ता पर निरभ़ रहने वाले एक वाशीए के समुदाये ने एक सादारन महला के प्रेम को अपनी सामूहिकता कप्रती कैसे मान लिया? रहा यहा कहानी का वो सो वोट यहनी ब्रहदर्त कमजोर पर जाता है. बिल्कुल, समापन को अदिक वजन्दार बनाने किलिए, मलाह समुदाय के प्रक्रिती के साथ रिष्ते, और उनके रोज मरहा के संगर्ष पर एक संख्षिप्त तिप्पनी जोडी जानी जाहीए. ताकि ये सपष्ट हो, कि ये केवल एक अंद विष्वास नहीं है. बलकी एक समवदाए दवारा प्रेम और उमीद को संस्तागत रूप देने का तरीका है अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अ� देखे ये कोई व्याख्यान नहीं है, बलकी ये उस व्यक्तिगत रोमानियत को आमर बनाने का तरीका है. अच्छा वो कैसे? चमतकार तब तक सरफ एक चमतकार है जब तक वो एक व्यक्ती तक्सीमित है. लेकिन जब हम दिखाते हैं कि क्यो एक पूरा समुदाय उस चमतकार को अपना लेता है, तो हम उस प्रेम को एक विशाल एतियासे कैनवास दे रहे हैं. आप ये बात तो है. मलाहो का जीवन अत्यदेक अनिष्चित होता है. उनके पास कोई तैस्वरक्षा नहीं होती, वे एक अप्रत्याशित नदी के बरोसे जीते है, जम दुन्या इतनी अनिष्चित होती है, तो मनुश्व आस्था के लंगर तलाषता है. बलकुल, उने कुछ तो यह जाहीए, जिस पर वो विश्वास कर सकें. अदारन के तोर पर निशकरष में ये विचार जोडा जा सकता है, की मलाहो के लिए नदी हमेशा एक रहेस स्या और अनिष्चित्ता होती है, लेकिन गांगो का नाम उस अनिष्चित्ता के भीच एक मानविय स्तिरता कप्रतीक बन गया. अग, और सामुहिक सहस कप्रतिक भी बलकुल, ये इस अव्दारना को मस्वूथ करने का केवल एक तरीका है ये सपष्ट करता है कि गांगो का नाम अप सरफ एक व्यक्ती का नाम नहीं बलकी एक पूरे समुदाय के लचीले पन और आशा कप्रमाड है ये द्रिष्टिकोर बहुती गेरा है यानी ये सर्फ मच्री पकडने की एक तकनीक या तोटके के बारे में नहीं? एक दम नहीं ये क्रूर और अप्रत्याशिद दुन्या में मान्विय प्रेम के एक प्रतिक के रूप में तिके रहने के बारे में है अंके सकते हैं कि जब जाल फेखने से पहले गांगो बुधुदाते हैं, तो वि सरफ मचली नहीं मांगरे होते हैं. आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आ� आ� आप आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� � बबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबबब� ताकि ये जादूई गटना असीम प्रेम का ही एक तारकिक विस्तार लगे. अदुस्रा कहानी की ग्रामीण भाशा और आमुर्द जायमेटीय चित्रों के भीच रूपकों का सुख्ष्म उप्योग करके एक मस्बूत द्रुष्ष्पाट्ः सामन्जः सिस्थापित करना है. अद़्ाउ अर अंद्ट में मला समवदाई के प्रक्रती से जुडाव और अनेश्चित्ताए को दर्षाते हुए इस परमपरागे व्यापक सामाजिक महत्व को सपष्ट करना है. बलक्ल, जिस से यह मात्र अंद्विश्वास न लगकर आशा का प्रतीक लगे. इंटोस और रचनात्मक सुदारों को लागू करके इस लोग कता के प्रभाव को अट्यंत शशक्ट बनाया जासकता है. हम लेखक को आमन्त्रित करते हैं कि वे इन बडलावो को अपनी रचना में शामिल करने के बाद, अपनी सामगरी को आगे की चर्चा के लिए हमें ज़ोर पुनहा बहेजें

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