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बोधि_कायस्थ_का_गंगा-लाभ.mp4

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Part 10 · VIDEHA MITHILA MAITHILI DISCUSSION CRITICISM SERIES PART 10
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  1. 0:00–0:04चली आज एक बेहत दिल्चस्त कहानी में गोता लगाते हैं
  2. 0:04–0:08आजके इस विष्लेषन में हम मित्ला के सम्रद आद्ध्यात में कि तिहास,
  3. 0:08–0:14वहांकी लोग कताव और शाहित्तिक विरासत की एक अदबुत यात्रा पर निकलने वाले हैं
  4. 0:14–0:18ये कोई आज़्ी वेसी कहानी नहीं है, बलकी एक आज़्ी दास्तान है,
  5. 0:18–0:20जो सद्यों से वहाके लोगो के दिलों में दधगग रही है.
  6. 0:20–0:24तो आई ये एस पूरी एतिहासे गठना को गेराइ से समझते हैं.
  7. 0:24–0:29अर देकते है कि कैसे एक आमर कता हमारे सामने जीवन छोडती है?
  8. 0:29–0:32बज़ सुख सार पावल तो दीरे
  9. 0:32–0:36यानी, तुमहारे तटपर मैंने महान सुख और सार पाया
  10. 0:37–0:40महान कवी विद्द्यापती की रची ये लैने
  11. 0:40–0:43मित्ला की सामस्क्रतिक पहचान का मानो एक एहम हिससा है.
  12. 0:43–0:48अज ख़िज तब आप बज़ापती जैसे महान कवी को ये आमर पंड्डिया लिखने पर मजबूर कर दिया.
  13. 0:48–0:55असल में ये स्रफ एक कविता नहीं है, बलकी एक असल एतिहासिक चमतकार का प�रा काव्यात मकसार है.
  14. 0:55–1:00अप ख़ानी में गज्राई तक जाने से एक बेहत जरूरी को समझना बहुत अवष्च्छेख है और वो है गंगा लाब आखर इसका असल मतलप क्या है
  15. 1:00–1:04अद्यापती जेसे महान कवी को ये आमर पंक्तिया लिखने पर मजबूर कर दिया.
  16. 1:04–1:07असल में ये सर्फ एक कविता नहीं है,
  17. 1:07–1:11बलकी एक असली एतिहास इक चमतकार का पुरा का पुरा काव्यात मकसार है.
  18. 1:11–1:14अब कहानी में गेराई तक जाने से बहले
  19. 1:14–1:17अग भी बेहत ज़रूरी कुन्षेप्त को समजना बहुत आवष्च्छिक है
  20. 1:17–1:19और वो है गंगा लाब
  21. 1:19–1:21आखर इसका असल मतलब क्या है
  22. 1:21–1:23दिक्ये, मित्ला की परमप्रा में
  23. 1:23–1:26अपनी इच्छा से, यानी सुएच्छा से
  24. 1:26–1:28गंगा नदी के पावन तद पर
  25. 1:28–1:31अपने प्रान त्यागने को गंगालाब कहाजाता है
  26. 1:31–1:35इसे मोखष पाने का सबसे बड़ा और उच्छम मारग माना गया है
  27. 1:35–1:38इस शवद को ज़न में रखना बहुत जरूरी है
  28. 1:38–1:41क्युकी हमारी आजकी ये पूरी कहानी
  29. 1:41–1:43इसके कडे अद्यात्मिक नियम
  30. 1:43–1:47अर संस्क्रतिक महत्व इसी एक अंतिम लक्षे के एडगिर्द गूमते हैं.
  31. 1:47–1:50अद्द्याय एक निश्कलंक दरबारी
  32. 1:51–1:53तु चलिये समय में तोड़ा पीछे चलते हैं.
  33. 1:53–1:55प्राचीन मितला के राज दरबार की कलपना की जिये.
  34. 1:55–1:59यही हमारी मुलाकात होती है इस कहानी के मुख्य पात्रसे, बोदी कायस.
  35. 1:59–2:03बोदी कायस राजा के दरबार में काम करने वाले एक दरबारी थे.
  36. 2:03–2:08उनहे बस एक सादारन सा वेतन मलता था, जिसे किसी तरह उनका गुजर बसर होपाता था.
  37. 2:08–2:11लेकिन सत्ता के इतने करीब होने के बावजुद
  38. 2:11–2:15उनका जीवन असादारन रूप से सादा समान जनक
  39. 2:15–2:19और सच कहें तो पूरी तरह से भेदाग या निष्कलंक �the.
  40. 2:19–2:23अब जरा सोची ए राजा के इतने करीब रहने वाले
  41. 2:23–2:26किसी सामान ने राज्दरबारी की जिन्दिगी कैसी हुती है?
  42. 2:27–2:29दन का लालच, सबता की भूग, और ब्रस्टचार,
  43. 2:30–2:31ये सब तो आम बाद है, है ना?
  44. 2:32–2:35लेकिन बोद्धी कायस्त बिलकुल अलग मित्ती के बने दे.
  45. 2:35–2:39उनो ने जीवन बर, हिन्सा और लालच को खुछ से कोसो दूर रखा,
  46. 2:39–2:42और सबसे हेरान करने बात टू ये ती के,
  47. 2:42–2:45अपनी जरूरत से ज़ादा जोब ही कमाई उने होती,
  48. 2:45–2:47उसे वूस शीधे डान पुने में लगा देते थे.
  49. 2:47–2:50बवाग्वान श्व्व के प्रति उनकी जो अगाद भक्ती थीना
  50. 2:50–2:54असल में वही उनके इस भेदाग जीवन कष्बसे बड़ा आदार थी.
  51. 2:54–2:57अद्ध्याए दो अन्तिम अद्ध्यात्मिक यात्रा
  52. 2:57–3:27जेईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईई
  53. 3:27–3:31सब कुछ पीछे चोड़कर एक अन्जान मुशकल सफर की योर.
  54. 3:32–3:34अब इस सफर की ताईमलाईन पर गवर करते हैं.
  55. 3:34–3:35एक व्रिध्धष शरीर,
  56. 3:35–3:38लेकिन अद्द्यात मिक संकलप इतना अदिग,
  57. 3:38–3:40कि उनोने अपना सब कुष त्याएक दिया.
  58. 3:40–3:46वे मीलो तक पैडल चलते रहे, शारे रेग कमजोरी के बाव जुद उनका होसला नहीं तूटा,
  59. 3:46–3:49और आखिर कार वे गंगा नदी के आसपस पहची गय.
  60. 3:49–3:54लेकिन यहां एक बहुत बडा टूएस्ट है, अन्तेम परिक्षा अभी बाकी ती.
  61. 3:54–3:57सब से हरानी की बात यह उई कि वे नदी के बिलकुल तद्तक नहीं गय?
  62. 3:58–4:02बलकी वे तद्त से आदा कोस, यानी लगगग देड कोलो मीटर दूरी रुगगय.
  63. 4:03–4:06अद्याय तीन आस्था की सब से बड़ी परिक्षा.
  64. 4:06–4:19अब यहां आखर कहानी एक बहुती क्रिटिकल मोड लेती है, वो आदा कोस दूर रुग गय, और फिर भोदी कायस्तने एक बहुती साहसिक या यों कहें कि बिलकुल अप्रत्याशित कदम उठाया.
  65. 4:19–4:22उन्हो ने आगे बगगर नदी को चूँने की कोशिष नहीं की,
  66. 4:22–4:27बलकी उसी दूरी से, वही खडे होगर गंगा मा को संबोदित किया.
  67. 4:27–4:32उन्हो ने दूर से ही पुकारा की मास स्वैम आए और उने पवित्र करें.
  68. 4:32–4:35अब यहा ये समझना बहुत जरूरी है,
  69. 4:35–4:38कि इतनी दूर से नदी को पुकारना,
  70. 4:38–4:41उनका कोई आहिंकार या कोई गमन्द बलकुल नहीं था.
  71. 4:41–4:46बलकी ये एक बखत का पूरी तरहां से आत्मसमरपन था.
  72. 4:46–4:50एक भेहद मासुम, निष्चल और अन्तिम पुकार.
  73. 4:50–4:56ये आसल में उंके उसनिश कलंक जीवन और अटूड आस था की आक्फरी परीक्षा थी,
  74. 4:56–4:59जिसे बोदी कायस्त्तने पूरी जिन्दिगी जीया था.
  75. 4:59–5:02क्या उनके जीवन बरकी सच्चाई इतनी मज्बूद थी,
  76. 5:02–5:05कि स्वयम प्रक्रती ही उनके पुकार सून ले?
  77. 5:05–5:07सवाल बहुत बड़ा था
  78. 5:07–5:08अद्धाय चार
  79. 5:08–5:11एक चमत कारिक इश्वर्या लगा
  80. 5:11–5:11शेप
  81. 5:11–5:15और फेर एक अज़्ा अग कल्पनी एचमत कार हूँँँ
  82. 5:15–5:18जिसने प्रक्रती के सारे नियमो को ही चुनाती देदी
  83. 5:18–5:21गंगा माने सच्छ्मुछ अपने तद तोर दिये
  84. 5:21–5:24उनो अपनी प्राक्रतिक सीमाव को पार किया,
  85. 5:24–5:26और उफन्ती हुई आदा कोस दूर बेटे,
  86. 5:26–5:28अपने उस शच्चे बख्तक पहुज गई,
  87. 5:28–5:31और उने अपने भीतर समाहित कर लिया.
  88. 5:31–5:33शच्च में रोंग्टे कडे कर देने वाल पल.
  89. 5:33–5:35ये गटना साभिट करती है,
  90. 5:35–5:38कि अगर हिरदे में सच्छी दग्मगाने वाली नहीं
  91. 5:38–5:43बलकी अटूट भक्ती हो, तो वो पूरी प्रक्रती को भी अपनी जगाए से हिला सकती है.
  92. 5:43–5:46तो इस भेदाग पवित्रता का प्ल क्या मिला?
  93. 5:46–5:49बोदि कायस्त को तुरन स्वर की प्राथि हुए
  94. 5:49–5:53बना किसी एकस्ट्टपस्या या लंभी प्रतिक्षा की,
  95. 5:53–5:56इस पूरी गाता का जु सबसे बड़ा मोरल यानी सार है,
  96. 5:57–6:02वो ये है के दिखावे वाले बहरी कर्म कान्डो से कही जाडदा पावर्फुल होती है,
  97. 6:02–6:05रिदे की शुद्द्रता और जीवन की सत्ति निष्था.
  98. 6:05–6:10अवेशा किसी भी बहरी कर्मकान्द या रीती रिवाज से बहुत-बहुत बड़ा होता है.
  99. 6:11–6:14अद्याय पाच एक आमर साहितेक विरासत.
  100. 6:15–6:19जाहर है, बोदिक अयस्त का ये असादारन चमतकार कभी भुलाया नहीं जासकता था.
  101. 6:19–6:21कभी भुलाया नहीं जासकता ता.
  102. 6:21–6:26महान विद्वान विद्ध्यापती ने अपने मशुर संस्क्रित ग्रन्थ पूरूश परिक्षा में
  103. 6:26–6:29इस पूरी गटना का पहुत ही विस्तार से वरनन किया.
  104. 6:29–6:33और इसी अटिहासे गटना से गहराई तक प्रेरिथ हो कर,
  105. 6:33–6:35उनो ले वो आमर मेठली कविटा रची
  106. 6:35–6:37जिसका जिक्र हम ले एक दम शुवात में किया ता
  107. 6:37–6:41इसी तरह, बोदी कायस्त का ये चमतकारिक अनुबहव
  108. 6:41–6:44साहित्ते के पन्नो में हमेशा-हमेशा के लिया मर होगया
  109. 6:44–6:48और इस गतना का असर इतना गेहरा पडा
  110. 6:48–6:55कि मित्फला की लोग कताव में, बोदी कायस्त का नाम एक आदर्ष म्रित्व का पर्याए ही बन गया.
  111. 6:55–7:01पीडियों तक ये बाद कुझती रही, और बोदी कायस्त की तरहें मरना वहा एक मुहावरा बन गया.
  112. 7:01–7:07ये इश्वर ये क्रिपा और एक सच्चे निश्कलंक जीवन का सबसे बड़ा प्रतीख है,
  113. 7:07–7:10जिसकी मिसाले आज भी दीजाती है.
  114. 7:10–7:14आब जैसे हम इस विष्लेशन के अंथ पर पहुचते है,
  115. 7:14–7:17एक बहुती गेरा सवाल हमारे सामने आता है.
  116. 7:17–7:26ज़रा सोची ए, आजके स मोडन युग में जगा अक सर हम बाहरी दिखावे और तरहे तरहे के करमकान्डो में उलजे रहते है,
  117. 7:26–7:31वहां बोदि कायस्त का वो सच्चा और शुद चरित्र हमें क्या सिखाता है?
  118. 7:31–7:41ये कहानी हमें सोचने पर मजबोर करती है, कि क्या हम बाहरी दिखावे से परे जाकर अपने भीतर वो सच्ची अंतरिक शुद्द्दा लासकते है?
  119. 7:41–7:48ख़र ये यक आँईसा विचार है जो भीतर तक जगजोडता है और बहुत कुछ सुचने पर मजबूर कर देता है।
  120. 7:48–7:52इस दिल्चस्प चर्चा में साथ जुडने किलिए बहुत बहुत दनेवात।

Plain text

चली आज एक बेहत दिल्चस्त कहानी में गोता लगाते हैं आजके इस विष्लेषन में हम मित्ला के सम्रद आद्ध्यात में कि तिहास, वहांकी लोग कताव और शाहित्तिक विरासत की एक अदबुत यात्रा पर निकलने वाले हैं ये कोई आज़्ी वेसी कहानी नहीं है, बलकी एक आज़्ी दास्तान है, जो सद्यों से वहाके लोगो के दिलों में दधगग रही है. तो आई ये एस पूरी एतिहासे गठना को गेराइ से समझते हैं. अर देकते है कि कैसे एक आमर कता हमारे सामने जीवन छोडती है? बज़ सुख सार पावल तो दीरे यानी, तुमहारे तटपर मैंने महान सुख और सार पाया महान कवी विद्द्यापती की रची ये लैने मित्ला की सामस्क्रतिक पहचान का मानो एक एहम हिससा है. अज ख़िज तब आप बज़ापती जैसे महान कवी को ये आमर पंड्डिया लिखने पर मजबूर कर दिया. असल में ये स्रफ एक कविता नहीं है, बलकी एक असल एतिहासिक चमतकार का प�रा काव्यात मकसार है. अप ख़ानी में गज्राई तक जाने से एक बेहत जरूरी को समझना बहुत अवष्च्छेख है और वो है गंगा लाब आखर इसका असल मतलप क्या है अद्यापती जेसे महान कवी को ये आमर पंक्तिया लिखने पर मजबूर कर दिया. असल में ये सर्फ एक कविता नहीं है, बलकी एक असली एतिहास इक चमतकार का पुरा का पुरा काव्यात मकसार है. अब कहानी में गेराई तक जाने से बहले अग भी बेहत ज़रूरी कुन्षेप्त को समजना बहुत आवष्च्छिक है और वो है गंगा लाब आखर इसका असल मतलब क्या है दिक्ये, मित्ला की परमप्रा में अपनी इच्छा से, यानी सुएच्छा से गंगा नदी के पावन तद पर अपने प्रान त्यागने को गंगालाब कहाजाता है इसे मोखष पाने का सबसे बड़ा और उच्छम मारग माना गया है इस शवद को ज़न में रखना बहुत जरूरी है क्युकी हमारी आजकी ये पूरी कहानी इसके कडे अद्यात्मिक नियम अर संस्क्रतिक महत्व इसी एक अंतिम लक्षे के एडगिर्द गूमते हैं. अद्द्याय एक निश्कलंक दरबारी तु चलिये समय में तोड़ा पीछे चलते हैं. प्राचीन मितला के राज दरबार की कलपना की जिये. यही हमारी मुलाकात होती है इस कहानी के मुख्य पात्रसे, बोदी कायस. बोदी कायस राजा के दरबार में काम करने वाले एक दरबारी थे. उनहे बस एक सादारन सा वेतन मलता था, जिसे किसी तरह उनका गुजर बसर होपाता था. लेकिन सत्ता के इतने करीब होने के बावजुद उनका जीवन असादारन रूप से सादा समान जनक और सच कहें तो पूरी तरह से भेदाग या निष्कलंक �the. अब जरा सोची ए राजा के इतने करीब रहने वाले किसी सामान ने राज्दरबारी की जिन्दिगी कैसी हुती है? दन का लालच, सबता की भूग, और ब्रस्टचार, ये सब तो आम बाद है, है ना? लेकिन बोद्धी कायस्त बिलकुल अलग मित्ती के बने दे. उनो ने जीवन बर, हिन्सा और लालच को खुछ से कोसो दूर रखा, और सबसे हेरान करने बात टू ये ती के, अपनी जरूरत से ज़ादा जोब ही कमाई उने होती, उसे वूस शीधे डान पुने में लगा देते थे. बवाग्वान श्व्व के प्रति उनकी जो अगाद भक्ती थीना असल में वही उनके इस भेदाग जीवन कष्बसे बड़ा आदार थी. अद्ध्याए दो अन्तिम अद्ध्यात्मिक यात्रा जेईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईई सब कुछ पीछे चोड़कर एक अन्जान मुशकल सफर की योर. अब इस सफर की ताईमलाईन पर गवर करते हैं. एक व्रिध्धष शरीर, लेकिन अद्द्यात मिक संकलप इतना अदिग, कि उनोने अपना सब कुष त्याएक दिया. वे मीलो तक पैडल चलते रहे, शारे रेग कमजोरी के बाव जुद उनका होसला नहीं तूटा, और आखिर कार वे गंगा नदी के आसपस पहची गय. लेकिन यहां एक बहुत बडा टूएस्ट है, अन्तेम परिक्षा अभी बाकी ती. सब से हरानी की बात यह उई कि वे नदी के बिलकुल तद्तक नहीं गय? बलकी वे तद्त से आदा कोस, यानी लगगग देड कोलो मीटर दूरी रुगगय. अद्याय तीन आस्था की सब से बड़ी परिक्षा. अब यहां आखर कहानी एक बहुती क्रिटिकल मोड लेती है, वो आदा कोस दूर रुग गय, और फिर भोदी कायस्तने एक बहुती साहसिक या यों कहें कि बिलकुल अप्रत्याशित कदम उठाया. उन्हो ने आगे बगगर नदी को चूँने की कोशिष नहीं की, बलकी उसी दूरी से, वही खडे होगर गंगा मा को संबोदित किया. उन्हो ने दूर से ही पुकारा की मास स्वैम आए और उने पवित्र करें. अब यहा ये समझना बहुत जरूरी है, कि इतनी दूर से नदी को पुकारना, उनका कोई आहिंकार या कोई गमन्द बलकुल नहीं था. बलकी ये एक बखत का पूरी तरहां से आत्मसमरपन था. एक भेहद मासुम, निष्चल और अन्तिम पुकार. ये आसल में उंके उसनिश कलंक जीवन और अटूड आस था की आक्फरी परीक्षा थी, जिसे बोदी कायस्त्तने पूरी जिन्दिगी जीया था. क्या उनके जीवन बरकी सच्चाई इतनी मज्बूद थी, कि स्वयम प्रक्रती ही उनके पुकार सून ले? सवाल बहुत बड़ा था अद्धाय चार एक चमत कारिक इश्वर्या लगा शेप और फेर एक अज़्ा अग कल्पनी एचमत कार हूँँँ जिसने प्रक्रती के सारे नियमो को ही चुनाती देदी गंगा माने सच्छ्मुछ अपने तद तोर दिये उनो अपनी प्राक्रतिक सीमाव को पार किया, और उफन्ती हुई आदा कोस दूर बेटे, अपने उस शच्चे बख्तक पहुज गई, और उने अपने भीतर समाहित कर लिया. शच्च में रोंग्टे कडे कर देने वाल पल. ये गटना साभिट करती है, कि अगर हिरदे में सच्छी दग्मगाने वाली नहीं बलकी अटूट भक्ती हो, तो वो पूरी प्रक्रती को भी अपनी जगाए से हिला सकती है. तो इस भेदाग पवित्रता का प्ल क्या मिला? बोदि कायस्त को तुरन स्वर की प्राथि हुए बना किसी एकस्ट्टपस्या या लंभी प्रतिक्षा की, इस पूरी गाता का जु सबसे बड़ा मोरल यानी सार है, वो ये है के दिखावे वाले बहरी कर्म कान्डो से कही जाडदा पावर्फुल होती है, रिदे की शुद्द्रता और जीवन की सत्ति निष्था. अवेशा किसी भी बहरी कर्मकान्द या रीती रिवाज से बहुत-बहुत बड़ा होता है. अद्याय पाच एक आमर साहितेक विरासत. जाहर है, बोदिक अयस्त का ये असादारन चमतकार कभी भुलाया नहीं जासकता था. कभी भुलाया नहीं जासकता ता. महान विद्वान विद्ध्यापती ने अपने मशुर संस्क्रित ग्रन्थ पूरूश परिक्षा में इस पूरी गटना का पहुत ही विस्तार से वरनन किया. और इसी अटिहासे गटना से गहराई तक प्रेरिथ हो कर, उनो ले वो आमर मेठली कविटा रची जिसका जिक्र हम ले एक दम शुवात में किया ता इसी तरह, बोदी कायस्त का ये चमतकारिक अनुबहव साहित्ते के पन्नो में हमेशा-हमेशा के लिया मर होगया और इस गतना का असर इतना गेहरा पडा कि मित्फला की लोग कताव में, बोदी कायस्त का नाम एक आदर्ष म्रित्व का पर्याए ही बन गया. पीडियों तक ये बाद कुझती रही, और बोदी कायस्त की तरहें मरना वहा एक मुहावरा बन गया. ये इश्वर ये क्रिपा और एक सच्चे निश्कलंक जीवन का सबसे बड़ा प्रतीख है, जिसकी मिसाले आज भी दीजाती है. आब जैसे हम इस विष्लेशन के अंथ पर पहुचते है, एक बहुती गेरा सवाल हमारे सामने आता है. ज़रा सोची ए, आजके स मोडन युग में जगा अक सर हम बाहरी दिखावे और तरहे तरहे के करमकान्डो में उलजे रहते है, वहां बोदि कायस्त का वो सच्चा और शुद चरित्र हमें क्या सिखाता है? ये कहानी हमें सोचने पर मजबोर करती है, कि क्या हम बाहरी दिखावे से परे जाकर अपने भीतर वो सच्ची अंतरिक शुद्द्दा लासकते है? ख़र ये यक आँईसा विचार है जो भीतर तक जगजोडता है और बहुत कुछ सुचने पर मजबूर कर देता है। इस दिल्चस्प चर्चा में साथ जुडने किलिए बहुत बहुत दनेवात।

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