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मूँगा_और_जालिम_सिंह_की_विद्रोही_गाथा.m4a
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- 0:00–0:05सूके पत्तों के देरों पर गिरी एक मामूली सी चंगारी पूरे जंगल को राग कर सकती है.
- 0:05–0:09बलकोल. और एतिहास में तो एसी कई चंगारिया देखने को मिलती है?
- 0:09–0:10सही कहा
- 0:10–0:15अकसध जब हम इतिहास के पननो को पलड़ते हैं तो अईसा लगता है कि बड़ी करानतिया और बड़ाओ
- 0:15–0:17सिर्फ युध्द के मैधानो में
- 0:17–0:20या या राज महलों के बंद कमरो में ही लिखे जाते हैं
- 0:20–0:23हम, लेकिन सच हमेशा एसा नहीं होता
- 0:23–0:24एक दम
- 0:24–0:27और आजके हमारे जेहन विषलेशन का दार
- 0:27–0:27एक आजके हमारे जेहन विषलेशन का आदार
- 0:27–0:28एक आजके ही चिंगारी है
- 0:28–0:31जाहां एक बड़ा एहतिहासिक बड़ाव
- 0:31–0:34अग यख कुए पर पानी पीने किलिए रुकने से
- 0:34–0:35शिरू हो जाता है
- 0:35–0:37जो की अपने आप में बहुती दिल्चास पात है.
- 0:37–0:38आप.
- 0:38–0:40तो इस बार हम गजंद्रिट भागुर द्वार रचित
- 0:41–0:43मूंगा आजालिम सिंकी गाता पर चर्चा कर रहें
- 0:43–0:45जो दो हाँजार चब्भीस में
- 0:45–0:47विदे हे पत्रिका में प्रकाषित हुई ती.
- 0:47–0:50ये बेत्या राज के यहतिहास की एक आजी लोग कता है,
- 0:50–0:53जाह सत्ता, कत्हुर जाती विवस्ता,
- 0:53–0:55और दर्बार के गेरे कुचक्रों को,
- 0:55–0:59मडलब एक नितान्त व्यक्तिगत और मानिविए भावनाने चुनाती दी.
- 0:59–1:01और वो बावना के ही प्रेम के.
- 1:01–1:02बलकुल.
- 1:02–1:05हमारा मिशनाज सरफ एक प्रें कहानी सुनाना नहीं है
- 1:05–1:09हमारा उदेश्व उस समय के समाज सत्ता के केल
- 1:09–1:11और अनसानियत के उस जस्बे को समजना है
- 1:11–1:14जो सदियों पुरानी रूडियों को तोर देता है.
- 1:14–1:16क्योंकी भेतिया राज का वो दोर
- 1:16–1:21जिसकी ये स्रोट समगरी बात कर रहे है, अब आपने आप में बहुत जटल था.
- 1:21–1:23वो 18 वी 19 सदी के आस्पास का समे ता, अग?
- 1:23–1:27जी भिल्कुल. हम उस समनती दाजे की बात कर रहे है,
- 1:27–1:31जहां जाती और क�ल की दिवारे ही अई अपने प्चान तै करती थी.
- 1:31–1:37इस कता की केंदर में जो दो लोग है, मतलव उनका मिलना किसी समाजिक भूकम से कम नहीं ता.
- 1:37–1:38एक तरफ हैं जालिम सिंग.
- 1:38–1:45आजो भेतिया राजक के एक बेहत सम्मानेद शक्तिषाली और खुंकार माने जाने वाले राजपुट सिपाई सरदार है.
- 1:45–1:47अर दूस्री तरव मुंगा है
- 1:47–1:49जी, मुंगा जो दूदबन्सी
- 1:49–1:52यानी दूसाद समवदाए के एक सादारन युड़ी है
- 1:52–1:55उस समाज में इन दो अलग गल द्रूवों के भीच
- 1:55–1:59किसी बी तरहें के विक्तिगद समबंद की कलपना करना भी
- 1:59–2:02अज़्ीदे तोर पर राजशाही और समाजिक वेवस्था को चुनाउती देना था
- 2:02–2:04तो अगर हम इस कहानी की शुर्वाद देखें
- 2:04–2:07तो ये किसी दरबार या यूध्ध के मेडान से नहीं
- 2:07–2:09बलकी गाँँके एक सादारन से कोे से हुती है
- 2:09–2:14उस्बहा असल में आँसा क्या हूँ अथा जिसने इतनी बडी सामाजी कुतल पूतल मचादी
- 2:14–2:17दिक्ये गठना देखने में बहुत सादारन ती
- 2:17–2:20बेत्या राज की सीमा के भीतर गावो का कुवा ता
- 2:20–2:22जहां औरतें पानी बहिर रही थी
- 2:22–2:24और मुंगा भी बही थी
- 2:24–2:26रोज मरला का का खाम चल राता?
- 2:26–2:27बलकोल!
- 2:27–2:30तब ही जालिम सिंग वहां से गुजरते हैं.
- 2:30–2:34स्रोथ बताता है कि जालिम सिंग का रूट्बा एसा था के
- 2:34–2:38मडल उनके गोडे की ताप सूंकर इलोग दरकर रास्ता चोर देते है.
- 2:38–2:39खोफ ता उनका?
- 2:39–2:40बहुत जाडा.
- 2:40–2:43उसे पाही सर्दार पानी पीने के ले वहार रुकते
- 2:43–2:46और और उनकी नजर मुंगा पर पडती है
- 2:46–2:51मुंगा लाज से और उस खोफनाक सर्दार के दर से वहां से बाग जाती है
- 2:51–2:52स्वाभाबिक है?
- 2:52–2:56रहा, लेकिन वो एक शन वो पहली नजर
- 2:56–3:00जालिम सिंके मन में एक उमिट चाप चोड़ाती है
- 3:00–3:01चलिये इसे विस्तार से समझतें
- 3:01–3:03मुंगा का दरकर बागना समजाता है
- 3:03–3:05वो एक ताकत्वर राजपुट सर्दार था
- 3:05–3:08लिकिन ये तो एक नितानत वेक्तिगष्शन ताना
- 3:08–3:09एक दंब वेक्तिगष्ट
- 3:09–3:12एक आद्मी ने एक अरत को देखा और वो बाग गगगेई
- 3:12–3:14बात यही खटम हो जानी चाही थी
- 3:15–3:17फिर ये एक राजनीतिग बवंडर कैसे बन गया
- 3:17–3:20ये तो मुझे बलकोल आजके जमाने की
- 3:20–3:21दफ्तरों वाली राजनी ती
- 3:21–3:22या प�लितिक जैसा लग रहे है
- 3:22–3:24अप सही दिशा में सोच रहे हैं
- 3:24–3:28जगा आप की किसी चोटी सी बात को आपके खलाफ अथ्यार बना लिया जाता है
- 3:28–3:30और दरबारों की राजनी ती तो
- 3:30–3:34किसी आदूनिक दफ्तर की राजनी ती से भी कही जाड़ा खतरनाक होती थी
- 3:34–3:36कुकि वहां जान का खतरा होता था
- 3:36–3:39बिल्कुल, वहा दाव पर नाकरी नहीं बलकी जिन्दिगी होती थी
- 3:40–3:44इस व्यक्तिगत कषन को बवंडर बनाने वाला व्यक्ती था प्रिठ्वीपाल सिंग
- 3:44–3:48वुराजा का कान बहरने वाला, एक मुल्लग्गु और चापलूज दर्बारी था
- 3:48–3:50तो आप दर बार में असे एक विक्ती होता ये?
- 3:50–3:54आप, लेकिन प्रिट्वी पाल की आस्ली समस्या कभी मुंगा थी ही नहीं.
- 3:54–3:58मुगा तो सर्फ एक मोहरा थी, जिसका उसने स्तिमाल किया.
- 3:58–4:00तो आस्ली वजग क्या थी? जलीद्म की ताकत?
- 4:00–4:04इग्दम सई प्रिद्पीपाल की आख में जो चीस चुब रही थी
- 4:04–4:10वो ता जालिम सिंका बडद्टा हुए यष, सर्दार का पड, और सेना के भीच उनका अपार सम्मन.
- 4:10–4:13तो सत्ता के गल्यारूं का एक सीदा सान्यम है,
- 4:13–4:17जब आप किसी के काम या उसकी युध्द कोशल पर वार नहीं कर बाते,
- 4:17–4:20तो आप उसके चरित्र और उसके वेक्तिक जीवन को राजनितिख हत्यार बना लितें.
- 4:20–4:22यही प्रिट्फीपाल ने किया,
- 4:22–4:27उस्ने राजा के सामने मुंगा और जालिम सिंकी जूटी कहानिया गरनी शुरू कर दीं
- 4:27–4:29ताकि जालिम की चवी खराब हो सके.
- 4:29–4:32लेकिन बाज स्रफ अफवावो तक तो नहीं रूकी थीना
- 4:32–4:35मैंने स्रोथ सामगरी में पडाया की एक हिंसक हमले का भी जिकर है.
- 4:35–5:05आप आप आई प्यलाने के बाद प्रिद्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट
- 5:05–5:08उगुन्डो ले जालिम पर गात लगा कर हम्ला किया
- 5:08–5:10तो पट्टू अकेले ही उन सब बहारी पडा
- 5:11–5:11औरे बाग
- 5:11–5:17उसने एक एक कर के प्रिथ्विपाल के सभी बाडे के हत्यारों को मुद्त के गात उतार दिया
- 5:17–5:20इक मल्ला का एक राजपूट सर्दार किलिए स्वान की बासी लगा देना
- 5:20–5:23मल्ला ब ये दिखाता है कि उस दोर मे भी कुछ रिष्ते
- 5:23–5:25जाती कि उस कठोर पिंजरे से बहार सांस ले रे दें
- 5:25–5:28मिल्कुल और यह यह यह इस कहानी की सब से खुबसुरत बात है
- 5:28–5:58लेकिन प्रिष्पाल के गुन्डो के मारे जाने के बाद, तो उसका आप्विश्वाद और भी आहत हूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ
- 5:58–6:03अग, बेत्या के उस इलाके में मौनी बाबा का प्रबाव इतना था,
- 6:03–6:06कि उनकी बात राजा भी नहीं तालते थे.
- 6:06–6:07जचा.
- 6:07–6:07जी.
- 6:08–6:10जालिम ने जाकर अपनी पूरी स्तिती,
- 6:10–6:15अपना प्रेम और दरबार का शव्ट्र बाबा के सामने रखा.
- 6:15–6:21बाबाने सब कुछ शान्ती सुना, और अपने मून को तोड़ते होगे सुब दो शबत कहे.
- 6:21–6:22या कहा उनोने?
- 6:22–6:25उनोने कहा, मुंगा कषंट चोर दे.
- 6:25–6:27ये एक महतपूँन सवाल कष्टा है.
- 6:27–6:29मडलब क्या मुनी बाबा वास्ता में,
- 6:29–6:31जालिम के प्रेम के खलाथ है?
- 6:31–6:35या क्या आईसा हुसकता है कि वो इतनी सिद और ताकत्वर होतेवे भी,
- 6:35–6:37दर्बार और राजा के क्रोथ से दर गयतें?
- 6:38–6:44इसे दर नहीं, बलकि उस योग के यतार्त की गेरी समज कहना ज्यादा सही होगा.
- 6:44–6:44वो कैसे?
- 6:44–6:49मौनी बाबा कोई सादारन व्यक्ती नहीं ते, वे समाज की नब्स पहचानते थे.
- 6:50–6:59वे जानते थे, के एक राजपूट सर्दार और दूसाद कन्या के मिलन को राज दर्बार और समाज कभी सुईकार नहीं करेगा.
- 6:59–7:01मदब उने आगे का खत्रा दिक्रा था?
- 7:01–7:09बिल्कुल, बाबा को यह सपष्ट दिक्रहा था, कि इस रस्ते के अन्त में केवल मुत, विनाश और कुन खराबा है.
- 7:09–7:12वो जालिम को उस भ्यंकर कीमथ से बचाना चाहते थे.
- 7:12–7:19उनका वो आदेश दर्म और समाज के निमो के चच्मे से दिया गया एक विवावारित फैसला था.
- 7:19–7:22लेकिन जालिम कर याकशिन यहा रोंटे कड़े कर देने वाला है.
- 7:22–7:22जी.
- 7:22–7:27स्रोथ के अनुसार उसने बाभा की बाद सुनकर नतो हा कहा और नहीं ना.
- 7:27–7:28वो खामोश रहा.
- 7:42–7:44ब्रेम इतना गज्रा था कि...
- 7:44–7:47ता उसका दिल उसे ये मानने नी देरा था कि वो मुंगा को चोर दे.
- 7:47–7:50जालिम कि वो खमोषी दर असल उसकी सबसे बड़ी बगावत थी.
- 7:50–7:53और जब जालिम इस उदिदवून मे था
- 7:53–7:56तब ही प्रिठ्वी पालने अपनी अगली चाल चली.
- 7:56–7:59उसे समज आग आग आ दागा अगा की जालिम तक पहुचने किलिए,
- 7:59–8:01पहले उसकी दाल को तोरना होगा.
- 8:01–8:02और वो दाल पत्तू था.
- 8:02–8:03इक्दम सही.
- 8:03–8:07इस बार प्रिठ्ट्पी पाल ने सीदे पत्तू पर एक बडा हम्ला किया.
- 8:07–8:09और यहा पत्तू ने जो किया,
- 8:09–8:13वो बारती लोग कताव के सब से शक्तिषाली द्रिष्षो में सेग है
- 8:13–8:15बिल्गुल, वो द्रिष्छ बहुत देबूद है.
- 8:15–8:17एक मल्ला जो निषले तबके से आता है,
- 8:17–8:19उसने भवानी माता की शपत ली,
- 8:19–8:21और एक दरम्युद लड़ने निकल पडा.
- 8:21–8:24जो की उस समय अखल्पनी आता.
- 8:24–8:27आप, उस समय के समाज में देवी की एसी शपत लेना
- 8:27–8:29अप दर्मियद्द की गूशना करना
- 8:29–8:33आम तोर पर उच्छ जात्यों का विशेशा दिकार मना जाता था
- 8:33–8:36पट्टू का ये कदम ही उस समाज की मानिताव पर एक बडा प्रहार था
- 8:36–8:39पट्टू जानता था के वो स्वर्फ अपने दोस्त को नहीं
- 8:39–8:41बलकी एक सच्चाई को बचारा है
- 8:41–8:43और उसने अपनी जानके परवानी की?
- 8:43–8:46बलकुल नहीं, उस भयानक संगर्ष में
- 8:46–8:48पट्ट्टू ने अपनी पूरी ताकच जोग दी
- 8:48–8:51उसने उस विष्वाज गाती प्रिट्ट्टी पाल को तुमार गीराया
- 8:51–8:53जिसनी ये सारा कुच्चक्र रचा था
- 8:53–8:54वो मारा गया
- 8:54–8:56आप प्रिट्वी पाल मारा गया
- 8:56–9:00लेकिन प्रिट्वी पाल के गुन्डों की एक बहुत बजी भील ने
- 9:00–9:02अंत तब पत्टू को गेर लिया
- 9:02–9:04पत्टू ने अपने स्वामी
- 9:04–9:06अपने डोस्त के नाम पर
- 9:06–9:10बट्टू का ये बलीदान किसी को भी भीटर तक जगजोर सकता है
- 9:11–9:13जालिम ने अपना सबसे अजीस दोस्त को दिया
- 9:13–9:15एक बहुत बडा अगात ता उसके लिए
- 9:16–9:18लेकिन त्रास्दी की हद देखिये
- 9:18–9:21जालिम को अपने दोस्त का शोक मनाने तक की महलत नहीं
- 9:21–9:25अद देखिये, जालिम कोपने दोस्त का शोक मनाने तक की महलत नहीं मिली
- 9:25–9:29योंकि प्रिथ्विपाल के मरने के बात भी कुचक्र रुका नहीं
- 9:29–9:32या तो जालिम के जड़े बहुत गेरी ती
- 9:32–9:37एक और भ्यानक खबर जालिन तक पूझची, जिसने उसे सीदे मुत के मुहाने पर ख़ा कर दिया.
- 9:37–9:40वो खबर थी मुंगा के गायब होने की.
- 9:40–9:44मुंगा को बेतिया के गने और खफनाक जंगल में बेज दिया गया था.
- 9:45–9:46राजा क्या देश पर?
- 9:46–9:53स्रोट ये स्पष नहीं करता की इस साजच के पीछे सीदे तोर पर राजा का हाथ ता या दरबार के अन्ने लोगों का.
- 9:53–9:58लेकिन ये देट आ, कि मुंगा को हमेशा के लिए रास्ते से हटाने की तयारी हो चुकी ती.
- 9:58–10:01उसे वन देवी की बली च़ाने किली बेज़ा गया थाना
- 10:01–10:01जी
- 10:01–10:03उसे कनवा के चंगल में सोम दिया गया था
- 10:03–10:07और यही पर कहानी एक दाक फांतिसी
- 10:07–10:10या किसी महाक काविय जैसी लगने लकती है
- 10:10–10:13हा खन्वा का चरित्र ही कुछ है जा है
- 10:13–10:16ये कनौवा कोई आम अन्सान नहीं ता
- 10:16–10:18स्रोथ में बताया गया है
- 10:18–10:20कि वो मुंगा की भोजी का भाई ता
- 10:20–10:23और एक विशाल, खुंकार तुसाध � thā
- 10:23–10:26उसका वनन सुनकर ही तर लकता है
- 10:26–10:28जरा उसकी खॉराक के बारे में सुचीए
- 10:28–10:30स्रोथ कैता है
- 10:30–10:32कि वो सवा मन दूद
- 10:32–10:34अर एक पूरी रस्सी पीता और खाता था
- 10:34–10:35सवा मन
- 10:35–10:36बहुत जाड़ होता है
- 10:36–10:38मतलब आजके साब से लगबबख
- 10:38–10:39पचास लीटर दूद
- 10:39–10:42एक अग़ अग़ ताग़ रोस पचास लीटर दूद पीता हो
- 10:42–10:44उसका शरीर कैसा होगा
- 10:44–10:45आँ...
- 10:45–10:46ये सुचकर इस यहरन होती है
- 10:46–10:49और स्रिव शरीर ही नहीं, उसकी सवारी भी देखिये.
- 10:49–10:50हा.
- 10:50–10:53कोई गोडा या बैल नहीं, बलके एक एसा बहेंसा था,
- 10:53–10:56जिसका इस्तमाल बाग के शिकार के लिए होता था.
- 10:56–10:57बाग का शिकार?
- 10:57–10:59बाग के शिकार वाला बहेंसा.
- 10:59–11:29अद्रीवाग नादा पर प्रदाग नादा नादा प्रदाग नादा नादा नादा नादा नादा नादा नादा नादा नादा नादा नादा नादा नादा नादा नादा नादा नादा नादा नादा नादा नादा नादा नादा नादा नादा नादा नादा नादा ना�
- 11:29–11:30कैसे?
- 11:30–11:32देखे अगर कोई आम सबही होता
- 11:32–11:34या गुस्से में पागल कोई प्रेमी होता
- 11:34–11:37तो वो सीदे अपनी तलवार लेकर कनूवापर जपपट परता
- 11:37–11:39जो की बहुत बेवकुफी भराकडम होता
- 11:39–11:40येलकुल
- 11:40–11:42लेकिन जाले में बहतरीन रननीति कार था
- 11:42–11:46ये कमाँडर था उसने सीदे कनूवा पर वार नें किया
- 11:46–11:49उसने अपने बाले से उस बाकशिकारी भहसे पर
- 11:49–11:50एक अचुक वार किया
- 11:50–11:51भहसे पर
- 11:51–11:55अगर अम इसे सामरेक द्रिष्टिकोन या रनीती के नजरीये से देख हैं
- 11:55–12:00यह किसी युध्ड में दिश्मन की ताकत और उसकी गती शीलता को सब से पहले खटम करना है
- 12:00–12:02वह दी चालाकी बहरा कदम
- 12:02–12:05जैसे आजके आदूनिक युध्ड में आप सीधे कमाड़र पर गोली चलाने से पहले
- 12:05–12:07उसके तांकी पट्रीों कोग़ा देते हैं
- 12:07–12:08तकि वो अपाहीज होजाई
- 12:08–12:12ये साम्रिक बुद्धिमत्ता का एक उत्क्रिष्ट उदारन है
- 12:12–12:15लिकिन इसका मनोवेग्यानी कसर और भी गेरा था
- 12:15–12:16वो कैसे
- 12:16–12:17देखे
- 12:17–12:19वहेसा स्थ इक जानवर नहीं ता
- 12:19–12:26वो कनुवा के कहोफ, उसकी अजे अचवी और उसके रूटभे का जीता जागता प्रतीक ता.
- 12:26–12:28आप एक तरशे उसकी पहचान ता?
- 12:28–12:33बलकुल जैसे ही जालिम के बाले ने उस भहसे को जमीन पर गिराया,
- 12:33–12:38कनुवा के आदी मानसे को शाररे एक शकती वही दधराशाई होगए.
- 12:38–12:39उसका गुरूर तूटगया.
- 12:39–12:41एक दम उसका गुरूर तूटगया.
- 12:42–12:46एक पैडल होचुके मनोवैग्यानेक रूप से तूटगया कनुवा
- 12:46–12:53अगर जालिम शिंके बीच जो युद हुए उस में जालिम के क्रोद और प्रेम ने उसे आजेया बना दिया.
- 12:53–12:55जालिम ने कनूवा का वद कर दिया.
- 12:55–12:57अगर तब आद कर दिया
- 12:57–12:59और कन्वा को मारने के टीक बाद
- 12:59–13:01उसी जंगल में उस खफना वाद कि साये के भीच
- 13:01–13:03कहानी का सब से विद्द्रो ही पलाता है
- 13:03–13:05जी, वो पल जो इतिहाज बन गया
- 13:05–13:07जालिम ने वही
- 13:07–13:09उसी खून से सनी जमीन पर
- 13:09–13:39या वी वीवाँदा थी तो वो बवाँदा थी वो बवाँदा थी वो वो बवाँदा थी वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो व
- 13:39–13:45ये तो उस बड़े तूफान से पहले की शान्ती ती जो नका गाँ में अंट़ार कर रहा था
- 13:45–13:50किंकि जब कोई समाच का सबसे बड़ा और पवित्र माना जाने वाला नियम तोरता है
- 13:50–13:54तो आसली युध आपनो से ही लडना परता है
- 13:54–14:00सही बात है, जब जालम मुंगा को लेकर अपने गाँ पूँचाओ और दंके की चोट पे ये गूश्ना की की ये मेरी पतनी है,
- 14:00–14:04तो समाज तो चोडिये उनका अपना परीवार भी जुखने को तेार नहीं था.
- 14:04–14:06परीवार सब से जब जयादा खिलाफ था.
- 14:06–14:12जालिम के अपने सगे भाई, कूर और परवार के अनने लोगोने मिलकर उन दोनो पर जानलेवा हम्ला कर दिया.
- 14:12–14:18अंके रिष्टे से भी जाडा एहमियत अपनी जाती की तथा कथित पवित्रता को दे रहाता.
- 14:18–14:19अपनी भाई को मारने आगया.
- 14:19–14:26आप लिकिन इस गोर अंद्कार और हिन्सा के भीच एक बड़ा अप्वाद सामने आता है.
- 14:26–14:26कोन?
- 14:26–14:33जालिम की माः और जब पूरा परिवार, कुन्बा और समाज जालिम को मारने पर उतारू था,
- 14:33–14:42तब उस माने पित्र सत्ता और जातिवाद की तमाम जनजीरों को तोडगर अपने बेटे और उसकी नहीं भहु का साथ दिया.
- 14:42–14:44ये तो बहुती हिम्मत की बात है.
- 14:44–14:52बिलकुल. मां की वो स्विक्रिती, वो मम्ता इस नहीं गरहस्ती का पहला और सबसे मजबुत आदार बनी.
- 15:03–15:05अपने ही सगे बहाईगी की जान लेने में किसी के हाथ नहीं कापे
- 15:05–15:07इस हमले में जाले में दिनी बूरी तरगाएल गाएल गया की वो जमीन पर गिर पडा
- 15:07–15:09अगर हम इसे व्यापक संदरब में देखें
- 15:09–15:11तो यहां मुंगा की चरित्र में एक अजादलाव आता है
- 15:11–15:41अगर अगर निसे व्यापक संदरभ में देखें तो यहां मुंगा के चरित्र में एक अजाँईगाईगाईगाईगाईगाईगाईगाईगाईगाईगाईगाईगाईगाईगाईगाईगाईगाईगाईगाईगाईगाईगाईगाईगाईगाईगाईगाईगाईगा�
- 15:41–15:43उसे अपने कंदो का सहारा देती है
- 15:43–15:44खुदागी आती है
- 15:44–15:45जी
- 15:45–15:48और अपने गायल पती को लेकर उनके एक दोस्ट
- 15:48–15:50भेरव के गर की और निकल परती है
- 15:50–15:52वो एक रक्षक बन चुकी है
- 15:52–15:54ये सफर आसान नहीं था
- 15:54–15:54बिलकुल नहीं
- 15:54–15:55रस्ता बहुत लंबा था
- 15:55–15:58और जालिम की शालत पल पल बिगर रही थी,
- 15:58–15:59खून तेजी से भेरा था.
- 15:59–16:01जान जाने का खत्रा था.
- 16:01–16:03आ, लेकिन मुंगा राद नहीं मानती.
- 16:03–16:06वू रास्ते में वेद्दे के दवार पर रुकती है.
- 16:06–16:08वेद्दे अपना काम करता है,
- 16:08–16:10जालिम के गामपर लेप लगाता है
- 16:10–16:12लिकन मुंगा रात बर जागगगर
- 16:12–16:14एक दाल कितरा जालिम के स्रहने बैट कर
- 16:14–16:16उसकी रक्षा करती है
- 16:16–16:18बिना पलग जबकाए
- 16:18–16:20जो लगकी कभी एक सिपाही की परचाईसग
- 16:20–16:22अबराजा जाती ती
- 16:22–16:24तो आज समाज और मुत
- 16:24–16:29यही वो बिन्दू है, जहा वेक्तिगत प्रेम एक समाजी क्रान्ती करूप ले लिता है.
- 16:29–16:31यह बहुत बड़ा बडलाव.
- 16:31–16:36वेद्दी की चिकिच्सा और मुंगा की उस अटूट सेवा, उसकी उस असीम समरपन कारन,
- 16:36–16:39जालिम की सासे वापस लोट आती है.
- 16:39–16:39उब भज्जाता है?
- 16:39–16:41अग, उब भज्जाता है.
- 16:41–16:43और जब ये खबर उनके गाँ पूछती है,
- 16:43–16:47तब कहानी अपने अन्तेम और सब से बहुख मोड पर आती है.
- 16:47–16:48जब परिवार वालों को पता चलता है,
- 16:48–16:50कि जलम जीविद बजगया है,
- 16:50–16:53और मुंगाने किस टाल बनकर उसकी जान बचाई एक,
- 16:53–16:55तो एक बड़ाब दिखने को मिलता है.
- 16:55–16:56क्या होतै?
- 16:56–16:59मुंगा के गर्वाले और जालिम के भाई,
- 16:59–17:00मतलव भे सभी लोग,
- 17:00–17:03जो कुछ दिन पहले उने मार डालने पर उतारू थे,
- 17:03–17:05रोते हुए वहा आते हैं.
- 17:05–17:07उने अपनी गलती का एहसाज होता है
- 17:07–17:09अग, विपश्चात आप करते हैं
- 17:09–17:11दोनो परिवारो के भीज का विरोद
- 17:11–17:14वो नफ्रत, वो जाती भेद की दीवार
- 17:14–17:16सब कुछ उन आसुवो में बहेजाती है
- 17:16–17:19और वे खुशी खुशी उने सुभीकार कर लेते हैं
- 17:19–17:25ये गात्ठा सर्व एक अटियासिक पन्ना नहीं है, ये भेतिया के लोग गीतों में आज भी गाई जाती है।
- 17:25–17:27ये अपने आपने बहुत बडी बात है।
- 17:27–17:40अदम्या साहस बड़े से बड़े राजनी तिक कुचक्रों समाजिक भहिषकार यहां तक कि खुखार दूशमनों अपनो के विश्वाजगात को भी हरा सकता है.
- 17:40–17:47एक कोई के पास की चोटी सी मुलाकात ने अंतता था समाज की सबसे कठोर दिवारो को डादिया.
- 17:47–17:51ये एक बहुती प्रेणा दायक और दिल को चूलेने वाला अंथ है
- 17:52–17:55लिन इस पूरी कहानी के अंथ पर विचार करते हुए
- 17:55–17:57एक सवाल मेरे मन में बार भार उट्ता है
- 17:57–17:58कुन सावाल?
- 17:58–18:01स्रोट सामगरी नी ये सीधे तोर पर नहीं पूचा है
- 18:01–18:06लिकिन जब हम मानव बनो विग्यान समाज की प्रक्रिती को दिकते है, तो ये सोचना लाजमी है.
- 18:06–18:07आप बता एए.
- 18:07–18:11जब परिवार रोते बे वापस आया और उन दोनो को स्विकार कर लिया,
- 18:11–18:16तो क्या उस समाज ने वास्तों में जाती वाद की उस गेहरी सरी गली सोच को हमेशा के लित्याग दिया ता?
- 18:16–18:21उफ, ये बहुत इग्रा सवाल है. मतलब, क्या उस शच में यक सामूही क्रिदे परईवर्तन था?
- 18:21–18:27या या या ये स्विक्रति केवल अपने ही सबे बहाई को लगबभग मार दालने के गेरे अप्राद बोद
- 18:27–18:30याने गिल्ट का नतीजाती. विल्खोल यही में सोच राथ बदल बाती है.
- 18:30–18:34या एक जोडे की ये जीद उनके प्यार की असीमित ताकत
- 18:34–18:37पूरे समाज की पीडियो पुरानी सोच को रातो राद बडल पाती है?
- 18:37–18:38या फिर?
- 18:38–18:41या फिर मुंगा और जालिम सिंकी ये कहानी
- 18:41–18:44उस कत्फोर समाज में सरफ एक अप्वाद बनकर रह जाती है?
- 18:44–18:46जैसा की हम ने श्वरूबात में कहाता?
- 18:46–18:50कोई पर गिरी वो छोटी सी चिंगारी जंगल में आग तो लगा गए,
- 18:50–18:53लेकिं क्या उस आग ने सच्मे क नहीं साव जमीन तएयार की?
- 18:53–18:54या फिर दूवा चटने के बाद?
- 18:54–18:59हाई या फिर दूवा चटने के बाद जाती बाद का वो जंगल वैसा कवैसा इख़़ा रहा,
- 18:59–19:01बस एक पेड जलकर राख हो गया था.
- 19:01–19:04ये एक आँसा सवाल है जिस पर एस विषलेशन को सुन्ने वाले
- 19:04–19:06हर वेक्ती को खुद विचार करना जाहीए.
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सूके पत्तों के देरों पर गिरी एक मामूली सी चंगारी पूरे जंगल को राग कर सकती है. बलकोल. और एतिहास में तो एसी कई चंगारिया देखने को मिलती है? सही कहा अकसध जब हम इतिहास के पननो को पलड़ते हैं तो अईसा लगता है कि बड़ी करानतिया और बड़ाओ सिर्फ युध्द के मैधानो में या या राज महलों के बंद कमरो में ही लिखे जाते हैं हम, लेकिन सच हमेशा एसा नहीं होता एक दम और आजके हमारे जेहन विषलेशन का दार एक आजके हमारे जेहन विषलेशन का आदार एक आजके ही चिंगारी है जाहां एक बड़ा एहतिहासिक बड़ाव अग यख कुए पर पानी पीने किलिए रुकने से शिरू हो जाता है जो की अपने आप में बहुती दिल्चास पात है. आप. तो इस बार हम गजंद्रिट भागुर द्वार रचित मूंगा आजालिम सिंकी गाता पर चर्चा कर रहें जो दो हाँजार चब्भीस में विदे हे पत्रिका में प्रकाषित हुई ती. ये बेत्या राज के यहतिहास की एक आजी लोग कता है, जाह सत्ता, कत्हुर जाती विवस्ता, और दर्बार के गेरे कुचक्रों को, मडलब एक नितान्त व्यक्तिगत और मानिविए भावनाने चुनाती दी. और वो बावना के ही प्रेम के. बलकुल. हमारा मिशनाज सरफ एक प्रें कहानी सुनाना नहीं है हमारा उदेश्व उस समय के समाज सत्ता के केल और अनसानियत के उस जस्बे को समजना है जो सदियों पुरानी रूडियों को तोर देता है. क्योंकी भेतिया राज का वो दोर जिसकी ये स्रोट समगरी बात कर रहे है, अब आपने आप में बहुत जटल था. वो 18 वी 19 सदी के आस्पास का समे ता, अग? जी भिल्कुल. हम उस समनती दाजे की बात कर रहे है, जहां जाती और क�ल की दिवारे ही अई अपने प्चान तै करती थी. इस कता की केंदर में जो दो लोग है, मतलव उनका मिलना किसी समाजिक भूकम से कम नहीं ता. एक तरफ हैं जालिम सिंग. आजो भेतिया राजक के एक बेहत सम्मानेद शक्तिषाली और खुंकार माने जाने वाले राजपुट सिपाई सरदार है. अर दूस्री तरव मुंगा है जी, मुंगा जो दूदबन्सी यानी दूसाद समवदाए के एक सादारन युड़ी है उस समाज में इन दो अलग गल द्रूवों के भीच किसी बी तरहें के विक्तिगद समबंद की कलपना करना भी अज़्ीदे तोर पर राजशाही और समाजिक वेवस्था को चुनाउती देना था तो अगर हम इस कहानी की शुर्वाद देखें तो ये किसी दरबार या यूध्ध के मेडान से नहीं बलकी गाँँके एक सादारन से कोे से हुती है उस्बहा असल में आँसा क्या हूँ अथा जिसने इतनी बडी सामाजी कुतल पूतल मचादी दिक्ये गठना देखने में बहुत सादारन ती बेत्या राज की सीमा के भीतर गावो का कुवा ता जहां औरतें पानी बहिर रही थी और मुंगा भी बही थी रोज मरला का का खाम चल राता? बलकोल! तब ही जालिम सिंग वहां से गुजरते हैं. स्रोथ बताता है कि जालिम सिंग का रूट्बा एसा था के मडल उनके गोडे की ताप सूंकर इलोग दरकर रास्ता चोर देते है. खोफ ता उनका? बहुत जाडा. उसे पाही सर्दार पानी पीने के ले वहार रुकते और और उनकी नजर मुंगा पर पडती है मुंगा लाज से और उस खोफनाक सर्दार के दर से वहां से बाग जाती है स्वाभाबिक है? रहा, लेकिन वो एक शन वो पहली नजर जालिम सिंके मन में एक उमिट चाप चोड़ाती है चलिये इसे विस्तार से समझतें मुंगा का दरकर बागना समजाता है वो एक ताकत्वर राजपुट सर्दार था लिकिन ये तो एक नितानत वेक्तिगष्शन ताना एक दंब वेक्तिगष्ट एक आद्मी ने एक अरत को देखा और वो बाग गगगेई बात यही खटम हो जानी चाही थी फिर ये एक राजनीतिग बवंडर कैसे बन गया ये तो मुझे बलकोल आजके जमाने की दफ्तरों वाली राजनी ती या प�लितिक जैसा लग रहे है अप सही दिशा में सोच रहे हैं जगा आप की किसी चोटी सी बात को आपके खलाफ अथ्यार बना लिया जाता है और दरबारों की राजनी ती तो किसी आदूनिक दफ्तर की राजनी ती से भी कही जाड़ा खतरनाक होती थी कुकि वहां जान का खतरा होता था बिल्कुल, वहा दाव पर नाकरी नहीं बलकी जिन्दिगी होती थी इस व्यक्तिगत कषन को बवंडर बनाने वाला व्यक्ती था प्रिठ्वीपाल सिंग वुराजा का कान बहरने वाला, एक मुल्लग्गु और चापलूज दर्बारी था तो आप दर बार में असे एक विक्ती होता ये? आप, लेकिन प्रिट्वी पाल की आस्ली समस्या कभी मुंगा थी ही नहीं. मुगा तो सर्फ एक मोहरा थी, जिसका उसने स्तिमाल किया. तो आस्ली वजग क्या थी? जलीद्म की ताकत? इग्दम सई प्रिद्पीपाल की आख में जो चीस चुब रही थी वो ता जालिम सिंका बडद्टा हुए यष, सर्दार का पड, और सेना के भीच उनका अपार सम्मन. तो सत्ता के गल्यारूं का एक सीदा सान्यम है, जब आप किसी के काम या उसकी युध्द कोशल पर वार नहीं कर बाते, तो आप उसके चरित्र और उसके वेक्तिक जीवन को राजनितिख हत्यार बना लितें. यही प्रिट्फीपाल ने किया, उस्ने राजा के सामने मुंगा और जालिम सिंकी जूटी कहानिया गरनी शुरू कर दीं ताकि जालिम की चवी खराब हो सके. लेकिन बाज स्रफ अफवावो तक तो नहीं रूकी थीना मैंने स्रोथ सामगरी में पडाया की एक हिंसक हमले का भी जिकर है. आप आप आई प्यलाने के बाद प्रिद्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट्ट उगुन्डो ले जालिम पर गात लगा कर हम्ला किया तो पट्टू अकेले ही उन सब बहारी पडा औरे बाग उसने एक एक कर के प्रिथ्विपाल के सभी बाडे के हत्यारों को मुद्त के गात उतार दिया इक मल्ला का एक राजपूट सर्दार किलिए स्वान की बासी लगा देना मल्ला ब ये दिखाता है कि उस दोर मे भी कुछ रिष्ते जाती कि उस कठोर पिंजरे से बहार सांस ले रे दें मिल्कुल और यह यह यह इस कहानी की सब से खुबसुरत बात है लेकिन प्रिष्पाल के गुन्डो के मारे जाने के बाद, तो उसका आप्विश्वाद और भी आहत हूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ अग, बेत्या के उस इलाके में मौनी बाबा का प्रबाव इतना था, कि उनकी बात राजा भी नहीं तालते थे. जचा. जी. जालिम ने जाकर अपनी पूरी स्तिती, अपना प्रेम और दरबार का शव्ट्र बाबा के सामने रखा. बाबाने सब कुछ शान्ती सुना, और अपने मून को तोड़ते होगे सुब दो शबत कहे. या कहा उनोने? उनोने कहा, मुंगा कषंट चोर दे. ये एक महतपूँन सवाल कष्टा है. मडलब क्या मुनी बाबा वास्ता में, जालिम के प्रेम के खलाथ है? या क्या आईसा हुसकता है कि वो इतनी सिद और ताकत्वर होतेवे भी, दर्बार और राजा के क्रोथ से दर गयतें? इसे दर नहीं, बलकि उस योग के यतार्त की गेरी समज कहना ज्यादा सही होगा. वो कैसे? मौनी बाबा कोई सादारन व्यक्ती नहीं ते, वे समाज की नब्स पहचानते थे. वे जानते थे, के एक राजपूट सर्दार और दूसाद कन्या के मिलन को राज दर्बार और समाज कभी सुईकार नहीं करेगा. मदब उने आगे का खत्रा दिक्रा था? बिल्कुल, बाबा को यह सपष्ट दिक्रहा था, कि इस रस्ते के अन्त में केवल मुत, विनाश और कुन खराबा है. वो जालिम को उस भ्यंकर कीमथ से बचाना चाहते थे. उनका वो आदेश दर्म और समाज के निमो के चच्मे से दिया गया एक विवावारित फैसला था. लेकिन जालिम कर याकशिन यहा रोंटे कड़े कर देने वाला है. जी. स्रोथ के अनुसार उसने बाभा की बाद सुनकर नतो हा कहा और नहीं ना. वो खामोश रहा. ब्रेम इतना गज्रा था कि... ता उसका दिल उसे ये मानने नी देरा था कि वो मुंगा को चोर दे. जालिम कि वो खमोषी दर असल उसकी सबसे बड़ी बगावत थी. और जब जालिम इस उदिदवून मे था तब ही प्रिठ्वी पालने अपनी अगली चाल चली. उसे समज आग आग आ दागा अगा की जालिम तक पहुचने किलिए, पहले उसकी दाल को तोरना होगा. और वो दाल पत्तू था. इक्दम सही. इस बार प्रिठ्ट्पी पाल ने सीदे पत्तू पर एक बडा हम्ला किया. और यहा पत्तू ने जो किया, वो बारती लोग कताव के सब से शक्तिषाली द्रिष्षो में सेग है बिल्गुल, वो द्रिष्छ बहुत देबूद है. एक मल्ला जो निषले तबके से आता है, उसने भवानी माता की शपत ली, और एक दरम्युद लड़ने निकल पडा. जो की उस समय अखल्पनी आता. आप, उस समय के समाज में देवी की एसी शपत लेना अप दर्मियद्द की गूशना करना आम तोर पर उच्छ जात्यों का विशेशा दिकार मना जाता था पट्टू का ये कदम ही उस समाज की मानिताव पर एक बडा प्रहार था पट्टू जानता था के वो स्वर्फ अपने दोस्त को नहीं बलकी एक सच्चाई को बचारा है और उसने अपनी जानके परवानी की? बलकुल नहीं, उस भयानक संगर्ष में पट्ट्टू ने अपनी पूरी ताकच जोग दी उसने उस विष्वाज गाती प्रिट्ट्टी पाल को तुमार गीराया जिसनी ये सारा कुच्चक्र रचा था वो मारा गया आप प्रिट्वी पाल मारा गया लेकिन प्रिट्वी पाल के गुन्डों की एक बहुत बजी भील ने अंत तब पत्टू को गेर लिया पत्टू ने अपने स्वामी अपने डोस्त के नाम पर बट्टू का ये बलीदान किसी को भी भीटर तक जगजोर सकता है जालिम ने अपना सबसे अजीस दोस्त को दिया एक बहुत बडा अगात ता उसके लिए लेकिन त्रास्दी की हद देखिये जालिम को अपने दोस्त का शोक मनाने तक की महलत नहीं अद देखिये, जालिम कोपने दोस्त का शोक मनाने तक की महलत नहीं मिली योंकि प्रिथ्विपाल के मरने के बात भी कुचक्र रुका नहीं या तो जालिम के जड़े बहुत गेरी ती एक और भ्यानक खबर जालिन तक पूझची, जिसने उसे सीदे मुत के मुहाने पर ख़ा कर दिया. वो खबर थी मुंगा के गायब होने की. मुंगा को बेतिया के गने और खफनाक जंगल में बेज दिया गया था. राजा क्या देश पर? स्रोट ये स्पष नहीं करता की इस साजच के पीछे सीदे तोर पर राजा का हाथ ता या दरबार के अन्ने लोगों का. लेकिन ये देट आ, कि मुंगा को हमेशा के लिए रास्ते से हटाने की तयारी हो चुकी ती. उसे वन देवी की बली च़ाने किली बेज़ा गया थाना जी उसे कनवा के चंगल में सोम दिया गया था और यही पर कहानी एक दाक फांतिसी या किसी महाक काविय जैसी लगने लकती है हा खन्वा का चरित्र ही कुछ है जा है ये कनौवा कोई आम अन्सान नहीं ता स्रोथ में बताया गया है कि वो मुंगा की भोजी का भाई ता और एक विशाल, खुंकार तुसाध � thā उसका वनन सुनकर ही तर लकता है जरा उसकी खॉराक के बारे में सुचीए स्रोथ कैता है कि वो सवा मन दूद अर एक पूरी रस्सी पीता और खाता था सवा मन बहुत जाड़ होता है मतलब आजके साब से लगबबख पचास लीटर दूद एक अग़ अग़ ताग़ रोस पचास लीटर दूद पीता हो उसका शरीर कैसा होगा आँ... ये सुचकर इस यहरन होती है और स्रिव शरीर ही नहीं, उसकी सवारी भी देखिये. हा. कोई गोडा या बैल नहीं, बलके एक एसा बहेंसा था, जिसका इस्तमाल बाग के शिकार के लिए होता था. बाग का शिकार? बाग के शिकार वाला बहेंसा. अद्रीवाग नादा पर प्रदाग नादा नादा प्रदाग नादा नादा नादा नादा नादा नादा नादा नादा नादा नादा नादा नादा नादा नादा नादा नादा नादा नादा नादा नादा नादा नादा नादा नादा नादा नादा नादा नादा ना� कैसे? देखे अगर कोई आम सबही होता या गुस्से में पागल कोई प्रेमी होता तो वो सीदे अपनी तलवार लेकर कनूवापर जपपट परता जो की बहुत बेवकुफी भराकडम होता येलकुल लेकिन जाले में बहतरीन रननीति कार था ये कमाँडर था उसने सीदे कनूवा पर वार नें किया उसने अपने बाले से उस बाकशिकारी भहसे पर एक अचुक वार किया भहसे पर अगर अम इसे सामरेक द्रिष्टिकोन या रनीती के नजरीये से देख हैं यह किसी युध्ड में दिश्मन की ताकत और उसकी गती शीलता को सब से पहले खटम करना है वह दी चालाकी बहरा कदम जैसे आजके आदूनिक युध्ड में आप सीधे कमाड़र पर गोली चलाने से पहले उसके तांकी पट्रीों कोग़ा देते हैं तकि वो अपाहीज होजाई ये साम्रिक बुद्धिमत्ता का एक उत्क्रिष्ट उदारन है लिकिन इसका मनोवेग्यानी कसर और भी गेरा था वो कैसे देखे वहेसा स्थ इक जानवर नहीं ता वो कनुवा के कहोफ, उसकी अजे अचवी और उसके रूटभे का जीता जागता प्रतीक ता. आप एक तरशे उसकी पहचान ता? बलकुल जैसे ही जालिम के बाले ने उस भहसे को जमीन पर गिराया, कनुवा के आदी मानसे को शाररे एक शकती वही दधराशाई होगए. उसका गुरूर तूटगया. एक दम उसका गुरूर तूटगया. एक पैडल होचुके मनोवैग्यानेक रूप से तूटगया कनुवा अगर जालिम शिंके बीच जो युद हुए उस में जालिम के क्रोद और प्रेम ने उसे आजेया बना दिया. जालिम ने कनूवा का वद कर दिया. अगर तब आद कर दिया और कन्वा को मारने के टीक बाद उसी जंगल में उस खफना वाद कि साये के भीच कहानी का सब से विद्द्रो ही पलाता है जी, वो पल जो इतिहाज बन गया जालिम ने वही उसी खून से सनी जमीन पर या वी वीवाँदा थी तो वो बवाँदा थी वो बवाँदा थी वो वो बवाँदा थी वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो वो व ये तो उस बड़े तूफान से पहले की शान्ती ती जो नका गाँ में अंट़ार कर रहा था किंकि जब कोई समाच का सबसे बड़ा और पवित्र माना जाने वाला नियम तोरता है तो आसली युध आपनो से ही लडना परता है सही बात है, जब जालम मुंगा को लेकर अपने गाँ पूँचाओ और दंके की चोट पे ये गूश्ना की की ये मेरी पतनी है, तो समाज तो चोडिये उनका अपना परीवार भी जुखने को तेार नहीं था. परीवार सब से जब जयादा खिलाफ था. जालिम के अपने सगे भाई, कूर और परवार के अनने लोगोने मिलकर उन दोनो पर जानलेवा हम्ला कर दिया. अंके रिष्टे से भी जाडा एहमियत अपनी जाती की तथा कथित पवित्रता को दे रहाता. अपनी भाई को मारने आगया. आप लिकिन इस गोर अंद्कार और हिन्सा के भीच एक बड़ा अप्वाद सामने आता है. कोन? जालिम की माः और जब पूरा परिवार, कुन्बा और समाज जालिम को मारने पर उतारू था, तब उस माने पित्र सत्ता और जातिवाद की तमाम जनजीरों को तोडगर अपने बेटे और उसकी नहीं भहु का साथ दिया. ये तो बहुती हिम्मत की बात है. बिलकुल. मां की वो स्विक्रिती, वो मम्ता इस नहीं गरहस्ती का पहला और सबसे मजबुत आदार बनी. अपने ही सगे बहाईगी की जान लेने में किसी के हाथ नहीं कापे इस हमले में जाले में दिनी बूरी तरगाएल गाएल गया की वो जमीन पर गिर पडा अगर हम इसे व्यापक संदरब में देखें तो यहां मुंगा की चरित्र में एक अजादलाव आता है अगर अगर निसे व्यापक संदरभ में देखें तो यहां मुंगा के चरित्र में एक अजाँईगाईगाईगाईगाईगाईगाईगाईगाईगाईगाईगाईगाईगाईगाईगाईगाईगाईगाईगाईगाईगाईगाईगाईगाईगाईगाईगाईगाईगा� उसे अपने कंदो का सहारा देती है खुदागी आती है जी और अपने गायल पती को लेकर उनके एक दोस्ट भेरव के गर की और निकल परती है वो एक रक्षक बन चुकी है ये सफर आसान नहीं था बिलकुल नहीं रस्ता बहुत लंबा था और जालिम की शालत पल पल बिगर रही थी, खून तेजी से भेरा था. जान जाने का खत्रा था. आ, लेकिन मुंगा राद नहीं मानती. वू रास्ते में वेद्दे के दवार पर रुकती है. वेद्दे अपना काम करता है, जालिम के गामपर लेप लगाता है लिकन मुंगा रात बर जागगगर एक दाल कितरा जालिम के स्रहने बैट कर उसकी रक्षा करती है बिना पलग जबकाए जो लगकी कभी एक सिपाही की परचाईसग अबराजा जाती ती तो आज समाज और मुत यही वो बिन्दू है, जहा वेक्तिगत प्रेम एक समाजी क्रान्ती करूप ले लिता है. यह बहुत बड़ा बडलाव. वेद्दी की चिकिच्सा और मुंगा की उस अटूट सेवा, उसकी उस असीम समरपन कारन, जालिम की सासे वापस लोट आती है. उब भज्जाता है? अग, उब भज्जाता है. और जब ये खबर उनके गाँ पूछती है, तब कहानी अपने अन्तेम और सब से बहुख मोड पर आती है. जब परिवार वालों को पता चलता है, कि जलम जीविद बजगया है, और मुंगाने किस टाल बनकर उसकी जान बचाई एक, तो एक बड़ाब दिखने को मिलता है. क्या होतै? मुंगा के गर्वाले और जालिम के भाई, मतलव भे सभी लोग, जो कुछ दिन पहले उने मार डालने पर उतारू थे, रोते हुए वहा आते हैं. उने अपनी गलती का एहसाज होता है अग, विपश्चात आप करते हैं दोनो परिवारो के भीज का विरोद वो नफ्रत, वो जाती भेद की दीवार सब कुछ उन आसुवो में बहेजाती है और वे खुशी खुशी उने सुभीकार कर लेते हैं ये गात्ठा सर्व एक अटियासिक पन्ना नहीं है, ये भेतिया के लोग गीतों में आज भी गाई जाती है। ये अपने आपने बहुत बडी बात है। अदम्या साहस बड़े से बड़े राजनी तिक कुचक्रों समाजिक भहिषकार यहां तक कि खुखार दूशमनों अपनो के विश्वाजगात को भी हरा सकता है. एक कोई के पास की चोटी सी मुलाकात ने अंतता था समाज की सबसे कठोर दिवारो को डादिया. ये एक बहुती प्रेणा दायक और दिल को चूलेने वाला अंथ है लिन इस पूरी कहानी के अंथ पर विचार करते हुए एक सवाल मेरे मन में बार भार उट्ता है कुन सावाल? स्रोट सामगरी नी ये सीधे तोर पर नहीं पूचा है लिकिन जब हम मानव बनो विग्यान समाज की प्रक्रिती को दिकते है, तो ये सोचना लाजमी है. आप बता एए. जब परिवार रोते बे वापस आया और उन दोनो को स्विकार कर लिया, तो क्या उस समाज ने वास्तों में जाती वाद की उस गेहरी सरी गली सोच को हमेशा के लित्याग दिया ता? उफ, ये बहुत इग्रा सवाल है. मतलब, क्या उस शच में यक सामूही क्रिदे परईवर्तन था? या या या ये स्विक्रति केवल अपने ही सबे बहाई को लगबभग मार दालने के गेरे अप्राद बोद याने गिल्ट का नतीजाती. विल्खोल यही में सोच राथ बदल बाती है. या एक जोडे की ये जीद उनके प्यार की असीमित ताकत पूरे समाज की पीडियो पुरानी सोच को रातो राद बडल पाती है? या फिर? या फिर मुंगा और जालिम सिंकी ये कहानी उस कत्फोर समाज में सरफ एक अप्वाद बनकर रह जाती है? जैसा की हम ने श्वरूबात में कहाता? कोई पर गिरी वो छोटी सी चिंगारी जंगल में आग तो लगा गए, लेकिं क्या उस आग ने सच्मे क नहीं साव जमीन तएयार की? या फिर दूवा चटने के बाद? हाई या फिर दूवा चटने के बाद जाती बाद का वो जंगल वैसा कवैसा इख़़ा रहा, बस एक पेड जलकर राख हो गया था. ये एक आँसा सवाल है जिस पर एस विषलेशन को सुन्ने वाले हर वेक्ती को खुद विचार करना जाहीए.