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मूँगा_और_जालिम_सिंह_का_खूनी_संघर्ष.m4a

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Part 10 · VIDEHA MITHILA MAITHILI DISCUSSION CRITICISM SERIES PART 10
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  1. 0:00–0:07तो इतिहास में जब भी हम महान प्रेम कठावों का जिकर करते हैं तो हमारे दिमाग में अकसर अजित सबीरे उबरती हैं,
  2. 0:07–0:10जवाप्रेमी या तो समाज से हार मान लेते हैं।
  3. 0:10–0:13आप या फिर किसी आदर्ष दूनिया में चले जाते हैं।
  4. 0:13–0:14बिलकुल
  5. 0:14–0:16अगशर अज्सी तस्वीरे उबहरती हैं
  6. 0:16–0:19जहां प्रेमी या तो समाज से हार मान लेते हैं
  7. 0:19–0:23आप या फिर किसी आदर्ष दूनिया में चले जाते हैं
  8. 0:23–0:24बिलकुल
  9. 0:24–0:27लेकिन ख्या हो अगर मैं आप से कहुं के
  10. 0:27–0:30अथारवीं या उनीस्फी सदी के भिहार के
  11. 0:30–0:45बेत्या राज मे एक अज़्ी खूनी और यतार्ट वादी प्रेम कता रची गगी जाहा एक सिपाही और एक हाँश्ये पर रहने वाली कन्न्या ने समाज के सबसे क्रूर नियमों को सीदे चुनाती दी.
  12. 0:45–0:56ये बहुती दिल्चास्प और जटिल विशे है, आज हम गजेंद्र ताकुर दोरा समपादित मुंगा आज आलिम सिंकी अटिहासिक प्रिष्ट भूमी पर बात कर रहें.
  13. 0:56–1:02सही कहा आपने, ये एक राजपूट सिपाही, जालिम सिंग और एक दूसाथ समवुदाय की कन्या,
  14. 1:02–1:07मुंगा के भीज प्रेम, प्रतिषोद और वूजुद की गाता है,
  15. 1:07–1:11और यही से हमारा आज का मुख्य वैचारिक प्रष्न जन में लेता है.
  16. 1:11–1:23जो की बहुत इसीदा है, मतलब क्या ये कहानी इस बात का अखात्या प्रमान है कि विक्तिगत इच्छाखती अर सच्चा प्रेम समाज की सबसे कठोर भेड्यों को तोर सकता है.
  17. 1:23–1:53आपके इस उद्साह को समच्ता हूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ
  18. 1:53–1:59अपने आस्पास के लोगों का विनाश च्छलत आगर मिलती भी है, तो वो बहारी रक्त पात और अपुरनी एच्छती की नीव पर खडी होती है.
  19. 1:59–2:01अपकी आप यह बाद सोचने पर मजबूरतो करती है,
  20. 2:01–2:05लिकिन आए आए हम श्रवाथ से चथा की मुल वहटनाउ को समजें।
  21. 2:05–2:07अपकी ये बाद सोचने पर मजबुरतो करती है,
  22. 2:07–2:11लेकिन आए आए आम शुर्वाथ से इस कता की मुल गटनागो को समजें,
  23. 2:11–2:13बेतिया राज के उस दोर में,
  24. 2:13–2:17जहां एक राज पूथ सिपाही का समाज में एक सपाष्ट वरचस्वद हा,
  25. 2:17–2:20अप्रुद निव पर खडी होती है
  26. 2:20–2:24आपकी ये बाद सोचने पर मजबूरतो करती है
  27. 2:24–2:27लिकिन आए आए हम शुर्वाथ से इस कता की मुल गटनाग को समजें
  28. 2:27–2:29बेतिया राज के उस दोर में
  29. 2:29–2:33जहां एक राज पुट सिपाही का समाज में एक सपाष्ट वरचस्वत हा
  30. 2:33–2:38इनार, यानी गाँके कूए, के पास जालिम और मुगा की पहली मुलाकात को देखीए.
  31. 2:38–2:41आँ, वो द्रिष्ष काफी प्रभाव शाली है, है न?
  32. 2:41–2:46जालिम को यी सादारन विक्ती नहीं है, वो भेतिया राजा के एक शक्ती शाली सर्दार है.
  33. 2:46–2:49जब अबने गोडे पर निकलता है तो लोग रास्ता चोड दिते हैं
  34. 2:49–2:52तुसरी और मुंगा एक दूसाद कन्या है
  35. 2:52–2:55जो उस समें के सामाजिक पडानुक्रम में भिलकुल हाँश्ये पर है
  36. 2:55–2:58सही बात है, एक दम निचले पाइदान पर
  37. 2:58–3:02फिर पी जालेम का निरने देखे
  38. 3:02–3:04गाँके गुरु मूनी बाभा
  39. 3:04–3:06जिनके वचनों को उस समाज मिक
  40. 3:06–3:08कानुन से भी बडखर माना जाता ता
  41. 3:08–3:11जवे वे स्पाष्ट रूप से चितावी दिते हैं
  42. 3:11–3:13की मुंगा का संग चोर दे
  43. 3:13–3:16तो जालिम सिंग उस आमोग सलाज को
  44. 3:16–3:17सिरे से कारइज कर देता है
  45. 3:17–3:18बद्यान एक बात है.
  46. 3:18–3:20बस एक सेक्टन, मैं आपनी बात पूरी कर लूँ.
  47. 3:20–3:26हमें ये समजना होगा, कि उस समहें किसी गुरू की बात तालना, महेंजेख आस सहमती नहीं ती.
  48. 3:26–3:30ये पूरी समाजिक विववस्ता कि खिलावे खुलाविद्रोओ था.
  49. 3:30–3:34ये दिखाता है कि जालिम सिंग किसी विवस्ता का गुलाम नहीं ता
  50. 3:34–3:37वो अपने फैसले खुद ले रहा था
  51. 3:37–3:41ये उसकी विक्तिगत आजादी का चरम बिन्दू है
  52. 3:41–3:43एक मिनेट, मैं यह आपको रोकना चाहूंगा
  53. 3:43–3:48आप मुनी बाबा की चेतावनी को खारिज करने को विक्तिगत आजादी कहरेंगें
  54. 3:48–3:50लेकिन क्या सच्मे आजा है?
  55. 3:50–3:52मुनी बाबा कोई खलनाएक नहीं ते
  56. 3:52–3:55वे उस समाच के एक एसे प्रतिनिदी दी ते
  57. 3:55–3:57जानते ते की ये दाचा कैसे काम करता है
  58. 3:57–3:59मतलब वो उसे बचाना चाहते थे?
  59. 3:59–4:04भिलकल वे जानते थे के एक राजपूथ और दूसाद के मिलन का परनाम क्या होगा?
  60. 4:05–4:08और जालिम का वो निरने स्वतन्त्र शुन्निता में लिया गया था
  61. 4:08–4:13जैसे ही वो ये निने लेता है, बेत्या दर्बार की साजिषन शुरू हो जाती हैं.
  62. 4:13–4:18दर्बार का एक अनने दर्बारी प्रिथवी पल्सिंग, जालिम की इस च्तिती का फपडा उठाता है.
  63. 4:18–4:20आप, वो राजा के कान बहरता है.
  64. 4:20–4:22आप, यों बहरता है?
  65. 4:22–4:27कुकी जालिम ने जो समाजिक नियम तोडा उसे राजनितिक रूप से कमजोर कर दिया था.
  66. 4:27–4:32सामन्ती वेवस्ता में जैसे ही आज समाज के स्थापित नियमो को तोडते हैं,
  67. 4:32–4:37सत्ता के गल्यारो में बेटे गिद आपको नोचने किले तगारो जाते हैं.
  68. 4:37–4:38ये तो है
  69. 4:38–4:39जालिम की ये आजादी
  70. 4:39–4:41असल में उस जाल के शुर्वात थी
  71. 4:41–4:43जिसने अंतता कई लोगो की बली ली
  72. 4:43–4:47मैं इस बहाथ से बलकुल इंकार नहीं करती के प्रत्ट्वीपाल सिंग ने कुच्ट्ट्रर आचे
  73. 4:47–4:49लेकिन आप दिक्छे
  74. 4:49–4:52कि उनकुचक्रों की भीज भी क्या उबरकर सामने आता है
  75. 4:52–4:53पट्टू का चरित्र
  76. 4:53–4:55आ, पट्टू, मल्ला
  77. 4:55–4:58आ, पट्टू, जुकी एक मल्ला अ था
  78. 4:58–5:03वो जालिम सिंक के लिए प्रिठ्वी पाल सिंके गुन्डो से अकेले बिड़ जाता है
  79. 5:03–5:07वो पहली बार में तल्वार से उन सब का सर्द़ से अलग कर देता है
  80. 5:07–5:11और अंतता अपने प्रानो की आहुती दे दे देता है
  81. 5:11–5:14अब अगर ये कहानी सर्व जातिगत हिंसा के बारे में होती
  82. 5:14–5:19तो एक मल्लाह एक राजपूट सिपाही किले अपनी जान क्यो देता?
  83. 5:19–5:23उआद बाद का प्रमाण है कि इनसाने जाती की भेडियों को तोर सकती है?
  84. 5:24–5:30मुझे माझ्द की जेगा लेकिन मैं पत्तू के इस बलिडान को रोमैंटिसाइस करने से बिलकुल असहमत हूँ.
  85. 5:30–5:33अर समाजिक पदानुक्रम से बहुत उपर थी
  86. 5:34–5:36पट्टू की मुद्त एक तरासदी हो सकती है
  87. 5:36–5:39लेकिन उसका लडना इस बात का प्रमाण है के
  88. 5:39–5:42इनसाने जाती की भेटीों को तोर सकती है
  89. 5:42–5:45मुझे माझ्द की जेगा, लेकिन मैं पट्टू के इस भलिदान को
  90. 5:45–5:48रोमैंटिसाइस करने से बिलकुल असहमत हूं
  91. 5:48–5:51देके अगर अगर अगर अपने पीचे के कारन को समजें
  92. 5:51–5:54तो पत्टू कब लिदान प्रेम की जीत नहीं है
  93. 5:54–5:58ये इस बात का नगन सत्ते है कि राज शाही और सामन्ती सत्ता का बोज
  94. 5:58–6:01बवोज अमेशा सबसे कमजोर तबके पर गिरता है
  95. 6:01–6:03वर उसने आपनी मरजी से लड़ाई चूनी थी
  96. 6:03–6:06पट्टू एक मलाह था
  97. 6:06–6:08दरभार की दूशित राजनी ती
  98. 6:08–6:10राजा और प्रत्विपाल के भीछ हो रही थी
  99. 6:10–6:13संगर्ष जालिम की समाजिक बगावत का ता
  100. 6:13–6:17अद्वार्द का था लेकिन खुन किसका बहाज? एक निर्दोश मलाह का.
  101. 6:17–6:21पट्टू का अपनी जान गवाना ये दर्षाता है, कि उस वेवस्ता में
  102. 6:21–6:24निच्ले तबके के लोगों की जान की कोई कीमत नहीं ती.
  103. 6:24–6:26ये थोडा निराशा जनक नजर्या है.
  104. 6:26–6:30अप पट्टु गे निरने की स्वायत्ता को पूरी तरह से नकार रहे हैं,
  105. 6:30–6:34जो मुझे लकता है कि उसके चरित्र के सात अन्देगाई अप पूरी रहे है।
  106. 6:34–6:37अप पूरी लेगाई बादा पूरी लेगाई पूरी रहे है।
  107. 6:37–6:40अप पूरी लेगाई बादा पूरी रहे है।
  108. 6:56–7:26अगर आप बाग ग़ाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग ब
  109. 7:26–7:34लेकिन तीक उसीक शन जब कनूवा मुंगा पर अपना खाडा उठाने वाला होता है, जालिम वहां पहुचता है.
  110. 7:34–7:36अग, और वो उसे मार देता है.
  111. 7:36–7:41बिलकुल, कता कि अनुसार जालिम वहां किसी जासुस की सुचना से नहीं,
  112. 7:41–7:43अपके इसाप से यह ख्या है?
  113. 7:43–7:45यह अपने बागे को खुड लिखा,
  114. 7:45–7:47उसने एक स्थापित ताकत को चुनाती दी,
  115. 7:47–7:49और उसे परास्त किया,
  116. 7:49–7:53यह प्रेम की अजे शकती नहीं तो और क्या है?
  117. 7:53–7:58देखे वो द्रे लिए बागे को उस्थापित ताकत को चुनाती दी,
  118. 7:58–8:10अब ये की चरम सीमा है, उसने बागे को खुद लिखा, उसने एक स्थापित ताकत को चुनाटी दी, और उसे परास्ट किया. ये प्रेम की अजे शकती नहीं तो और क्या है?
  119. 8:10–8:13दिक्ये वो द्रिष्छ निस्सन्दे हे रोंक्ते कडे खडेने वाला है
  120. 8:14–8:16और जालिम का पराक्रम भी असादारन है
  121. 8:16–8:20लिकिन मैं आप से पुछना चाता हूँ कि मुंगा भेतिया के उस गने जंगल में
  122. 8:20–8:22भली की वेदिपर पूची ही क्यों?
  123. 8:22–8:52अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अ�
  124. 8:52–8:58अर कन्वा के हते चडना राज शाही दवारा थोपे गाए वन्वास का सीदा परणाम था.
  125. 8:59–9:02अर कन्वा को देखिए वो मुंगा के ही समुदाये का है?
  126. 9:02–9:04आ, ये कजी बिडंबना है.
  127. 9:04–9:07ये एक बहुत ही महतोपून समाज शास्त्री बिन्दू है.
  128. 9:07–9:13जब व्यवस्ता को खट्रा मैजुस होता है, तो वो हाशिये के समवदायों को ही आपस में लवा देती है.
  129. 9:13–9:22कनूवा का मुंगा की बली देना ये दिखाता है कि हाशिये का समाज भी उच्छ वरग के दबाव में अपनी ही लगकियों को दन्टित करने लकता है.
  130. 9:22–9:25ये तो है
  131. 9:25–9:31जालिम को कनवा से लडना पडा किंकी राजशाही ने उने एक असे कोने में दखेल दिया दाखा जाहा मरिद्ट्व।
  132. 9:31–9:34या हत्या के अलावा कोई विकल्प नहीं बचाथा
  133. 9:34–9:36ये बहागे को खुड लिखना नहीं है
  134. 9:36–9:41अप यह खॉर विवस्ता दूरा पैदा की गई अस्तिट्व के संकत की स्थिती है.
  135. 9:42–9:46मैं आप की इस प्रश्व कुकर वाली बाथ से सहमत हूँ कि समाज ने उने बाहर दھकेला.
  136. 9:47–9:50लेकिन आप उस शवन के महत्वो को नजर अंदास कर रहे है,
  137. 9:50–9:53जो कन्वा की म्रित्यों के टीक बाद आता है
  138. 9:53–9:55आप सिंदूर दान की बात कर रही है
  139. 9:55–9:55आप
  140. 9:56–9:57उसी जंगल में
  141. 9:57–10:00उसी म्रित्यों और रक्टपात की च्याया में
  142. 10:00–10:02जालिम मुंगा की माग में सिंदूर बरता है
  143. 10:03–10:05वो कोई चिपकर की आगाय कारे नहीं ता
  144. 10:05–10:06और इसके बाद
  145. 10:06–10:09वो मुंगा को लेकर अपने गाँ वापस आता है.
  146. 10:09–10:11और समाज के सामने,
  147. 10:11–10:13अपने परिवार के सामने,
  148. 10:13–10:16दंके की चोट पर उदब गोषना करता है,
  149. 10:16–10:18कि ई रमर जनानी ची,
  150. 10:18–10:21यानी ये मेरी पतनी है.
  151. 10:21–10:24एक शक्तिषाली राजपूट सर्दार के मुद से,
  152. 10:24–10:29अपने ही आंगन में ये गोशना इस बात का अकाट्ट्या प्रमान है,
  153. 10:29–10:32कि जाती की दिवार उसके लिए ब दहे चुकी ती.
  154. 10:32–10:33लेकिन दिवार दही कहाँ?
  155. 10:33–10:37मिरा मतलब है, विवस्ताने उने कोने में ज़रूर दھकेला होगा.
  156. 10:37–10:44लेकिन उस कोने से वापस आखर उनहोने जो निरने लिया उसी विवस्था के मुए एक करारा तमाचा था.
  157. 10:44–10:47उनहोने दरके आगे गुतने नहीं टेके.
  158. 10:47–10:49और उस तमाचे की प्रतिक्रिया क्या हुई?
  159. 10:49–10:51क्या समाज ने उने गले लगा लिया?
  160. 10:51–10:56ये इस गाता का सब से अंद्कार मैं और मनोवे ग्यानिक रूप से जटिल हिस्सा है
  161. 10:56–10:59जिसे आप एक जीट की तरा पेश कर रही हैं
  162. 10:59–11:01आप भायोंगे हमले की बात कर रही हैं
  163. 11:01–11:03हाँ जब जालिम मुगा को गर लाता है
  164. 11:03–11:07तो बाहरी धुशमन या राजा के सेनेक उस पर हम्ला नहीं करते,
  165. 11:07–11:10उसके अपने ही सगे भाई, कुमर और अन्ने,
  166. 11:10–11:13अपने ही खुन पर जान लेवा हम्ला कर देते हैं,
  167. 11:13–11:16विज्जालिम को लहु लूहान कर देते हैं.
  168. 11:16–11:19जाच में बहुत दूखध था.
  169. 11:19–11:22और क्यों? क्या वे जालिम से नफरत करते थे?
  170. 11:22–11:26नहीं, हमें यहां उस समें की दाचागत वास्तविक्ता
  171. 11:26–11:31और जाती गड चिंता जिसे हम कास्ट अंग्जाइती कहते हैं को समझना होगा
  172. 11:31–11:34एक सामनती समाज में जाती की शुद्द्दता
  173. 11:34–11:40अद्ता सीदे तोर पर जमीन के मालिकाना हक और पन्चायत में आपके रुदभे से जुडी होती थी.
  174. 11:40–11:43आप, सामाजिक पूंजी बहुत माएने रकती थी.
  175. 11:43–11:46बलकुल, एक दूसात कन्या को गर की भहु बनाने का मतलप था,
  176. 11:46–11:50कि उस पर्वार का पूरे भेतिया राज में हुख्का पानी बन दोजाना.
  177. 11:50–11:52बायोंने जालिम पर तल्वार इसलीये उठाए,
  178. 11:52–11:55किवकि रक्त समवन्डों पर जातिगत आहंकार,
  179. 11:55–11:57और वूजुद कर दर भारी पड़गया था.
  180. 11:58–11:59ये कैसा सुखान तें,
  181. 11:59–12:01ज़ाह आपनो काई खून बहाना पडे
  182. 12:01–12:05मैं मानती हूँ की बायों का हमला एक बहुत इगग्ड़ा
  183. 12:05–12:08और मानसेख रूप से तोड देने आगाद था
  184. 12:08–12:11ये सच है की आपनो ने वार किया था
  185. 12:11–12:15लेकिन यहाँ आपको मुगा की बूमिका काविष्लेषन करना चाहीए
  186. 12:15–12:17वूगा की बूमिका
  187. 12:17–12:18आप
  188. 12:18–12:24जो कन्या इनार के पास सिपाही के गोडे की ताप सूनकर लाज अर दरसे बहाग गगी ती
  189. 12:24–12:29वही मुंगा अब गायल जालिम को लेकर वेद्धे के दवार पर पहुचती है.
  190. 12:29–12:33वो राद बर जाकगर अपने पती के प्रानो की रक्षा करती है.
  191. 12:34–12:38मुंगा की वो खामोषी और उसका उदहरे किसी हत्यार से कम नहीं ता.
  192. 12:38–12:41ये तो मैं बिमानत्ता हूँ कि वो बहुत सहासी ती.
  193. 12:41–12:43और अंतता है तफीग परिनाम क्या निकलता है?
  194. 12:43–12:47जालिम की माग का उने स्विकार करना.
  195. 12:47–12:49और जो भाई उसे मारने आइ ते,
  196. 12:49–12:51जब वे वापस लोटते हैं,
  197. 12:51–12:55और जालिम के शरीर पर अपने ही भारा दियेगा गेरे गवव देकते हैं
  198. 12:55–12:57तुवे पूट पूट कर रोने लकते हैं
  199. 12:57–13:01उंगगगुँँँँ पश्चाताः कोई सादारन गख्ना नहीं है
  200. 13:01–13:05यस सिद्ध करता है, की प्रेम और मानविये पीडा में वो ताकत है
  201. 13:05–13:09जो समाज के सबसे कथोर आहंकार को भी पिगला सकती है
  202. 13:10–13:12बहायों करोना इस बात का प्रमान है
  203. 13:12–13:17कि प्रेम ने अंततह उस समाजिक धाचे को भीतर से तोड़ दिया था
  204. 13:17–13:20मुझे खेद है, लेकिन मैं बहायों के उस रुदन को
  205. 13:20–13:24किसी स्ताई विवस्तागद बदलाव के रूपने नहीं देख पाराँ।
  206. 13:24–13:26अगर हम अज्छे मनोविच्ण्यान के चश्मे से देखें,
  207. 13:26–13:29तो बहाँईों करोना एक सवावर गिल्ट,
  208. 13:29–13:32या एक शनिक भावनात्मक उद्वेग हो सकता है.
  209. 13:32–13:36सच्चाई यह आई कि वे उसे जान से मारने ही वाले थे
  210. 13:36–13:38लेकिन उनो ने उसे मारा नहीं
  211. 13:38–13:41पर आप इस तत्ठे को कमतर आख रही हैं
  212. 13:41–13:43किस थोडे से बड़ाव कि कीमत क्या थी
  213. 13:43–13:47पट्टो की लाश, कनूवा का रक्त, दरबार की साजिषे
  214. 13:47–13:49मुगा का मानसिक संट्रास
  215. 13:49–13:55अदरास और जालिम के शरीर पर अपने ही बहाँयों दवारा दिये गवे गाओ जो शाएत कभी नहीं बभरेंगे.
  216. 13:55–13:59कीमद तो चुकानी ही परती है बड़ाव के लिए.
  217. 13:59–14:01लेकिन ये सब एक भयानक चितावनी है.
  218. 14:01–14:04समाज असल में ये सन्टेष देरा है,
  219. 14:04–14:34ये दे आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आ� आप आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ
  220. 14:34–15:04अदिग तो अदिग तो अदिग था मैं इसे इनकार नहीं कर नहीं अदिग तो अदिग तो अदिग तो दिग तो दिग तो दिग तो दिग तो दिग तो दिग तो दिग तो दिग तो दिग तो दिग तो दिग तो दिग तो दिग तो दिग तो दिग तो दिग तो दिग तो द
  221. 15:04–15:08उस्विकार करता हूँ की उनके साहस में एक अदम में आबहा मंडल है,
  222. 15:08–15:13लेकिन हमें इस जीद के पीचे चिपी त्रासदियों को बिलकुल नहीं भूलना चाहिये.
  223. 15:13–15:21ये कहानी हमें दिखाती है, कि अंतर जाती ये समबन्द इतिहास में कभी भी केवल दो लोगों का मामला न नहीं रहे है.
  224. 15:21–15:24आप वो हमेशा एक समाजिग भूचाल लाते है.
  225. 15:24–15:28बिल्कुल, पट्टू की मुद्ट और परिवार का रक्त पात
  226. 15:28–15:31हमें याद दिलाता है की हमारा समाज कितना कठोर है.
  227. 15:31–15:34यह इस बात का एक बहुत ही प्रामानिक दस्तावेज है,
  228. 15:34–15:36की व्यवस्ता जब खत्रे में होती है,
  229. 15:36–15:39तो वो प्रेम करने वालों को या तो मार देती है,
  230. 15:54–15:55सही कहा.
  231. 15:55–15:58लिकिन एक बात, जिस पर हम दोनो निष्च्ट्रूप सहमत है,
  232. 15:58–16:01वो ये है कि गजेंद्र ताकुर दवारा समपादित,
  233. 16:01–16:04मुंगा आजालिम सिंग की ये गाता,
  234. 16:04–16:07केवल इक सादारन या सतही लोग कता नहीं है.
  235. 16:07–16:09बिलकल नहीं, ये महेज एक कहानी नहीं है,
  236. 16:09–16:15ये 18 वी और उन्नीस्वी सदी के बेत्या राज के समय की समाजिक जटिल्ताओ,
  237. 16:15–16:21सत्ता के समी करनों और व्यवस्तागत हिन्सा का एक बहुत्ती गेरा समाज शास्त्रिये दस्तावेज है.
  238. 16:21–16:27राग, और ये हमें मजबूर करती है कि हम अपने अटीट के समाजिक दाचो,
  239. 16:27–16:31बिना किसी रोमान्टिक चष्मे के देखें
  240. 16:31–16:31एक दम सही
  241. 16:31–16:34इस में तलाशने के लिए समजने के लिए
  242. 16:34–16:36अभी भी बहुत सी परते बाखी है
  243. 16:36–16:39और इसी लिए ये विमर्ष इतना महत्वपून है
  244. 16:39–16:43तो अन्त में, हम वापस उसी सवाल पर आते है
  245. 16:43–16:48जालिम सिंग और मुंगा ने समाज की उस गेहरी खाई को पार तो किया,
  246. 16:49–16:54लेकिन रास्ते में जो कुछ भी तूटा और भिख्रा वो हमें सोचने पर मजबोर करता है.
  247. 16:55–16:57बलकल ये श्रोताव किल ये सोचने का विशै है.
  248. 16:57–17:02अगिन तजबाब च्पे हैं जिने खुजना अभी बाखी हैं।
  249. 17:02–17:08आज कि लिए बस इतना ही, सोचने और सवाल पुचने का यसिल सिला जारी रख्ख्ये।

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तो इतिहास में जब भी हम महान प्रेम कठावों का जिकर करते हैं तो हमारे दिमाग में अकसर अजित सबीरे उबरती हैं, जवाप्रेमी या तो समाज से हार मान लेते हैं। आप या फिर किसी आदर्ष दूनिया में चले जाते हैं। बिलकुल अगशर अज्सी तस्वीरे उबहरती हैं जहां प्रेमी या तो समाज से हार मान लेते हैं आप या फिर किसी आदर्ष दूनिया में चले जाते हैं बिलकुल लेकिन ख्या हो अगर मैं आप से कहुं के अथारवीं या उनीस्फी सदी के भिहार के बेत्या राज मे एक अज़्ी खूनी और यतार्ट वादी प्रेम कता रची गगी जाहा एक सिपाही और एक हाँश्ये पर रहने वाली कन्न्या ने समाज के सबसे क्रूर नियमों को सीदे चुनाती दी. ये बहुती दिल्चास्प और जटिल विशे है, आज हम गजेंद्र ताकुर दोरा समपादित मुंगा आज आलिम सिंकी अटिहासिक प्रिष्ट भूमी पर बात कर रहें. सही कहा आपने, ये एक राजपूट सिपाही, जालिम सिंग और एक दूसाथ समवुदाय की कन्या, मुंगा के भीज प्रेम, प्रतिषोद और वूजुद की गाता है, और यही से हमारा आज का मुख्य वैचारिक प्रष्न जन में लेता है. जो की बहुत इसीदा है, मतलब क्या ये कहानी इस बात का अखात्या प्रमान है कि विक्तिगत इच्छाखती अर सच्चा प्रेम समाज की सबसे कठोर भेड्यों को तोर सकता है. आपके इस उद्साह को समच्ता हूँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँँ अपने आस्पास के लोगों का विनाश च्छलत आगर मिलती भी है, तो वो बहारी रक्त पात और अपुरनी एच्छती की नीव पर खडी होती है. अपकी आप यह बाद सोचने पर मजबूरतो करती है, लिकिन आए आए हम श्रवाथ से चथा की मुल वहटनाउ को समजें। अपकी ये बाद सोचने पर मजबुरतो करती है, लेकिन आए आए आम शुर्वाथ से इस कता की मुल गटनागो को समजें, बेतिया राज के उस दोर में, जहां एक राज पूथ सिपाही का समाज में एक सपाष्ट वरचस्वद हा, अप्रुद निव पर खडी होती है आपकी ये बाद सोचने पर मजबूरतो करती है लिकिन आए आए हम शुर्वाथ से इस कता की मुल गटनाग को समजें बेतिया राज के उस दोर में जहां एक राज पुट सिपाही का समाज में एक सपाष्ट वरचस्वत हा इनार, यानी गाँके कूए, के पास जालिम और मुगा की पहली मुलाकात को देखीए. आँ, वो द्रिष्ष काफी प्रभाव शाली है, है न? जालिम को यी सादारन विक्ती नहीं है, वो भेतिया राजा के एक शक्ती शाली सर्दार है. जब अबने गोडे पर निकलता है तो लोग रास्ता चोड दिते हैं तुसरी और मुंगा एक दूसाद कन्या है जो उस समें के सामाजिक पडानुक्रम में भिलकुल हाँश्ये पर है सही बात है, एक दम निचले पाइदान पर फिर पी जालेम का निरने देखे गाँके गुरु मूनी बाभा जिनके वचनों को उस समाज मिक कानुन से भी बडखर माना जाता ता जवे वे स्पाष्ट रूप से चितावी दिते हैं की मुंगा का संग चोर दे तो जालिम सिंग उस आमोग सलाज को सिरे से कारइज कर देता है बद्यान एक बात है. बस एक सेक्टन, मैं आपनी बात पूरी कर लूँ. हमें ये समजना होगा, कि उस समहें किसी गुरू की बात तालना, महेंजेख आस सहमती नहीं ती. ये पूरी समाजिक विववस्ता कि खिलावे खुलाविद्रोओ था. ये दिखाता है कि जालिम सिंग किसी विवस्ता का गुलाम नहीं ता वो अपने फैसले खुद ले रहा था ये उसकी विक्तिगत आजादी का चरम बिन्दू है एक मिनेट, मैं यह आपको रोकना चाहूंगा आप मुनी बाबा की चेतावनी को खारिज करने को विक्तिगत आजादी कहरेंगें लेकिन क्या सच्मे आजा है? मुनी बाबा कोई खलनाएक नहीं ते वे उस समाच के एक एसे प्रतिनिदी दी ते जानते ते की ये दाचा कैसे काम करता है मतलब वो उसे बचाना चाहते थे? भिलकल वे जानते थे के एक राजपूथ और दूसाद के मिलन का परनाम क्या होगा? और जालिम का वो निरने स्वतन्त्र शुन्निता में लिया गया था जैसे ही वो ये निने लेता है, बेत्या दर्बार की साजिषन शुरू हो जाती हैं. दर्बार का एक अनने दर्बारी प्रिथवी पल्सिंग, जालिम की इस च्तिती का फपडा उठाता है. आप, वो राजा के कान बहरता है. आप, यों बहरता है? कुकी जालिम ने जो समाजिक नियम तोडा उसे राजनितिक रूप से कमजोर कर दिया था. सामन्ती वेवस्ता में जैसे ही आज समाज के स्थापित नियमो को तोडते हैं, सत्ता के गल्यारो में बेटे गिद आपको नोचने किले तगारो जाते हैं. ये तो है जालिम की ये आजादी असल में उस जाल के शुर्वात थी जिसने अंतता कई लोगो की बली ली मैं इस बहाथ से बलकुल इंकार नहीं करती के प्रत्ट्वीपाल सिंग ने कुच्ट्ट्रर आचे लेकिन आप दिक्छे कि उनकुचक्रों की भीज भी क्या उबरकर सामने आता है पट्टू का चरित्र आ, पट्टू, मल्ला आ, पट्टू, जुकी एक मल्ला अ था वो जालिम सिंक के लिए प्रिठ्वी पाल सिंके गुन्डो से अकेले बिड़ जाता है वो पहली बार में तल्वार से उन सब का सर्द़ से अलग कर देता है और अंतता अपने प्रानो की आहुती दे दे देता है अब अगर ये कहानी सर्व जातिगत हिंसा के बारे में होती तो एक मल्लाह एक राजपूट सिपाही किले अपनी जान क्यो देता? उआद बाद का प्रमाण है कि इनसाने जाती की भेडियों को तोर सकती है? मुझे माझ्द की जेगा लेकिन मैं पत्तू के इस बलिडान को रोमैंटिसाइस करने से बिलकुल असहमत हूँ. अर समाजिक पदानुक्रम से बहुत उपर थी पट्टू की मुद्त एक तरासदी हो सकती है लेकिन उसका लडना इस बात का प्रमाण है के इनसाने जाती की भेटीों को तोर सकती है मुझे माझ्द की जेगा, लेकिन मैं पट्टू के इस भलिदान को रोमैंटिसाइस करने से बिलकुल असहमत हूं देके अगर अगर अगर अपने पीचे के कारन को समजें तो पत्टू कब लिदान प्रेम की जीत नहीं है ये इस बात का नगन सत्ते है कि राज शाही और सामन्ती सत्ता का बोज बवोज अमेशा सबसे कमजोर तबके पर गिरता है वर उसने आपनी मरजी से लड़ाई चूनी थी पट्टू एक मलाह था दरभार की दूशित राजनी ती राजा और प्रत्विपाल के भीछ हो रही थी संगर्ष जालिम की समाजिक बगावत का ता अद्वार्द का था लेकिन खुन किसका बहाज? एक निर्दोश मलाह का. पट्टू का अपनी जान गवाना ये दर्षाता है, कि उस वेवस्ता में निच्ले तबके के लोगों की जान की कोई कीमत नहीं ती. ये थोडा निराशा जनक नजर्या है. अप पट्टु गे निरने की स्वायत्ता को पूरी तरह से नकार रहे हैं, जो मुझे लकता है कि उसके चरित्र के सात अन्देगाई अप पूरी रहे है। अप पूरी लेगाई बादा पूरी लेगाई पूरी रहे है। अप पूरी लेगाई बादा पूरी रहे है। अगर आप बाग ग़ाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग बाग ब लेकिन तीक उसीक शन जब कनूवा मुंगा पर अपना खाडा उठाने वाला होता है, जालिम वहां पहुचता है. अग, और वो उसे मार देता है. बिलकुल, कता कि अनुसार जालिम वहां किसी जासुस की सुचना से नहीं, अपके इसाप से यह ख्या है? यह अपने बागे को खुड लिखा, उसने एक स्थापित ताकत को चुनाती दी, और उसे परास्त किया, यह प्रेम की अजे शकती नहीं तो और क्या है? देखे वो द्रे लिए बागे को उस्थापित ताकत को चुनाती दी, अब ये की चरम सीमा है, उसने बागे को खुद लिखा, उसने एक स्थापित ताकत को चुनाटी दी, और उसे परास्ट किया. ये प्रेम की अजे शकती नहीं तो और क्या है? दिक्ये वो द्रिष्छ निस्सन्दे हे रोंक्ते कडे खडेने वाला है और जालिम का पराक्रम भी असादारन है लिकिन मैं आप से पुछना चाता हूँ कि मुंगा भेतिया के उस गने जंगल में भली की वेदिपर पूची ही क्यों? अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अग, अ� अर कन्वा के हते चडना राज शाही दवारा थोपे गाए वन्वास का सीदा परणाम था. अर कन्वा को देखिए वो मुंगा के ही समुदाये का है? आ, ये कजी बिडंबना है. ये एक बहुत ही महतोपून समाज शास्त्री बिन्दू है. जब व्यवस्ता को खट्रा मैजुस होता है, तो वो हाशिये के समवदायों को ही आपस में लवा देती है. कनूवा का मुंगा की बली देना ये दिखाता है कि हाशिये का समाज भी उच्छ वरग के दबाव में अपनी ही लगकियों को दन्टित करने लकता है. ये तो है जालिम को कनवा से लडना पडा किंकी राजशाही ने उने एक असे कोने में दखेल दिया दाखा जाहा मरिद्ट्व। या हत्या के अलावा कोई विकल्प नहीं बचाथा ये बहागे को खुड लिखना नहीं है अप यह खॉर विवस्ता दूरा पैदा की गई अस्तिट्व के संकत की स्थिती है. मैं आप की इस प्रश्व कुकर वाली बाथ से सहमत हूँ कि समाज ने उने बाहर दھकेला. लेकिन आप उस शवन के महत्वो को नजर अंदास कर रहे है, जो कन्वा की म्रित्यों के टीक बाद आता है आप सिंदूर दान की बात कर रही है आप उसी जंगल में उसी म्रित्यों और रक्टपात की च्याया में जालिम मुंगा की माग में सिंदूर बरता है वो कोई चिपकर की आगाय कारे नहीं ता और इसके बाद वो मुंगा को लेकर अपने गाँ वापस आता है. और समाज के सामने, अपने परिवार के सामने, दंके की चोट पर उदब गोषना करता है, कि ई रमर जनानी ची, यानी ये मेरी पतनी है. एक शक्तिषाली राजपूट सर्दार के मुद से, अपने ही आंगन में ये गोशना इस बात का अकाट्ट्या प्रमान है, कि जाती की दिवार उसके लिए ब दहे चुकी ती. लेकिन दिवार दही कहाँ? मिरा मतलब है, विवस्ताने उने कोने में ज़रूर दھकेला होगा. लेकिन उस कोने से वापस आखर उनहोने जो निरने लिया उसी विवस्था के मुए एक करारा तमाचा था. उनहोने दरके आगे गुतने नहीं टेके. और उस तमाचे की प्रतिक्रिया क्या हुई? क्या समाज ने उने गले लगा लिया? ये इस गाता का सब से अंद्कार मैं और मनोवे ग्यानिक रूप से जटिल हिस्सा है जिसे आप एक जीट की तरा पेश कर रही हैं आप भायोंगे हमले की बात कर रही हैं हाँ जब जालिम मुगा को गर लाता है तो बाहरी धुशमन या राजा के सेनेक उस पर हम्ला नहीं करते, उसके अपने ही सगे भाई, कुमर और अन्ने, अपने ही खुन पर जान लेवा हम्ला कर देते हैं, विज्जालिम को लहु लूहान कर देते हैं. जाच में बहुत दूखध था. और क्यों? क्या वे जालिम से नफरत करते थे? नहीं, हमें यहां उस समें की दाचागत वास्तविक्ता और जाती गड चिंता जिसे हम कास्ट अंग्जाइती कहते हैं को समझना होगा एक सामनती समाज में जाती की शुद्द्दता अद्ता सीदे तोर पर जमीन के मालिकाना हक और पन्चायत में आपके रुदभे से जुडी होती थी. आप, सामाजिक पूंजी बहुत माएने रकती थी. बलकुल, एक दूसात कन्या को गर की भहु बनाने का मतलप था, कि उस पर्वार का पूरे भेतिया राज में हुख्का पानी बन दोजाना. बायोंने जालिम पर तल्वार इसलीये उठाए, किवकि रक्त समवन्डों पर जातिगत आहंकार, और वूजुद कर दर भारी पड़गया था. ये कैसा सुखान तें, ज़ाह आपनो काई खून बहाना पडे मैं मानती हूँ की बायों का हमला एक बहुत इगग्ड़ा और मानसेख रूप से तोड देने आगाद था ये सच है की आपनो ने वार किया था लेकिन यहाँ आपको मुगा की बूमिका काविष्लेषन करना चाहीए वूगा की बूमिका आप जो कन्या इनार के पास सिपाही के गोडे की ताप सूनकर लाज अर दरसे बहाग गगी ती वही मुंगा अब गायल जालिम को लेकर वेद्धे के दवार पर पहुचती है. वो राद बर जाकगर अपने पती के प्रानो की रक्षा करती है. मुंगा की वो खामोषी और उसका उदहरे किसी हत्यार से कम नहीं ता. ये तो मैं बिमानत्ता हूँ कि वो बहुत सहासी ती. और अंतता है तफीग परिनाम क्या निकलता है? जालिम की माग का उने स्विकार करना. और जो भाई उसे मारने आइ ते, जब वे वापस लोटते हैं, और जालिम के शरीर पर अपने ही भारा दियेगा गेरे गवव देकते हैं तुवे पूट पूट कर रोने लकते हैं उंगगगुँँँँ पश्चाताः कोई सादारन गख्ना नहीं है यस सिद्ध करता है, की प्रेम और मानविये पीडा में वो ताकत है जो समाज के सबसे कथोर आहंकार को भी पिगला सकती है बहायों करोना इस बात का प्रमान है कि प्रेम ने अंततह उस समाजिक धाचे को भीतर से तोड़ दिया था मुझे खेद है, लेकिन मैं बहायों के उस रुदन को किसी स्ताई विवस्तागद बदलाव के रूपने नहीं देख पाराँ। अगर हम अज्छे मनोविच्ण्यान के चश्मे से देखें, तो बहाँईों करोना एक सवावर गिल्ट, या एक शनिक भावनात्मक उद्वेग हो सकता है. सच्चाई यह आई कि वे उसे जान से मारने ही वाले थे लेकिन उनो ने उसे मारा नहीं पर आप इस तत्ठे को कमतर आख रही हैं किस थोडे से बड़ाव कि कीमत क्या थी पट्टो की लाश, कनूवा का रक्त, दरबार की साजिषे मुगा का मानसिक संट्रास अदरास और जालिम के शरीर पर अपने ही बहाँयों दवारा दिये गवे गाओ जो शाएत कभी नहीं बभरेंगे. कीमद तो चुकानी ही परती है बड़ाव के लिए. लेकिन ये सब एक भयानक चितावनी है. समाज असल में ये सन्टेष देरा है, ये दे आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आप आ� आप आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ� आ अदिग तो अदिग तो अदिग था मैं इसे इनकार नहीं कर नहीं अदिग तो अदिग तो अदिग तो दिग तो दिग तो दिग तो दिग तो दिग तो दिग तो दिग तो दिग तो दिग तो दिग तो दिग तो दिग तो दिग तो दिग तो दिग तो दिग तो दिग तो द उस्विकार करता हूँ की उनके साहस में एक अदम में आबहा मंडल है, लेकिन हमें इस जीद के पीचे चिपी त्रासदियों को बिलकुल नहीं भूलना चाहिये. ये कहानी हमें दिखाती है, कि अंतर जाती ये समबन्द इतिहास में कभी भी केवल दो लोगों का मामला न नहीं रहे है. आप वो हमेशा एक समाजिग भूचाल लाते है. बिल्कुल, पट्टू की मुद्ट और परिवार का रक्त पात हमें याद दिलाता है की हमारा समाज कितना कठोर है. यह इस बात का एक बहुत ही प्रामानिक दस्तावेज है, की व्यवस्ता जब खत्रे में होती है, तो वो प्रेम करने वालों को या तो मार देती है, सही कहा. लिकिन एक बात, जिस पर हम दोनो निष्च्ट्रूप सहमत है, वो ये है कि गजेंद्र ताकुर दवारा समपादित, मुंगा आजालिम सिंग की ये गाता, केवल इक सादारन या सतही लोग कता नहीं है. बिलकल नहीं, ये महेज एक कहानी नहीं है, ये 18 वी और उन्नीस्वी सदी के बेत्या राज के समय की समाजिक जटिल्ताओ, सत्ता के समी करनों और व्यवस्तागत हिन्सा का एक बहुत्ती गेरा समाज शास्त्रिये दस्तावेज है. राग, और ये हमें मजबूर करती है कि हम अपने अटीट के समाजिक दाचो, बिना किसी रोमान्टिक चष्मे के देखें एक दम सही इस में तलाशने के लिए समजने के लिए अभी भी बहुत सी परते बाखी है और इसी लिए ये विमर्ष इतना महत्वपून है तो अन्त में, हम वापस उसी सवाल पर आते है जालिम सिंग और मुंगा ने समाज की उस गेहरी खाई को पार तो किया, लेकिन रास्ते में जो कुछ भी तूटा और भिख्रा वो हमें सोचने पर मजबोर करता है. बलकल ये श्रोताव किल ये सोचने का विशै है. अगिन तजबाब च्पे हैं जिने खुजना अभी बाखी हैं। आज कि लिए बस इतना ही, सोचने और सवाल पुचने का यसिल सिला जारी रख्ख्ये।

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