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चाँद_सौदागर_और_बिहुला_की_बगावत.m4a

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Part 10 · VIDEHA MITHILA MAITHILI DISCUSSION CRITICISM SERIES PART 10
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  1. 0:00–0:08इक बार सोचने की कोशिष करते है की एक आसा पिता, जिसके अपने ही आंगन में एक के बाद एक, उसके सातो जवान बेटों की लाशें बिची हूं।
  2. 0:08–0:10मतलब ये सोचना ही कितना...
  3. 0:10–0:13बहुती खफनाख है, रोंगतें कडे कर देने वाला द्रिष्च.
  4. 0:13–0:14बिलकल.
  5. 0:14–0:18पूरा नगर त्राही त्राही कर रहो, लोग पैरो में गिर रहों कि भैई बस एक बार,
  6. 0:18–0:22स्रिव एक बार उस सामने कडी सत्ता के अगे सिर जुकालो,
  7. 0:22–0:23मापी मागलो
  8. 0:23–0:26लेकिन वो पिता उन साथ चितावो के भीज कडा है
  9. 0:26–0:29और सत्ता की आखो में आखेडाल कर कहरा है कि
  10. 0:29–0:32मैं अपना सब कुछ राक होता देख लुगा
  11. 0:32–0:34लेकिन तुमहारे अगे सिर नेजूकाूंगा
  12. 0:34–0:37और ये कोई मतलप कोई फिल्मी द्रिष्छे नहीं है
  13. 0:37–0:38आप बिल्प्री है
  14. 0:38–0:41ये कैसी गाता है, जहां अईन्सान का हद्त,
  15. 0:41–0:44सीदे देवताँं के एहंकार से तकराता है
  16. 0:44–0:46तो आज ददीब डाइप किस गहन चर्चा में
  17. 0:46–0:54अपने हम गजेंदर ताकुर दोरा समपादित एक बेहद शक्ती शाली स्रोथ समगरी बेहुला चंपानगर की सती के पन्नो में उतर रहें.
  18. 0:54–0:56और हमारा आज का मिशन यही समझना है,
  19. 0:56–0:58कि जब आसी मित इश्वरीय शकती
  20. 0:58–1:01और आजे मान्विय आस्था आमने सामने आती है,
  21. 1:01–1:02तो आसल में तुर्ता कोन है?
  22. 1:02–1:03सही का.
  23. 1:03–1:06और मैं ये भी जोडन चाँँँगी कि ये ये स्वोट
  24. 1:06–1:11तो अगर इसके मनोवएग्यानेक अर दाशनिक पहलोग पर गवर कियाजाईना,
  25. 1:11–1:16तो यह भहे सत्ता और मान्वियद्रुटा का एक अज़्ान है,
  26. 1:16–1:19जो आज्ग के दोर में उतना ही प्रसंगेक है.
  27. 1:19–1:21सत्ता और प्रतिरोध का ये आख्यान,
  28. 1:21–1:27सत्ता और प्रतिरोद का ये आख्यान, हमें कई असहज कर दिने वाले सवालों के सामने कब देता है.
  29. 1:27–1:29और इनी सवालों की परते आजा में खोलनी है.
  30. 1:29–1:33तो कहनी की प्रिष्ट भूमी समझना बहुत जरूरी है यह आपर.
  31. 1:33–1:36ये गाता देव्ताओ की भविता की नहीं है,
  32. 1:36–1:48बलकी एक सादारन मनुष्छे के एज़ सादारन होसले और अर अंतता एक अज़ी कन्न्या की है भिहुला जिसने म्रत्यों की उफन्ती दारा में खुद उतर कर विवस्तासे बगावत की.
  33. 1:48–1:52तो शुर्वात करते हैं उस जगा से जहां से यहां से महाकावे जन लेता है.
  34. 1:52–1:54यान लिता है, यानी चंपानगर.
  35. 1:54–1:56स्रोथ में चंपानगर का जित्रन है ना
  36. 1:56–1:59वो आज्टा है की कोई आज्ट का आदूनिक महनगर
  37. 1:59–2:00उसके आगे चोटा पडजाए.
  38. 2:00–2:03बलकुल, गंगा किनारे बसावा ये एक
  39. 2:03–2:05आज्टा भव्यनगर बताया गया है
  40. 2:05–2:08जाए बनजारे और विआपारी दून्या बहर से आते हैं
  41. 2:08–2:11दूब गाटों पर विशाल जाजाजों का बेडा कडा है
  42. 2:11–2:17हाँ और बाजारो में साथ समदर पार के मसालों और इत्र की सुगंद पहली है
  43. 2:17–2:22और इस पुरी आर्टिक स्था का जुक्किन्र है, वहा सर्फ एक ही नाम है.
  44. 2:22–2:29चान सोदागर कर परचाय महेंज एक आमीर व्यापारी का नहीं है.
  45. 2:29–2:34स्रोथ में ये स्पष्ट की आगया है, कि वे चोदा विशाल जाहाजों के स्वामी है.
  46. 2:34–2:36बाप्रे, चोदा जाहाज.
  47. 2:36–2:39अगर अज के संदर्ब में सुचें तु ये किसी अज़्ोबल टेक अरब्पती जैसा लकता है,
  48. 2:39–2:41जिसकी प्यचान उसकी कमपनी के शेर से नहीं,
  49. 2:41–2:47ज़ाना भी उनके आगे चोटा पडजाए, पूरा चंपानगर एक तरा से उनके इशारो पर चलता है.
  50. 2:47–2:51लेकिन यहाग जो सब से दिरचस तो बात है, विये के चान सोदागर की अस्ली पहचान,
  51. 2:51–2:55उनका ये असी मिद दन या उनके जाज बilkul नहीं है.
  52. 2:55–3:00अगर आजके संदर्ब में सुचें, तो ये किसी आजक्छी आप्टेक अरब्पती जैसा लकता है,
  53. 3:00–3:06जिसकी प्यचान उसकी कमपनी के शेर से नहीं, बलकी उसके एक बहत कठोर लगबख जुनूनी विक्तिगत उसुल से है.
  54. 3:06–3:08इक दम सतीक तुलना है ये.
  55. 3:08–3:14चान सवदागर की पहचान है, बबवान शिप के प्रती उनकी अटूज और अटिक भकती.
  56. 3:14–3:18उनका हर दिन एक ही कत्होर अनुशासन से शुरू होता है.
  57. 3:18–3:23गंगासनान, बेलपत्र, रुद्राक्ष, और हर-हर महादेव कनाद.
  58. 3:23–3:27अर यान उशासन बड़लब उनके जीवन का कोई चोटा सा हिस्सा नहीं है
  59. 3:27–3:28बलकल नहीं
  60. 3:28–3:30ये उनका पूरा जीवन दर्षन है
  61. 3:30–3:34श्रोथ में उनका एक कतन उनके पूरे चरित्र को गडता है
  62. 3:34–3:37वि मानते है की ये सर्फ-सर्फ एकी जगा जुकता है
  63. 3:37–3:41केलाश पती के चरनो में. दूसरी जगा जूके तो इस सिर का क्या काम?
  64. 3:41–3:44ये वाग के सुन्ने में तो बज्यान्दार लकता है, बहुत वीर रस्वाला.
  65. 3:44–3:48लिकिन क्या यही वो बिंदू नहीं है जहां से विनाश की नीव रखी जाती है.
  66. 3:48–3:49कैसे?
  67. 3:49–3:53ये द्रुद्ता जो बहार से नकी सबसे भडी तागद दिकती है,
  68. 3:53–3:56अन्दर यन्दर उनके लें एक अजी चट्टान बन जाती है,
  69. 3:56–3:57जिसे तूफानो से तख्राना ही ता?
  70. 3:57–4:01आ, मैं सहमत हूँ, यही इस चरित्र की त्रासदी भी है,
  71. 4:01–4:06अद वो शक्ती उबर कराती है, सर्प लोग से देवी मन्सा के रूप में
  72. 4:06–4:12विष्की स्वामिनी बिल्कुल, श्रोथ के अनुसार देवी मन्सा के भीतर एक गेरी और बेच्यान कर देने वाली इच्छा जन में लेती है
  73. 4:12–4:42अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अ�
  74. 4:42–4:45यानी प्रत्वी पर अपनी सत्ता स्तापित करेंगी
  75. 4:45–4:48लोग उनके नाम के तान या मन्दिर बनाएंगे
  76. 4:48–4:50उनकी पुजा करेंगे
  77. 4:50–4:53यान श्रोथ सामगरी लेव्ताओ को जिस तरह
  78. 4:53–4:54मानवी क्रित कीए है
  79. 4:54–4:57मतलब, विमनाइस, विमनाइस कीए है
  80. 4:57–4:59वो बहुत द्यान देने योगे है.
  81. 4:59–5:00आवो तो है.
  82. 5:00–5:02वंचा की ये जो लालसा एना,
  83. 5:02–5:05वो इश्वर ये कम और मानविय ज्याडा लकती है.
  84. 5:05–5:07ये मानिता और स्विक्रिती की वो भूख है,
  85. 5:07–5:09जो किसी भी सत्तादारी को हुती है.
  86. 5:09–5:11अचा मुझे यहीपर एक पेईच नजर आता है.
  87. 5:11–5:11क्या?
  88. 5:12–5:15मधदब, क्या ये एक बहुत बडी विडंबना नहीं है?
  89. 5:15–5:18कि जिसके पास विष्की असीमित ताकत है,
  90. 5:18–5:21जो जीवन और विद्ट क्यो तै कर सकती है,
  91. 5:21–5:24उसे प्रिठ्वी के अन्सानो से वलडेशन चाही है.
  92. 5:24–5:25आई ये विरोदा भास तो है
  93. 5:25–5:27ये पूली प्रक्रिया
  94. 5:27–5:30तो आजके सोचल मीट्या माकेटिंग स्ट्राटिजी जैसी लकती है
  95. 5:31–5:32अच्छा कैसे
  96. 5:32–5:35मतला जैसे जब कोई ब्राँन्द नया प्रोड़ाक लाईच करता है
  97. 5:35–5:38तो लोग अकसर सबसे बड़े प्लूएंसर को पकरते हैं
  98. 5:38–5:43ये सोचकर के अगर सबसे मशुर और आमीर अन्सान ने सब्राईन का प्रचार कर दिया
  99. 5:43–5:46तो बागी की जनता तो बिना सोचे समजे पिछे पिछे आही जाएगी
  100. 5:46–5:49बिल्कुल मन्सा भी बिल्कुल यही रन्नीती अपनाती है?
  101. 5:49–5:52ये तुर्ना आजके संदर्ब में बहुत फिट बैट्ती है.
  102. 5:52–5:55मन्सा की रन्नीती एक दम सपष्ट थी.
  103. 5:55–5:59वे जानती है की भ्यए का सम्राजज़ तबही स्थापित होता है,
  104. 5:59–6:03जब समाज कद सबसे तागत्वर व्यक्ती सबसे पहले कुटने तेके
  105. 6:03–6:06अगर चंपानगर कद सबसे प्रतिष्थित नाम
  106. 6:06–6:09यानी चान सवदागर उनके आगी जुग गया
  107. 6:09–6:13तो बाकी का नगर तो सवतही उनका अनुयाई बन जाएगा
  108. 6:13–6:15शक्ती अपने आपने पर्याप नहीं होती,
  109. 6:15–6:18उसे पनपने किलिए एक मनज चाही होता है.
  110. 6:18–6:19इक प्रदर्षन चाही होता है.
  111. 6:19–6:22तो इसी प्रदर्षन किलिए मन्सा
  112. 6:22–6:24सीदे चंपानगर उतरती हैं.
  113. 6:24–6:27वे चान सोदागर के सामने प्रकत हो कर,
  114. 6:27–6:31इक बहुत लिए सीदा अदेश दिति हैं, मेरी पुजा कर.
  115. 6:31–6:37और मन्सा को अपनी सत्ता और अपने विष्ख के खोफ पर इतना जीादा बहुरुसा था,
  116. 6:37–6:39उनके लिए ये सुचना भी असमबव था,
  117. 6:39–6:41कोई येक सादारन मनुश्छे
  118. 6:41–6:44एक देवी के अदेश को नकारने का दूसा हस कर सकता है.
  119. 6:45–6:47लेके नोने अंदाजा नहीं ता,
  120. 6:47–6:49किस सामने कडा कोन है.
  121. 6:49–6:50बिलकुल.
  122. 6:50–6:52चान्द सवदागर का जवाब उतना ही सीदा ता,
  123. 6:52–7:02उनो ने बिना किसी जिजक के साफ प्वादेब की पुजा होती है, वे किसी और पर पूल नहींगे.
  124. 7:02–7:05इस इंकार के प्रक्रती को समजना यहा बहुत जोरी है.
  125. 7:05–7:06आप बताएए.
  126. 7:06–7:11स्रोथ ये सपष्ट करता है कि चान्द सोडागर के इस इंकार में
  127. 7:11–7:15अदेवी की वो माननेता की बूक अब अप्मान की अग में बड़ल जाती है
  128. 7:15–7:17अगलावे जानबुचकर नीचा नहीं दिखाए।
  129. 7:17–7:18नहीं, बलकल नहीं
  130. 7:18–7:23ये सरफ एक शिव भक्त की अपनी निष्था के प्रती पुँड सपष्टता थे
  131. 7:23–7:25उनका विजन क्लीर था
  132. 7:25–7:27लिएं सथता एसे एसे नीजगतीना
  133. 7:27–7:29मनसा एसे सीदे-सीदे
  134. 7:29–7:34अदेवी की वो माननेता की बूक अब अप्मान की अग में बड़ल जाती है।
  135. 7:34–7:40और जब दो जिद, एक इश्वर ये आइंकार और एक मानवी एक हत्छ आपस में तकराती है,
  136. 7:40–7:42तो बीच का कोई रास्ता नहीं बच्च्ता। बिल्खुल।
  137. 7:42–7:44तो बीज का ख़ी रास्ता नहीं बच्च्टा?
  138. 7:44–7:44बलकल
  139. 7:44–7:46अफर मन्सा वो करती हैं, जो इतिहास में,
  140. 7:46–7:48हर वो सथ्ता करती आईईईईई,
  141. 7:48–7:49जिसे च्णाउती मिलती हैं.
  142. 7:50–7:53वे उस अन्सान के सबसे कमजोर बिन्दु परवार करती हैं.
  143. 7:53–7:55चान सोदागर के सात बेटे थे.
  144. 7:55–7:59आप श्रोथ उने है, सात दीप, सात सहरे कैकर पुकारता है.
  145. 7:59–8:03मन्सा उने विष्के प्रबाव से एक एक करके सातो बिटो को मुत की नींज सुला देती है.
  146. 8:04–8:09या कहानी का वह मोड है, जहां सब कुछे गने दमगोटु अंदकार में दॉप जाता है.
  147. 8:09–8:19यह दूब जाता है. चंपानगर का उसबसे सम्रिद, खृषाल और भरा पुरा आंगन एक ही जटके में साथ चिताओं कषम्शान बन जाता है.
  148. 8:19–8:21इस त्रास्दी कब भारी पम, मतलब अखल पनी यह है.
  149. 8:21–8:25बगद भारी है, इसका मनूवेग्यानिक भोज शब्दों में बयान नहीं किया जासकता.
  150. 8:26–8:29पर यहां मुझे चान सवदागर के चरित्र पर एक बहुत गंभीर सवाल उठाना है.
  151. 8:30–8:31जी.
  152. 8:31–8:33मैं समचता हूँ की उनकी आस्ता अटूट थी.
  153. 8:33–8:39लिक इक पिता होने कि नाते एक ही समय में अपने सातो बेटो की चिताओं को जलते देखना,
  154. 8:39–8:42क्या ये चान सवादागर का बहुत बडा एहंकार नहीं था?
  155. 8:42–8:44ये एक बहुत यी जटिल सवाल है.
  156. 8:44–8:49बद्दब लोग फुस्फुसा रे ते नगर वाले मिन्नते कर रे थे के विशेरी का कोप हैं मान जाओ.
  157. 8:49–8:54तो क्या बच्छों की जान बचाने के ले एक बार जुग जाना शिव की बख्ती को कम कर देता?
  158. 8:54–8:56कम कर देता? क्या ये सच्मे आस्ता थी?
  159. 8:56–8:59या महज एक अन्दा इगो जो अपने ही पर्वार को निगल गया?
  160. 8:59–9:02मैं सुमज रही हों की है कितना चुबता हुए सवाल है.
  161. 9:03–9:05और यही ही वो जगा है, जगा स्रोट समगरी
  162. 9:05–9:10अमे समान ने नेटिक्ता से निकाल कर एक गेरे दार्ष्निक दूंद में दखेल देती हैं.
  163. 9:10–9:15चान सुदागर कर ना जुकना बाहर से एक पिता की विपलता लग सकता है.
  164. 9:15–9:19लेकिन अद्यात्मिक और दार्ष्निक स्थर पर यह कुछ अरी है.
  165. 9:19–9:20यह से?
  166. 9:20–9:29दिक्ये अगर वे मन्सा के दर से जूग चाते, तो इसका मतलब यह उता कि शिव के प्रती उनकी अप टक्की बक्ती भी किसी भःय यो लेन देन पर आदारित थी.
  167. 9:29–9:33मदलब अगर दर कर पूजा कर ली तो पूजा रही ही कहा?
  168. 9:33–9:33बिलकोल.
  169. 9:33–9:36उतो एक तरका प्रटक्षन मनिया हवता देना हो गया
  170. 9:36–9:39जी भाई मुझे मत मारो, मैं तुमरी पूजा कर लूंगा
  171. 9:39–9:40एक दम सही पक्डा आपने
  172. 9:40–9:44चान्थ सुदागर का शोग एक पहाड के समान भारी जरूर था
  173. 9:44–9:47लिकिन उनका एक अदम आस्ता बनाम भआई के भीच
  174. 9:47–9:50इक बहुति स्पष्ट सीमा रेका कीचता है
  175. 9:50–9:53अकसर इश्वर की पुजा इसले की जाती है,
  176. 9:53–9:55ताकि जीवन परिवार और दन सुरक्षत रहें
  177. 9:55–9:58यहां चान दे अपना सब कुछ खो दिया है
  178. 9:58–10:01सुरक्षा का कोई आवरन नहीं बचा है
  179. 10:01–10:07भी भी वे अपनी जगागा पर खडे है, ये दरशाता है कि उनकी निष्टा लें देन से बहुत उपर उट्चूकी है.
  180. 10:07–10:10और उनका ये खडा रेना ही मनसा की सबसे बडी हार है.
  181. 10:10–10:11बिलकुल.
  182. 10:11–10:15बेटो की मुत के बाद इसी बिन्दूपर चान सुदागर एक अईसा तरक देते हैं,
  183. 10:15–10:18जो इस पूरी चर्जा का सबसे शक्तिषाली हिस्सा है.
  184. 10:18–10:22वे कहते है, जो देवी मेरे सात निर्दोष बेटों के प्रान ले सकती है,
  185. 10:23–10:24वो पुजा नहीं बहाई मांग रही है.
  186. 10:24–10:26और भ़़़ से जुके सरका क्यामोल?
  187. 10:26–10:31इस एक वाकि में सत्ता के दूरूपियों के खलाप एक बड़ाजनिक विद्रों चुपा है.
  188. 10:31–10:38चान सुदागर ये स्तापित कर रहे है, कि श्रद्धा और भ़ए, दो बिलकल विप्री दिशाए है.
  189. 10:38–10:42ज़ाँ भाय है, वाहाश्वद्धा कभी जन्म लेही नहीं सकती.
  190. 10:42–10:46तो ये सरफ एक हाथ नहीं है, ये बहुत बडी वैचारिग बगावध है.
  191. 10:46–10:50बाहर से देखने में वे एक बहुत इनिश्छुर अन्सान लक सकते हैं,
  192. 10:50–10:54लेकिन उनके भीतर उसुलों की एक आग जल रहे है
  193. 10:54–10:56उनका सीदा सा संदेश है
  194. 10:56–10:59कि अगर कोई शकती मुझे दरा कर मुझ से इजध मांग रहे है
  195. 10:59–11:01तो उजजध नहीं उजध मेरा डर है
  196. 11:01–11:04और मैं दर के आगे समर पर नहीं करूंगा
  197. 11:04–11:07और ये नेटिक जीत न्देवी को बरदाश्त नहीं होती
  198. 11:07–11:08बलकल नहीं होगी
  199. 11:08–11:11किकि साथ बेटे चीने के बाद भी
  200. 11:11–11:13जब सवदागर नहीं तुटे
  201. 11:13–11:15तो देवी का ख्रोद और भड़़कुटता है
  202. 11:15–11:18अप प्रहार उनके बहुतिक अस्तिट्वपर होता है
  203. 11:18–11:19जी हा
  204. 11:19–11:23मन्सा अब उनके व्यापार औनकी अथा समपती को निशाना बनाती है.
  205. 11:23–11:26स्रोथ में बहुत ही नाटकी एद्श्छ कावरनन है.
  206. 11:26–11:29चान सवदागर व्यापार कर के समद्र के रास्ते लोट रहे है.
  207. 11:29–11:33उनके चोड़ा जाहाज असीमत दन्डूलत से लड़े हुए है
  208. 11:33–11:38आँ, और तभी मन्सा बीच समुद्र में एक भेंकर तूफान कड़ा कर देती हैं
  209. 11:38–11:41लेहरें पहार जैसी उची होचाती हैं
  210. 11:41–11:44और देखते ही देखते आगो के सामने
  211. 11:44–11:48सबही चोदा जहाज समदर के काले पानी में समाजाते हैं
  212. 11:48–11:49सब कुछ कहतम
  213. 11:49–11:50सब कुछ
  214. 11:50–11:54चान सोदागर किसी तरे अपनी जान बचागर किनारे लकते हैं
  215. 11:54–11:59लिकिन जो विक्ती कुछ समे पहले तक चंपनगर का सबसे आमीर और प्रभावशाली आद्मी था
  216. 11:59–12:03वो अब एक कंगाल एक भिकारी बनकर किनारे पे ख़ा है
  217. 12:03–12:06साथ बेटे चले गए सारा दन चला गया
  218. 12:06–12:08जीवन बहर की कमाई दोब गय
  219. 12:08–12:11मनसा आस्मान से देख रही होंगी के
  220. 12:11–12:12अप तो यह अनसान तूटेगा
  221. 12:12–12:14अप तो इसके गटने जमीन पर आएंगे
  222. 12:14–12:17लेकिन यहाँ भी मन्सा गलत साभित होती हैं
  223. 12:17–12:22एक कंगाल जिसके पास अब खोने के लिए शाब्दिक रूप से कुछ नहीं बचा है
  224. 12:22–12:25वो अभी भी उस देवी के सामने अपनी रीट सीधी की एक हडा है
  225. 12:25–12:27कमाल का सहींजम है
  226. 12:27–12:29लेकिन कहानी यहाँ खत्मे नहीं होती
  227. 12:29–12:32बलकी यहां से ये एक बलकुल नया रूप लेती है.
  228. 12:32–12:36इसी गोर अंदकार और भयानक कंगाली के समय में
  229. 12:36–12:38नियती एक छोटा सा दीप चलाती है.
  230. 12:38–12:42चान सवदागर को एक खोर पुटर की प्राप्ती होती है.
  231. 12:42–12:44जिसका नाम है, लकंदर. जी.
  232. 12:44–12:47यो से जादा एक नैए खोफ को जनम देता है
  233. 12:47–12:52सब को पता है कि मनसा की नजर इस आक्फरी बेटे पर भी जरूर पड़ेगी
  234. 12:52–12:56और यही मुझे स्रोथ समगरी की रूप्रेका पर सबसे जादा हैरानी हूँई
  235. 12:56–12:57कैसी है रानी
  236. 12:57–12:59कहानी अप टार्शनिक सन्देश है
  237. 12:59–13:01अप दार्शनिक सन्देश है
  238. 13:01–13:03भी भी बाद्टा का प्रदाशनिक सन्देश है
  239. 13:03–13:05भी बाद्टा का चान्द चान्द चादागर
  240. 13:05–13:07अर मन्सा की महाजद के टक्राउ पर केंट्रित थी
  241. 13:07–13:09बिहुला चंपानगरक सती
  242. 13:09–13:13ये गाता अंतता चान सोदागर के नाम से नाजानी जाकर
  243. 13:13–13:16लकिन्दर की पतनी बिहुला के नाम से किवानी जाती है
  244. 13:16–13:18ये एक बहुती ज़ूरी सवाल है
  245. 13:18–13:20बिहुला जो आकरी हिस्से में आती है
  246. 13:20–13:22वो इस पूरी कहनी का कंदर कैसे बन जाती है
  247. 13:22–13:27ये बडलाओ इस पूरी बगाता का सबसे महतोपोण दार्षनिक सन्देश है
  248. 13:27–13:30इसे गहराई से समजने की जरूरत है
  249. 13:30–13:31बलकुल समजाए
  250. 13:31–13:34दिके चान सोदागर का जो प्रतीरोध था अचल था
  251. 13:34–13:35कठोर था
  252. 13:35–13:37वो एक आसी दिवार की तरहे खडे थे
  253. 13:37–13:40तो बग़े थे जो तूट सकती है लेकिन जूक नहीं सकती.
  254. 13:41–13:45इसे हम निष्क्रीः सहन शीलता या पैस्व एंड्योरिंस प कैसकते हैं,
  255. 13:46–13:49चान्दने मन्सा के सारे आगाद सहे आपनी पुरी दुन्या उजर जाने दी.
  256. 13:49–13:52लेगे नोंने पलटकर कोई सक्रीये या रचनात्मक संकर्ष नहीं किया
  257. 13:52–13:55एक दम सही वे बस मार सहते रहें
  258. 13:55–13:56ये बाध सोचने वाली है
  259. 13:56–13:58उनो ने सर्फ इंकार किया
  260. 13:58–14:01लेगे उस अन्याय को रोकने कि लिए कडवम नहीं उठाया
  261. 14:01–14:04अगर ज़ब लखिन्दर के शादी भिहुला से होती है,
  262. 14:04–14:09और शादी की ही रात, मन्सा के भीजे साम के तसने से लखिन्दर की भी मुध हो जाती है.
  263. 14:09–14:13तब भिहुला वो नहीं करती जो चंपानगर में अप थक होता आया था.
  264. 14:13–14:15तो यहां भिहुला का चरित्र कैसे लख़्ा होता है?
  265. 14:15–14:18बिहुला उस निष्क्रीय सहन्षील्ता को तोर देती है,
  266. 14:18–14:22उसका प्रतिरोद गतिषील और सक्रीय है,
  267. 14:22–14:26जहां चान सुदागर सर्फ किस्मत और देवी के प्रहार को सहरे थे,
  268. 14:26–14:29बिहुला उस प्रहार के खिलाफ क्डिई हो जाती है
  269. 14:29–14:32श्रोथ में जो बिहुला का कर्म है
  270. 14:32–14:35वही इस पूरी गाता की आत्मा है
  271. 14:35–14:37और वो कर्म क्या था?
  272. 14:37–14:40क्योकी श्रोथ बताता है कि बिहुला ने
  273. 14:40–14:43विद्वा बन कर विलाप करने या चिता पर सती हो जाने के
  274. 14:43–14:45उस्वे के चलन को पुरी टरा नकार दिया.
  275. 14:45–14:46अआ.
  276. 14:46–14:49उसने कुछ आज्सा किया जिसकी कलपना भी किसीने निकी ती.
  277. 14:49–14:50बिलकुल.
  278. 14:50–14:56बिहुला ने केले के तंबो यानी तनो को जोडगर एक नाव या मनजूशा बनाई.
  279. 14:56–14:59उस्टने अपने म्रित्पती के शव को उस नाव पर रख्खा
  280. 14:59–15:02और खुद उस नाव पर सवार हो कर
  281. 15:02–15:05गंगा की उपन्ती और खतरनाग दारा में उतर गगाई.
  282. 15:05–15:07ये बहुत बडी बाथ है.
  283. 15:07–15:09ये सर्फ एक भूटे क्यात्रा नी ती
  284. 15:09–15:14ये सीदे सीदे इश्वर ये सत्ता और म्रुट्यो के नियमो को चुनाती देना था
  285. 15:14–15:18वो देवताँ के लोग तक पूचने के लिए बेहत कष्टकारी सपर निकल पडी
  286. 15:18–15:20जहां शव गलने लगा था
  287. 15:20–15:24रहां बहयानक बादाई सामने थी लेकिन वो दिगी नहीं
  288. 15:24–15:26यही वो हिस्सा है जो रोंग्टे कड़े कर देता है
  289. 15:26–15:30श्रोथ के अंथ में भिहुला के माद्धिम से जो संदेश दिया गया है ना
  290. 15:30–15:34वो चान्सवादागर के उस अड्यल हद से कई गुना ज़ा बड़ा है
  291. 15:34–15:35और ज़ादा मान्विय भी है
  292. 15:35–15:39संदेश है भिहुला बनो यानी मुसीबत की दारा मे उत्रो
  293. 15:39–15:42लेकिन रार मत मानो रो
  294. 15:42–15:45लेकिन सिव किनारे पर बैट कर रोते मत रह जाँ।
  295. 15:45–15:48और अगर कुछ मागना ही है, तो सिव अपने लिये नहीं
  296. 15:48–15:50बलकि सब के लिये मागो।
  297. 15:50–15:52और यही भिहुला की महांता है
  298. 15:52–15:55चान्त सोदागर की लडाई बहुत ही वेक्तिगत थे
  299. 15:55–15:59उनकी अपनी निष्टा, उनका अपना उसुल, उनका अपना इनकार.
  300. 15:59–16:03लेकिन भिहुला की लडाई सामूहिग भलाई की लडाई बन गय.
  301. 16:03–16:07उसने देव्ताओ के लोग में जाकर जब नयाई मांगा,
  302. 16:07–16:10तो सर्फ अपने पती का जीवन नहीं मांगा,
  303. 16:10–16:12तो मतलब चान्द का हट विद्वंस्कारी ता
  304. 16:12–16:16जब की भहुला का संगर्ष, रचनात्मक और जीवन दाईनी था
  305. 16:16–16:17बलकुल
  306. 16:17–16:20चान्द सुदागर ने दून्या को ये सिखाया
  307. 16:20–16:23की गलत सत्ता और अन्याय के सामने जुकना नहीं चाहीए
  308. 16:23–16:25ये बहुड बडी बात है
  309. 16:25–16:28कि गलत सत्ता और अन्याय के सामने जुकना नहीं चाहीं
  310. 16:28–16:30ये बगत बडी बात है
  311. 16:30–16:32लिकिन भिहुला हमें ये सिकھाती है
  312. 16:32–16:36कि सर्फ नजुकना सर्फ मार काते रहना ही काफी नहीं है
  313. 16:36–16:39आपको उस अन्याय के खलाफ खडा हूना परता है
  314. 16:39–16:42उस उफन्ती नदी में अपनी नाउ उतारनी परती है
  315. 16:42–16:44और विवस्ता से जवाब मगना परता है
  316. 16:44–16:46मतलब विक्तिगद जिद
  317. 16:46–16:50जब तक निस्वार्त होकर समहिक भलाई में ना बडल जाए
  318. 16:50–16:52तब तक अस्ली जीत नहीं होती
  319. 16:52–16:54एक दम सतीक विष्लेशन
  320. 16:54–16:58ज़ाह चान, सवदागर और मन्सा की लडाई एक एगो का तक्राव ती,
  321. 16:58–17:03बिहुला ने उस पूरे ध्वंद को एक व्यापक मानवे करूना में बडल दिया.
  322. 17:03–17:07इसिले हे गाता अंत ता बिहुला के नाम से ही जानी जाती है.
  323. 17:07–17:13तो अगर हम आजकी इस गें चर्चा के इन सभी भिख्रेवे सुत्रों को एक साथ पिरोएं.
  324. 17:13–17:18तो चंपानगर की ये प्राछीन गा था, हमें कुछ बहुती गेरे सबक देकर जाती है.
  325. 17:18–17:23पहला तो ये कि सच्च्च विष्वास, सच्च्ची श्द्ध्धा और अस्ली इजध,
  326. 17:23–17:28कभी भी किसी के भ्दिल में भःे या ख्फ पेडा कर के रहसिल नहीं की जा सकती.
  327. 17:28–17:32अगर किसी को दरा कर अगे जुकने पर मजबोर किया जा रहा है,
  328. 17:32–17:35तो वो सम्मान नहीं है, वो सर्फ एक कबजा है.
  329. 17:35–17:36सही बाद है.
  330. 17:36–17:37और दुस्रा सब अक ये,
  331. 17:37–17:39कि जीवन की सब से बड़ी त्रासद्यो में
  332. 17:39–17:41चुप्चा बैट कर मार सहते रहना ही
  333. 17:41–17:43एक मात्र विकल्प नहीं है.
  334. 17:43–17:48बिहुला कितरा उस मुस्विबत की आखूमे आखें डालकर दारा में उतरना सीखना होगा.
  335. 17:48–17:53और में ये भी कहुंगी के ये कहानी सथ्टा में बैटे लोगों के लेग एक दर पर है.
  336. 17:53–17:54बिकुल.
  337. 17:54–17:58शक्ती का अस्ली उद्टेश आपना वर्च्छस्वस थापित करना नहीं,
  338. 18:13–18:43अज भी भी बज़ाद बज़ाद बज़ाद बज़ाद बज़ाद बज़ाद बज़ाद बज़ाद बज़ाद बज़ाद बज़ाद बज़ाद बज़ाद बज़ाद बज़ाद बज़ाद बज़ाद बज़ाद बज़ाद बज़ाद बज़ाद बज़ाद बज़ाद बज़
  339. 18:43–18:45अगर कोई भी विचार, कोई भी नहारटिव,
  340. 18:45–18:48या कोई भी सथ्ता, सर्फ नुक्सान पहचाने का दर्द दिखाखर,
  341. 18:48–18:50तालिया और सम्मान बडोर रही है.
  342. 18:50–18:52तो क्या उसम्मान वाखाई में सच्चा है?
  343. 18:52–18:55या वो सर्फ इस ख्रूर और तेस भागती दुन्या में
  344. 18:55–18:59या वो सर्फ इस खुर और तेस भागती दुन्या में सुरक्षिद बचर लहने के तरकीभ मात रहें।
  345. 18:59–19:00बिलकुल
  346. 19:00–19:04जब अगली बार किसी दबाव के आगे सर्ज जुके, तो खुट से ये ज़ूर पूशना चाहिए,
  347. 19:04–19:07बबआगती दुन्या में सुरक्षत बचर लहनेके तरकीब मात्र है
  348. 19:07–19:08बिलकुड
  349. 19:08–19:11जब अगली बार किसी दबाव के आगे सर्ज जुके
  350. 19:11–19:13तो खुट से ये ज़ोड पूशना चाएगे
  351. 19:13–19:16क्या ये नत्मस्तक होना सची शवट्धा है
  352. 19:16–19:19या फिर ये सर्फ मन्सा के विष्के दंग कदर है.
  353. 19:19–19:21बहुत ही विचार उत्तीजक.
  354. 19:21–19:23इस पर विचार ज़ोर हूना चाहीए.
  355. 19:23–19:28एक नहीं कहानी, नहीं स्रोथ, और एक नहीं सवाल के साथ फिरूत्रेंगे एक नहीं गराई में.
  356. 19:28–19:31तब तक सुन्तरहीए तब दीब डाएई.

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इक बार सोचने की कोशिष करते है की एक आसा पिता, जिसके अपने ही आंगन में एक के बाद एक, उसके सातो जवान बेटों की लाशें बिची हूं। मतलब ये सोचना ही कितना... बहुती खफनाख है, रोंगतें कडे कर देने वाला द्रिष्च. बिलकल. पूरा नगर त्राही त्राही कर रहो, लोग पैरो में गिर रहों कि भैई बस एक बार, स्रिव एक बार उस सामने कडी सत्ता के अगे सिर जुकालो, मापी मागलो लेकिन वो पिता उन साथ चितावो के भीज कडा है और सत्ता की आखो में आखेडाल कर कहरा है कि मैं अपना सब कुछ राक होता देख लुगा लेकिन तुमहारे अगे सिर नेजूकाूंगा और ये कोई मतलप कोई फिल्मी द्रिष्छे नहीं है आप बिल्प्री है ये कैसी गाता है, जहां अईन्सान का हद्त, सीदे देवताँं के एहंकार से तकराता है तो आज ददीब डाइप किस गहन चर्चा में अपने हम गजेंदर ताकुर दोरा समपादित एक बेहद शक्ती शाली स्रोथ समगरी बेहुला चंपानगर की सती के पन्नो में उतर रहें. और हमारा आज का मिशन यही समझना है, कि जब आसी मित इश्वरीय शकती और आजे मान्विय आस्था आमने सामने आती है, तो आसल में तुर्ता कोन है? सही का. और मैं ये भी जोडन चाँँँगी कि ये ये स्वोट तो अगर इसके मनोवएग्यानेक अर दाशनिक पहलोग पर गवर कियाजाईना, तो यह भहे सत्ता और मान्वियद्रुटा का एक अज़्ान है, जो आज्ग के दोर में उतना ही प्रसंगेक है. सत्ता और प्रतिरोध का ये आख्यान, सत्ता और प्रतिरोद का ये आख्यान, हमें कई असहज कर दिने वाले सवालों के सामने कब देता है. और इनी सवालों की परते आजा में खोलनी है. तो कहनी की प्रिष्ट भूमी समझना बहुत जरूरी है यह आपर. ये गाता देव्ताओ की भविता की नहीं है, बलकी एक सादारन मनुष्छे के एज़ सादारन होसले और अर अंतता एक अज़ी कन्न्या की है भिहुला जिसने म्रत्यों की उफन्ती दारा में खुद उतर कर विवस्तासे बगावत की. तो शुर्वात करते हैं उस जगा से जहां से यहां से महाकावे जन लेता है. यान लिता है, यानी चंपानगर. स्रोथ में चंपानगर का जित्रन है ना वो आज्टा है की कोई आज्ट का आदूनिक महनगर उसके आगे चोटा पडजाए. बलकुल, गंगा किनारे बसावा ये एक आज्टा भव्यनगर बताया गया है जाए बनजारे और विआपारी दून्या बहर से आते हैं दूब गाटों पर विशाल जाजाजों का बेडा कडा है हाँ और बाजारो में साथ समदर पार के मसालों और इत्र की सुगंद पहली है और इस पुरी आर्टिक स्था का जुक्किन्र है, वहा सर्फ एक ही नाम है. चान सोदागर कर परचाय महेंज एक आमीर व्यापारी का नहीं है. स्रोथ में ये स्पष्ट की आगया है, कि वे चोदा विशाल जाहाजों के स्वामी है. बाप्रे, चोदा जाहाज. अगर अज के संदर्ब में सुचें तु ये किसी अज़्ोबल टेक अरब्पती जैसा लकता है, जिसकी प्यचान उसकी कमपनी के शेर से नहीं, ज़ाना भी उनके आगे चोटा पडजाए, पूरा चंपानगर एक तरा से उनके इशारो पर चलता है. लेकिन यहाग जो सब से दिरचस तो बात है, विये के चान सोदागर की अस्ली पहचान, उनका ये असी मिद दन या उनके जाज बilkul नहीं है. अगर आजके संदर्ब में सुचें, तो ये किसी आजक्छी आप्टेक अरब्पती जैसा लकता है, जिसकी प्यचान उसकी कमपनी के शेर से नहीं, बलकी उसके एक बहत कठोर लगबख जुनूनी विक्तिगत उसुल से है. इक दम सतीक तुलना है ये. चान सवदागर की पहचान है, बबवान शिप के प्रती उनकी अटूज और अटिक भकती. उनका हर दिन एक ही कत्होर अनुशासन से शुरू होता है. गंगासनान, बेलपत्र, रुद्राक्ष, और हर-हर महादेव कनाद. अर यान उशासन बड़लब उनके जीवन का कोई चोटा सा हिस्सा नहीं है बलकल नहीं ये उनका पूरा जीवन दर्षन है श्रोथ में उनका एक कतन उनके पूरे चरित्र को गडता है वि मानते है की ये सर्फ-सर्फ एकी जगा जुकता है केलाश पती के चरनो में. दूसरी जगा जूके तो इस सिर का क्या काम? ये वाग के सुन्ने में तो बज्यान्दार लकता है, बहुत वीर रस्वाला. लिकिन क्या यही वो बिंदू नहीं है जहां से विनाश की नीव रखी जाती है. कैसे? ये द्रुद्ता जो बहार से नकी सबसे भडी तागद दिकती है, अन्दर यन्दर उनके लें एक अजी चट्टान बन जाती है, जिसे तूफानो से तख्राना ही ता? आ, मैं सहमत हूँ, यही इस चरित्र की त्रासदी भी है, अद वो शक्ती उबर कराती है, सर्प लोग से देवी मन्सा के रूप में विष्की स्वामिनी बिल्कुल, श्रोथ के अनुसार देवी मन्सा के भीतर एक गेरी और बेच्यान कर देने वाली इच्छा जन में लेती है अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अगर अ� यानी प्रत्वी पर अपनी सत्ता स्तापित करेंगी लोग उनके नाम के तान या मन्दिर बनाएंगे उनकी पुजा करेंगे यान श्रोथ सामगरी लेव्ताओ को जिस तरह मानवी क्रित कीए है मतलब, विमनाइस, विमनाइस कीए है वो बहुत द्यान देने योगे है. आवो तो है. वंचा की ये जो लालसा एना, वो इश्वर ये कम और मानविय ज्याडा लकती है. ये मानिता और स्विक्रिती की वो भूख है, जो किसी भी सत्तादारी को हुती है. अचा मुझे यहीपर एक पेईच नजर आता है. क्या? मधदब, क्या ये एक बहुत बडी विडंबना नहीं है? कि जिसके पास विष्की असीमित ताकत है, जो जीवन और विद्ट क्यो तै कर सकती है, उसे प्रिठ्वी के अन्सानो से वलडेशन चाही है. आई ये विरोदा भास तो है ये पूली प्रक्रिया तो आजके सोचल मीट्या माकेटिंग स्ट्राटिजी जैसी लकती है अच्छा कैसे मतला जैसे जब कोई ब्राँन्द नया प्रोड़ाक लाईच करता है तो लोग अकसर सबसे बड़े प्लूएंसर को पकरते हैं ये सोचकर के अगर सबसे मशुर और आमीर अन्सान ने सब्राईन का प्रचार कर दिया तो बागी की जनता तो बिना सोचे समजे पिछे पिछे आही जाएगी बिल्कुल मन्सा भी बिल्कुल यही रन्नीती अपनाती है? ये तुर्ना आजके संदर्ब में बहुत फिट बैट्ती है. मन्सा की रन्नीती एक दम सपष्ट थी. वे जानती है की भ्यए का सम्राजज़ तबही स्थापित होता है, जब समाज कद सबसे तागत्वर व्यक्ती सबसे पहले कुटने तेके अगर चंपानगर कद सबसे प्रतिष्थित नाम यानी चान सवदागर उनके आगी जुग गया तो बाकी का नगर तो सवतही उनका अनुयाई बन जाएगा शक्ती अपने आपने पर्याप नहीं होती, उसे पनपने किलिए एक मनज चाही होता है. इक प्रदर्षन चाही होता है. तो इसी प्रदर्षन किलिए मन्सा सीदे चंपानगर उतरती हैं. वे चान सोदागर के सामने प्रकत हो कर, इक बहुत लिए सीदा अदेश दिति हैं, मेरी पुजा कर. और मन्सा को अपनी सत्ता और अपने विष्ख के खोफ पर इतना जीादा बहुरुसा था, उनके लिए ये सुचना भी असमबव था, कोई येक सादारन मनुश्छे एक देवी के अदेश को नकारने का दूसा हस कर सकता है. लेके नोने अंदाजा नहीं ता, किस सामने कडा कोन है. बिलकुल. चान्द सवदागर का जवाब उतना ही सीदा ता, उनो ने बिना किसी जिजक के साफ प्वादेब की पुजा होती है, वे किसी और पर पूल नहींगे. इस इंकार के प्रक्रती को समजना यहा बहुत जोरी है. आप बताएए. स्रोथ ये सपष्ट करता है कि चान्द सोडागर के इस इंकार में अदेवी की वो माननेता की बूक अब अप्मान की अग में बड़ल जाती है अगलावे जानबुचकर नीचा नहीं दिखाए। नहीं, बलकल नहीं ये सरफ एक शिव भक्त की अपनी निष्था के प्रती पुँड सपष्टता थे उनका विजन क्लीर था लिएं सथता एसे एसे नीजगतीना मनसा एसे सीदे-सीदे अदेवी की वो माननेता की बूक अब अप्मान की अग में बड़ल जाती है। और जब दो जिद, एक इश्वर ये आइंकार और एक मानवी एक हत्छ आपस में तकराती है, तो बीच का कोई रास्ता नहीं बच्च्ता। बिल्खुल। तो बीज का ख़ी रास्ता नहीं बच्च्टा? बलकल अफर मन्सा वो करती हैं, जो इतिहास में, हर वो सथ्ता करती आईईईईई, जिसे च्णाउती मिलती हैं. वे उस अन्सान के सबसे कमजोर बिन्दु परवार करती हैं. चान सोदागर के सात बेटे थे. आप श्रोथ उने है, सात दीप, सात सहरे कैकर पुकारता है. मन्सा उने विष्के प्रबाव से एक एक करके सातो बिटो को मुत की नींज सुला देती है. या कहानी का वह मोड है, जहां सब कुछे गने दमगोटु अंदकार में दॉप जाता है. यह दूब जाता है. चंपानगर का उसबसे सम्रिद, खृषाल और भरा पुरा आंगन एक ही जटके में साथ चिताओं कषम्शान बन जाता है. इस त्रास्दी कब भारी पम, मतलब अखल पनी यह है. बगद भारी है, इसका मनूवेग्यानिक भोज शब्दों में बयान नहीं किया जासकता. पर यहां मुझे चान सवदागर के चरित्र पर एक बहुत गंभीर सवाल उठाना है. जी. मैं समचता हूँ की उनकी आस्ता अटूट थी. लिक इक पिता होने कि नाते एक ही समय में अपने सातो बेटो की चिताओं को जलते देखना, क्या ये चान सवादागर का बहुत बडा एहंकार नहीं था? ये एक बहुत यी जटिल सवाल है. बद्दब लोग फुस्फुसा रे ते नगर वाले मिन्नते कर रे थे के विशेरी का कोप हैं मान जाओ. तो क्या बच्छों की जान बचाने के ले एक बार जुग जाना शिव की बख्ती को कम कर देता? कम कर देता? क्या ये सच्मे आस्ता थी? या महज एक अन्दा इगो जो अपने ही पर्वार को निगल गया? मैं सुमज रही हों की है कितना चुबता हुए सवाल है. और यही ही वो जगा है, जगा स्रोट समगरी अमे समान ने नेटिक्ता से निकाल कर एक गेरे दार्ष्निक दूंद में दखेल देती हैं. चान सुदागर कर ना जुकना बाहर से एक पिता की विपलता लग सकता है. लेकिन अद्यात्मिक और दार्ष्निक स्थर पर यह कुछ अरी है. यह से? दिक्ये अगर वे मन्सा के दर से जूग चाते, तो इसका मतलब यह उता कि शिव के प्रती उनकी अप टक्की बक्ती भी किसी भःय यो लेन देन पर आदारित थी. मदलब अगर दर कर पूजा कर ली तो पूजा रही ही कहा? बिलकोल. उतो एक तरका प्रटक्षन मनिया हवता देना हो गया जी भाई मुझे मत मारो, मैं तुमरी पूजा कर लूंगा एक दम सही पक्डा आपने चान्थ सुदागर का शोग एक पहाड के समान भारी जरूर था लिकिन उनका एक अदम आस्ता बनाम भआई के भीच इक बहुति स्पष्ट सीमा रेका कीचता है अकसर इश्वर की पुजा इसले की जाती है, ताकि जीवन परिवार और दन सुरक्षत रहें यहां चान दे अपना सब कुछ खो दिया है सुरक्षा का कोई आवरन नहीं बचा है भी भी वे अपनी जगागा पर खडे है, ये दरशाता है कि उनकी निष्टा लें देन से बहुत उपर उट्चूकी है. और उनका ये खडा रेना ही मनसा की सबसे बडी हार है. बिलकुल. बेटो की मुत के बाद इसी बिन्दूपर चान सुदागर एक अईसा तरक देते हैं, जो इस पूरी चर्जा का सबसे शक्तिषाली हिस्सा है. वे कहते है, जो देवी मेरे सात निर्दोष बेटों के प्रान ले सकती है, वो पुजा नहीं बहाई मांग रही है. और भ़़़ से जुके सरका क्यामोल? इस एक वाकि में सत्ता के दूरूपियों के खलाप एक बड़ाजनिक विद्रों चुपा है. चान सुदागर ये स्तापित कर रहे है, कि श्रद्धा और भ़ए, दो बिलकल विप्री दिशाए है. ज़ाँ भाय है, वाहाश्वद्धा कभी जन्म लेही नहीं सकती. तो ये सरफ एक हाथ नहीं है, ये बहुत बडी वैचारिग बगावध है. बाहर से देखने में वे एक बहुत इनिश्छुर अन्सान लक सकते हैं, लेकिन उनके भीतर उसुलों की एक आग जल रहे है उनका सीदा सा संदेश है कि अगर कोई शकती मुझे दरा कर मुझ से इजध मांग रहे है तो उजजध नहीं उजध मेरा डर है और मैं दर के आगे समर पर नहीं करूंगा और ये नेटिक जीत न्देवी को बरदाश्त नहीं होती बलकल नहीं होगी किकि साथ बेटे चीने के बाद भी जब सवदागर नहीं तुटे तो देवी का ख्रोद और भड़़कुटता है अप प्रहार उनके बहुतिक अस्तिट्वपर होता है जी हा मन्सा अब उनके व्यापार औनकी अथा समपती को निशाना बनाती है. स्रोथ में बहुत ही नाटकी एद्श्छ कावरनन है. चान सवदागर व्यापार कर के समद्र के रास्ते लोट रहे है. उनके चोड़ा जाहाज असीमत दन्डूलत से लड़े हुए है आँ, और तभी मन्सा बीच समुद्र में एक भेंकर तूफान कड़ा कर देती हैं लेहरें पहार जैसी उची होचाती हैं और देखते ही देखते आगो के सामने सबही चोदा जहाज समदर के काले पानी में समाजाते हैं सब कुछ कहतम सब कुछ चान सोदागर किसी तरे अपनी जान बचागर किनारे लकते हैं लिकिन जो विक्ती कुछ समे पहले तक चंपनगर का सबसे आमीर और प्रभावशाली आद्मी था वो अब एक कंगाल एक भिकारी बनकर किनारे पे ख़ा है साथ बेटे चले गए सारा दन चला गया जीवन बहर की कमाई दोब गय मनसा आस्मान से देख रही होंगी के अप तो यह अनसान तूटेगा अप तो इसके गटने जमीन पर आएंगे लेकिन यहाँ भी मन्सा गलत साभित होती हैं एक कंगाल जिसके पास अब खोने के लिए शाब्दिक रूप से कुछ नहीं बचा है वो अभी भी उस देवी के सामने अपनी रीट सीधी की एक हडा है कमाल का सहींजम है लेकिन कहानी यहाँ खत्मे नहीं होती बलकी यहां से ये एक बलकुल नया रूप लेती है. इसी गोर अंदकार और भयानक कंगाली के समय में नियती एक छोटा सा दीप चलाती है. चान सवदागर को एक खोर पुटर की प्राप्ती होती है. जिसका नाम है, लकंदर. जी. यो से जादा एक नैए खोफ को जनम देता है सब को पता है कि मनसा की नजर इस आक्फरी बेटे पर भी जरूर पड़ेगी और यही मुझे स्रोथ समगरी की रूप्रेका पर सबसे जादा हैरानी हूँई कैसी है रानी कहानी अप टार्शनिक सन्देश है अप दार्शनिक सन्देश है भी भी बाद्टा का प्रदाशनिक सन्देश है भी बाद्टा का चान्द चान्द चादागर अर मन्सा की महाजद के टक्राउ पर केंट्रित थी बिहुला चंपानगरक सती ये गाता अंतता चान सोदागर के नाम से नाजानी जाकर लकिन्दर की पतनी बिहुला के नाम से किवानी जाती है ये एक बहुती ज़ूरी सवाल है बिहुला जो आकरी हिस्से में आती है वो इस पूरी कहनी का कंदर कैसे बन जाती है ये बडलाओ इस पूरी बगाता का सबसे महतोपोण दार्षनिक सन्देश है इसे गहराई से समजने की जरूरत है बलकुल समजाए दिके चान सोदागर का जो प्रतीरोध था अचल था कठोर था वो एक आसी दिवार की तरहे खडे थे तो बग़े थे जो तूट सकती है लेकिन जूक नहीं सकती. इसे हम निष्क्रीः सहन शीलता या पैस्व एंड्योरिंस प कैसकते हैं, चान्दने मन्सा के सारे आगाद सहे आपनी पुरी दुन्या उजर जाने दी. लेगे नोंने पलटकर कोई सक्रीये या रचनात्मक संकर्ष नहीं किया एक दम सही वे बस मार सहते रहें ये बाध सोचने वाली है उनो ने सर्फ इंकार किया लेगे उस अन्याय को रोकने कि लिए कडवम नहीं उठाया अगर ज़ब लखिन्दर के शादी भिहुला से होती है, और शादी की ही रात, मन्सा के भीजे साम के तसने से लखिन्दर की भी मुध हो जाती है. तब भिहुला वो नहीं करती जो चंपानगर में अप थक होता आया था. तो यहां भिहुला का चरित्र कैसे लख़्ा होता है? बिहुला उस निष्क्रीय सहन्षील्ता को तोर देती है, उसका प्रतिरोद गतिषील और सक्रीय है, जहां चान सुदागर सर्फ किस्मत और देवी के प्रहार को सहरे थे, बिहुला उस प्रहार के खिलाफ क्डिई हो जाती है श्रोथ में जो बिहुला का कर्म है वही इस पूरी गाता की आत्मा है और वो कर्म क्या था? क्योकी श्रोथ बताता है कि बिहुला ने विद्वा बन कर विलाप करने या चिता पर सती हो जाने के उस्वे के चलन को पुरी टरा नकार दिया. अआ. उसने कुछ आज्सा किया जिसकी कलपना भी किसीने निकी ती. बिलकुल. बिहुला ने केले के तंबो यानी तनो को जोडगर एक नाव या मनजूशा बनाई. उस्टने अपने म्रित्पती के शव को उस नाव पर रख्खा और खुद उस नाव पर सवार हो कर गंगा की उपन्ती और खतरनाग दारा में उतर गगाई. ये बहुत बडी बाथ है. ये सर्फ एक भूटे क्यात्रा नी ती ये सीदे सीदे इश्वर ये सत्ता और म्रुट्यो के नियमो को चुनाती देना था वो देवताँ के लोग तक पूचने के लिए बेहत कष्टकारी सपर निकल पडी जहां शव गलने लगा था रहां बहयानक बादाई सामने थी लेकिन वो दिगी नहीं यही वो हिस्सा है जो रोंग्टे कड़े कर देता है श्रोथ के अंथ में भिहुला के माद्धिम से जो संदेश दिया गया है ना वो चान्सवादागर के उस अड्यल हद से कई गुना ज़ा बड़ा है और ज़ादा मान्विय भी है संदेश है भिहुला बनो यानी मुसीबत की दारा मे उत्रो लेकिन रार मत मानो रो लेकिन सिव किनारे पर बैट कर रोते मत रह जाँ। और अगर कुछ मागना ही है, तो सिव अपने लिये नहीं बलकि सब के लिये मागो। और यही भिहुला की महांता है चान्त सोदागर की लडाई बहुत ही वेक्तिगत थे उनकी अपनी निष्टा, उनका अपना उसुल, उनका अपना इनकार. लेकिन भिहुला की लडाई सामूहिग भलाई की लडाई बन गय. उसने देव्ताओ के लोग में जाकर जब नयाई मांगा, तो सर्फ अपने पती का जीवन नहीं मांगा, तो मतलब चान्द का हट विद्वंस्कारी ता जब की भहुला का संगर्ष, रचनात्मक और जीवन दाईनी था बलकुल चान्द सुदागर ने दून्या को ये सिखाया की गलत सत्ता और अन्याय के सामने जुकना नहीं चाहीए ये बहुड बडी बात है कि गलत सत्ता और अन्याय के सामने जुकना नहीं चाहीं ये बगत बडी बात है लिकिन भिहुला हमें ये सिकھाती है कि सर्फ नजुकना सर्फ मार काते रहना ही काफी नहीं है आपको उस अन्याय के खलाफ खडा हूना परता है उस उफन्ती नदी में अपनी नाउ उतारनी परती है और विवस्ता से जवाब मगना परता है मतलब विक्तिगद जिद जब तक निस्वार्त होकर समहिक भलाई में ना बडल जाए तब तक अस्ली जीत नहीं होती एक दम सतीक विष्लेशन ज़ाह चान, सवदागर और मन्सा की लडाई एक एगो का तक्राव ती, बिहुला ने उस पूरे ध्वंद को एक व्यापक मानवे करूना में बडल दिया. इसिले हे गाता अंत ता बिहुला के नाम से ही जानी जाती है. तो अगर हम आजकी इस गें चर्चा के इन सभी भिख्रेवे सुत्रों को एक साथ पिरोएं. तो चंपानगर की ये प्राछीन गा था, हमें कुछ बहुती गेरे सबक देकर जाती है. पहला तो ये कि सच्च्च विष्वास, सच्च्ची श्द्ध्धा और अस्ली इजध, कभी भी किसी के भ्दिल में भःे या ख्फ पेडा कर के रहसिल नहीं की जा सकती. अगर किसी को दरा कर अगे जुकने पर मजबोर किया जा रहा है, तो वो सम्मान नहीं है, वो सर्फ एक कबजा है. सही बाद है. और दुस्रा सब अक ये, कि जीवन की सब से बड़ी त्रासद्यो में चुप्चा बैट कर मार सहते रहना ही एक मात्र विकल्प नहीं है. बिहुला कितरा उस मुस्विबत की आखूमे आखें डालकर दारा में उतरना सीखना होगा. और में ये भी कहुंगी के ये कहानी सथ्टा में बैटे लोगों के लेग एक दर पर है. बिकुल. शक्ती का अस्ली उद्टेश आपना वर्च्छस्वस थापित करना नहीं, अज भी भी बज़ाद बज़ाद बज़ाद बज़ाद बज़ाद बज़ाद बज़ाद बज़ाद बज़ाद बज़ाद बज़ाद बज़ाद बज़ाद बज़ाद बज़ाद बज़ाद बज़ाद बज़ाद बज़ाद बज़ाद बज़ाद बज़ाद बज़ाद बज़ अगर कोई भी विचार, कोई भी नहारटिव, या कोई भी सथ्ता, सर्फ नुक्सान पहचाने का दर्द दिखाखर, तालिया और सम्मान बडोर रही है. तो क्या उसम्मान वाखाई में सच्चा है? या वो सर्फ इस ख्रूर और तेस भागती दुन्या में या वो सर्फ इस खुर और तेस भागती दुन्या में सुरक्षिद बचर लहने के तरकीभ मात रहें। बिलकुल जब अगली बार किसी दबाव के आगे सर्ज जुके, तो खुट से ये ज़ूर पूशना चाहिए, बबआगती दुन्या में सुरक्षत बचर लहनेके तरकीब मात्र है बिलकुड जब अगली बार किसी दबाव के आगे सर्ज जुके तो खुट से ये ज़ोड पूशना चाएगे क्या ये नत्मस्तक होना सची शवट्धा है या फिर ये सर्फ मन्सा के विष्के दंग कदर है. बहुत ही विचार उत्तीजक. इस पर विचार ज़ोर हूना चाहीए. एक नहीं कहानी, नहीं स्रोथ, और एक नहीं सवाल के साथ फिरूत्रेंगे एक नहीं गराई में. तब तक सुन्तरहीए तब दीब डाएई.

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